बुधवार, 27 नवंबर 2013

गुणशेखर का यात्रा संस्मरण : चीन की उड़ान

चीन की उड़ान

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[यात्रावृत्त चलते-चलते देखे गए दृश्यों और अनुभूत सत्यों का उदघाटन मात्र है या कुछ औरभी है,जिसे इसमें जोड़ा जा सकता है.यह प्रश्न जब मेरे समक्ष उपस्थित हुआ तो धर्म संकट में फँस गया. इस पर विचार करते-करते मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जैसे यात्रा-काल में थकान के अनुसार यात्री ठहर-ठहर कर चलता है और रात्रिकाल में पड़ाव भी डालता है,ठीक वही स्थिति यात्रावृत्तांत के लेखन के सन्दर्भ में भी लागू होती है.गतिमान दृश्यों के साथ-साथ स्थानिक ठहराओं और पड़ाओं के दृश्य भी इसमें शामिल किए जाने से यात्रा के सम्पूर्ण अनुभूत और देखे गए दृश्यों को सम्यक स्थान मिलता है.इसी परिप्रेक्ष्य में दिल्ली से ग्वान्गज़ाऊ की साढ़े चार घंटे की यात्रा के साथ विश्व विद्यालय परिसर में प्रथम पड़ाव का यात्रावृत्त प्रस्तुत है.]

11नवम्बर 2013 की रात के बारह बजे दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से सदर्न चाइना एअरवेज के एस 360 की उड़ान ने टेक ऑफ़ के साथ ही हमारी कल्पनाओं के भी पर लगा दिए.इस उड़ान भरने की हौसला अफजाई के लिए बगल की सीट के ज़िक्र के साथ क्रूमेम्बर ने भी कुछ ज़्यादा ही गर्मजोशी से स्वागत किया. मैं शरीर से तो सीट पर बैठ गया और बेल्ट भी बाँध ली पर मन से तो खुले और खिले-खिले, विमान की ऊंची उड़ान सीमा जो संभवतः १८ किमी होती है,से भी ऊपर बहुत ऊपर अपनी एक अलग उड़ान भरता रहा.

बगल की सीट का मतलब भाग्यशाली होना है. शायद यही संकेत वह अमावस की आधीरात में भी देना चाह रहा था.हो भी क्यों न ,कुछ दिनों पहले तक तो इस बगल वाली सीट के कुछ अलग भाव होते थे.लेकिन इस बगल वाली सीट का दो कारणों से कोई औचित्य मेरे लिए नहीं था .पहला यह कि यह उत्साह एक-दो हवाई यात्राओं में ही ठंडा पड़ गया था. दूसरा कि आधीरात का समय था. नींद ने आक्रमण कर दिया था.थकान ऊपर से थी. नींद अपनी ओस कणिकाओं से मेरी कल्पना के परों को भी बराबर भिगो रही थी.इसी आलस के वातावारण में इधर एअर होस्टेस के पदचाप और उधर अंतड़ियों की किंकिड़ियों ने एक साथ दस्तक देकर मुझे कल्पना और नींद के लोक से एक साथ प्लेन की फर्श पर उतारा.

वेज़ की माँग से वह थोड़ी अनमनी हुई पर चावल-दाल और एक पाव के साथ कुछ पेय पदार्थ ने भूख के देवता को कुछ शांत किया और गर्दन की आड़ी-तिरछी गतिविधियों के साथ हम फिर निद्रा रानी की गोद में चले गए.तकलीफ़ असह्य होने पर बीच-बीच में जागते ,गर्दन सीधी करते पर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत को ग्वान्ग्ज़ाऊ हवाई पत्तन तक चरितार्थ करते हुए भारतीय समयानुसार साढ़े चार बजे और चीन के समय के अनुसार ६:४० पर चीन के अपने काल्पनिक लोक से आहिस्ता-आहिस्ता यथार्थ के धरातल पर उतार लाया था.

