सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

फ्रेंक्‍वाइस सागा की कहानी - वापिसी

फ्रेंक्‍वाइस सागा की कहानियाँ

वापिसी

उसने टी.वी. शुरू की और सोफे पर आराम से घुटने मोड़ बैठ अधुखुली आँखों से देखने लगी। यह वही अदा थी जिसे वह बिलाड़ासन कभी कहा करता था और आजकल कृत्रिम और अस्वाभाविक कहता है। वो बेहद मुलायम ऊन की सफेद स्वेटर पहिने है जिससे उसकी लम्बी सुन्दर प्यारी सी गर्दन निकली हुई है। सुनहरे बालों के रोएँ जेसे छोटे-छोटे बाल उसकी गर्दन के पीछे घुघराले हैं जो उसके चेहरे को अतिरिक्त आकर्षक बना रहे हैं। शुरूआती दिनों में तो वह एक बार सहम ही गया था जब उसने हँस जैसी गर्दन और कबूतरी आँखों को प्यार से हुआ था। उसके आकर्षण से बंधे होने पर उसने कभी उसकी गर्दन की लम्बाई और प्यारे से सिर और कलाइयों की लचक का श्रेय उसके सव्यवस्थित पालन पोषण दिया था। उस समय प्रेम में पागल हो उसने ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया थ जो प्रायः गंवार लोग किया करते है। उसने अपनी मिस्ट्रेस (रखैल) को संभ्रात होने को स्वीकार लिया था और इन विशेषताओं को सामान्य या हास्यास्पद न मान उसने उसकी वैसही ही देखभाल की जैसे प्यारे से क्रिरटल में रखे बहुमूल्य फूलों की करते हैं, हालाँकि सच यह था कि उसका व्यवहार चाढुकारितापूर्ण था जिसमें प्रतिष्ठा भी समाहित थी और अब वह संताप से त्रस्त था क्योंकि उसे अब अहसास हो रहा है कि उसने एक सम्पूर्ण रूप से सुन्दर पदार्थ से प्यार किया था, एक स्त्री से नहीं। उसने अपनी मिस्ट्रेस से वैसे ही प्यार किया था जैसे कोई पैसों और कला से करता है। उसकी सुन्दरता के कारण और अब वह स्वयं से नाराज था क्योंकि उसने ढोंग करते हुए हल्के उथले शब्दों से उस मूल असीमित भावना को, जिसे सम्मान से कुद लेना देना नहीं है,उसे उस कोमल जरा सी बात में आहत होने वाली भावना को गिफ्ट रूप में बाँधने का भयानक अपराध किया था जिसे प्यार कहते हैं। उसने उसकी बुद्धि प्रतिक्रिया हीनता और संवेगों के निचले स्तरों से सापात बचते रहने की आदतों को प्यार किया था। उसने प्यार किया था अपेक्षाओं से जो वो पूरा कर ही नहीं सकती थी, उन सुरक्षा कवचों से जिनसे उसने स्वयं को घेरे रखा है और इसके बाबजूद आदिम जंगली प्यार की अपेक्षा वह कौन से प्यार को वास्तविक मानने लगा था। उसने हजारों हजार बार उसकी पर पुरुष-गामिता को उसकी मूर्खताओं या दुर्गुणों को प्यार कर लिया होता। काश। उसने ऐसा किया होता तो कम से कम अपने सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों को ही समझ भी सकता था और स्वयं पर आराम से हँस भी सकता था और इन सबके साथ स्पष्टतः यह भी समझना सम्भव होता कि आज की रात उससे कैसे संबंध विच्छेद करले।

