शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

राजीव आनंद की बाल कहानियाँ

बाल कहानियाँ

 

 कुंए में चांद

घीसू अपने को बहुत तेज आदमी समझता था. गांव में लोगों को उनकी समस्या पर उलटी-सीधी राय देता रहता था और अपने तरीके से मदद भी करता रहता था. अपने को तेज और होशियार समझने की वजह से लोगों को दी गयी राय और मदद दोनों ही निराली थी. जैसे एक बार तालाब में डूबते मदन नामक लड़के को तालाब से निकालने में इतना देर कर दिया कि वह मरते-मरते बचा. अगर घीसू तुरंत उसे तालाब से निकाल लेता तो मदन बेहोश नहीं होता.

एक बार की बात है कि अनाज के खेतों में पक्षियों को डराने के लिए दिनभर घीसू पुतला बनकर खुद ही खड़ा रहा था. उधर घीसू के माता-पिता दिन भर परेशान थे कि आखिर घीसू गांव छोड़ कर गया कहां ?

एक बार बहुत ही मजेदार घटना घटी. एक चांदनी रात को घीसू अपने घर के पीछे बगान में बने कुंए के पास पानी लेने गया जैसे ही उसने कुंए में बाल्टी डाला कि देखता है कि कुंए में चांद है. घीसू बड़ा दुखी हुआ कि बच्चों के चंदा मामा कुंए में डूब गए है और किसी को कोई चिंता ही नहीं है. सारे जहां का दर्द घीसू के सीने में ही है, वह बड़बड़ा रहा था. घीसू बाल्टी को खींच कर रस्सी का फंदा बनाया और चांद को कुंए से निकालने की कोशिश करने लगा. रस्सी का फंदा बार-बार घीसू कुंए में फेंकता रहा परंतु चांद फंदे में नहीं फंसा. लेकिन इस बार उसे रस्सी का फंदा खींचने में थोड़ा बल लगाना पड़ा, घीसू खुश हो गया यह सोच कर कि चांद इस बार रस्सी के फंदे में फंस गया है. दरअसल एक बड़ा पत्थर रस्सी के फंदे में फंस गया था. घीसू जोर लगाकर खींचने लगा, पत्थर जब कुंए से आधी दूर तक आया तो रस्सी के फंदे से छूट गया और घीसू पीछे की तरफ धड़ाम से गिरा. गिरते ही उपर आसमान पर देखता है कि चांद भागा जा रहा है. घीसू अपने गिरने के दर्द को भूल गया और खुश हुआ और चिल्लाने लगा कि आखिर मैंने बच्चों के चंदा मामा को बचा ही लिया.

 

कर की चोरी

एक सेठ सरकारी कर बचाने के लिए अपने अकूत धन को बैंक में नहीं रख कर कहीं ऐसे जगह रखने की सोच रहा था, जहां उसका धन सुरक्षित भी रहे और उसे धन के लिए कर न देना पड़े.

अमावस्या की काली रात को वह अपने धन को कई बाक्स में रखकर अपने लंबे-चौड़े जमीन पर फैले घने पेड़ों के बीच ले गया और एक डूमर के पेड़ के जड़ को कोड़ कर आठ-दस धन से भरे बाक्स को छुपा दिया.

घर लौट कर सेठ चैन से चादर तान कर सो गया. कुछ महीने बाद सेठ को अपने छुपाए गए धन को देखने की प्रबल इच्छा होने लगी. रात होने पर सेठ ने फावड़ा उठाया और पहुंच गए डूमर के पेड़ के पास और जड़ों के आसपास खोदना शुरू कर दिया. घंटे भर के मेहनत के बाद काफी गहरा गडढ़ा खोदने पर भी सेठ को धन का बाक्स कहीं दिखाई नहीं दिया. अब तो सेठ को चिंता सताने लगी. तरह-तरह के ख्याल आने लगे कि कहीं उसका धन कोई चोर तो नहीं ले गया. सेठ ने अपने इन ख्यालों को दरकिनार कर सोचने लगा कि कहीं कोई दूसरा पेड़ तो नहीं था जहां उसने धन छुपाए थे. उस डूमर के पेड़ के कुछ दूर एक और दूसरा डूमर का पेड़ था, सेठ उस दूसरे डूमर के पेड़ के जड़ के आसपास भी गडढ़े कर दिए, फिर भी उसे धन नहीं मिला. अब सेठ को विश्वास हो गया था कि उसका धन चोरी हो चुका है.

