रविवार, 1 दिसंबर 2013

गिरिराजशरण अग्रवाल की कहानी - फ़रिश्ता

फ़रिश्ता

डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

चार दिन बाद कर्फ़्यू में दो घंटे की ढील दी गई तो वे दोनों दोस्त हुसैन के घर इकट्ठे हुए। पिछले चार दिन के दौरान कोई भी एक-दूसरे का हाल नहीं जान सका था। कौन किस हालत में था, ज़िंदा था या मारा जा चुका था, किसी को किसी का पता नहीं था।

जब शहर में दंगा भड़का और दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश के साथ-साथ अनिश्चितकालीन कर्फ़्यू लागू करने की घोषणा की गई, तब जो जहाँ था, वहीं रह गया।

शहर पर या तो पुलिस का राज था अथवा दंगाइयों का। तीनों एक-दूसरे के बारे में चिंतित थे लेकिन कोई ऐसा तरीक़ा दिखाई नहीं दे रहा था कि वे एक-दूसरे की कुशलता जान सकते। दोनों दोस्तों को हुसैन के बारे में अधिक चिंता थी, जहाँ दंगाइयों से उसका बच निकलना एक अजूबा ही था।

विनोद ने देखा कि हुसैन बहुत थका-थका-सा है, बिल्कुल निढाल-सा। जैसे कई-कई रातों से एक पल को न सोया हो। आँखें लाल थीं और पलकें सूजकर मोटी हो गई थीं। चेहरे पर हलका पीलापन छाया हुआ था।

'कैसे हो यार!' विनोद भावुक होकर हुसैन से चिपट गया था, लेकिन उसे आगे कुछ भी पूछने का साहस नहीं हो रहा था।

विनोद ने देखा कि हुसैन की आँखों में आँसू हैं और ओठ कुछ कहने को फड़फड़ा रहे हैं, लेकिन वह कुछ कह नहीं पा रहा है, मानो शब्दों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया हो।

तीनों ड्राइंग रूम में आमने-सामने बिछी कुर्सियों पर बैठ गए। शाहिदा आहट सुनकर बाहर आई तो दोनों ने उसका अभिवादन किया। वह चुप थी। ऐसा लगता था जैसे उसके चेहरे पर छाई रहनेवाली ताज़गी उससे रूठकर कहीं दूर चली गई हो।

हुसैन ने उससे तीन कप चाय लाने के लिए कहा और एक टूटे-थके व्यक्ति की तरह सामने रखी मेज़ पर पाँव फैला दिए।

अभी सुबह के दस बजे थे और कर्फ़्यू में दो घंटे की ढील दी गई थी। इसके बावजूद लोग सड़कों पर नहीं निकले थे। पुलिस की गाडि़याँ हार्न बजाती हुई इधर-से-उधर गुज़र रही थीं। राहत-सामग्री बाँटनेवाली गाड़ी मुहल्ले में आ गई थी। उसके चारों तरफ़ लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। ये वे लोग थे, जिन्हें पिछले चार दिन घोर अभाव में और संकट के बीच काटने पड़े थे।

शाहिदा चाय लेकर आई। मेज़ पर चाय रखकर उसने विनोद से प्रश्न किया, 'तुम यहाँ कैसे पहुँचे? रास्ते में तो पठानों का मुहल्ला पड़ता है, डर नहीं लगा तुम्हें?'

विनोद ने गंभीर मुद्रा में शाहिदा को देखा और कहा, 'डर तो बहुत लगा, पर भाभी प्रेम का भाव डर की भावना से अधिक प्रबल होता है। हम दोनों यहाँ पहुँच ही गए। राकेश तो एक बार हिम्मत हार बैठा था, फिर भी आ ही गया।'

