रविवार, 24 नवंबर 2013

सुरेश कुमार 'सौरभ' का आलेख - क्षीण होती सामाजिक सद्भावना

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सामाजिक सद्भावना का तात्पर्य है- समाज के हित अथवा कल्याण की भावना ।
मनुष्य समाज में रहने वाला एक विचारशील प्राणी है । वह संसार के सभी
प्राणियों में बौद्धिक रूप से अतिसक्षम तथा संवेदनशीलता के स्तर पर
सर्वश्रेष्ठ है ।
इस 21वीं शताब्दी का मनुष्य बौद्धिक रूप से तो उत्तरोत्तर विकास करता जा
रहा है, परन्तु चारित्रिक-अवनति भी उसी अनुपात में दृष्टिगोचर हो रही है
। साथ ही मानवीय संवेदना मृत होती जा रही है । संवेदनहीन-नर नर नहीं
नर-पशु हो जाता है । आज के अधिकांश व्यक्ति समाज में रहकर भी समाज के
उत्थान के सम्बन्ध में सोच-विचार करने का प्रयत्न नहीं करते हैं ।
व्यस्तता भरे इस परिवेश में व्यक्ति अपने आप ही में सिमटता चला जा रहा है
। उसे केवल अपना घर-परिवार ही दिखता है, उसके अतिरिक्त वह समाज की
विसंगतियों से बचने का प्रयास करता है, न कि उन्हें दूर करने का । ऐसा
प्रतीत होता है कि समाज के प्रति उसका कोई दायित्व ही नहीं है ।
परिणामस्वरूप वह अपने आप-पास के लोगों से नित्य कटता चला जा रहा है । ऐसे
में जो एकता की सुदृढ़ कड़ी का निर्माण हमारे पूर्वजों ने किया था वो
निरन्तर क्षीण होती जा रही है ।

एक दु:खद आश्चर्य ये है कि आज विज्ञान के इस युग में भी धर्मगत एवं
जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं हो सके हैं । कभी मंदिर के नाम पर तो कभी
मस्जिद के नाम पर प्राय: लोग आपस में ही टकराते रहते हैं । जातिगत अथवा
वर्णगत भेदभाव की बात की जाय तो देखने को मिलता है कि अभिजात्य-वर्ग किस
प्रकार से स्वयं को ऊँचा होने का दम्भ भरता है और अंत्यज-वर्ग को नीचा
दिखाता है । दो भिन्न धर्मावलम्बी अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने
हेतु विवाद कर बैठते हैं , परन्तु ये नहीं समझ पाते हैं कि 'मानव-धर्म'
ही पूरे विश्व का सबसे बड़ा और सबसे उत्तम धर्म है ।
धार्मिक तथा जातीय भेदभाव हमारे सामाजिक सद्भावना पर प्रत्यक्ष प्रहार
करते हैं । ऐसे में समाज बिखर जाता है और इसका लाभ कुछ विघटनकारी तत्वों
को प्राप्त हो जाता है, जो निरन्तर इसी प्रतीक्षा में रहते हैं कि कब
उन्हें अवसर मिले और कब वो ऐसे बिखरे हुए समाज अपना वर्चस्व स्थापित कर
लें, जैसा कि पूर्व में हमारे देश के साथ भी ऐसा ही हुआ । आपसी एकता एवं
सामाजिक सद्भावना की कमी ने इस देश को अँगरेजों के अधीन करवा दिया ।

मन में साम्प्रदायिकता की भावना रखना समाज की सबसे बड़ी बुराई में से एक
है । ये भावना दो मनुष्यों के मध्य की दूरी को निरन्तर बढ़ाती है । चाहे
गोधरा की बात करें चाहे मुजफ्फरनगर की बात करें, साम्प्रदायिकता की भावना
ने ही इन स्थानों पर दंगे करवाये ।

वर्तमान राजनीति स्वार्थ का पर्याय बनती जा रहती है । स्वार्थी
राजनीतिज्ञ जाति-धर्म अथवा सम्प्रदाय के नाम पर हमारे समाज के सीधे-सादे
लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं और उन्हें आपस में लड़वाकर अपना स्वार्थ
सिद्ध करते हैं । इससे हमारे समाज के लोगों का मांसिक वातावरण प्रदूषित
होता है और राष्ट्र की एकता और अखंडता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सामाजिक सद्भाव और सौहार्द तभी बना रह सकता है जब समाज में रहने वाले सभी
व्यक्ति एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का प्रयास करे । हर व्यक्ति को ये
बात समझ लेनी चाहिए कि प्रेम देने से ही प्रेम प्राप्त होता है, सम्मान
के बदले सम्मान मिलता है, घृणा करने से घृणा बढ़ती है और विश्वास से ही
विश्वास का जन्म होता है ।
हमें सामाजिक सद्भावना को सुदृढ करने हेतु एक-दूसरे के धर्मों का समान
रूप से आदर करना होगा । सभी प्रकार के भेदभावों से स्वयं को मुक्त रखना
होगा । ईर्ष्या - द्वेष, घृणा, प्रतिशोध की भावना आदि को त्यागना होगा ।
हमें एक-दूसरे के साथ कन्धे से कंधा मिलाकर चलना होगा तथा सहयोग की भावना
का भी विकास करना होगा । हमें ये समझना होगा कि विश्व एक परिवार है और हम
सभी उस परिवार के सदस्य हैं और सदस्य होने के नाते सभी अपने ही हैं । ऐसी
सोच ही वैमनस्य को मार सकती है और हमें एकता तथा भाई-चारे के एक सूत्र
में बाँध सकती है ।


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- सुरेश कुमार 'सौरभ' [M.A.-। (हिन्दी), हिन्दू पी.जी. कॉलेज, जमानियॉ
जिला गाजीपुर, उ.प्र. ]

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