सेठ बहुत दुखी हो गया पर छुपाए गए धन की चोरी की बात वह अपने परिवार वालों को भी नहीं बता सकता था क्योंकि वह अपने परिवार वालों से भी छुपा कर धन को पेड़ के नीचे गाड़ दिया था.

कर की चोरी की लालसा अगर सेठ को नहीं होती तो कर देकर वह अपने धन को बैंक में सुरक्षित रख सकता था परंतु मन में बेइमानी आ जाने के कारण सेठ का सारा धन चोरी हो गया. सेठ का दुख दुगना बढ़ गया था, एक तो धन के चोरी हो जाने का दुख और दूसरा चोरी की बात किसी को न बताने की असमर्थता का दुख.

इसलिए बच्चों अच्छे नागरिक बनने के लिए कर की चोरी नहीं करनी चाहिए नहीं तो सेठ की तरह धन की हानि होनी तय है.

 

संजाल के जाल में

राहुल को संजाल की लत किसी मादक पदार्थ के लत से कम नहीं थी. संजाल उपलब्ध नहीं होने पर राहुल इतना बेचैन हो जाता कि उसके माता-पिता उसे डाक्टर के पास ले जाते. सामान्य डाक्टर क्या करता कुछ सिडेटिव वगैरह देकर चलता कर देता था.

राहुल को आराम तभी मिलता जब वह पुनः संजाल के साथ अपने लैपटॉप पर घंटों बैठता और अपना गुस्सा संजाल के जरिए अग्रैसिव कमेंटस शेयर करता हुआ तथा वायलैंट गेम खेलता हुआ गुजारता. किसी के भी साथ घुलने मिलने में उसको परेशानी होने लगी थी. राहुल के माता-पिता जब भी किसी पार्टी में जाते तो राहुल साफ तौर पर साथ जाने से इंकार कर देता. उसे अपने कमरे में लैपटॉप पर संजाल के साथ गुजारने में जो आनंद आता वह शायद उसे किसी भी चीज में नहीं आता था. वह संजाल के माध्यम से एक ऐसी काल्पनिक दुनिया न सिर्फ बना लिया था बल्कि वह उस काल्पनिक दुनिया का वाशिंदा भी बन चुका था. राहुल के हावभाव से ऐसा प्रतीत होता था कि उसे किसी अन्य व्यक्ति की जरूरत ही नहीं है. राहुल के पिता ए. डिसूजा खुद कम्प्यूटर इंजिनियर थे, उन्हें राहुल की हरकतों से यह समझ में आने लगा था कि 'समथिंग हैज गॉन रांग विथ राहुल', और इसलिए राहुल किसी के साथ फेसटूफेस इंटरैक्शन नहीं करना चाहता.

राहुल के पिता अपने एक मेडिकल रिसर्चर फ्रेंड डा.मैथ्यू से राहुल के इन दिनों स्वभाव में आए बदलाव को डिस्कस करने लगे थे. डा. मैथ्यू ने राहुल के पिता ए.डिसूजा को आश्वासन दिया था कि वे कभी उनके घर आकर राहुल से मिलना चाहेंगे तभी वह कुछ कह पायेंगे.