उसने अपने पैर पसारकर उन्हें पूरी शक्ति से खींचा। वो काले रंग की डिजाइन की हुई स्लेक्स पहिले है जिससे उसकी सुन्दर देह का आकार स्पष्ट दिख रहा है। यहाँ भी तो उसने धोखा खाया था, उससे भी और अपने आप से भी क्योंकि रात में अपनी बाँहोंमें वह पाया करता था एक उत्तेजना के ज्वार को, गुलाम को, मदोमंत्र को और सुबह उठने पर उसके सामने एक बार फिर आत्मकेन्द्रित शालीन स्त्री हुआ करती थी। वर्फ के अंदर दबी आग उसने अपने आप से कहा था। आखिर इन परिस्थितियों में उसका प्रेम आगे कैसे बढ़ता गया। भला इस द्वैत के बीच वह उत्तेजना के ज्वार में जाता कैसे था और उसे उत्तेजना से उफनता हुआ भी पाता था। एक स्त्री के भला दो विरोधी रूप हो कैसे सकते हैं दिन में शाँत और तटस्थ और राम तें उत्तेजना की लपलपाती लौ। दोनों ही रूपों में से यह है कौन? इसके बावजूद उसने आनंद तो उठाया ही है, ऐसा वह सोचता रहा है (अकल्पनीय) रात में उठते आनंद के ज़्वार के साथ दिन में एक सांसारिक व्यक्ति और रात में मर्द वैश्या। एक बार भी तो उसने उसे अपने स्तर का नहीं माना। प्रेम में पड़ा व्यक्ति जिससे प्रेम करता है उसके प्रति उदासीनता कभी दिखला ही नहीं सकता और न ही प्रेम के अस्वाभाविक प्रदर्शन के लिए उसे बाध्य ही कर सकता है। उनका रिश्ता एक ढोगे था, झूठ था पूरी तरह। हालाँकि एक भी समोगरत स्मृति उसकी चेतना को परेशान नहीं कर रही है लेकिन कुछ शब्द थे जो विगल होते हुए कहे गए थे 'जल्दी ही तुमसे मिलूँगी डियर' शब्द पर्याप्त अजनबियों जैसे स्वर से निकले थे, वो भी उन दोस्तों के सामने जो उनके आंतरिक रिश्ते को जानते थे सुन उसे शर्म आई थी। किस शर्मनाक खाई में, किस नकली नाटक में वह यों ही भटक कर इस उम्मीद में पहुँच गया था कि वहाँ ड्राइंग रूप में हास्य नाटिका में भागीदारी करेगा। अंततः उसने कैसे-जिसने प्यार किया भी था और प्यार पाया भी था और जो आज भी प्रेम में आस्था रखता है ऐसे जंगली, गंदे भोड़ेपन में हिस्सेदारी पर सहमति कैसे दे दी थी कैसे?

''हाँ तुम क्या पीना पसंद करोगे''? सउने सर्वोत्तम हाई सोसायटी के लकड़ो में उसे देखते हुए पूछा था।

''मैं ले लूंगा, तुम्हें क्या चिाहिए? उसने उसके नकली लहजे को दरकिनार करते हुए कहा था।

वाक्य पूरा करते ही उसे बेहूदगी का अहसास हुआ। नहीं, उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह औपचारिक रहे, औपचारिकता का एक ढाल की तरह उपयोग करें, एक सर्द तिरस्कार भरी वापिसी। भला कोई कैसे उस स्त्री को सोजन्यपूर्ण व्यावहारिकता के साथ छोड़ सकता है जिसकी उत्तेजना भरी ऊष्मा में उसने दो वर्ष व्यतीत किए हों? बेहतर तो यही होगा कि यह वापिसी भी आकर्षक ढंग सेहो।

उसने न तो कोई प्रतिक्रिया ही व्यक्त की, न ही कोई उत्तर ही दिया। बिना काँपते हाथों के उसने लिए ड्रिंक बनाई और शंकर वापिस शेल्फ में रखा जो वहाँ के लिए उपयुक्त न था क्योंकि शेल्फ भी अपरिचित सा लग रहा था। इसके बाद वह आर्मचेर की ओर बढ़ गया जो सँभवतः लुई छब्बीसवें के काल की थी। इस घर में, इस संसार में वह अपने को गुमा हुआ सा महसूस कर रहा था जिसके एक-एक कोने अतरे से वह कभी परिचित था और जिससे उसने प्यार किया था, कि जैसे ही उसने छोटी टी.वी. पर एक सुपरिचित पाखंडी राजनेता के चेहरे को देखा तो उसे बेहद राहत महसूस हुई। इस बार उसने चेहरे को सहानुभूति के साथ देखा यहाँ तक कि कुछ पश्चाताप के साथ। ''एक समय थ जब मैं तुम्हें बादी आत्मप्रशंसक, ढोंगी और बेईमान समझा करता था'', उसने आपने आप से कहा ''जब तुम मुझे हृदयहीन, चेतनाबिहीन लगा करते थे अपने पूरे अक्खड़पन के बीच हाँ मुझे तो तुम्हारी प्रशंसा करनी चाहिए। तुम तो साकार रूप में सामने वाली के जैसे हो''।

