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November 2013
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कहानी

दिल की इक आवाज़ ऊपर उठती हुई․․․

मुकेश वर्मा

तीन सौ सड़सठवीं मंजिल से गिरते हुये जब वह अपने होश-हवास पर कुछ काबू कर पाया तो उसने देखा कि वह नीचे गिरता ही जा रहा है। वह मदद के लिये उस बड़ी इमारत के सामने चिल्‍लाया लेकिन ऊपर के कई माले हमेशा की तरह सख्‍त बंद हैं। मकानों की दरारों में से रह-रह कर सिगरेट का धुआँ और शराब की गंध लापरवाही से निकल रही है।

अपने जिस्‍म को पत्‍थर की तरह ठीक सीधे और नीचे ही नीचे जाते देखते हुए उसके दिमाग़ में सिर्फ़ मदद․․․ मदद की एक ही आवाज़ गूँज रही है। उसे तीन सौ पाँचवीं मंजिल के टैरिस पर एक हैरतज़दा आदमी दिखाई पड़ा। उसने हाथ फैलाकर कहाः- ‘मैं नीचे गिरता जा रहा हूँ, बताओ मैं क्‍या करूँ․․․ मेरी मदद करो।' टैरिस पर सकपकाया खड़ा आदमी अकबका गया और लगभग हकलाते हुये चिल्‍लाया, ः- ‘अरे रुको․․․ क्‍या करते हो․․․ मर जाओगे․․․ मैं फिर कहता हूँ कि․․․ वहीं रुक जाओ․․․'

गिरता हुआ वह झल्‍लाना नहीं भूला, ‘मालूम है․․․ मुझसे बेहतर कौन जान सकता है․․․ स्‍साले․․․। लेकिन तब तक वह दो सौ अठासी नम्‍बर के फ्‍लैट के करीब पहुँच गया है। उसने फिर मदद की गुहार की। दरवाज़े पर एक चुस्‍त-दुरुस्‍त बदगुमान शख्‍़स पतलून के जेबों में हाथ घुसेड़े उसे ताक रहा है। उसने तेज़ आवाज़ में पूछा, ‘क्‍या है रे, काय को चिल्‍लाता है? क्‍या नाम है तेरा? काय को कूंदा? भीख माँगने का नवा तरीका निकाला है? दो लात देऊँगा तो और फटाफट नीचे पहुँचेगा․․․

उसने चाहा कि रुककर वह इस बदतमीज आदमी से निपट ले लेकिन उसे अपनी हालत का ध्‍यान आया। उसने खुद ही कुछ करने में दिमाग लगाया। जब वह फ्‍लैट नं․ 259 के पास से निकला तो उसने बिना देखे कहा- ‘भाई, मैं नीचे गिरता जा रहा हूँ․․․ हालाँकि ज़मीन पर हरा लॉन है लेकिन फिर भी चोट तो लगेगी․․․ अब मुझे जरा जल्‍दी से बताओ कि․․․ गिरते वक्‍त मेरा सही पॉस्‍चर क्‍या रहे․․․ कि पैरों को सीधा रखूँ․․․ या सिर को हाथों से थामे रहूँ․․․ ताकि चोट खतरनाक न बन सके․․․' फ्‍लैट की खिड़की से आसमान को घूरता एक मनहूस और बेरोजगार नौजवान उसे देख बहुत दिनों बाद आश्‍चर्य-चकित हुआ और हँसने लगा। फिर यकायक चौंककर बोला- ‘भाई साब, आप कहाँ नौकरी करते थे․․․ जगह बताओगे․․․? टेम्‍परेरी या परमानेन्‍ट․․․ मुझे ज्‍यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा․․․'

दुनिया से एक बार फिर दुःखी होकर, अब उसने कभी कहीं पढ़े गये योग के बारे में सोचा। यदि वह श्‍वास को रोक लेने का अभ्‍यास करे या फेफड़ों में से हवा निकाल ले तो․․․ क्‍या शरीर हल्‍का होकर फूल की तरह आहिस्‍ते से ज़मीन पर रख जायेगा․․․ क्‍या ऐसा हो सकता है?․․․ ऐसा न हो कि फूल जैसा हल्‍का, होकर वह इमारत के किसी ख़तरनाक कोने से टकरा कर छार-छार हो जावे․․․ हाथ पाँव टूटे तो भी चल जायेगा लेकिन․․․ कहीं जान से हाथ धोना पड़ा तो․․․' यह ‘तो' इतना बड़ा बनकर उसके सामने आया कि इस बार वह फूट-फूटकर रोने लगा।

कुछ बच्‍चे, बचपन और जवानी की सरहद पर खड़े फ्‍लैट नं․ 226 के तंग बरामदे में कौन सा खेल खेलें, इस बात को लेकर झगड़ रहे हैं। एक भर आवाज़ चीखा․․․

‘सुपरमैन․․․ सुपरमैन․․․'

‘इसकी लाल चढ्‌ढी कहाँ है․․․?

‘हवा में․․․ कहाँ गया․․․?'

‘नीचे․․․ भई नीचे․․․!' कोरस में आनन्‍द के स्‍वर गूँज उठे।

‘सुपरमैन․․․ सुपरमैन․․․ ऽऽऽ․․․

इस क्षण वह फ्‍लैट नं․ 203 के सामने से गिरता हुआ गिरता गया। दीवार पर लटके काँच में सूरत निहारता एक अधेड़ शेविंग कर रहा है। देखकर उसने दाढ़ी पर चिपका साबुन पोंछा और जोर से हँसा और जोर-जोर से हाथ हिलाने लगा। गिरते आदमी ने फिर वही पूछना चाहा लेकिन वह हाथ ही हिलाता रहा। यकायक उसने पूछा- ‘कैसे गिरे․․․ अचानक․․․ खुली खिड़की से? ․․․ और जोर से खिड़की बंद कर ली।

वह अभी भी हवा में है। बेचैन है। उसके शरीर का क्‍या पॉस्‍चर होना चाहिये, वह समझ नहीं पा रहा है। उसने बड़ी अजीजी से उस फ्‍लैट को देखा जिसके बाथरूम की बाहर वाली निकपाट खिड़की चौपट खुली है।

‘․․․बेशर्म․․․ गुण्‍डे․․․ बदमाश․․․'

टॉवल की ओर लपकती औरत मुँह खोलकर चीखी। खिड़की से नीचे देखती औरत का मुँह खुला का खुला रह गया।

उसके भाग्‍य का गुण्‍डा बदमाश फ्‍लैट नं․ 178 के पास फड़फड़ा रहा है।

सामने ड्राइर्ंगरूम में तीन लोग बैठे और एक खड़ा व्‍हिस्‍की पी रहा है। एक चिल्‍लाया-‘देख, क्‍या सीन है․․․! सबकी आँखें उसी तरफ मुड़ गईं।

‘․․․क्‍या कहता है․․․ आओ सट्‌टा लगावें․․․ आसमान से उतरा फरिश्‍ता या अंतरिक्ष से आया चोर․․․ लगाते हैं․․․ फरिश्‍ते पर एक के चार․․․ चोर पर एक के आठ․․․ माल निकाल․․․ जल्‍दी बे․․․

फ्‍लैट नं․ 149 के किचन में आटा गूँथती काली औरत ने कहा-' ․․․एक वो है जो ऊपर से कूद पड़ा और ․․․ एक तुम हो निठल्‍ले․․․ निकम्‍मे․․․ काम के न काज के․․․ दुश्‍मन अनाज के․․․ मैं नौकरी न करूँ तो भूखे मर जाओ․․․ उसे देखो․․․ और कुछ शर्म करो․․․। उसने दरवाज़े से नीचे गिरते आदमी को एक बार देखा और चुप बैठा रहा। जब गिरते आदमी ने उसे देखा, तब भी वह उसी तरह चुप बैठा रहा। औरत के अधिक बड़बड़ाने पर वह चुप उठा। चप्‍पलें पैरों में फँसाकर बाहर निकल आया और आदतन सीढि़याँ उतरने लगा। नीचे उतरते हुये ऐसा लगा कि वह नीचे गिर रहा है। उसने जेब ढूँढ़ी लेकिन आखिरी बीड़ी वहाँ भी नहीं है।

उस वक्‍त फ्‍लैट नं․ 118 के बाजू से वह गुजर रहा है जिसके टैरिस में दर्जनों कैक्‍ट्‌स के गमलों के बीच से पीले पत्तों वाली एक बेल दीवार दरके कोने से बार-बार बाहर उमड़ रही है। अस्‍त-व्‍यस्‍त मोटी औरत ने लगभग कान खींचते हुये लड़के को बुरी तरह से डपटा।

‘․․․छोड़․․․ छोड़․․․ उसने देखा․․․ दरवाज़ा भी ठीक से बंद नहीं करता․․․ हाय रे․․․ वह नीचे गिरा जा रहा है․․․ उसने देख लिया․․․ ज़रूर देखा होगा․․․'

लड़के ने ढीठता से कहा- ‘․․․किसने देखा․․․?'

पसरी औरत बेदम हाँफ रही है।

․․․उसने ․․․ और किसने․․․ अरे वो मुआ․․․ जो नीचे गिरा जा रहा है․․․ लड़के ने हाथों में ताकत भरी और गिचगिचा कर बोला-‘कौन गिरा․․․ आप तो मुझे देखो कि आपके लिये मैं कितना नीचे गिर सकता हूँ․․' कहते हुए मनीबैग से फूली और तीन जगह से उधड़ी चितकबरी पैंट पाँव से परे ठेल दी।

फ्‍लैट नं․ 94 के बूढ़े ने उसे बहुत पहिले से देख लिया। फ़क़र् केवल इतना रहा कि वे उसे चिडि़या समझकर खुशी-खुशी सोच रहे थे कि आकाश में अभी भी चिडि़यें हैं। लेकिन उनकी बत्तीसी निपक कर बाहर आने को हुई जब उन्‍हें कुछ-कुछ आभासित हो सका कि इतनी बड़ी तो चिडि़या नहीं हो सकती। ऐनक लगाकर वे सप्रमाण जान पाये कि कमबख्‍़त यह तो आदमी है, बेकार ही नीचे को भागा जा रहा है। रेलिंग से सटी कुर्सी पर फिर लेटते हुये वे बुदबुदाये- ‘आह! जवानी की मौज भी क्‍या होती है․․․ ज़मीन आसमान सब एक हो जाता है․․․ कहीं भी चले जाओ․․․ ऊपर नीचे, दायें-बायें, चारों दिशायें․․․ सभी सनसनाती․․․ तब कुछ भी ग़जब करने का मन होता था․․․ अब न उम्र रही और ․․․ न कोई ग़जब हुआ․․․ अब तो देखने से भी डर लगता है․․․।' उन्‍होंने टटोल कर गोली खाई और आसमान से मुँह फेरकर करवट बदल ली।

जिस दम वह फ्‍लैट नं․ 72 के नजदीक पहुँच रहा है। उसके भीतर के हॉल में पहिले से कुछ परेशान हाल लोग आपस में उलझ रहे हैं। उन्‍हें कुछ सूझ नहीं रहा है। तभी जिसने उसे देखा, उसके साथ कई और लोग समवेत भी चिल्‍लाये। ‘․․․वह․․․ वह ․․․ देखो․․․ देखो․․․ कैसे․․․ हाँ․․․ गज़ब․․․ एकदम․․․ फाइन यार․․' उनमें से सिर खुजलाता आदमी जिसने सबसे बाद में देखा, मुँह फाड़कर आया और सबसे आगे हो गया। ‘․․․अरे ․․․ हाँ․․․'

उसकी हाँ इतनी बड़ी और लम्‍बी हुई कि उसमें सबकी हाँ घुस गई और दूर तक और देर तक फैली रही। ‘․․․आइडिया․․․ हाँ․․․ आइडिया․․․ ऐइटाइ तो आमी खूंजछिलाम․․․ आर ऐइटाइ पालामछिलम ना․․․ आखिर आश्‍मान से टोपका․․․ छोप्‍पर फोड़ के․․․'

सब लोग उसके चारों ओर इकट्‌ठा हो गये।

‘․․․ दादा ․․․ की भालो․․․???'

‘․․․ अपुन को एकटो नोइ आइडिया आई․․․ अपुन को बीमा के बारे में एड फिलिम कोरबो․․․ तो ․․․शूनो․․․ आमार कम्‍पनी की महिमा․․․ जार लाइफ़ का बीमा कराया, ओ आदमी ․․․ 300 वीं मंजिल से नैचूँ को कूदा․․․ बूझले तो न․․․ अमार कम्‍पनी सच ए फॉस्‍ट․․․ के श्‍शाला जब वो 200वीं मंजिल पे पौंचा तो कम्‍पनी ने क्‍लेम का चेक हाथ में पोकरा दिया․․․ व्‍ही ऑर फास्‍ट, व्‍ही ऑर अहैड द शाला टाइम․․․ है न' ․․․ आइडिया․․․ एकदम नोइ․․․'

यह दुनिया का नियम है कि जो नीचे गिरता है, वह गिरता ही जाता है। प्रकृति भी इसमें आड़े नहीं आती बल्‍कि अपनी सारी गुरुत्‍वाकर्षण शक्‍ति के साथ जुट जाती है। वह फ्‍लैट नं․ 28 के सामने रुकना चाहता है। लेकिन बावजूद हरचंद कोशिशों के रुकना हो नहीं पा रहा है। उस फ्‍लैट की तीसरी खिड़की से भी निकला एक कोमल कमजोर हाथ उसे रोकना चाह रहा है लेकिन रोक पाना नहीं हो रहा है।

यूँ तो बड़ा कहा जाता है कि प्‍यार में बड़ी ताकत होती है। आज यह कहना बेकार सिद्ध हुई कि गिरने से प्‍यार रोक सकता है अलबत्ता कारण ज़रूर बन सकता है। बात सिर्फ़ इतनी भर नहीं बल्‍कि आगे यह भी जताया जाता है कि दुनिया की कोई ताकत किसी को गिरने से रोक नहीं सकती। लेकिन केवल लेखक ही है जो यह कमाल दिखा सकता है, भले ही काग़ज़ के मैदान में और कलम के माथे पर भल-भल स्‍याही बहाता हुआ․․․

․․․ और ऐसा हुआ भी। हुआ यह कि फ्‍लैट नं․ 23 से नीचे आते-आते वह हरे लॉन तक आ ही गया। पके आम सा टपका। धम्‍म्‌ की इक आवाज़, वह भी हल्‍की सी। धूल झाड़ी। उठ कर चल दिया, इस बार भी बिना बताये कि अब कहाँ जा रहा है। आप कहेंगे कि ऐसे कैसे??? लेकिन आप भी तो दिल ही दिल में चाहते यही थे․․․ तो अब क्‍यों कैसे-कैसे की रट लगा रखी है?

अगर दिल की बात पूरी हो जाये तो भला आपको क्‍या और क्‍यों कर आपत्ति होना चाहिये․․․!!!

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एफ-1, सुरेन्‍द्र गार्डन, अहमदपुर,

होशंगाबाद रोड, भोपाल-462043

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स्‍मृति-शेष डोरिस का जाना

डोरिस लेसिंग अब नहीं रहीं. 17 नवंबर को 94 साल की उम्र में ब्रिटेन के सबसे प्रभावशाली साहित्‍यकारों में शुमार डोरिस लेसिंग ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. 22 अक्‍टूबर 1919 को ईरान में जन्‍मी डोरिस साहित्‍य के लिए नोबेल पुरस्‍कार पाने वाली सबसे उम्रदराज लेखिका थी. वर्ष 2007 में जब डोरिस 88 वर्ष की थी तब उन्‍हें साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार दिया गया था. पुरस्कार की घोषणा के बाद डोरिस ने का था कि ‘‘ मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं लगभग यूरोप के सभी पुरस्कारों को जीत चुकी हॅूं. सब चीजें एक मजाक की तरह है. नोबेल पुरस्‍कार की एक स्‍वयंभू कमेटी है, वे सब खुद ही वोट करते है और विश्‍व की प्रकाशन उद्योग भी इसमें कूद पड़ती है. मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानती हॅूं जिन्‍होंने पूरे साल कुछ खास नहीं किया फिर भी नोबेल विजेता हैं.''

सन्‌ 1984 में डोरिस ब्रिटेन की प्रतिष्‍ठित उपन्‍यसकारों में शामिल हो चुकी थी. पांच दशक के लंबे रचनाकाल में दो दर्जन से अधिक पुस्‍तकें उन्‍होंने लिखी. सन्‌ 1950 में ही डोरिस का पहला उपन्‍यास ‘द ग्रास इज सिंगिंग' प्रकाशित हो चुका था. सन्‌ 1962 में डोरिस का दूसरा उपन्‍यास ‘द गोल्‍डन नोटबुक' प्रकाशित हुआ तथा बहुत अधिक चर्चित रहा. इस उपन्‍यास की लगभग दस लाख कापियां बिकी थी. यही वह समय था जब डोरिस लेसिंग के बारे में अखबारों में छपने लगा था कि वह साहित्‍य के क्षेत्र में नोबेल सम्‍मान पाने की हकदार है. बावजूद इसके उन्‍हें 45 साल के इंतजार के बाद र्वा 2007 में नोबेल सम्‍मान दिया गया.

बेहद सफल और गैर परंपरावादी लेखिका डोरिस का बहुचर्चित उपन्‍यास ‘द गोल्‍डन नोटबुक' के प्रकाशित होते ही ‘स्‍त्रीवादी कालजयी रचना' के कतार में आ गया था इस उपन्‍यास की मुख्‍य स्‍त्री पात्र अन्‍ना एक आधुनिक उलझी हुई महिला की कहानी है जो पुरूषों जैसी स्‍वतंत्रता चाहती है. अन्‍ना उपन्‍यास में एक लेखिका की भूमिका में है जिसने चार नोटबुक, क्रमशः काले कवर वाली नोटबुक, जिसमें उसके बचपन के अनुभव दर्ज है, लाल कवर वाली नोटबुक जिसमें राजनीतिक जिंदगी एवं कम्‍युनिस्‍ट विचारधारा से मोहभंग की कहानी दर्ज है, पीले कवर वाली नोटबुक में अन्‍ना अपने निजी अनुभवों पर एक उपन्‍यास लिख रही होती है तथा नीली कवर वाली नोटबुक में वह अपनी निजी डायरी लिख रही होती है. इन्‍ही चारों नोटबुक का संकलित रूप ‘द गोल्‍डन नोटबुक' के रूप में प्रकाशित होता है जिसे हाथों हाथ लिया जाता है और इस उपन्‍यास के लगभग दस लाख प्रतियां बिकती है जो अपने आप में एक रिकोर्ड है.

अपने अफ्रीका प्रवास के दौरान रोडेशिया में बसे एक गरीब किसान की पत्‍नी का नौकर से संबंधों को बहुत ही दिलचस्‍प ढ़ंग से उकेरती डोरिस की पहली उपन्‍यास ‘द ग्रास इज सिंगिंग' थी जिसके सन्‌ 1950 में प्रकाशित होने के बाद से ही यह बात साहित्‍यकारों के सामने आ गयी कि डोरिस में स्‍वाभाविकता के साथ-साथ शैलीगत एवं भाषाई प्रतिभा भी कूट-कूट कर भरी है.

डोरिस लेसिंग ने जेन सोमर्स के छदम नाम से दो उपन्‍यास लिख कर यह बताने की कोशिश की कि नये लेखकों के साथ दुनिया का क्‍या व्‍यवहार होता है. छदम नाम से जब उपन्‍यास लिख कर प्रकाशकों के पास गयी तो एक प्रकाशक ने छापने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि यह उपन्‍यास ‘व्‍यवसाय हितों को साधने में विफल' है तथा दूसरे प्रकाशक ने यह कहते हुए दूसरे उपन्‍सास को छापने से इंकार कर दिया कि ‘इसमें इतना अवसाद है कि कमाई मुमकिन नहीं' है. डोरिस ने बाद में संवाददाताओं को बताया था कि गुमनाम लेखकों की पीड़ा को सामने लाने के लिए यह नाटक करना पड़ा था.

