शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

कुबेर के दो व्यंग्य

व्यंग्य

1: अपनी-अपनी ईमानदारी

सेठ जी की सारी आदतें पारंपरिक हैं, जैसे - परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे
बढ़ाने की जिम्मेदारी का निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करना। बेदाग
श्वेत परिधान पहनते हैं जिसमें ऊपर कुर्ता और नीचे पायजामा होता है।
कुर्ते के नीचे विशेष रूप से डिजाइन किया हुआ बंडी पहनते हैं जिसमें नगदी
और कीमती सामानों को छिपाकर रखने के लिए कुछ गुप्त पाकिट बने होते हैं।
हाथ में बड़ा सा झोला, रास्ते में मिलने वाले सस्ते पर कीमती सामानों को
समेटने के लिए होता है। पाँव में चप्पल और चेहरे पर विशिष्ट भावाकृति की
पुराइन पत्ते के महत्व को कम करता हुआ एक ऐसा आवरण पहनते हैं, जिस पर से
मान-अपमान, लाज-शरम जैसी अति सामान्य मानवीय भावनाएँ पानी की बूंदों की
तरह बिना दाग छोड़े ढर जाते हैं।

सेठ जी पूर्णतः अहिंसक और शाकाहारी जीव हैं; यद्यपि सूदखोरी, मिलावटखोरी
और मुनाफाखोरी उनका खानदानी व्यवसाय है। झूठ बोलना तो इनके व्यवसाय का
अनिवार्य गुण है। भीमकाय शरीर के मालिक हैं। शरीर के खुले अंगों से पता
चलता है कि उनका रंग काला है और काली चमड़ी पर सूअर के बालों की तरह
काले-काले घने बाल उगे हुए हैं। चेचक दाग वाले चेहरे पर बड़ी-बड़ी सफेद
आँखें बच्चों के मन में भय पैदा करने के लिए पर्याप्त हैं। चेहरा डरावना
हुआ तो क्या, सेठ जी बड़े मिष्ठभाषी हैं, पर लोग न जाने क्यों उनकी मीठी
बातों से हरगिज, हर हाल और हर कीमत पर बचना चाहते हैं। मिष्ठता के साथ
शायद दुष्टता का सोने पे सुहागा के समान योग हो?

सेठ जी आज अपने पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर निकले हैं। उन्हें कहीं
बाहर जाना है। बस में ज्यादा भीड़, ज्यादा तकलीफ और ज्यादा बकझक होती है।
ऊपर से किराया भी ज्यादा। अतः उन्होंने भारतीय रेल को ही इस यात्रा के
लिए निरापद समझा है। मरना यदि हुआ भी, तो खटारा बस में क्यों? महान
भारतीय परंपरा अनुसार भारतीय रेल में क्यों नहीं ?

सेठ जी अप दिशा की ओर जाने वाली रेल के सामान्य दर्जे का टिकिट लेकर
निर्धारित प्लेटफार्म पर रेल के आने की प्रतीक्षा कर रहें हैं, जिसके आने
में तीस मिनट की देरी रेल्वे की इलेक्ट्रानिक सूचना पटल पर दिखाई जा रही
है, और जिसके एकाध घंटा और बढ़ जाने की पूरी संभावना है।

रेल-आगमन का समय जैसे-जैसे निकट आ रहा था, प्लेटफार्म पर भीड़ बढ़ती जा रही
थी। कुछ लोग जो अकेले थे, और जल्दी में थे, बड़ी व्यग्रता के साथ कंधे या
पीठ पर बैग लटकाए इधर-उधर घूम रहे थे। कुछ लोग बड़े इत्मिनान के साथ
सीमेंट की बनी स्थायी बेंचों पर बैठे हुए थे। कुछ लोग अपने उन मित्रों या
परिजनों के साथ भावनात्मक वार्तालाप में रत थे जो उन्हें बिदा करने आये
थे।

