शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

सुशील यादव का व्यंग्य - जहाँ सोच है, वहाँ शौचालय है

जहां सोच है वहाँ शौचालय है

यस, वी केन ,,,,

मैं मानता हूँ इतने रद्दी तरीके से कोई शुरुआत नहीं होती ,मगर क्या करे अपने अंदर क्या –क्या कर सकने की क्षमताओं का आकलन यदि किया जाना है. तो मूल को पकड़ना जरूरी हो जाता है।

मूल में आदमी की सुबह की नित्य क्रिया पहला और जरूरी स्थान रखती है।

बहरहाल आइए आगे की सोचें, ‘व्हाट वी केन डू अहेड’।

हर आदमी में ‘यस वी केन’ नहीं पाया जाता। उसके अंदर से, उसके कर सकने वाली क्षमता को, निकालना पड़ता है।

हमारे अंदर छिपी प्रतिभा को निकालते-निकालते बासठ बरस हो गए। हर किसी ने खदेड के बाहर निकालने की कोशिशें की। माँ-बाप ,भाई-बहन ,मास्टर ,गुरुजी, सर……., सबने हाथ आजमाए। नैतिक शिक्षा की झडी लगा दी।

बचपन में स्कूल जाने का मन नहीं करता था, तो अम्मा कहती बेटा तुम अच्छे बच्चे हो…. ,स्कूल भला क्यों नहीं जा सकते। मैं कहता दूसरे हमें मारते हैं। वो कहती ,तुममें बहुत ताकत है......। तुम ओ शेर को भी डरा सकते हो। मैं मुगालता पाल लेता ,शेर से लड़ने की ताकत है....., तो गीदड़ों से भला क्या डरना?

पिताजी से शिकायत रहती कि कपडे अच्छे नहीं है, तो वे वीर सपूतों के, या अपने भोगे हुए यथार्थ को लेकर किस्से सुना डालते कि कैसे भारी बारिश में एक जोडी कपड़ों से काम चला लेते थे। चूल्हे की आंच के सामने रख के कपडे सुखा के पहने हैं। मुझमें नैतिक बल का संचार हो जाता ,फिर यूँ लगता जब वे वैसा कर सके ,तो हम क्यों नहीं ?

स्कूल में मास्टर जी के हत्थे चढे तो, वे सबक कठिन से कठिन चुटकियों में करवा लेते थे। कहते थे सब आसान है ज़रा सी मेहनत और लगन चाहिए आदमी सब सीख जाता है। उस नैतिक बल के भरोसे हमें लगा कि हम कुछ कर सकते हैं।

‘सर’ लोगों के सानिंध्य में एक्जाम की कैसी तैय्यारी करनी है, का पथ-प्रदर्शन हुआ। वे अपना किस्सा बताते कि, सुबह चार बजे उठ कर पढ़ने के क्या फायदे हैं ? एक तो पढ़ा हुआ जल्दी याद हो जाता है, दूसरा बुरी संगतों से छुटकारा मिलता है। उनके पीछे कही बातों में दम देखकर, बुरी संगतें छूटी। शुरू-शुरू में लगता था ,हो नहीं पाएगा, मगर ‘यस यूं केन’ का झांसा...... दिमाग में छप गया।

सर्विस के इंटरव्यू की तैय्यारी में, दोस्तों ने खूब डरा सा दिया था। बहुत टफ पूछते हैं। जरा सा चुके नहीं कि, गए। उन्ही में से एक दोस्त ने कहा ,घबरा मत यार ,बेधड़क बताना। वे लोग ‘कान्फीडेंस लेबल’ ज्यादा देखते हैं। सवालों के जवाब यूँ देना कि जैसे तुम ही ,ज्ञाता हो। यु केन......। उसके इतना कहने मात्र से मुझे संजीवनी मिल गई। मेरी, मास्टरी की नौकरी के साथ, वैतरणी पार लग गई।

मैंने भी जी भर के कोशिश की, कि बच्चों में ‘यस यु केन’...... की जबर्दस्त हवा भर सकूं। अपनी कोशिशें कामयाब भी देखता हूँ, जब कोई स्टूडेंट, बाजार या किसी पार्टी में अचानक आकर पैर छू कर कहता है,सर जी पहचाने हमें ......।