डोरिस से अंतिम बार मिलने कई जाने माने लोगों में एक न्‍यू आर्कर से जुड़े जेम्‍स लैसडुन भी थे जिन्‍होंने ‘जेन सोमर्स' की पांडुलिपि को न प्रकाशित करने से संबंधित एक लेख को प्रकाशित किया था. इस लेख के लेखक जेम्‍स लैसडुन थे जो अभी एक ख्‍याति प्राप्‍त उपन्‍यासकार है, ने लिखा है कि उस पांडुलिपि तब न छपना बड़ी भूल थी जिसे समझने में हमें 30 वष्‍र्ा लग गए.

वष्‍र्ा 2007 में डोरिस का एक उपन्‍यास ‘द क्‍लेफट' आया जो काफी चर्चित हुआ. इस उपन्‍यास की खासियत यह है कि इसमें पुरूष रहित दुनिया को रचा गया है. इस उपन्‍यास में समुद्री किनारों पर बसे एक ऐसे प्राचीन समुदाय की महिलाओं की कहानी है जिन्‍हें न तो पुरूषों के बारे में कुछ पता है और न ही उन्‍हें पुरूषों की कोई जरूरत है. उस समुदाय में बच्‍चों का जन्‍म चंद्रमा की गति से नियंत्रित होता है और वहां सिर्फ लड़कियों का ही जन्‍म होता है. एक बार अचानक उस समुदाय की एक महिला ने एक लड़के को जन्‍म देती है जिसके पश्‍चात समूचे समुदाय का सामंजस्‍य भंग हो जाता है. इस तरह के रोचक कथानकों से भरी पड़ी है डोरिस का रचनासंसार तथा प्राय सभी रचनाओं में स्‍त्री की प्रधानता रही है. वैसे डोरिस ने विज्ञान पर आधारित उपन्‍यास भी लिखी.

‘प्रेरणा जैसे शब्‍द को नापंसद करने वाली डोरिस कहा करती थी कि लेखन किसी वैज्ञानिक समस्‍या का वैज्ञानिक विचार है जैसे कोई इंजीनियर किसी वैज्ञानिक समस्‍या के बारे में सोचता है. डोरिस के अफ्रीका में गुजरे बचपन, प्रथम विश्‍वयुद्ध का अपने माता-पिता पर पड़े प्रभाव, किशोरावस्‍था के अनुभव, आत्‍मद्वंद्व, रंगभेद से संबंधित विचार उनकी आखरी उपन्‍यास ‘एलु्रेड एंड एमिली' में पढ़ा जा सकता है जो वर्ष 2008 में प्रकाशित हुई थी.

एक दयालु एवं मर्मभेदी लेखिका डोरिस लेसिंग के जाने के बाद विश्‍व साहित्‍य को अपूरणीय क्षति हुई है. उनको सादर श्रद्धांजलि.

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड़

               (व्यंग्य)
दुम लगवाने की कोशिश


   
-राम नरेश'उज्ज्वल'

   मेरी समझ से दो जून की रोटी ईमानदारी पूर्वक कमाना और खाना सबसे बड़ा एवं पुरस्कृत करने वाला अर्थात सम्मानयुक्त कार्य है। जो इस काम में सफल हो जायेगा, वह दूनिया में कभी भी मात नहीं खायेगा। बड़े-बड़े काम करने वाले लोग दो जून की रोटी के लिए कभी काम नहीं करते। वे काम करते हैं नाम कमाने के लिए अपना स्टेट्स बनाने के लिए। स्टेट्स बनाना बहुत मुश्किल काम है,उसे मेनटेन रखना, उससे भी मुश्किल काम है। आदमी अपने स्टेट्स को ऊपर उठाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता है और कभी भी उसे पर्याप्त ऊंचाई तक पहुँचा नहीं पाता है।


     ऊंचाई पर पहुँचना सबके वश की बात भी नहीं है। कुछ लोग ऊंचाई पर पहुँच तो जाते हैं,पर उस स्थिति में बने नहीं रह पाते हैं। मुँह के बल नीचे गिर जाते हैं। जब पंछी थकता है, तो भूमि की ओर ही आता है। आसमान में ठहरने के लिए कोई स्थान नहीं। यह पृथ्वी ही है, जो सभी को अपने हृदय में स्थान देती है और हम उसे महाभारत करके लहू-लुहान करते हैं


     चोरी-मक्कारी का हर जगह बोलबाला है। सुविधा शुल्क हर जगह चल रहा है। नौकरी-चाकरी,पढ़ाई-लिखाई,चुनाव-उनाव हर जगह गड़बड़ घोटाला है। संत-महात्मा भी धर्म,जाति,उपजाति,व प्रजाति आदि इत्यादि के आधार पर गड़गड़ कर रहे हैं। मान-सम्मान भी सुविधा शुल्क व सिफारिश से ही हथियाये जाते हैं। इसलिए कुछ कलाकारों के आगे पुरस्कारों और सम्मानों की लम्बी दुम लगी होती है और कुछ कलाकार दुम लगवाने की फिराक में लगे रहते हैं और कुछ बेवकूफ 'कर्मण्येवाधिकास्ते मा फलेषु कदाचन' की तर्ज पर सिर्फ कर्म करते हैं और बिना पूँछ के ही पुँछकटे पिल्ले की तरह जीवन भर निरीह जीवन व्यतीत करते     हुए समय काटते रहते हैं।


      दुम सम्मान का प्रतीक है, इज्जत का मानक है, इसलिए समाज में दुम लगवाना अति आवश्यक है। आवश्यकता ही विज्ञान की जननी है। विज्ञान ही उन्नति का रास्ता दिखाती है। अतः रास्ता ऐसा होना चाहिए जिसमें चलते हुए तकलीफ न हो। हो तो पता न चले, जैसे प्यार होता है तो पता ही नहीं चलता कि कब-कैसे,क्या हो गया है। कुछ काम बिना चाहे हो जाते हैं। जैसे सचिन को संन्यास न चाहते हुए भी लेना पड़ा या यूँ कहें कि उन्हें जबरदस्ती संन्यास दिलवाया गया। कभी कभी जबरदस्ती के काम में भी फायदा हो जाता है। जैसे सचिन का हो गया। बिना चाहे ही 'भारत रत्न' मिल गया,इसलिए तो कहते हैं, कि 'बिन माँगे मोती मिले माँगे मिले न भीख'। अब भीख मिले या न मिले पर माँगने वाले तो 'भारत रत्न' ही माँग रहे हैं।

रहीम ने कहा है 'माँगन वाले मर गये जिहिं घर माँगन जाहिं,उनते पहिले वे मुए जिहिं मुँह निकषे नाहिं।' अब देने वाले मरते हैं या जीते हैं। यह तो समय ही बतायेगा। समय के आगे किसी की नहीं चलती। समय बड़ा बलशाली होता है। वह अपने अनुसार स्वयं परिर्वतन करता रहता है क्योंकि परिर्वतन प्रकृति का नियम है। नियम के अनुसार ही कायदे से चलना चाहिए, पर कायदे से भला चलता ही कौन है? सब लँगड़ा रहे हैं, हमारे देश की तरह जिसे सहारा देने वाला भी कोई नहीं है। जो सहारा देने के लिए कुर्सी पर बैठाए जाते हैं, वे खुद अपनी इच्छा पूर्ति हेतु उसे अपाहिज बना देते हैं। अपाहिज देश भला क्या तरक्की करेगा? तरक्की के लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है।

तरक्की के बिना किसी की पूँछ नहीं होती है। इसलिए भगवान ने जानवरों को पूँछ दुम के रूप में दी, किन्तु इंसान को दुम नहीं दी, उसे दिमाग दिया,क्योंकि  वह दुम के बिना भी अपना मान सम्मान प्राप्त कर सकता है। पर कुछ लोग आवार्ड रूपी दुम के पीछे भागते ही रहते हैं। क्योंकि उनका मानना है कि दुम के बिना तो जानवरों की भी इज्जत नहीं होती है। फिर आदमी की क्या विसात? पूछ और मूँछ दोनों गर्लफ्रेंड की तरह जरूरी हैं ।


     दुम को बेवकूफ टाइप कलाकर जरूरी नहीं मानते हैं। इसलिए पूँछ की कोशिश भी नहीं करते। हमें लगता है ऐसे कलाकारों व फनकारों को पूँछ जरूर लगा देनी चाहिए ताकि वे पूँछ वालों की निन्दा न सकें। निन्दा बहुत ही आनन्दप्रदाई विषय है। निन्दा की निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए। पर आदमी है निन्दा न करे तो करे भी क्या? निन्दा के कारण ही हरिशंकर परसाई की पूँछ बनी। नामवर सिंह तो इसी की रोटियाँ तोड़ रहे हैं और अपने कई साथियों को भी तुड़वा रहे हैं। इसी के कारण राम लीला भी चर्चा में आ गई है। अब चर्चा में आ गई है तो नाम में परिवर्तन करने से क्या फायदा?
    

हर इंसान फायदे के लिए ही काम करता है,जो काम करता है,उसकी पूँछ होती है। हनुमान जी राम का काम करते थे,उनकी पूँछ थी। 'अटल' की शायद अब पूछ नहीं है,इसलिए कुछ लोग पूँछ लगवाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं। आन्दोलन करने से अन्ना जैसा फायदा बहुत कम लोगों का ही होता है। हॉकी के खिलाड़ी ध्यान चन्द का ध्यान सम्माननीय लोगों ने नहीं रखा तो क्या हुआ? मान-सम्मान या अवार्ड की लालसा भी उनमें न थी। थी केवल जीत की इच्छा, देश की तरक्की की अभिलाषा। सो वो भी डूब गयी है। अब अवार्ड लेकर भी क्या होगा? हॉकी राष्ट्रीय खेल तो बन सकता है पर प्रिय खेल नहीं बन सकता। जनता व सरकार में अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग है। सबकी खिचड़ी अलग पक रही है।

    साहित्यकारों में साहित्य कुमार  'साहित्य-प्रेमी' जब से पैदा हुए हैं, लिखे जा रहे हैं और छपे जा रहे हैं। हजारों रचनाओं को जन्म देने वाले रचनाकार न प्रकाशन के लिए लालायित होते हैं और न ही दुम के लिए कोशिश करते हैं। कोकिल सी मधुर तान होने के बावजूद मंच पर नहीं जाते। आकाशवाणी वाले बुलाते हैं पर इन्हें भाँग खा कर लिखने से ही फुर्सत नहीं है। भगवान जाने कब तक ये बिना दुम के रहेंगे?


     बिना दुम वाले बड़े ही खतरनाक किस्म के होते हैं,इनसे सदा होशियार रहना चाहिए। इनके पास तो पूँछ होती नहीं इसलिए औरों की पूँछ काटने पर आमादा रहते हैं। नालायक कुमार 'लायक' एक ऐसे ही खूँखार सहित्यकार हैं, जिन पर किसी भी चोट का असर नहीं पड़ता। सैकड़ों पुस्तकों का सम्पादन कर चुके हैं। पाठ्य पुस्तक तक तैयार कराई। आकाशवाणी से अपनी कर्कश वाणी का प्रसारण किया। अब 'पैदावार' में लगे हैं। पैदावार बढ़ाने से कुछ नहीं होगा। आप लिखते रहिये, कहते रहिए सुनने वाला कोई नहीं। व्यंग्य लिखकर दूसरों के फटे में टाँग अँड़ाना किसी भले मानस को शोभा नहीं देता। अतः दुम लगवाने की कोशिश करिए। इससे नाम और दाम दोनों मिलता है। जोड़-तोड़, होड़ में जरूरी है। भारत रत्न के महाभारत में हर सपूत को जुड़ कर खुद को 'भारत रत्न' साबित करना चाहिए।
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राम नरेश 'उज्ज्वल' 
मुंशी खेड़ा,
पो0-अमौसी एयरपोर्ट,
लखनऊ

(आलेख में दर्शित नाम व स्थान पूर्णतः काल्पनिक हैं व लेखक के दिमाग की उपज हैं)

 

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बेहद परेशान थे टीवी चैनल सीसीकेएम (पूरा मतलब चूँ चूँ का मुरब्बा) के सीईओ इन दिनों.परेशानी का सबब था उनके चैनल की कमाई का गिरता ग्राफ़. दूसरे चैनल खूब चाँदी काट रहे थे, उनकी टीआरपी भारत सरकार की साख की तरह घट रही थी.

उन्होंने आनन-फ़ानन में अपने अपने सारे एंकर से लेकर फ़ील्ड संवाददाता,प्रोड्यूसर,केमरामैन सबकी आपात् बैठक बुलाई.सबको देश में - तेज़ी से लेकर सुस्त चलने वाले,१० मिनट में २०० ख़बरें परोसने वाले,चैन की नींद सोने के बहाने जगाने वाले कई चैनलों के कामयाब नुस्खे वाले कार्यक्रम दिखाये,विशेषज्ञों के भाषण करवाये.

उन्होंने कुछ टीवी क्लिपिंग दिखलाई,जिनसे उन चैनलों के दिन फिर गये थे.उनमें कुछ के नमूने ये थे."मिल गया,मिल गया,रावण का महल मिल गया. वह एअरपोर्ट भी मिल गया जहाँ उसका विमान लेडिंग करता था"- पार्श्व में रामायण सीरियल की धुन बजने लगी."आज रात बाज बकरी को रात आठ बजे उठा ले जायेगा,देखना न भूलें,आपके अपने टीवी'इंडिभार'पर".अगला चैनल-"अंतरिक्ष से उड़न तश्तरियाँ आ कर गायों को ले जा रही हैं,हमारे जाँबाज पायलटों ने हेलिकॉप्टर से पीछा किया पर वे चकमा देकर भाग गईं"-अगला समाचार-"आकाश से एलियन आ चुके हैं,कहीं आपकी खिड़की से झाँक तो नहीं रहे उठ कर देख लीजिए"-पार्श्व में खौफनाक संगीत बजता है.

अगला चैनल-"मिल गया भगवान श्रीकृष्ण का शंख"-नेपथ्य में शंख ध्वनि."मिल गई सीता की रसोई जहाँ वे भोजन बनाती थी."पार्श्व में रामायण की चौपाईयां.

ख़बरें,बनारस मे बरगद का पेड़ जिसमें तीन पत्ते लगते हैं-ब्रम्हा विष्णु महेश.जनता पूजा कर रही है.अगला समाचार -दार्जीलिंग के कुर्सीयांग में एक उड़न तश्तरी ज़मीन पर गिरी.जमीन पर एक २ फ़ुट लोहे की डिस्क जो किसी मशीन का पुर्ज़ा था पड़ी थी.वाचक संवाददाता उसे उड़न तश्तरी मान कर चर्चा करने लगे-"लोग डरे तो नहीं,पूजा शुरू हुई की नहीं"-वाचक चाहता था कि लोग पूजा शुरूं करें तो कहानी लंबी खिंचे.

"सांई बोलने लगे-आँखें झपकने लगी".दो चैनलों नें इस एनिमेशन फ़िल्म ओर उसके परम रहस्य को कई दिनों तक दर्शंकों को समझाया."बंदर जो केवल गोरी लड़कियों का दीवाना है"-"आज सिर्फ़ देखिये हमारे चैनल पर.बाबा सूर्यदेव की घोषणा-२०१४ में धरति पर प्रलय"- नेपथ्य में भूकंप की गढ़गढ़ाती आवाज़ें ,समुद्र का गर्जन,भक्त जनों का कीर्तन.

चैनल सीसीकेएम उर्फ़ चूँ चूँ का मुरब्बा के सीईओ ने उन्हें बाबा घासाराम,चरायणसांई,भूतप्रेत,सेक्स,अपराध,

अघोरी,तंत्र-मंत्र,धर्म-अध्यात्म के फ़िल्मी काकटेल,आश्रमों हो रही रास लीलाएँ ,अंधिवश्वास के खेल तमाशे

कच्चे अधपके चुनावी स्टिंग आप्रेशन और इनसे चैनलों को बढ़ती टीआरपी ओर कमाई,सब की वीडियो दिखलाई.

ख़बरें बनती कैसे है,यह भी उदाहरणों के साथ समझाया.एक खबर की क्लिपिंग में श्रीनगर के लालचौक में अलगाववादी तिरंगा खरीदते ओर जला देते. अब उनसे कौन पूछे की भइयै,वहाँ कोई झंडे की दुकान भी है क्या? यह सब अंग्रेज़ी के एक अख़बार की नक़ली प्रायोजित फ़ोटो थी. "आँखो-देखी" की बिहार में दादाओं द्वारा बूथ केपचरिंग की स्टोरी गढ़ी हुई थी.बनारस में २ वर्ष पूर्व १५ विकलागों की गुमटियां अतिक्रमण में हटना थी.उन्हें चैनलों ने उकसाया की वे ज़हर खा लें हम कैमरे से शूट करेंगे,और तुम्हें बचा लेंगे.सबने टीवी पर इसे देखा.उन्होंने सचमुच ज़हर खा लिया.५ की जान चली गई पर चैनलों की टीआरपी आसमान छूने लगी.

सीईओ ने चेलेंज किया जो कोई धाँसू स्टोरी - चाहे गढ़कर लाये चाहे स्टिंग कर के,उसे १० लाख रुपये नक़द और थाईलैंड की सैर पर भेजा जायेगा.सारे रिपोर्टर दौड़ पड़े -'इस्टोरी'की तलाश में.जिस झारखंडी रिपोर्टर की स्टोरी चुनकर टेलिकास्ट हुई वह कुछ ऐसी थी.

"मिल गया,धोनी के चौकों छक्कों का राज.आज रात प्राइम टाईम में ८ बजे चैनल सीसीकेएम पर.कौन है जो उसे ऊर्जा से भर देती है,कौन है वह सलोनीश्यामा.जिसका राज धोनी भी नहीं जानता,हम उठायेंगे पर्दा इस रहस्य से जिसे हमारे संवाददाता कूड़ाप्रसाद नें जान पर खेल कर उठाया है".

क्रिकेट इस देश का सन्निपात बुखार है और कभी उतरता ही नहीं. सारा देश सदा तपता रहता है.देश में इस खबर से हलचल मच गई.देश थम गया,चर्चाओं का बाज़ार गर्म हो उठा.परम जिज्ञासा से सब 'चू चूँ का मुरब्बा'देख रहे थे.

"जी हाँ धोनी के चौके छक्के के पीछे जिस व्यक्ति का हाथ है वह हैं मुक्तिकुमार यादव,जिनकी भैंसों का दूध धोनी पीते हैं"- कैमरा मुक्तिकुमार पर फ़ोकस होता है."ये भैंसें पालते हैं,दूध निकालते हैं,- दूध जो अमृत होता है जिसकी देश में नदियाँ बहती थी"-मुक्तिकुमार जी गदगद् हैं.पीछे उनकी घरवाली लजाती सकुचाती नज़र आती है जिस पर केमरा अब फ़ोकस है,जो भैंस का दूध निकाल रही है.कैमरा कभी मैदान में चरती भैंसों पर जाता है कभी मैदान में क्रिकेट खेलते चौके छक्के लगाते धोनी पर कभी दूध निकालती मिसेज़ मुक्तिकुमार पर कभी गिलास से दूध पीते ओर मलाई पोंछते धोनी पर जाता है.बड़ा ही मनोहारी द्रश्य बनता है.दूध निकालती घरवाली,बाल्टी में झागदार दूध,भैंस,मैदान ओर धोनी के चौके छक्के..........! तभी मुक्तिकुमार बतलाते हैं की धोनी की फ़ेवरेट भैंस कोई और ही है....! रहस्य...रोमांच...! रहस्य भरा संगीत....।

स्टूडियो से वाचक घोषणा करता है- जाइयेगा नहीं हम मिलेंगे ब्रेक के बाद,और दिखायेंगे उस भैंस ओर तबेले को जिसे मुक्तिकुमार से इजाज़त न मिलने पर भी 'जान पर खेल कर' ढंूड निकाला है,हमारे संवाददाता ने सारा देश टकटकी लगाये टीवी से चिपका रहा- परम रहस्य से पर्दा जो उठना था.

