मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - ऊधो दिन चुनाव के आये

 

ऊधो दिन चुनाव के आये

व्‍यंग्‍य

मुरारी बाबू ने ऊधो को बुलाया। बोले-

-” मित्र ! यह पत्र लो। सीधे मेरे निर्वाचन क्षेत्र में जाओ। जनता से मिलना। उन्‍हें कहना कि मैं राजकाज में इतना उलझ गया था कि नहीं आ सका। इस बार यदि वे मुझे चुनती हैं तो उनके एक-एक सपने पूरे कर दूंगा। उनका जो प्रेम मेरे प्रति है , उसे बनाये रखें। अब केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र में रहना है। अपनी प्‍यारी जनता का विरह अब मुझसे सहा नहीं जाता। मैं यह सत्‍ता का ताज अपने सिर पर धारण किये बैठा हूं तो किसके लिए ? जनता की खातिर ही न। मैं तो स्‍वभाव से ही संत हूं। इन टंटों में पड़ना नहीं चाहता। मगर क्‍या करूं अपनी प्‍यारी जनता के लिए यदि मुझे आग पर भी चलना पड़े तो चलूंगा। मेरा मन ही जनता है कि मैं अपनी जनता से कितना प्रेम करता हूं लेकिन मजबूर हूं। ”

इतना कह कर मुरारी रोने लगे। जब तक वह रोते रहे तब तक ऊधो खड़े रहे। उनके रो चुकने के बाद उन्‍होंने निवेदन किया -

-” स्‍वामी ! आपकी सेवा में रहते मुझे आज दसवां साल है। हम और आप एक ही साथ मथुरा से दिल्‍ली आये थे। मैं पढ़ा-लिखा था। इसलिए मेरी अक्‍ल किताबों में ही खत्‍म हो गई थी ं आपने किताबों में अपना समय खराब नहीं किया था इसलिए आपकी अक्‍ल बची हुई थी। आपने राजनीति ज्‍वायन कर ली। मैं आइ ए एस की तैयारी में जुट गया। मैं पी टी से आगे नहीं गया आप एम पी तक जा पहुंचे। आपका मेरे ऊपर उपकार है कि आपने मुझे अपना पी ए रख लिया जो आज मैं दिल्‍ली में रह पा रहा हूं। बाल मित्रता के कारण मै आपको एक सलाह देने की हिम्‍मत कर रहा हूं। आज भी आप जनता के मतों पर ही अपनी जीत के लिए निर्भर हैं ! विज्ञान ने इतनी तरक्‍की कर ली। चुनाव जीतने के इतने तरीके इजाद हो गये। आप आज भी वही पुराना तरीका आजमा रहे हैं। बूथ लूटना , बूथ छापना , नोट बांटना, फूट डालना, कल‍क्टर को पटाना, अधिकारियों का इस्‍तेमाल करना , इतने अचूक तरीके आपके सामने हैं। आप जनता के पास क्‍यों संदेश भेजना चाहते हैं। आपको तो पता ही है कि उनके मन में आपके प्रति कोई आदर नहीं है। उन्‍हें आपमें रूचि भी नहीं है। फिर आप अपना और मेरा दोनों का समय क्‍यों खराब कर रहे हैं? जनता को आप पत्र भेज रहे हैं। पत्र पढ़ने का समय किसके पास है। ”

मुरारी मुस्‍कराये। उन्‍हें पता था कि पढ़ा-लिखा आदमी है। बात को सीधे नहीं समझ सकता। उसे समझाने के लिए तर्क करने पड़ेंगे। काम चाहे एक मिनट को हो फिर भी तर्क एक घंटे का होगा। उन्‍हें पी ए तो दूसरा भी मिल सकता था। लेकिन उन्‍हें ऊधो की निष्‍ठा पर भरोसा था। उन्‍हें दल बदलने का डर नहीं लगता था। दूसरे का क्‍या पता आज उनके साथ हो कल किसी दूसरे के साथ। उन्‍होंने अपनी आवाज में मिश्री घोलते हुये कहना शुरू किया -