अपने पैर पसार कर उसने कुर्सी के हत्थों पर हाथ फैलाकर रख लिए। वह आराम से सुस्ता रहा था। उसकी देह एक छोटे बच्चे की तरह मो रहीथी, अपने पूरे आकार में देह, यह देह कुछ घन्टों बाद अकेली आराम करती पड़ी होगी दो घुली ताजी चादरों के बीच। इस प्रेम प्रसंग की समाप्ति के बाद स्वाभाविक है, उस कुछ ही समाप्ति के बाद जिसका वास्तविकता से कोई संबंध था ही नहीं।

''यह तो निरा पागलपन है'' वो पूँछ रही थी ''वे सभी यही बात तो कहा करते हैं।''

उसने सिर हिला दिया। एक बार फिर उसने सहमति व्यक्त की। वह हमेशा उससे सहमत होता रहा है। वो इतने विरक्त भाव से मज़ा किया लहजे से कह रही थी, कि उसके विरोध का कोई अर्थ ही नहीं था क्योंकि वो अपने शब्दों से कभी भी आसानी से वापिस भी सकती है। लेकिन सच यह था कि वो ऐसा करती नहीं है, वो अपनी रुचियों, प्राथमिकता पर, अपने व्यक्तिगत अनुभवों के निष्कर्षो को कस कर पकड़े रहती है, जिनका उसने बाइबिल से नहीं वरन्‌, गाइड बुक्स से निर्माण किया है। और उसकी थकी-थकी सी आवास जो लम्बी खिंचती है, इतनी विश्वसनीयता भरी रहती है जो वास्तव में भयाक्राँत दयाहीन स्त्री का आवरण मात्र है। हाँ, सच यही है कि यह भयग्रस्त है, इस भय से कि कही वह निर्धन हो गई तो, हालाँकि वह जवान है, डरी हुई कि कहीं वह फिसल न जाए हालाँकिवो अपने शालीन व्यवहार पर दढ़ रहती है। इस पूरे नकाब या आवरण के अंदर कोई पीछा करती स्मृतियाँ नहीं हैं। सँभवतः किसी सहेली द्वारा प्रेमी का अपहरण या लोभ प्रदर्शन या फिर एक दो टूटे दिल या फिर सबसे निकृष्ट ट्राकाडेरो की बिलासिता पूर्ण रंगरेलियों में हिस्सेदारी या फिर जिन रमी में की गई घोखेबाजियाँ।

और फिर जब वह उसे छोड़कर चला जाऐगा, शुरूआती क्रोध और छोड़े जाने की पीड़ा के बाद कुछ दिनों तक डरी हुई रहेगी जब तब वो उसकीजगह किसी को ढूँढ़ नहीं लेगी, एकाकी रहने का भय जैसे अभी भी अकेली न हो और सदैव न रही हो, जैसे एकांत और आतंक में मरना ही उसकी नियति न हो, जैसी वो अपने पूरे जीवन भर ही है, जैसे जन्म के उपरांत की इसकी पहिली चीख आत्मक्रेन्द्रित नवजात की न रही हो। अचानक उसे हसास हुआ कि वो उन स्त्रियों में से है जिनके बचपन की कल्पना करना ही कठिन है और उसे स्मरण हो आई वे सारी कहानियाँ जो उसने अपने बचपन की उसे सुनाई थी कहानियाँ जिनमें बागीचे लॉन, महत्वपूर्ण चाचा और टेनिस कोर्ट थे वह शाँति से भरा इंग्लैण्ड में बीता समय उसे बसने उस पर ऐसा प्रभाव डाला था कि वह सब कुछ कर्कश, बेसुरा शेरमात्र हो, कि वो पूरी कोशिश करती रही है कर्कश शोरगुल, आत्म प्रवंचना को परीलोक में रूपांतरित करने की। वो उन लोगों में से है जिनका बचपन शर्मनाक और बुढ़ापा अश्लील होता है। उसे याद आया कैसे वह आश्चर्य चकित रह गया था जब उसने अपने पहिले प्रेमी के विषय में बतलाया था। इस आश्चर्य का कारण उसने अपनी प्रेमिका की कोमलता, उसकी निष्कपटता और उसके कौमार्य को माना था। उसे अहसास हुआ कि किसी अस्णष्ट से रहस्यमय तरीके से वो उसकी आँखों में आंतरिक रूप से अक्षत कुमारी रही आई है हालाँकि वो अतिरक में कामानुर है या फिर वो कभी कुमारी अश्रत यौवना थी ही नहीं।

