रविवार, 10 नवंबर 2013

पखवाड़े की कविताएँ

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गुरु दयाल कपूर

अंगद का पैर

न गाँधी की फौज में हूँ मैं
न मोदी की आँधी में
न आडवानी की ज़िद में हूँ
न थर्ड-फोर्थ फ्रंट की चाँदी में
मैं किंकितविमूढ़ खड़ा हूँ
अपनी मुहर लगाऊँ क्यूँ, किसपर
अपनी यह अनमोल संपदा
बोलो आज लुटाऊँ क्यूँ, किसपर

मज़दूरों की काया से
भू
पर जो पसीना गिरता है
बढ़ कोई माई का लाल
मुझे
बतलाए जात पसीने की
बतलाए धर्म पसीने का

कभी सियासत मंदिर की
तो
कभी सियासत टोपी की
आम आदमी जेब टटोले
देखे कीमत रोटी की


खाली पेट
दम ईमान का भर
जाने कितने आते जाते हैं
पेट जरा भर जाने पर
देश को
घपले/स्कैम की टोपी
पहनाते हैं

ढूँढ़ रहा हूँ
बड़ी भीड़ में
वो अंगद का पैर कहीं
जो दलदल में भी अड़ा रहे
धर्म, धर्म-निरपेक्ष आँधी में भी
जो निश्चल सा खड़ा रहे

मंदिर-मस्जिद गिरजों गुरुद्वारों की
रौनक यूं ही बढ़ी रहे
मगर पसीना बटे नहीं
ये
प्यार –मुहब्बत घटे नहीं
 
उस दिन अपना सीना ताने
मतदान केंद्र पर जाऊं मैं
और शान से
मतदान पत्र पर
अपनी मुहर लगाऊँ मैं।।।।।।।


•    गुरु दयाल कपूर

gdayal_kapoor@yahoo.co.in

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सीमा सक्सेना


तुम शामिल हो चुके हो
तुम शामिल हो चुके हो
मेरी जिन्‍दगी में मेरे दिल में
मेरी रातों में मेरे दिन में
अब स्वप्न ही स्वप्न हैं आँखों में
जर्रा-जर्रा, कण-कण में दिखते हो तुम
एक कहानी सी बन गये हो
मेरे जीवन में
एक छाया की तरह हो मेरे आस-पास
मेरे हर प्रसंग में
मेरी हर खुशबू में
मेरी खाने की थाली में
पीने के पानी में
फूलों के उस गुलदस्‍ते में
जो मेज पर सजा है
मेरे कपड़ों के रंगों में
मेरी हरेक बातों में
नाम है तुम्‍हारा
हर अणु में कदमों की हर राह में
मेरी आँखों में मेरे मन में
मेरे आसमाँ में मेरी जमीं में
पेड़ पौधे नदी नाले
मेरी हर धड़कन में
हर सांस में
कितना छुपाऊँ फिर भी
हर लम्‍हे में शामिल हो तुम।

 

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सीताराम पटेल


मुर्दा का घर
(1)
चुनाव देव
करूँ प्रणाम तुम्‍हें
दर्शन देना
हर साल हमको
बदूँ बकरा
(2)
भोंपू बजाते
मंदिर पधारना
हो हल्‍ला शोर
गुल से नहीं डर
जय हो जय

(3)
दूँगा प्रसाद
शराब और खून
बड़ा भजिया
चना चरपटियाँ
बकरा झोर
(4)
देवदासियाँ
अति खूबसूरत
स्‍वर्ग अक्षरा
कामकला प्रवीण
सेवा तत्‍परा
(5)
देवों के देव
महान भक्‍त हम
खून की नदी
तेरे लिए बहाते
प्रसन्‍न पाते
(6)
हे महादेव
हम महारावण
दो वरदान
प्रभुता पाएँ हम
देना ताकत
(7)
भूख गरीबी
हमेशा बनी रहे
आम आदमी
भ्रष्‍टाचार कीमती
हो परेशान


(8)
मात्र कंकाल
भारत की तस्‍वीर
फटा पताका
भूखे नंगे बेहाल
बहाएँ धन
(9)
साधु संन्‍यासी
लूट रहे अस्‍मत
देवी के देश
नाम रखते बापू
बेटी लूटते
(10)
अखंड देश
खंड खंड पाखंड
एक हैं हम
टुकड़ा में बँटा
देश हमारा
(11)
धोती कुरता
चकमक सफेदी
दिन सा धुली
रँगे हाथ हमारे
हल्‍दी या खून
(12)
गूंगी बहरी
बनती सरकार
चुनना नहीं
कहता हूँ मैं यार
गाँव शहरी
(13)
मड़वारानी
कैसे करे नादानी
पुजारी हम
घड़ियाल बजाएँ
नारा लगाएँ
(14)
स्‍वतंत्र भारत
ताली पीटते अन्‍या
रूप सौन्‍दर्य
ठूंठ हाथ पांव
भीख माँगते
(15)
नारी सम्‍मान
दहेज बलात्‍कार
भ्रूण की हत्‍या
वंचित अधिकार
रिश्‍ते में फाँस
(16)
चुनाव देव
सब तुम्‍हारी लीला
लड़खड़ाते
सांसारिक मानव
लगाते टेर
(17)
अनेक हाथ
पर सिर हैं एक
कुर्सी है लक्ष्‍य
जला अगरबत्‍ती
पूजते हम
(18)
अपहरण
चुनावी शिष्‍टाचार
तरसे लोग
धन की बरसात
आपकी माया
(19)
मुर्गे की टांग
बकरे का कलेजा
मछली माथा
शराब की बोतल
हूर शबाब
(20)
असमानता
नर नारी समान
बालिका वधु
असत्‍य आरक्षण
हमें है खेद
(21)
सत्‍ता की डोरी
मुजरिमों के कर
चाहे जितना
छटपटा ले कोई
आम आदमी
(22)
आशा विश्‍वास
जीने की जरूरत
ईमानदारी
सभी को है जरूरी
विकास देश
(23)
अपनापन
आकर्षित मानस
स्मृति तुम्‍हारी
जाता नहीं मगज
क्‍या करें हम
(24)
दिल के तार
जुड़े हैं बिना तार
दिल बेकार
हुआ मालूम तुम्‍हें
चुनाव यार
(25)
जिन्‍दा हैं लोग
पता चला क्‍या तुम्‍हें
धूल उड़ाती
सड़क में आई कार
फूल बरसा
(26)
चुनावी चित्र
बता कहाँ है मित्र
माथा में मैल
कुछ कम है दिल
लोढ़ा में सील
(27)
घना अंधेरा
जिन्‍दगानी है मेरा
होगा सबेरा?
एक लगाओ फेरा
गोधूलि बेला
(28)
अकेला मन
अँधेरे से डरता
चल भीतर
उजाला पकड़ ला
फैला प्रकाश
(29)
चुनाव चिन्‍ह
कंकाल है किसान
शव जवानी
माफिया कर योग
मुर्दा का घर
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अखिलेश प्रताप


