शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

विनीता शुक्ला की कहानी - मां ने कहा था

मां ने कहा था

विनीता शुक्ला

देविका असमंजस में थी. नये सत्र से पहले, स्कूल १५ दिनों के लिए खुला था. एक भी दिन ‘प्रॉब्लम चाइल्ड’ हितेन नजर नहीं आया. किसी तरह ‘धक्का देकर’, ग्रेस- मार्क्स से पास हुआ था. परीक्षा होने तक, अक्सर ही वह चेहरा दिखाई देता. देविका और हितेन के बीच, कोई अनकहा अनुबंध था मानो! टीचिंग स्टाफ के लिए, सरदर्द बना वह लडका!! अमूमन तीन चार दिनों में, एक बार तो उसके दर्शन हो ही जाते. कभी उसे रिसोर्स- रूम भेजा जाता था; जहाँ क्लास में पिछड़े हुए बच्चों का, कोर्स कवर होता. कभी काउंसिलिंग- रूम भी भेजते; उसके हिंसक व्यवहार के विश्लेषण के लिए. वाइस – प्रिंसिपल के तौर पर, देविका की एक ड्यूटी यह भी थी- हितेन सरीखे बच्चों का ध्यान रखना. हर बार मिलने पर वही प्रश्न,

“इस बार क्या दिक्कत है हितेन?”

“मैम, मेरी ममा ही सबसे बड़ी प्रॉब्लम है”

“ऐसा नहीं कहते माँ के बारे में ...” कहने को तो वह कह जाती पर फिर उसे अपने ही शब्द खोखले जान पड़ते. माएं बच्चों के लिए, उनका आदर्श होती हैं...शायद दुनियां भर के, ज्यादातर बच्चे यही मानते होंगे. लेकिन कुछ ऐसे बच्चे भी हैं, जिनकी माएं उनके लिए; अपनी खुशियों को झुठलाती नहीं. खुद को भूलकर, उनके साथ हंसती रोती नहीं. देविका इस बच्चे के दुःख से, असम्पृक्त न रह पाती. उस पीड़ा को, कहीं न कहीं, उसने भी जिया था – जो सायास ही, संवेदना के तारों को, छेड़ देती.

१३ की उमर तक, नानी को ही माँ मानती आई थी. स्कूल में पैरेंट्स मीटिंग के दौरान, उसकी नानी को देखकर अध्यापकों और दूसरे अभिभावकों को हैरानी जरूर होती; ५० से ऊपर की महिला, इस पिद्दी सी लड़की की माँ! उसके सहपाठी दिनेश की अम्मा, उन्ही के मोहल्ले में रहती थी- सो वही जिज्ञासा का समाधान कर देतीं, “ इस महिला के देर तक बच्चे होते रहे...इसी से.” एक तरह से यह सही भी लगता क्योंकि देविका के मामा (जिन्हें वह अपना भाई समझती थी) तब १७ वर्ष के थे, उससे मात्र ४ वर्ष बड़े. पैंतीस की उम्र में, वे नानी की गोद में आये. ‘गलती’ से दुनिया में अवतरण हुआ था उनका! उनके पहले, नानी के दो और बच्चे भी हुए. पहलौठी संतान माँ, जिन्हें नानी ने महज १९ बरस की उमर में जनम दिया. दूसरी शन्नो मौसी, जो माँ से ३-४ बरस छोटी थीं.

अपनी सगी माँ का, कोई अस्तित्व ही न था, उसकी छोटी सी दुनियां में. वे बहुत कम मायके आती थीं. शायद उससे ही बचना चाहती हो....!! तब उन्हें वह, बडी मौसी कहके पुकारती थी – यही तो दुनियावी रिश्ता था, उनके बीच. “मैडम” चौकीदार की आवाज़ से, उसकी विचार- तंद्रा भंग हुई. “बोलो भागीरथ” देविका ने थके हुए स्वर में कहा. “हितेन नाम का बच्चा, स्पोर्ट्स ग्राउंड में बेहोश होकर गिर गया” भागीरथ की घोषणा ने, उसे चौंका दिया. शिथिल देह, हरकत में आ गयी. वो तुरंत उठ खडी हुई. “बच्चे को फर्स्ट- एड रूम में ले चलो. उसके घर फोन लगाओ, कहो – ‘फौरन यहाँ आ जाएँ’...” हितेन के मुख पर पानी छिड़कने से, उसे थोडा- बहुत होश आ गया. आँखें अभी भी अधखुली सी थीं. देविका ने धीरे धीरे, स्ट्रॉ से, उसे ग्लूकोज़- वाटर पिलाया- तब जाकर हालत कुछ सुधरी. इतने में बच्चे के पिता, हेमेन्द्र का अवतरण हुआ.