-” मित्रवर ! आपमें सच्‍चे मित्र के सभी लक्षण है। सच्‍चे मित्र का अर्थ ही है कि बिना भय या प्रीति के अपनी राय साफ साफ रखे। किसी के क्रोध की चिंता नहीं करे। आपके विचारों का मैं आदर करता हूं। बस आपसे यही निवेदन है कि समय की नाजुकता को समझें। आपको तो विदित ही है कि चुनाव आयोग आजकल आग उगल रहा है। उसके पर निकल आये हैं। पुराने सारे नुस्‍खे काम नहीं आ रहे। आप तो जानते हैं कि हम गांधी वादी आदमी हैं। आदर्श तरीके से ही राजकाज करना चाहते हैं। जनता तो जनार्दन होती है। उसके पास यदि आग्रह के लिए जाया जाये तो इसमें बुराई नहीं है। आप जायें। हमारे पत्र का जवाब यदि मिल जाये तो लेते आयेंगे नहीं तो कोई बात नहीं। ”

-” मगर जनता तो आपका नाम सुनते ही गाली देने लगती है। ऐसे में आपको वोट कैसे देगी ?मैं तो कहता हूं कि उन्‍हें कुछ भी कहना बेकार है ं। दूसरा ही कोई रास्‍ता देखना चाहिये। ”

-” आप भूल कर रहे है। गाली देना भी प्रेम का ही प्रतीक है। मनुष्‍य गाली उसी को देता है जिसे वह प्रेम करता है। आप तो ज्ञानी पुरुष हैं आपको विदित ही होगा कि घृणा भी प्रेम का ही दूसरा रूप है। मनुष्‍य जिससे प्रेम नहीं कर पाता उससे घृणा करता है। अनजाने व्‍यक्‍ति से न तो प्रेम होता है न घृणा। आप प्रेम की पराकाष्‍ठा को समझ नहीं पायेंगे। बस आप जाइये और मेरा संदेश उन तक पहुंचा दीजिये कि इस बार भी उस क्षेत्र से मैं ही उम्‍मीदवार हूं। बस उन्‍हें बांसुरी छाप याद रखना है। ”

ऊधो ने और तर्क करना पी ए धर्म के खिलाफ समझा और पत्र लेकर प्रणाम करके कूच कर गये। मन ही मन उनको इस बात की पीड़ा थी कि बार-बार मुरारी की बातों में जनता आ जाती है और अपना कीमती वोट दे देती है। न तो विकास का कोई काम होता है। न ही क्षेत्र से अपराध कम हुआ। जितने वायदे किये गये थे सब के सब अधूरे रह गये फिर भी मुरारी जीत जाते हैं। जनता उन्‍हें इतना प्रेम क्‍यों करती है। उन्‍हें पता था कि पढ़ाई-लिखाई के कारण उनके सोचने समझने की शक्‍ति समाप्‍त हो गई है। राजनीति करना उनके वश की बात नहीं है। उन्‍हें तो बस महीने की बंधी बधाई तनख्‍वाह चाहिए ताकि बाल बच्‍चों का पेट चल सके। मन ही मन उन्‍हें देश की जनता से प्रेम भी बहुत था। चाहते थे कि देश का विकास हो। देश तरक्‍की करे। जनता खुशहाल हो। लेकिन उन्‍हें कुछ नहीं करना पड़े। ये सब काम नेता करें तो अच्‍छा है नहीं तो जनता उन्‍हें गाली दे। जनता प्रदर्शन करे। आंदोलन करे। क्रांति करे। हां उनका वेतन उन्‍हें समय से मिलता रहे। उनके बाल बच्‍चे इसे आंदोलन फांदोलन से दूर ही रहें। मन ही मन मंथन करते ऊधो की गाड़ी मथुरा की सीमा पर आ पहुंची। इसके बाद की सड़क की हालत उन्‍हें पता थी। गाड़ी को ड्राइवर ने दूसरे गियर में डाल दिया। गति बीस किमी प्रति घंटे की हो गई। बगल से साइकिल वाले निकल जा रहे थे। झांक कर देखते कि नेता जी हैं या कोई और है। दरअसल मुरारी की गाड़ी लेकर ही ऊधो जी चल पड़े थे। नेता जी आ रहे हैं। यह खबर जंगल के आग की तरह समूचे क्षेत्र में फैल गई। लोग जूटने लगे। नंदगांव के लोगों को पता था कि नेता जी यहीं आयेंगे और जायेंगे कहां ? नंदगांव में ही पले बढ़े हैं। आखिर गांव की माटी उन्‍हें खींच ही लाई। आनन फानन मे एक शामियान तान कर। एक लाउडस्‍पीकर लगा दिया गया जिसमें गाना बजने लगा-तेरे मस्‍त मस्‍त दो नैन ․․․․․․․․․․․․․। प्रेरक गानों की झड़ी लग गई। ऊधो जी भी जानते थे कि पांच किमी की यह यात्रा तकरीबन आधे घंटे का है। उन्‍होंने सोचने का कार्यक्रम छोड़कर सोने का मूड बनाया। अभी ढ़ंग से एक झपकी भी नहीं ले पाये थे कि गाड़ी हुच․․․․․हुच․․․․․हुच․․․․․करके खड़ी हो गई। ड्राइवर ने पूरे अदब से बताया कि गाड़ी पंचर हो गई है। इस सूचना को भी ऊधो जी ने सर्दी जुकाम की मामूली घटना की तरह लिया और स्‍टेपनी लगाने का इशारा करके पुनः नींद पूरी करने की कोशिश करने लगे। आखिरकार स्‍टेपनी लगा कर गाड़ी चल पड़ी। थोड़ी ही देर में गाड़ी नंदगांव की सीमा पर पहुंची। गांव के लोग हाथों में फूलों की माला लिये खड़े दिखे। जोर जोर से नारे लगा रहे थे। मुरारी बाबू की जय। मुरारी बाबू जिंदाबाद। ऊधो जी को अपने आंखों पर भरोसा नहीं हुआ। कमाल है इतन ा बड़ा परिवर्त्‍तन अभी पिछले महीने जब वे अपनी गाड़ी से आये थे तो लोग उन्‍हें घेर-घेर कर तरह तरह के ताने दे रहे थे। कुछ लोग तो साफ साफ कह रहे थे कि आने दो इस बार डंडों से स्‍वागत करेंगे। क्षेत्र में न तो पानी है न बिजली है। सड़क की हालत तो सब को दिख ही रही है। नेता जी को कुछ नहीं दिखता ? यही लोग आज किस तरह हाथों में माला लिये खड़े हैं। नारे लगा रहे हैं।