हुसैन अब तक आँखों मूँदे चुपचाप बैठा था। उसने पैर सिकोड़े और सीधा होकर बैठ गया। शब्द अब उसका साथ दे रहे थे। विनोद और राकेश को संबोधित करते हुए हुसैन ने अपने मौन को तोड़ा, 'कैसी अजीब बात है! आदमी अपने ही जैसे आदमियों से डरता है। उन आदमियों से भी, जिन्हें वह जानता है, जिनके साथ उठता-बैठता आया है; जिन्हें वह पहचानता ही नहीं, जानता भी है।'

'हाँ हुसैन, दु:ख की बात तो यही है।' राकेश ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की, 'जब हम पठानों के मुहल्ले तक आए तो गली के नुक्कड़ पर कुछ लोगों को खड़ा हुआ देखकर सहम गए। वैसे तो सब जाने-पहचाने थे, लेकिन हमें लगा कि वे पलक झपकते ही हम पर हमला कर सकते हैं। जब मिद्दा पहलवान आगे बढ़ा तो मेरी तो जान ही निकल गई। मुझे लगा कि अभी एक तेज़ चमकदार छुरी मेरी छाती के पार हो जाएगी; लेकिन मिद्दा आगे बढ़कर बराबर वाली गली में मुड़ गया।'

'हाँ राजेश, ट्रेजडी तो यही हुई है। लोगों में विश्वास नहीं रहा है, भरोसा उठ गया है उनके मन से; और यह इतना बड़ा नुकसान हुआ है कि उसकी भरपाई खुदा जाने कब होगी।' हुसैन ने धीरे-धीरे अपनी बात पूरी की और चाय सिप करने लगा।

'पर तुम तो ठीक रहे? तुम्हारी चिंता ने मुझे नींद से कोसों दूर रखा।' विनोद ने पूछा।

विनोद के इस प्रश्न का हुसैन ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह एकदम चुप बैठा था, बुत-जैसा। जैसे उसने कुछ भी सुना ही न हो।

'हुसैन, लगता है तुम कुछ छिपा रहे हो। कैसे रहे तुम! तुम जिस हाते में रहते हो, वहाँ तुम सबसे अकेले थे। तुम्हारे संप्रदाय का कोई और व्यक्ति यहाँ नहीं रहता।' राकेश ने हुसैन को कुरेदा, 'हमें डर था कि तुम और तुम्हारा परिवार शायद ही जीवित मिले। बताओ, क्या कुछ गुज़रा यहाँ पर?'

जैसे-तैसे हुसैन के शब्द होठों तक आए। उसकी गंभीरता उसकी पीड़ा को खुद बता रही थी। धीरे-धीरे हुसैन ने कहा, 'मुझसे क्या पूछते हो राकेश! मुझ पर इतना भयानक कुछ नहीं गुज़रा, जितना इस पूरे शहर पर गुज़रा है। सुना है, पूरा बाज़ार राख का ढेर हो गया है। सजी हुई दुकानें भूतों का डेरा बनी खड़ी हैं। सब्ज़ी मंडी श्मशान बन गई है। बड़वान और बकली में भीषण नरसंहार हुआ है।' हुसैन की आवाज़ लड़खड़ा गई। आँखों की कोरों पर गीलापन उभर आया।

'हाँ हुसैन, हम उधर से होकर आए हैं। तुम देखो तो पहचान नहीं पाओगे कि यह तुम्हारा वही शहर है, जो कुछ दिन पहले था। ग़रीबों के खोखे तक नहीं छोड़े इन शैतानों ने।' राकेश को शहर का पूरा ब्यौरा देने की हिम्मत नहीं हुई। वह चुप हो गया।

'सुना है हुसैन, तुम पर भी हमला हुआ था।' विनोद ने पूछा।

'हाँ, ठीक सुना है तुमने।'

'फिर।'

'फिर क्या! मैं कैसे बच गया? यही ना! मुझे भी एक अजूबा लगता है, सब-कुछ। हैरत होती है। मैं तो अब भी कई बार अपने को छूकर देखता हूँ- क्या सचमुच जीवित हूँ। मेरी पत्नी और मेरे बच्चे क्या सचमुच जीवित हैं और क्या मैं वाकई तुम दोनों के बीच बैठा बात कर रहा हूँ।' हुसैन ने मौत के मुँह से अचानक बच जानेवाले आदमी की तरह उत्तर दिया।