ब्रेक के बाद केमरा घोसीपुरा में मुक्तिकुमार के तबेले में घूम रहा है.संवाददाता के कपड़े गोबर-गंदगी से भरे पड़े हैं.केमरा चारा,रस्सीयां,गोबर,मरियल से बिजली के लट्टू,टोके,गडासे से होता हुआ भैंसों की क़तार दिखाता हुआ एक ख़ास श्यामासलोनी 'भैंस' पर टिक जाता है.संवाददाता उवाच-"यही है वह वह अनमोल प्यारी भैंस जिसका दूध पीकर धोनी रनों की बरसात कर देता है"पार्श्व में गाना बजता है-"तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया".अब केमरा भैंस की आँखों पर जाता है,रुकता है-गाने की आवाज़-"झील सी इन आँखों में डूब डूब जाता हूँ".अब केमरा भैंस के सींगों के क्लोज़ से उसकी पूँछ तक मिडशॅाट से लांग शॅाट में जाता है.वाचक पूछता है -"इसकी उम्र क्या है"-संवाददाता-""बाली उम्र है"-शरारत से"महिलाओं की उम्र नहीं पूछते".संवाददाता भैंस के नज़दीक़ हो गया-क्लोजप शॉट-भैंस ने उसका गाल चाट लिया-संवाददाता लजाता है.भैंस रंभाती है,सारा देश इस अद्भुत कौतुक को देख तालियाँ बजाता है.

चैनल सीसीकेएम पर यह स्टोरी टुकड़ा टुकड़ा कई दिनों तक सारा सारा दिन चली टीआरपी उछल कर सातवें आसमान पर चढ़ गई.खूब विज्ञापन मिले.चैनल निहाल हो गया.रिपोर्टर को १० लाख रुपये और बैंकाक में सुंदरियों से मसाज का अवसर मिला -उसके पहले बोनस में गोआ ट्रिप अलग से.

जैसे उस "चूँ चूँ का मुरब्बा" तथा उस रिपोर्टर के दिन फिर सब चैनलों के दिन फिरें.

अविज्ञात रहस्यों से भरा-पूरा संसार यह संसार एक विचित्र रंगमंच है, जिस पर तरह-तरह के विलक्षण अजूबे देखने को मिलते हैं. वैज्ञानिक प्रयास करते हैं कि हर प्रत्यक्ष दृष्यमान वस्तु या घटनाक्रम का वे कारण बता सकें, फ़िर भी अनेकों रहस्यों का समाधान वे अपनी तर्कबुद्धि से देने में सक्षम नहीं है. ऎसी विचित्रताएँ हमे यह सोचने पर विवश करती हैं, कि इन अविज्ञात क्रिया-कलापों एवं दृष्यों से भरी यह दुनिया आखिर बनाई किसने?

महाराष्ट्र के जलगाँव में अंजिष्ठा मार्ग पर अहुर नामक एक छोटा सा गाँव है. वहाँ से सेंदुनी जाने वाली कच्ची सडक पर तीन मील दूर पर “सोप” गाँव अवस्थित है. इस गाँव में वाणी सिद्धि का एक अद्भुत चमत्कारी नीम का पॆड है, जिसकी प्रत्येक डाल के पत्ते कडवे हैं, किन्तु सिर्फ़ एक डाल ऎसी है, जिसके पत्तों का स्वाद अत्यन्त मीठा है. कहते हैं. कडॊवा महाराज नाम के एक साधु ने ईश्वर के अस्तित्व और उसकी शक्ति का परिचय देने के लिए ऎसा किया था.

हिन्दमहासागर के रियूनियन द्वीप के केक्टस जाति का एक विचित्र पौधा पाया जाता है. वह अपने जीवन के अन्तिम दिनों में प्रायः पचास वर्ष बाद एक बार ही फ़ूलता है. इसके बाद उसके जीवन का अन्त हो जाता है.

बाई डाँगो अफ़्रीक के गाँव मवाई तथा फ़्रांस के “केन्ड्री” स्थान में एक प्रकार का वृक्ष पाया जाता है, जो वनस्पति विज्ञान के नियमों का उल्लंघन कर वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है. इस वृक्ष की जडॆं कील की तरह होती है. जब कभी तूफ़ान इस पेड के पास पहुँचता है तो वृक्ष चूलनुमा जड के सहारे लट्टू जैसा चक्कर काटने लगता है, जबकि अन्य जाति के हजारों पेड धराशायी हो जाते हैं. जितनी देर दूफ़ान रहता है, वृक्ष नाचता रहता है और तूफ़ान बंद हो जाने के बाद उसका नाचना बन्द हो जाता है.

नदिया( प.बंगाल) जिले के भामजुआन गाँव के एक शिक्षक के घर नारियल का एक ऎसा पेड ल्गा हुआ है, जिसकी शाखाओं में ही उसकी सन्तानें जन्मने लगती हैं. पिछले पाँच साल से इस पेड ने करीब एक सौ पौधों को जन्म दिया और सभी पौधे उस पेड के पत्तों के मूल स्थान से उगे हैं. इस प्रकार पिछले पाँच वर्षों में करीब एक सौ पेडों को अलग स्थानों पर लगाया गया. यदि इन अंकुरों को पेड से अलग नहीं किया जाए तो वे नष्ट हो जाते हैं

गर्म प्रदेशों मे पाया जाने वाला वृक्ष “ समानी सनम” वनस्पति जगत में अपने ढंग का आनोखा वृक्ष है. वह रात्रि में बादल की तरह बरसता है. उस क्षेत्र के निवासी उसी से अपनी जल की आवश्यकता पूरी करते हैं..वह पॆड दिन भर अपने डण्ठलों से हवा की नमी सोखता है और अपना भण्डार भर लेता है. जैसे ही मौसम की गर्मी शांत होती है वह उस भण्डार को खाली करके उस क्षेत्र के प्राणियों की प्यास बुझाता है.

इटली में एक बार दो व्यक्ति ऎसे पैदा हुए जो आकृति और प्रकृति की दृष्टि से इतने समान थे, कि साधारतया उन्हें पहचानना कठिन पडता था. दोनों के नाम भी एक जैसे थे. इनमें से एक किंग अम्बर्टॊ प्रथम था. दूसरा अम्बर्टॊ एक होटल में पहरेदार था. टोकियो नगर में वे दोनो एक ही दिन पैदा हुए. दोनो ने अपने-अपने पद एक ही दिन संभाले. दोनों की पत्नियों के नाम एक ही थे-“मारघेरिटा”. दोनों के एक-एक पुत्र पैदा हुए. दोनो ने अनजाने में पुत्रों का नाम “विहोरियो” रखा. इतना ही नहीं, ये दोनों अम्बर्टॊ मरे भी एक ही दिन. एक ही प्रकार. राजा को उसके दरबारियों ने गोली से उडा दिया, जबकि दूसरा संयोगवश बन्दूक चल जने से घायल हुआ और मर गया.

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सन १९१४ में एक जर्मन जासूस पीटर कार्पन पकडा गया. फ़्रांसीसियों ने गिरफ़्तारी को गुप्त रखा. साथ ही एक दूसरी चाल चली कि पीटर के नाम से झूठॆ समाचार जर्मनी भेजते रहे. साथ ही, जो वेतन-भत्ता जर्मनी से आता उसे झूठे दस्तखतों से वसूल करते रहे. सन १९१७ में पीटर का दाँव लगा और वह जेल से भाग निकला. दूसरी ओर पीटर नाम से मिले वेतन से प्रांसीसी गुप्तचर विभाग के किए एक गाडी खरीदी गई. संयोग की बात कि शहर मे घूमते समय एक व्यक्ति उस गाडी की चपेट में आया और मर गया. मृतक की खोजबीन की गई तो पता चला कि वह कोई और नहीं, बैरक से भागा जासूस पीटर ही था.

ओहियो के फ़िलिप रेण्ड डॆल के दाएँ फ़ेफ़डॆ में गोली लगी और इतनी गहरी घुस गई कि उन दिनों के साधनों को देखते हुए उसे निकालना सम्भव नहीं था. शल्य चिकित्सक ने निराशा व्यक्त की और आपरेशन करने से इन्कार कर दिया. घायल ऎसे ही अस्पताल में पडा रहा. एक दिन उसे जोरों की खाँसी आयी और गोली मुँह के रास्ते बलगम के साथ बाहर निकल गई.

प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन का एक टॊही विमान मोर्चे का सर्वेक्षण कर रहा था. उस्का चालक और सर्वेक्षणकर्ता शत्रु की मशीनगन के शिकर हुए और वे मारे गए. इतने पर भी विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ और घण्टॊं आसमान में उडता रहा और अन्त में ईंधन चूक जाने पर शान्ति के साथ समतल भूमि पर उतर आया. आखिर वह कौन सी चेतन शक्ति थी,जो उस जड विमान का संचालन कर रही थी?

जापान के सासवो नगर का एक नागरिक नियमित रुप से बाइबिल पढता था, जिस पृष्ठ पर वह पाठ छोडता उसमे एक हरी पत्ती का विराम संकेत लगा देता. वह अपने जीवन भर उसी पत्ती का उपयोग करता रहा. वह कभी सूखी नहीं, सदा हरी बनी रही.

आस्ट्रेलिया के एक चलती-फ़िरती पहाडी है. वह “ग्रासमीन” के नाम से प्रसिद्ध है और पर्यटकों के लिए एक छोटे ग्राम एवं होटल की तरह है. कभी यहाँ तो कभी वहाँ स्थान बदलता रहता है. कारण यह बताया जाता है कि उसकी तलहटी में १०० फ़ुट मोटी नमक की चट्टान है. पहाडी की जड उसी पर टिकी हुई है. नीचे का नमक नमी, गर्मी और सर्दी में प्रभावित होकर उथल-पुथल करता रहता और पहाडी को इधर-उधर धकेलता रहता है.

आस्ट्रिया के टीर्न पर्वत का नोड्रल जल-प्रपात संसार के प्राकृतिक आश्चर्यों में से एक है. वह झरना यों तो निरन्तर गिरता रहता है, किन्तु तीसरे पहर ठीक ३.३० पर उस पर एक इन्द्रधनुष उदय होता है. इसका समय इतना सुनिश्चित है कि लोग उससे अपनी घडी मिलाकर टाइम सही करते हैं.

ब्राजील के एक नगर बेलम डोपारा पर दोपहर २ से ४ बजे तक पूरे दो घण्टॆ नियमित रुप से वर्षा होती है. इसमें अतिरेक कदाचित ही कभी होता है. उस क्षेत्र के निवासी दो घण्टॆ अवकाश मनाते हैं. इसी प्रकार उत्तरप्रदेश के देवबन्द में (प्राचीन नाम देववृन्द),जो दारुल उलूम के कारण प्रसिद्ध है, एक देवी का मन्दिर है. प्रतिवर्ष हरियाली तीज के आस-पास एक विशेष मुहूर्त में उसकी पूजा होती है व वहाँ मेला लगता है. चाहे आसमान साफ़ हो, दूर-दूर तक बादलॊं का नामोनिशान न हो, पट खुलते ही न जाने कहाँ से काली घटाएँ आ जाती हैं और कुछ देर घनघोर बारिश होने लगती है.

गरम और ठ्ण्डॆ जल के स्त्रोते संसार के अनेक स्थानॊं पर पाए जाते हैं,किन्तु इटली के आर्मिया क्षेत्र में अपने ढंग का एक विचित्र स्त्रोता है. उसमें सर्दी के दिनों गरम पानी निकलता है और भाप के बदल उठते हैं, जबकि गर्मी के मौसम में उसका पानी बर्फ़ जैसा ठंडा बना रहता है. सम्भव है, मनुष्य की आवश्यकता के अनुकूल इस स्त्रोते ने अपनी प्रकृति बदल ली हो.

जिरिनाज पर्वत इण्डॊनेशिया में स्थित एक शांत ज्वालामुखी है. कभी वह गर्म लावा उगलता था, पर अब वैसा कुछ नहीं है. फ़िर भी उसका चुम्बकीय चक्रवात अभी भी विद्धमान है. एक चपटा सा बादल उसके गति-चक्र में इस प्रकार फ़ँसा है, कि वह इस परिधि से बाहर नहीं जा सकता. उस शिखर के ऊपर ही मंडराता और चक्र की तरह अनवरत घूमता रहता है.

अमेरिका के ओहियो प्रान्त में क्लीवलैड शहर से तीस मील पूर्व की ओर एक छोटे से गाँव में एक टीला आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है. उसे देखने के लिए प्रवासी लोग कौतुहलवश वहाँ आते हैं और अपनी गाडी टीले की तलहटी में बन्द कर देते हैं और र्जैसे ही अपना पैर ब्रेक पर से हटा लेते हैं, गाडी धीरे-धीरे पहाडी पर चढने लगती है. प्रारम्भ में गाडी की गति धीमी रहती है, किन्तु चढने के साथ-साथ उसमें तेजी आने लगती है. चोटी पर पहुँचते-पहुँचते लगभग २० किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ़्तार हो जाती है. इस तरह प्रवासी गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन करके एक निरीह, किन्तु आनन्दपूर्वक यात्रा करके लौट जाते है, जिसमें उनके लिए ऊर्जा की बचत का एक सुखद संयोग और भी जुडा रहता है.

किर्टलैण्ड हिल अथवा ग्रेविटी हिल के नाम से प्रसिद्ध उस टीले में ऎसा कौन-सा आकर्षण है, जिसके कारण चौदह टन की एक गाडी बिना ऊर्जा का व्यय किए सरलतापूर्वक आरोहण कर सके अथवा प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन कर सके?

तिब्बत में एक विचित्र झील है-“ऊँरुत्सी”. इसका पानी बारह वर्ष खारा रहता है और बारह वर्ष के लिए मीठा हो जाता है. यह परिवर्तन क्रम अतीत में इसी प्रकार चला आ रहा है.

इटली के टेण्टॊ क्षेत्र के समीप समुद्र में सफ़ेद रंग के पानी का फ़ुहारा फ़ूटता है. इसका पानी मीठा है. खारे समुद्र में मीठे पानी का फ़ुहारा फ़ूटना प्रकृति की किस विचित्रता का परिणाम है, यह अभी तक जाना नहीं जा सका.?

ये सभी विलक्षण अजूबे प्रकृति जगत में ऎसे उदाहरणॊं के रुप में विद्धमान है, जिन्हें अपवाद भर मानकर मन को संतुष्ट कर लिया जाता है, पर यह मान लेने व स्वीकार कर लेने में हमारी गरिमा तो गिरती नहीं, कि अभी हमें बहुत कुछ जानना शेष है.

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चाँद आसमान के ठीक बीचोंबीच आ गया है। ‘हाँ, शायद बारह बजा होगा।' मन ने अनुमान लगाया। बादल इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। काले, धुँआरे तथा सफेद बादलों के समूह बड़ी मस्‍ती के साथ तैर रहे थे, लगता था जैसे, गश्‍त लगा रहे हों। ड्‌यूटी पूरी कर रहे हों। ड्‌यूटी पूरी करने की आदत अब समाप्‍त हो रही है। चौकीदार भी दो चार सीटियाँ मार कर कहीं पसर जाता है। क्‍या करे वह भी, जमाना ही काम-चोरी का है। बस केवल खाना पूरी होती है।

मैकू का बेटा डमरू पुलिस में हुआ था। वही बताता था।“चाचा ! बड़ी मस्‍त जिन्‍दगी है अपनी। जिधर जाओ, कुछ न कुछ मिल ही जाता है। जब चाहता हूँ, दस, बीस, पचास बना लेता हूँ। रात की ड्‌यूटी में तो और भी मजा है। सौ-पचास बनाकर सो जाता हूँ।”

“कैसे बनावत हो बचवा।” बैरागी ने पूछा था।

“कैसे का ? कानून का डंडा अपने पास है। जिस पर फटकार दो, दस-पचास तो बगैर कहे निकाल ही देता है।”

“जो न निकाले तो ?”

“तो थाने खींच ले जाने की धमकी देता हूँ। तुम तो जानते ही हो काका, थाने-कचहरी से अच्‍छे-अच्‍छे भागते हैं।” डमरू ने अपनी बात को बड़े स्‍टाइल और रुआब से मूँछों पर ताव देते हुए कहा था।

मूँछें मर्दों की शान होती हैं। बिन मूँछों का आदमी मर्द कम जनाना ज्‍यादा लगता है। सरकारी मुलाजिमों की मूँछ हो या न हो, पर यह हमेशा ऊँची ही रहती है। कुत्ता यदि विलायती हो, तो पूँछ कटने पर भी कीमती होता है।

रात का दूसरा पहर लग गया, मगर बैरागी को नींद न आ रही थी। नजरें आसमान को घूर रही थीं। बादलों के चित्र अजीबो-गरीब बन जाते थे। यह सफेद बादल का रूप परिवर्तित हुआ। सर पर पगड़ी, बदन पर कुर्ता और तहमद बाँधे हुए एक आदमी लोटा लिए खड़ा था। कलूटा बादल काले भालू सा लग रहा था। वह दो पैरों पर खड़ा था। वह खिलखिला कर हँस रहा था। इस दृश्‍य को देख कर बैरागी मन ही मन बोला�‘बहुत चर्बी सवार है। बहुत अमीरी सवार है। चार बूँद पानी नहीं दे सकता। चार जूता पड़े तो दिमाग शुद्ध हो जाए।'

सूखे ने अबकी सबकी करनी खराब कर दी। खेत जोत-जोत कर सब परेशान हो गए, मगर पानी की कमी से बुवाई नहीं हो पाई। कुछ लोगों ने पम्‍प से पानी भरा कर रोपाई की थी। सोचा था शायद बारिश हो जाए, पर पानी के अब कोई आसार नहीं थे। उधारी ले लेकर कहाँ तक धान सींचें ? कर्जा वैसे कोई अच्‍छी चीज थोड़े न है। फसल एकदम मुरझा गई है। पानी न मिला तो बीज भर का भी अनाज न होगा।

जेवर-गहने गिरवीं रखकर पैसे लगाए थे। पैसे की तंगी आदमी को जानवर बना देती है। पूरा खेत फावड़े से गोंड़ कर जुताई की थी। किसानी में किसान हर साल जुआ खेलता है। बड़े-बड़े लोग ही लाभ कमाते हैं। छोटे लोगों की जिन्‍दगी कीड़ों सी होती है।

आसमान के काले बादल नाले के रूप में बदल गए और सफेद बादल कीड़ों की शक्‍ल लेने लगे। क्‍या दुनिया है ? क्‍या तकदीर है ? एक आसमान है, एक जमीन है। दोनों का मिलना असम्‍भव है। किन्‍तु आदमी असम्‍भव को सम्‍भव करने में ही लगा रहता है। धुँआरे बादलों ने गंगा महारानी का रूप धर लिया। “जै गंगा मैया की।” बैरागी ने कहा।