बैचैनी के चिन्ह, उसके हाव- भाव से, स्पष्ट झलक रहे थे. बदहवासी में सांस ऊपर- नीचे हो रही थी. देविका को संबोधित कर उसने कहा, “मैडम, परीक्षा के दौरान, इसकी माँ की हालत बिगड़ गयी...और परीक्षा ख़त्म होते होते...आखिरी एग्जाम के दिन ही, उसने दम तोड़ दिया” कहते कहते हेमेन्द्र का मुख विकृत हो चला, “जब यह...जब यह पेपर देकर घर पहुंचा तो इसकी ममा...” बाकी की बात, सिसकियों में गुम हो गयी. “ओह!!!...यह सब...कब, कैसे...?!!!” कोई भयंकर, विरूप सी अनुभूति, देविका को जकड़ने लगी थी “कैंसर की लास्ट स्टेज थी...समय रहते, पता न चल सका...” हेमेन्द्र के शब्द लडखडा रहे थे, आगे कुछ बोल नहीं पाया. बीमार सी एक चुप्पी, पल भर को, उन पर हावी रही. फिर बच्चे के पिता ने, स्वयम को सहेजा और मोबाइल पर फोन करके, अपने ड्राइवर को, वहां बुला लिया.

ड्राइवर के साथ मिलकर, हेमन्द्र मित्रा ने, बेटे को उठाया और चल पडा. जाते जाते देविका की तरफ मुडा और बोला, “ माँ के जाने से, इसे डिप्रेशन रहने लगा है...न कुछ ठीक से खाता है, न पीता है”

“हम समझते हैं मित्रा जी! आप चिंता न करें; समय के साथ सब ठीक हो जाएगा” दिलासा देते हुए, वह बोली थी. कहने को तो कह दिया उसने, पर अपनी ही बात बेमानी लगी. माँ का अभाव, जीवन को, शून्यता से भर देता है; वह शून्य उसके भीतर भी पनपता था .... जो काट देता था दुनिया से- खुद से ही दूर कर देता था!! विचारों का प्रवाह, उसको पुनः बहा ले गया. नानी अंतिम सांसें गिन रही थीं और उन्होंने तब उसे, वह सच बताया, जो बरसों से उनके सीने में दफन था- माँ के बारे में... संबंधों की पुनर्व्याख्या करते हुए. सुनकर, उसका समूचा अस्तित्व हिल उठा था. ज्यों पल्लवित हो रहे पादप को, उखाड फेंका हो किसी ने!! बदल गया था सब कुछ- स्वप्नों में पल रही आस...भविष्य की कल्पना में, पेंगे भरता किशोर मन.. धड़कनों के स्पंदन ...हाँ; बदल गयी थी ज़िन्दगी की हर शै!!!

चिन्तन के इस बिंदु पर, न जाने क्यों, देविका का मन भटकने लगा और हितेन पर जा अटका. हितेन की माँ संध्या...एक ऐसी औरत, जो घरवालों के लाख समझाने पर भी, मानी नहीं; देर- सबेर घर में घुसना, पराये मर्दों का साथ, छोटे परदे पर रोमांटिक भूमिकाएं... टी. वी. सीरियल की यह अदाकारा, खासी लोकप्रिय थी. पति इसकी लोकप्रियता के आगे बौना महसूस करता और सास ससुर को अपनी नाक, कटती हुई जान पड़ती. किसी जमाने में वह, महज एक घरैतिन थी. परिवार की गाडी, छोटे मोटे व्यापार से चलती. ऐसे में उसको, एक अनोखा ऑफर मिला. टेलीविजन पर कोई, साधारण सा किरदार निभाना था. अवसर किसी परिचित द्वारा दिया गया. कारोबार पर मंदी भी छाई हुई थी. इसी से संध्या के परिवारजनों ने, प्रस्ताव को मंजूरी दे दी.

