शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सुशील यादव का व्यंग्य - सस्पेंडेड थानेदार का इंटरव्यू

सस्पेंडेड थानेदार का इंटरव्यू

वो थानेदार इंटरव्यू देने के नाम पे बहुत काइयां है। बड़े से बड़ा कांड हो जाए वो मुंह नई खोलता। ऐसे कारनामों में भी जिसमें उसे श्रेय लेने का हक होता है वहाँ भी चुप्पी लगा जाता है।

पत्रकार लोग मनाते हैं, उसके थाने वाली जगह में कोई भी ‘दारोमदार’ वाला वाकया न घटे, कारण कि चटपटी खबरों का पूरा सत्यानाश हो जाता है।

उसकी थानेदारी में सुबह-सुबह सब की शामत आए रहती है। नाई को थाने में तलब करके,थानेदार साहब की शेविंग-ट्रीमिंग से दिन की शुरुआत होती है। एक अर्दली जूते को पालिश करवाने ले जाता है। दूसरा ड्राइक्लीनिर्स से ड्रेस उठाने जाता है। तीसरा, घंटे भर की मशक्कत के बाद बुलेट के एक-एक पुर्जे को साफ कर के तैयार करता है। उसे कडक ड्रेस और चमचमाते बुलेट से बेंइंतिहा प्यार है। बुलेट की आवाज में ज़रा सा भी चेंज हुआ तो मेकेनिक की खिचाई हो जाती है।

उनकी सोच है कि, कडकपन और रुतबे को, यही बाहरी तामझाम, ही तो पुख्ता बनाते हैं। जब तक फरियादी-अपराधी थाने की सीढियां चढते काँप न जाएँ तो थाने और पोस्ट-आफिस में भला फर्क क्या हुआ?

वे जिस थाने के इंचार्ज बनाए जाते हैं, चार रात बिना सोए, गस्ती में गुजार देते हैं।

’गस्ती’ को वे शहर-बस्ती की स्टडी का सबसे खास मापदंड मानते हैं।

उनका कहना है कि अपराध सर्वव्यापी है। जहाँ अन्धेरा है वहाँ अपराध ,जहाँ सुनसान है वहीं उठाईगिरी ,जहाँ भीड़-भाड है वहीं पाकिटमारी ,और तो और, जहां भजन –कीर्तन है, वहाँ भी बाबाओं की धोखाधडी है।

एक पुलसिया सोच में हर जगह लोचा है, बस लोचन घुमाने की देर है सब सामने आ जता है।

सरकार ने ला एंड आर्डर का डंडा पुलसिया हाथ में जिस आदि-काल से दे रखा है, तब से लेकर आज तक जर, जोरू ,जिस्म ,जान ,माल-एहबाब की हिफाजत ही हिफाजत हो रही है। थानेदार इसे बिलकुल वैसा ही बताते हैं कि, महाभारत में सारथी मधुसूदन के रहने –न रहने का क्या फर्क पडता ?यकीनन ,बिना सारथी-मारुती , के रथ की धज्जियां ही उड़ गई होती। प्रभु ने अपनी अलौकिक शक्ति को जैसे ही अलग कर बताया, धुरंधर धनुर्धारी अर्जुन के पाँव के नीचे की धरती खिसक गई।

वे अपनी ड्यूटी पूरी मुस्तैदी से निभाते रहे। पंगा तब तक न हुआ जब तक बाकायदा जुए के फड़ वाले ,सटोरिये ,उठाईगीर,बुटलेगर सभी तय रिवाइज्ड रेट पर हप्ता पहुंचाते रहे।

इधर कुछ दिनों से नए इलेक्शन बाद, दादा किस्म के विधायक के पालतू लोग, उभर आए। सब के सब नेता के ‘दाहिना हाथ’ होने की धमकी देने लगे।

‘हप्ता-महीना’ के व्यावहारिक लेन-देन के बदले कोई थानेदार से ठेंगा बताए तो अव्यवहारिक स्थिति का पैदा होना तो बनता ही है ?

थानेदार के पास लम्बे हाथ वाले कानून भी होते हैं,जिसे वे प्राय: जेब में घुसाए रहते हैं। जेब से हाथ निकला तो सामने वाले को खामियाजा तो भुगतना पडता है न ?