सेठ जी अपने बड़े झोले को अपनी तोंद पर रखे सीमेंट की एक बेंच पर पसरे हुए
थे। बेंच पर केवल उन्हीं का कब्जा था। बीच में कुछ लोग आकर उनके साथ बैठे
जरूर, लेकिन न जाने क्यों वे वहाँ से बहुत जल्दी उठ कर चले भी गए।

सामने से केला वाला ’दस के बारा, दस के बारा’ चिल्लाता हुआ निकल गया। जिस
बेंच पर सेठ जी का आधिपत्य था उससे कुछ ही दूरी पर प्लेटफार्म पर
आने-जाने के लिए सीढ़ियों का सिलसिला शुरू होता था, जो ऊपर की ओर ओवर बृज
से जुड़ा हुआ था। सीढ़ियों के नीचे एक महिला झालमुड़ी बेंच रही थी। महिला
शायद ही पढ़ी-लिखी हो। उसके कपड़े काफी पुराने व चिकटाए हुए थे। अधेड़ उम्र
में भी उसके वक्ष खुले गले की ब्लाऊज में से लोगों को आकर्षित करने में
सक्षम थे। टमाटर और प्याज काटने, फिर मुर्रे में नमक, मिर्च आदि मिलाकर
झालमुड़ी तैयार करने तथा अखबारी कागज के छोटे-छोटे चैकोर टुकड़ों को
शंक्वाकार मोड़कर, उसमें तैयार झालमुड़ी भर कर ग्राहक को पेश करने की उसकी
दक्षता देखकर पता चलता था कि वह अपने काम में माहिर हैं और अर्से से इसी
काम में लगी हुई हैं। सेठ जी की बाईं ओर कुछ दूरी पर रेल्वे पुलिस का एक
कांस्टेबल और भद्र सा दिखने वाला एक नौजवान पुलिसिया शैली में बतिया रहे
थे। बीच-बीच में ठहाका भी लगा रहे थे। तभी एकाएक प्लेटफार्म पर भूचाल आ
गया। सेठ जी माथा पीट-पीट कर चिल्लाने लगे - ’’हाय! मैं लुट गया, बर्बाद
हो गया, किसी ने मेरी जेब कांट ली।’’

कांस्टेबल ने अपने मित्र युवक की ओर अर्थ भरी निगाहों से देखा। निगाहों
-निगाहों में बातें हुई और इसके पहले कि भीड़ उग्र होती या सेठ जी के
आस-पास एकत्रित होती, उसने तत्परता पूर्वक सेठ जी को अपने संरक्षण में ले
लिया, मानो उन्हें इसी क्षण की प्रतिक्षा थी। पूछा - ’’कितने रूपये थे
?’’

’’क्या बताएँ सरकार, पूरे हजार रूपये थे।’’ सेठ जी ने रूआँसे स्वर में जवाब दिया।

कांस्टेबल आश्वस्त हुआ परन्तु रौब जमाने, अज्ञात पाकिटमारों के प्रति
भद्दी-भद्दी पुलिसिया गालियों की बौछार करते हुए कहने लगे - ’’बहोत हौसले
बढ़ गये हैं ........ के।’’

जब उन्हें लगा, उनका गाली-यज्ञ पूरा हो गया है, तब उन्होंने सेठ जी से
कहा - ’’जनाब! चलिये आप, रपट लिखवाइये। इत्मिनान रखिये, बहोत जल्दी हम
उन्हें पकड़ लेंगे। कितना कहा आपने, एक हजार ? चलिये। ’’

चैंकी पर पहुंचते ही भद्र सा दिखने वाला वह युवक जो कुछ देर पहले इसी
कांस्टेबल के साथ गप्पे लड़ा रहा था, और जो पूरे समय कास्टेबल के ही साथ
बना हुआ था, कुछ परेशान दिखने लगा। अपनी जेब से एक बटुआ निकाल कर उसमें
रखे रूपयों को वह गिनने लगा। नोट गिन चुकने के बाद उसके चेहरे पर हवाइयाँ
उड़ने लगी। एक भद्दी सी गाली दी और सेठ से कहा - ’’सेठ जी झूठ काहे बोलते
हो यार।’’

’’बाबा हम झूठ काहे बोलेंगा।’’

’’यही है न तेरा बटुआ ?’’

