सोमवार, 25 नवंबर 2013

सीमा सक्सेना का आलेख - नई कहानी के संस्थापक राजेंद्र यादव

मोहन राकेश, कमलेश्वर के बाद राजेंद्र यादव जी को नई कहानी विधा का अंतिम हस्ताक्षर माना जाता है, 1986 में कालजयी कथाकार मुंशी प्रेमचंद्र के द्वारा शुरू की गई पत्रिका ‘हंस’ का प्रकाशन उन्होंने ही दुबारा शुरू कराया था। वह विचारोत्तेजक लेखों को प्रकाशित करने से विवादों में भी आये, फिर भी वे सन्नाटे की आवाज बनकर निरंतर अग्रसर होते रहे।

हिंदी साहित्य जगत में उनको लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण मानवाधिकार, दलित और स्त्री-विमर्श पर अपनी आवाज बुलंद रखने के लिए हमेशा जाना जाता रहेगा।

28 अगस्त 1929 में आगरा ( उत्तर प्रदेश) में जन्मे राजेंद्र जी ने 1951 में आगरा यूनिवर्सिटी से एम ए किया, जिसमें उन्होंने टाप किया था। उनकी शादी लेखिका मन्नू भंडारी के साथ हुई थी, जो विवादों में घिर जाने के कारण ज्यादा दिन नहीं चल सकी।

राजेंद्र यादव जी ने उपन्यास, कहानी, निबंध आदि कई विधाओं में लिखा, उनकी प्रसिद्ध कृति सारा आकाश, ‘अनदेखे अनजाने पुल’, कुलटा आदि काफी प्रसिद्ध हुए । ‘सारा आकाश’ पर तो फिल्म भी बनी थी । ‘हंस’ पत्रिका निकाल कर उन्होंने साहित्य जगत में बहुत बड़ा काम किया था , उनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उनकी साहित्यिकता मरते दम तक बनी रही। उन्होंने 60 वर्ष पहले नई कहानी और नये सिनेमा को जो आयाम या योगदान दिये थे, वे आज भी नये ही हैं। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी, अपनी कमियों और बुराइयों को सहर्ष स्वीकार करने वाले इंसान थे। अपनी पत्नी मन्नू भंडारी के साथ मिलकर लिखी एक रचना ‘एक इंच मुस्कान’ जैसी रचना आज तक नहीं लिखी जा सकी है उसमें एक प्रयोग धर्मिता थी । वे हमेशा नारी चेतना, दलित चेतना के लिए जाने जाते रहेंगे। क्योंकि वे साहित्य जगत में इनके लिए ही आवाज बुलंद करते थे। अपने जीवन के अंतिम समय तक विवादों से घिरे रहे साहित्यकार राजेंद्र जी ने हिंदी साहित्य में एक युग की स्थापना की थी।

बीसवीं सदी के अन्त और इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता की जब भी बात होगी तब राजेंद्र जी के हंस की चर्चा जरूर होगी। उनकी अनेकों कहानियों के अलावा वे अपने आन्दोलन -धर्मी व्यक्तित्व के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे।

वह अपने पाठकों और लेखकों के बीच चाय पिलाने के दौरान बातचीत का जो तारतम्य स्थापित करते थे और उन्हें अपने विमर्श से तृप्त कर देते थे शायद ही अन्य कोई साहित्यकार ऐसा कर पाये।

वह आगरा से मथुरा, झॉसी और कोलकाता में घूमते हुए अन्ततः दिल्ली आकर बस गये थे और दिल्ली में उनका इतना मन लगा कि उन्होंने फिर कहीं और जाने का सोचा ही नहीं, जैसे गालिब दिल्ली आकर बस गये तो कहीं और जा ही नहीं पाये।

राजेंद्र यादव जी का कहानी संग्रह ‘अपने पार’ उनकी उत्कृष्ट कथा है फिर भी अगर उनकी सामर्थ्य का आकलन किया जाये तो ‘हनीमून’ उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति कही जायेगी उनके उपन्यास

‘उखड़े हुए लोग’ जो बात नहीं कह सकी वह यह छोटी सी कहानी कह जाती है। यह रचना एवरेस्ट की चोटी के समान है जिस तक पहुँच पाना किसी भी लेखक के लिए गर्व की बात है।

हालांकि उनकी मृत्यु 29 अक्टूबर 2013 में हो गई फिर भी वे अपने कृतित्व के लिए हमेशा जाने जाते रहेंगे। उनका जाना साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है जिसे भरने में समय लगेगा, साथ ही हंस का संपादन कैसे होगा इस पर भी विचार करना होगा ।

राजेंद्र यादव जी को अपना गुरू मानने वाली वरिष्ठ साहित्यकार ‘मैत्रेयी पुष्पा’ के तो उनसे बेहद अच्छे संबन्ध रहे थे वे स्वयं कहती हैं ‘‘कि मेरा साहित्य जगत में पदार्पण राजेंद्र जी से परिचय के बाद ही हुआ वे मेरे लिए बेहतरीन शिक्षक साबित हुए उन्होंने ही मुझे रचनात्मक मूल्य बताये आश्वस्ति दी कि भले ही तुम्हें बुरा लगे लेकिन वे गुरू के रूप में हमेशा बताते रहेंगे, उनकी लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों से ही हमने सीखा’ । वे कहती हैं ‘कि हिन्दी में लेखक तो बहुत मिलेंगे परंतु शिक्षक एक भी नहीं क्योंकि किसी में भी राजेंद्र जैसी उदारता और सच कहने की हिम्मत या प्रवृति नहीं मिलेगी, तमाम विवादों के बाद भी वे लोगों से और लोग उनसे जुड़े रहे।

सीमा सक्सेना ‘बरेली’

4 blogger-facebook:

  1. सीमाजी आपने स्व.राजेंद्र यादव जी का परिचय पाठकों के सामने रख एक भागीरथ कार्य किया है ,साहित्य जगत का एक देदीप्यमान सितारा डूब गया |
    धन्यबाद |

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  2. Nirmala ji dhanyabaad . ek chhoti si koshish ki h bas .. seema

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  3. Nirmala ji dhanyabaad . ek chhoti si koshish ki h bas .. seema

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