थानेदार ने बैरियर लगा दिया ,गस्ती बढ़ा दी। एक-एक ‘दाहिने हाथ के दावेदारों’ को चुन-चुन के घरों से उठाने लगे। सब की कमाई का जरिया बंद होने की नौबत देख, ‘आका’ लोग मौक़ा ए अपराध में कूदे।

उन सबों को ‘उपर के आदेश की मजबूरी बता कर हाथ खड़े कर देना थानेदार का आजमाया हुआ नुस्खा था।

नेताओं में तहलका मचा, वे भाग कर मुखिया की शरण में गए।

मुखिया ने कहा ,जहां तक हमारे थानेदार का एक्शन है ,उस पर तो हम कुछ करने से रहे। सब ‘टू द पॉइंट’ वाला मामला है।

तुम लोग थानेदार को किसी दूसरे तरीके से घेर-फंसा सको तो मामला बनेगा। नेता लोग अपना सा चेहरा लिए लौट आए।

थानेदार का छुट-भइयों के स्टाइल में स्टिंग की कई कोशिशें हुई। काइयां लोग पकड़ में कब आते हैं भला?वे भी पकड़ से दूर थे।

कहते हैं हर कुत्ते का एक दिन जरूर आता है ,हुआ भी वैसा ,एक मरियल सी गाय को एक समुदाय विशेष ने बाइक से ठोंक डाला। गउ-माता परलोक चली गई। इस लोक में कुहराम मच गया। दंगे भड़क गए। थानेदार को हवाई फायर करने की नौबत आ गई।

कलेक्टर का दौरा हुआ। फरमान निकला, ला एंड आर्डर, का ठीक से अनुपालन नहीं हुआ ,शहर में दंगे भड़क जाने के पूरे आसार थे, थानेदार तुरंत प्रभाव से निलंबित क्र दिए गये।

केवल हमारा चैनल, पहली खबर देने का ठेका लिए फिरता है, सो हम हालात का जायजा लेने पहुंचे। हमारे बाद दूसरे चैनल वाले भी कूद-कूद कर बताने लगे ,थानेदार तुरंत प्रभाव से निलंबित।

हमने सस्पेंडेड थानेदार की ओर माइक किया।

हम लोग की इंटरव्यू लेने के पहले, इंटरव्यू देने वाले को खूब चढाते हैं। हमने उसकी प्रशंसा में कहा ,जनाब आपके थाने का एक बेहतरीन रिकार्ड है। सभी कस्बों से कम चोरी -डकैती ,लूट-मारपीट ,ह्त्या-आगजनी ,बलात्कार –किडनेपिंग के केस, आपके यहाँ पाए जाते हैं ऐसा क्यं,इसकी कोई खास वजह ?

थानेदार ने अपने डंडे को ऊपर की तरफ इशारा करते हुए कहा, सब ‘ऊपर वाले’ की मेहरबानी है जनाब। एक काइयां-पन से लबरेज जवाब हमारे सामने था,जिसके दो-तीन मायने तो लग ही सकते थे। ,

हमने पूछा ,आपको एक सख्त थानेदार के रूप में जाना जाता है। अपराधियों की पतलून आपके थाने में आपके डर से गीली हो जाती है ?

नहीं जी ,ये सरासर गलत है। हम तो बड़े प्यार से पुचकार के तहकीकात करते हैं। अब हमारे छूने मात्र से कोई अपने अधोवस्त्र को गीला होने से न रोक सके तो हम क्या कर सकते हैं ?

एक बात कहे ?...... लोगों में जो कानून का भय होता है वही उनके पतलून को गीला करता है जी। वे अपनी मूछों पर हाथ फिराने लग गये।

अच्छा आखिरी सवाल ,आपको सस्पेंड होने में कैसा लग रहा है ?

बहुत बढिया लग रहा है जी।

थानेदार हो, और सस्पेंशन-वस्पेशंन न हो, ये तो कोई बात न हुई जी।

बारी-बारी से प्रोग्राम बना होता है। ये अंदरूनी बात है।

हम ला-आर्डर वाले लोगो के ऊपर, ‘पब्लिक के लिए मैसेज वाला कार्यक्रम’ भी चलता है। अभी सस्पेंशन हुआ है ,चार्ज –शीट मिलेगा ,इन्क्वारी होगी ,रुटीन है जी रुटीन ?

हमने देखा थानेदार के न तो चेहरे की हवाईया उडीं .न शिकन आया ,न कहीं जूं के रेंगने का निशाँ मिला ,वे सर को तनिक भी नहीं खुजलाए।

ये हमारा पहला इंटरव्यू था, जिसमें थानेदार के सामने ,हम ज्यादा घबराए लग रहे थे।

सुशील यादव

श्रिम सृष्टि ,सन फार्मा रोड

अटलादरा,वडोदरा(गुज) 390012,

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