बाहर निकलते-निकलते काफी समय लगा. कई ज़गह मेरे झोले की जांचें हुईं. बार-बार पहले पासपोर्ट लिया जाना फिर बैग की तलाशी कुछ-कुछ डराता तो फिर हिम्मत बाँध कर आगे बढ़ जाते. कहीं दूर-दूर तक हिन्दी का कोई नामलेवा तक नहीं था. अंग्रेज़ी भी आधे से अधिक कर्मचारियों के मुस्कान तक ही सीमित थी. अंत में मैंने एक नई युक्ति खोजी .वह ये थी कि सामने वाले से कुछ पूछने के पहले ही यह पूछ लेता कि,डू यू नो इंग्लिश? यदि उत्तर यस ,या..या जैसा होता तो उससे उक्त यूनिवर्सिटी की तरफ जाने वाले द्वार के बारे में पूछता.लेकिन इसमें तब तक सफलता नहीं मिली जब तक कि मैं मुख्य द्वार तक नहीं पहुँच गया. बाद में पता चला कि मेरी सारी कसरत निरर्थक थी.क्योंकि चीन में केवल कुछ जानकारों को छोडकर यूनिवर्सिटी के चीनी भाषी रूप को ही ग्रहण करते हैं जबकि अपने यहाँ विशेष रूप से उत्तर भारत में विश्वविद्यालय से ज़्यादा इसका अंग्रेज़ी रूप (यूनिवर्सिटी)प्रचलित है. यहाँ तक कि अपढ़ रिक्शे वाले भी फट से समझ जाते हैं. सच कहें तो मुझे यहाँ के इसी चरित्र ने सबसे पहले सम्मोहित किया.

शायद ज्यादा ऊंचाई के डर से विमान के आसमान में पहुँचने के साथ ही मेरा मोबाइल प्राण छोड़ चुका था. जिस मुसीबत से बचने के लिए मैंने दिल्ली एअरपोर्ट पर ही चाइना का जानबूझकर एक महँगा सिम खरीद लिया था,वही गले आ पड़ी थी.मेरा मोबाइल उस विदेशी जंतु को अपने अन्दर प्रवेश ही नहीं दे रहा था. मेरे मोबाइल का यह राष्ट्र-धर्म मुझे बहुत सता रहा था. क्योंकि इसके मृत होने से मेरे और मुझे लेने आने वाले के बीच सम्पर्क टूट गया था और मैं कटी पतंग -सा अपनी उटंग पतलून उठाए इधर-उधर भटक रहा था.भले ही बाहर श्रीमती तान्या केपिंग जैसी एक अत्यंत गंभीर,भद्र और शालीन सहायक प्रोफ़ेसर मेरी प्रतीक्षा में खडी थीं.लेकिन बाहर ऐसे लेने आने वालों की संख्या हज़ारों और अतिथियों की भी हज़ारों थी. मेरे आतिथ्य के सन्दर्भ में एक ख़ास बात यह थी कि मेरा नाम पट्ट देवनागरी में लिख कर लाया गया था,जिसने मुझे बिना कोई विशेष तकलीफ़ उठाए श्रीमती तान्या केपिंग तक पहुँचा दिया.एअरपोर्ट की अनेक अड़चनों के बावज़ूद चीन की इस स्वागत शैली ने भी मुझे बहुत बाँधा.

श्रीमती तान्या केपिंग ने केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ,आगरा, भारत से हिदी भाषा और उसके शिक्षण का प्रशिक्षण लिया है. संक्षिप्त परिचय के तुरंत बाद हमारा ध्यान खूब चौड़ी,साफ-सुथरी नागिन-सी बल खाती और चमचमाती सड़कों ने अपनी ओर खींच लिया.साथ में उनके किनारे लहकते खड़े स्वस्थ ,सुडौल और अत्यंत हरे-भरे वृक्षों ने भी बहुत मोहा.मैडम से उनके नाम पूछे.पर, वे नाम पूछते समय तक ही हमारे साथ रह सके. प्रथम दृष्टया चीन मेरे कल्पनालोक से पृथक नहीं लगा. रास्ते भर मेरी नज़रें अपलक चीन का प्रकृति सौन्दर्य निहारती रहीं.इस बीच पन्त की ये पंक्तियाँ भी हठात कुरेदती रहीं कि- "छोड़ द्रुमों की मृदु छाया ,तोड़ प्रकृति से भी माया .बाले! तेरे बल-जल में कैसे उलझा दूँ लोचन."

लग्ज़री कार में लाना और पहले से ही सुव्यवस्थित और सुसज्जित करके रखे गए 3बी एच के आवास में न केवल ठहराना बल्कि मुझे फ्रेश होने के लिए छोड़कर यह कहकर जाना कि, "मैं आपके लिए कुछ नाश्ता लाती हूँ." और आधे घंटे के भीतर यह नाश्ता लेके आ भी जाना मेरे लिए सुखद अनुभव था.

