बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

प्रमोद यादव का व्यंग्य - हमारे जमाने में....

हमारे जमाने में.../ प्रमोद यादव

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.गुप्ताजी की बातों से मैं कभी असहमत नहीं होता. मेरे बचपन के मित्र हैं. हम साथ-साथ पले-बढे और जवान हुए.उन्होंने भी वही ज़माना देखा है जो मैंने देखा. हम दोनों की विचार धारा, दिलो-दिमाग, जीवन-अनुभव और रहन-सहन भी लगभग एक से रहे. और तो और हम दोनों रिटायर भी एक ही दिन हुए. कहीं कुछ अलग-थलग सा कुछ था तो वो थी हमारी पत्नियां. जहां मेरी पत्नी जरुरत से ज्यादा वाचाल( लगभग भूचाल ) , वहीँ उनकी पत्नी एकदम गूंगी - पुराने मूक फिल्मों की तरह. . कोई उनसे पांच लाईन बोले तो जवाब में वह ‘कामा’ की तरह एकाध शब्द ही हौले से फेंकती .. वह भी बड़ी मुश्किल से. कई बार गुप्ताजी से पूछा कि कैसे निभाते हो ‘साइलेंट मूवी‘ के साथ ? मेरी पत्नी तो बिना किसी बात के इतना बोलती है कि कभी-कभी बोलते-बोलते भूल जाती है कि क्या बोल रही है. मुझसे फिर पूछती है- “ मैं क्या बोल रही थी ? “ तब मैं कह देता हूँ- “ गुड नाईट बोल रही थी “ और चुपचाप सो जाता हूँ. गुप्ताजी ने अपनी पत्नी के विषय में बताया कि बनिया की बेटी ठहरी , हर काम बचपन से नाप-तौल कर करती रही..इसलिए शादी के बाद भी वैसी ही रही पर अब चढ़ती उम्र के साथ नाप-तौल में गड़बड़ा गयी है, सुधर गयी है...नाना पाटेकर की तरह बिना विराम,अल्प विराम के धारावाहिक बोल लेती है.

पहले की तरह अब गुप्ताजी के घर आना-जाना नहीं होता. बस, हर रोज शाम के वक्त टहलने के नाम पर शहर से तीन-चार किलोमीटर बाहर सुनसान पगडंडियों में चलते-चलते एक शिव मंदिर के आँगन में धंसे सीमेंट के बेंच पर धंसकर पुरानी यादों को कुरेदते टाईम पास करते हैं.रिटायरमेंट के आगे कुछ भी तो नहीं होता जैसे चाँद के उस पार कुछ नहीं होता फिर भी कहते हैं-‘ चलो दिलदार चलो...चाँद के पार चलो..’कोई दिलदार चाँद पर पहुंचे तो मालुम पड़े कि मुहब्बत का यह कैसा मुकाम है ?नौकरी में जैसे रिटायरमेंट का मुकाम है..ठीक वैसा ही है..चाँद के उस पार भी कुछ नहीं रिटायरमेंट के उस पार भी कुछ नहीं जिस पर बहस, विवाद.या कुछ प्लान करें यह वह मुकाम है जहाँ आदमी की जिंदगी पर “ जो होना था,सो हो गया “टाइप एक पूर्ण विराम लग जाता है...अपवाद ही होंगे जो रिटायरमेंट के बाद भी अपनी निजी जिंदगी को रिचार्ज करने का माद्दा रखते हों. इसलिए अधिकांश लोग निजी जिंदगी के सुख को पुनः भोगने परदे के पीछे ( अतीत में ) चले जाते हैं..अतीत को कुरेदते हैं...हम दोनों ने तो कुरेद-कुरेद कर परदे ही फाड़ दिए हैं.. एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता कि पुराने दिनों को याद न करते हो.

