रविवार, 24 नवंबर 2013

जसबीर चावला की चुनावी चकल्लस और व्यंग्य कविताएँ


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चुनावी पाठशाला
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
अमर उठ
अब उठ
बहुत सोया
सो मत
रो मत
बहुत खोया
अब खो मत
*
बक बक
मत कर
चख चख
मत कर
मत मत
मत कर
मतदान कर
*
अब चल
चाल चल
दल दल
सब दलबदल
छल बल
इनकी करनी
करनी का फल
*
लगा अकल
दे बदल
'मत'-मत बता
औक़ात बता
गत बना
मतदान कर
सरकार बना

ख़ुदा खुदाई और ख़िदमतगार
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
ऊपर वाला ख़ुदा नहीं शहर ख़ुदा रखा है
शहर को इन्होंने हर तरफ़ ख़ुदा रखा है

ग़ज़ब की है खुदाई इनकी कहीं चलने से पहले
ख़ुदा बंदे से खुद पूछे बता कहाँ ख़ुदा रखा है

किस तरफ़ से किधर जायें पता वहीं चलता
परेशां यहाँ हर बशर किसने कहाँ ख़ुदा रखा है

देख ली तेरी खुदाई अब इनकी खुदाई देख
इसने खुदा रखा है उसने भी ख़ुदा रखा है

ख़ुदा को ढूँढ़ने निकले ख़ुदा के कुछ नेक बंदे
खुदा की हर राह को इन्होंने ख़ुदा रखा है

ख़बरदार खबर
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बिना खबर के भी
खबर बनती है
बे खबर रहे तो भी
खबर बनती है
*
खबर यह है कि
कोई खबर नहीं
बाखबर हो तो
खबर बनती है
*
खबर की आड़ में
खबर होती है
छुपाओ खबर
खबर बनती है
*
बेपर की भी हो
खबर उड़ती है
ठीये पाये की हो
खबर बनती है
*
खबरों में रहना है
तो फ़ंडा सीखो
इस्तेमाल करो
खबर बनती है
*
खबर से बचना
ख़बरदार रहो
हर लम्हें यहाँ
खबर बनती है

खबरों की मण्डी है हुज़ूर आप बाखबर रहिये
खबर न बन जायें कहीं ओर खबर भी ना हो

आयोग और संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंं
आग लगी है
आ नहीं सकते
आचार संहिता लगी है

हलो हलो
कहाँ लगी है
चुनाव आयोग

आ ही नहीं सकते
आयोग ने ही
संहिता बनाई है

भगोड़ा सांई
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
सूरत पुलिस
क्यों नहीं
सम्पर्क करती
ढूंढने के लिये
भगोड़े सांई को
उनसे

तीनों लोकों में
वीणा बजाते
दिन रात
पुकार लगाते
हमारे अपने
नारद मुनि से

जो जानते हैं
कहाँ है नारायण
नारायण नारायण
मनुहार करें
कहें तो ज़रा
दिल से

और एक वैचारिक कविता : हम बँट चुके हैं
ंंंंंंंंंंंंंंंं
हम बँट चुके
एकता दिखावा
मुल्लमा / छद्म है
कलई हर बार उतर जाती
हवा के हल्के झोंके से
*
वैचारिक ही नहीं
मानसिक रूप से बँटे
वैचारिक में विचार होता है
हमारी एकजुटता
लहसुन की गाँठ
क्षणिक दबाव
खंड खंड
बिखरती फाँके
*
बलात् बँटवारा
इतिहास संस्कृति का
ये और वे की भाषा
भौगोलिक सीमांकन
मोहल्ले जातियों के सूबे
कालोनियों की सीमा पर पुलिस चौकियाँ
गलियां दुकाने
भौगोलिक इकाईयां
इस / उस समाज का टोला
*
अपने मज़हब का नहीं
नहीं रहेगा मोहल्ले में
मकान से बेदख़ल करो
मैं भी डरता हूँ
रहना चाहता हूँ यार की गली में
रह नहीं सकता
*
संस्कृति / भाषा भूषा बंटी
दिमाग़ बँटे
रिश्ते बँटे / भाईचारा बँटा
काम बँटे
संवेदनाएँ अलग
पीड़ा अलग
*
हम भोले हैं
अनेकता में एकता कह देते
सतत कर्मकांड
मंचों से ताली बजती
क्या सचमुच एक हैं हम
कह दो
कि ग़लत हूँ मैं
***
जसबीर चावला की सामाजिक- राजनीितक विद्रूप पर चोट करती कविताएँ 

