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November, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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मुकेश वर्मा की कहानी - दिल की इक आवाज़ ऊपर उठती हुई...

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कहानीदिल की इक आवाज़ ऊपर उठती हुई․․․ मुकेश वर्मातीन सौ सड़सठवीं मंजिल से गिरते हुये जब वह अपने होश-हवास पर कुछ काबू कर पाया तो उसने देखा कि वह नीचे गिरता ही जा रहा है। वह मदद के लिये उस बड़ी इमारत के सामने चिल्‍लाया लेकिन ऊपर के कई माले हमेशा की तरह सख्‍त बंद हैं। मकानों की दरारों में से रह-रह कर सिगरेट का धुआँ और शराब की गंध लापरवाही से निकल रही है। अपने जिस्‍म को पत्‍थर की तरह ठीक सीधे और नीचे ही नीचे जाते देखते हुए उसके दिमाग़ में सिर्फ़ मदद․․․ मदद की एक ही आवाज़ गूँज रही है। उसे तीन सौ पाँचवीं मंजिल के टैरिस पर एक हैरतज़दा आदमी दिखाई पड़ा। उसने हाथ फैलाकर कहाः- ‘मैं नीचे गिरता जा रहा हूँ, बताओ मैं क्‍या करूँ․․․ मेरी मदद करो।' टैरिस पर सकपकाया खड़ा आदमी अकबका गया और लगभग हकलाते हुये चिल्‍लाया, ः- ‘अरे रुको․․․ क्‍या करते हो․․․ मर जाओगे․․․ मैं फिर कहता हूँ कि․․․ वहीं रुक जाओ․․․' गिरता हुआ वह झल्‍लाना नहीं भूला, ‘मालूम है․․․ मुझसे बेहतर कौन जान सकता है․․․ स्‍साले․․․। लेकिन तब तक वह दो सौ अठासी नम्‍बर के फ्‍लैट के करीब पहुँच गया है। उसने फिर मदद की गुहार की। दरवाज़े पर एक चुस्‍…

देवीलाल पाटीदार की मृदा कलाकृतियाँ

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देवीलाल पाटीदार की मृदा कलाकृतियों में प्रकृति अपने सजीव स्वरूप में अवतरित हो जाती है. प्रस्तुत हैं उनके कुछ नवीनतम सृजन -

राजीव आनंद का आलेख - स्‍मृति-शेष : डोरिस लेसिंग का जाना

स्‍मृति-शेष डोरिस का जानाडोरिस लेसिंग अब नहीं रहीं. 17 नवंबर को 94 साल की उम्र में ब्रिटेन के सबसे प्रभावशाली साहित्‍यकारों में शुमार डोरिस लेसिंग ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. 22 अक्‍टूबर 1919 को ईरान में जन्‍मी डोरिस साहित्‍य के लिए नोबेल पुरस्‍कार पाने वाली सबसे उम्रदराज लेखिका थी. वर्ष 2007 में जब डोरिस 88 वर्ष की थी तब उन्‍हें साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार दिया गया था. पुरस्कार की घोषणा के बाद डोरिस ने का था कि ‘‘ मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं लगभग यूरोप के सभी पुरस्कारों को जीत चुकी हॅूं. सब चीजें एक मजाक की तरह है. नोबेल पुरस्‍कार की एक स्‍वयंभू कमेटी है, वे सब खुद ही वोट करते है और विश्‍व की प्रकाशन उद्योग भी इसमें कूद पड़ती है. मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानती हॅूं जिन्‍होंने पूरे साल कुछ खास नहीं किया फिर भी नोबेल विजेता हैं.'' सन्‌ 1984 में डोरिस ब्रिटेन की प्रतिष्‍ठित उपन्‍यसकारों में शामिल हो चुकी थी. पांच दशक के लंबे रचनाकाल में दो दर्जन से अधिक पुस्‍तकें उन्‍होंने लिखी. सन्‌ 1950 में ही डोरिस का पहला उपन्‍यास ‘द ग्रास इज सिंगिंग' प्रकाशित हो चुका था. सन्‌…

राम नरेश 'उज्ज्वल' का व्यंग्य - दुम लगवाने की कोशिश

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(व्यंग्य)
दुम लगवाने की कोशिश