'लेकिन राकेश भाई! यह भी उतना ही सच है कि इस हाते के मालिक बूढ़े राजेंद्रपाल यहाँ न होते तो हम सब ज़रूर मार दिए गए होते।' अपनी दु:ख-गाथा सुनाने की पहल करते हुए शाहिदा बोली, 'यही बूढ़ा व्यक्ति हमें अपमान और मौत से बचानेवाला फ़रिश्ता बन गया।'

'कैसे!' विनोद के मन में जिज्ञासा पंख फैला रही थी।

'दरअसल, हमें शक ही नहीं था कि इस हवेली में भी कुछ गड़बड़ हो सकती है। शक होता भी तो कैसे! हम लोग कई वर्षों से एक परिवार की तरह रहते आए हैं। कभी कोई फ़र्क़ महसूस नहीं हुआ।'

'फिर!' राकेश सारी बात एकबारगी जान लेना चाहता था।

'तुम्हें तो पता ही है कि हमारे बराबर नौबहारसिंह का परिवार है। सामने चौधरी मलखानसिंह रहते हैं। सब इस प्यार से रहते आए थे, मानो एक ही परिवार के लोग हों।' हुसैन ने एक गहरी साँस ली और अपने को सँभालने का प्रयास किया।

शाहिदा चुपचाप इन सबके वार्तालाप को सुन रही थी। जब हुसैन चुप हुआ तो शाहिदा ने कहना आरंभ किया। उसके स्वर में कंपन भी था और रोष भी- 'पर उस पल तो मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।'

'क्या हुआ भाभी!' राकेश ने बीच में बात काटते हुए पूछा।

'जब मुझे पता लगा कि मेरी बड़ी बेटी को अगुआ करने की साजिश हो चुकी है... ।' इतना कहते-कहते शाहिदा फूट-फूटकर रोने लगी। तीनों ने उसे चुप कराने की कोशिश की। उसे सांत्वना दी।

विनोद और राकेश दोनों परेशान हो उठे थे। उन्हें लग रहा था कि वे भी इस षड्यंत्र के अंग हों। उनका मन उन्हें कोस रहा था। 'क्या और कैसे हुआ' के भाव उनके चेहरे पर उभर रहे थे। दोनों एक साथ बोल उठे- 'तुम्हें कैसे पता लगा? किसने बताया?'

'दंगा जिस दिन भड़का, मैं अपने घर पर ही था। बाहर से शोर सुनाई दिया तो मैंने कमरे से बाहर निकलकर देखा। चारों ओर धुआँ आसमान की ओर लपक रहा था। रुक-रुककर गोलियाँ चलने की आवाज़ें आ रही थीं।, बम फट रहे थे। नारे लग रहे थे। मेरी पत्नी अब तक निश्चिंत भाव से हैंडपंप के पास बैठकर कपड़े धो रही थी। शोर सुनकर वह घबरा गई और बच्चों को एक कमरे में भेज दिया।' हुसैन ने उस दिन की घटना का विवरण देते हुए कहा।

अब तक शाहिदा अपने को सँभाल चुकी थी। हुसैन की बात को आगे बढ़ाते हुए उसने बताया- 'कमरे में मेरा मन नहीं लगा। आवाज़ें लगातार आ रही थीं। जो कुछ घट रहा था, उसे भाँपने के लिए मैं आँगन में आ गई। हवेली में रहनेवालों की गतिविधियाँ अचानक तेज़ हो गई थीं। औरतें, बच्चे, आदमी सब हवेली की आठ फुट ऊँची छत पर चढ़ गए थे। अपने बचाव के लिए उन्होंने ईंट-पत्थर जमा करने शुरू कर दिए थे। तभी पुलिस की गाड़ी घोषणा करते हुए गुज़री- 'शहर में दंगा भड़क उठा है। प्रशासन ने दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए हैं। अनिश्चितकाल के लिए कर्फ़्यू लगा दिया है। कोई आदमी घर से बाहर न निकले।' इस घोषणा का कितना असर हुआ यह तो पता नहीं, लेकिन तभी बराबर में रहनेवाले नौबहारसिंह दफ़्तर से घर आए। उन्होंने बताया कि जुलूस पर पथराव के साथ-साथ शहर में दंगा भड़क उठा है। चारों तरफ़ आग लगी हुई है, दुकानें जल रही हैं, मकान जल रहे हैं। स्कूटर और कारें ईंघन बनी सड़कों पर पड़ी हैं। जुलूस में शामिल दो हिंदू औरतों का अपहरण कर लिया गया है।'

