शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य

बड़े साहब की मीटिंग

व्यंग्य

विद्यालय में सनसनी फैली थी। बड़े साहब आने वाले हैं। ज्ञान के अपरिमित भंडार हैं। नियमों के तो ऐसे पक्के कि जहां भी चले जायें, दो चार को सस्पेंड कर ही डालते हैं। संसार का कोई भी ऐसा विषय नहीं जिसका उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान नहीं हो। अंग्रेजी तो पानी की तरह बोलते हैं। रसायन शास्त्र का ज्ञान तो उन्हें बचपन से ही है। जीव विज्ञान और भौतिकी उन्हें देखकर ही सहम जाते हैं। इतिहास- भूगोल बेचारे तो दुम दबाये कोने में खड़े रहते हैं। गणित उनके बायें हाथ का खेल है नींद में भी दो चार समस्याएं हल कर देते हैं। हां हिन्दी कुछ कमजोर है। क्यों ? क्योंकि साहब ने इधर ध्यान ही नहीं दिया। नहीं तो दिनकर और निराला उनके सामने पानी भरते नज़र आते। तुलसी दास से भी बड़ी रामकथा अब तक उन्होंने लिख मारी होती। खेल-कूद के क्षेत्र में तो उनके ज्ञान की ऊँचाई और गहराई की माप संभव ही नहीं। घ्यानचंद से लेकर ब्रेडमैन तक पर आधिकारिक बयान दे सकते हैं। इन सबसे बढ़कर साहब की रूचि है संगीत में। मियां तानसेन अगर आज जिंदा होते तो अपना तंबुरा उनके चरणों में रखकर शागीर्द हो जाते। बैजुबावरा को तो शायद शागीर्द भी नहीं बनाते। अल्ला राखा और गुलाम अली तो तरसते रह गये साहब ने उनको मुंह नहीं लगाया। शिक्षा विभाग का सौभाग्य देखिये कि इतना महान मानव अधिकारी बन गया। उससे भी बड़ा सौभाग्य इस विद्यालय का कि साहब पधारने वाले हैं।

बातों का बाजार जितना गर्म हो सकता था उससे ज्यादा ही गर्म था। आखिरकार साहब आ गये। विद्यालय में सन्नाटा छा गया। शिक्षकों को सांप सूंघ गया। पता नहीं किस बात पर साहब उखड़ जायें। डांट खानी पड़ जाये। हालांकि सच्चा शिक्षक वही है जो निरंतर डांट खाये फिर भी मुस्कराये। कभी छात्र उसकी इज्जत उतारें। कभी अभिभावक उसकी मुंछ के बाल नोंच दे। प्राचार्य का तो पहला और अंतिम कर्त्तव्य ही है, शिक्षकों की पूंछ में पटाखा बांधना। अधिकारी के लिए तो शिक्षक भैंस की तरह है। जब चाहे सवारी गांठ ले। जब चाहे दूह ले। चारा देना हो तो दे नहीं तो बेचारा क्या कर लेगा। तो साहब आ गये। आते ही उन्होंने कहा-

-" सबसे पहले मीटिंग होगी बाकी बातें बाद में। "

सभा कक्ष में धड़कते हृदय की आवाजें सुनी जा सकती थीं। मास्टर हाथ बांधे कुर्सियों से चिपके पड़े थे। सामने एक टेबुल पर कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर एक गुलदान रख दिया गया था। गुलदान के बगल में दो पानी के बोतल थे जिसमें पानी ही था। औंधे मुंह उल्टे दो गिलास भी थे जिन्हें साहब के आने के बाद चपरासी सीधा करने वाला था। दीवार पर टंगी घड़ी की आवाज जो आमतौर पर टिक-टिक करती है मगर उस दिन टन्न-टन्न कर रही थी। सुईयां भाग नहीं रही थीं। तमाशा देखने के लिए मानो खड़ी थीं। तभी साहब कक्ष में पधार गये। साथ में विद्वान प्राचार्य। शिक्षकों ने खड़े होकर स्वागत किया। साहब के बैठने के बाद सब लोग बैठ गये। अचानक साहब मुस्कराये। अरे यह क्या ! साहब मुस्कराते भी हैं !! आँखों का भ्रम तो नहीं है ? साहब फिर मुस्कराये। नहीं दो बार भ्रम नहीं हो सकता। पक्की बात है कि साहब ही मुस्कराये। मास्टर भी मुस्कराये। प्राचार्य जोर से मुस्काराये। उन्होंने एक संक्षिप्त स्वागत भाषण भी दिया। तभी बड़े साहब ने कहा-

