सोमवार, 18 नवंबर 2013

राम नरेश ‘उज्‍ज्‍वल' की बाल कहानी - बीड़ी का धुँआ

(बाल कहानी)

बीड़ी का धुँआ

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राम नरेश‘उज्‍ज्‍वल'

एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पर दर्जनों बन्‍दर रहते थे। वे बड़े ही नकलची और शरारती थे।

एक दिन की बात है। धूप बड़ी तेज थी। उधर से एक राही आ रहा था। उसका गंजा सिर चाँद-सा झलक रहा था। सिर पर चुचुहाता हुआ तेल रेगिस्‍तान में पानी की तरह लग रहा था। उसका कद लम्‍बा तथा मूँछें बड़ी-बड़ी थीं।शरीर बिल्‍कुल दुबला-पतला, सींक-सलाई हो रहा था। उसके सिर पर झोटइया खड़ी लहरा रही थी।

वह गर्मी से परेशान पेड़ के नीचे आ गया। अँगौछा बिछाया और बैठ गया। कुछ देर बाद जेब से बीड़ी-माचिस निकाली। सुलगा कर पीने लगा। हवा बड़ी अच्‍छी चल रही थी। वह लेट कर टकला सहलाते हुए झोटइया उमेठने लगा। इसी तरह खिलवाड़ करते हुए वह सो गया।

बन्‍दर ऊपर से सारा तमाशा देख रहे थे। उसके सोते ही एक बन्‍दर नीचे उतर आया। बीड़ी-माचिस अँगौछे पर ही रखी थी। वह उसे उठाकर ऊपर चला गया। अब क्‍या था ? सारे बन्‍दरों ने आपस में एक-एक बीड़ी बाँट ली। फिर फुक्‍क-फुक्‍क कर सुलगा लिया। सबने बड़े शान से चार-पाँच कस खींचा। अचानक खाँसी आ गई। सब खों-खों करने लगे। धुँआ अन्‍दर तक भर गया। आँखें लाल हो गईं , मुँह और गला कड़ुआने लगा। वे कहने लगे-‘‘ये बड़ी बेकार चीज़ है। इसमें तो ज़हर ही ज़हर है। यह बेवकूफ आदमी पता नहीं कैसे इतनी खराब चीज़ पीता है ?''

सारे बन्‍दरों ने जलती हुई बीड़ियाँ नीचे फेंक दीं। नीचे आदमी सो रहा था। बीड़ियाँ उसके ऊपर गिरीं। वह तिलमिला कर उठ गया। जगह-जगह पर जल भी गया था। उसने अपना अँगौछा समेटा और इधर-उधर देखने लगा। तभी उसे गुर्राने की आवाज सुनाई दी। ऊपर देखा , तो सारे बन्‍दर उसी पर खौखिया रहे थे। आदमी को इस बात का पता न था। वह बन्‍दरों की करतूत समझ गया। खों-खों करके गुर्राते हुए बन्‍दर उसी की तरफ आ रहे थे। वह डर कर भागने लगा। लेकिन बन्‍दर उसे कब छोड़ने वाले थे। दौड़ा कर घेर लिया। आदमी को घेरते ही उन्‍होंने उसकी टकली खोपड़ी ठोकना बजाना शुरू कर दिया। कुछ बन्‍दर उसकी झोटइया भी खींच रहे थे। वह आदमी परेशान हो गया। उसकी हालत खराब थी। उसने सोचा-‘बीड़ी के कड़वे स्‍वाद के कारण ही ये बन्‍दर उसके पीछे पड़े हैं।' इसलिए उसने कान पकड़ कर कहा-‘‘भाइयों मैं वचन देता हूँ, अब से बीड़ी को हाथ तक नहीं लगाऊँगा। मुझे माफ कर दो।''यह कह कर उसने दो-तीन उठक-बैठक लगाई।

बन्‍दर अब शान्‍त हो गये। यह देखकर आदमी बड़ा खुश हुआ। वह आगे बढ़ा, अरे..ये क्‍या ? बन्‍दरों के सरदार ने उसे रोक लिया। उसने आदमी के गंजे सिर पर हाथ फेरा। उसके गाल चूमे और खों-खों करके अलग हट गया। दरअसल वह अपना प्‍यार जता रहा था। अब सारे बन्‍दर उसकी टकली पर हाथ फेरते। गाल चूमते और ‘खों-खों' इस तरह करते जैसे नमस्‍ते करके उसे विदाई दे रहे हों।

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राम नरेश ‘उज्‍ज्‍वल'
मुंशी खेड़ा,
अमौसी एयरपोर्ट,
लखनऊ-226009

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