आगे की बात हुसैन ने बताई, 'मुझे लगा जैसे नौबहार के तेवर आज बिल्कुल बदल गए हैं। उसके चेहरे पर तनाव था, आवाज़ में कठोरता। शायद इसी तरह का अनुभव हवेली के मालिक राजेंद्रपाल सिंह को हुआ हो। उन्हें नौबहारसिंह द्वारा बताए समाचार पर विश्वास नहीं हुआ। वे बोले- 'ऐसा नहीं हो सकता। यह संभव नहीं है। इतने बड़े जुलूस में से दो औरतों को गुंडे उठाकर नहीं ले जा सकते। पुलिस भी होगी और फिर औरतें काग़ज़ का टुकड़ा तो नहीं थीं कि मोड़कर जेब में रख लीं।'

'किंतु राजेंद्रपाल सिंह का यह तर्क कारगर नहीं हुआ। कुछ ही देर में यह अफ़वाह पूरी हवेली और आस-पास के घरों में फैल गई। मैं सहमा हुआ था, किंतु मुझे विश्वास नहीं होता था कि इस अफ़वाह की इतनी तेज़ प्रतिक्रिया होगी और उन्माद में लोग अनहुई घटना का बदला लेने की ठान लेंगे।' इतना कहते-कहते हुसैन की आवाज़ भर्रा गई।

सब चुप थे। माहौल में भारीपन छा गया था। सबकी निगाहें झुकी हुई थीं। सब हैरान थे।

शाहिदा ने घटना के सिलसिले को आगे बढ़ाया- 'इस बीच मेरा लड़का बाहर से दौड़ता हुआ आया। पता नहीं वह कैसे कमरे से निकलकर पड़ोस के घर में पहुँच गया था।

'वह हाँफ रहा था।'

'क्या हुआ?' मैंने उससे इतना-भर पूछा।

'माँ, वे आपा के बारे में कुछ कह रहे थे।'

'क्या कह रहे थे? जल्दी से बता।' मैंने कहा।

'सामनेवाली आंटी के घर राजन कह रहा था- बदले में हुसैन की लड़की को उठा लो।'

'अली हसन अभी छोटा है। वहाँ जमा भीड़ में से किसी ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया।'

शाहिदा चुप हो गई और रूमाल से अपने आँसू पोंछने लगी।

'यह पहली मौत थी, राकेश जिसके आतंक से हमें उस शाम गुज़रना पड़ा। मैंने मकान मालिक से कहा- 'मैं खतरे में हूँ। मेरी बेटी को उठा लेने की साज़िश हो रही है।'

'मेरा स्वर लड़खड़ा रहा था। जैसे-तैसे मैंने उन्हें सारी बात बताई। सत्तर साल का बूढ़ा राजेंद्रपाल अपनी जगह शांत बैठा रहा, बिल्कुल उस चट्टान की तरह अडिग, जो बड़े-से-बड़े तूफ़ान में भी अपनी जगह से नहीं हिलती। उसके चेहरे पर क्रोध की एक लहर आई और फिर पल-भर में ग़ायब हो गई।'

'वह तुमसे बदला लेंगे। उस बात का बदला, जो कभी हुई ही नहीं। कमीने, शैतान कहीं के!' बूढ़े की धीमी आवाज़ मेरे कानों में आई और मैंने महसूस किया कि उसका धीमा स्वर शेर की गरज में परिवर्तित हो गया है।