विक्रम बेताल और भ्रूण
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
विक्रम ने हठ न छोड़ा
बेताल को लाद लिया कंधे
बेताल बोला हिंस्र हैं जंगल
चलेंगे शहर के रस्ते
बिखरें / तैर रहे थे जहाँ
परियों / तितलियों के पंख
लटके मासूम सपने
किलकारियों की गूँजे
गुड़ियाओं के टूटे अंग
सोनोग्राफी की दुकानें
भ्रूण का लिंग परिक्षण नहीं होता
नन्हें हाथों के रक्तरंजित छापों से भरी
चिकित्सालयों की दीवारें
सिसकती लोरियाँ
नन्ही सी परी मेरी लाड़ली
चंदन का पलना रेशम की डोरी
चिर निद्रा में सोई राजकुमारियाँ
हाथों से गला घोंटती / अफ़ीम चटाती दाईयां
गा रही नये ज़माने की लोरियाँ
लली ऊपर जईयो
लला को भेज दीजो
*
बेताल ने सब दिखाया
बता रास्ता कौन अच्छा है
विक्रम काँप गया
क्रूर हैं शहर
जंगल नहीं मारता अजन्मे
शव फिर उड़ा
पेड़ पर लटक गया
लटक गये थे तब तक जहाँ
हज़ारों नये कन्या भ्रूण
***
विक्रम बेताल की आख़री कहानी
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
विक्रम ने फिर हठ न छोड़ा
इसके पूर्व बेताल से सुन चुका था
पच्चिस कहानियाँ
अलग अलग
कहानी सुना बेताल कहता
सिर टुकड़े हो जायेगा उसका
प्रश्न का ठीक उत्तर न दिया उसने
बेताल उड़ता हर बार
पेड़ पर लटक जाता
*
विक्रम बोला
बारी ख़त्म हुई तुम्हारी
सुना चुके पच्चिस कहानियाँ
घिसी पिटी
इस राजा / साहूकार की
रूपवती सुंदरीयों की
बहुत बोर किया
सुनता रहा
अब मेरी बारी
ठीक उत्तर मिला
दिला दूँगा शव से मुक्ति
ज़िंदा हो मनुष्य बन जाओगे
आर्यावर्त में रह पाओगे
*
सुन शव रोने लगा
किसी प्रश्न का उत्तर दूँगा नहीं तुम्हारे
ज़िंदा शव बनने से अच्छा है
बेताल शव ही रहूँ
मुझे नहीं जीना
*
कहा बेताल ने
उड़ा
पेड़ पर लटक गया फिर से
अब विक्रम ने भी
हठ छोड़ दिया
***
बोनों का इतिहास
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बोने क़द से नहीं
दिमाग़ और मन से हैं
इतिहास में सेंध
अपनी नग्नता / दारिद्रय छुपाते
ढूँढते गलियां
जहाँ से घुस सकें
कर सकें अपनी दावेदारी
इतिहास के चमकते पन्नों पर
आगे करते
प्रतीक / नायक
चुराते पुण्य / ख्याति
हरते संताई
करते वार / उनकी ़आड़
झूठ पर झूट
हाँ नंगो का भी अतीत होता है
और बोनो का भी इतिहास
***
इतिहास का प्रहसन
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
टीवी में बिछी
अतीत की बिछात
रची रणभूमि
कुछ कुटिलों ने हथियार उठाये
जो इतिहास की परीधि तक में न थे
स्वंयम कभी
वे इतिहास पुरूषों को जगाने लगे
आरती गाने लगे
हाथों में थमा दी तलवारें नायकों के
जो नायक बैठे एक जाजम
बहस / विमर्श करते
वैमनस्य से परे
वर्तमान में कठपुतली बना
भाँजने लगे / वार करने लगे
अख़बारी पन्नों पर
एक दूसरे पर
बेचारे दिवंगत नायक
**
इतिहास तो इतिहास है
प्रहसन नहीं
अतीत में जाकर
मिटाने से मिटता नहीं
न पराजित होता
मस्खरों की लीला से
***
अरुण दीपिका के नाम:हे राम
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
प्रिय अरुण गोविल / दीपिका चिखलिया