दिनबदिन राहुल का संजाल के साथ एडिक्शन बढ़ता ही जा रहा था. एक दिन तो राहुल सूबह से शाम तक कम्प्यूटर पर बैठा रह गया था और जब उसके पिता ने आफिस से आने के बाद राहुल को लैपटॉप ऑफ करने को कहा तो राहुल ने पास में रखे पुस्तक को फेंक कर अपने पिता पर वार कर दिया. मिस्टर डिसूजा समझदार व्यक्ति थे उन्होंने अपने पंद्रह वर्षीय बेटे राहुल को फिर कुछ नहीं कहा पर वे तुरंत ही अलर्ट हो गए. उन्होंने तुरंत ही डा. मैथ्यू को रिंग किया और उन्हें चाय पर अपने घर बिना विलंब किए आने का आग्रह किया. डा. मैथ्यू परिस्थिति को समझते हुए मिस्टर डिसूजा के घर आए. राहुल को डा. मैथ्यू से यह कह कर राहुल के पिता ने मिलवाया कि बेटे ये डा. मैथ्यू अंकल है, रिसर्च स्कॉलर, तुमसे कुछ बातचीत करना चाहते है.

राहुल अनमने ढ़ंग से डा.मैथ्यू के कुछ प्रश्नों का उतर देता रहा परंतु डा. मैथ्यू को राहुल का उतर झूठा प्रतीत हो रहा था. डा. मैथ्यू ने राहुल को यह कहते हुए छोड़ दिया कि बेटे, कल तुम अपने पापा के साथ मेरे रिसर्च लैब में आना, मैं तुम्हें कुछ ऐसी मशीने दिखउंगा जो कम्प्यूटर से भी ज्यादा अच्छे है. राहुल आने के लिए हामी भर दिया.

राहुल के जाने के बाद डा. मैथ्यू ने मिस्टर डिसूजा को बतलाया कि राहुल का संजाल यानी इंटरनेट की लत इस हद तक लग चुकी है कि राहुल में कुछ खास तरह के जेनेटिक बदलाव होने शुरू हो गए है और घंटों संजाल से चिपके रहने के कारण राहुल अपनी नियमित दिनचर्या भी भूलता जा रहा है. जाहिर है कि इससे उसके स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहे है.

मिस्टर डिसूजा को अब चिंता होने लगी थी कि राहुल अभी मात्र पंद्रह वर्ष का है, इसकी पूरी जिंदगी सामने पड़ी है. मिस्टर डिसूजा डा. मैथ्यू से बड़ी गंभीरता से पूछा कि अब राहुल को कैसे संजाल के जाल से बचाया जाए ?

डा. मैथ्यू कुछ देर सोचते रहे फिर मिस्टर डिसूजा को कल राहुल को लेकर रिसर्च लैब आने को कहा. राहुल के पिता ने दूसरे दिन आफिस से लीव लेकर राहुल के साथ डा. मैथ्यू के रिसर्च लैब में गए. डा. मैथ्यू ने राहुल का ब्रेन टेस्ट कई मशीनों के द्वारा किए. राहुल को डा. मैथ्यू द्वारा की जा रही कार्रवाई समझ में नहीं आ रहा थी परंतु बड़े-बड़े हेडफोन की तरह एपरेटस अपने सिर पर लगाए जाने से उसे थोड़ी उत्सुकता जरूर हो रही थी. बहरहाल पूरी जांच पड़ताल के बाद डा. मैथ्यू इस नतीजे पर पहुंच गए कि राहुल मैंटल हेल्थ डिसआर्डर से ग्रसित हो चुका है.

राहुल के पिता मि. डिसूजा के लिए मैंटल हेल्थ डिसआर्डर एक नयी बीमारी जान पड़ी इसलिए उन्होंने डा. मैथ्यू से यह जानना चाहा कि यह बीमारी किस हद तक परेशान कर सकती है और इसका इलाज क्या है ?