इसके बाद, उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. अभिनय की नई नई ऊंचाइयों को छूने लगी. कुनबे के लोग, यह पचा नहीं पाए. चारदीवारी में रहने वाली औरत, कुछ ज्यादा ही उड़ रही थी. पंख कतरने की जरूरत महसूस हुई. परिणाम- घर में नित नये झगड़े, कलह, कहासुनी...ग्लैमर की बदनाम दुनिया, छोड़ देने की ताकीद. हितेन के कोमल बालमन पर, इस सबका बहुत प्रतिकूल असर हुआ. वह बुझ सा गया. पढाई से दिल उखड़ उखड़ जाता. देविका ने एक बार, संध्या मित्रा से, इस बारे में बात भी की थी. पर वह घुटने टेकने को तैयार न थी. बोली, “मैडम, मेरी फॅमिली कहने को तो कहती है कि मैं जॉब छोड़ दूँ पर सिर्फ दिखावे के लिए. ये सब चाहते हैं कि मैं काम करूं मगर उनकी शर्तों पर. मेरा डायरेक्टर कौन हो, सहकलाकार कौन हो- इस पर भी, कंट्रोल रखना है इन्हें; इस तरह से तो मैडम हो चुका जॉब! चलो...इनके कहने से नौकरी छोड़ देती हूँ- पर फिर लाखों का कर्जा कौन चुकाएगा? दूकान से तो घर की बस, छोटी- मोटी जरूरतें ही पूरी होती हैं. हर महीने, कुछ न कुछ, रूपये भर देती हूँ...लेनदारों का मुंह बंद रहता है. ऐसा न करूं तो पूरा परिवार सडक पे आ जाये.” संध्या की बातों में दम था, मगर उसके तेवर, देविका को अपनी माँ सुनंदा जैसे लगे; कदाचित इसी से, उसकी सहानुभूति, संध्या से न जुड़ सकी.

सहायक शिक्षिका आशा भी, संध्या के पक्ष में थी, “मैडम मैं इन लोगों को जानती हूँ. बड़े खुदगर्ज लोग हैं. संध्या की कमाई पर ऐश करते हैं. यदि यह कमाना बंद कर दे तो इनका जीवन ही नरक हो जाएगा. हितेन को ऐसे अच्छे स्कूल में पढ़ाने की, हैसियत ही कहाँ है इनकी! वो तो संध्या...” संध्या की बढ़चढ़कर तारीफ, देविका को खलने लगती. आशा के शब्द, वह सुनकर भी अनसुने कर देती. भावनात्मक धरातल पर, वह हितेन से जुडी थी और हितेन की भावना, माँ के विरोध में मुखर होती थी...कदाचित देविका और ये बच्चा , एक ही नाव पर सवार थे- एक ही तरह की पीड़ा के भुक्तभोगी! तभी तो संध्या की दलीले, ठेस पहुचाती थीं उसे और उसकी संवेदना को...!!

लेकिन अब देविका, आशा से ही बात करना चाहती थी. हितेन की हालत के बारे में, केवल आशा बता पायेगी; सो उसे बुलवा भेजा. थोडा कुरेदने पर ही, वह फट पड़ी, “क्या कहूं मैडम! संध्या बहुत अच्छी सहेली थी मेरी...उसको याद कर- दिल बहुत दुखता है. वो कई सालों से बीमार चल रही थी लेकिन परिवार ने कोई ध्यान न दिया. उनकी खातिर तो ये, महज पैसा- उगाही का जरिया थी. हितेन के लिए, एक ‘पालिसी’ लेना चाहती थी; कुछ रूपये कम पड रहे थे- उसमें...संध्या अपनी परवाह न करके, लगी रही – मेहनत- मशक्कत में...सच कहूँ मैडम; वह खुद ऊपर नहीं गयी, भेजी गयी है!! वहां भेजा है, उसके लापरवाह और स्वार्थी घरवालों ने!!!”

“और हितेन?...” देविका को अपना दिल, डूबता हुआ सा लगा. “माँ को खोने के बाद ही उसे, उसकी कीमत पता चली है. अब जाकर वह जान पाया कि उसके भविष्य की चिंता में ही, ममा इतनी खटती थी. संध्या के ‘सीरियस’ होने के बाद, घर में रिश्तेदारों की आवाजाही थी. तभी तो, ननिहाल वालों के साथ रहने का भी मौक़ा मिला...और हितेन ने, सिक्के के दूसरे पहलू को जाना; नहीं तो चौबीसों घंटे, घर में, उसके कान ही तो भरे जाते थे- संध्या के खिलाफ! कितना अकेला पड गया है, ममा के जाने से... कुछ भी कहो; माँ तो माँ है!!” आगे आशा ने बहुत कुछ कहा और कहकर चली भी गयी लेकिन देविका ने मानों सुना ही नहीं. उसके अवचेतन में तो बस, यही एक वाक्य गूँज रहा था, “माँ तो माँ है”