एक बड़ी सी पानी की बूँद माथे पर पड़ गई। “जै गंगा महारानी। जै वर्षारानी, प्‍यासी धरती की प्‍यास हरो। कष्‍ट हरो। जन-जन की पीड़ा का निवारण करो।”

“अब बरसेगा।” काले बादल गरज उठे। बिजली सी चमक गई। बादलों ने फिर रूप बदला। नहर बन गए। भूरा बादल ट्‌यूबवेल बन गया। सफेद बादल पम्‍प की टोंटी से पानी की तरह झर रहा था।

“हाँ, बारिश अवश्‍य होगी। बैरागी उठा और आँगन में फैला हुआ सामान छाया में रख दिया। सबको आवाज लगाई, पर कोई न उठा। सब घोड़े बेच कर सोते हैं। जब मर जाऊँगा, तो जाने क्‍या करेंगे ? अपनी चारपाई भी ओसारे में ले आया। पानी तड़तड़ा कर बरस रहा था। उसका मन खुशी से झूम रहा था।

अब पानी न लगाना पड़ेगा। फसल आसानी से हो जाएगी। भगवान बड़ा कारसाज है, वरना बड़ी मुसीबत हो जाती। कहाँ से लाता सिंचाई के पैसे ? लड़के की फीस भी चुकानी है। पढ़ाई-लिखाई में तो और भी आग लगी है।

खैर जब ओखली में सर दिया है, तो मूसल से क्‍या डरना ? मानुष का जन्‍म कष्‍ट भोगने के लिए ही होता है।

छप्‍पर से पानी चू रहा था। उसने चारपाई खिसका कर बाल्‍टी लगा दी। पानी उसमें चूने लगा। आँगन का पानी भी चारपाई के नीचे आने लगा। तुरन्‍त फावड़ा उठाया। नाली को खोदकर गहरा किया। पानी बाहर जाने लगा। पानी से उसका शरीर भीग गया था। पानी काफी ठंडा था। बदन ठिठुर रहा था, किन्‍तु उसे आनन्‍द आ रहा था। इस पानी में अमृत की अनुभूति हो रही थी।

फसल ठीक-ठाक हो गयी, तो सारे कर्जे उतर जाएँगे। गहने छूट जाएँगे। आसमान से मूसलाधार बारिश हो रही थी। ऐसी बारिश पहले नहीं हुई थी। चारों तरफ हरा भरा चारा लहलहा रहा था। सारे जानवर चर कर ही पेट भर रहे थे। घर की नाँद का चारा खाते ही न थे। जब हार-बाहर से ही पेट टन्‍न हो जाए, तो घर में भला कौन खाए ? गाय-भैंस का दूध बढ़ गया था। दूध से आमदनी काफी बढ़ गई थी। वह एक ग्राहक से पैसे ले रहा था, कि किसी ने अचानक कसके झिंझोड़ दिया। वह हकबका कर बैठ गया। सामने लल्‍लू खड़ा था- “मास्‍टर साहब ने स्‍कूल से भगा दिया है। बिना फीस बैठने न देंगे।”

बैरागी आश्‍चर्य चकित चारों ओर देख रहा था। धरती पर एक भी बूँद पानी न था। आसमान की ओर देखा। कलूटा बादल दो पैरों पर खड़ा हँस रहा था। सफेद बादल मर चुका था। उसकी अर्थी जा रही थी। भूरे बादल आँसू बहाकर स्‍यापा कर रहे थे। सपना टूट गया था।

उसी समय पम्‍प वाला आ गया। बोला- “भाई बैरागी पैसे दो। जानवरों के लिए भूसा लाना है। हरेरी है नहीं, वरना उसी से काम चलाता।”

“आज तो कुछ है नहीं। कल-परसों तक कुछ इंतजाम हो जाएगा।”

“नहीं भाई, बहुत हुआ ? पानी लगाकर जब रोपाई की थी, तब से उधार पड़ा है। आखिर हमें भी जरूरत लगती है।”

“देखो, आज और पानी लगा देना। मैं दोनों का हिसाब कल-परसों में कर दूँगा।”

“ये कल-परसों अब न चलेगा। सीधे पैसा निकालो, या ये भूसे की झाल दे दो।”

“क्‍या मजाक करते हो बनवारी ? मेरे पास भी तो जानवर हैं।”

“मैं कुछ नहीं जानता ? मुझे अपने जानवरों के लिए चारा लाना है। पैसा दो या भूसा।”

पैसे तो थे नहीं, भूसा ही ले गया। बैरागी लड़के को लेकर स्‍कूल गया। मास्‍टर साहब ने भी फटकार दिया- “खाने को पैसा है। डॉक्‍टर के लिए पैसा है, पर पढ़ाई के लिए पैसा नहीं है।”

“बीमारी तो.....।”

“बहस मत करो। जब पैसा हो, तब भेजना लड़के को। यहाँ धर्मशाला नहीं खोल रखा है।”

“चल ! खबरदार जो इस स्‍कूल में कदम रखा। पढ़ाई-लिखाई से पेट नहीं भरता है। जाके जंगल से लकड़ी-वकड़ी बीन लाया कर। अब ऐसे न काम चलेगा।” बैरागी ने लड़के को टीप लगाते हुए कहा।

लौटते समय वह फिर बनवारी के पास गया- “दादा आज पानी जरूर चला दो।”

“न बाबा न, अगर नगद रोकड़ा हो, तो बात करो। वरना आगे बढ़ो। हमारे पास इतना बाढ़ा पानी ना है। बड़ी मुश्‍किल से पिछला निकला है। अब और नहीं।”

“अगर पानी न लगा तो फसल सूख जाएगी।”

“माफ करो महाराज। फसल सूखे या आग लगे। मैं जिम्‍मेदार ना हूँ।”

“देखिए बड़ा पैसा लगाया है, अगर पानी न मिला तो पूरी मेहनत अकारथ हो जाएगी।”

बैरागी ने हाथ जोड़े। लेकिन उस पर कोई असर न हुआ। नहर में भी एक बूँद पानी न था। बैरागी मुँह लटका कर वापस घर आ गया। दरवाजे पर जानवर बँधे रम्‍भा रहे थे। खूँटे के चारों ओर फेरे ले रहे थे। सबकी हड्‌डी-हड्‌डी दिख रही थी। सारे जानवर चारा न पाने से कमजोर हो गए थे। भूरी भैंस तो बीमार होकर मर ही गई थी।

उसे कुछ समझ न आ रहा था। उसने जानवरों को कनाई से खोल दिया। वह उन्‍हें लेकर हार में पहुँचा। वहीं पास ही उसके खेत थे। उसकी बीवी खेत की निराई कर रही थी। खर-पतवार निकालने से फसल अच्‍छी होती है।

बैरागी ने देखा। मैदान में घास भी न थी। उसने जानवरों को खेत की ओर खेद दिया। जानवर फसल चरने लगे और वह मेड़ पर बैठकर जाने क्‍या सोचने लगा ? बीवी और लल्‍लू दोनों भौचक्‍के से रह गए।

‘चलो दो-चार दिन का चारा ही हुआ जानवरों का।' वह सोचकर मुस्‍कराया। कुछ ही देर में अचानक आसमान में बादल दिखाई पड़ने लगे। धीरे-धीरे पूरा आसमान बादलों से भर गया। बिजली कड़क उठी और मूसलाधार बारिश होने लगी। पानी इतना बरसा, कि खेत-खलिहान, नहर, तालाब सब भर गए।

लड़के ने कहा- “देखो बापू, आज कितना पानी गिरा।”

“का वर्षा, जब कृषि सुखाने।” इतना कह कर उसने एक लम्‍बी सी साँस भरी और दूर आसमान में फूटते- छिटकते बादलों को घूरने लगा।

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चीन की उड़ान

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[यात्रावृत्त चलते-चलते देखे गए दृश्यों और अनुभूत सत्यों का उदघाटन मात्र है या कुछ औरभी है,जिसे इसमें जोड़ा जा सकता है.यह प्रश्न जब मेरे समक्ष उपस्थित हुआ तो धर्म संकट में फँस गया. इस पर विचार करते-करते मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जैसे यात्रा-काल में थकान के अनुसार यात्री ठहर-ठहर कर चलता है और रात्रिकाल में पड़ाव भी डालता है,ठीक वही स्थिति यात्रावृत्तांत के लेखन के सन्दर्भ में भी लागू होती है.गतिमान दृश्यों के साथ-साथ स्थानिक ठहराओं और पड़ाओं के दृश्य भी इसमें शामिल किए जाने से यात्रा के सम्पूर्ण अनुभूत और देखे गए दृश्यों को सम्यक स्थान मिलता है.इसी परिप्रेक्ष्य में दिल्ली से ग्वान्गज़ाऊ की साढ़े चार घंटे की यात्रा के साथ विश्व विद्यालय परिसर में प्रथम पड़ाव का यात्रावृत्त प्रस्तुत है.]

11नवम्बर 2013 की रात के बारह बजे दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से सदर्न चाइना एअरवेज के एस 360 की उड़ान ने टेक ऑफ़ के साथ ही हमारी कल्पनाओं के भी पर लगा दिए.इस उड़ान भरने की हौसला अफजाई के लिए बगल की सीट के ज़िक्र के साथ क्रूमेम्बर ने भी कुछ ज़्यादा ही गर्मजोशी से स्वागत किया. मैं शरीर से तो सीट पर बैठ गया और बेल्ट भी बाँध ली पर मन से तो खुले और खिले-खिले, विमान की ऊंची उड़ान सीमा जो संभवतः १८ किमी होती है,से भी ऊपर बहुत ऊपर अपनी एक अलग उड़ान भरता रहा.

बगल की सीट का मतलब भाग्यशाली होना है. शायद यही संकेत वह अमावस की आधीरात में भी देना चाह रहा था.हो भी क्यों न ,कुछ दिनों पहले तक तो इस बगल वाली सीट के कुछ अलग भाव होते थे.लेकिन इस बगल वाली सीट का दो कारणों से कोई औचित्य मेरे लिए नहीं था .पहला यह कि यह उत्साह एक-दो हवाई यात्राओं में ही ठंडा पड़ गया था. दूसरा कि आधीरात का समय था. नींद ने आक्रमण कर दिया था.थकान ऊपर से थी. नींद अपनी ओस कणिकाओं से मेरी कल्पना के परों को भी बराबर भिगो रही थी.इसी आलस के वातावारण में इधर एअर होस्टेस के पदचाप और उधर अंतड़ियों की किंकिड़ियों ने एक साथ दस्तक देकर मुझे कल्पना और नींद के लोक से एक साथ प्लेन की फर्श पर उतारा.

वेज़ की माँग से वह थोड़ी अनमनी हुई पर चावल-दाल और एक पाव के साथ कुछ पेय पदार्थ ने भूख के देवता को कुछ शांत किया और गर्दन की आड़ी-तिरछी गतिविधियों के साथ हम फिर निद्रा रानी की गोद में चले गए.तकलीफ़ असह्य होने पर बीच-बीच में जागते ,गर्दन सीधी करते पर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत को ग्वान्ग्ज़ाऊ हवाई पत्तन तक चरितार्थ करते हुए भारतीय समयानुसार साढ़े चार बजे और चीन के समय के अनुसार ६:४० पर चीन के अपने काल्पनिक लोक से आहिस्ता-आहिस्ता यथार्थ के धरातल पर उतार लाया था.

बाहर निकलते-निकलते काफी समय लगा. कई ज़गह मेरे झोले की जांचें हुईं. बार-बार पहले पासपोर्ट लिया जाना फिर बैग की तलाशी कुछ-कुछ डराता तो फिर हिम्मत बाँध कर आगे बढ़ जाते. कहीं दूर-दूर तक हिन्दी का कोई नामलेवा तक नहीं था. अंग्रेज़ी भी आधे से अधिक कर्मचारियों के मुस्कान तक ही सीमित थी. अंत में मैंने एक नई युक्ति खोजी .वह ये थी कि सामने वाले से कुछ पूछने के पहले ही यह पूछ लेता कि,डू यू नो इंग्लिश? यदि उत्तर यस ,या..या जैसा होता तो उससे उक्त यूनिवर्सिटी की तरफ जाने वाले द्वार के बारे में पूछता.लेकिन इसमें तब तक सफलता नहीं मिली जब तक कि मैं मुख्य द्वार तक नहीं पहुँच गया. बाद में पता चला कि मेरी सारी कसरत निरर्थक थी.क्योंकि चीन में केवल कुछ जानकारों को छोडकर यूनिवर्सिटी के चीनी भाषी रूप को ही ग्रहण करते हैं जबकि अपने यहाँ विशेष रूप से उत्तर भारत में विश्वविद्यालय से ज़्यादा इसका अंग्रेज़ी रूप (यूनिवर्सिटी)प्रचलित है. यहाँ तक कि अपढ़ रिक्शे वाले भी फट से समझ जाते हैं. सच कहें तो मुझे यहाँ के इसी चरित्र ने सबसे पहले सम्मोहित किया.

शायद ज्यादा ऊंचाई के डर से विमान के आसमान में पहुँचने के साथ ही मेरा मोबाइल प्राण छोड़ चुका था. जिस मुसीबत से बचने के लिए मैंने दिल्ली एअरपोर्ट पर ही चाइना का जानबूझकर एक महँगा सिम खरीद लिया था,वही गले आ पड़ी थी.मेरा मोबाइल उस विदेशी जंतु को अपने अन्दर प्रवेश ही नहीं दे रहा था. मेरे मोबाइल का यह राष्ट्र-धर्म मुझे बहुत सता रहा था. क्योंकि इसके मृत होने से मेरे और मुझे लेने आने वाले के बीच सम्पर्क टूट गया था और मैं कटी पतंग -सा अपनी उटंग पतलून उठाए इधर-उधर भटक रहा था.भले ही बाहर श्रीमती तान्या केपिंग जैसी एक अत्यंत गंभीर,भद्र और शालीन सहायक प्रोफ़ेसर मेरी प्रतीक्षा में खडी थीं.लेकिन बाहर ऐसे लेने आने वालों की संख्या हज़ारों और अतिथियों की भी हज़ारों थी. मेरे आतिथ्य के सन्दर्भ में एक ख़ास बात यह थी कि मेरा नाम पट्ट देवनागरी में लिख कर लाया गया था,जिसने मुझे बिना कोई विशेष तकलीफ़ उठाए श्रीमती तान्या केपिंग तक पहुँचा दिया.एअरपोर्ट की अनेक अड़चनों के बावज़ूद चीन की इस स्वागत शैली ने भी मुझे बहुत बाँधा.

श्रीमती तान्या केपिंग ने केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ,आगरा, भारत से हिदी भाषा और उसके शिक्षण का प्रशिक्षण लिया है. संक्षिप्त परिचय के तुरंत बाद हमारा ध्यान खूब चौड़ी,साफ-सुथरी नागिन-सी बल खाती और चमचमाती सड़कों ने अपनी ओर खींच लिया.साथ में उनके किनारे लहकते खड़े स्वस्थ ,सुडौल और अत्यंत हरे-भरे वृक्षों ने भी बहुत मोहा.मैडम से उनके नाम पूछे.पर, वे नाम पूछते समय तक ही हमारे साथ रह सके. प्रथम दृष्टया चीन मेरे कल्पनालोक से पृथक नहीं लगा. रास्ते भर मेरी नज़रें अपलक चीन का प्रकृति सौन्दर्य निहारती रहीं.इस बीच पन्त की ये पंक्तियाँ भी हठात कुरेदती रहीं कि- "छोड़ द्रुमों की मृदु छाया ,तोड़ प्रकृति से भी माया .बाले! तेरे बल-जल में कैसे उलझा दूँ लोचन."

लग्ज़री कार में लाना और पहले से ही सुव्यवस्थित और सुसज्जित करके रखे गए 3बी एच के आवास में न केवल ठहराना बल्कि मुझे फ्रेश होने के लिए छोड़कर यह कहकर जाना कि, "मैं आपके लिए कुछ नाश्ता लाती हूँ." और आधे घंटे के भीतर यह नाश्ता लेके आ भी जाना मेरे लिए सुखद अनुभव था.

आराम से एक नींद ले लेने के बाद मेरी इच्छा पर उसी दिन दूसरे पहर श्रीमती तान्या जी मुझे अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय ले गईं .अपने कैम्पस से कार्यालय जाते समय रास्ते भर परिसर के सम्मोहक दृश्य ठिठकाते रहे और मैं जगह-जगह रुक-रुक कर मैडम से केवल उनके नाम भर पूछता रहा. विश्वविद्यालय परिसर के भीतर बहती नहर परिसर के प्राकृतिक सौन्दर्य में चार चांद लगा रही थी. सुन्दर-सुन्दर पार्क ,व्यायाम स्थल ,कैंटीनें और होटल साथ में यातायात के लिए निश्चित समयांतराल से चलती बसें सभी कुछ इस अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय को उसके मानकों पर खरा उतारने के लिए उद्यत दिखाई देते थे.इस अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के मुख्य शिक्षा भवन के मुख्य द्वार पर यूएनओ के सभी देशों के ध्वज चीन के राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ फहरा रहे थे.सबसे पहले उनमें अपने भारत गणतंत्र का ध्वज खोजा.उसे देखते ही अपार खुशी हुई.

विश्वविद्यालय के सुन्दर स्थापत्य,प्राकृतिक रमणीयता और वैश्विक सोच को साकार करते विभिन्न राष्ट्रों के लहराते रंग-बिरंगे ध्वजों में बंधता-बिंधता आख़िर उस दिन की मंज़िल यानी अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय पहुँच ही गया ,जहाँ पारम्परिक और अंतर्राष्ट्रीय शैलियों के मिलेजुले रूप में पर मेरा भव्य स्वागत किया गया.कुछ मिष्ठान्न के रूप में बिस्किट और वस्तु के रूप में कीमती क्राकरी भेंट में मिले.साथ में पहले से तैयार परिचय पात्र और एक कार्ड मिला ,जिसका उपयोग हम पुस्तकालय,कैंटीन और मेगा मार्केट आदि में कर सकते थे,बड़ी इज्ज़त के साथ प्रदान कर विदा किया गया. अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय के विदेशी-विशेषज्ञ अनुभाग की चीफ सुश्री सिंदी जी और उनकी सहायक ने विशेष आदर सम्मान के साथ न केवल इन चीजों के साथ विदा किया बल्कि व्यावहारिक ज़रूरतों के लिए कार्यालय से 3000युआन भी उधर दिलाए ताकि भारतीय मुद्रा के युआनीकरण तक मुझे कोई तालीफ़ न उठानी पड़े.

चलते समय मैंने चीन के जानकार मित्र से रुपयों के रूपांतरण के सन्दर्भ में राय ली तो उनहोंने बताया कि, "शर्मा जी खामखाँ डालर मत करवाना .दिल्ली या चीन के एअर पोर्ट पर रुपयों को सीधे युआन में बदलवा लेना." मैंने उनकी बात गाँठ बाँध ली .लेकिन यह गाँठ न दिल्ली में खुली और न यहाँ.अतः आज तक इस अनखुली गाँठ में बंधी भारतीय मुद्रा अपने मूल रूप में मेरी जेबों की शोभा बढ़ा रही है. यहाँ यदि यह आर्थिक सहयोग न मिला होता तो मैं अपने भारतीय मित्र की जिस नेक सलाह पर चलकर भारतीय मुद्रा के डालरीकरण से होने वाली हानि से बचा था ,उससे मेरी देह की सारी लालरी जा सकती थी .

अपने मानवीय ,प्राकृतिक और वैचारिक उच्चता के साथ जिया गया यह दिन अपने समग्र रूप में (या यह कहें कि कुल मिलाकर पहला दिन )बहुत चित्ताकर्षक और आनंद दायक रहा .