डा. मैथ्यू ने सोचते हुए राहुल के पिता से कहा, मिस्टर डिसूजा, आज के समय में हर किसी के लिए इंटरनेट एक अनिवार्य जरूरत बन चुका है इसलिए इस बीमारी का इलाज अगर नामुमकिन नही ंतो कठिन अवश्य है.

मि. डिसूजा बहुत ही गंभीरता से राहुल के इलाज के लिए लाइन आफ एक्शन डा. मैथ्यू से जानना चाहा. डा. मैथ्यू तब तक सोच चुके थे कि इलाज कैसे शुरू करना है. उन्होंने मि. डिसूजा से कहा हमलोगों के लिए खाना अनिवार्य जरूरत है लेकिन हम सब स्वास्थ्य रहने के लिए खाने की मात्रा, उसकी गुणवत्ता और उस की प्रकृति पर ध्यान रखते हुए खाना खाते है. ठीक इसी तरह इंटरनेट या संजाल आज सभी के लिए अनिवार्य हो चुका है लेकिन इसका उपयोग खासकर राहुल जैसे बच्चों के लिए उसके पैरेंटस द्वारा तय किया जाना चाहिए कि संजाल पर बच्चा कितनी देर तक बैठेगा, क्या-क्या इस्तेमाल करेगा ? बच्चे को संजाल पर अकेला कभी भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए, डा. मैथ्यू ने मि. डिसूजा को बतलाया.

मि. डिसूजा ने सबसे पहले बिना राहुल को बताए उसके लैपटॉप के कई मुख्य फाइलों को डिलीट कर दिए जिससे नेट सर्फिंग में राहुल का दिक्कत आने लगी. कुछ दिनों तक तो राहुल उसे फार्मेट करता फिर चलाता और उसके पिता चुपके से फाइलों को डिलीट करते, ऐसा करने के पीछे मि. डिसूजा का सिर्फ एक ही मकसद था कि राहुल के लगातार संजाल पर बैठे रहने में व्यवधान आए, जो आया और यहीं पर मि. डिसूजा को मौका मिल गया राहुल को डायभर्ट करने का. राहुल को राहुल के पिता बाहर ले जाने लगे और फिर उसे दूसरे कई तरह के जैसे पेंटिंग, म्यूजिक, फिलाटेली आदि के संबंध में बताया और राहुल को इन चीजों में इंटरेस्ट लेने को कहा, परिणाम अच्छा निकला. राहुल धीरे-धीरे संजाल के जाल से मुक्त होने लगा.

 

अपहरण

आदित्य को स्कूल के बोर्डिंग में रहने का मन नहीं करता था. शहर में ही उसके मम्मी-डैडी रहते पर वह घर पर नहीं रह कर बोर्ड़िंग में रहकर थर्ड स्टैन्ड़र्ड में पढ़ता था. होस्टल के कमरों के रौशनदान पर रह रहे परिन्दों को देखकर आदित्य कभी-कभी सोचता था कि काश उसके भी पंख होते तो वह रोज-रोज उड़कर घर जाता और अपनी दादी से मिल आता. मम्मी-डैडी से मिलने की उसकी इच्छा नहीं होती थी. डैडी तो अपने कामों में इतने व्यस्त रहते कि आदित्य को उनसे मिले महीने के महीने गुजर जाते और रही मम्मी तो उनसे आदित्य की भेंट होती जरूर थी पर उन्हें भी कहां फुर्सत थी आदित्य के साथ वक्त गुजारने की. मम्मी भी तो किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी. आंधी की तरह सुबह तैयार होती, आदित्य सामने पड़ गया तो उसे चूमचाट कर हाथों में बड़ा सा चाकलेट पकड़ा देती और निकल जाती. घर पर एक दादी ही थी जो आदित्य को अपने सीने से लगाती जब वह बोर्डिंग से छुट्टियों में घर आता. दादी के साथ ही आदित्य सोता, दादी से ढ़ेर सारी कहानियां सुनता और उसे नींद आ जाती.