-राम नरेश'उज्ज्वल'   मेरी समझ से दो जून की रोटी ईमानदारी पूर्वक कमाना और खाना सबसे बड़ा एवं पुरस्कृत करने वाला अर्थात सम्मानयुक्त कार्य है। जो इस काम में सफल हो जायेगा, वह दूनिया में कभी भी मात नहीं खायेगा। बड़े-बड़े काम करने वाले लोग दो जून की रोटी के लिए कभी काम नहीं करते। वे काम करते हैं नाम कमाने के लिए अपना स्टेट्स बनाने के लिए। स्टेट्स बनाना बहुत मुश्किल काम है,उसे मेनटेन रखना, उससे भी मुश्किल काम है। आदमी अपने स्टेट्स को ऊपर उठाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता है और कभी भी उसे पर्याप्त ऊंचाई तक पहुँचा नहीं पाता है।
     ऊंचाई पर पहुँचना सबके वश की बात भी नहीं है। कुछ लोग ऊंचाई पर पहुँच तो जाते हैं,पर उस स्थिति में बने नहीं रह पाते हैं। मुँह के बल नीचे गिर जाते हैं। जब पंछी थकता है, तो भूमि की ओर ही आता है। आसमान में ठहरने के लिए कोई स्थान नहीं। यह पृथ्वी ही है, जो सभी को अपने हृदय में स्थान देती है और हम उसे महाभारत करके लहू-लुहान करते हैं
     चोरी-मक्कारी का हर जगह बोलबाला है। सुविधा शुल्क हर जगह चल रहा है। नौकरी-चाकरी,पढ़ाई-लिखाई,च…

जसबीर चावला का व्यंग्य: चेनल चूँ चूँ का मुरब्बा धोनी और भैंस

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............................................... बेहद परेशान थे टीवी चैनल सीसीकेएम (पूरा मतलब चूँ चूँ का मुरब्बा) के सीईओ इन दिनों.परेशानी का सबब था उनके चैनल की कमाई का गिरता ग्राफ़. दूसरे चैनल खूब चाँदी काट रहे थे, उनकी टीआरपी भारत सरकार की साख की तरह घट रही थी. उन्होंने आनन-फ़ानन में अपने अपने सारे एंकर से लेकर फ़ील्ड संवाददाता,प्रोड्यूसर,केमरामैन सबकी आपात् बैठक बुलाई.सबको देश में - तेज़ी से लेकर सुस्त चलने वाले,१० मिनट में २०० ख़बरें परोसने वाले,चैन की नींद सोने के बहाने जगाने वाले कई चैनलों के कामयाब नुस्खे वाले कार्यक्रम दिखाये,विशेषज्ञों के भाषण करवाये. उन्होंने कुछ टीवी क्लिपिंग दिखलाई,जिनसे उन चैनलों के दिन फिर गये थे.उनमें कुछ के नमूने ये थे."मिल गया,मिल गया,रावण का महल मिल गया. वह एअरपोर्ट भी मिल गया जहाँ उसका विमान लेडिंग करता था"- पार्श्व में रामायण सीरियल की धुन बजने लगी."आज रात बाज बकरी को रात आठ बजे उठा ले जायेगा,देखना न भूलें,आपके अपने टीवी'इंडिभार'पर".अगला चैनल-"अंतरिक्ष से उड़न तश्तरियाँ आ कर गायों को ले जा रही हैं,हमारे जाँबाज पा…