आराम से एक नींद ले लेने के बाद मेरी इच्छा पर उसी दिन दूसरे पहर श्रीमती तान्या जी मुझे अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय ले गईं .अपने कैम्पस से कार्यालय जाते समय रास्ते भर परिसर के सम्मोहक दृश्य ठिठकाते रहे और मैं जगह-जगह रुक-रुक कर मैडम से केवल उनके नाम भर पूछता रहा. विश्वविद्यालय परिसर के भीतर बहती नहर परिसर के प्राकृतिक सौन्दर्य में चार चांद लगा रही थी. सुन्दर-सुन्दर पार्क ,व्यायाम स्थल ,कैंटीनें और होटल साथ में यातायात के लिए निश्चित समयांतराल से चलती बसें सभी कुछ इस अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय को उसके मानकों पर खरा उतारने के लिए उद्यत दिखाई देते थे.इस अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के मुख्य शिक्षा भवन के मुख्य द्वार पर यूएनओ के सभी देशों के ध्वज चीन के राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ फहरा रहे थे.सबसे पहले उनमें अपने भारत गणतंत्र का ध्वज खोजा.उसे देखते ही अपार खुशी हुई.

विश्वविद्यालय के सुन्दर स्थापत्य,प्राकृतिक रमणीयता और वैश्विक सोच को साकार करते विभिन्न राष्ट्रों के लहराते रंग-बिरंगे ध्वजों में बंधता-बिंधता आख़िर उस दिन की मंज़िल यानी अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय पहुँच ही गया ,जहाँ पारम्परिक और अंतर्राष्ट्रीय शैलियों के मिलेजुले रूप में पर मेरा भव्य स्वागत किया गया.कुछ मिष्ठान्न के रूप में बिस्किट और वस्तु के रूप में कीमती क्राकरी भेंट में मिले.साथ में पहले से तैयार परिचय पात्र और एक कार्ड मिला ,जिसका उपयोग हम पुस्तकालय,कैंटीन और मेगा मार्केट आदि में कर सकते थे,बड़ी इज्ज़त के साथ प्रदान कर विदा किया गया. अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय के विदेशी-विशेषज्ञ अनुभाग की चीफ सुश्री सिंदी जी और उनकी सहायक ने विशेष आदर सम्मान के साथ न केवल इन चीजों के साथ विदा किया बल्कि व्यावहारिक ज़रूरतों के लिए कार्यालय से 3000युआन भी उधर दिलाए ताकि भारतीय मुद्रा के युआनीकरण तक मुझे कोई तालीफ़ न उठानी पड़े.

चलते समय मैंने चीन के जानकार मित्र से रुपयों के रूपांतरण के सन्दर्भ में राय ली तो उनहोंने बताया कि, "शर्मा जी खामखाँ डालर मत करवाना .दिल्ली या चीन के एअर पोर्ट पर रुपयों को सीधे युआन में बदलवा लेना." मैंने उनकी बात गाँठ बाँध ली .लेकिन यह गाँठ न दिल्ली में खुली और न यहाँ.अतः आज तक इस अनखुली गाँठ में बंधी भारतीय मुद्रा अपने मूल रूप में मेरी जेबों की शोभा बढ़ा रही है. यहाँ यदि यह आर्थिक सहयोग न मिला होता तो मैं अपने भारतीय मित्र की जिस नेक सलाह पर चलकर भारतीय मुद्रा के डालरीकरण से होने वाली हानि से बचा था ,उससे मेरी देह की सारी लालरी जा सकती थी .

अपने मानवीय ,प्राकृतिक और वैचारिक उच्चता के साथ जिया गया यह दिन अपने समग्र रूप में (या यह कहें कि कुल मिलाकर पहला दिन )बहुत चित्ताकर्षक और आनंद दायक रहा .

-गुणशेखर

(डॉ.गंगा प्रसाद शर्मा )
हिन्दी विभाग ,
गुआन्दांग अंतर्रराष्ट्रीय विश्व विद्यालय(वैश्विक अध्ययन) ,
ग्वन्ग्ज़्हाऊ ,चीन.

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