-" तो आज की मीटिंग शुरू करते हैं। मेरे पास समय की कमी रहती है। आज तो और भी कमी है। दस विद्यालयों में मीटिंग लेकर आ रहा हूं। अभी तेरह विद्यालयों में मीटिंग लेने जाना हैं। मैं तो आने वाला नहीं था लेकिन अचानक सोचा कि आपके विद्यालय को भी देख लेते हैं। आपके प्राचार्य का आग्रह भी था। हम तो विद्या से प्रेम करते हैं। उठते-बैठते , सोते-जगते , खाते-पीते मुझे तो विद्या के ही ख्याल आते हैं। यहां आने का मूल कारण भी मीटिंग नहीं हैं बल्कि विद्या ही है। तो मित्रों की आज की मीटिंग शुरू करते हैं। मीटिंग क्या है ? आपस में मिलने का एक अवसर है। आप लोगों को एक मौका मिला है मुझे नजदीक से देखने जानने का मैं इतने मीटिंग लेता हूं फिर भी ऊबता नहीं हूं। आप जानते हैं , मेरी तंदुरूस्ती का राज़ क्या है ? आखिर मैं इस उम्र में भी कैसे फिट हूं ? "

सब लोग एक दूसरे की ओर देखने लगे। क्या बोलें कि साहब को बुरा न लगे। पूरी सभा में सन्नाटा। प्राचार्य भी सोच रहे थे। कहीं कुछ बोले और शिक्षकों के सामने ही चालू हो गया तो ............। फिटनेश का राज़ !! उन्होंने आखिर ऐसी बात कही जो किसी को बुरी नहीं लग सकती। संसार के प्रत्येक आदमी पर लागू होती है। हो सकती है।

-" सर ! कड़ी मेहनत और संयमित जीवन ही आपके फिटनेस का राज़ है। "

प्राचार्य को पूरी आशा थी कि यह तीर खाली नहीं जायेगा। उन्हें दो बिल सैंक्शन करवाने थे। कहीं साहब भड़क गये तो ......। हुआ भी वही बड़े साहब मुस्कराये। मास्टर लोग भी मुस्कराये। सब लोगों ने राहत की सांस ली । चलो फिटनेश का राज़ प्राचार्य ने सही सही बताकर विद्यालय की इज्जत रख ली। पता नहीं किस-किस से पूछता और क्या-क्या बोलता। अचानक बड़े साहब जोर-जोर से हंसने लगे। मास्टर लोग भी हंसने लगे। प्राचार्य भी घबराकर हंसने लगे।

-" यही है मेरी तंदुरूस्ती का राज़। मैं भी जब भी हंसता हूं जोर जोर से हंसता हूं। जिंदगी में मन की सुनता हूं। दिमाग की नहीं। मन करता है तो सोता हूं। मन करता है तो खाता हूं। मेरे जीवन का तो एक ही संदेश है जब तक जीओ सुख से जीओ। सुख बांटते चलो। संसार में और क्या है। तो मीटिंग शुरू करें ? बातों में वक्त खराब मत करें। आइये मीटिंग शुरू करते हैं। हां ....तो आपका क्या नाम है ? आप क्या पढ़ाते हैं ? "

-" जी...कृष्ण कुमार। मैं हिंदी पढ़ाता हूं। "

-" कृष्ण अर्थात काला। मगर आप तो गोरे हैं। "

साहब हो हो करके हंसने लगे। मास्टर लोग भी हंसने लगे। प्राचार्य भी हंसे। अंत में कृष्ण कुमार भी हंसने लगे। उन्हें डर था कि नहीं हंसने पर पता नहीं कहीं बड़े साहब बुरा न मान जाये। कृष्ण कुमार ने आगे बताना शुरू किया -

-" जी.. पिछले साल मेरे विषय में ..............।"

-" अच्छा ! कृष्ण कुमार जी एक बात बताइये। भगवान कृष्ण को किस बात का शौक था ?"

