शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

सूर्यकान्त मिश्रा का आलेख - अकाल मृत्यु भय समाप्त कर आरोग्य देने वालापर्व है - धनतेरस

धनतेरस पर विशेष....
अकाल मृत्यु भय समाप्त कर आरोग्य देने वालापर्व है - धनतेरस
भगवान धनवन्तरी और यम पूजा का प्रावधान ....

दीपावली अथवा लक्ष्मी पूजा से ठीक दो दिन पूर्व मनाया जाने वाला धनतेरस का पर्व धन वैभव और आरोग्य प्राप्ति के दृष्टिकोण से अति उत्तम पर्व माना जाता है। यह भी मान्यता है कि इस दिन बर्तनो की खरीदी सपन्नता को और अधिक पुष्टता प्रदान करती है। सवाल यह उठता हैकि इसदिन किसकी पूजा और क्यों की जाती है। धनतेरस के दिन मृत्यु के भय और अकाल मृत्यु को परिवार से दूर रखने यम अथवा यमराज की पूजा का प्रावधान है दूसरी ओर इसी दिन आयुर्वेद के जनक भगवान धनवन्तरी का जन्म भी पर्व के आयोजन का कारण बताया जाता है । कहते है कि देवासुर संग्राम में निकले अमृत कलश से ही लक्ष्मी जी उत्पन्न हुई थी और उसी देवासुर संग्राम में निकले अमृत कलश से भगवान धनवन्तरी ने भी जन्म लिया। भगवान विष्णु के अवतार धनवन्तरी को आयुर्वेद विशेषज्ञ होने से देवो के वैद्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इस दिन प्रत्येक हिन्दू धर्मावलबी अपने घर के द्वार पर तेरह दीपक जलाकर भगवान धनवंतरी से यही प्रार्थना करता है कि उसका परिवार सभी व्याधियों से मुक्त रहे और धन-धान्य से परिपूर्ण हो


-: प्रचलित है अनेक कथाएं :-
    कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धनवंतरी का जन्म होने से ही इसे धनतेरस नाम दिया गया। भगवान धनवंतरी जिन्हें आयुर्वेद का जनक कहा जाता है । अमृत कलश धारण कर धरती पर अवतरित हुए। एक लोकमान्यता के अनुसार धन तेरस के दिन बर्तनो की खरीदी भविष्य के धन में क्फ् गुना की वृद्धि प्रदान करती है । धनतेरस के दिन घर के दक्षिण दिशा में दीप जलाने की शास्त्रोक्त परपरा भी बतायी जाती है। वैसे तो धनतेरस पर्व को लेकर विभिन्न लोककथाएं प्रचलित है, किन्तु कहा जाता है कि हेम नामक राजा का एक सुन्दर पुत्र था, लेकिन उसे ज्ञात था कि उसकी शादी के चार दिन पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा । इस बात को लेकर राजा बड़ा चिंतित रहता था। यही कारण था कि उसने अपने राज्य में ऐसे स्थान की खोज करायी जहां स्त्री जाति की छाया भी न पड़ती हो । अपने पुत्र को हेम राज ने अपने सुरक्षा कर्मियो के साथ वहां रहने भेज दिया। भाग्य का लिखा न कभी मिटा है और न ही मिट पायेगा। राजकुमार के साथ भी ऐसा ही हुआ उसे उस स्थान पर एक अत्यन्त सुन्दर कन्या के दर्शन हुए। दोनो एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हुए अंततः गंधर्व विवाह के द्वारा परिणय सूत्र में बंध गये। चार दिनों पश्चात् उस राजकुमार की मृत्यु हो गयी । उसकी नववधु जोर-जोर से विलाप करने लगी यमराज द्वारा उसके प्राण हर लेने से और नववधु के विलाप से व्यथित यमगणो से यमराज से पूछा महराज इसके दुःख के अंत का कोई उपाय होगा, इस पर यमराज ने कहा कि यदि वह अपने पति के प्राण को बचाना चाहती है तो धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी के साथ यमराज की पूजा करे । ऐसा करने पर वह अपने पति को वापस पायी और सभी को इस रहस्य की जानकारी दी । तब से पूरे राज्य में धनतेरस का पर्व उत्साह से मनाया जाने लगा, किन्तु यह रहस्य मात्र अकाल मृत्यु से बचने के लिये ही उपयुक्त बताया गया।