गाड़ी पहुंची। ऊधो जी नीचे उतरे। उनके उतरते ही लोग चुप हो गये। माला वाला तो दूर लोग उन पर हंसने लगे। एक सज्‍जन ने आगे बढ़कर गाड़ में झांका कि कहीं अंदर मुरारी बाबू होंगे। पी ए पहले उतर आया होगा। मगर निराशा ही हाथ लगी। उन्‍होंने लोगों

ऊधो कर समझ में ये खोरगधंधा नहीं आया। उन्‍होंने अलग ले जाकर उससे राज़ की बात जाननी चाही। उसने बताया कि ऐसा करने पड़ बाकी लोग समझेंगे कि वास्‍तव में पत्र उसी के लिए था लेकिन फट जाने पर वह पछता रहा है। नहीं तो बाकियों पर प्रभाव कैसे पड़ेगा।

थोड़ी ही देर में सभी लोग शामियाने के नीचे जमा हो गये। आखिर ऊधो मुरारी बाबू के दूत की हैसियत से आये थे। इसके पहले कि ऊधो कुछ कहें लोगों ने कहना शुरू कर दिया-

-” क्‍या ऊधो भैया ! मुरारी बाबू को सत्‍ता क्‍या मिली। हमें तो बिल्‍कुल ही भूल गये। पहले तो हमारे साथ उठना बैठना , खाना-पीना था। हम ही उनके लिए सबकुछ थे। अब दिल्‍ली क्‍या गये हमें याद ही नहीं करते। पिछले चुनावों में आये थे तो वायदा किया था कि हमेशा आते रहेंगे लेकिन नहीं सत्‍ता के नशे में जाकर धुत्‍त हो गये। ”

-” एक बात समझ में नहीं आती जब आप लोगों को मुरारी बाबू से इतनी चिढ़ है तो उन्‍हें चुनते ही क्‍यों हो ? लोकतंत्र का अर्थ है कि आप अपने विवेक से निर्णय लें। सही नेता का चुनाव ही लोकतंत्र को मजबूत करता है। ”

-” भैया ! यह लोकतंत्र कहां पाया जाता है ? यदि आपको कहीं मिले तो अपने गांव में बुलाकर लाइये। सच्‍ची बात तो यह है कि हम किसी लोकतंत्र फोकतंत्र को नहीं जानते। हम तो केवल मुरारी को जानते हैं। वह मुरारी जो हमारी जाति के हैं। उनसे हमें उम्‍मीद है कि एक न एक दिन अपनी जाति के लिए विकास के कार्य करेंगे। हम तो केवल यही जानते हैं कि हमारे मन में केवल मुरारी हैं। जब वोट हमें देना ही है तो अपनी जाति के आदमी को ही क्‍यों न दें। दूसरी जाति वाले जो लूटेंगे उससे तो अच्‍छा है कि अपनी जाति का आदमी ही खाये। ”