1.ईज़ाद उनकी
उन्होने ईज़ाद किया छूरा,
हलाल करने को बकरा,
एक जतन
धंधा बढ़ाने का, फंदा फैलाने का,,
कमाल उनका
इन्द्रजाल उनका,
कि गुन गाते हैं बकरे भी
उनके ईज़ाद छूरों के।।
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2.कुछ संजो लूं
सोचता हूं
अपने वर्तमान के
कुछ मोती कुछ फूल
कुछ गीत कुछ संगीत
कुछ चित्र कुछ चिंतन
चुन लूं
और संजोकर रख लूं
क्या पता
जब लम्बे गह्वरों में उलझते फसते
ललक गहरायेगी रोशनी की
तब ये काम आयेंगे
और फिर एक ग्रह को दुनियां बनायेंगे,,
अभी तो लोग मशरूफ़ है
सर्वव्यापी नशे की जानिब
अभी फुरसत कहां, साफ देखने की, साफ सोचने की।।
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3. क्या आप भी
भगवान का अस्तित्व
निराधार,
स्वर्ग नर्क की अवधारणायें
बेकार,
सबका आधार,
भरम का व्यापार,।
शासन व्यवस्था का सच
आप भी जानते हैं,
छुप सकता है असली चेहरा
हम भी मानते हैं।
आप स्वतंत्र हैं
हम स्वतंत्र हैं
इन बातों से,
रीति नीति, कानून की घातों से,
बस लिपटे है
आदमी होने की शर्तों से,
क्या आप भी??
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4. ताजा दम
कुछ आँखें, बरस चुकी हैं
कुछ ओठ, सुबक चुके हैं
अब वे ताजा दम हैं,
वह सब कुछ करने के लिये
जिससे
आँखे बरसती हैं
और ओठ सुबकते हैं।।
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5. तीर तरकश के
समस्यायें अनेकानेक नजर आती
अपने आस-पास की, दूर-दूर की,
समाधान भी ओझल नहीं होते,
पर ज्यों ही आगे बढ़ता
आत्म-चेतना जगा, देह में दम भरता,
त्यों ही अटकने लगता,
रोटी-पानी, शिक्षा, चिकित्सा पर,
फिर बिलाने लगता
मुश्किल से आकार पाया अस्तित्व,
फिर कुहासे में घिर जाती, मार खाती आत्म चेतना,,
नित-नित वार कारगर रचती
नियामक सत्तायें भाँति-भाँति की,
गहरे तिरछे मुस्काती
और गहरे संदेश गुंजाती,
हमसे नाता जोड़ो ऐश करो,
अन्यथा अभी बहुत तीर हैं, हमारे तरकश में।।

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6. पेटेंट प्यार का
अब कोई सहज ही प्यार नहीं कर सकता
कि हमने प्यार को पेटेंट करा लिया है,
क्या कहा,
मन की सहज भावना है
कब की बात करते हैं जनाब
अब नया जमाना है
अनियमितता को हटाना है।
जीने के लिये कुछ करना है जरूरी,
सो डाल ली दुकान यही
कीमत भी काफी कम रखी
रही मजबूरी,
चीजे उपयोगी दुनियादारी की
पेटेंट हो चुकी थी पहले ही
चल निकली थी वो दुकानें भी,
मैं मौका पकड़ नहीं पाया
बस प्यार ही पेटेंट करा पाया।
सोचा था दुकान चल जायेगी
अपनी भी गाड़ी सरक जायेगी,
उम्मीद बंधी थी
बेशुमार युवाओं से, कुछ फिल्मी महानुभावो से,
पर युवा जाने कैसा प्यार मांगते हैं
और वेरायटी न पाकर खिझला जाते हैं,
और रहे फिल्म वाले
न तो इधर ताकते हैं
न ही भाव आंकते हैं
कहते हैं नाम ही काफ़ी है।।
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7. प्यार किसी से
ये सच है कि
उनका नहीं था लम्बा साथ
पसरी पसरी उम्र में, कुछ लम्हों की बात
न खून का रिश्ता न समाज सम्मत नाता
पर उम्र के फैले रेगिस्तान में
अब भी जो रस आता है
जीवन सह्य हो जाता है
तो दूर के उसी क्षीण किंतु अक्षय सोते से।
किसी जलते घर से हाथ नहीं सेक पाता
कोई गला नहीं दबा पाता
याचक को दुत्कार नहीं पाता
पातक की प्रशस्ति नहीं गाता
शायद इसलिये कि, मैंने किसी से प्यार किया था।
झूमते हैं सपने आंखों में,
हरीतिमा सर्वजयी हो जाये
कैक्टस भी रहे, गुलाब लहराये
बढ़ते नर्क के ताप को, कोई पयस्विनी शीतल कर जाये
शायद इसी से कि मैंने किसी से प्यार किया था
जिस्म हथियाने की ज़िद नहीं पाली थी।
कैसा रिश्ता, कैसा साथ,
हार हार जाता हिसाब,
फूलो संग झूम जाना
जलधार को सहलाना
पशु पक्षियों से भी बतियाना
कोई चेहरा वैरी न ढूंढ़ पाना
ये अज़ीब वाक़यात होते हैं मेरे साथ
शायद इसी से कि मुझे किसी से प्यार हुआ था।
क्या पाया क्या गँवाया
बेकार इसका हिसाब
बस एक गहन एहसास
मन में, जीवन में, समाया
एक स्निग्ध मधुरिमा मूर्तिमान हुयी है
फूल में कि शूल में वर्तमान रही है
इसी से कि
मुझे किसी से प्यार हुआ था
जिस्म हथियाने की ज़िद नही जगी थी।
कुछ टुकडे धरती
चंद दीवारें, थोड़ी हरियाली
कुछ फुहारें
बस थोड़ा सा ब्यौरा
मामूली सा इतिहास
एक कहानी का, जो बीत गयी है,
पर अज़ब कीमियागीरी कर गयी है
एक छवि बहुमुखी हुयी है
और जिंदगी सरहदों के पार गयी है।।
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8. मान्यवर आये
मान्यवर आये,
बगूले उठे, बादल सिमटे
हवा हांफी, धरती कांपी
आकाश हड़बड़ाया, इंजन घड़घड़ाया
सड़कें घिरी
गलियां चिढ़ी,,
ऊपर से नीचे तक की
पायदाने शासन की,
खड़खड़ायी,
इधर भागी उधर दौड़ लगायी,
उद्घाटनी स्थल चमके
शिलान्यासी पत्थर दमके,,
खास जन आगे हुये
आम जन सीमा में नपे।
मान्यवर गये,
कुछ निहाल हुये, कुछ बेहाल हुये
ऊपरी पायदाने शासन की
फिर उबासी लेने लगी,
और निचली फिर खो गयी,,
उद्घाटनी स्थल औक़ात में आये
शिलान्यासी पत्थर, फिर पत्थर हुये
घोषणायें पटरी पर पड़ी
असलियत दो कदम और आगे बढ़ी
चंद क्षणों तक शासन चक्र घूमा
फिर पूर्व विंदु पर जमा,,
एक भव्य शो खत्म हुआ
महंगू रोटी में गुमा।।
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9. विलाप रुका हुआ
जब-जब कोई गीत
कुछ ही पुराना,
कानों में पड़ता, दिल में उतरता,
तब-तब फूट पड़ता
फिर-फिर
विलाप रुका हुआ।
गीतों के बोल सरल
राग मधुर
तन मन पर ज्यों छाने लगती
फुहारें, खुशबुयें, चांदनी,
सहसा एक झटका,
यह समय है दूसरा,
इस युग में संगीत या कि शोर
झूमते कूदते लोग,
क्या खूब रिश्ता शोर औ आधुनिकता का
कितना बचा रिश्ता गीत औ कायनात का।