क्या सच में??? उसकी माँ तो उसे, कायरों की तरह छोड़कर, भाग खड़ी हुई थी. सात समुन्दर पार, एक विधुर एन. आर. आई. से गठबंधन कर लिया था. उनकी इस बेटी ने, जब पूछा तो सारी बातें अपने अनुसार, तोड़- मरोड़ कर पेश कीं उन्होंने, “तेरे पिता के साथ विवाह के बाद, एक साल तो ठीक से बीता पर उसके बाद ...उनकी नौकरी छूटने से घर में पैसों की तंगी हो गयी...तब तेरी दादी और पिता ने, मुझे देह- व्यापार में धकेलना चाहा!! किसी तरह बचकर मायके आ गयी! क्या करती?? तुझे उस आदमी का नाम भी तो नहीं दे सकती थी...माँ और शन्नो के साथ, एक रिश्तेदार के यहाँ चली गयी. वहीं हुई जचगी. लौटने पर, तुझे माँ की गोद में सौंप दिया- हमेशा के लिए!” सुनंदा ने और भी बहुत कहा, बेटी को बरगलाने के लिए, “मेरा तुझसे दूर जाना ही ठीक था, अपने काले अतीत की छाया तुझ पर कैसे डालती भला?...!!” कभी कभी उनकी बातों को मान लेने का जी करता, काश कि वो मान पाती यह सब...तो उसे कुरेदने वाले प्रश्न शांत पड जाते. उपेक्षित होने की पीड़ा भी, दंश न देती. लेकिन चाहकर भी, स्वीकार न कर पायी– वह तर्क...भूल न पाई जीवन की उस विडम्बना को! माँ से, उनके नये परिवार से- एक अजानी ईर्ष्या हो गयी थी. खासकर सौतेले भाई रजत को लेकर, जिसे माँ ने अपनी कोख से जन्म दिया था. डाह से जल उठती थी वह!

माँ के और भी सौतेले बच्चे थे पर वे सब दूरदराज की जगहों पर बसे थे और शादीशुदा जीवन गुजार रहे थे; उनकी निजी ज़िन्दगी में, दखल भी देते नहीं थे. एक भरपूर ज़िदगी जी रही थी माँ, जबकि उनकी ये औलाद....!!! ऐसे में कैसे मान लेती कि यह ब्याह उन्होंने, अपने स्वार्थ के लिए नहीं किया? उनकी सौतेली संतानों तक का नाम भी, उनके नाम से जुडा है फिर वह ही क्यों ....????? लेकिन और भी कुछ सच्चाइयां हैं जो माँ को, कठघरे में खड़ा करने से रोकती हैं. नानी के देहांत तक माँ, गुप्त रूप से, उसके लिए धन भेजती रही थीं. बाद में तो पैसों के अलावा, उनके उपहार और चिट्ठियां भी मिलते रहे. एक बार उन्होंने, अपने पास विदेश भी बुलाया.

लेकिन वह, उन्हें माफ़ न कर सकी. उनके उपहार कभी खोलकर भी नहीं देखे. जब वे फोन करतीं तो बीच में ही काट देती. उनके पत्र भी तहाकर, जस के तस, रख दिया करती. कभी जब चिट्ठियाँ पढ़ी ही नहीं गयीं तो जवाब कहाँ मिलता! पर सुनंदा ने फिर भी, आस नहीं छोड़ी. वह पत्र लिखती रही. बेटी से भावनात्मक रूप से जुड़ने के लिए, हर संभव प्रयत्न किया. नाना को, उसकी शादी के लिए, लड़का सुझाया था पर उसकी बेरुखी देखकर, नाना की हिम्मत नहीं हुई- बात चलाने की. घड़ी ने १२ का घंटा बजाया तो देविका सचेत हो गयी. आज कुछ ज्यादा सोचती रही थी वो, सर का दुखना अपेक्षित ही था. लंच टाइम आ गया; छात्रों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए, उसे राउंड पर जाना था. अन्यमनस्क सी वह उठी और स्कूल का एक चक्कर लगाया.