मैं खोई –खोई नजरों से देखता हूँ ,फिर वे अपना वे परिचय खुद दे बैठते हैं। मैं फलां, यू. एस. में इंजिनियर हूँ /मैं डाक्टर .....। मैं उनको, फूलने-फलने का आशीर्वाद दे के ,चारों तरफ देखता हूँ, (कि देखो,एक मास्टर के पास कितनी ताकत है। )

वे दिन हवा हो गए ,अच्छे बच्चे.... ,अच्छे संस्कार वाले टीचर..... ,मान-सम्मान ,नैतिक शिक्षा का दौर .....।

सोते से जैसे, किसी ने जगा दिया हो, जिस एक वाक्य से बच्चो में, जोश की गंगा बहाया करते थे वो अब करीब-करीब पालिटिकल नारा बन गया है ,वो भी अमेरिका से आयातित ओबामा के स्टाइल का...... ?

‘यस यु केन’ का पालिटिकल मीनिंग अब के दौर में जानते हैं क्या होगा ?

आपके पास वोट-बैक नहीं है ,यस यु केन हैव.....।

झुग्गी –झोपडी चले जाओ। गरीब बच्चों को गोदी में उठाओ। विकलांगो की मदद करो। लड़कियों को सायकल ,लडकों को लेपटाप बांटो। वर्ग –विशेष में पकड़ जमाने के लिए यूं जतलाओ कि अगर उनके काम में कलेक्टर –एस पी बीच में आता है , तो हम उनकी भी नहीं सुनेंगे। उनको सस्पेंड करके आपके रोड़े हटा देंगे .....‘यस यू केन’, आपके दिलो दिमाग में भरने से बाज नहीं आयेंगे।

यस यू केन.... कहते-कहते ,वे लोग चुनाव बाद कब पलटी खा कर कह बैठते है, ‘यस वी केन‘ ....।

“वी केन”, मानी, वे जंगल का ठेका ले सकते है ,माइनिंग सेक्टर में ‘बारा’- बजा सकते हैं ,संचार –क्रांति की आड़ में इतना पीट सकते है कि सात पीढ़ी तर जाए। कोयले की पूरी आंच खींच कर कब ‘राख’ पकडा दें कह नहीं सकते। वे रेल लाइन अपने घर से ससुराल तक बिछाने को जस्टीफाई कर दें।

‘यस वी केन’...... में सरकार बदलने की लोकतांत्रिक ताकत घुस गई है। बहुत दिनों से जिसके मन में ये सपना पल रहा हो कि, उसका भी , कहने को ,एक स्विस एकाउंट हो ,बिना स्विस अकाउंट के स्टेटस सेम्बाल नही बनता ,वे चार चाटुकार बटोर लेते हैं। हवा फैलाते हैं कि सरकार गई,सरकार की नाक से आक्सीजन के चार सिलेंडर खींच लिए गए ,कमजोर दिल वाले पाला बदलने लगते हैं,या अपनी-अपनी ‘नाक’ के लिए एक अदद आक्सीजन –मास्क का इन्तिजाम करना शुरू कर देते हैं।

“यस वी केन” वालों की , बांछें खिलने लगती है वे कुर्सी -काबिज हो जाते हैं .......,

“यस यु केन” से शुरू ’यस वी केन” में एंड.... ;यानी खेल खतम.... पैसा हजम .....

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

5 blogger-facebook:

  1. चुटीला व्यंग्य

    उत्तर देंहटाएं
  2. व्यंग ने आपको प्रभावित किया ,मै आपकी टिप्पणी अपनी उपलब्धि में शुमार किये लेता हूँ |धन्यवाद ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही बढ़िया और चुटीला व्यंग्य.....बधाई...प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  4. Comments written above is for you too.Thanks

    उत्तर देंहटाएं
  5. व्यंग ने आपको प्रभावित किया ,मै आपकी टिप्पणी अपनी उपलब्धि में शुमार किये लेता हूँ |धन्यवाद ..

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------