-: चिकित्सको के लिए विशेष फलदायी :-
    भगवान धनवंतरी देवताओं के वैद्य माने जाते है इस दृष्टिकोण से चिकित्सकों के लिए धनतेरस का पर्व विशेष महत्व रखता है । औषधियो के प्रभाव और चिकित्सको के ज्ञान वृद्धि के उद्देश्य से भी धनतेरस पर्व उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। एक ऐसे कथानक में जानकारी भी मिलती है, कि यमगणो के विचारों को जानने के लिए यमराज ने एक बार उनसे पूछा कि प्राणियों के प्राण हरते समय तुहें दुःख होता है या नही । यम के भय से यमगणों ने कुछ भी कहने से परहेज किया,। किन्तु यम द्वारा भय समाप्त करने पर उन्होंने कहा कि अनेक बार अकाल मृत्यु पर उनका हृदय दुखित हो उठता है । तब यमराज ने रहस्य प्रकट करते हुए कहा कि धनतेरस के दिन जो प्राणी मेरी पूजा कर घर के दक्षिण दिशा में दीपो की रौशनी करेगा उसे अकाल मृत्यु से सर्वथा भय मुक्ति प्राप्त होगी । विशेष रूप से आयुर्वेद चिकित्सा के विशेषज्ञ लोग भगवान धनवन्तरी के तैलचित्र के आगे दीप प्रज्ज्वलन कर प्रतिदिन लोगो के स्वास्थ्य लाभ की कामना करते है । भगवान धनवन्तरी के वंश में ही दिवोदास उत्पन्न हुए जिन्हें शल्य चिकित्सा का विशेषज्ञ माना जाता है । आयुर्वेद के संबंध में सृष्टि रचयिता ब्रहा जी ने स्वयं एक लाख श्लोक सहित आयुर्वेद महत्व का प्रकाशन किया। जिसे इन्द्र के मुख से स्वयं धनवंतरी जी ने सुना। उसी श्लोक में से एक इस प्रकार है -
    विद्याताथर्य सर्वस्वमायुर्वेद प्रकाशयन्
    स्वनाना संहितां चके लक्ष श्लोकमयीमृजुम ।।
    भगवान धनवन्तरी की साधना के लिए निन मंत्र का जाप उत्तम है -
    ऊँ धन्वतरये नमः
        इस मंत्र के अलावा भी भगवान धनवन्तरी को प्रसन्न करने वंदना इस प्रकार की जा सकती है -
    ऊँ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धनवन्तरायेः
    अमृत कलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्व रोग निवारणाय ।
    त्रिलोकनाथाय - त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णु स्वरूप,
    श्री धनवन्तरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः ।।
        अर्थात् परम भगवान का जिन्हे सुदर्शन, वासुदेव, धनवन्तरी कहते है जो अमृत कलश धारक है। सर्व भय नाशक है, सर्व रोग नाश करने वाले है । तीनों लोको के स्वामी है और उनका निर्वाह करने वाले है, उन विष्णु स्वरूप धनवन्तरी को नमन है ।


:- सोना नहीं पीतल खरीदें -:
धनतेरस पर्व पर सामान्यतः लोगो की यह धारणा बनी हुई है कि सोना, चांदी अथवा जमीन की खरीदी शुभ होती है । इस भ्रांति को अपने मन से निकाल देना चाहिए । धनतेरस पर पूजे जाने वाले भगवान धनवन्तरी की प्रिय धातु पीतल है । इसलिए इस दिन पीतल की खरीदी शुभ मानी जाती है । चिकित्सा विज्ञान में इसी दिन आयुर्वेदिक दवाईयों को कूट पीसकर अभिमंत्रित किया जाता है । व्यापारी वर्ग धनतेरस के शुभ अवसर पर बही खातों की खरीदी कर उसकी पूजा अर्चना करते आ रहे है । पीतल के साथ चांदी की खरीदी भी उत्तम मानी जाती है। पीतल की खरीदी घर परिवार में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य की पुष्ठता प्रदान करती है। इसी तरह चांदी कुबेर की धातु है जिसे इस विशेष दिन खरीदने से यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और सपदा में वृद्धि का अवसर प्राप्त होता रहता है ।

                                 -

                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर -

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