जगह जगह चिल्लपों मची थी. मध्यावकाश में होने वाला, शोरगुल उसको हजम नहीं हुआ. अनुशासन बनाये रखने की जिम्मेवारी भी थी, सो कुछ कड़े नियम, कलमबद्ध करने लगी. आने वाले दिनों में, कुछ ज्यादा सोचने- विचारने का मौक़ा ही नहीं मिला. व्यस्तता में लम्हे, तेजी से सरकते रहे. वह व्यस्त क्षणों में भी, हितेन की सुध ले लेती. देविका मैम का चुपके से सर पर हाथ फेरना या होठों पर मार्मिक मुस्कान सजाकर उसे देखना, बच्चे को अभिभूत कर देता. कुछ और समय बीता. तिमाही परीक्षा का परिणाम आने वाला था. देविका का हृदय, अजाने भय से डोल उठा. हितेन यूँ ही पढाई में कमजोर था. विचलित मनोदशा में न जाने कैसे नम्बर लाया होगा!!

जो भी हो, इस साल हितेन ने कोई शरारत नहीं की थी. देविका ने, उसके हर शिक्षक से आग्रह किया था: यह कि हितेन मित्रा का ध्यान रखें और हो सके तो रिसोर्स रूम नहीं भेजें. अवसाद से बाहर निकालने के लिए जरूरी भी था कि बच्चे को कुंठित होने से बचाया जाये. ऐसे में पता चला कि प्रिंसिपल मैम, आवश्यक काम से बाहर जा रही थीं; रिपोर्ट कार्ड उसे ही साइन करने होंगे. हितेन का परीक्षाफल हाथ में आते ही, देविका के हाथ कांपने लगे थे. किसी प्रकार खोलकर देखा- तो देखती ही रह गयी...अविश्वसनीय!! हर साल मुश्किल से उत्तीर्ण होने वाला बच्चा, इस बार कक्षा में अव्वल आया था!!! प्रसन्नता और आश्चर्य के मिले जुले आवेग में, उसने झट चपरासी को बुलाया. “जी मैम?” सवाल के जवाब में शब्द, मानों अपने आप फिसलकर, जुबान पर आ गये थे, “ फिफ्थ ‘ए’ से जाकर हितेन मित्रा को ले आओ फौरन...!”

“जी” कहकर चपरासी चला गया. हितेन ने आते ही, मैम के पैर छुए. देविका ने भावावेश में आकर, उसको अपने अंक में भर लिया. “आई एम् प्राउड ऑफ़ यू बेटा!!... चमत्कार जैसा लग रहा है सब कुछ!!!” हितेन हल्के से मुस्कराया. उसकी मुस्काराहट में भी, किसी प्रौढ़ सी परिपक्वता थी. कुछ देर सर झुकाकर खडा रहा फिर धीरे धीरे बोला, “माँ हरदम कहती थी, क्लास में फर्स्ट आने को...जब तक ज़िंदा थी –मैंने इस बात की परवाह नहीं की!! हमेशा उनके बारे में, खराब ही सोचा ... जब वो नहीं रहीं तब जाकर जाना कि वो...” कहते कहते वह फफक पडा. देविका बिलकुल जड़ हो गयी. उसकी अनुभूतियाँ जम सी गयीं थीं. छलक आई आँखों को निर्निमेष, बालक पर केन्द्रित कर दिया. हितेन का धुन्धलाया हुआ अक्स, किसी परीकथा के चरित्र सा जान पड़ता था. वह संभलकर फिर बोला, “मैम मेरा फर्स्ट आना बहुत जरूरी था...मेरी ममा ने कहा था ना- इसीलिए...!!!”

भावनाओं का ज्वार उफान पर था, “माँ को कभी गलत नहीं समझना चाहिए...उसकी भी मजबूरी हो सकती है ...”

हितेन और भी कुछ कह रहा था पर देविका के कान सुन्न पड़ने लगे. कान ही क्यों, समूल चेतना सुन्न होने को थी! एक छोटा सा बच्चा, सहसा बड़ा हो गया और अनजाने ही उसे, एक बड़ी सीख दे गया. बच्चे के जाने के बाद वह, आत्ममंथन की दशा में जा पहुंची. उसने मन में तय किया कि वह माँ के सभी पत्र, सभी उपहार खोलकर देखेगी. हो सकेगा तो पत्रों के जवाब भी देगी और कदाचित, उनके द्वारा भेजे गये विवाह- प्रस्ताव पर भी गौर करेगी...!!!

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(लेखिका का परिचय यहां देखें)

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