’’अंय ......!’’

’’..........सौ रूपट्टी रखा है और हजार की बात करता है। अपना बटुआ रख और
भाग यहाँ से। हल्ला नहीं मचाने का, समझे ?’’
ट्रेन आई और चली गई। सेठ जी भी चले गये। प्लेटफार्म पर भीड़ अब एकदम कम हो गई।

वह कांस्टेबल अब उस युवक के साथ गप्पें नहीं लड़ा रहा था। उस पर बुरी तरह
झुंझला रहा था और उसे निहायत ह़ी भद्दी-भद्दी गालियाँ बकते हुए कह रहा था
- ’’कब से हरिश्चन्द्र की औलाद हो गया बे?’’

युवक ने बेधड़क कहा - ’’आप तो देख ही रहे थे न सा’ब, कितना चालाक था साला
सेठ का बच्चा। सौ का हजार बता रहा था।’’

’’तो क्या ?’’

’’आप तो उन्हीं का यकीन करते न? हिस्से की बात आती तो कहाँ से लाता मैं
हजार रूपये।’’

फिर दोनों के बीच एक दीर्घ खामोशी छा गई।

स्टेशन पर भी खामोशी छाई हुई थी और इस खामोशी से उभर रहे थे अनेक सवाल।
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व्यंग्य

2: कामरेड का रिक्शा वाला


कामरेड सोमेश साहब इस शहर में एक जानी-मानी हस्ती हैं। इस समय उनकी
अवस्था लगभग साठ की है। ऊँगलियों के पोरों से लेकर पुतलियों के नीचे तक
अर्थात् नख से शिख तक चर्बी की एक मोटी परत जमा हो गई है और शरीर
हिप्पोपोटेमस के शरीर के समान चिकना, चमकदार और थुलथुला हो गया है। किसी
समारोह में अतिथि वक्ता के रूप में इन्हें आमंत्रित करने के पहले आयोजक
का पहला महान कर्तव्य होता है, इनके शरीर के अनुरूप इनके लिए आसन और असन
की समुचित व्यवस्था करना।

इनका भरापूरा परिवार और देश-विदेश में फैला विस्तृत कारोबार है। शहर और
शासन के अति विशिष्ट हस्तियों के साथ इनका बड़ा मधुर और पारिवारिक परंतु
पारदर्शी संबंध है।

पारदर्शी चीजें अक्सर दिखाई नहीं पड़तीं।

मज़दूर संघों से इनका रिश्ता आज का नहीं अपितु संघर्ष के दिनों से है, जब
ये युवा थे और शरीर छरहरा था, पुतलियाँ आँख-कोटर में धँसी और शिराएँ
त्वचा के ऊपर उभरी हुई होती थी। तब ये अपने माता-पिता के साथ किराये के
मकान में रहा करते थे।

शहर में इनकी प्रसिद्धि के वर्ग-वार अलग-अलग कारण हैं। साहित्यिक हल्कों
में ये अपनी प्रगतिशील विचारधारा के लिए पूजे जाते हैं। इनकी लिखी ’भारत
में साम्यवाद की दिशा और दशा’ शीर्षक से वृहद् ग्रन्थ माला की दो खंडों
का प्रकाशन अब तक हो चुका है।

व्यवसायियों और पूँजीपतियों के लिए ये बड़े काम की चीज हैं, क्योंकि
श्रमिक वर्ग और शासन-तंत्र के साथ इस वर्ग का संतुलन बनाये रखने में ये
उस्ताद हैं।

श्रमिकों के लिये तो ये कार्ल मार्क्स के साक्षात अवतार ही हैं। उन्हें
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि ये साहब एक दिन इस शहर में उनका (अर्थात
श्रमिकों का) राज स्थापित करने में जरूर कामयाब होंगे।