-" जी....बांसुरी बजाने का। "

-" एक तरह से आपकी बात भी सही है लेकिन इस बात का उत्तर यह नहीं है। आप में से कोई बता सकता है कि कृष्ण भगवान को किस बात का शौक था ? "

सभा में एक बार फिर सन्नाटा छा गया। सारे मास्टर प्राचार्य की ओर देखने लगे कि इस संकट से भी वही निकालेंगे। पहली बार भी उनके उत्तर से साहब खुश हो गये थे। कृष्ण कुमार की हालत खराब। बेचारे की नौकरी अभी पर्यवेक्षण में थी। कभी भी जा सकती थी। साहब अगर नाराज हो गये तो ......। उन्होंने एक कोशिश और की।

-" जी......उन्हें गाय पालने का शौक था। "

-" एक तरह से आप सत्य के करीब पहुंच रहे हैं लेकिन यह सत्य का एक ही पहलू है। इस प्रश्न का उत्तर यह नहीं है। गाय पालना एक धंधा है। शौक नहीं है। शौक तब हो तब आदमी एक या दो गाय पाले। उनके पास तो सैकड़ों गायें थीं। यह उनकी मजबूरी थी। उनका शौक तो कुछ और ही था। आप लोग पढ़ते तो हैं लेकिन गौर से नहीं। बहुत ही आसान उत्तर है। कोशिश कीजिये प्राचार्य जी आप भी। "

प्राचार्य हंसने लगे। उनकी हंसी बता रही थी कि उन्हें इस पचड़े से दूर ही रखा जाये तो बेहतर होगा। मन ही मन उन्हें खुशी भी हो रही थी। कृष्ण कुमार को फंसा देखकर उन्हें हार्दिक संतोष हो रहा था। यही शख्स है जो उनकी बातों का जवाब देता है। बड़े बड़े नियम बताता है। बेटा अब बताओ कृष्ण भगवान के शौक। बड़े साहब ने बात को और लंबा न करके , एक ठहाका लगाया और बोले-

-" भई ! कृष्ण भगवान की दही और मक्खन खाने का शौक था। आपको भी है कृष्ण कुमार। दही खाना सेहत के लिए बहुत जरूरी है। यदि आप नहीं खाते है तो खाना चाहिए। आपको पता है कि मुझे भी दही खाने का शौक है। दही वास्तव में एक ऐसा पदार्थ है जिसमें सभी पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं। दूध से अधिक पौष्टिकता दही में होती है। बैठो भई कृष्ण कुमार। खड़े मत रहो। थक जाओगे। दही भी तुम खाते नहीं हो। "

मास्टरों के जान में जान आई। प्राचार्य को थोड़ी कम खुशी हुई। उनको लग रहा था कि कृष्ण कुमार को और रगड़ा जायेगा। चीं तो बच्चू बोल ही देगा। मगर ऐसा हुआ नहीं। खैर ! जितना भी हुआ अच्छा हुआ। उन्होंने भी ठहाका लगाया। बड़े साहब को बताना भी चाहते थे कि उन्हें इस प्रश्न का उत्तर आता था लेकिन मास्टरों को आजमाना चाहते थे। इनको भी तो पता चले कि विद्यालय किस पर टिका है। काम के न काज के दुशमन अनाज के। मोटी तन्ख्चाह लेंगे करेंगे कुछ नहीं। एक हम न रहें तो...............। बड़े साहब ने कृष्ण कुमार की बगल में बैठे शिक्षक की ओर देखा -