मैं प्रशंसक हूँ दोनों के अभिनय का
जो निभाया
धारावाहिक रामायण में
राम सीता बनकर
*
पर परेशान भी हूँ
अब सपने में राम नज़र नहीं आते
न सीता मैया नज़र आती
जब मूँदता हूँ आंखे
तुम दोनों ही नजर आते हो
राम सीता बनकर
*
मैं पहले बुरी तरह छला गया हूँ
राम छीना गया मुझसे
मेरा राम सौम्य था
मर्यादा पुरुषोत्तम
चित्रों में एक और माता जानकी
भाई लक्ष्मण
चरणों में हनुमान
कभी हनुमान के सीने में राम सीता
फिर मुलगांवकर के केलेन्डर अाये
घर घर में छाये
भगवानों के चित्र बने सेक्सी
देवी देवताओं ने शालीन वस्त्र छोड़े
चटख नायलोन के झीने पहने
*
फिर रचे गये एक और राम
हाथ में धनुष
आक्रामक मुद्रा में कूच करते
जनमानस में रोपे गये
गली चौराहों
कटआउट लगे
बाहर सब राममय हो गया
अंदर के राम निकल गये
*
अब याद करूँ
किस छवि के राम
मुझसे छीना गया है मेरा राम
छला गया है / छला जा रहा
सबको राम का वास्ता
राम के लिये
राम न छीनों
लौटा सको तो लौटा दो
मेरा राम
मर्यादा पुरुषोत्तम
करूणामय राम
हे राम
***
चिंता
ंंंंंंंंंंं
क्यों चिंतित हैं
आप ही हरदम
सुनता हूँ जब भी
बढ़ जाती
और भी चिंता
इन्हें भी
कोई चिंता नहीं
***
युद्ध की मानसिकता इन दिनों
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
क्या तुम्हें लगता नहीं
हम / देश जी रहा
सतत युद्ध की मानसिकता में
दनादन दगते गोले
शब्दों / कटाक्ष के
चलते रहते ज़हर बुझे तीर / तलवार
इन दिनों
*
बंट गये / बाँटे गये हम
असुविधा / सुविधानुसार
सेनाओं / उप सेनाओं में
आप असहमत हैं मुझ से
मित्र नहीं शत्रु है
आप कलिंग के हैं
या अशोक की और
कौरव हैं या पांडव
निरंतर महाभारत घट रहा
देश कुरुक्षेत्र
इन दिनों
*
बेजरुरत हिंसक
विचार में व्यव्हार में
हिंदू हैं या मुसलमान / सिख या ईसाई
और कोई कालम नहीं काग़ज़ पर
जहाँ बेख़ौफ़ होकर लिख सकें
शब्द इंसान
इन दिनों
*
हुंकार रैली / महारेली
शंखनाद रेली
चित्कार / फुत्कार / धिक्कार दिवस
थू थू रेली / स्वाभिमान रेली
रेलीयों की रेलमपेली
इन दिनों
*
आप पंचायत / खाप पंचायत
महा पंचायत
महामृत्युजंय जाप पंचायत
जय घोष
देश में हांका
तुरही नाद / नगाड़े
युद्ध / युद्धोन्माद नहीं तो क्या
कौन सुने तूती की आवाज़
इन दिनों
*
आइने में देखता हूँ
जब जब अपना चेहरा
घबरा जाता हूँ
हिंस्र होता जाता है
मेरी भी आँखें लाल / माथे पर बल
भृकुटि तनी रहती है
इन दिनों
***
सपने ओर सोना
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
बचपन से सुनते आये थे
सपने देखो
सपने देखने लगे
नींद भी अच्छी आती थी
*
फिर राष्ट्रपति कलाम ने कहा
बड़े सपने देखो
बड़े सपने देखे
*
साधू शोभन ने ओर बड़ा सपना दिखाया
डोंडीयाखेड़ा में सौ टन सोना दबा है
खुदाई कर ले जाओ
दिन में भी सपने देखने लगे
*
जब शोभन ने कहा
फ़लाँ जगह पच्चिस सौ टन सोना दबा है
नींद खुल गई
बेचेन हो गये
करवटे बदलते हैं
बिस्तर पर सोना चाहते
रात दिन नींद नहीं आती
सोना तो क्या सोना भी गया
अब सपने क्या ख़ाक देखें

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