'जब तक मैं जीवित हूँ, बड़े-से-बड़ा सूरमा भी इन बच्चियों की तरफ़ देखने की ज़ुर्रत नहीं कर सकता, समझे। पूरे परिवार को मेरे पास भेज दो और तुम भी आ जाओ यहीं।'

'मैंने बूढ़े राजेंद्रपाल की तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल चिराग़ों की तरह रोशन थीं और चेहरे पर शूरवीरों जैसा तेज था।'

'राजेंद्रपालसिंह का परिवार इस शहर में बड़े जमींदारों में गिना जाता था। जागीर तो कबकी जब्त हो गई है। हाँ, उस ज़माने के कई लोग अब भी उनके और उनके पिता करतारसिंह की बहादुरी के क़िस्से अक्सर दुहराते हैं।'

'मैंने संदेह-भरी निगाह से राजेद्रपालसिंह की ओर देखा- राजपूतों जैसी दाढ़ी-मूँछें, शरीर पर मांस का नाम नहीं, हड्डियों का ढाँचा। सोचा यह बूढ़ा आदमी मेरी सहायता क्या करेगा; लेकिन बचने का और कोई रास्ता भी तो नहीं था उस वक़्त मेरे सामने।'

'इस विशाल हाते के निचले हिस्से में सबके सब किरायेदार हैं, यह तो तुम जानते ही हो विनोद लेकिन उ पर वाली मंज़िल भी, जिसमें राजेंद्रपालसिंह रहते हैं, कोई सुरक्षित जगह नहीं है। चारदीवारी जगह-जगह से टूट गई है, दरवाज़े कमज़ोर हो गए हैं। कोई भी एक झटके में दरवाज़ा तेड़कर ऊपर आ सकता है।'

'मैंने घबराकर अपने चारों ओर देखा। मैं समझ गया था कि मैं बिल्कुल अकेला हूँ, असुरक्षित। लेकिन बूढ़ी बाँहों का सहारा लेने के अलावा अब मेरे पास कोई चारा भी तो नहीं था।'

'मैं नीचे आया। इतनी ही देर में मेरी बड़ी बेटी भय से पीली पड़ गई थी, जैसे वर्षों से रोगी हो।

शाहिदा की आँखों के आँसू रुकते ही नहीं थे। यह आसमान की ओर हाथ उठाए खुदा से दुआएँ माँग रही थी। मैंने इसकी तरफ़ देखा, इसके होंठ काँप रहे थे, जैसे यह कुछ कहना चाहती हो।

'इससे पहले कि मैं कुछ पूछता शाहिदा खुद कहने लगी- 'बेइज़्ज़ती का वह लम्हा आने से पहले मैं अपने बच्चों को लेकर छत से कूद जाती हूँ। गुंडों के हाथों बेइज़्ज़त होने से बच जाएँगे हम-।'

'खुदकुशी करोगी, आत्महत्या-!' निराशा-भरे लहज़े में मैंने उससे पूछा।

तभी बूढ़े राजेंद्रपालसिंह के आने की आहट हुई। वे हम सबको लेकर हवेली की उ परी मंज़िल में पहुँच गए।

वह रात संकट से भरी हुई थी। एक पल को आँख नहीं झपकी। नींद कैसे आ सकती थी! रुक-रुक कर बम फटने और गोलियाँ चलने की आवाज़ें आती रहीं। थम-थम कर शोर मचता, नारे सुनाई देते- 'नारा-ए-तकबीर, अल्लाहो अकबर' 'हर-हर महादेव, जय बजरंग बली की।'

उस रात हम लोगों के साथ यह बूढ़ा फ़रिश्ता भी जागता रहा, ताकि शैतानों को हम लोगों तक आने से रोक सके।