गोवर्धन यादव का आलेख : अविज्ञात रहस्यों से भरापूरा संसार

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अविज्ञात रहस्यों से भरा-पूरा संसार यह संसार एक विचित्र रंगमंच है, जिस पर तरह-तरह के विलक्षण अजूबे देखने को मिलते हैं. वैज्ञानिक प्रयास करते हैं कि हर प्रत्यक्ष दृष्यमान वस्तु या घटनाक्रम का वे कारण बता सकें, फ़िर भी अनेकों रहस्यों का समाधान वे अपनी तर्कबुद्धि से देने में सक्षम नहीं है. ऎसी विचित्रताएँ हमे यह सोचने पर विवश करती हैं, कि इन अविज्ञात क्रिया-कलापों एवं दृष्यों से भरी यह दुनिया आखिर बनाई किसने? महाराष्ट्र के जलगाँव में अंजिष्ठा मार्ग पर अहुर नामक एक छोटा सा गाँव है. वहाँ से सेंदुनी जाने वाली कच्ची सडक पर तीन मील दूर पर “सोप” गाँव अवस्थित है. इस गाँव में वाणी सिद्धि का एक अद्भुत चमत्कारी नीम का पॆड है, जिसकी प्रत्येक डाल के पत्ते कडवे हैं, किन्तु सिर्फ़ एक डाल ऎसी है, जिसके पत्तों का स्वाद अत्यन्त मीठा है. कहते हैं. कडॊवा महाराज नाम के एक साधु ने ईश्वर के अस्तित्व और उसकी शक्ति का परिचय देने के लिए ऎसा किया था. हिन्दमहासागर के रियूनियन द्वीप के केक्टस जाति का एक विचित्र पौधा पाया जाता है. वह अपने जीवन के अन्तिम दिनों में प्रायः पचास वर्ष बाद एक बार ही फ़ूलता है. इसके बाद उसके ज…

रामनरेश उज्जवल की कहानी - बूंद बूंद पानी

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चाँद आसमान के ठीक बीचोंबीच आ गया है। ‘हाँ, शायद बारह बजा होगा।' मन ने अनुमान लगाया। बादल इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। काले, धुँआरे तथा सफेद बादलों के समूह बड़ी मस्‍ती के साथ तैर रहे थे, लगता था जैसे, गश्‍त लगा रहे हों। ड्‌यूटी पूरी कर रहे हों। ड्‌यूटी पूरी करने की आदत अब समाप्‍त हो रही है। चौकीदार भी दो चार सीटियाँ मार कर कहीं पसर जाता है। क्‍या करे वह भी, जमाना ही काम-चोरी का है। बस केवल खाना पूरी होती है। मैकू का बेटा डमरू पुलिस में हुआ था। वही बताता था।“चाचा ! बड़ी मस्‍त जिन्‍दगी है अपनी। जिधर जाओ, कुछ न कुछ मिल ही जाता है। जब चाहता हूँ, दस, बीस, पचास बना लेता हूँ। रात की ड्‌यूटी में तो और भी मजा है। सौ-पचास बनाकर सो जाता हूँ।” “कैसे बनावत हो बचवा।” बैरागी ने पूछा था। “कैसे का ? कानून का डंडा अपने पास है। जिस पर फटकार दो, दस-पचास तो बगैर कहे निकाल ही देता है।” “जो न निकाले तो ?” “तो थाने खींच ले जाने की धमकी देता हूँ। तुम तो जानते ही हो काका, थाने-कचहरी से अच्‍छे-अच्‍छे भागते हैं।” डमरू ने अपनी बात को बड़े स्‍टाइल और रुआब से मूँछों पर ताव देते हुए कहा था। मूँछें मर्दों की शान होती…

गुणशेखर का यात्रा संस्मरण : चीन की उड़ान

चीन की उड़ान ============ [यात्रावृत्त चलते-चलते देखे गए दृश्यों और अनुभूत सत्यों का उदघाटन मात्र है या कुछ औरभी है,जिसे इसमें जोड़ा जा सकता है.यह प्रश्न जब मेरे समक्ष उपस्थित हुआ तो धर्म संकट में फँस गया. इस पर विचार करते-करते मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जैसे यात्रा-काल में थकान के अनुसार यात्री ठहर-ठहर कर चलता है और रात्रिकाल में पड़ाव भी डालता है,ठीक वही स्थिति यात्रावृत्तांत के लेखन के सन्दर्भ में भी लागू होती है.गतिमान दृश्यों के साथ-साथ स्थानिक ठहराओं और पड़ाओं के दृश्य भी इसमें शामिल किए जाने से यात्रा के सम्पूर्ण अनुभूत और देखे गए दृश्यों को सम्यक स्थान मिलता है.इसी परिप्रेक्ष्य में दिल्ली से ग्वान्गज़ाऊ की साढ़े चार घंटे की यात्रा के साथ विश्व विद्यालय परिसर में प्रथम पड़ाव का यात्रावृत्त प्रस्तुत है.]11नवम्बर 2013 की रात के बारह बजे दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से सदर्न चाइना एअरवेज के एस 360 की उड़ान ने टेक ऑफ़ के साथ ही हमारी कल्पनाओं के भी पर लगा दिए.इस उड़ान भरने की हौसला अफजाई के लिए बगल की सीट के ज़िक्र के साथ क्रूमेम्बर ने भी कुछ ज़्यादा ही गर्मजोशी से स्वागत किया. मैं शर…

