शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

नवरात्रि विशेष रचनाएं

मंजुल भटनागर

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माँ
तुम हो आदि अनंता
शक्ति रूप भगवंता
ब्रह्म रूपा
जगत जननी
यशोदा बन
खिलाती कान्हा
कौशल्या बन दुलारती
हर घर में बसती
अहसास बन
हर दिन हर श्वास में
बन उतरती  माँ संसृति बन

माँ
तुम पालन हारी
रिपु दलन कारणी बन
मन्दिर में सज जाती
मूर्ति बन
शंख और घंटियों में
बजती आरती बन
ममत्व बांचती
कल्पना को मूर्त करती
बाल गोपाल बन.
 
माँ तुम
राग रागनी में ढलती
गीत गोबिंद गाती
भजन बनती
शांत निविर्घन
धूर्म वर्तिका सी बन
आशीर्वचनों सी माँ
अपने बच्चों के लिए
भक्तों के लिए
तुम उतरती मन मंदिर में
माँ ,पूरा आकाश बन।

 

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डाक्टर चंद जैन 'अंकुर'

मेरी माँ
मेरी चेतना है माँ तेरे गुरुत्व का दिया हुआ
गुरुत्व का दिया हुआ प्रभुत्व का दिया हुआ
विश्व देह भीड़ में था देहमान ढूढता
देहमान ढूढता विदेह मान ढूढता
गुरु देह मिलगया गुरुदेव मिलगया
मिलगया शिवचेतना मिल गया शिवचेतना

मेरी चेतना है माँ तेरे गुरुत्व का दिया हुआ
गुरुत्व का दिया हुआ प्रभुत्व का दिया हुआ

देखता है कौन मै या तू मेरे लिये
ढूढ़ता  है कौन मै  या तू मेरे लिये
सोचता है कौन मै या तू मेरे लिये
मैय्या तू मेरे लिये  मैय्या तू मेरे लिये

मेरी चेतना है माँ तेरे गुरुत्व का दिया हुआ
गुरुत्व का दिया हुआ प्रभुत्व का दिया हुआ

मेरे नन्हे नन्हे पैर क्या इतना विशाल हो गया
मेरे छोटे छोटे नैन क्या दृष्टिवान हो गया
मै महान हो गया या बुद्धिमान हो गया
मै नहीं ये मानता चाहे कोई मान ले

मेरी चेतना है माँ तेरे गुरुत्व का दिया हुआ
गुरुत्व का दिया हुआ प्रभुत्व का दिया हुआ

माता पिता के कामना से देह एक पा  गया
जो दिया है जिन्दगी ने दान है गुरुत्व का
जो भी मिला है जिन्दगी में मान है गुरुत्व का
देहवृक्ष चेतना शिवत्व का दिया हुआ

मेरी चेतना है माँ तेरे गुरुत्व का दिया हुआ
गुरुत्व का दिया हुआ प्रभुत्व का दिया हुआ

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