बेमुरव्वत लालसायें ज्यों टूट पडी हैं
सारी सरलता और सुघरता पर,
आज फिक्र कितनी?
कि कल बस बात होगी
इस धरती पर एक देव नदी थी
अतुल्य, अनुपम, सदानीरा, वंदनीया
गंगा
फ़ना हो गयी
ज़िद औं स्वार्थ में विकास सेनानियों के।.................
धरती के सीने पर धमाचौकड़ी विकास सेनानियों की
यूं कि, लगती बात बस कुछ दिन की
सुजलाम, सुफलाम, मलयज, शीतलाम...........................
बस दिन आखिरी।
आत्महंता विकास की वीरानियों बीच,
सुकून हीन शोर बीच,
भावशून्य शिष्टाचार बीच,
विचार कुविचार अभेद बीच,
प्यार.........
नहीं मेरे यार।
नहीं मेरे प्रिय
मेरे बस की बात नहीं, प्यार
सपाट निचाट हाइवे पर,
या आत्मघाती अहंजनित भव्य स्तूपों पर,,
जब से हुआ साक्षात् मेरा
ढाई आखर के वेद का,
जब तब फूट पड़ता
विलाप
किसी तरह रुका हुआ।।
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10. हलाल या झटका-
शासन है,
व्यवस्था है,
ऊपर से नीचे तक सार्वभौम रस्ता है
हलाल का।
वे अहमक
जो व्यवस्था में जगह बना नहीं पाते
या अपनी मजबूरी पचा नहीं पाते
या अड़ जाते अपनी इयत्ता पर ही
वे राह अपनाते दूसरी,
झटके की।
बावजूद सारे वादों, सारे नारों, सारे दावों के
विकल्प
जनता जनार्दन के लिये
सिर्फ दो ही,
हलाल या झटका,
आजाद हो
जैसे चाहो वैसे मरो।।
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11. संसद का भूत
एक रात, विचार खदबदाये
और पैर हरकत में आये
इधर उधर घूमते, सन्नाटे को सूंघते
जहाँ तहाँ गुजर गया
संसद भवन पर ठहर गया,
सोचा जरा अंदर भी देखा जाये,
सोते लोकतंत्र का हाल लिया जाये।
भव्य हाल में कुछ चांदनी आ रही थी
ऊँघती मेजें कुर्सियां अपनी पीड़ा मिटा रहीं थी।
मैं भी भूलकर भवन की व्यथा,
बुनने लगा कोई सुहानी कथा,
इतने में भवन कांपा, अंधड़ आया
मेरे आगे एक विशाल भूत उतर आया
मैं हतप्रभ, कँपकँपाया,
क्या सोचा क्या पाया?
भूत को शायद तरस आया
धीरे से मेरा कंधा थपथपाया,
जब मैं थोड़ा संभल गया,
तब प्रश्न कई पूछ गया,
तुम कौन हो, क्या करते हो?
यहां क्यूँ रहते हो, कैसे खाते पीते हो?
भूत शायद फुरसत में था, इत्मीनान से उत्तर दिया।
यह आलीशान भवन मुझे पसंद आया
इसलिये यहां बसेरा बनाया,
मैं कुछ नहीं करता,
करते वो हैं जो यहाँ आते हैं,
भूख-प्यास मुझे भी है सताती,
पर सामान्य खुराक मेरी पूर्ति नहीं कर पाती।
मैं एक शापग्रस्त भूत हूं
कुछ विशेष चीजें ही पी खा पाता हूं
मजबूरी में, आत्मा खाकर भूख मिटाता हूं,
और आंखों की शर्म पीकर प्यास से पार पाता हूं,
यहां आने वालों की आत्मा खाता हूं
और महानुभावों की शर्म पी जाता हूं।
मुझे बेहद गुस्सा आया, चेहरा तमतमाया
यानी देश के कर्णधारों को निराधार करने वाले तुम्हीं हो
इस देश का बंटाधार करने वाले तुम्हीं हो,,
देशभक्ति का ज्वार यूं गहराया, कि भूत सकपकाया,
फिर समझाया
मेरे विशाल शरीर पर न जाओ
मेरी हालत पर तरस खाओ,
मैं एक शापग्रस्त कमजोर भूत हूं
शाप की शर्तों से मजबूर भूत हूं,
मैं किसी की आत्मा स्वेच्छा से नहीं खा सकता हूं,
व्यक्ति जब चाहे, जितना चाहे, उतना ही पा सकता हूं।
हां इतना अवश्य ही खुसनसीब हूं, इस जगह का मुरीद हूं,
यहां आनेवाले बहुधा निराश नहीं करते हैं
अपनी आत्मा खुद ही निकाल कर चल देते हैं,
आँखों की शर्म की भी उन्हें जरूरत नहीं होती,
सो मुझे भी प्यास मिटाने में दिक्कत नहीं होती।
फिर अचानक भूत के चेहरे पर मायूसी छायी
बोला, तुम तो दुनिया देखते हो भाई
कहो, क्या समय इस तरह बदल रहा है वाकई??
अब तो बड़ा अजब होता है
जाने कैसे ये गजब होता है,
अब बहुतेरे यहाँ ऐसे आते हैं
जिनका शरीर तो दिखता है, आत्मा का पता ही नहीं चलता है
न जाने कहाँ से चले आते हैं,
आत्मा कब कहां निकाल आते हैं?
वही स्थिति शर्म की भी होती है
बेशर्मी उनकी सदा की नियति होती है।
फिर भूत मुस्काया, ज्यों राज की बात बताया
जो लोग आत्माहीन हो जाते हैं
जल्द ही बड़े लोग हो जाते हैं,
तुम तो बड़े लगते नहीं, संसद या आसपास दिखते नहीं
यदि तुम भी अपनी आत्मा छोड़ जाओगे
तो कुछ मेरी भी भूख मिटाओगे
और जल्दी ही बड़े हो जाओगे।।
मैं भारी मन बाहर आया,
फिर घर पहुँच न पाया,
गली, सडक घूमता हूं,
चेतन आत्मायें ढूंढता हूं।।
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12. जादू
जादू का शो शुरू हो चुका है
जादूगर गुंजित आवाज में कहता है
अब मैं जो चाहूंगा,
आप वही देखेंगे
आप वही करेंगे
आप वही कहेंगे।
मेरे साथ एक हादसा होता है,
जादू का मंच फैलता जाता है
सारी दुनिया, जहां तक
और ऊँची-ऊँची जगहों से
हर वक्त हर जगह
यहीं आवाज आती, गूंजती घहराती
तुम वही देखोगे
वही करोगे
वही कहोगे
जो हम चाहेंगे।।
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13. घिघियाता सच
आँखों देखी या कानों सुनी में
हाहाकारी गति से
कई-कई रूपों, कई-कई रंगों में
बढ़ता जाता हिस्सा असत का
या भ्रमपूर्ण सच का,
लुटेरे सक्रिय हैं, पूरे आत्मविश्वास से
मुस्कुराते हुये और अपनी क्षमता बढ़ाते हुये
बेहयाई की परिभाषाओं को नाकाफी बनाते हुये,
चारों तरफ से झूठ उंड़ेलते इतना
कि सच दबता गया, जाने कहाँ गया
अब चर्चा में भी हास्यास्पद हो गया,,
जीवन के दिन काट रहे बौद्धिक जन
या फिर अपनी क्षमता का उपयोग करते
और साम्य बिठाते राजा लुटेरा के अद्वैत से
असरदार काकटेल तैयार करते, सच झूठ की,
शायद उन्होंने जान लिया है,
कि घिघियाते सच का भी क्या हाल हो सकता है।।
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14. चुनाव
चुनाव हो चुके
छंटने लगा भ्रम खुद मुख्तारी का
वोट दिया, किसे दिया क्यूं दिया,
एक सम्मोहक तमाशा था
जिसमें कोई भी अपना न था,
बनेगी फिर सरकार नई
रहेगी कहानी पुरानी की पुरानी
कोई नृप होय हमें तो हानी।
कुछ खिसियाकर, कुछ मुस्काकर
उन्होंने आपस में भूमिकायें बदल ली
लोगों को लगा था, दुनिया बदल गयी।।
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15. दोनों ओर
लड़ाई बंद हुयी
लंबी रात गयी,
कहीं विजयोत्सव, हर्ष के नारे,
कहीं मातम, चीत्कारें, धिक्कारें।
कितने किस तरफ मारे गये,
कितने किस तरफ शहीद हुये,
किसने क्या क्या ढहाया
किसने क्या क्या बचाया,
कौन कैसे बचा, किसने किसे छकाया।
एक तरफ फैलने लगी गाथायें, जय की
दूसरी तरफ पसरने लगी दीमक, पराजय की।
कहीं तमगे मिले
कही बिल्ले नुचे,
एक ही काम, भिन्न परिणाम।
आदमी ही मरे मराये, दोनों ओर,
फूल मुरझाये, बंजर इठलाये, दोनों ओर,
घर लुटे, खेत उजड़े, जंगल नुचे
जल्दी ही वयस्क हो गये कितने बच्चे
दोनों ओर,
कितनी आँखों की आस गयी
कितने मनों की साध गयी
दोनों ओर।
कितने शहर उजड़े (सभ्यता के फलक)
कितने ग्रंथ फुकें (प्रकाश के जनक)
दोनों ओर।
कितना हिस्सा जीवंत वर्तमान, भहरा गया एक झटके मे
इतिहास की दृढ़ निर्मम खोह में,
दोनों ओर,
कितनी सरल आँखें दुनियादार हुईं
जिन्दगी अनचाहा अर्थ गही,
कितने अनायास खिलने वाले अधर
बात करने लगे सोच समझकर
दोनों ओर।
........................................................
कितना हिसाब, कैसा हिसाब,
नारे खूब गूँजे थे
आदर्शों के, स्वाभिमान के,,
युगों से पर्त दर पर्त जमी या जमायी हुयी
देश-भक्ति की भारी गरिमामयी चादर तले,
चलता बड़ा खेल
किनके स्वार्थों का ?
किनके अहंकारों का ?
हर ओर।।
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16. जब भी
कभी-कभी जब भी खोजने लगता अपना देश
एक मुकम्मल देश,
फिर वही हताशा
फिर कुछ दुरुस्त नजर न आता,
एक देश सा,
बहुत मेहनत की है, पैंसठ साल में
हमारे हुक्मरानों ने,
निर्बाध सत्ता बनाने में
मनचाही व्यवस्था बनाने में
एक भूभाग को देश बनने से बचाने में।
इस तथाकथित देश में,
हारे हुये नवाब
अपनी सुविधाओं सहित व्यस्त है
शह मात के आपसी खेल में,
और सत्ता के शीर्ष पर बैठा
हमराह कंपनियों का,
गड़प करता जा रहा मनचाहा
योजनानुसार आराम से,,
इतिहास दुहरा रहा फिर से
अपने आप को
और घनीभूत विद्रूपता से।।
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17. मेरे महबूब, मेरे दोस्त
मेरे महबूब, मेरे दोस्त
अब हम क्या मिलें,
क्या गुनें,
अपनी यादें
अपनी बातें।
खो रहीं वे संज्ञायें
जो हम थे
जो तुम थे,
बाजारों ने फँसाया, तमन्नाओं ने दौड़ाया
हमको भी, तुमको भी
आँख बाँध कर
जाल फाँस कर
कुछ इस कदर
कि सिद्धान्त गल गये,
विचार थम गये।
फिसल गया स्तर
घूम गया चक्कर
बुद्धि का, इस कदर,
हमारा भी तुम्हारा भी,
कि हम भी आये नजर
उसी तरफ,
जिसकी माया छाँटने को,
बंध काटने को,
हम मिले थे
संग चले थे,
और खिला था, हमारा अस्तित्व।
..................................................
गनीमत बस यही है
कि जो राख दबी है
उसमें छिपी है वो चिंगारी
अब भी,
जिसकी चमक भाती है,
सरल सुरों में कह जाती है ;
अगर फूल खिलेंगे तो हम भी महरूम न होंगे
सुगंध से,
और, सारी की सारी ठेकेदारी रेगिस्तान की
नहीं काम की,
न हमारे
न तुम्हारे।।