-” आप दूसरों को मौका देकर तो देखिये। ”

-” ऊधो मन नाहिं दस बीस

एक हुतौ सो गयो श्‍याम संग ॥

एक जनता का जवाब था। उसने विस्‍तार से समझाना शुरू किया -

-” भैया ! मुरारी हमारे बचपन के साथी हैं। हमारी अपनी जाति के हैं। हमारी संख्‍या नंदगांव में ही नहीं , पूरे मथुरा में लगभग चालीस प्रतिशत है। यदि अपनी जाति के उम्‍मीदवार को वोट दें तो दूसरी जाति को मौका कभी नहीं मिलेगा। विकास हो चाहे नहीं हो लेकिन दूसरी जाति वाले गर्दन नीची करके तो चलेंगे। सरऊ नाक उठाकर यह तो नहीं कहेंगे कि हमारी जाति का सांसद है। सो हम तो जब भी वोट देंगे तो मुरारी को ही देंगे। आप चाहे जो कहें। हमें तो लगता है कि आप को ही मुरारी बाबू से जलन होने लगी है। कहीं विरोधियों से तो नहीं मिल गये ? दूसरे को वोट देने के लिए कहना तो मित्र का काम नहीं है। ”

-” आप भूल कर रहे हैं। मैं पहले अपने क्षेत्र का विकास चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि सभी लोग सुखी हों। आप दिल की जगह अपने दिमाग का इस्‍तेमाल करें। सवाल जाति या धर्म का नहीं है। सवाल है जनता के समुचित विकास का। ”

-” भैया हमारे पास दिमाग है कहां ? हम तो ज्ञानी आदमी है नहीं। इतना ही जानते हैं कि मुरारी हमारे अपने हैं। पूरे मथुरा में मन के अलाव कुछ नहीं है। आप प़ढ़े-लिखे आदमी है। बड़ी बड़ी बातें जानते हैं। हम तो केवल अपनी जाति को जानते हैं। मुरारी हमारे बीच के आदमी हैं। रही बात विकास की तो वह तो कोई नहीं करेगा। कम से कम एक बात की खुशी तो होगी कि घी कहां गिरा तो दाल में। ”

-” आपलोगों समझने की कोशिश करनी चाहिए। जनता के हाथ में एक ही बार शक्‍ति आती है उसका भी यदि ठीक से इस्‍तेमाल नहीं हो सका तो कभी भी किसी भी क्षेत्र का विकास नहीं होगा।”

उनकी यह बात सुनकर सारी जनता मुंह फिरा कर हंसने लगी। एक दूसरे की ओर देखकर इशारे करने लगी। एक दूसरे को कोहनी मारने लगी। उन्‍हें इस प्रकार नारी अस्‍त्रों का प्रयोग खुलकर करते देखकर ऊधो घबरा गये। उन्‍हें अपने ज्ञान पर बहुत विश्‍वास था। जी के , जी एस के मास्‍टर माने जाते थे अपने समय में। विश्‍व के सभी देशों की राजधानी और प्रधानमंत्री उनको याद हुआ करते थे। मगर इस परीक्षा में असफल हो रहे थे। एक जनता ने दूसरी की ओर देखकर कहा-

-” भैया ! मुझे तो ऐसा लगता है कि बेचारे खार खाये बैठे हैं। ”

-” ऐसा तो नहीं कि दूसरी पार्टी से उधार खाये बैठे हैं। ”

-” नहीं ज्ञानी व्‍यक्‍ति हैं , ऐसा तो नहीं करेंगे। दिल्‍ली वाले इतना तो जानते ही हैं कि कब किसका दामन पकड़ना है , उसके साथ रासलीला मनानी है और कब दामन झटक कर चल देना है। ऊधो जी भी इतना जरूर जानते होंगे कि इस बार भी मुरारी बाबू की ही सरकार बनने वाली है। सारे एक्‍जिट पोल तो यही बता रहे हैं। ऐसे में उनका साथ छोड़कर बड़ी गलती करेंगे। रही बात हमारी तो हम अपना वोट तो किसी को भी देने को तैयार हैं। चाहे मुरारी जी ले जायें या कंस स्‍वामी के खाते में जाये। ”