छुट्टियों में भी मम्मी-डैडी कहां आदित्य को समय देते. कभी रात की पार्टी, कभी घर पर पार्टी, कभी क्रिकेट मैच, कभी फिल्म शो आदि का आनंद लेने में समय बिता देते. अगर मम्मी-डैडी फुर्सत में रहते तो सारा दिन बस सोते रहते. शाम को उठकर डैडी लैपटॉप पर नेट लगाकर बैठ जाते और मम्मी ब्यूटी पार्लर चली जाती.

छुट्टियां ऐसी ही बीत जाती और फिर स्कूल बोर्डिंग जाने का समय आ जाता. मम्मी-डैडी कभी भी आदित्य के बोर्डिंग जाने पर रोते नहीं पर दादी सूबह से ही रोने लगती और मम्मी को कोसती की घर पर ही रहकर आदित्य पढ़ता तो क्या आसमान गिर पड़ता, जो एकलौते बेटे को बोर्डिंग मे डाल रखा है. ऐसी अमीरी से तो गरीबी ही बेहतर है, कम से कम बच्चे को सीने से तो लगाए रहते है माता-पिता.

बोर्डिंग में आदित्य का जब मन नहीं लगता तो वह फील्ड में छायादार वृक्षों के नीचे जा बैठता और घंटों बैठा रहता, उसे सिर्फ दादी की याद आती. बच्चे प्यार के भूखे होते है, उन्हें जो प्यार करता हो उसे बच्चे हर समय याद रखते है.

इलाके में बच्चे चुराने वाले सक्रिय थे. इधर-उधर घूमते बच्चे चुराने वालों की नजर बोर्डिंग में रह रहे बच्चों पर तो थी ही, खास कर आदित्य, जो अक्सर अकेला वृक्षों के नीचे बैठा देखा जाता, बच्चे चुराने वालों के टॉरगेट में आ चुका था. उन लोगों ने पता लगा रखा था कि आदित्य के माँ-बाप पैसे वाले अमीर लोग है. एक दिन बच्चे चुराने वालों के गिरोह का एक आदमी बोर्डिंग के चार दिवारी पर चढ़कर आदित्य से बातें करने लगा. बंदिश में आदित्य रहना नहीं चाहता था इसलिए आदित्य को उस आदमी में यह संभावना नजर आने लगा कि वह आदमी उसे बाहर घूमने ले जा सकता है. आदित्य को उस आदमी ने खाने को चॉकलेट और चिप्स भी दिया. धीरे-धीरे आदित्य उस आदमी से घूल-मिल गया और एक दिन उस आदमी ने आदित्य को बाहर घूमा लाने के नाम पर बोर्डिंग के बाहर ले आया और घूमाने ले गया. बातों ही बातों में आदित्य उस आदमी के साथ बहुत दूर निकल गया और फिर कार में दूर घूमा लाने की बात कह उसे शहर से दूर ले गया और एक खंड़रनूमा मकान में जा कर गाड़ी रोकी. बच्चा चुराने वाले गिरोह के अन्य सदस्य वहां जमा हो गए और सभी आदित्य को ले जाकर एक तहखाने के कमरे में बंद कर दिया. कमरे में ढ़िबरी जल रही थी.

आदित्य बहुत डर गया था. वह समझ गया कि उसका अपहरण हो चुका है. उसे अपनी दादी की कहानी याद आने लगी कि अमीर माँ-बाप के बेटे को बच्चा चुराने वाले चुरा कर ले जाते है. आदित्य की दादी उसे हमेशा कहा करती थी कि किसी अंजान आदमी की दी हुई किसी चीज को कभी नहीं लेना चाहिए और खाना तो कभी नहीं चाहिए. आदित्य को खुद पर गुस्सा भी आ रहा था कि उसने अपनी दादी की सीख क्यों नहीं याद रखी ?

