शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

तेलुगु कविता - कर्लपालेम् हनुमन्त राव की कविता

‘वह’ और हम

    ‘उसकी’ कीटनाशक दवाओं को आदमियों पर ही इतना प्रेम क्यों?
    ज़हर...जब मिथाइल आइसो साइनेड़ के छद्म वेष में...
    शहर पर टूट पड़ी- तब
    उन अंधियारे क्षणों के सामने हीरोशिमा और नागासाकी की बमबाजी ही नहीं,
    ‘नौ ग्यारह’ वाले आतंकवादी हमले भी नगण्य हैं।
    टोपीवाले का मायाजाल ही कुछ ऐसा है...

    उसकी चालबाजी ऐसी है कि-
    खुली हवा का बहाना देकर हमारे दरवाजे में ही छेद कर डालेगा!
    बहुत पुराने जमाने में वास्को-द-गामा आकर काली मिर्च का पौधा माँगना हो या-
    कम्पनी वाले का आकर तीन कदमों की ज़मीन माँगना...
    हमारी आँखें छिपाकर हमारी खोपड़ी में उसका झण्डा गाड़ने के लिए ही!
    हमारी मांसपेशियों को मसलकर
    हमारी फसलों को जहाजों पर लादकर ले जाने के लिए ही!
    यह सब तो अब पुरानी कहानी हो चुकी।
    नयी कहानी में हम कहाँ ठहरे हैं?
    वामन के वर माँगने से पहले ही अपना सिर दिखाने वाले सम्राट बलि हैं हम!
    पृथ्वी को चटाई की तरह मोड़कर-
    ‘उसके’ पैरों तले बिछाने के लिए होड़ाहोड़ी करने वाले कलियुग-कर्ण हैं हम!
    अपने रूपये की प्राणवायु को
    ‘उसके’ डॉलर की जीविका हेतु तिनके की भांति समर्पित कर देने वाले बावले सौदागर हैं हम!
    हमारी दरियादिली तो इतनी है कि-
    अपने गाँवों को ढ़हाकर, सड़कों को चौड़ा बनाते हैं..
    ताकि उसके हवाई जहाज ठीक से ज़मीन पर उतरें!
    उसकी जीभ सीधी नहीं चल सकती- इसलिए
    हमारी अपनी जुबान को टेढ़ा बनाने में भी हम संकोच नहीं करते!
    उसकी अणुदुकानों के लिए -
    अपनी अन्नपूर्णा के पेट में आग लगाने के लिए भी हम तैयार!
    हमारी ‘सर्व प्रभुत्व संपन्नता’ एक तमाशा है-
    उसे देखकर खुशी के मारे तालियाँ बजाना ही हमारा बड़प्पन है।
    अणु समझौते के कारण भविष्य में संपन्न होने वाले भारतीय चेर्नोबिल नाटक के लिए
    पच्चीस साल पहले ही शुरू हो चुका है-
    ‘भूपाल राग’....सुनते हो कि नहीं!

।।।।।
तेलुगु मूल :- कर्लपालेम् हनुमन्त राव
अनुवाद :- दण्डिभोट्ला नागेश्वर राव

Dr. D. Nageswara Rao, Assistant Professor, 

Department of Hindi, 

Faculty of Sanskrit and Indian Culture, 

SCSVMV (Deemed) University, Kanchipuram 631561

http://www.kanchiuniv.ac.in/hindi/faculty/faculty1.html

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