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18. शब्द थक गये हैं
लहरों पर लहरें
सहानुभूति के शब्दों की
बहते आते, जहाँ तहाँ से, शब्द संवेदना के,
पल-पल, पग-पग, मिलते जाते
प्यार की बातें, दोस्ती के वादे,
बस बातें ही बातें
बाहर-बाहर विद्रूप गहराता
भीतर सन्नाटा पसरता जाता।
शब्द की शक्ति से इन्कार नहीं
पर इस दौर में इस की अचूकता स्वीकार नहीं
शायद शब्दों की शक्ति ज्यादा खर्च हो गयी हैं
अब ये पीछे लौटकर, और विपरीत अर्थ देकर
क्षतिपूर्ति कर रहे हैं,
या निष्क्रिय होकर स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं।
कभी-कभी आशंका उभरती गहरी
क्या शब्द थक गये हैं?
अपना जीवन जी गये हैं
मर्म छोड़ चुके है, अर्थ खो चुके है,?
प्रश्न और गहरे उपजते
थके या मरे शब्दों से, कब तक काम चलेगा?
इनमें सम्यक अर्थ कौन भरेगा?
सभ्यता कब तक यूँ ही चलती जायेगी?
अर्थ की तलाश में कब तक बौरायेगी??
00----------------------------((0))--- ------------------------00