अब कल ही की तो बात है- गुप्ताजी ने वाजिब बात कही कि हमारे अतीत में इतनी सारी , इतनी प्यारी-प्यारी और हैरत अंगेज यादें है कि आदि-अंत का कोई ओर-छोर नहीं..” क्या भूलूं,क्या याद रखूं “वाली स्थिति है...जितना कुरेदो-उतना ही सुख..उतनी ही ताजगी....भगवान् जाने आज के छोकरों का पचास साल बाद क्या कुछ अतीत होगा ? अतीत होगा भी या नहीं ? आज के जमाने में कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसे कोई अपनी यादों में संजो कर रखे. गैंगरेप, घोटाला, आतंक,लूट-खसोट यही सब तो है रोजमर्रा की बातें जो आदमी की जिंदगी में डी.एन.ए.की तरह व्याप्त हो गया है..नेट, इंटरनेट, मेल-ई-मेल, एस.एम्.एस.,एम्.एम्.एस.ही इस जमाने का सत्व है जो मिनटों में ‘डिलीट’ भी हो जाता है..भला यह किसी के अतीत का मीठा हिस्सा कैसे और किस मुंह. बने ? जो खुद क्षणभंगुर हो ,वह भला अतीत के एल्बम में कैसे टिके.. कैसे यादगार बने ? गुप्ताजी बड़े चिंतित थे कि आज की पीढ़ी के बच्चों का (पचास साल बाद) अतीत किस कदर अंधकारमय होगा..वे क्या कुछ याद करेंगे ? रिटायरमेंट के बाद कैसे समय पास करेंगे ?

तब मैंने उन्हें ढाढस बंधाते कहा था-- “ नाहक ही इस बात के लिए परेशान न हों...उनके अतीत से हमें क्या लेना-देना ?..अपनी देखो....”

“ हाँ यार, ठीक कहते हो..हम उनके अतीत की क्यों सोचें..” गुप्ताजी गमगीन हो एकदम से ट्रेक बदल दूसरी बात पर आ गए, बोले- “ यार..क्या ज़माना आ गया है..बच्चे इतने डीठ हो गए हैं कि आश्चर्यचकित रह जाता हूँ..हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं था...”

“ क्या हुआ ? “ मैंने पूछा.

“ अरे, वो जो सोनीजी है ना हमारे पडोसी...वह अपने लड़के से बहुत परेशान हैं..बाप की कुछ सुनता ही नहीं..न लिखता है, न पढता है,न कमाता है...ऊपर से बाप से जुबान लड़ाता है...बेचारा समझाते- समझाते थक गया..वह उसे घर से भाग जाने को कहता है पर सुपुत्र है कि खूँटा गाड़े बैठा है “ क्यों भागूँगा ? “ जैसी आँखे ततेरता है..सुबह-शाम बेशर्मी से खाता-पीता और घूमता है...बहुत त्रस्त हैं सोनीजी...हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं था...” गुप्ताजी उदास हो गए.

“ हाँ गुप्ताजी...” मैंने एक ठंडी आह छोड़ते जवाब दिया- “ हमारे जमाने में तो बच्चों के बम्बई भाग जाने का फैशन था..जहाँ बच्चे मेट्रिक पहुंचे, और कहीं फेल हुए तो सीधे बम्बई भाग जाते...कभी पिता के पीटने से पलायन कर जाते तो कभी मम्मी की खरी- खोटी सुन भाग जाते.. पूरे देश में भगोड़े बच्चों की शरण स्थली थी- बम्बई...कोई कभी भूले से भी भागकर मथुरा- काशी या झुमरीतलैया नहीं जाता ...हर भगोड़े को लगता कि बम्बई उसके लिए बाँहें पसारे खड़ा है..सबको लगता कि कहीं और मिले न मिले, बम्बई में उसे जरुर काम मिल जाएगा.. ( और वो भी फ़िल्मी-दुनिया में ) वैसे अधिकाँश भागने वाले बच्चे ‘ हीरो’ बनने की आस में ही बम्बई भागते...सूरत-शक्ल से भले ही केष्टो या मुकरी दिखें लेकिन सब अपने को दिलीप कुमार या देवानंद से कम न आंकते...”

“ ठीक कहते हो यार..” गुप्ताजी ने हामी भरते कहा- “ तब न सेलफोन का दौर था न ई मेल-फिमेल का..भागने वालों का कोई पता-ठिकाना भी नहीं होता कि टेलीग्राम कर घर बुला लें...तब मोहल्ले के लोग दुःख जताने मातमपुर्सी की शक्ल में आते.. घरवाले भी मुंह लटकाए दुखी होने का उपक्रम करते.. तेजी से फिर यह पूरे शहर में चर्चा का विषय हो जाता कि अमुक लाल का लाल ‘चला मुरारी हीरो बनने ‘ की तर्ज पर हीरो बनने बम्बई भाग गया..उस दौर के माता-पिता को पूरा भरोसा होता कि उसका लाडला चार-पांच दिनों में ( पैसा ख़त्म होते ही ) जरुर वापस आ जाएगा...और ऐसा होता भी था...दुनिया में विश्वास से बढ़कर और कोई चीज नहीं...जो बच्चे घर से पैसे लेकर भागते,वे पैसे समाप्त होने के पहले ही प्यार से,पोस्ट-कार्ड से सूचित कर देते कि चौपाटी में चित पड़े हैं...जल्दी आकर ले जाएँ...जो बच्चे गरीबी में ( बिना टिकिट के ) भागते, उसे उस समय के शरीफ टी.टी.ई.समझा-बुझाके ट्रेन से किसी नजदीक के स्टेशन में उतार देते जहाँ किसी नजदीकी रिश्तेदार ( फूफा,मामा ) के पास तीन-चार दिन गुजार थ्रू प्रापर चेनल वापस घर लौट आते.. कुल मिलाकर वापस सभी आते..”