''रात का तुम्हारा क्या प्रोग्राम है,'' उसने पूछा।

सुनते ही तड़ाक से उत्तर उसके मन में उठा था, ''बस, तुम्हें, हमेशा के लिए छोड़कर चल देना है'', कहे और फिर उसके मुस्कराते शाँत चेहरे में होते परिवर्तनों को देखे, लेकिन उसने सुन्दर चेहरे पर सहमति का भाव देख लिया था। और यह सच है कि यदि उसने थियेटर जाने, समुद्र तट पर घमने या प्रेम करने को कहाँ होता तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वो बना नुकुत के तुरंत तैयार हो जाती। उसने उसकी पसंदगी पर सहमति दीहोती और उसे यह विश्वास दिलाने की कोशिश करती, भले ही सुझाव कितना ही बकवास क्यों न होता, कि वो भी तो पूरी दोपहरी यही करने का सोच रही थी और बाद में वो उसे विश्वास दिला देती कि नाटक, बीच या समुद्रीतट, मुड़ी सुकड़ी चादर सभी कुछ उसकी अपनी पसंदगी थी और वह तो केवल उसके इशारे को समझ पर ही बोला था। हमेशा से ऐसा ही होता आ रहा है, जब भी वह किसी शाम मजा किया, बातूनी या जीवंत रहा है। सबके साथ वो हंसी मज़ाक में पुरजोर हिस्सेदारी करेगी और जब वे घर लौटेगी तो कहेगी'' तुमने खूब आनंद उठाया न, है कि नहीं? यह उसका तरीका था यह समझाने का कि यह सुखद शाम उसकी ओर से भेंट थी। मजाक से उसका कोई रिश्ता न था, वो हंसा करती जब कोई मजाक करता था दूसरों की बौद्धकि उक्तियों की प्रशंसा करती थी और जब सहवास की ऊँचाई पर पहुँचती तो रोने लगती थी, किन्तु वो स्वयं न तो हंसी मजाक करती थी, न ही विचार ही करती थी और यदि किसी को उसकी बांहों में सुख मिलता था तो वह वास्तव में दैहिक क्रियाओं का प्राकृतिक परिणाम होता था। अचानक उसे लगा कि वह दलदल में पड़ा वजनदार व्यर्थ सा एक अजगर है जिसके सिर परशोरगुल करता एक चटरब रंग का पक्षी बैठा है जो अपनी सवारी (अजगर) के द्वारा इकट्ठे किए कीचड़ और गंदगी को खा कर जीवित रहता है। उसे आसानी से कोई दूसरी सवारी, मगर या दरियाई घोड़े की मिल जावेगी आराम से बैठने के लिए उसकी कलगी इतनी सुंदर और आवाज़ इतनी सुरीली और आकर्षक है कि कोई भी पशु उसकी मादक कामातुर चंचु प्रहार के लिए स्वयं को सहर्ष प्रस्तुत कर देगा।

''कहीं बाहर जाने का तो मन ही नहीं हो रहा है'', उसने सिगरेट निकालने के लिए जेब में हाथ डालते हुए कहा। मुस्कराते हुए उसने तुरंत एक छोटा और बेहद पतन सा मँहगा लाइटर उसकी और फेंक दिया कुछ ही दिन पहिले उसी की दी हुई प्रजेन्ट। उसने हवा में ही उसे पकड़ लिया उसके ठंडेपन पर उसे आश्चर्य नहीं हुआ, जैसे उसे कभी किसी मानवीय हाथ का स्पर्श ही न मिला हो। जैसे सोना और चाँदी ऊष्मा या कामना के सुचालक न रह गए हों, सुंदर ठंडे कृतहीन उस हाथ के स्पर्श के बाद। उसका लाइटर, उसका सोफा, उसका घर, उसके घरेलू सामान यहाँ तक कि उसकी देह इससे वह परेशान नहीं हुआ हालाँकि उसी ने इन सबसे दाम चुकाए हैं, लेकिन इससे वह इनका स्वामी नहीं हो जाता। एक मात्र दुःख या पश्चाताप उसे है तो यही कि उसने इन सबको कभी हृदय से चाहा था।