19. नया व्याकरण
हथियारों से लैस प्यासे लोगों ने
हमले किये संतुष्टों पर,
साथ-साथ रचना भी नये व्याकरणों की,
नये समीकरणों की,
अब बात नयी
संतुष्टि गुनाह, प्यास ही विकास।
पूंजी संवलित नवजात उच्श्रृंखलताएं
रास्ता  दिखा रही
प्रशस्त पथ-दर्शना पुरातन तहजीबों को,
तहजीबें खिरती जा रहीं
पर प्यास ऐसी की पूरी होने को ही नहीं।
डगमग पग सभ्यतायें
फूली अहंकार से
लैस हो पूँजी के सर्वग्रासी हथियारों से,
घहराती आती
सहस्त्राब्दियों की संजोयी विरासत पर,
उन्हें सवाल नहीं स्वीकार अपनी प्यास पर
अरे नहीं विकास पर,
नये नारों से हांकी जा रही धरती
नये व्याकरणों में फांसी जा रही धरती।।
00----------------------------((0))--- ------------------------00

 

मनीस पाण्डेय


कागज पर / ग़ज़ल

हमारा इश्क प्यार कागज पर।
हमारा कारोबार कागज पर॥

नकद तो नहीँ लिखा जाता।
हमारा है उधार कागज पर॥

कौन करता है इजहार खुलके।
सभी हैँ बेकरार कागज पर॥

सगा भाई भी हो गया दुश्मन।
उठी घर मेँ दीवार कागज पर॥

बीज दंगोँ का बो दिया किसने।
मजहबी काट मार कागज पर॥

नफरतोँ ने किये हैँ रंग फीके।
अब तो बस हैँ त्योहार कागज पर॥

मनीस इश्क मुझे है तुझसे।
लिख दो बस एक बार कागज पर॥

- मनीस पाण्डेय
पता- शिवगढ़ (लालदास), पोस्ट- दरछुट, तहसील- पट्टी, जनपद- प्रतापगढ़ (उत्तर
प्रदेश) 230405, मो फोन सं 09711720520, E mail-
mnspandey24@gmail.com


--------------------------.

ईश्वर शरण शुक्ल


हे गंगा !
हे गंगा! तुम कितनी अनुपम
कितना करती काम।
आपके पावन दर्शन से ही,
मिल जाता आराम ।
कितनों की हो रोजी-रोटी ,
विपदाओं को करती छोटी
न कहना तुम नहीं जानती
न कोई प्रतिबंध विराम ।
आपका जल कल-कल नित करता
पवन थपेड़ो को अति सहता
अमृत जल को भर कर रख लें
युगों-युगों तक आता काम ।
हे गंगा! तुम कितनी अनुपम
कितना करती काम।।
आपकी गोदी में असंख्य
जल-चर भी जीवन जीते।
ऋषि से लेकर कृषि जगत तक
सब जन पानी पीते ।
पर सेवा में रत रहती तुम
पाती उच्च मुकाम ।
सकल फूल-फल ,माला, मूरत
हर मुंडन का बाल ।
धूप,दीया,घी अमृत चंदन
संगम तक का पुवाल।
सब कुछ सहर्ष भाव से लेकर
देती हो विश्राम ।
हे गंगा! तुम कितनी अनुपम
कितना करती काम।
मानव के निर्जीव देह को
तुम तारण कर देती ।
आपके आंचल में लावारिस
लाशों को मिलता आराम ।
मन की दुष्चिंता मिट जाती
आपको बस छूने से ।
हर प्राणी को सदा लगाती
स्नेहिल सीने से ।
परम आस्था की प्रतीक हो
हृदय से मैं करूँ प्रणाम ।।
हे गंगा! तुम कितनी अनुपम
कितना करती काम ।।

 


नारी की शौर्यगाथा

जननी मां की गाथा को कितना किस रूप बखान करूँ।
पुलकित कर दिया है कण-कण को किस-किस पर कितना गर्व करूै ।।
इनकी तप शक्ति िववेक कर्म से हिंद जगत में अमर हुआ ।
बह चली संस्कृ ति की धारा, उन्नति भी आठों पहर हुआ ।।