रिक्शा वालों के बीच इनकी प्रसिद्धि का कारण कुछ अलग है। आइये एक सत्य
घटना के आधार पर इसे समझने का प्रयास करें।

यूँ तो यह घटना हर वर्ष मई दिवस अर्थात एक मई को घटित होती है, परंतु जिस
घटना का विवरण यहाँ दिया जा रहा है वह इसी वर्ष की है। दिन दुनिया भर के
मजदूरों-श्रमिकों के लिये जश्न मनाने, रैलियाँ निकालने ओर नारे बुलंद
करने का था। चूकि यह शहर भी दुनिया का ही मजदूर बहुल एक हिस्सा है, और
सोमेश साहब जैसा व्यक्ति उनका खेवनहार हैं, अतः यहाँ भी यह परंपरा निभाई
जा रही थी। तय कार्यक्रम के अनुसार विभिन्न मजदूर संगठनों को अपना-अपना
जुलूस, शहर के विभिन्न मार्गों से गुजार कर, अंततः शासकीय स्कूल के विशाल
मैदान में आम-सभा के रूप में परिवर्तित कर लेना था, जहाँ दिन के दो बजे
सोमेश साहब प्रकट होकर मजदूरामृत वाणी की मधुर वर्षा से मजदूरों को
नव-जीवन देने वाले थे।

सोमेश साहब अपने सिद्धान्तों के पक्के हैं। श्रमिक-सभाओं के मंच पर
उपस्थित होने के लिए वे मोटर वाहन का उपयोग न कर रिक्शे का ही उपयोग करते
हैं। आधे घंटे से वे अपने भव्य ’श्रमिक निवास’ के सामने खड़े होकर किसी
रिक्शे की प्रतीक्षा कर रहे थे, पर न जाने शहर के सारे रिक्शा वाले कहाँ
मर गए थे।

दरअसल शहर के रिक्शा वाले जानते हैं कि कामरेड साहब अपने रिक्शा चढ़ने की
तीन सौ चैसठ दिनों की दमित-संचित साध मई दिवस के दिन ही पूरी करते हैं,
ठीक वैसे ही जैसे होली के दिन लोग दुश्मनी भुनाने की साध पूरी करते हैं।

दो बजने वाले थे। सूरज आग उगल रहा था। सड़क के ऊपर डामर पिघल कर फैलने लगा
था। धूप से बचने के लिए लोग गमछों-तौलियों का प्रयोग करने लगे थे। तभी
इशारा पाकर एक रिक्शा सोमेश साहब के पास आकर रुका। चालक शायद नया था।
सवारी और चालक, दोनों ने एक दूसरे को पतियाते हुए निगाहों से तौला।
ग्राहक की आँखों में कांइयापन साफ झलक रहा था जबकि चालक की आँखों में
विवशता और लाचारी हिलोरें मार रही थी। पाँच मिनट की खासी मोल-भाव के बाद
रिक्शा आगे बढ़ा।

कुछ ही दूर चलने के बाद रिक्शा वाले की साँसें फूलने लगी। शरीर पसीने से
लतपथ हो गया। रिक्शे की चाल धीमी हो गई। सोमेश साहब को रिक्शे की सवारी
का वांछित आनंद नहीं मिल पा रहा था। मोल-भाव के कारण वे वैसे भी झुंझलाए
हुए थे। मंच पर पहुँचने का समय भी निकला जा रहा था। अब तो धैर्य जवाब दे
गया। वे रिक्शा वाले पर बरस पड़े -’’अबे, जल्दी चल, दम नहीं है तो रिक्शा
क्यों चलाता है।’’
पूरे शरीर की ताकत पैरों में समेट कर रिक्शा वाले ने जोर लगाया।