-" आप ज़रा संक्षेप में अपने शिक्षण और बालकों के विकास पर प्रकाश डालें। समय कम है अभी आज शाम में निकलना भी है। "

-" जी.......मैं रामकुमार सिन्हा , भूगोल पढ़ाता हूं। पिछले साल ............।"

-" आप भूगोल पढ़ाते हैं तो एक बात बतायें कि दही भारत में कहां के लोग अधिक पसंद करते हैं ? "

-" जी...दही तो पूरे भारत में पसंद की जाती है। भारत की एक प्राचीन और पसंदीदा भोज्य पदार्थ है।"

-" यही तो समस्या है। आपलोग सुनते कम बोलते ज्यादा हैं। मैंने क्या पूछा ? कहां के लोग अधिक पसंद करते हैं ? पसंद करने में और अधिक पसंद करने में अंतर है। आप बच्चों को क्या पढ़ायेंगे जब आप को सुनना ही नहीं आता। मूल समस्या ही यही है। पूरे देश की समस्या है। कोई किसी को सुनने के लिए तैयार नहीं है। सब चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाये। हां तो मैं कह रहा था ंकि दही को भारत में सबसे ज्यादा कहां के लोग पसंद करते हैं ? जरूरी नहीं कि राम कुमार ही बतायेंगे। कोई भी बता सकता है। कृष्ण थोड़े ही हैं कि दही के बारे में बतायेंगे। राम हैं। यहां तो कृष्ण भी कुछ नहीं बता पाये। "

साहब का ठहाका गूंजा। मास्टर भी जोर जोर से हंसने लगे। प्राचार्य मुस्कराये। उनको पता था कि रामकुमार को आवश्यकता से अधिक समझदार दिखने की आदत है। अब फंसों बेटा दही में। जो कहोगे गलत ही कहोगे। गलत के सिवा कुछ नहीं कहोगे। रामकुमार के पास चुप रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। चुपचाप मुस्कराते रहे अर्थात जानता तो मैं सबकुछ हूं लेकिन बड़े साहब की बात का जवाब देना मुनासिब नहीं है। बड़े साहब ने देखा कि उनकी बातों का जवाब मास्टरों के पास नहीं है तो उन्हे हार्दिक संतोष हुआ। अपने आप पर गर्व कर चुकने के बाद उन्होंने उत्तर देना ही उचित समझा-

-" रामकुमार ! दही तो मथुरा, कानपुर , आगरा जनपदों में अधिक पसंद की जाती है। अच्छा बताओ मुझे यह कैसे पता। मैं तो कभी उधर गया भी नहीं। तुम बैठ जाओ। आप के बगल में गणित के शिक्षक हैं। ये तो हरफनमौला आदमी हैं। बतायेंगे। इन्हें पता भी होगा। कैलकुलेशन करके बताइये कि मुझे दही के बारे में इतनी सही जानकारी कैसे है ? "

गाणित के शिक्षक आजाद जी की घिग्घी बंध गई। भला दही का कैलकुलेशन कैसे होगा ? अजीब अहमक आदमी है। ज्ञान का आयाम कैसे मापा जाये। उन्होंने अपने अनुभव का प्रयोग किया -

-" सर ! आप ज्ञान के सागर हैं। आपको मापने की क्षमता भला किसमे हैं ? मेरे जैसा साधारण मैथ का मास्टर कैसे माप सकता है ? आप तो सर्वज्ञ हैं। आप ..........।"

-" बस बस आजाद साहब ! दही के बदले में इतना मक्खन काफी है। आप सोचिये तो आपको भी पता चल जायेगा कि दही मथुरा जनपद के लोग ही क्यों पसंद करते हैं ? सोचना सेहत के लिए आवश्यक क्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति को सोचना जरूर चाहिये। "