-गुणशेखर

(डॉ.गंगा प्रसाद शर्मा )
हिन्दी विभाग ,
गुआन्दांग अंतर्रराष्ट्रीय विश्व विद्यालय(वैश्विक अध्ययन) ,
ग्वन्ग्ज़्हाऊ ,चीन.

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आंचलिक साहित्यकार परिषद छिंदवाड़ा की पत्रिका आंचलिका का लोकार्पण शहर के रवींद्र भवन हिंदी प्रचारिणी परिसर में सादे किंतु गरिमा पूर्ण परिवेश में किया गया

इस अवसर पर अंचल की विभूतियों को उनके विशिष्ट यॊगदान के लिये विभूति सम्मान से सम्मानित किया गया। आंचलिका जिले की बड़ी पुरानी साहित्यिक संस्था है जिसका प्रारंभ 1992 से हुआ था। वर्तमान‌ अध्यक्ष रवींद्र नीलम और कार्यकारी अध्यक्ष शिवशंकर शुक्ल लाल के अथक प्रयासों से से संस्था ने अपनी अलग‌ पहचान जिला एवं प्रदेशिक स्तर पर बनाई है। संस्था ने जिले भर के तीन पीढी के साहित्यकारों को एक ही माला में पिरोकर उसे धरोहर रूप में सजाकर एक सराहनीय कार्य किया है जो स्वागत योग्य है।

पुस्तक में नई पुरानी और मध्य पीढ़ी के चौहत्तर साहित्यकारों की कविताओं का समावेश है। 'कितना बड़ा मजाक है ये जिंदगी के साथ,चाहा किसी और को उम्र गुज़ारी किसी के साथ'। शफक अकोटवीइ सरीखे कई वरिठ गज़लकारो‍ की रचनायें भाव विभोर करने के लिये बहुत हैं। धृतराष्ट्र हो गया न्याय आज,दुर्योधन करते शासन हैं । आज़ादी का चीर हरण,नित करते यहां दु शासन हैं। शिवशंकर शुक्ल ने देश की पीड़ा बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त की है।

पुस्तक के लोकार्पण के बाद विभूति सम्मान पारंपरिक ढंग से किया गया।  

[1]आशिक अली आशिक उर्दू अदब

[2] ,राम कुमार शर्मा साहित्य

[3] शफक अकोटवी उर्दू अदब

{4]  जयशंकर शुक्ल[लॊक सेवा

[5] सालकराम यादव जन सेवा

[6] हनुमंत मनगटे कहानी

[7] प्रभुदयाल श्रीवास्तव बाल कविता

[8]विलास मेहता समाज सेवा

[9]गुरुदास‌ राउत खेल

[ 10] कौशलकिशॊर श्रीवास्तव व्यंग

[11]हबीब‌ शैदाउर्दू अदब

[12]  गुलाब चंद‌ वात्सल्य साहित्य

[13] आनंद बक्षी कला संस्कृति

[14] पदमा नरेन्द्र सिंह गायन

[15] पंकज सोनी नाट्य विधा और

[16] उमादीप शिखा गीत गज़ल‌

को उनके योगदान के लिये शाल श्रीफल प्रदान कर और शाल ओढ़ाकर सम्मान‌ किया गया। उन्हें स्मृति चिन्ह भी प्रदान किये गये।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विमलकांत येंडे सेवा नि.महानिदेशक आकाशवाणी मध्यक्षेत्र थे। विशिष्ठ अथिथि मधुकर राव ठेंगे थे। अध्यक्षता दैनिक भास्कर छिंदवाड़ा के संपादक संजय गौतम ने की। कार्यक्रम का सफल संचालन शिवशंकर लाल ने किया। संस्था की अध्यक्ष रवींद्र नीलम सचिव रामलाल सराठे वरिष्ठ उपाध्यक्ष रमाकांत पांडे और कोषाध्यक्ष गुलाम मध्य प्रदेशी के प्रयासों से कार्यक्रम सफलता पूर्वक‌ समपन्न हुआ।

राजनीति रह गई सिमटकर अम्मा और हवाला तक,                                                  मज़हब के झगड़े पहुंचे हैं,घर से अल्ला ताला तक।

अहले अदब की परिभाषायें,कुछ पंकज ऐसी बदली‍ हैं,                                                    शेरो सुखन की दुनिया पहुंची,गालिब से खंडाला तक।

प‍ंकज सक्सेनाजी की ये पंक्तियां पुस्तक के स्तर का बयान कर रहीं हैं।

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मोहन राकेश, कमलेश्वर के बाद राजेंद्र यादव जी को नई कहानी विधा का अंतिम हस्ताक्षर माना जाता है, 1986 में कालजयी कथाकार मुंशी प्रेमचंद्र के द्वारा शुरू की गई पत्रिका ‘हंस’ का प्रकाशन उन्होंने ही दुबारा शुरू कराया था। वह विचारोत्तेजक लेखों को प्रकाशित करने से विवादों में भी आये, फिर भी वे सन्नाटे की आवाज बनकर निरंतर अग्रसर होते रहे।

हिंदी साहित्य जगत में उनको लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण मानवाधिकार, दलित और स्त्री-विमर्श पर अपनी आवाज बुलंद रखने के लिए हमेशा जाना जाता रहेगा।

28 अगस्त 1929 में आगरा ( उत्तर प्रदेश) में जन्मे राजेंद्र जी ने 1951 में आगरा यूनिवर्सिटी से एम ए किया, जिसमें उन्होंने टाप किया था। उनकी शादी लेखिका मन्नू भंडारी के साथ हुई थी, जो विवादों में घिर जाने के कारण ज्यादा दिन नहीं चल सकी।

राजेंद्र यादव जी ने उपन्यास, कहानी, निबंध आदि कई विधाओं में लिखा, उनकी प्रसिद्ध कृति सारा आकाश, ‘अनदेखे अनजाने पुल’, कुलटा आदि काफी प्रसिद्ध हुए । ‘सारा आकाश’ पर तो फिल्म भी बनी थी । ‘हंस’ पत्रिका निकाल कर उन्होंने साहित्य जगत में बहुत बड़ा काम किया था , उनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उनकी साहित्यिकता मरते दम तक बनी रही। उन्होंने 60 वर्ष पहले नई कहानी और नये सिनेमा को जो आयाम या योगदान दिये थे, वे आज भी नये ही हैं। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी, अपनी कमियों और बुराइयों को सहर्ष स्वीकार करने वाले इंसान थे। अपनी पत्नी मन्नू भंडारी के साथ मिलकर लिखी एक रचना ‘एक इंच मुस्कान’ जैसी रचना आज तक नहीं लिखी जा सकी है उसमें एक प्रयोग धर्मिता थी । वे हमेशा नारी चेतना, दलित चेतना के लिए जाने जाते रहेंगे। क्योंकि वे साहित्य जगत में इनके लिए ही आवाज बुलंद करते थे। अपने जीवन के अंतिम समय तक विवादों से घिरे रहे साहित्यकार राजेंद्र जी ने हिंदी साहित्य में एक युग की स्थापना की थी।

बीसवीं सदी के अन्त और इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता की जब भी बात होगी तब राजेंद्र जी के हंस की चर्चा जरूर होगी। उनकी अनेकों कहानियों के अलावा वे अपने आन्दोलन -धर्मी व्यक्तित्व के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे।

वह अपने पाठकों और लेखकों के बीच चाय पिलाने के दौरान बातचीत का जो तारतम्य स्थापित करते थे और उन्हें अपने विमर्श से तृप्त कर देते थे शायद ही अन्य कोई साहित्यकार ऐसा कर पाये।

वह आगरा से मथुरा, झॉसी और कोलकाता में घूमते हुए अन्ततः दिल्ली आकर बस गये थे और दिल्ली में उनका इतना मन लगा कि उन्होंने फिर कहीं और जाने का सोचा ही नहीं, जैसे गालिब दिल्ली आकर बस गये तो कहीं और जा ही नहीं पाये।

राजेंद्र यादव जी का कहानी संग्रह ‘अपने पार’ उनकी उत्कृष्ट कथा है फिर भी अगर उनकी सामर्थ्य का आकलन किया जाये तो ‘हनीमून’ उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति कही जायेगी उनके उपन्यास

‘उखड़े हुए लोग’ जो बात नहीं कह सकी वह यह छोटी सी कहानी कह जाती है। यह रचना एवरेस्ट की चोटी के समान है जिस तक पहुँच पाना किसी भी लेखक के लिए गर्व की बात है।

हालांकि उनकी मृत्यु 29 अक्टूबर 2013 में हो गई फिर भी वे अपने कृतित्व के लिए हमेशा जाने जाते रहेंगे। उनका जाना साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है जिसे भरने में समय लगेगा, साथ ही हंस का संपादन कैसे होगा इस पर भी विचार करना होगा ।

राजेंद्र यादव जी को अपना गुरू मानने वाली वरिष्ठ साहित्यकार ‘मैत्रेयी पुष्पा’ के तो उनसे बेहद अच्छे संबन्ध रहे थे वे स्वयं कहती हैं ‘‘कि मेरा साहित्य जगत में पदार्पण राजेंद्र जी से परिचय के बाद ही हुआ वे मेरे लिए बेहतरीन शिक्षक साबित हुए उन्होंने ही मुझे रचनात्मक मूल्य बताये आश्वस्ति दी कि भले ही तुम्हें बुरा लगे लेकिन वे गुरू के रूप में हमेशा बताते रहेंगे, उनकी लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों से ही हमने सीखा’ । वे कहती हैं ‘कि हिन्दी में लेखक तो बहुत मिलेंगे परंतु शिक्षक एक भी नहीं क्योंकि किसी में भी राजेंद्र जैसी उदारता और सच कहने की हिम्मत या प्रवृति नहीं मिलेगी, तमाम विवादों के बाद भी वे लोगों से और लोग उनसे जुड़े रहे।

सीमा सक्सेना ‘बरेली’


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चुनावी पाठशाला
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
अमर उठ
अब उठ
बहुत सोया
सो मत
रो मत
बहुत खोया
अब खो मत
*
बक बक
मत कर
चख चख
मत कर
मत मत
मत कर
मतदान कर
*
अब चल
चाल चल
दल दल
सब दलबदल
छल बल
इनकी करनी
करनी का फल
*
लगा अकल
दे बदल
'मत'-मत बता
औक़ात बता
गत बना
मतदान कर
सरकार बना

ख़ुदा खुदाई और ख़िदमतगार
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
ऊपर वाला ख़ुदा नहीं शहर ख़ुदा रखा है
शहर को इन्होंने हर तरफ़ ख़ुदा रखा है

ग़ज़ब की है खुदाई इनकी कहीं चलने से पहले
ख़ुदा बंदे से खुद पूछे बता कहाँ ख़ुदा रखा है

किस तरफ़ से किधर जायें पता वहीं चलता
परेशां यहाँ हर बशर किसने कहाँ ख़ुदा रखा है

देख ली तेरी खुदाई अब इनकी खुदाई देख
इसने खुदा रखा है उसने भी ख़ुदा रखा है

ख़ुदा को ढूँढ़ने निकले ख़ुदा के कुछ नेक बंदे
खुदा की हर राह को इन्होंने ख़ुदा रखा है

ख़बरदार खबर
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बिना खबर के भी
खबर बनती है
बे खबर रहे तो भी
खबर बनती है
*
खबर यह है कि
कोई खबर नहीं
बाखबर हो तो
खबर बनती है
*
खबर की आड़ में
खबर होती है
छुपाओ खबर
खबर बनती है
*
बेपर की भी हो
खबर उड़ती है
ठीये पाये की हो
खबर बनती है
*
खबरों में रहना है
तो फ़ंडा सीखो
इस्तेमाल करो
खबर बनती है
*
खबर से बचना
ख़बरदार रहो
हर लम्हें यहाँ
खबर बनती है

खबरों की मण्डी है हुज़ूर आप बाखबर रहिये
खबर न बन जायें कहीं ओर खबर भी ना हो

आयोग और संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंं
आग लगी है
आ नहीं सकते
आचार संहिता लगी है

हलो हलो
कहाँ लगी है
चुनाव आयोग

आ ही नहीं सकते
आयोग ने ही
संहिता बनाई है

भगोड़ा सांई
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
सूरत पुलिस
क्यों नहीं
सम्पर्क करती
ढूंढने के लिये
भगोड़े सांई को
उनसे

तीनों लोकों में
वीणा बजाते
दिन रात
पुकार लगाते
हमारे अपने
नारद मुनि से

जो जानते हैं
कहाँ है नारायण
नारायण नारायण
मनुहार करें
कहें तो ज़रा
दिल से

और एक वैचारिक कविता : हम बँट चुके हैं
ंंंंंंंंंंंंंंंं
हम बँट चुके
एकता दिखावा
मुल्लमा / छद्म है
कलई हर बार उतर जाती
हवा के हल्के झोंके से
*
वैचारिक ही नहीं
मानसिक रूप से बँटे
वैचारिक में विचार होता है
हमारी एकजुटता
लहसुन की गाँठ
क्षणिक दबाव
खंड खंड
बिखरती फाँके
*
बलात् बँटवारा
इतिहास संस्कृति का
ये और वे की भाषा
भौगोलिक सीमांकन
मोहल्ले जातियों के सूबे
कालोनियों की सीमा पर पुलिस चौकियाँ
गलियां दुकाने
भौगोलिक इकाईयां
इस / उस समाज का टोला
*
अपने मज़हब का नहीं
नहीं रहेगा मोहल्ले में
मकान से बेदख़ल करो
मैं भी डरता हूँ
रहना चाहता हूँ यार की गली में
रह नहीं सकता
*
संस्कृति / भाषा भूषा बंटी
दिमाग़ बँटे
रिश्ते बँटे / भाईचारा बँटा
काम बँटे
संवेदनाएँ अलग
पीड़ा अलग
*
हम भोले हैं
अनेकता में एकता कह देते
सतत कर्मकांड
मंचों से ताली बजती
क्या सचमुच एक हैं हम
कह दो
कि ग़लत हूँ मैं
***
जसबीर चावला की सामाजिक- राजनीितक विद्रूप पर चोट करती कविताएँ 

विक्रम बेताल और भ्रूण
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
विक्रम ने हठ न छोड़ा
बेताल को लाद लिया कंधे
बेताल बोला हिंस्र हैं जंगल
चलेंगे शहर के रस्ते
बिखरें / तैर रहे थे जहाँ
परियों / तितलियों के पंख
लटके मासूम सपने
किलकारियों की गूँजे
गुड़ियाओं के टूटे अंग
सोनोग्राफी की दुकानें
भ्रूण का लिंग परिक्षण नहीं होता
नन्हें हाथों के रक्तरंजित छापों से भरी
चिकित्सालयों की दीवारें
सिसकती लोरियाँ
नन्ही सी परी मेरी लाड़ली
चंदन का पलना रेशम की डोरी
चिर निद्रा में सोई राजकुमारियाँ
हाथों से गला घोंटती / अफ़ीम चटाती दाईयां
गा रही नये ज़माने की लोरियाँ
लली ऊपर जईयो
लला को भेज दीजो
*
बेताल ने सब दिखाया
बता रास्ता कौन अच्छा है
विक्रम काँप गया
क्रूर हैं शहर
जंगल नहीं मारता अजन्मे
शव फिर उड़ा
पेड़ पर लटक गया
लटक गये थे तब तक जहाँ
हज़ारों नये कन्या भ्रूण
***
विक्रम बेताल की आख़री कहानी
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
विक्रम ने फिर हठ न छोड़ा
इसके पूर्व बेताल से सुन चुका था
पच्चिस कहानियाँ
अलग अलग
कहानी सुना बेताल कहता
सिर टुकड़े हो जायेगा उसका
प्रश्न का ठीक उत्तर न दिया उसने
बेताल उड़ता हर बार
पेड़ पर लटक जाता
*
विक्रम बोला
बारी ख़त्म हुई तुम्हारी
सुना चुके पच्चिस कहानियाँ
घिसी पिटी
इस राजा / साहूकार की
रूपवती सुंदरीयों की
बहुत बोर किया
सुनता रहा
अब मेरी बारी
ठीक उत्तर मिला
दिला दूँगा शव से मुक्ति
ज़िंदा हो मनुष्य बन जाओगे
आर्यावर्त में रह पाओगे
*
सुन शव रोने लगा
किसी प्रश्न का उत्तर दूँगा नहीं तुम्हारे
ज़िंदा शव बनने से अच्छा है
बेताल शव ही रहूँ
मुझे नहीं जीना
*
कहा बेताल ने
उड़ा
पेड़ पर लटक गया फिर से
अब विक्रम ने भी
हठ छोड़ दिया
***
बोनों का इतिहास
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बोने क़द से नहीं
दिमाग़ और मन से हैं
इतिहास में सेंध
अपनी नग्नता / दारिद्रय छुपाते
ढूँढते गलियां
जहाँ से घुस सकें
कर सकें अपनी दावेदारी
इतिहास के चमकते पन्नों पर
आगे करते
प्रतीक / नायक
चुराते पुण्य / ख्याति
हरते संताई
करते वार / उनकी ़आड़
झूठ पर झूट
हाँ नंगो का भी अतीत होता है
और बोनो का भी इतिहास
***
इतिहास का प्रहसन
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
टीवी में बिछी
अतीत की बिछात
रची रणभूमि
कुछ कुटिलों ने हथियार उठाये
जो इतिहास की परीधि तक में न थे
स्वंयम कभी
वे इतिहास पुरूषों को जगाने लगे
आरती गाने लगे
हाथों में थमा दी तलवारें नायकों के
जो नायक बैठे एक जाजम
बहस / विमर्श करते
वैमनस्य से परे
वर्तमान में कठपुतली बना
भाँजने लगे / वार करने लगे
अख़बारी पन्नों पर
एक दूसरे पर
बेचारे दिवंगत नायक
**
इतिहास तो इतिहास है
प्रहसन नहीं
अतीत में जाकर
मिटाने से मिटता नहीं
न पराजित होता
मस्खरों की लीला से
***
अरुण दीपिका के नाम:हे राम
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
प्रिय अरुण गोविल / दीपिका चिखलिया
मैं प्रशंसक हूँ दोनों के अभिनय का
जो निभाया
धारावाहिक रामायण में
राम सीता बनकर
*
पर परेशान भी हूँ
अब सपने में राम नज़र नहीं आते
न सीता मैया नज़र आती
जब मूँदता हूँ आंखे
तुम दोनों ही नजर आते हो
राम सीता बनकर
*
मैं पहले बुरी तरह छला गया हूँ
राम छीना गया मुझसे
मेरा राम सौम्य था
मर्यादा पुरुषोत्तम
चित्रों में एक और माता जानकी
भाई लक्ष्मण
चरणों में हनुमान
कभी हनुमान के सीने में राम सीता
फिर मुलगांवकर के केलेन्डर अाये
घर घर में छाये
भगवानों के चित्र बने सेक्सी
देवी देवताओं ने शालीन वस्त्र छोड़े
चटख नायलोन के झीने पहने
*
फिर रचे गये एक और राम
हाथ में धनुष
आक्रामक मुद्रा में कूच करते
जनमानस में रोपे गये
गली चौराहों
कटआउट लगे
बाहर सब राममय हो गया
अंदर के राम निकल गये
*
अब याद करूँ
किस छवि के राम
मुझसे छीना गया है मेरा राम
छला गया है / छला जा रहा
सबको राम का वास्ता
राम के लिये
राम न छीनों
लौटा सको तो लौटा दो
मेरा राम
मर्यादा पुरुषोत्तम
करूणामय राम
हे राम
***
चिंता
ंंंंंंंंंंं
क्यों चिंतित हैं
आप ही हरदम
सुनता हूँ जब भी
बढ़ जाती
और भी चिंता
इन्हें भी
कोई चिंता नहीं
***
युद्ध की मानसिकता इन दिनों
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
क्या तुम्हें लगता नहीं
हम / देश जी रहा
सतत युद्ध की मानसिकता में
दनादन दगते गोले
शब्दों / कटाक्ष के
चलते रहते ज़हर बुझे तीर / तलवार
इन दिनों
*
बंट गये / बाँटे गये हम
असुविधा / सुविधानुसार
सेनाओं / उप सेनाओं में
आप असहमत हैं मुझ से
मित्र नहीं शत्रु है
आप कलिंग के हैं
या अशोक की और
कौरव हैं या पांडव
निरंतर महाभारत घट रहा
देश कुरुक्षेत्र
इन दिनों
*
बेजरुरत हिंसक
विचार में व्यव्हार में
हिंदू हैं या मुसलमान / सिख या ईसाई
और कोई कालम नहीं काग़ज़ पर
जहाँ बेख़ौफ़ होकर लिख सकें
शब्द इंसान
इन दिनों
*
हुंकार रैली / महारेली
शंखनाद रेली
चित्कार / फुत्कार / धिक्कार दिवस
थू थू रेली / स्वाभिमान रेली
रेलीयों की रेलमपेली
इन दिनों
*
आप पंचायत / खाप पंचायत
महा पंचायत
महामृत्युजंय जाप पंचायत
जय घोष
देश में हांका
तुरही नाद / नगाड़े
युद्ध / युद्धोन्माद नहीं तो क्या
कौन सुने तूती की आवाज़
इन दिनों
*
आइने में देखता हूँ
जब जब अपना चेहरा
घबरा जाता हूँ
हिंस्र होता जाता है
मेरी भी आँखें लाल / माथे पर बल
भृकुटि तनी रहती है
इन दिनों
***
सपने ओर सोना
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बचपन से सुनते आये थे
सपने देखो
सपने देखने लगे
नींद भी अच्छी आती थी
*
फिर राष्ट्रपति कलाम ने कहा
बड़े सपने देखो
बड़े सपने देखे
*
साधू शोभन ने ओर बड़ा सपना दिखाया
डोंडीयाखेड़ा में सौ टन सोना दबा है
खुदाई कर ले जाओ
दिन में भी सपने देखने लगे
*
जब शोभन ने कहा
फ़लाँ जगह पच्चिस सौ टन सोना दबा है
नींद खुल गई
बेचेन हो गये
करवटे बदलते हैं
बिस्तर पर सोना चाहते
रात दिन नींद नहीं आती
सोना तो क्या सोना भी गया
अब सपने क्या ख़ाक देखें