एक-एक पल रात बीती। सुबह आज की ही तरह उजली थी। पंछी उसी तरह चहचहा रहे थे, जैसे पहले चहचहाया करते थे। आदमी की दरिंदगी का प्रभाव शायद उन पर नहीं पड़ा था। हमने हवेली की निचली मंज़िल में आकर देखा। सब-कुछ सामान्य-सा लगा, लेकिन माहौल में कोई तनाव-सा था। पड़ोसियों के अंदर कुछ टूट-सा गया था। कोई चीज़ बदल-सी गई थी। राजेंद्रपालसिंह शांत थे। उनके चेहरे पर घबराहट का कोई चिह्न नहीं था। तभी अचानक चारदीवारी के बाहर एक तेज़ धमाका हुआ, शोर मचा।

मार लो, मार लो, या अली, हर-हर महादेव। सारे लोग फिर से छत पर चढ़ गए। पड़ोस के कच्चे घरों में आग के शोले भड़कने लगे, सामान लूटा जाने लगा। हवेली के बड़े दरवाज़े पर उत्तेजित लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई।

शोर मचा-

'दरवाज़ा खोलो, खोलो दरवाज़ा।'

'मैं खौफ़ से पीला पड़ गया। मौत सामने थी और उससे बचने का कोई उपाय मेरे पास नहीं था। तभी किसी महिला ने हवेली का दरवाज़ा खोल दिया। भीड़ अंदर घुस आई। मौत मेरे कानों पर दस्तक दे रही थी।'

'मैंने राजेंद्रपालसिंह की तरफ़ देखा। वहाँ अब भी कोई हलचल नहीं थी। भीड़ आगे बढ़ी। लोगों के हाथों में लाठी, डंडे और बरछियाँ थीं। मैं सहमकर बरामदे की दीवार की ओट में खड़ा हो गया। भीड़ और पास आ गई।'

शोर बढ़ रहा था, नारे तेज़ हो रहे थे। अचानक बूढ़ा फ़रिश्ता बाघ जैसी अँगड़ाई लेकर खड़ा हुआ और अपने फेफड़ों की पूरी ताक़त से दहाड़ा- 'आगे मत बढ़ो। हुसैन तक पहुँचने के लिए तुम्हें मेरी लाश से गुज़रना होगा। हथियार डाल दो।'

ललकार इतनी प्रबल थी, इतनी शक्तिशाली थी कि बलवाइयों का साहस छूट गया। क्षण-भर वे स्तब्ध खड़े रहे और फिर धीरे-धीरे बाहर निकल गए। मौत मेरे कानों पर दस्तक देकर वापस चली गई।

अब सोचता हूँ विनोद, हड्डियों के ढाँचे की यह शारीरिक ताक़त नहीं थी, नैतिक शक्ति थी, मानवीय बल था यह, जिसने मुझे बचाया। गुंडे बुजदिल होते हैं। नैतिक बल उनके पास नहीं होता। इंसानियत की एक ललकार उनके हौसले पस्त कर देती है। बात यह है विनोद कि समाज में पाशविकता कभी-कभी इसलिए बढ़ जाती है कि मानवता क्षीण होने लगती है। हमें ऐसा नहीं होने देना है।'

'तुम ठीक कहते हो हुसैन।' राकेश गर्व से बोला- 'लेकिन क्या तुमने उस पल एक और बात सोची थी?'

'क्या।' हुसैन ने पूछा।

'बड़ा मामूली-सा सवाल है। पर है बड़ा ज़रूरी।' राकेश बोला।

'क्या?' हुसैन ने फिर पूछा।

'यदि उस बूढ़े व्यक्ति पर, जो तुम्हारी रक्षा कर रहा था, हमला हो जाता तो तुम क्या करते? तुम उसे कैसे बचाते?'

'नहीं, मैंने नहीं सोचा। मैं सोचने की हालत में था भी नहीं। लेकिन मुझे सोचना चाहिए था, सोचना चाहिए था मुझे- मैं स्वीकार करता हूँ।'

तभी बूढ़ा राजेंद्रपालसिंह उधर आता हुआ दिखाई दिया। वे तीनों उसके स्वागत में खड़े हो गए।

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