टी.वी. के परदे पर एक पुरुष और स्त्री आलिंगन बद्ध हैं। वे सुंदर थे, जैसा अभिनेताओं को होना चाहिए, पुरुष की गर्दन पर रखा स्त्री का हाथ कोमलता और कृतहाता को व्यक्त कर रहा था। उस क्रिया में कुछ पागलपन के रेशे थे, मार्मिकता से भरा कुछ ऐसा जिसने उसके अंदर कामना को भड़का दिया, परिणाम स्वरूप वह बेहोशी के अंतिम छोर तक पहुँच गया। उसके गले में ऐंठन सी हुई जिसने उसके कंठ की नस को दबा दिया, परिणाम स्वरूप हृदय के रक्त प्रवाह के रूक जाने से दिल की धड़कनें रूक गई। वह एकाकी निर्धन, ठंड से ठिठुरता, भयभीत और भूखा था। वह आधुहीन, अनाम, भविष्यहीन और मित्रविहीन था। कोमलता से बेपर्दा हो वह बार सिहर रहा था क्योंकि स्क्रीन पर एक पारंपरिक बनी ठनी अभिनेत्री एक बेहद साधारण से अभिनेता का चुम्बन ले रही थी। उसे केवल तीन शब्द कहना था, पास बैठी स्त्री से और बस वह अपने कपड़े उतार फेंकेगी, उसके हाथ उसकी देह पर थिरकने लगेंगे, उसे महसूस करेंगे फिर वह उसे जाग्रत करेगी, गंदी गालियाँ देगी-जो सब झूठ होगा, यहाँ तक कि 'आई लव यू' भी कहेगी और उसकी गर्दन को दाँतों सेकुतरेगी भी। बाद में यह सिहरन दाँत किटकिटाने में बदल जाऐगी और जिसे अपने वश में करना उसकी शक्ति के बाहर होगा और अंत में वह और अधिक अकेला हो जाएगा।

उसने उसकी ओर देखा। वो प्रेम करते जोड़े को देख रही थी, उसकी मुस्कराहट में घृणा की हल्की सी झलक थी, एक ऐसी मुस्कराहट जिसमें दया छिपी, थी, लेकिन कुछ भी हो यही तो है प्यार।

एकाएक आंतकित हो वह चकित रह गया, क्या वो वास्तव में प्रेम से घृणा करती है, तो फिर लगातार प्रेम क्यों करती है और प्रेम पर चर्चा भी करती है। फिर किस अधिकार से वो प्रेम के हावभाव का उपयोग करती है, यहीं नहीं उसका हृदयग्राही मुखौटा भी पहनती है? अचानक उसके मन में आया कि वह उसे उतनी ही जोर से मारे जैसे कोई जालसाज को मारता है। उसने उसके पहिले किसी को भी प्यार नहीं किया है, यह वो स्वयं उससे कहती रही है और उसे इन शब्दों को सुन मूर्खता पूर्ण गर्व भी होता था। कौन सी मूढ़ और आपराधिक नियति के चलते उसने स्वयं से यह बात छिपा कर रखी थी इस असंभव आत्मस्वीकृति को स्वीकरने के बाद कि यदि उसने उसके पूर्व किसी से प्रेम नहीं किया है तो वो उसके बाद भी किसी से प्रेमनहीं करेगी और इससे एक कदम आगे कि उसने इस बीच में किसी से भी वास्तव में प्यार नहीं किया है। जब वह इससे मिला था तब ये किसी की मिस्टे्रस (रखैल) थी और उस समय वह प्रसन्नता से भर गया थ जब बेहद साधारण तरीके से उस व्यक्ति को उसके लिए छोड़ दिया था। तब उसने इस निर्ममता को, उसकी इस तत्परता को अपने आकर्षक व्यक्तित्व को उत्तरदायी मान लिया था, उतावलापन मान लिया था जो वास्तव में पलायन था। सच यही था वो एक मरूस्थलवादी (दुर्जटर) ही थी जो एक मरूस्थल से दूसरे में चली जाती है, और इस बीच चारों ओर बीरानगी वर्फ, सी सर्द, रंगहीन बनाती चली जाती है, बैरोनियों, चेहरों, कार्पेटों और यहाँ तक कि सुबहों को भी। उस छोड़े गए दूसरे व्यक्ति ने बाद में प्लेन पेड़ से टकराकर स्वयं को मार डाला था। उसे याद आया कैसे उसने इस खबर को बेहद प्यार के साथ होले से बतलाया था।