इतिहास गा रहा है गौरव, अति विरह सहा चौदह बसंत।
पति प्रति अनुराग भरे मन में, खाया है वन में मूलकंद।।
जन लोक विरूद्ध वरदान हेतु, अनुताप सह लिया सभा मध्य।
सह लिया प्रसव वेदना घोर, मर्यादा खातिर कुटी मध्य।।

नवदिशा प्रदान किया जग को , आदर्श शिरोमणि बन करके ।
कृतार्थ कर दिया जनमानस, ह्रदय में श्रद्धा भरकरके ।।
आंखो का तारा भेज दिया, अत्याचारों के नष्ट हेतु ।
सह लिया ममत्व की पीड़ा को ,बंध गया सत्य का अमर सेतु ।।

साधना शक्ति से देवों को रक्षार्थ बुलाया नंगे पद ।
पूरी कर पाये चीर नहीं, असुरों का मद हो गया पस्त।।
ली कठिन परीक्षा गुरूओं ने, धारण कर भेष तुम्हारी जब।
तप शक्ति से तुमने बना दिया, अबोध शिशु पल भर में तब ।।

यमराज को हरा दिया तुमने , अपने हट योग कुटिल प्रण से ।
पति प्राण को वापस करा लिया , तब हटी हो नारी तुम रण से।।
युग के अनुरूप महानारी, दिखलाया तुमने चमत्कार ।
कोमल ह्रदय नाजुक कर में , धारण भी की है खड्गधार ।।

 


दुश्मनों से रक्षा के खातिर दीवार ढहा दी धर्मो की ।
राखी से भाई बना लिया , इतिहास रच दिया कर्मो की ।।
स्वतंत्र दिवस के स्वागत में , थालियां सजायी थीं घर-घर।
आरती उतारी वीरों की , फूलों की वर्षा की झर-झर।।

लेखनी उठायी जब कर में ,विद्वता का कौशल दिखलाया ।
रस प्रेम भक्ति की रचना से, अध्यात्म जगत में फैलाया।।
वेदना गीत प्रकृति प्रेम अभिव्यक्ति जता दी रचना में ।
बन गयी नीर दु:ख की बदली छायावादी संरचना में ।।

जव लोकतंत्र में सत्ता की चेतना जग गई गांव-गांव ।
तब अलख जगाया तन-मन से परवाह किया न धूप छांव ।।
सतब्ध कर दिया दुनिया को , सत्ता सभांल कर भारत की ।
सत ् कोटि धन्य हो नारी मां, आदर्श संस्कृति भारत की ।।

 

योग के आयाम


योग बिना यह जीवन सूना,
योग से जीवन होता दूना।
योग ही तन है,
योग ही मन है,
योग परम संतुष्टि धन है।
योग विविध रोगों का नाशक,
कांति , तेज का अद्भुत शासक ,
सुंदरता का अभिवादन है,
चंचलता का यह मानक है।
योग है आनंदों का सागर,
अमृतमय यह अनुपम गागर।
जहाँ छलकता वहीं महकता
वंचित रहता वही तरसता ।
योग से हारी सभी दवाएं
नष्ट हो गयीं फूंक-दुवाएं
योग सकल प्राणी को भाए,
आधि-व्याधि को दूर भगाए,
योग स्वर्ग अनुभूति कराता,
जीवन को आदर्श बनाता।
योग सदा मन से अपनाएं
जीवन स्वस्थ, निरोग बनाएं।।

 

 

व्यंजनाभाव


क से कर्म करें नित अपना,
ख से खण्डित न हो सपना।
ग से गलती सदा सुधारें,
घ से घबराहट उद्धारें।
च से चरण छुएं गुरूजन का,
छ से छलके ज्ञान मनन का।
ज से जग में नाम कमाएं,
झ से झगड़ा सदा मिटाएं।
ट से टहले भोर पहर में ,
ठ से ठहर जाएं दोपहर में।
ढ़ से करें ढ़ंग से काम,
त से करें तरक्की, नाम।
थ से थल,जल,नभ पहचाने,
द से समझें दर्द सभी का।
ध से माने धर्म सभी का,
न से नष्ट करें कटुता को।
प से पढ़े पढ़ाएं सबको
फ से फलीभूत हो सबरस।
ब से बने नेक इंसान,
भ से भ्रम का हो बलिदान।
म से मदद करें जन-जन का,
य से यत्न करें बढ़ने का।
र से रखें उच्च विचार,
ल से लक्ष्य पर हो अधिकार ।
व से करें वतन से प्यार,
श से शरमाएं न यार।
ष से षष्ठी व्रत को जाने,
ह से हँसकर हाथ मिलाएं।
क्ष से क्षय को सदा बचाएं,
त्र से त्रस्त करें ने किसी को।
ज्ञ से बाँटे ज्ञान सभी को।।

 

ईश्वर शरण शुक्ल
हिन्दुस्तान, इलाहाबाद।
9935174896
---------------------.

 

मनोज 'आजिज़'


दिवाली  में सरहदों का दिवाला करें
------------------------------------------
                      

सरहदें हैं दिलों के दरम्याँ बहुत
दिवाली में सरहदों का दिवाला करें
हर शख्स है बदहवासी के अँधेरे में
मोहब्बत की रौशनी से उजाला करें
कुछ लोग पटाखों में आग की तैयारी में
कहो, ख़ुद की आग से वो सम्हाला करें
वो  जश्न क्या जिसमे सिर्फ़ पैसा शामिल
दिलों के जश्न से सबको मतवाला करें
ख़ुशियों के दिये जल उठे हर तरफ़
पुराने ग़मों से न खुद को मलाला* करें
*मलाला-- दुखी
--
यह तप नहीं तो क्या है 
                 
दारुण, वीभत्स, प्रतिकूल
पक्ष जीवन के
वाद, प्रतिवाद
सब सह रहा है वह
जी रहा है निर्वाक
यह तप नहीं तो क्या है !

गरजने की चाह मन में
तपने की ताप तन में
फिर अनर्थ न हो जाये
थाम लेता है खुद को
यह तप नहीं तो क्या है !