दहेज का रहस्य/ प्रमोद यादव

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जब से अखिल से मिलकर लौटी हूँ,बेहद उलझ गयी हूँ.कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि अखिल के कौन से रूप को सही मानूं. उसका एक रूप सामाजिक बुराईयों और रूढ़ परंपराओं के विरोधी तथा आधुनिक विचारों और सजग चेतना के प्रतीक युवक का है तो दूसरा रूप एक ऐसे इंसान का है जिसका आदर्श महज दिखावा है,महज ढोंग है. वैसे मन कहता है कि अखिल ढोंगी नहीं है. उसका आदर्श सिर्फ दिखावा नहीं है मगर उसके जिस व्यावसायिक रूप को मैंने आज अपनी आँखों से देखा, उसे झुठलाना भी सहज नहीं है. एक अनास्था का काँटा सा चुभ गया है मन में.

अखिल मीता का मंगेतर है और मीता मेरी अभिन्न सहेली है. दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते हैं. दो साल बाद अखिल डाक्टर बन जाएगा और तब वह मीता से शादी करके अपने सपनों को पूरा करेगा.वह इसी शहर के मेडिकल कालेज में डाक्टरी पढ़ रहा है और अक्सर ही मीता के घर आता-जाता रहता है. उसके घरवाले नैनपुर में रहते है.मीता के घर में उनके बाबूजी,माँ और दो छोटे भाई हैं.एक भाई सतीश सातवीं में पढ़ता है तथा दूसरा भाई मनीष मेट्रिक का विद्यार्थी है. बाबूजी का सपना मनीष को डाक्टर बनाने का है. वे एक शासकीय कार्यालय में अच्छे पद पर हैं तथा आठ हजार रूपये मासिक वेतन पाते हैं.मीता की माँ बेहद सीधी-साडी धर्म-परायण महिला है.अच्छा खाता-पीता सुखी परिवार है. आज सुबह मीता मेरे पास आई तो बहुत उदास थी.मेरे कारण पूछने पर उसने बताया कि बाबूजी के पास नैनपुर से अखिल के पिता की चिट्ठी आई है कि अखिल की शादी में वे पचास हजार रूपये नगद दहेज के रूप में चाहते हैं और उनकी इस फरमाइश की पूर्ति बाबूजी के लिए कठिन सी है.

मैं मीता के घर की स्थिति अच्छी तरह जानती हूँ इसलिए मुझे स्थिति की गंभीरता समझने में देर न लगी.मैं मीता के बाबूजी के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित हूँ. वे बेहद फिजूल-खर्च इंसान है..माँ उन्हें समझाते-समझाते हार जाती है मगर उनकी यह आदत नहीं जाती. वरना उनका परिवार इतना बड़ा भी नहीं कि वे कुछ बचा न पायें. चाहते तो धीरे-धीरे करके अब तक काफी रकम इकट्ठी हो सकती थी. मीता ने उदासी भरे शब्दों में बताया कि इस फरमाइश से माँ व बाबूजी बहुत चिंतित हो गए हैं. उनकी नजर में अब सिर्फ एक ही उम्मीद की किरण है और वह है-अखिल...अखिल के माता-पिता कभी उसके निर्णय का विरोध नहीं करते और अखिल दहेज जैसी सामाजिक कुप्रथा को प्रोत्साहित नहीं करेगा, बस इसी उम्मीद से माँ व बाबूजी कुछ आश्वस्त हैं.

मीता की बातें सुन मुझे भी लगा कि माँ-बाबूजी ठीक ही सोचते हैं.अखिल कभी दहेज नहीं स्वीकार करेगा.यही ख्याल मीता का भी था. मैंने उसे समझाया कि तुम बेकार ही दुखी मत होओ क्योंकि अखिल नए विचारों का युवक है और वह तुम्हें बेहद चाहता है. तुम उससे बात कर लेना. मगर मीता मेरे पीछे पड़ गयी कि यह बात अखिल से मैं करूँ. कमबख्त दलील दे रही थी कि मैं “ फ्रीली” बात नहीं कर सकूंगी,इसलिए तू करना. मुझे उसकी इस अनोखी दलील के आगे झुकना पड़ा और मैं अखिल से मिलने के लिए तैयार हो गयी. और अब, जब उससे मिलकर लौटी हूँ तो मन में अखिल की बातें गूंज रही है. उससे भेंट होने पर कुछ इधर-उधर की बातें करके जब मैं विषय को दहेज की प्रथा की ओर ले गयी तब उसने बहुत तीव्रता से विरोध किया था.उसने कहा कि दहेज-प्रथा समाज के माथे पर कलंक के टीके के समान है.सुनकर मैं बहुत खुश हुई थी.तब मैंने उसे बताया कि नैनपुर से उसके पिताजी का खत आया है जिसमें पचास हजार रूपये नगद दहेज की मांग की गयी है. सुनकर अखिल जैसे कहीं खो गया. उसके होठों पर एक विचित्र मुस्कान आई जो उलझाने वाली थी.मैं कुछ समझ न पाई. मैंने उसको बताया कि मीता के बाबूजी,माँ और खुद मीता बहुत परेशान हैं और उनकी आशाओं का केंद्र अब सिर्फ वही है.

सुनकर अखिल मौन रहा.फिर वही रहस्यमय मुस्कान होठों पर लाकर कहने लगा कि वह पिताजी के फैसले के खिलाफ कोई निर्णय नहीं लेगा. अगर यही बात वह सहज मुस्कान के साथ कहता तो मैं इसे एक मजाक मान लेती किन्तु उसकी उस समय की मुस्कान में चाहे जो रहा हो,मजाक बिलकुल नहीं था. सुनकर मुझे लगा जैसे किसी ने मुझे अँधेरे कुँए में धक्का दे दिया हो. फिर भी मैंने साहस करके आदर्शों की याद दिलाई. कुछ देर पहले कही गयी बातों का जिक्र किया.वह मौन रहा. मैं अच्छी तरह जानती कि अखिल के माता-पिता उसको बेहद चाहते हैं और उसकी किसी भी बात को टालते नहीं इसलिए मैंने उससे अनुनय के स्वरों में कहा कि यदि वह चाहे तो अपने पिताजी के फैसले को बदल सकता है मगर अखिल ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि वह इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा..पिताजी जो करते हैं,उसे रोककर मैं उनका दिल नहीं तोड़ सकता..

अखिल का वह रूप देखकर मन में विरक्ति सी समा गयी.आज उससे मिलने के बाद मीता से मिलने की इच्छा नहीं हुई.सच तो यह है कि मुझमें अखिल के फैसले को मीता को सुनाने का साहस नहीं हो रहा है.मगर सोचती हूँ कि आखिर कब तक बचूंगी. कल ही सुबह मीता पहुँच जायेगी और बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें अखिल के लिए विशवास और प्यार है, मेरी आँखों में डाल कर पूछेगी कि बता- क्या कहा मेरे अखिल ने ? और तब मैं कैसे कहूँगी कि अखिल ..सिर्फ ‘उसका’ अखिल आदर्शों का ढोंग रचता है..उसका आदर्श सिर्फ दिखावा है..उसे सामाजिक बुराइयों पर केवल भाषण देना आता है.

आज मीता की शादी है.मेहमानों की भीड़ है घर में.सभी के चेहरों पर उल्लास है..सभी के चेहरों पर रौनक है..घर बेहद भरा-भरा लग रहा है लेकिन जब बीते दो सालों को याद करती हूँ तो मन में जैसे खरोंच सी लग जाती है. इस भीड़ में भी मन जैसे अकेला हो जाता है.ढेर से कामों में उलझे हुए बाबूजी व मा को देख रही हूँ जिनके चेहरों पर एक परम संतोष का भाव है.

उस दिन कितना नहीं रोई थी मीता जब मैंने उसे बड़ी मुश्किल से साहस संजोकर अखिल का निर्णय सुनाया था. वही हाल मीता के बाबूजी व मा का हुआ था जब अखिल का रुख उनके सामने स्पष्ट हुआ था. वे बुझ से गए थे परन्तु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी. वे अखिल को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहते थे क्योंकि उसके उजले भविष्य के प्रति उनकी आस्था शेष थी. वैसे एक बात जरूर आश्चर्यजनक थी कि अखिल इन सबके बावजूद भी नहीं बदला था. वह हमेशा की तरह मीता के यहाँ आता-जाता जैसे कुछ हुआ ही नहीं. उसके व्यवहार में जाने क्या था कि उसने माँ , बाबूजी व मीता को कभी महसूस नहीं होने दिया कि उसने भी मौन रूप से दहेज की मांग के लिए अपने पिताजी का समर्थन किया है. फिर बाबूजी उसे चाहते भी बहुत थे.पचास हजार रूपये की चिंता से जब वे बहुत अधिक परेशान हो जाते तो यही सोचकर अपने आपको तसल्ली दे लेते कि अखिल आखिर उनके बेटे की तरह है, रूपया किसी पराये को तो नहीं देना है. इन दो सालों को मीता ने भी बहुत अजीबो-गरीब ढंग से जिया था. अखिल के लिए वह सब कुछ सह सकती थी.प्यार ने उसे विवश सा कर दिया था. अखिल को उसने अपना देवता माना था. अतः वह उसकी इच्छा के आगे विवश सी हो गयी थी.उसका व्यवसायिक सा रूप भी उसके सपनों को तोड़ नहीं सका था.

कमरे की उमस से बचने के लिए मैं खिड़की खोलती हूँ तो आँगन में मंडप की रौनक नजर आती है. एक क्षण के लिए ठिठक सी जाती हूँ. देखती हूँ, मीता के बाबूजी ने अखिल के पिताजी से कुछ कहा और वे मंडप से उठकर मीता के बाबूजी के साथ इधर ही आने लगे हैं. मैं समझ जाती हूँ कि वे अब इसी कमरे में आयेंगे और अनुमान लगाती हूँ कि उनमें क्या बातें होंगी. वे कमरे में आते हैं तो मैं बाहर जाने लगती हूँ मगर मीता के बाबूजी कहते हैं- ‘ अरे बेटी..तुम्हें बाहर जाने की आवश्यकता नहीं...अपना काम करो...’ और मैं फिर मेहमानों के लिए पान लगाने बैठ जाती हूँ.मेरे कान उनकी बातों की ओर लग जाते हैं.मीता के बाबूजी कह रहे हैं- ‘ समधीजी..दहेज की रकम तैयार है..मैंने सोचा कि आप से पूछ लूँ कि रकम आप अगर सबके सामने न लेना चाहें तो...’

सुनकर अखिल के पिता हँस पड़ते हैं. बाबूजी और मैं चौंक जाते हैं.आखिर उनकी हँसी रूकती है और वे मुस्कुराकर कहते हैं- ‘ समधीजी...दहेज की मांग तो सिर्फ एक नाटक था जो मैंने अखिल के कहने पर खेला वरना दहेज की लालच न मुझे है और ना ही अखिल को...’

‘ क्या...? बाबूजी पुनः चौंक पड़ते हैं, मैं भी कुछ समझ नहीं पाती.

‘ हाँ...मैं ठीक कह रहा हूँ...’ वे बोलते हैं- ‘ अखिल ने आपकी फिजूलखर्ची रोकने के लिए मुझसे वह पत्र लिखवाया था वरना आपमें कभी बचत की प्रवृत्ति नहीं आ पाती...अखिल को मालुम है कि आप किसी के आगे हाथ फैलाना या कर्ज लेना अपना अपमान समझते हैं..’

‘ मगर समधीजी...’ बाबूजी सुखद आश्चर्य भरे शब्दों में कहते हैं- ‘ रकम इकट्ठी हो गयी है..इसे तो आप स्वीकारिये...’

‘ नहीं भई...’ अखिल के पिताजी कहते हैं- ‘ मैंने और अखिल ने इस रकम का उपयोग सोच लिया है..’

‘ क्या उपयोग सोचा है समधीजी ? ‘ बाबूजी के स्वरों में उत्सुकता है.

‘ इसे आप मनीष को डाक्टरी पढाने में खर्च करेंगे..’

बस...इससे आगे मैं नहीं सुनती...दौड़कर मीता के कमरे में पहुँच जाती हूँ. अब मेरी समझ में अखिल के उस दिन की विचित्र मुस्कान का रहस्य समझ में आता है जब वह कह रहा था कि वह पिताजी की मांग का विरोध नहीं करेगा.

मैं जल्दी-जल्दी मीता को सब बातें बताती हूँ.मीता खुशी से मुझसे लिपट जाती है.

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प्रमोद यादव

दुर्ग, छत्तीसगढ़

(डॉ. श्याम गुप्त  )

पुष्पाजी अपनी महिला मंडली के नित्य सायंकालीन समागम से लौटकर आयें तो कहने लगीं,’ आखिर राम ने एक धोबी के कहने पर सीताजी को वनबास क्यों दे दिया? क्या ये उचित था।

क्या हुआ? मैंने पूछा, तो कहने लगीं,’ आज पर्याप्त गरमा-गरम तर्क-वितर्क हुए। शान्ति जी कुछ अधिक ही महिलावादी हैं, इतना कि वे अन्य महिलाओं के तर्क भी नहीं सुनतीं। उनका कहना है कि पुरुष सदा ही नारी पर अत्याचार करता आया है। मेरे कुछ उत्तर देने पर बोलीं कि अच्छा तुम डाक्टर साहब से पूछ कर आना इनके उत्तर। वे तो साहित्यकार हैं और नारी-विमर्श आदि पर रचना करते रहते हैं। वे आपसे भी बात करना चाहती हैं।

क्यों नहीं ,मैंने कहा , अवश्य, कभी भी।

दूसरे दिन ही तेज तर्रार शान्ति जी प्रश्नों को लेकर पधारीं, साथ में अन्य महिलायें भी थीं। बोलीं ‘क्या उत्तर हैं आपके इन परिप्रेक्ष्य में ? मैंने कहने का प्रयत्न किया कि ऐसा नहीं है, राम शासक थे और.....वे तुरंत ही बात काटते हुए कहने लगीं ,’ राम राजा थे..प्रजा के हित में व्यक्तिगत हित का परित्याग, लोक-सम्मान आदि..... ये सब मत कहिये, घिसी-पिटी बातें हैं, बेसिर-पैर की...पुरुषों की सोच की ...। कुछ महिलाओं ने कहा भी कि पहले उनकी बात तो सुनिए, परन्तु वे कहती ही गयीं, आखिर नारी ही क्यों सारे परीक्षण भोगे, पुरुष क्यों नहीं?

मैंने प्रति-प्रश्न किया, अच्छा बताइये, क्या एक स्त्री के कहने पर राम-वनबास... क्या स्त्री का पुरुष पर अत्याचार नहीं था। पुरुष तो कभी ये प्रश्न नहीं उठाते, क्यों। प्रश्न उठते भी हैं तो... हाय, विरुद्ध विधाता....आज्ञाकारी पुत्र ..में दब कर रह जाते हैं। विवाह सुख भोगते राम को ठेल दिया वनबास में और दशरथ को मृत्युलोक में। क्या स्त्री पर पुरुषों को प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है ?

शान्ति जी कुछ ठिठकीं परन्तु हतप्रभ नहीं हुईं, बोलीं, तो आप मानते हैं कि जैसे राम पर अत्याचार हुआ वैसे ही सीता पर भी अग्नि-परिक्षा व सीता त्याग रूपी अत्याचार –अन्याय हुआ, तो राम पुरुषोत्तम क्यों हुए ?