सारे शिक्षक यह सोचने में व्यस्त थे कि दही मथुरा जनपद के लाग ही क्यों अधिक पसंद करते हैं। प्राचार्य यूं तो बेफिक्र दिख रहे थे लेकिन मन ही मन सोच रहे थे कि मथुरा जनपद के लोग क्यों पसंद करते हैं। दही उनको भी पसंद थी। मगर इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया कि यह सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी में भी शामिल हो जायेगा। तभी साहब ने ही इस सस्पेंस को तोड़ा -

-" आप सबको जानकर खुशी होगी कि मैंने तुक्का मारा था। कृष्ण मथुरा के थे। उनको दही इतनी पसंद थी तो हो सकता है कि उनके क्षेत्र के लोगों को भी दही पसंद हो। बस बात इतनी ही थी। हमने तो आप सबके आत्मविश्वास की जांच की थी। खैर , आजाद साहब के बगल में कौन है ? "

-" जी...मैं संगीत शिक्षक मनोज कुमार। मैं...........।"

-" भई आपका नाम ही कला और सिनेमा को पहचान देता है। मनोज कुमार ने तो ऐसी ऐसी फिल्में दी हैं। मैं तो उनका मुरीद हूं। 'क्रांति' और 'पूरब और पश्चिम' तो उनकी महान फिल्में हैं। आप जानते हैं कि मनोज कुमार पंजाबी हैं। देवसाहब भी पंजाबी थे। गुजर गये। भारतीय सिनेमा को एक महान क्षति हो गई। उनकी अदायें तो अनोखी होती ही थीं। हर फिल्म में कुछ न कुछ मैसेज जरूर देते थे। अब तो जमाना ही रसातल की ओर जा रहा है। खैर ! आप क्या गाते हैं ? "

-" जी....मैं तो गीत गाता.....हूं। "

-" अच्छा आपको पता है कि तानसेन क्या गाते थे ? "

-" जी...वो तो मियां की तोड़ी और ध्रूपद के उस्ताद थे। मुझे............।"

-" आपको क्या ? आपलोग बस गाते हैं। अपने ज्ञान को कभी मांजते नहीं हैं। अजी साहब मियां की तोड़ी और ध्रूपद तो उनकी इजाद ही है। मेरा प्रश्न है कि वो गाते क्या थे ? "

मनोज कुमार के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं जिससे कुछ शिक्षको को रक्तचाप सामान्य हुआ। धड़कने मधुर संगीत की तरह बजने लगीं। अब बच्चू का क्लास होगा। और गाओ मियां की तोड़ी और ख्याल। गज़ल। लीजिये अब भुगतीये। मगर सबको आश्चर्य हुआ अचानक साहब ठहाके लगाने लगे। जोर जोर से गगनभेदी ठहाका।

-" अजी मनोज साहब ! मियां तानसेन भी आपकी तरह गाना ही गाते थे। अच्छा बंधुओ ! समय की कमी के कारण मीटिंग हमें बीच में ही छोड़नी पड़ेगी। आशा है आप सब अपने आप को सुधारेंगे। शिक्षकों को हमेशा अप टू डेट रहना चाहिये। ज्ञान की सीमा पर खड़े मत रहिये। उसके अंदर प्रवेश कीजिये। हमेशा कुछ न कुछ सीखने के लिए तैयार रहिये। मगर आजकल तो शिक्षक.............। खैर, आपलोग अपनी रिपोर्ट प्राचार्य को सौंप दें। "

इस प्रकार एक मीटिंग सम्पन्न हुई। बड़े साहब की हर मीटिंग एक अमिट छाप छोड़ जाती है।

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर ,

नांदेड़ पिन- 431736 मोबाइल नं-7387311701

10 blogger-facebook:

  1. लाजवाब प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं

  2. बहुत उत्तम व्यंग रचना ,बधाई
    निर्मला सिंह गौर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी हास्य व्यंग रचना ,
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं

  4. बहुत उत्तम व्यंग रचना ,बधाई
    निर्मला सिंह गौर

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. अब तक का सबसे अच्छा ब्यंग इस वेबसाइट का
    लेखक को धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------