साहित्य समाचार : आंचलिका का विमोचन और साहित्यिक विभूतियों का सम्मान‌

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आंचलिक साहित्यकार परिषद छिंदवाड़ा की पत्रिका आंचलिका का लोकार्पण शहर के रवींद्र भवन हिंदी प्रचारिणी परिसर में सादे किंतु गरिमा पूर्ण परिवेश में किया गया इस अवसर पर अंचल की विभूतियों को उनके विशिष्ट यॊगदान के लिये विभूति सम्मान से सम्मानित किया गया। आंचलिका जिले की बड़ी पुरानी साहित्यिक संस्था है जिसका प्रारंभ 1992 से हुआ था। वर्तमान‌ अध्यक्ष रवींद्र नीलम और कार्यकारी अध्यक्ष शिवशंकर शुक्ल लाल के अथक प्रयासों से से संस्था ने अपनी अलग‌ पहचान जिला एवं प्रदेशिक स्तर पर बनाई है। संस्था ने जिले भर के तीन पीढी के साहित्यकारों को एक ही माला में पिरोकर उसे धरोहर रूप में सजाकर एक सराहनीय कार्य किया है जो स्वागत योग्य है। पुस्तक में नई पुरानी और मध्य पीढ़ी के चौहत्तर साहित्यकारों की कविताओं का समावेश है। 'कितना बड़ा मजाक है ये जिंदगी के साथ,चाहा किसी और को उम्र गुज़ारी किसी के साथ'। शफक अकोटवीइ सरीखे कई वरिठ गज़लकारो‍ की रचनायें भाव विभोर करने के लिये बहुत हैं। धृतराष्ट्र हो गया न्याय आज,दुर्योधन करते शासन हैं । आज़ादी का चीर हरण,नित करते यहां दु शासन हैं। शिवशंकर शुक्ल ने देश की पीड़ा बड़े मार…

सीमा सक्सेना का आलेख - नई कहानी के संस्थापक राजेंद्र यादव

मोहन राकेश, कमलेश्वर के बाद राजेंद्र यादव जी को नई कहानी विधा का अंतिम हस्ताक्षर माना जाता है, 1986 में कालजयी कथाकार मुंशी प्रेमचंद्र के द्वारा शुरू की गई पत्रिका ‘हंस’ का प्रकाशन उन्होंने ही दुबारा शुरू कराया था। वह विचारोत्तेजक लेखों को प्रकाशित करने से विवादों में भी आये, फिर भी वे सन्नाटे की आवाज बनकर निरंतर अग्रसर होते रहे। हिंदी साहित्य जगत में उनको लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण मानवाधिकार, दलित और स्त्री-विमर्श पर अपनी आवाज बुलंद रखने के लिए हमेशा जाना जाता रहेगा। 28 अगस्त 1929 में आगरा ( उत्तर प्रदेश) में जन्मे राजेंद्र जी ने 1951 में आगरा यूनिवर्सिटी से एम ए किया, जिसमें उन्होंने टाप किया था। उनकी शादी लेखिका मन्नू भंडारी के साथ हुई थी, जो विवादों में घिर जाने के कारण ज्यादा दिन नहीं चल सकी। राजेंद्र यादव जी ने उपन्यास, कहानी, निबंध आदि कई विधाओं में लिखा, उनकी प्रसिद्ध कृति सारा आकाश, ‘अनदेखे अनजाने पुल’, कुलटा आदि काफी प्रसिद्ध हुए । ‘सारा आकाश’ पर तो फिल्म भी बनी थी । ‘हंस’ पत्रिका निकाल कर उन्होंने साहित्य जगत में बहुत बड़ा काम किया था , उनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा…