दो-तीन घंटे बाद वही आदमी एक थाली में कुछ तुड़ी-मुड़ी रोटियां और हरी मिर्च के छोटे-छोटे टुकड़े लाकर दिया और एक ग्लास पानी भी साथ में दिया तथा आदित्य को डांटते हुए उसे खाकर सोने की बात कह गया. पहले तो आदित्य ने खाने को देखकर ही थाली दूर हटा दिया पर रात होने पर जब उसे जोर की भूख लगी तो वह क्या करता, उसी रोटियों को पानी में डालकर खा लिया और पानी से अपनी प्यास बुझायी. रात को उसे नींद नहीं आयी, वह डरता रहा और अपनी दादी को याद करता रहा.

आदित्य के मम्मी-डैडी को जब आदित्य के अपहरण की बात बोर्डिंग प्रबंधन के लोगों ने बताया तो आदित्य के मम्मी-डैडी के पांव तले जमीन खीसकती नजर आने लगी. आदित्य की मम्मी को कई बुरे ख्याल आने लगे, आखिर एकलौता बेटा था आदित्य अपने मम्मी और डैडी का. आदित्य के डैडी ने बोर्डिंग प्रबंधन का भला-बुरा तो कहा ही और आइन्दा बोर्डिंग में नहीं रखने की धमकी दे डाली. आदित्य के दादी को कुछ नहीं बताया गया क्योंकि वह रोती-धोती सो अलग और साथ में अपने बेटे और बहू को कोसते जीना हराम कर देती. आदित्य के मम्मी-डैडी ने तुरंत एसपी, डीसी को फोन पर इतला किया. रसूखदार होने के कारण शहर में आदित्य के मम्मी-डैडी का बहुत नाम और प्रतिष्ठा थी. पूरा पुलिस महकमा सक्रिय हो गया था आदित्य को खोजने में. शहर के सभी अपराधियों को पुलिस उठा कर लाइन हाजिर करवा रही थी परंतु अभी तक आदित्य के अपहरणकर्ताओं ने कोई मांग नहीं किया था.

उधर आदित्य के अपहरकर्ताओं को यह पता चल चुका था कि पुलिस सक्रिय हो चुकी है इसलिए ठिकाने से आदित्य को लेकर भागना जरूरी है. सुबह-सुबह गिरोह के लोगों ने एक बड़े से बोरे में आदित्य को भरकर बांध दिया और कार में लाद कर निकल पड़े दूसरे शहर जाने को. वे लोग जानते थे कि शहर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों में पुलिस चेकिंग होगी लिहाजा वे लोग जंगल के रास्ते से जाने की योजना बनाई. जंगल के रास्ते कुछ दूर जाने पर एक नदी मिली जिसमें काफी पानी था, कार किसी भी तरह नदी पार नहीं कर सकती थी. गिरोह के सभी चार आदमी कार से उतर कर नदी का मुआयना करने लगे. आसपास कोई पुल भी नहीं था. पानी नहीं रहने पर खाली गाड़ी बालू पर चलाकर ही पार की जाती थी. आदित्य बोरे में बंधा अकेला ही कार में पड़ा था. उसे दादी की वह कहानी याद आयी जब एक लोमड़ी शिकारी के जाल में फंस गया था और एक चूहे ने जाल कुतर कर लोमड़ी की जान बचायी थी और उसके बाद लोमड़ी और चूहा दोस्त हो गए थे.

आदित्य ने दांतों से बोरे को कुतरना शुरू किया और थोड़ी देर में बोरे में एक छेद बनाने में कामयाब हो गया फिर छेद से हाथ निकालकर रस्सी खोला और बोरे से बाहर आकर कार के अधखूले फाटक से निकल कर आसपास पड़े पत्थर, पत्ते उठाकर बोरे में भर दिया और बोरे को बांधकर छेद वाले भाग को नीचे की तरफ कर दिया और कार के ओट लेते हुए दूर निकल कर छुप गया.