क्या आप समझती हैं कि राम को कष्ट नहीं हुआ होगा यह निर्णय लेते हुए, मैंने कहा, पत्नी-सुख वियोग एवं आत्म-ग्लानि की दो-दो पीडाएं झेलना कम दुःख होगा। वे चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे, परन्तु नहीं सामाजिक परिवर्तन की उस युग-संधिबेला पर राम एक उदाहरण, एक मर्यादा स्थापित करना चाहते थे –प्रत्येक स्थित-परिस्थिति में एक पत्नीव्रत की।

तो उन्होंने स्वयं वनबास क्यों नहीं लेलिया, साथ में बैठी प्रीति जी ने पूछ लिया ।

तो फिर एक पत्नीव्रत मर्यादा कैसे स्थापित होती, और वे कायर कहलाते। समस्या समाधान से पलायन करने वाला भगोड़ा, कापुरुष राजा। सीता को यह कब मान्य था अतः उन्होंने स्वयं ही निर्वासन को चुना। पति का अपमान प्राय: पत्नी को स्वयं का ही अपमान प्रतीत होता है, क्या यह सही नहीं है, मैंने कहा। सब चुप रहीं।

सीता ने स्वयं ही निर्वासन को चुना...ये नया ही बहाना गढ़ लिया है आपने, वाह!... शान्ति जी ने कहा।

मैंने पुनः प्रयास किया, ‘वास्तव में जैसे राम का वनगमन एक राजनीति-सामाजिक कूटनीति का भाग था वैसे ही सीता-वनबास भी विभिन्न नीतिगत राजनीति के कार्यान्वन का भाग थे।

कैसे ! वे बोल पडीं।

देखिये मैंने कहा, कुछ विद्वानों का मत है कि सीता-वनबास हुआ ही नहीं, क्योंकि तुलसी की रामचरित मानस एवं महाभारत के रामायण प्रसंग में इस घटना का रंचमात्र भी उल्लेख नहीं है, अतः बाल्मीक रामायण में यह प्रसंग प्रक्षिप्त है, बाद में डाला गया, राम को बदनाम करने हेतु। परन्तु मेरे विचार से जन-श्रुतियां, लोक-साहित्य व स्थानीय प्रचलित कथाये आदि में कुछ अनकही बातें अवश्य होती हैं जो लोक-स्मृति में रह जाती हैं। जिन्हें पात्र की महत्ता व संगति से विपरीत मानकर सामाजिक-साहित्यकार-रचनाकार छोड़ भी सकते हैं।

वस्तुतः राम एक अत्यंत ही नीति-कुशल राजनैतिज्ञ थे। समस्त भारत की शक्तियों का ध्रुवीकरण करके अयोध्या व भारतवर्ष को अविजित शक्ति का केंद्र बनाना उनका ध्येय था । पूरे भारत में उन्होंने अपनी मित्रता, कूटनीति, धर्माचरण व शक्ति-पराक्रम के बल पर शक्तियां एकत्रित कीं। वनांचल के तमाम स्थानीय कबीले, वनबासी शासक, आश्रम व ऋषि, मुनि अस्त्र-शस्त्रों व शक्ति के केंद्र थे। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अगस्त्य, भारद्वाज सभी ने राम को अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये, परेंतु महर्षि बाल्मीकि जो बहुत बड़े शक्ति के केंद्र थे, उन्होंने सिर्फ आशीर्वाद दिया ..अस्त्र-शस्त्र नहीं। जैसा मानस में पाठ है....

मुनि कहँ राम दण्डवत कीन्हा। आसिरवादु विप्रवर दीन्हा।।

वाल्मीकि जी ने आशीर्वाद तो दिया किन्तु दिव्यास्त्रों के भण्डार का नाम तक नहीं लिया। अतः लंका विजय अर्थात समस्त भारतीय भूभाग का ध्रुवीकरण के पश्चात सिर्फ अयोध्या के निकटवर्ती वाल्मीकि आश्रम ही शक्ति का केंद्र बच गया था। राम ने सोचा, यह भण्डार अब व्यर्थ है इसका सदुपयोग होना चाहिए। उसी वन के समीप सीता को प्रेषित किया, जहाँ महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। राम का यह कृत्य महर्षि को अच्छा नहीं लगा। महर्षि ने साध्वी सीता को संरक्षण दिया। महर्षि ने उनके माध्यम से राम को सबक सिखाने का निश्चय कर, लव व कुश को दिव्यास्त्रों का संचालन सिखाया। समस्त शस्त्र-शास्त्र उन्हें सौंप कर अयोध्या से लड़ने योग्य बनाया। माँ के लाड़-प्यार व संरक्षण में और महर्षि के कुशल निर्देशन में पल्लवित बच्चे अश्वमेध के घोडे को पकड़ने के प्रकरण में विश्व-विजयी अयोध्या की समस्त सेना को हराने में सफल हुए। इस युद्ध में लंका-विजयी शूरवीरों के दर्प व उनकी शक्तियों का भी दलन हुआ जो राम की कूटनीति का भाग था। इस प्रकार राम व सीता ने परस्पर सहयोग, सामंजस्य व कूटनीति से अपने पुत्रों को भी महलों के राजसी विलास, लंका-विजयी विश्व-विख्यात महान सम्राट राजा रामचंद्र के प्रभामंडल के दर्प से दूर वनांचल में ज्ञानी ऋषियों-मुनियों छत्र-छाया में पालन-पोषण का प्रवंध कर दिया ताकि वे सर्व-शक्तिमान बन कर उभरें।

ये त्याग की पराकाष्ठाएं हैं। इसीलिये राम,राम हैं....सीता, सीता। त्याग, तप, धैर्य व कष्टों में तपकर ही तो व्यक्ति महान होता है। यदि राम-वनबास नहीं होता तो कौन जनता राम को, लक्ष्मण को, वे सिर्फ एक राजा होकर रह जाते, न इतिहास पुरुष होते, न पुरुषोत्तम न प्रभु राम।

कृष्ण-राधा के त्याग तप ने ही उन्हें श्रीकृष्ण व श्रीराधिका जी बनाया अन्यथा कौन पूछता सीता को कौन राधा को...वे भी श्रीकृष्ण की एक और रानी या किसी अन्य पात्र की पत्नी बन कर इतिहास में गुम हो जातीं।

तो आपका मत है कि सीता के साथ कोइ अन्याय नहीं हुआ, शान्ति जी जल्दी-जल्दी बोलीं, ये सारे प्रश्न निरर्थक हैं?

आप लोग यह बताइये, मैंने भी प्रश्न पूछ लिया, कि क्या सीता के काल-खंड में विदुषी स्त्रियाँ नहीं थीं, उन्होंने ये प्रश्न क्यों नहीं उठाये? विज्ञ, पढी-लिखी, विदुषी, बीर-प्रसू, शस्त्र-शास्त्र कुशल तीनों माताएं; कैकयी जैसी युद्धकुशल, नीतिज्ञ, देवासुर संग्राम में दशरथ की रथ-संचालिका एवं सहायिका ने ये प्रश्न क्यों नहीं उठाये? सीता की अन्य तीनों बहनों ने क्यों नहीं उठाये?

यदि उठाये भी होंगें तो हमें कैसे ज्ञात होगा, वे कहने लगीं, पुरुष दंभ व राजाज्ञा में दबा दिए गए होंगे।

उसी प्रकार जैसे सीता पर अत्याचार के तथ्य आपको ज्ञात हैं, मैंने स्पष्ट किया, अन्यथा हमें क्या पता कोई राम-सीता थे भी या नहीं, सीता वनबास हुआ भी था या नहीं। फिर तो सारे प्रश्न ही निरर्थक हो जाते हैं।

और अग्नि-परिक्षा का क्या औचित्य है आपके अनुसार। प्रीति जी ने पूछा।

आपने रामचरित मानस तो कई बार पढी होगी। ध्यान दें ,जब राम कहते हैं...

“तुम पावक महं करहु निवासा, जब लगि करों निशाचर नासा ।

जबहिं राम सब कहा बखानी, प्रभु पद हिय धरि अनल समानी।

निज प्रतिबिम्ब राखि तहं सीता, तैसेहि रूप सील सुविनीता। “

...अरण्यकाण्ड

अर्थातु सीताजी तो महर्षि अग्निदेव के आश्रय में चली गयीं जो उनके श्वसुर थे। वह तो नकली सीता थी जिसका हरण हुआ।

अब लंकाकाण्ड की चौपाई पर गौर करें ....

“सीता प्रथम अनल महं राखी, प्रकट कीन्ह चहं अंतरसाखी”

‘तेहि कारन करूणानिधि, कछुक कहेउ दुर्वाद,

सुनत जातुधानी सबै लागीं करन बिसाद।’

आखिर बिना असली सीता को प्रकट किये वे नकली सीता को वहां से कैसे साथ ले जाते।

तो फिर सीताजी लौटी क्यों नहीं राम के साथ? किसी महिला ने एक और प्रश्न उठाया।

जिससे कूटनीति का पटाक्षेप भी सत्य लगे, कुछ तो स्वाभिमान प्रकट होना ही चाहिए नारी का, ताकि प्रत्येक एरा-गेरा पुरुष इस उदाहरण रूप में स्त्री पर अत्याचार न करने लगे। यह तीसरी अग्नि-परिक्षा थी, वास्तव में शक्ति के पूर्ण ध्रुवीकरण के पश्चात, शक्ति-रूप की आवश्यकता समाप्त होगई। आदि-शक्ति को ब्रह्म से पूर्व पहुँचना होता है गोलोक की व्यवस्था हेतु, मैंने हंसते हुए कहा। वे भी मुस्कुराने लगीं।

पूरा समाधान नहीं हो पाया, आपके उत्तर, तर्क व व्याख्याएं सटीक होते हुए भी पूर्ण नहीं हैं। शान्ति जी उठकर चलते हुए बोलीं।

पूर्ण यहाँ कौन है शान्ति जी? इस प्रकार के ये प्रश्न युग-प्रश्न हैं..यक्ष-प्रश्न...प्रत्येक युग में अपने-अपने प्रकार से प्रश्नांकित व उत्तरित किये जाते रहेंगे। मैंने समापन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर कहा, हम तो बस आप सबको, सभी महिलाओं को ‘जोरि जुग पाणी’ प्रणाम ही कर सकते हैं इस आशा में कि शायद रामजी की एवं पुरुष-वर्ग की इस तथाकथित भूल का रंचमात्र भी निराकरण हो जाए।

      ---- डा श्याम गुप्त, के-३४८, आशियाना, लखनऊ...

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सामाजिक सद्भावना का तात्पर्य है- समाज के हित अथवा कल्याण की भावना ।
मनुष्य समाज में रहने वाला एक विचारशील प्राणी है । वह संसार के सभी
प्राणियों में बौद्धिक रूप से अतिसक्षम तथा संवेदनशीलता के स्तर पर
सर्वश्रेष्ठ है ।
इस 21वीं शताब्दी का मनुष्य बौद्धिक रूप से तो उत्तरोत्तर विकास करता जा
रहा है, परन्तु चारित्रिक-अवनति भी उसी अनुपात में दृष्टिगोचर हो रही है
। साथ ही मानवीय संवेदना मृत होती जा रही है । संवेदनहीन-नर नर नहीं
नर-पशु हो जाता है । आज के अधिकांश व्यक्ति समाज में रहकर भी समाज के
उत्थान के सम्बन्ध में सोच-विचार करने का प्रयत्न नहीं करते हैं ।
व्यस्तता भरे इस परिवेश में व्यक्ति अपने आप ही में सिमटता चला जा रहा है
। उसे केवल अपना घर-परिवार ही दिखता है, उसके अतिरिक्त वह समाज की
विसंगतियों से बचने का प्रयास करता है, न कि उन्हें दूर करने का । ऐसा
प्रतीत होता है कि समाज के प्रति उसका कोई दायित्व ही नहीं है ।
परिणामस्वरूप वह अपने आप-पास के लोगों से नित्य कटता चला जा रहा है । ऐसे
में जो एकता की सुदृढ़ कड़ी का निर्माण हमारे पूर्वजों ने किया था वो
निरन्तर क्षीण होती जा रही है ।

एक दु:खद आश्चर्य ये है कि आज विज्ञान के इस युग में भी धर्मगत एवं
जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं हो सके हैं । कभी मंदिर के नाम पर तो कभी
मस्जिद के नाम पर प्राय: लोग आपस में ही टकराते रहते हैं । जातिगत अथवा
वर्णगत भेदभाव की बात की जाय तो देखने को मिलता है कि अभिजात्य-वर्ग किस
प्रकार से स्वयं को ऊँचा होने का दम्भ भरता है और अंत्यज-वर्ग को नीचा
दिखाता है । दो भिन्न धर्मावलम्बी अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने
हेतु विवाद कर बैठते हैं , परन्तु ये नहीं समझ पाते हैं कि 'मानव-धर्म'
ही पूरे विश्व का सबसे बड़ा और सबसे उत्तम धर्म है ।
धार्मिक तथा जातीय भेदभाव हमारे सामाजिक सद्भावना पर प्रत्यक्ष प्रहार
करते हैं । ऐसे में समाज बिखर जाता है और इसका लाभ कुछ विघटनकारी तत्वों
को प्राप्त हो जाता है, जो निरन्तर इसी प्रतीक्षा में रहते हैं कि कब
उन्हें अवसर मिले और कब वो ऐसे बिखरे हुए समाज अपना वर्चस्व स्थापित कर
लें, जैसा कि पूर्व में हमारे देश के साथ भी ऐसा ही हुआ । आपसी एकता एवं
सामाजिक सद्भावना की कमी ने इस देश को अँगरेजों के अधीन करवा दिया ।

मन में साम्प्रदायिकता की भावना रखना समाज की सबसे बड़ी बुराई में से एक
है । ये भावना दो मनुष्यों के मध्य की दूरी को निरन्तर बढ़ाती है । चाहे
गोधरा की बात करें चाहे मुजफ्फरनगर की बात करें, साम्प्रदायिकता की भावना
ने ही इन स्थानों पर दंगे करवाये ।

वर्तमान राजनीति स्वार्थ का पर्याय बनती जा रहती है । स्वार्थी
राजनीतिज्ञ जाति-धर्म अथवा सम्प्रदाय के नाम पर हमारे समाज के सीधे-सादे
लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं और उन्हें आपस में लड़वाकर अपना स्वार्थ
सिद्ध करते हैं । इससे हमारे समाज के लोगों का मांसिक वातावरण प्रदूषित
होता है और राष्ट्र की एकता और अखंडता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सामाजिक सद्भाव और सौहार्द तभी बना रह सकता है जब समाज में रहने वाले सभी
व्यक्ति एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का प्रयास करे । हर व्यक्ति को ये
बात समझ लेनी चाहिए कि प्रेम देने से ही प्रेम प्राप्त होता है, सम्मान
के बदले सम्मान मिलता है, घृणा करने से घृणा बढ़ती है और विश्वास से ही
विश्वास का जन्म होता है ।
हमें सामाजिक सद्भावना को सुदृढ करने हेतु एक-दूसरे के धर्मों का समान
रूप से आदर करना होगा । सभी प्रकार के भेदभावों से स्वयं को मुक्त रखना
होगा । ईर्ष्या - द्वेष, घृणा, प्रतिशोध की भावना आदि को त्यागना होगा ।
हमें एक-दूसरे के साथ कन्धे से कंधा मिलाकर चलना होगा तथा सहयोग की भावना
का भी विकास करना होगा । हमें ये समझना होगा कि विश्व एक परिवार है और हम
सभी उस परिवार के सदस्य हैं और सदस्य होने के नाते सभी अपने ही हैं । ऐसी
सोच ही वैमनस्य को मार सकती है और हमें एकता तथा भाई-चारे के एक सूत्र
में बाँध सकती है ।


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- सुरेश कुमार 'सौरभ' [M.A.-। (हिन्दी), हिन्दू पी.जी. कॉलेज, जमानियॉ
जिला गाजीपुर, उ.प्र. ]

चीनी भी जहर है!

हम भारतीय चावल, आलू, ब्रेड, स्नैक्स एवं शीतल पेयों के रूप में प्रतिदिन कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार का सेवन करते हैं जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है परंतु अधिकता में ग्रहण करने पर पोषण संबंधित रोगों का जन्म होता है जिनमें हृदय रोग, मोटापा, मधुमेह, दंतक्षय, चयापचयी अनियमिततायें, पोषण न्यूनता तथा कैंसर जैसी परेशानियां मुख्य हैं.

आवश्यकता से अधिक मात्रा में ग्रहण किये जाने वाले कार्बोहाइड्रेट्स में शर्करा का प्रमुख स्थान है. गत पांच दशकों में भारत में शर्करा का उपयोग विश्व उत्पादन के पांच प्रतिशत से 13 प्रतिशत तक बढ़ गया है जिससे भारत विश्व का सबसे बड़ा चीनी अपभोगकर्ता देश बन गया है जहां संपूर्ण यूरोपियन यूनियन के कुल उपभोग से एक तिहाई ज्यादा तथा चीन के उपभोग से 60 प्रतिशत अधिक चीनी का उपभोग किया जाता है. भारत का प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष चीनी उपभोग 20 किलो है जो वैश्विक औसत (25 किलो) से कम है परंतु यह दर तेजी से बढ़ रही है.

विश्व भर में यह सलाह दी जाती है कि महिलाओं एवं पुरुषों को प्रतिदिन क्रमश: 05 तथा 09 चम्मच से अधिक शर्करा नहीं ग्रहण करना चाहिए. मधुमेह के प्रति अधिक संवेदनशील होने के कारण शर्करा का उपयोग भारतीयों को पांच चम्मच प्रतिदिन तक ही करना चाहिए. शर्करा का यकृत पर दुष्प्रभाव एल्कोहल के सदृश ही होता है जो शर्करा के किण्वन से बनता है. शर्करा तथा अन्य कार्बोहाड्रेट के सेवन से शरीर में इंसुलिन का उत्पादन बढ़ाने का शरीर पर दबाव पड़ता है जिससे शरीर की कोशिकाओं में इंसुलिन प्रतिरोधकता उत्पन्न होने लगती है और रक्त ग्लूकोज स्तर तेजी से बढ़ने लगता है. कई लोगों में तो टाइप -2 मधुमेह की परेशानी देखने को मिलती है. दीर्घकाल तक उच्च शर्करा स्तर, रक्त संचरण तंत्र पर अत्यधिक दबाव डालता है जिससे रक्त शिराओं की भित्तियां मोटी एवं कठोर हो जाती हैं.

प्रसंस्कृत कार्बोहाइड्रेट्स से प्राप्त अतिरिक्त कैलोरी, वसा कोशिकाऔं में परिवर्तित होकर मोटापा बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान करती है जिससे मधुमेह, कैंसर, वसीय यकृत रोग, मानसिक तनाव एवं हृदय रोगों के उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है. राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद के अनुसार, प्रतिदिन 20-25 ग्राम शर्करा प्रति वयस्क व्यक्ति के लिए सुरक्षित मात्रा है. इसके लिए, शर्करा युक्त पेयों यथा- शीतलपेय, काफी, आदि तथा प्रत्यक्ष शर्करा सेवन से बचना चाहिए. शीतलपेय की एक कैन में 130 कैलोरी या 08 चम्मच शर्करा समतुल्य होता है.

गत वर्षों में प्रति व्यक्ति कैलोरी उपयोग में कमी आने के बावजूद मोटापाग्रस्त रोगियों की संख्या में वृद्धि से यह स्पष्ट है कि इसके पीछे पोषण में असंतुलन के साथ स्थावर दिनचर्या का महत्वपूर्ण योगदान है. अतः शारीरिक सक्रियता के साथ स्वास्थ्यरक्षक आहार का सेवन दीर्घ स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है.

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डा. राकेश शुक्ल

पशुचिकित्साधिकारी, पशुचिकित्सालय सांऊखोर – 273402, गोरखपुर उ.प्र.

 

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जहां सोच है वहाँ शौचालय है

यस, वी केन ,,,,

मैं मानता हूँ इतने रद्दी तरीके से कोई शुरुआत नहीं होती ,मगर क्या करे अपने अंदर क्या –क्या कर सकने की क्षमताओं का आकलन यदि किया जाना है. तो मूल को पकड़ना जरूरी हो जाता है।

मूल में आदमी की सुबह की नित्य क्रिया पहला और जरूरी स्थान रखती है।

बहरहाल आइए आगे की सोचें, ‘व्हाट वी केन डू अहेड’।

हर आदमी में ‘यस वी केन’ नहीं पाया जाता। उसके अंदर से, उसके कर सकने वाली क्षमता को, निकालना पड़ता है।

हमारे अंदर छिपी प्रतिभा को निकालते-निकालते बासठ बरस हो गए। हर किसी ने खदेड के बाहर निकालने की कोशिशें की। माँ-बाप ,भाई-बहन ,मास्टर ,गुरुजी, सर……., सबने हाथ आजमाए। नैतिक शिक्षा की झडी लगा दी।

बचपन में स्कूल जाने का मन नहीं करता था, तो अम्मा कहती बेटा तुम अच्छे बच्चे हो…. ,स्कूल भला क्यों नहीं जा सकते। मैं कहता दूसरे हमें मारते हैं। वो कहती ,तुममें बहुत ताकत है......। तुम ओ शेर को भी डरा सकते हो। मैं मुगालता पाल लेता ,शेर से लड़ने की ताकत है....., तो गीदड़ों से भला क्या डरना?