जसबीर चावला की चुनावी चकल्लस और व्यंग्य कविताएँ

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चुनावी पाठशाला
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
अमर उठ
अब उठ
बहुत सोया
सो मत
रो मत
बहुत खोया
अब खो मत
*
बक बक
मत कर
चख चख
मत कर
मत मत
मत कर
मतदान कर
*
अब चल
चाल चल
दल दल
सब दलबदल
छल बल
इनकी करनी
करनी का फल
*
लगा अकल
दे बदल
'मत'-मत बता
औक़ात बता
गत बना
मतदान कर
सरकार बना

ख़ुदा खुदाई और ख़िदमतगार
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
ऊपर वाला ख़ुदा नहीं शहर ख़ुदा रखा है
शहर को इन्होंने हर तरफ़ ख़ुदा रखा है

ग़ज़ब की है खुदाई इनकी कहीं चलने से पहले
ख़ुदा बंदे से खुद पूछे बता कहाँ ख़ुदा रखा है

किस तरफ़ से किधर जायें पता वहीं चलता
परेशां यहाँ हर बशर किसने कहाँ ख़ुदा रखा है

देख ली तेरी खुदाई अब इनकी खुदाई देख
इसने खुदा रखा है उसने भी ख़ुदा रखा है

ख़ुदा को ढूँढ़ने निकले ख़ुदा के कुछ नेक बंदे
खुदा की हर राह को इन्होंने ख़ुदा रखा है

ख़बरदार खबर
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बिना खबर के भी
खबर बनती है
बे खबर रहे तो भी
खबर बनती है
*
खबर यह है कि
कोई खबर नहीं
बाखबर हो तो
खबर बनती है
*
खबर की आड़ में
खबर होती है
छुपाओ खबर
खबर बनती है
*
बेपर की भी हो
खबर उड़ती है
ठीये पाये की हो
खबर बनती है
*
खबरों में रहना है
तो फ़ंडा सीखो
इस्तेमाल करो
खबर बनती है
*
खबर …

प्रमोद यादव की कहानी - दहेज का दानव

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दहेज का रहस्य/ प्रमोद यादव जब से अखिल से मिलकर लौटी हूँ,बेहद उलझ गयी हूँ.कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि अखिल के कौन से रूप को सही मानूं. उसका एक रूप सामाजिक बुराईयों और रूढ़ परंपराओं के विरोधी तथा आधुनिक विचारों और सजग चेतना के प्रतीक युवक का है तो दूसरा रूप एक ऐसे इंसान का है जिसका आदर्श महज दिखावा है,महज ढोंग है. वैसे मन कहता है कि अखिल ढोंगी नहीं है. उसका आदर्श सिर्फ दिखावा नहीं है मगर उसके जिस व्यावसायिक रूप को मैंने आज अपनी आँखों से देखा, उसे झुठलाना भी सहज नहीं है. एक अनास्था का काँटा सा चुभ गया है मन में. अखिल मीता का मंगेतर है और मीता मेरी अभिन्न सहेली है. दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते हैं. दो साल बाद अखिल डाक्टर बन जाएगा और तब वह मीता से शादी करके अपने सपनों को पूरा करेगा.वह इसी शहर के मेडिकल कालेज में डाक्टरी पढ़ रहा है और अक्सर ही मीता के घर आता-जाता रहता है. उसके घरवाले नैनपुर में रहते है.मीता के घर में उनके बाबूजी,माँ और दो छोटे भाई हैं.एक भाई सतीश सातवीं में पढ़ता है तथा दूसरा भाई मनीष मेट्रिक का विद्यार्थी है. बाबूजी का सपना मनीष को डाक्टर बनाने का है. वे एक शासकीय कार्यालय …