एक बंदा उधर कोने में बैठ बांसुरी पर ऊंगली फेर रहा था। जोर जोर से सांसें ले रहा था। उसको देखकर ही लग रहा था कि चंद घंटों का मेहमान है। उसे इस तरह करते देखकर ऊधो से नहीं रहा गया। उन्‍होंने उसका परिचय और ऐसा करने का कारण पूछा-

-” परिचय तो पूछना ही व्‍यर्थ है। यह अब अपने आपका मुरारी की कहता है । पिछले चुनावों में उनके लिए बूथ छापने गया था। पुलिस पकड़कर ले गई। मुरारी बाबू ने कोई मदद नहीं की। और तो और उन्‍होंने तो पहचानने से भी इन्‍कार कर दिया। उसके बाद बड़ी कठिनाई से दारेागा जी की मनभराई करके इसे वापस लेकर आये थे। तब से इसकी यही हालत है किसी से कुछ नहीं कहता। बस हाय हाय करता रहता है। ”

-” यही कारण है कि मैं तुम लोगों को निष्‍पक्ष और निर्भय चुनाव की बात बता रहा हूं। आखिर क्‍या मिला इसे बूथ छापकर। कहीं का नहीं रहा। ”

-” नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है। इसकी तो पहचान बन गई। आखिर मुरारी बाबू के लिए कितने लोग जेल गये हैं। पूरे इलाके के लोग इसे पहचानते हैं। मुरारी बाबू के खास चमचों में इसकी पहचान होती है। वे जब भी यहां आते हैं इसके घर पर जरूर जाते हैं। पिछले बार जब उस दारोगा का तबादला झुमरीतलैया हो गया था । तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। बेचारा आकर पांव पकड़ने लगा। अपने तबादले को रोकवाने के लिए आठ आठ आंसू बहा रहा था बोला पहले आपकी पूजा करूंगा उसके बाद ही मुरारी बाबू खुश होंगे। हमलोगों को तो इसके भाग्‍य से इर्ष्‍या होती है। अब यदि मौका मिला तो हम भी मुरारी बाबू के लिए बूथ छापेंगे। ”

-” कभी देश के लिए भी सोचिए। ”

-” देश को तो हम जानते ही नहीं। उसके मां-बाप कौन हैं। वह दिखता कैसा है। किस जाति का है। उसका धर्म क्‍या है ? उसकी पहचान क्‍या है ? आप भी लगता है नहीं जानते। जानते होते तो मुरारी बाबू को छोड़कर चले जाते। हकीकत तो यह है कि देश को कोई नहीं पहचानता। सब अपनी जरूरतों को जानते हैं। हम जानते है अपने नंदगांव को। यहां साठ से सत्‍तर प्रतिशत तक हमरी जाति के ही वोटर हैं। मुरारी की जगह पर जिस दिन कोई अपनी ही जाति का मजबूत उम्‍मीदवार खड़ा होगा तो उसे वोट डालने की सोचेंगे। तब तक के लिए आप अपना ज्ञान अपने पास ही रखें तो बेहतर होगा। ”

ऊधो समझ गये कि उनका ज्ञान आउटडेटेड हो चुका है। लोकतंत्र की असली पहचान जाति और धर्म से ही है। लोकतंत्र तो वर्त्‍तमान में आया है। जाति और धर्म तो तब से है जब से आदमी है। यही सनातन सत्‍य है। शेष मिथ्‍या है। ज्ञान का सार तत्‍व है स्‍वार्थ। जहां स्‍वार्थ सधे वहां सींग घुसाना ही मानवमात्र के कर्त्‍तव्‍य हैं। वोट देना तो एक बहाना मात्र है। वस्‍तुतः यह संबंधों का सेतू है। वोट देकर हम अपना संबंध न केवल उम्‍मीदवार से जोड़ लेते हैं बल्‍कि दूसरे वोटरों से भी हमारे संबंध मजबूत होते हैं। इतना ज्ञान काफी था।

ऊधो भागते हुये आये और मुरारी बाबू के चरण पकड़ लिए। बोले-

-” हे पतितपावन ! आपने अपने इस भक्‍त पर बड़ी कृपा की लोकतंत्र का सही अर्थ बताकर आपने मेरे ऊपर उपकार किया है। मैं आपके चरणों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। आप मेरे लिए भी कुछ न कुछ जुगाड़ बना ही देंगे। ”

मुरारी बाबू मुस्‍कराये। उन्‍होंने मन ही मन निर्णय लिया कि अब पी ए बदलने का समय आ गया है।

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर , नांदेड़

पिन- 431736

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