किसी तरह मंजिल आई। रिक्शा वाले की जैसे जान बची। एक हाथ से गले में लटक
रहे गमछे से चेहरे का पसीना पोंछते हुए उन्होंने दूसरा हाथ मजदूरी के लिए
आगे बढ़ा दिया। उनके इस दुःसाहस से सोमेश साहब उबल पड़े - ’’कौन वापस लेकर
जायेगा, तेरा बाप? और फिर इस जलसे में क्या तुम शामिल नहीं होगे ?
तुम्हारे जैसे लोगों के कारण ही मजदूरों का संगठन आज इतनी कमजोर हुई जा
रही है।’’
तब तक सोमेश साहब आयोजकों से घिर चुके थे।

रिक्शा वाला प्रत्युत्तर में दम साध कर कुछ बोलने ही जा रहा था कि अचानक
उसे खाँसी का दौर शुरू हो गया। मुँह पर गमछा रख वह खाँसने लगा। सोमेश
साहब आयोजकों के साथ मंच की ओर बढ़ गये।

रिक्शा वाला खाँसते-खाँसते निढ़ाल हो गया। वह वहीं जमीन पर बैठ गया। अब तो
उसे इस जलसे का हिस्सा बनना ही था।

उधर सोमेश साहब मंच पर मुख्य अतिथि की आसंदी का शोभा बढ़ा रहे थे और
भावपूर्ण, आत्मीय स्वागत से गद्गद् हो रहे थे।

सोमेश साहब अपने सारगर्भित और ओजस्वी भाषण में हिंदुस्तान के मजदूरों की
दयनीय हालत, उनके अधिकार जिनसे वे वंचित कर दिये गए हैं, पूँजीपतियों के
जुल्मों-सितम और शासन तंत्र का पूँजीपतियों के हाथों बिक जाने आदि न जाने
कितने रहस्यों पर से एक-एक करके परदा उठाते चले जा रहे थे। मजदूरों को
साम्यवाद का सिद्धांत अच्छी तरह समझा रहे थे।

रिक्शा वाला उधर लगातार खांसे जा रहा था। सोमेश साहब के किसी
रहस्योद्घाटन से अथवा साम्यवाद के किसी सिद्धांत से उसकी खाँसी पल भर के
लिये भी थम नहीं रही थी। इस जलसे के किसी तामझाम से उसे कोई लेना-देना भी
नहीं था। उसे लेना था सोमेश साहब से अपनी मेहनत की तयशुदा वह रकम जिसके
अनुसार उसने उसके भारी-भरकम शरीर को यहाँ तक ढो कर लाया था और जिससे उसे
खाँसी की दवाइयाँ खरीदनी थी।

अंत में ’हर जोर जुल्म के आगे में, संघर्ष हमारा नारा है’ और ’इन्कलाब,
जिंदाबाद’ के नारों के साथ सभा के समापन की घोषणा हुई।
जिंदाबाद के गगनभेदी नारों के बीच भी रिक्शा वाले की निगाहें निरंतर
सोमेश साहब का पीछा करती रहीं। उसके लस्त-पस्त शरीर में थोड़ी बहुत जान जो
बची थी वह इन नारों की वजह से नहीं बल्कि अपनी मेहनत के उन्हीं पैसों के
मिलने की आस में बची थी, जिसे सोमेश साहब से लेना था।

परन्तु सोमेश साहब अब न जानें भीड़ के किस कोने में गुम हो चुके थे।

भीड़ धीरे-धीरे पूरी छट गई। विवशता के कारण छलछला आई रिक्शा वाले की
निगाहें उन्हें अब भी मैदान के चारों ओर तलाश रही थी। उसे अब भी उम्मीद
था कि मजदूरों का यह मसीहा उसकी मजदूरी का पैसा देने उसके सामने जरूर
आयेगा और यह भी कि वह वापस घर भी उन्हीं की रिक्शा में बैठ कर जायेगा।पर
सोमेश साहब अंतध्र्यान हो चुके थे।
मसीहा अक्सर अंतध्र्यान हो जाया करते हैं।

रिक्शा वाले की खाँसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

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कुबेर
मो. 9407685557

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