श्याम गुप्त की कहानी - यक्ष प्रश्न

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(डॉ. श्याम गुप्त  ) पुष्पाजी अपनी महिला मंडली के नित्य सायंकालीन समागम से लौटकर आयें तो कहने लगीं,’ आखिर राम ने एक धोबी के कहने पर सीताजी को वनबास क्यों दे दिया? क्या ये उचित था। क्या हुआ? मैंने पूछा, तो कहने लगीं,’ आज पर्याप्त गरमा-गरम तर्क-वितर्क हुए। शान्ति जी कुछ अधिक ही महिलावादी हैं, इतना कि वे अन्य महिलाओं के तर्क भी नहीं सुनतीं। उनका कहना है कि पुरुष सदा ही नारी पर अत्याचार करता आया है। मेरे कुछ उत्तर देने पर बोलीं कि अच्छा तुम डाक्टर साहब से पूछ कर आना इनके उत्तर। वे तो साहित्यकार हैं और नारी-विमर्श आदि पर रचना करते रहते हैं। वे आपसे भी बात करना चाहती हैं। क्यों नहीं ,मैंने कहा , अवश्य, कभी भी। दूसरे दिन ही तेज तर्रार शान्ति जी प्रश्नों को लेकर पधारीं, साथ में अन्य महिलायें भी थीं। बोलीं ‘क्या उत्तर हैं आपके इन परिप्रेक्ष्य में ? मैंने कहने का प्रयत्न किया कि ऐसा नहीं है, राम शासक थे और.....वे तुरंत ही बात काटते हुए कहने लगीं ,’ राम राजा थे..प्रजा के हित में व्यक्तिगत हित का परित्याग, लोक-सम्मान आदि..... ये सब मत कहिये, घिसी-पिटी बातें हैं, बेसिर-पैर की...पुरुषों की सोच क…

सुरेश कुमार 'सौरभ' का आलेख - क्षीण होती सामाजिक सद्भावना

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सामाजिक सद्भावना का तात्पर्य है- समाज के हित अथवा कल्याण की भावना ।
मनुष्य समाज में रहने वाला एक विचारशील प्राणी है । वह संसार के सभी
प्राणियों में बौद्धिक रूप से अतिसक्षम तथा संवेदनशीलता के स्तर पर
सर्वश्रेष्ठ है ।
इस 21वीं शताब्दी का मनुष्य बौद्धिक रूप से तो उत्तरोत्तर विकास करता जा
रहा है, परन्तु चारित्रिक-अवनति भी उसी अनुपात में दृष्टिगोचर हो रही है
। साथ ही मानवीय संवेदना मृत होती जा रही है । संवेदनहीन-नर नर नहीं
नर-पशु हो जाता है । आज के अधिकांश व्यक्ति समाज में रहकर भी समाज के
उत्थान के सम्बन्ध में सोच-विचार करने का प्रयत्न नहीं करते हैं ।
व्यस्तता भरे इस परिवेश में व्यक्ति अपने आप ही में सिमटता चला जा रहा है
। उसे केवल अपना घर-परिवार ही दिखता है, उसके अतिरिक्त वह समाज की
विसंगतियों से बचने का प्रयास करता है, न कि उन्हें दूर करने का । ऐसा
प्रतीत होता है कि समाज के प्रति उसका कोई दायित्व ही नहीं है ।
परिणामस्वरूप वह अपने आप-पास के लोगों से नित्य कटता चला जा रहा है । ऐसे
में जो एकता की सुदृढ़ कड़ी का निर्माण हमारे पूर्वजों ने किया था वो
निरन्तर क्षीण होती जा रही है ।

एक दु:खद आश्चर्य ये है कि आज व…

राकेश शुक्ल का आलेख - चीनी भी जहर है!

चीनीभीजहरहै!हम भारतीय चावल, आलू, ब्रेड, स्नैक्स एवं शीतल पेयों के रूप में प्रतिदिन कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार का सेवन करते हैं जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है परंतु अधिकता में ग्रहण करने पर पोषण संबंधित रोगों का जन्म होता है जिनमें हृदय रोग, मोटापा, मधुमेह, दंतक्षय, चयापचयी अनियमिततायें, पोषण न्यूनता तथा कैंसर जैसी परेशानियां मुख्य हैं. आवश्यकता से अधिक मात्रा में ग्रहण किये जाने वाले कार्बोहाइड्रेट्स में शर्करा का प्रमुख स्थान है. गत पांच दशकों में भारत में शर्करा का उपयोग विश्व उत्पादन के पांच प्रतिशत से 13 प्रतिशत तक बढ़ गया है जिससे भारत विश्व का सबसे बड़ा चीनी अपभोगकर्ता देश बन गया है जहां संपूर्ण यूरोपियन यूनियन के कुल उपभोग से एक तिहाई ज्यादा तथा चीन के उपभोग से 60 प्रतिशत अधिक चीनी का उपभोग किया जाता है. भारत का प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष चीनी उपभोग 20 किलो है जो वैश्विक औसत (25 किलो) से कम है परंतु यह दर तेजी से बढ़ रही है. विश्व भर में यह सलाह दी जाती है कि महिलाओं एवं पुरुषों को प्रतिदिन क्रमश: 05 तथा 09 चम्मच से अधिक शर्करा नहीं ग्रहण करना चाहिए. मधुमेह के प्रति अधिक संवेदनशील…