उसका एक सिद्धान्त था, घुधलके में निर्मित और सँभवतः मुर्खतापूर्ण लेकिन फिर भी एक सिद्धांत जो उसका मार्गदर्शन करता है कोई भी व्यक्ति किसी से भी गहरा संबंध नहीं बना सकता बिना उस व्यक्ति पर अपना कुछ प्रभाव छोड़े। फिर भी उसमें बाल बराबर भी अंतर नहीं आयाथा उस व्यक्ति की मृत्यु का समाचार सुनकर बस, हल्के से कंधे हिलाए थे और मुड़ गई थी। सौजन्यता के नाते, उसने तब सोचा था। उसने दुर्भाग्य ही महत्वपूर्ण था क्योंकि जिस व्यक्ति को उसने छोड़ दिया हो, कुछ ही समय बाद कार चलाते समय असावधानीवश प्राण त्याग दे। उस आदमी की जिन्दगी से किसी भी प्रकार का संबंध होने को उसने पूरी तरह अस्वीकार दिया था इतनी छोटी सी जिन्दगी। इस प्रेम कहानी से उसका कोई सरोकार न था, न ही दुर्घटना से।

एकाएक इस विचार में उसमें सिहरन सी पूरी देह में दौड़ गई, कि यह भी तो हो सकता है कि वह दुर्घटना न रही हो और उसका अंत भी उससे संबंध समाप्त होने ही हो जाएगा। 'तीसरी आँख' (थर्ड आइ) उसने स्वयं से कहा और तभी विरोधाभासी मोड़ देती तो बहुरगी कढ़ाई की ओर बढ़ी जिसे उसने कुछ समय पहिले ही बनाना शुरू किया था। अपनी लंबी प्यारी उंगलियों को चलाने के पहिले उसकी भौहों पर बल पड़े। वह फालूत टेपस्ट्री एक प्रतीक और रहेगी। यह तो कल्पना की ही नहीं जा सकती थी कि वो किसी के लिए स्वेटर, हेट, बैग या और कुछ बुने। उससे कभी भी उसे किसी की ओर रोटी बढ़ाते या दरवाज़ा खोलते या लाइटरजलाते नहीं देखा था। और अभी कुछ समय पहिले जब उसने लाइटर फेंका था तो यह जानबूझकर किया था तो यह याद दिलाने के लिए यह उसकी प्रजेन्ट है। वह भी मँहगी, प्रेम में पड़ने के बाद जिसे उसी ने एक जवाहरात की दुकान से खरीद कर उसे भेंट किया था और जिसे उपयोग केलिए देने में उसे कोई आपत्ति नहीं है। बिना कुछ लिए उसने कभी कुछ नहीं दिया था और एक मात्र बात उसके पक्ष में यही थी कि उसकी दृष्टि में लाखों उपेक्षितों के रहते वह उसे 'मेक्सिम' में खाना खिलाने की सामार्थ रखता था।

उसकी आँखे सुई की नोक पर टिकी थीं और उसकी भौहें तनी हुई थी। लग रहा था जैसे वो किसी तकनीकी उलझन में है। उसके सुई अलग रखी और ऊन की लांच्छया इकट्ठी की और अपने सामने निरपेक्ष भाव से रख दिया।

कितनी ब्लाड (सुनहरी बालों वाली) है ये, असामान्य, ब्लाक, उसने सोचा, ठीक उस समय जब तो उसकी ओर मुड़ी और बोलने के लिए मुँह खोला।

''तुम्हें पता है थामस'', उसने कहा, ''वह मुझसे बेहद प्यार करता है। मैं तुम्हें छोड़कर उसके पास जा रही हूँ''।

एकाएक दर्द की एक मूठ उसके सीने में उतर गई वह उल्टी करना चाहता था, उसने लिपट जाना चाहता था, और अंतिम बार उसके ब्लांक (सुनहरे) बालों से उसका भविष्य आग की लपट की तरह जगमगाते लगा और उसने भावी जिंदगी को देखा कि वह कैसी होगीः नारकीय।

..

 

अनुवाद -

इन्दमणि उपाध्याप

489 नारायण नगर,

गढ़ा, जबलपुर

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