शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

दामोदर लाल जांगिड का लघु व्यंग्य - हिंदी दिवस

कभी इनसे मिले हैं

अभी पिछले हिंदी दिवस की पूर्व संध्या की ही बात हैं,डा० अमुक लाल जी उपनामी कई

दिनों के पश्चात मेरे घर आये और हाथ में एक मुद्रित निमंत्रण पत्र थमा कर बोले कि कल हम अपने महाविद्यालय में हिंदी दिवस मनाने का कार्यक्रम रख रहें हैं ,आप भी देखने जरूर आना। उनके होठों पर एक उपकार मिश्रित आग्रह तो था ही साथ साथ में उनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की मटक भी स्पष्ट दृटिगोचर हो रही थी कि जाने कल वो कोई बड़ा चमत्कार दिखाने वाले हैं। वैसे डा० अमुक लाल जी उपनामी आदमी तो बहुत बड़े हैं लेकिन उनका परिचय बस इतना सा हैं कि आप एक राजकीय महाविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं, कुछेक दिनों से नाम के पूर्व डा० लगाने लगे हैं। डा० हो जाने के तत्काल बाद से आप केवल कक्षा में हिंदी भाषा पढाते समय ही विजातीय भाषाओं के शब्दों का बहिष्कार नहीं करते बल्कि हर स्थान पर बिना किसी पूर्वाग्रह के आप विजातीय भाषाओं के शब्दों उपयोग वर्जित मानते हैं। उनका मानना हैं कि उनके द्वारा यूं विजातीय भाषाओं के शब्दों उपयोग करने से हमारी मातृ भाषा हिंदी और भ्रष्ट हो सकती हैं।

मैंने निमंत्रण पत्र स्वीकार कर ऐसे सहेज कर रखा जैसे वो एक निमंत्रण पत्र न हो कर कोई प्रवेशानुमति पत्र हो। उनका मेरे घर कुछ क्षण ठहरने का मन देख कर मैंने उनसे आग्रह किया कि डाक्टर साहब कई दिनों के पश्चात आये हो थोड़ा ही सही कुछ पल बैठिए। सम्भव तया वो मेरा आमंत्रण ठुकरा देते मगर डाक्टर साहब का सम्बोधन सुन कर वो ऐसा नहीं कर पाये और बैठ गये। मुझे ज्ञात तो था कि डाक्टर साहब को लम्बे समय तक झेलना पड़ेगा लेकिन मुझसे रहा नहीं गया और एक साहित्यकार होने के नाते पूछना पडा कि और क्या चल रहा हैं।

सम्भवतया वो मेरे इस प्रश्न की प्रतीक्षा में ही थे,बोले चल क्या रहा हैं। हिंदी की दुर्दशा का समय चल रहा हैं। न तो कोई विशुद्ध हिंदी बोलने का प्रयास करता और न ही कोई विशुद्ध हिंदी लिखने का श्रम ,मैं अकेला कितना कर पाऊंगा।अब मैं किसी दूसरे का क्या उदाहरण दूं स्वयं आप भी तो अपने द्वारा रचित मुक्तिकाओं हिंदी मिश्रित उर्दू लिखते हैं, मिश्रण में भी आप हिंदी के तो केवल वो ही शब्द प्रयुक्त करते होंगे जिनका समानार्थी शब्द आप उर्दू अथवा फारसी में नहीं जानते। टोकने पर झट से कह देते हो कि हिंदी उर्दू तो दोनों सगी बहने हैं। यदि मैं पूछूं कि हिंदी उर्दू के सगी बहने होने का आपके पास कोई प्रमाण है क्या। दोनों की आयु तो देखिए ,यदि आपने हठात सम्बन्ध ढ़ूंढ़ने का प्रयास किया तो भी आप हिंदी और उर्दू में नानी और परनाती का सम्बन्ध ढ़ूंढ सकोगे। प्रतीत तो यह होता हैं कि ऐसा कहने वालों को न तो ठीक हिंदी आती हैं और न पूरी उर्दू।

मुझे कुछ काम याद आ गया था तो उनके चुप होते ही बिना एक पल गंवाए झट

से बोला कि डाक्टर साहब आप ठीक कह रहे हैं। हमने कब तो हिंदी पढ़ी थी और कहां उर्दू। इधर उधर से कुछेक शब्द,कतिपय वाक्यांश और अवसर मिले तो पूरी की पूरी पंक्तियां ही चुग लेते है और सुविधा अनुसार काम में ले लेते हैं। मुझे तो आज तक ज्ञात नहीं कि आपकी इस डाक्टर की उपाधि को हिंदी में क्या कहते है। मेरा प्रश्न पूरा होने से पूर्व ही डाक्टर साहब विदा हो गये।

दामोदर लाल जांगिड

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