ज्वाला, अकारण ज्वाला में
जल रहा है
किसी की चिता पर ख़ुद लेटा है
अधमों के बीच उत्तम बन रहा है
यह तप नहीं तो क्या है !
-----------------------------------

मजबूर
 
पके केश, झुर्रियों से भरी देह
अधखुली आँखें
बदन पर टिकता नहीं
कमीज़ या पैंट
चालू दुकान, ढेरों ग्राहक
और कोने में प्लास्टिक टब लिए
बैठा एक सत्तर-बसंती
जूठे प्लेटों पर हाथ फेरता
चमकाता और दुकान कि रौनक बढ़ाता ।

शहर के पैसा-मंडी से
लपक नहीं सके
कभी---
कुछ पैसे
या एक बेहतर रोजगार ।

जब चलना है पोते-पोतियों के साथ
देकर अपना उनपर हाथ
प्लेट माँजते हैं-- चमकाते हैं
प्लेटों को भी, हर दिन भाग्य को भी ।
कितने आते, कितने जाते
बस, देखकर चुप रह जाते
खाते हैं, खिलाते हैं
उनका मुँह भर जाता होगा
लार से ।

धुँधली आँखों से टक-टक देखता
फिर गर्दन झुका
न हाथ न आँसू रुके ।


(शायर बहु भाषीय साहित्य सेवी हैं, अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका " द चैलेन्ज" के संपादक हैं और अंग्रेजी भाषा-साहित्य के व्याख्याता हैं । इनके ७ कविता-ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । )
पता-- इच्छापुर, ग्वालापारा, पोस्ट-- आर.आई.टी.
        आदित्यपुर-२, जमशेदपुर-१४ , झारखण्ड
फोन- 09973680146
मेल- mkp4ujsr@gmail.com


---------------------------------.

संजीव शर्मा


गीत
1
हाथों में मेरे खूँ की मेंहदी को तुम लगाना
मैयत उठेगी मेरी शहनाईयां तुम बजाना
ले खून का कटोरा तेरे दर पे रख दिया है
मेंहदी की रस्म को तू जरा धूम से मनाना
मैयत सजा के अपनी तेरे दर पे लौट आया
मेरी याद भी सितमगर एक पल में भूल जाना
मेरी बारात चलकर जब तेरे दर पे पहुंचे
एक सुर्ख सा दुपट्टा मेरी लाश पर उड़ाना
मजबूर होके मैंने तेरे दर पे जिन्दगी दी
मेरी मौत से तड़पकर आँसूं न तू बहाना
तुझे जिन्दगी मुबारक मुझे मौत रास आई
मेरी मौत का तमाशा देखेगा ये जमाना
मैंने निभाई तुझसे तूने मुझसे बेरुखी की
बेजोड़ आंसुओं को मेरी लाश पर गिराना
तूने क्यों मेरे दिलबर मेरे से दिल्लगी की
पूछेगा उस खुदा से एक बार ये दीवाना
मैयत उठाये दुनिया महताब बददुआ दे
ऐसे जहाँ में यारों अब किस से दिल लगाना
मिट जायेगा तसव्वुर मिट जाएगी मुहब्बत
मेरी मौत है अजीयत तेरी जिन्दगी फ़साना


मगरूर होके तूने एक बार भी न देखा
मायूस होके मैं तो तेरे दर से लौट आना
मिल जाये रास्ते में कोई गरीब यारों
मेरी रूह को समझकर उसे प्यार से बिठाना

2
दुनिया में एक हम ही नहीं और भी तो हैं
जिनका जिगर है चाक तमाशा हैं प्यार में
जिस इश्क ने किया मेरे ख्वाबों को खूं-न-खूं
उसका भी क़त्ल खूब किया मेरे यार ने

कैसे कहूं की यार तू ही मेरी हमकदम
हर चाल ने बनाया तमाशा बहार का
मजबूर हो गए मेरी उल्फत के खैरख्वाह
काँटों से बनाया तूने रास्ता दीदार का
नासूर बन गया जिगर का दर्द क्या पता
किस रोज में हो जाये तकाजा मज़ार का
खुद अपने मुंह से क्या कहें दिल की तिश्नगी
तोहफा समझ लिया इसे परवरदिगार का

3
कल तेरे दर से बहुत दूर चला जाऊँगा
तेरे कूंचे तेरी गलियों में नहीं आऊँगा
कल से हर रात मेरी और मुबारक होगी
कल से हर नूर के सीने से लिपट जाऊँगा
कल की बातों से मुझे आज तसल्ली कैसी
कल का क्या है में आज ही मिट जाऊँगा
----------------------.

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री


कुर्सी नहीं है दूर ........!
राजनीति के जंगल में थे जो बदनाम
आज वही कुर्सी के खातिर करते संग्राम
धर्म युद्ध के नाम पर स्‍वार्थ युद्ध हर ओर
घोटालो में डूब कर चर्चित बने  सब चोर

जाति और धर्म के नये नये किये खड़े संबंध
कुर्सी के लिए हो रहे अब नये नये अनुबंध
विपक्ष में बैठ भोगा था बहुत दिनो वनवास
इस बार सत्‍ता मिलते ही दूर होगा  संत्रास
शैतान भी बनना किया उन्‍होंने अब मंजूर
मिलेगी मंजिल लगता कुर्सी नही है दूर
साधु शैतान के फर्क हुए अब तो सारे दूर
कुर्सी के लिऐ साधु शैतान मिलने मजबूर।
-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री
ए-305, ओ.सी.आर.
बिधान सभा मार्ग;लखनऊ
मो0ः 9415508695, 

--------------------.

चन्द्र कान्त बन्सल

(1)        क्योंकर

उनके हसीन लब पर, मेरा नाम आया क्योंकर
मेरे ही क़त्ल का मुझपे, इलज़ाम आया क्योंकर

करने से पहले उल्फत के, तमाम जख्म पाए मैंने
बिना किये ही मोहब्बत, मैंने अंजाम पाया क्योंकर

बस एक खता की मैंने, कि उन्हें ख़त भेज दिया
ऐतराज़ हुआ खुद मैंने न, पैगाम पहुँचाया क्योंकर

हमने उनके हुजुर में, सजदे थे कई किये
जाने उनका न अब तक, सलाम आया क्योंकर

माना उसका इश्क बस, एक महज खेल है मगर
‘रवि’ की उल्फत पे, यह निशान आया क्योंकर

(2)        आँखें

कितनी है शराबी, ये तुम्हारी आँखें
खुद अपना जवाबी है, ये तुम्हारी आँखें

नशे का यह है खुमार, या यह है कुछ और
उफ़ यह जो है गुलाबी, ये तुम्हारी आँखें

खुली हो तो क़यामत है, यह बंद होने पे भी
करती है दिल में खराबी, ये तुम्हारी आँखें

हमने देखा है इनको, बचपन से जवानी तलक
बदली नहीं है जरा भी, ये तुम्हारी आँखें

‘रवि’ ने देखा नहीं है, कोई शरारती इन सा
कैसे कह दे है सीधी सादी, ये तुम्हारी आँखें