पिताजी से शिकायत रहती कि कपडे अच्छे नहीं है, तो वे वीर सपूतों के, या अपने भोगे हुए यथार्थ को लेकर किस्से सुना डालते कि कैसे भारी बारिश में एक जोडी कपड़ों से काम चला लेते थे। चूल्हे की आंच के सामने रख के कपडे सुखा के पहने हैं। मुझमें नैतिक बल का संचार हो जाता ,फिर यूँ लगता जब वे वैसा कर सके ,तो हम क्यों नहीं ?

स्कूल में मास्टर जी के हत्थे चढे तो, वे सबक कठिन से कठिन चुटकियों में करवा लेते थे। कहते थे सब आसान है ज़रा सी मेहनत और लगन चाहिए आदमी सब सीख जाता है। उस नैतिक बल के भरोसे हमें लगा कि हम कुछ कर सकते हैं।

‘सर’ लोगों के सानिंध्य में एक्जाम की कैसी तैय्यारी करनी है, का पथ-प्रदर्शन हुआ। वे अपना किस्सा बताते कि, सुबह चार बजे उठ कर पढ़ने के क्या फायदे हैं ? एक तो पढ़ा हुआ जल्दी याद हो जाता है, दूसरा बुरी संगतों से छुटकारा मिलता है। उनके पीछे कही बातों में दम देखकर, बुरी संगतें छूटी। शुरू-शुरू में लगता था ,हो नहीं पाएगा, मगर ‘यस यूं केन’ का झांसा...... दिमाग में छप गया।

सर्विस के इंटरव्यू की तैय्यारी में, दोस्तों ने खूब डरा सा दिया था। बहुत टफ पूछते हैं। जरा सा चुके नहीं कि, गए। उन्ही में से एक दोस्त ने कहा ,घबरा मत यार ,बेधड़क बताना। वे लोग ‘कान्फीडेंस लेबल’ ज्यादा देखते हैं। सवालों के जवाब यूँ देना कि जैसे तुम ही ,ज्ञाता हो। यु केन......। उसके इतना कहने मात्र से मुझे संजीवनी मिल गई। मेरी, मास्टरी की नौकरी के साथ, वैतरणी पार लग गई।

मैंने भी जी भर के कोशिश की, कि बच्चों में ‘यस यु केन’...... की जबर्दस्त हवा भर सकूं। अपनी कोशिशें कामयाब भी देखता हूँ, जब कोई स्टूडेंट, बाजार या किसी पार्टी में अचानक आकर पैर छू कर कहता है,सर जी पहचाने हमें ......।

मैं खोई –खोई नजरों से देखता हूँ ,फिर वे अपना वे परिचय खुद दे बैठते हैं। मैं फलां, यू. एस. में इंजिनियर हूँ /मैं डाक्टर .....। मैं उनको, फूलने-फलने का आशीर्वाद दे के ,चारों तरफ देखता हूँ, (कि देखो,एक मास्टर के पास कितनी ताकत है। )

वे दिन हवा हो गए ,अच्छे बच्चे.... ,अच्छे संस्कार वाले टीचर..... ,मान-सम्मान ,नैतिक शिक्षा का दौर .....।

सोते से जैसे, किसी ने जगा दिया हो, जिस एक वाक्य से बच्चो में, जोश की गंगा बहाया करते थे वो अब करीब-करीब पालिटिकल नारा बन गया है ,वो भी अमेरिका से आयातित ओबामा के स्टाइल का...... ?

‘यस यु केन’ का पालिटिकल मीनिंग अब के दौर में जानते हैं क्या होगा ?

आपके पास वोट-बैक नहीं है ,यस यु केन हैव.....।

झुग्गी –झोपडी चले जाओ। गरीब बच्चों को गोदी में उठाओ। विकलांगो की मदद करो। लड़कियों को सायकल ,लडकों को लेपटाप बांटो। वर्ग –विशेष में पकड़ जमाने के लिए यूं जतलाओ कि अगर उनके काम में कलेक्टर –एस पी बीच में आता है , तो हम उनकी भी नहीं सुनेंगे। उनको सस्पेंड करके आपके रोड़े हटा देंगे .....‘यस यू केन’, आपके दिलो दिमाग में भरने से बाज नहीं आयेंगे।

यस यू केन.... कहते-कहते ,वे लोग चुनाव बाद कब पलटी खा कर कह बैठते है, ‘यस वी केन‘ ....।

“वी केन”, मानी, वे जंगल का ठेका ले सकते है ,माइनिंग सेक्टर में ‘बारा’- बजा सकते हैं ,संचार –क्रांति की आड़ में इतना पीट सकते है कि सात पीढ़ी तर जाए। कोयले की पूरी आंच खींच कर कब ‘राख’ पकडा दें कह नहीं सकते। वे रेल लाइन अपने घर से ससुराल तक बिछाने को जस्टीफाई कर दें।

‘यस वी केन’...... में सरकार बदलने की लोकतांत्रिक ताकत घुस गई है। बहुत दिनों से जिसके मन में ये सपना पल रहा हो कि, उसका भी , कहने को ,एक स्विस एकाउंट हो ,बिना स्विस अकाउंट के स्टेटस सेम्बाल नही बनता ,वे चार चाटुकार बटोर लेते हैं। हवा फैलाते हैं कि सरकार गई,सरकार की नाक से आक्सीजन के चार सिलेंडर खींच लिए गए ,कमजोर दिल वाले पाला बदलने लगते हैं,या अपनी-अपनी ‘नाक’ के लिए एक अदद आक्सीजन –मास्क का इन्तिजाम करना शुरू कर देते हैं।

“यस वी केन” वालों की , बांछें खिलने लगती है वे कुर्सी -काबिज हो जाते हैं .......,

“यस यु केन” से शुरू ’यस वी केन” में एंड.... ;यानी खेल खतम.... पैसा हजम .....

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

निर्मला सिंह गौर

उम्र भर

अनुभवों की धार ने हमको तराशा उम्र भर

हमने हर्जाना चुकाया अच्छा खासा उम्र भर

हमको जिनकी धीरता गम्भीरता पर गर्व था

वो हमे देते रहे झूंठी दिलासा उम्र भर|

दूसरों के दर्द में हम खुद हवन होते रहे

बाँट कर तकलीफ सबकी साथ में रोते रहे

हमने जिसके आंसुओं को अपने कंधे पर रखा

हाय!किस्मत उसने हमको खूब कोसा उम्र भर |

हम सयानो में सदा नादाँन कहलाते रहे

दोस्ती में हम नफा–नुक्सान झुठलाते रहे

इस भरी दुनिया में किसका कौन करता है लिहाज़

वो तो हम थे ,जो नहीं तोड़ा भरोसा उम्र भर |

कागजों के महल भी हमने बनाये शौक से

और उन पर रंग रोगन भी कराये शौक से

एक चिन्गारी से उसकी खैरियत क्या पूछ ली

फिर वहां हर एक ने देखा तमाशा उम्र भर |

निर्मला सिंह गौर ,(९.११.२०१३)१६:३०:

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कल्याणी कबीर

एक  आह  मेरी  सुन  के  जो  हो  जाते   थे  बेचैन .......

मुंसिफ  जो  था  उसे  भी  गुनहगार  देखकर  ,

हम  खुद  उठा    रहे  हैं  अपनी राह का पत्थर  .

कोई  रखता  हो  छुपा  के  ज्यों जीवन की कमाई ,

माँ रखती है  छुपा  के यूँ अश्कों का  समंदर  .

एक  आह  मेरी  सुन  के  जो  हो  जाते   थे  बेचैन  ,

हर ज़ख़्म  से  मेरे  हैं आजकल  वो  बे-खबर .

कानों  में  गूंज  उठाते  हैं  वेदों के  मीठे  बोल  ,

जब  चहचहाती  हैं  हमारी  बेटियाँ  घर पर .

नाज़ों से  जिसने  सींचा था  भारत  की  नींव  को 

वो रहनुमा वतन  के  भटकते  हैं  दर- ब- दर .

kalyani kabir / 

 

नीरज कुमार ‘नीर’

अगर तुम पढ़ पाते

मन की भाषा तो

जान पाते

मेरे अंतर के भाव को

तुम समझ पाते

उस बात को

जो मैं कह न सका

तुम देखते हो काला रंग

पर नहीं देख पाते

उसमें छुपे रंगों के इन्द्रधनुष को

जो काला है, उसमें

समाहित है सभी रंग

कभी परदे हटाकर देखो

दिखेगा सत्य

सत्य चमकीला होता है

चुंधियाता हुआ ..

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संजय कुमार गिरि

  **गौरैया **

रोज सुबह को जब तुम मेरे ,

घर में चली आती हो ?

मेरी बंद आँखें तब तुम्हें ,

सुन कर जल्दी से खुल जाती हैं ,

सुबह सवेरे माँ मेरी जब ,

मुझे उठाने आती है ,

तब तुम जल्दी से फिर

फुर्र से उड़ जाती हो ,

मैं उनको तब तुम्हें दिखाने .

को , छत पर चला आता हूँ ,

और तुम्हारी चीं-चीं से

बहुत मंगन हो जाता हूँ ,

प्यारी सी तुम छोटी सी तुम ,

मेरे घर में रोज चली आती हो ,

अपनी चीं चीं कर के तुम  मेरा

दिल रोज खूब बहलाती हो ,

  **-----------------------

 

बाल कवि हंस

हंस के दोहे

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           --

१. मानव पहुंचा चाँद पर, गया ख़ुशी में फूल

धरती पर चलना मगर, आज गया है भूल ।

२. दुश्मन, आग, रोग नष्ट हों, हंसा चुके उधार

तभी चैन से बैठिये, ये हैं दुश्मन चार ।

३. दोहा अति प्राचीन है, जितने पीपल, नीम

दोहे लिख कर अमर हैं, तुलसी और रहीम ।

४. भोजन, निद्रा, काम-भय, नर पशु में है एक

हंस एक नर में अधिक, कहते उसे विवेक ।

५. चोर,जुआरी, लालची, इनका है इतिहास

कभी न करना चाहिए, हंस भूल विश्वास ।

पता-- 50, अस्पताल रोड

कदमा, जमशेदपुर-५

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव

बाल गीत

सच्चा मित्र

झगड़ू बंदर ने रगडू,

भालू से हाथ मिलाया|

बोला तुमसे मिलकर तो,

प्रिय बहुत मज़ा है आया|

रगड़ू बोला हाथ मिले ,

तो दिल भी तो मिल जाते|

अच्छे मित्र वही होते,

जो काम समय पर आते|

कठिन समय में काम नहीं,

जो कभी मित्र के आता|

मित्र कहां ?अवसरवादी,

वह तो गद्दार कहाता

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चन्द्र कान्त बन्सल

काफी है

फनकार यहाँ कम है और कलाकार काफी है

ऐसी बज़्म के खाक होने के आसार काफी है

हर शख्स यहाँ समझता है उसी से जिन्दा है ये मुल्क

इस फिक्र के इस देश में बीमार काफी है

जब एक ही उल्लू से मिट जाये गुलिस्ताँ तो क्या होगा

यहाँ संसद में मुशर्रफ हिटलर बुश औ’ जार काफी है

मत भूलो मीरजाफर और जयचंद को कभी भी

हिंदुस्तान मिटाने को ये दो ही गद्दार काफी है

होंठ चिबुक रुख्सार और शाने पर मौजूद तिल

एक खजाने की रक्षा को ये चारों पहरेदार काफी है

माना हाथों में दम नहीं पर आँखों में तो है

तेरी ताजपोशी को ए साकी अभी ये खाकसार काफी है

पता हमें भी है कि तेरी भी जिंदगी सिर्फ चार दिन की है

फिर भी मेरे जनाज़े को तेरा इंतज़ार काफी है

यूँ तो आता नहीं इस दिल को किसी भी तरह से करार

अगर उसका भी है मुझसा हाल ये समाचार काफी है

तमाम दुनिया करे मेरी खिलाफत कोई गम नहीं

अगर है मेरी तरफ मेरा खुदा मेरा पैरोकार मेरा मददगार काफी है

रहने दो अपनी तमाम कोशिशे हमारी तहज़ीब बचाने की

बस कलमे रही जिन्दा तो ये तमाम कलमकार काफी है

सीएम नारी स्पीकर नारी और जब एक्सेलेंसी भी नारी है

फिर भी देश में कन्या की हत्याए वाकई हम गुनाहगार काफी है

राजनीति शिक्षा पुलिस न्याय सभी भ्रष्ट है इस वतन में

अब आखिरी आसरा फौज वो भी हो गई दागदार काफी है

तुम्हारी इस सोच को गन्दा न कहे तो क्या कहे

बेरोजगार सौ है और कहते हो काम का एक अनार काफी है

मत पुछो दिल्ली में क्यों हम अनशन पर बैठे है

कश्मीर से कन्याकुमारी तक यहाँ फैला भ्रष्टाचार काफी है

ना समझाओ हमें अपने ही देश की संसदीय बारीकियां

कुछ न कहकर सब कुछ समझाता ये सरदार काफी है

अगर है हिम्मत तो आओ मैदान में सभी के सामने

समझाओ अपना लोकपाल हम भी समझदार काफी है

बीते चौसठ साल एक सुरंग की मानिंद रहे जिसमे

दिखी अन्ना की एक मशाल जो मिटाने को अन्धकार काफी है

न सोचो की अन्ना बुढा है कुछ नहीं कर पायेगा

हम डूबतों को मिल जाये तिनका या एक पतवार काफी है

खौफज़दा न हो तू उजड़ जायेगा ए गुलशन

तेरी हिफाज़त को यहाँ एक एक सिपहसालार काफी है

जब सुपुर्दगे ख़ाक ही होना है चार हाथ की कब्र में आखिर

तो ‘रवि’ को ये महल ये शान सब की सब बेकार काफी है

चन्द्र कान्त बन्सल

निकट विद्या भवन, कृष्णा नगर कानपूर रोड लखनऊ

ईमेल पता chandrakantbansal@gmail.com

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नन्द लाल भारती

आसमान/कविता

पीछे डर आगे विरान है,

वंचित का कैद आसमान है

जातीय भेद की,
दीवारों में कैद होकर

सच ये दीवारे जो खड़ी है

आदमियत से  बड़ी है । .

कमजोर आदमी त्रस्त है

गले में आवाज़ फंस रही है

मेहनत और

योग्यता दफ़न हो रही है ,

वर्णवाद का शोर मच रहा है

ये कैसा कुचक्र चल रहा है।

साजिशे रच रहा आदमी

फंसा रहे भ्रम में ,

दबा रहे दरिद्रता और

जातीय निम्नता के दलदल में ,

बना रहे श्रेष्ठता का साम्राज्य

अट्ठहास करती रहे ऊचता।

जातिवाद साजिशो का खेल है

अहा आदमियत फेल है ,

जमीदार कोई साहूकार बन गया है

शोषित शोषण का शिकार हो गया है।

व्यवस्था में दमन की छूट है

कमजोर के हक़ की लूट है।
कोई पूजा का तो
कोई नफ़रत का पात्र है

कोई पवित्र कोई अछूत है

यही तो जातिवाद का भूत है।

ये भूत अपनी जहा में जब तक

खैर नहीं शोषितो की

आज़ादी जो अभी दूर है ,

अगर उसके द्वार पहुचना है

पाहा है छुटकारा

जीना है सम्मानजनक जीवन

बढ़ना है तरक्की की राह

गाड़ना है
आदमियत की पताका तो

तलाशना होगा और

आसमान कोई .

 

मौत/ कविता

जमीन पर अवतरित होते ही ,

बंद मिठिया भी भींच जाती हैं ,

रुदन के साथ ,

गूंज उठता है संगीत ,

जमीन पर अवतरित होते ही।

आँख खुलते ,होश में आते,

मौत का डर बैठ जाता है ,

वह भी ढ़ीठ जुट जाती है ,

मकसद में।

जीवन भर रखती है ,

डर में ,

स्वपन में भी ,

भय पभारी रहता है ,

हर मोढ़ पर खड़ी रहती है

मौके की तलाश में।

ढीठ पीछा करती है ,

भागे-भागे ,

आदमी चाहता है ,

निकलना आगे

भूल जाता है,

पीछे लगी है मौत ,

अभिमान सिर होता है

दौलत का ,

रुतबे की आग में कमजोर को

जलाने की जिद भी।

अंततः खुले हाथ समा जाता है ,

मौत के मुंह में,

छोड़ जाता है ,

नफ़रत से सना खुद का नाम।

कुछ लोग जीवन-मरन के

पार उतर जाते हैं

आदमी से देवता बन जाते है ,

दरिद्रनारायण की सेवा कर।

मौत सच्चाई है ,

अगर अमर है होना ,

ये जग वालो ,
नेकी के बीज ही होगा बोना।

 

साथ/कविता

जीवन क्या……?
जो जी लिया वही अपना

लोग पाये दुनिया परायी,
सच है कहना।

जीवन में कैसे -कैसे धोखे ,

मोह ने लूटे ,

मतलब बस संग ,

डग भरते लोग खोटे।

मतलबी औरो को बर्बाद कर ,

शौक में जीते ,

आदमियत की छाती में ,

नस्तर घोप देते है।

भेद के पुजारी ,

चोट गहरा कर देते है।

गरीब के भाग्य का
ना हुआ उदय सितारा ,

गैरो की क्या .......?

अपनो ने हक़ है मारा।
बदनेकी पर नेकी की
चादर दाल देते है ,

स्वार्थ में क्या मरना…?

सब साथ हो लेते है।

डॉ नन्द लाल भारती

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उमेश मौर्य

देश सेवा

ठेका लेते हैं जो त्‍याग की भावना से देश चलाने का

क्‍या उन्‍हें पता होता है

अपने वजन से ज्‍यादा बोझ ढोने का दर्द,

क्‍या उन्‍हें सुनाई देती है महलों के नीचे

चीत्‍कारती हुई ईंटों की मौन पुकार,

क्‍या उन्‍हें पता होता है चिलचिलाती धूप में कुदाली से

धरती को कुरेदते हुए पसीने से सनी काली कलूटी

शक्‍ल के पीछे की पीड़ा

क्‍या उन्‍हें पता है हजारों की भीड़ में गुम हो जानें का खेल

क्‍या उन्‍हें पता है गरीबों की पहचान

जिनके पास उनसे भी अधिक प्रतिभा थी

सब्‍जी और समोसे बेचते हैं

क्‍या उन्‍हें पता है सड़े हुए टमाटर की चटनी का स्‍वाद

क्‍या उन्‍हें पता है गरीबी रेखा के नीचे की भी रेखा की शक्‍ल

जहाँ कोई कार्ड नहीं पहुंचते न पीले, न काले, न सफेद

क्‍या उन्‍हें पता है न्‍यूनतम वेतन के परिवार की किल्‍लत

जो उतारते है महंगाई का बोझ बीबी और बच्‍चों पर,

आत्‍महत्‍या भी करते है।

क्‍या उन्‍हें पता है सच्‍ची देश सेवा की परिभाषा,

जो किसानों के पसीने से बहकर माटी को सोना बनाती है,

जिन्‍हें सेवा और विकाश का नाम भी नहीं पता होता,

क्‍या उन्‍हें पता है बाजार में पंक्‍ति से बैठे बुजुर्ग किसानों के

चमड़े की सिलवट के पीछे की बंजर घरती का रूप

करना है सेवा तो गुम हो जाओ इस भीड़

तब जानोगे की सेवा फिर कैसे करनी है।

-उमेश मौर्य

सराय, भाईं

सुलतानपुर, उत्‍तर प्रदेश

भारत

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/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
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