सुशील यादव का व्यंग्य - जहाँ सोच है, वहाँ शौचालय है

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जहां सोच है वहाँ शौचालय हैयस, वी केन ,,,,मैं मानता हूँ इतने रद्दी तरीके से कोई शुरुआत नहीं होती ,मगर क्या करे अपने अंदर क्या –क्या कर सकने की क्षमताओं का आकलन यदि किया जाना है. तो मूल को पकड़ना जरूरी हो जाता है। मूल में आदमी की सुबह की नित्य क्रिया पहला और जरूरी स्थान रखती है। बहरहाल आइए आगे की सोचें, ‘व्हाट वी केन डू अहेड’। हर आदमी में ‘यस वी केन’ नहीं पाया जाता। उसके अंदर से, उसके कर सकने वाली क्षमता को, निकालना पड़ता है। हमारे अंदर छिपी प्रतिभा को निकालते-निकालते बासठ बरस हो गए। हर किसी ने खदेड के बाहर निकालने की कोशिशें की। माँ-बाप ,भाई-बहन ,मास्टर ,गुरुजी, सर……., सबने हाथ आजमाए। नैतिक शिक्षा की झडी लगा दी। बचपन में स्कूल जाने का मन नहीं करता था, तो अम्मा कहती बेटा तुम अच्छे बच्चे हो…. ,स्कूल भला क्यों नहीं जा सकते। मैं कहता दूसरे हमें मारते हैं। वो कहती ,तुममें बहुत ताकत है......। तुम ओ शेर को भी डरा सकते हो। मैं मुगालता पाल लेता ,शेर से लड़ने की ताकत है....., तो गीदड़ों से भला क्या डरना? पिताजी से शिकायत रहती कि कपडे अच्छे नहीं है, तो वे वीर सपूतों के, या अपने भोगे हुए यथार…

सप्ताह की कविताएँ

निर्मला सिंह गौरउम्र भरअनुभवों की धार ने हमको तराशा उम्र भर हमने हर्जाना चुकाया अच्छा खासा उम्र भर हमको जिनकी धीरता गम्भीरता पर गर्व था वो हमे देते रहे झूंठी दिलासा उम्र भर| दूसरों के दर्द में हम खुद हवन होते रहे बाँट कर तकलीफ सबकी साथ में रोते रहे हमने जिसके आंसुओं को अपने कंधे पर रखा हाय!किस्मत उसने हमको खूब कोसा उम्र भर | हम सयानो में सदा नादाँन कहलाते रहे दोस्ती में हम नफा–नुक्सान झुठलाते रहे इस भरी दुनिया में किसका कौन करता है लिहाज़ वो तो हम थे ,जो नहीं तोड़ा भरोसा उम्र भर | कागजों के महल भी हमने बनाये शौक से और उन पर रंग रोगन भी कराये शौक से एक चिन्गारी से उसकी खैरियत क्या पूछ ली फिर वहां हर एक ने देखा तमाशा उम्र भर | निर्मला सिंह गौर ,(९.११.२०१३)१६:३०: ----------- कल्याणी कबीरएक  आह  मेरी  सुन  के  जो  हो  जाते   थे  बेचैन .......मुंसिफ  जो  था  उसे  भी  गुनहगार  देखकर  ,हम  खुद  उठा    रहे  हैं  अपनी राह का पत्थर  .कोई  रखता  हो  छुपा  के  ज्यों जीवन की कमाई ,माँ रखती है  छुपा  के यूँ अश्कों का  समंदर  .एक  आह  मेरी  सुन  के  जो  हो  जाते   थे  बेचैन  ,हर ज़ख़्म  से  म…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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