(3)        मज़ा आता है

दर्द की सीने में हो बरसात, बड़ा मज़ा आता है
दिल में हो अनजाने से जज्बात, बड़ा मज़ा आता है

एक बार दगा देता है, हर कोई किसी को तो
दिल पर हो हरदम ही आघात, बड़ा मज़ा आता है

तुम मेरी हो नहीं हो, या हो मालूम नहीं है
दिल में उठे ऐसे अजब ख्यालात, बड़ा मज़ा आता है

दिल को नाजो से पाला था, हमने सिर्फ इसीलिए
टूटता है जब ये बात बे बात, बड़ा मज़ा आता है

‘रवि’ के आँगन में जाने जा, जब भी तुम आती हो
चाहे समझ उसके जनाजे को बारात, बड़ा मज़ा आता है

 

(4)        जीने नहीं देता

तुम्हारे प्यार का अहसास, मुझे जीने नहीं देता
रहे हर पल यह मेरे साथ, मुझे जीने नहीं देता    

कभी जो भूल जाऊं तुम्हे, तुम्हारी वफ़ा को
दिला देता है ये फिर याद, मुझे जीने नहीं देता    

एक बार कहा था मैं, लूंगी दिल यह तुम्हारा
मचले तबसे ये दिले नादाँ, मुझे जीने नहीं देता    

जिद कर बैठे है जाने की, तुम तलक यह दीवाना
न देखे है दिन न यह रात, मुझे जीने नहीं देता    

किसी को चाहना गुनाह है, तो ‘रवि’ ने यह किया है
मेरा ही यह पाक गुनाह, मुझे जीने नहीं देता    

 

(5)        झुमके

मेरे दिल को है करे घायल, ये तेरे झुमके
कोई नहीं है इनके कायल, ये तेरे झुमके

न बिंदिया, न कजरा, न हार ही होगा
हार गयी है जब पायल, ये तेरे झुमके

दिल तो हुआ है दीवाना, तेरा कजरा देखे से
देखे यह तो हुआ पागल, ये तेरे झुमके

सोने के बने हो तो, सूरज है ये लगते
क्या बराबरी करेगा काजल, ये तेरे झुमके

मुखड़े को गर चाँद कहूँ, तेरे ए जाने तमन्ना
कहूँगा इनको आवारा बादल, ये तेरे झुमके

भूले ‘रवि’ तुझे, तेरी बातें, तेरी यादें
याद रहेंगे पल पल हर पल, ये तेरे झुमके

चन्द्र कान्त बन्सल
निकट विद्या भवन, कृष्णा नगर कानपूर रोड लखनऊ
ईमेल पता  chandrakantbansal@gmail.com     
संपर्क सूत्र  09453729881

 

-------------------.

       जितेन्द्र पस्तारिया


भोर होने को है...! ( अतुकांत कविता )
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अचानक कुछ होने का भय
कभी-कभी आत्मा को क्या पता क्यूँ..?
पहले से बोध करा देता है, कभी कभी सहसा
अचानक
ऐसा न हो कि
न छत्र न छाया न प्रथम सीढ़ी
और न ही कोई.....!
कहीं वक़्त का खोखलापन
मेरी आत्मा की गंभीरता
को तहस-नहस न कर दे..
मत भय खा चुप..! चुप व शांत रह
तू डरेगा तो क्या होगा..?
मत डर, कुछ नही होगा..रे
बस शांत होकर पीता जा..पीता जा
तुझे कभी कुछ नही होगा
लगने दे इल्जाम और लगाने दे
तू तो पालनहार है रे..पागल
सुन आ, बैठ मेरे पास,नजदीक और करीब
आराम से गहरी सांसो को छोड़ और
वापस गहरी ताज़ा सांसे खींच ले..
लेट जा, सुकून व इत्मीनान
बरक़रार रख अपना
वही, बचपन से अधेड़ता तक वाला
फिर अचानक
सुनो तो...इक बार...!
हाँ कहो..इत्मीनान से
आज वही रात है..न
हाँ..रे, मुझे सब पता है,
तू क्यूँ..परेशान है, और कोई
हो न हो..
सुनो...!
हाँ..कहो..
ऐसा न हो कि
न छत्र न छाया,न प्रथम सीढ़ी
और न कोई...!
फिर से..डर
चल...चुप , पीले..
कुछ ओर दिन-रात
वही सुकून, इत्मीनान और गहनता से
शाबाश...!
सो..जा
देख..सो जा,
भोर होने को है..!
------------------------.

 

नीरा सिन्‍हा

मैं देशभक्‍तिन हॅूं

मैं देशभक्‍तिन हॅूं

इसलिए

कह रही हॅूं

हमारा देश बर्बाद हो रहा है

महिलाओं यानी आधी आबादी

के प्रति घिनौने व्‍यवहार से

हम महिलाओं की कोई आवाज नहीं

हम महिलाएं समाज में समान नहीं

हम महिलाएं इस देश में इंसान नहीं

आधी आबादी को नजरअंदाज करता

यह देश

पचास फीसदी संसाधन का उपयोग

करता ही नहीं

तो कैसे होगी देश की प्रगति

पुरूषों की आधी आबादी

समझती है महिलाओं को

बच्‍चे पैदा करने की मशीन

महिलाओं की उपलब्‍धियों की छत

बन जाती है पुरूषों की जमीन

--

 

प्‍याज का रोना छोड़ो

प्‍याज का रोना छोड़ो

सौ रूपए हो या दो सौ रूपए

क्‍या फर्क पड़ता है ?

खाने में बिना प्‍याज के भी

स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजन बनता है

मैंने तो गोश्‍त भी बिना प्‍याज के बनाया है

खाने वालों ने स्‍वादिष्‍ट कह कर सराहा है

आलू दम बिना प्‍याज के भी

लगता है दमदार

इडली-डोसा में कहां है

प्‍याज का दरकार

सेब चालीस रूपए किलो आता है

जिसे रोज एक खाने से

डाक्‍टर घर नहीं आता है

क्‍यों दस रूपए का एक प्‍याज

खरीदने के लिए हो बेकरार

इतना भी क्‍यों प्‍याज से

करते हो प्‍यार ?

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