शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

शैलेन्द्र चौहान का आलेख - राजेन्द्र यादव : सत्ताकेंद्रों और प्रभावशाली लोगों की स्तुति से अखाड़े में जमे रहना कोई मायने नहीं रखता

शैलेन्द्र चौहान 


३० अक्टूबर के दैनिक हिंदुस्तान में मैत्रेयी पुष्पा का राजेंद्र जी पर भक्तिभावपूर्ण आत्मपरक संस्मरण पढ़कर कतई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि जिन लोगों ने उनसे लाभ लिया वे निष्पक्ष नहीं हो सकते। मैत्रेयी जी का मानना है कि 'मैं तो उनकी दिखाई राह पर चले जा रही थी। मुझे क्या पता था स्त्री विमर्श के बारे में ? लेकिन उन्होंने मेरे विमर्श को स्त्रीलेखन से जोड़ा। इस मायने में कि घर कि चार दीवारी से हैम औरतें बहार निकल पड़ीं।' वाह मैत्रेयी जी क्या बात है ? यानि जो स्त्रियां दफ्तरों से लेकर राजनीति और स्कूलों से लेकर सिनेमा तक काम कर रहीं थीं वे घर से बाहर नहीं थीं। जो सामाजिक संघर्षों में शिद्दत से शिरकत कर रही थीं वे भी घरों के अंदर रही होंगी ? बड़ी अजीब सी बात है साहित्य कि दो-चार महिलाएं पूरा स्त्री विश्व हो जाती हैं और पूरा विश्व नगण्य। धन्य हैं मैत्रेयी जी आप। 

कुछ ऐसे ही विचार राजकिशोर जी ने उसी दिन जनसत्ता में व्यक्त किये हैं उनका कहना है कि 'अच्छा लिखने वाले बहुत होते हैं परन्तु युग प्रवर्तक कहलाने का श्रेय किसी किसी को हासिल होता है। भारतेन्दु हरिशचंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आदि की पंक्ति में राजेन्द्र यादव को खड़ा करने से बहुत से लोगों को मुश्किल होगी ..., और 'यादव हिंदी के महात्मा फुले और अम्बेडकर दोनों थे।' राजकिशोर जी वरिष्ठ पत्रकार हैं इसलिए वे कुछ अनुचित छूट भी ले सकते हैं। दरअसल उनका जो पहला स्टेटमेंट है उसे कुछ अनदेखा भी किया जा सकता था लेकिन जब उन्होंने राजेन्द्र जी को फुले और अम्बेडकर कि श्रेणी में रख डाला तो यह न केवल आपत्तिजनक था बल्कि अगंभीर और हास्यास्पद भी। 

हिंदी वाले बिना सोचे समझे किसी को कुछ भी बताने के कायल हैं। यदि यादव जी को किशोर जी भारतेन्दु, द्विवेदी, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल, निराला की पंक्ति में खड़ा करना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें यह देखना चाहिए कि राजेन्द्र जी की प्रसिद्धि किन कारणों से हुई और उनके पूर्ववर्ती महानुभावों की किन कारणों से, यह देखना भी आवश्यक था। राजेन्द्र जी ने अपने आप को जिन विवादों से प्रतिष्ठित किया वे सत्ता प्रतिष्ठानों और व्यवस्था के सरोकारों से कतई अलग थे इसलिए उन्हें सत्ता और व्यवस्था का कभी भी प्रकोप नहीं झेलना पड़ा। हाँ सामाजिक रूढ़िवादियों के निशाने पर वह अवश्य आये पर वह भी उन्होंने अपने लिए आगे बढ़ने का औजार बनाया। क्या उनके परवर्ती साहित्यकारों ने सतही पॉपुलरिटी का कभी आश्रय लिया था ? उनके युगप्रवर्तक होने के पीछे उनका निहित स्वार्थ नहीं था। वहाँ त्याग था। 

राजेन्द्र जी ने जो भी किया वह सिर्फ और सिर्फ अपने लिए किया, अपने महत्त्व के लिए किया, मनोरंजन के लिए किया। राजेंद्र जी युगप्रवर्तक नहीं थे बल्कि युग भंजक थे। उन्होंने हिंदी साहित्यकारों के बीच स्त्री और दलितों को ला तो दिया परन्तु उनकी वैचारिक मनःस्थिति को नहीं बदल पाये बल्कि स्त्रियों को स्वतंत्रता के नाम पर पण्य वस्तु में तब्दील करने की ही कोशिश की, जो सामंती और पूंजीवादी दोनों अवधारणाओं के फायदे की बात थी। देहवादी विमर्श स्त्रियों के शोषण बढ़ावा देता है न कि रोकता है इसके जीवंत प्रमाण हैं वे विज्ञापन और वे देह-नुमायशें जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आयोजित कराती हैं। नाच-गाने तो सामंती मिजाज हैं ही। मैत्रेयी जी इसे भी थोड़ा समझ लें तो राजेंद्र जी के मूल्यांकन में आसानी होगी। लेखिकाओं के शोषण को भी थोडा शेयर करें। मुझे तो डर लगता है कि कहीं आसाराम भी इस बात से राहत न मांगने लगें। रही बात दलित विमर्श की तो दलितों के सामाजिक आर्थिक और वैचारिक उत्थान के लिए राजेन्द्र जी ने 'हंस' में  सिर्फ विमर्श किया, न जनता के बीच उनकी कोई पैठ रही न दलित आन्दोलनों में कोई शिरकत। ऐसी उन्होंने कभी कोई कोशिश भी नहीं की। हां चार-छह दलित लेखक जरुर हंस में लिखते रहे। जबकि महाराष्ट्र में यह ट्रेंड दशकों से मौजूद था। विगत सत्ताइस वर्षों उनकी यह पूरी कागजी कवायद सिर्फ किसी खम्भे पर चढने उतरने जैसी ही थी। 