“ हाँ यार...आजकल के बच्चे तो भागते ही नहीं..” मैंने हामी भरी- “ पिछले दो-तीन दशकों से यह फैशन ही समाप्त हो गया...तीन-तीन बार फेल होने पर भी नहीं भागते....और तो और भगाओ तब भी नहीं भागते..आज के बच्चों में कितनी उद्दंडता घर कर गई है... हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था..शरमो-हया के परदे में होते थे बच्चे..फेल हुए कि किसी को चेहरा दिखाना भी गवारा नहीं करते.. ‘.परदे में रहने दो,परदा न उठाओ ‘ के अंदाज में सीधे बम्बई भाग जाते.... वापस लौटने पर उनका वीरोचित सम्मान होता ..जैसे कारगिल युद्ध जीतकर लौटा हो...घर में एक खुशनुमा माहौल पसर जाता..घर के सभी सदस्य उससे बड़े अदब से ऐसे पेश आते जैसे कुछ हुआ ही न हो.... उसकी हरेक फरमाईशों को दौड़-दौड़ पूरा करते....रुपया-पैसा, खाना-पीना घूमना-फिरना सब ‘टैक्स-फ्री’ हो जाता .. स्कूल के दोस्तों पर भी भारी रॉब पड़ता.. ‘बम्बई रिटर्न’ होने का...दोस्त-यार महीनों तक पूछते रहते- ‘ क्या देखा बम्बई में?’ तब वह सीना फूला शान से बम्बई के किस्से सुनाता... हीरो-हिरोईनों के किस्से..शूटिंग के किस्से...थोड़े सच्चे अधिकाँश झूठे और दोस्त उसकी किस्मत पर ‘ अश-अश ‘और ‘वाह-वाह ‘ करते..”

“ अब तो केवल ‘आह-आह’ है यार..” गुप्ताजी बोले- “देखो न..सोनीजी कैसे परेशान हैं..मुंडा घर से भागता ही नहीं इसलिए दुखी और हैरान है... उन्हें कौन समझाए कि ज़माना बदल गया है...बम्बई अब मुंबई हो गया है..ठसाठस आबादी वाला दमघोंटू महानगर...अब तो मुंबई के बाशिंदे ही सांस लेने बाहर भाग रहे हैं....कोई बिहार, आसाम की ओर.तो कोई यू.पी. की ऑर..ऐसे में कोई लड़का भला क्यों भागे मुंबई ? “.

“एक काम करो यार...” मैंने गुप्ताजी को मशवरा दिया- “ सोनीजी को बताओ ..आज के युग में केवल होशियार बच्चे ही भागते हैं...वो भी बेंगलोर,पूना,दिल्ली की ओर...मुंबई तो अब गधे भी नहीं भागते....उन्हें कहो वे खुद केदारनाथ या बद्रीधाम भाग जाएँ...तभी समस्या का समाधान संभव है...”

“ ठीक कहा यार..अभी जाकर उनकी टिकिट कटाता हूँ..” और गुप्ताजी उठकर चलते बने. मैं फिर अपने जमाने के जंगल में खो गया...सचमुच क्या ज़माना था....एक बात का मलाल तो आज भी है कि चाहकर भी मैं कभी बम्बई न भाग सका....पुरुषों के भाग्य का क्या भरोसा? हो सकता है आज वहां होता तो के.बी.सी. में अमिताभ की जगह मैं होता...या हो सकता है कि ‘दबंग ’ का चुलबुल पांडे मैं होता.. खैर...जो हुआ..अच्छा हुआ.. व्यस्तता भरी जिन्दगी न मुझे तब पसंद थी..न अब... किसी ने कहा है न- आराम बड़ी चीज है..तो चलिए..आराम किया जाए..जय राम जी की..

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प्रमोद यादव

दुर्ग, छत्तीसगढ़,

मोबाइल-09993039475

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