अपहरणकर्ताओं को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि नदी पार कैसे की जाए. जब कुछ भी समझ में नहीं आया तो सभी कार पर आ बैठे और कार लेकर दूसरी तरफ जाने लगे. जंगल का रास्ता उनलोगों को देखा हुआ नहीं था इसलिए वे लोग जंगल में ही भटकने लगे.

आदित्य बहुत देर तक छुपा रहा और फिर वहां से निकलकर नदी के पास जा पहुंचा. नदी के किनारे बैठा-बैठा वह छोटे-छोटे कंकड़ पानी में फेंक रहा था कि घड़ा लेकर एक अधेड़ स्त्री को आते देखा. स्त्री ने सुनसान में एक सुंदर बच्चे को देखकर आश्चर्य में पड़ गयी और पूछा, '' तू कौन है बचवा, कहां तोहार घर, हींया कैसे अइलें बचवा ?''

आदित्य ने कहा मुझे कुछ लोग बोरे में बंदकर कार में रखकर लाए थे. किसी तरह बोरे से निकलकर छुपते-छुपाते यहां आया हूँ. उस स्त्री को आदित्य पर दया आ गयी, उसे अपने गले से लगा लिया और कहा, ''चल बेटवा, हमार साथ घर चला''

आदित्य तो यही चाहता था. उसे भूख भी जोर की लगी थी. वह स्त्री के साथ चल पड़ा. स्त्री ने उसे घर लाकर दूध और रोटी खाने को दिया, पानी पिलाया, फिर उसे एक चारपाई पर सोने को दिया. आदित्य खा पीकर आराम से चारपाई पर सो गया, उसे बहुत गहरी नींद आयी. उसने सपने में देखा कि उसकी दादी रो रही है. वह उठ बैठा, तब तक उस घर का मालिक गुहिया तुरी आ गया था. स्त्री ने अपने पति गुहिया को बच्चे के बारे में सब कुछ बतलाया. बच्चे से उसके माँ-बाप का पता जानकर दूसरे दिन गुहिया आदित्य को लेकर उसके घर ले गया.

आदित्य के घर पहुंचते ही भीड़ लग गयी. आदित्य के मम्मी-डैडी छत से जब तक आते बाहर ही बैठी उसकी दादी, गुहिया से हाथ छुड़ाते हुए आदित्य को ऐसे चूमने लगी जैसे कोई गाय अपने बछड़े को प्यार करती है. फिर मम्मी लिपट गयी, डैडी तो रोने ही लगे. गुहिया यह सब देखकर आनंदित अपने घर जाने को मुड़ा ही था कि आदित्य उसे पीछे से पकड़ लिया और अंदर ले गया.

ये कौन है बेटा, मम्मी ने पूछा ?

मेरे नये चाचा, पूरी कहानी सुनते ही डैडी ने पुलिस को इत्तला कर दिया. पुलिस जंगल में दबिश दिया और अपहरणकर्ताओं को पकड़ कर जेल भेज दिया.

सब कुछ बहुत बदल गया था. मम्मी तो अब आदित्य को छोड़ ही नहीं रही थी. डैडी भी जब तक आकर आदित्य के साथ खेलने लगते थे. दादी ने पंडित जी को बुलवा कर कथा करवाई. गुहिया और उसकी पत्नी, आदित्य के नये चाचा और चाची को बुलाया गया. मम्मी ने आदित्य के चाची को बहुत सारी साड़ियां और गहने दिए. चाचा को भी नये कपड़े दिए.

आदित्य बहुत उदास हो गया था जब उसके नये चाचा और चाची वापस जा रहे थे लेकिन आदित्य को खुशी इस बात की थी कि अब बोर्डिंग नहीं जाना पड़ेगा और अब वह अपनी दादी तथा मम्मी-डैडी के साथ ही रहेगा..

राजीव आनंद

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