राजकिशोर जी यह भी बताते हैं कि अशोक वाजपयी ने उन्हें पब्लिक इंटेलेक्टुअल कह डाला जैसे कि पश्चिम प्लेटो, सुकरात, बर्ट्रेंड रसैल आदि। ये सब दार्शनिक थे और जनता के सरोकारों से सम्बद्ध थे। वे सत्ता से खौफ भी नहीं खाते थे और समय आने पर उसकी पुरजोर मुखालफत भी करते थे। राजेंद्र जी को किसीभी शशक सत्ता कि मुखालफत करते नहीं देखा गया और दो एक मुद्दों विशेषकर स्त्री और दलित विमर्श (संघर्ष नहीं) कभी-कभी साम्प्रदायिकता से इतर कुछ सोचते समझते नहीं पाया गया। यह भी ध्यातव्य है कि  'हंस' के सम्पादकीय लिखकर और कुछ दलित लेखकों कि रचनाएं छपने भर से अगर उन्हें फुले और अम्बेडकर के समकक्ष रखना किशोर जी की किसी ग्रंथि का परिणाम ही लगता है। हिंदी साहित्य कि दुनिया बहुत छोटी है साथ ही मैं यह भी कहूंगा कि बहुत सतही, अगंभीर और गैर जिम्मेदार है। 

अधिसंख्य लेखक पुरस्कार-सम्मान और अर्थकामी हैं। वे सत्ता के गलोईयारों में घूमते पाये जाते हैं। चाहे वह राजनितिक सत्ता हो या सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक। अकादेमी हो या विश्वविद्यालय वे उन्ही कि तरफ मुंह जोहते रहते हैं। उनमें न स्वाभिमान है न आत्मसम्मान, अहंकार अवश्य है। अवसरवाद उनकी रग रग में प्रवाहित है।  ऐसे लोग अम्बेडकर और फुले हो सकते हैं ? आंबेडकर और फुले ने अपने समय में कितनी जलालतें झेलीं और आत्मसम्मान के लिए कितना कठोर संघर्ष किया यह अगर किशोर जी नहीं समझ सकते तो उनकी इस थोथी समझ का क्या किया जा सकता है। 

यह याद रखिये हिंदी का साहित्यिक संसार भर न तो देश है, न दुनिया। न समाज, न कोई बड़ी आवाज।कृपया हजार-दो हजार की तादात भर से यह भ्रम मत पालिए। यह ठीक है किसी की मृत्यु के उपरांत पारम्परिक रूप में उसका यशोगान ही किया जाता है लेकिन क्या किशोर जी इस पाखंड पूर्ण रवायत को तोड़ने की जहमत नहीं उठाना चाहते ? सारे सत्ताकेंद्रों और प्रभावशाली लोगों की स्तुति से अखाड़े में जमे रहना कोई मायने नहीं रखता, खासकर किसी साहित्यिक पत्रकार का। हां, राजेन्द्र जी बहुत जीवट के व्यक्ति थे और जिद्दी भी, उनसे लड़ने का मजा भी कुछ और ही था इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। 

संपर्क : पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद - 201014

1 blogger-facebook:

  1. --- स्पष्ट व सटीक आलेख ..पूर्ण सहमत...

    ---अधिसंख्य लेखक पुरस्कार-सम्मान और अर्थकामी हैं। वे सत्ता के गलोईयारों में घूमते पाये जाते हैं। चाहे वह राजनितिक सत्ता हो या सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक। अकादेमी हो या विश्वविद्यालय वे उन्ही कि तरफ मुंह जोहते रहते हैं। उनमें न स्वाभिमान है न आत्मसम्मान, अहंकार अवश्य है। अवसरवाद उनकी रग रग में प्रवाहित है।

    ----एक दम सही तथ्य है..... आजकल ऐसे ही लोग ....
    'उष्ट्राणाम लग्नवेलायाम गर्धभा स्तुति पाठका: , परस्पर प्रशंसन्ति अहो रूप महो ध्वनि |

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