मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

अश्वनी कुमार शर्मा की कविताएँ

clip_image002

अश्‍वनी कुमार शर्मा

 

उदास रंग                                  

सूने घर में
कब से पड़े
रंग
उदास हो रहे
कहते
अपने मन की गाथा
झर झर बहते
उनके आंसुओं को
कोई भी
रोक ना पाता।

और फिर
उनकी
मुख मुद्रा, हाव भाव
मैं
ज़रा भी
समझ ना पाता।

तड़प रहे
वो
केनवास पर
जल्‍दी से
छा जाने को!
‘‘ललक‘‘ उनकी
कुछ तो कहती
कुछ भी
कर जाने को।

फिर भी
ऐसा तो लगता
बोलते वो ‘रंग‘
रंगों में डूब जाने को।
उदास रंग
कहते मुझसे
गले उनके लग जाने को।

 

 


सेवानिवृत

अभी तो
तू सेवानिवृत्त नहीं हुआ है
मत घबरा
एक युग का अन्‍त
दूसरा शुरु हुआ है।

वो थी पहली पारी
दूसरी का
आगमन हुआ हैं।
अभी तो
चलना है
मीलों आगे
उसी में तेरा
सुनहरा जीवन
छुपा हुआ है।

न सुध थी
न होश था
दिन रात मेहनत कर
आज भी
36 वर्षो का अनुभव
तुझ में पड़ा हुआ है
तभी तो
तू सेवानिवृत्त नहीं हुआ है।

 

 

सुर्ख शाम

दिन की रोशनी
शरमा कर
सुर्ख शाम
बन गयी
वही शाम
तनहा
रात में
ढल गयी।

रात-वो
काली रात
झिलमिल सितारों से
सज गयी
सितारों से सटे
आकाश में
आकाश गंगा
बह गयी।

मैं एकटक
यह रोचक नजारा
देखता ही रह गया
पता ही न चला
मुझे,
वो रात कब
सुहानी भोर में
ढल गयी।
और फिर
दिन की रोशनी
शरमा कर
सुर्ख शाम में ढल गयी।

 

 

 

ओ माझीं रे

दूर है किनारा
मांझी मतवारा
मंझधार
सागर के बीच
मीठे सुर में
कुछ तो गाये रे
नैया उसकी
मस्‍त पवन में
हिचकोले खाये रे
हो हो हो हो -------------

तूफान, आंघी को चीर
अपने सपनों की
धुन में
घनघोर घटा को तोड़
वो तो
नैया संग
बहता जाऐ रे
उसे कौन समझाये रे
हो हो हो हो----------

हाथ में पतवार
को थामे
मांझी मतवारा
गाता चला जाए रे
गाते गाते
सारा जीवन
उसका
नैया में
बीता जाऐ रे।
हो हो हो हो----------

दूर है किनारा
वो तो
अपनी धुन में
कुछ तो गाये रे।

 

 

 

बूढी कमर

पिता और बेटे का रिश्ता ऐसा है जैसे शरीर और आत्मा का  और इस बात से आप सब मेरे साथ सहमत होगे। मैं यह भी दावे के साथ कह सकता हूँ कि हर बेटा अपने पिता के प्रति आज्ञाकारी होता है उन्ही बेटों के लिए कुछ लिख रहा हूँ। …

पिता की
बूढी कमर को
और झुकने मत देना
रोक लेना
पकड़ लेना उसे
अपने सशक्त हाथों से।

तेरे कद को
जिस तरह बड़ा किया है
सींचा है तुझे मेहनत से
वही जनता है।

तुझे क्या पता
जिस ने
अपने हाथो से
तुझे ढाला है]] पकाया है
सोने क़ी तरह
तराश कर खड़ा किया है तुझे
उसने अपने साथ

वही पिता खड़ा है
तेरे साथ
उम्मीद भरी तरसती
आँखों से निहारता तुझे।

अब तेरी बारी है
उसके जीवन कि ढलती शाम में
रंग भरने की
उसे हंसाने की, खिलाने की
लगा देना उसके कंधों पर
एक आशा  की फुलकारी A

भर देना ताकत अपनी
उसके बूढ़े झुर्रिओं वाले बदन में
बन जाना लाठी ठोस
जिसको पकड़ चल पाये
वो पिता तेरे साथ
आगे तक।

 

 

आओ
स्‍कूल चलें हम

उज्‍जवल भविष्‍य की
आशा लेकर
नन्‍हें कंधों पर
किताबों का बोझ उठा
घर से
निकल पड़े
ये बच्‍चे
चिल्‍लाते हंसते
कहते
आओ स्‍कूल चले।

बचपन को उड़ा
हवा में
कुछ कर गुजरने की जिद
मन में लिए
उपदेश लेने की होड़ में
आगे पीछे
दौड़ पड़े
ये बच्‍चे
एक सुर में
कहते
आओ स्‍कूल चलें।

आकाश की बुलंदियों को
छूने के
सपनों को सहेज
नेहरु, सुभाष, गांधी
बनने
गुरुओं के चरण स्‍पर्श
करने
सब को संदेश देते
ये बच्‍चे
कहते
आओ स्‍कूल चले।

 

जलता दीपक

ऐ दीपक
खुद को
अंधेरे में रखकर
जलता है तू--पर
देता दूजों को
उजियारा।
टिमटिमाती
लौ से तेरी
रोशन होता
अंधियारा.........................

तूं तो है
‘‘दिया‘‘
निस्‍वार्थ
सारे जग को
जगमगा
प्रकाश से अपने
सबके दिलों में
प्‍यार का
दीपक जला दिया!
पर तूने
ऐ दीपक
बदले में
कुछ न लिया
वाह रे ‘‘दिया‘‘

 

 

बिन टंगी तसवीर

क्‍यों
रख छोड़ा है
मुझे
एक कोने में
एक
अनाथों की तरह।

इन सूनी पड़ी
दीवारों पर
सजा तो दो
मुझे ज़रा
अपनी छाती से
न सही
दीवारों की
चौड़ी छाती पर
लगा तो दो
मुझे ज़रा।

तुम्‍हारे ही हाथों
की बनाई
सजाई हूं मैं
फिर क्‍यूं
फेंक दिया है मुझे
कचरा समझ
फटे कागज की तरह
विनम्र प्रार्थना है मेरी
जिन हाथों से
छोड़ा मुझे
उन्‍हीं हाथों से
गले अपने
लगा तो ज़रा।

 


छोटी सी मुलाकात

छोटी सी इस
मुलाकात में
उसने
बहुत कुछ
कह दिया
बस
कुछ ही लम्‍हों में
उसने
हंसकर
प्‍यार का मुझे इक
तोहफा दिया।

निशब्‍द सा होकर
स्तब्‍ध सा
देखता मैं
उसे रह गया
अचानक यह
हो क्‍या गया
यह सब
सोचता मै रह गया।

इक प्‍यारा सा अहसास
दिल में
सहेजकर
पुलकित था मैं कि
उसने
इसी मुलाकात में
मुझे इक
सुन्‍दर सा रिश्‍ता दिया।

और फिर
वो अपने रस्‍ते चल दिया
मैं अपने रस्‍ते हो लिया..........................

 

 

नया चेहरा

नये चेहरे से
बात हुई
मुलाकात हुई।

यूं लगा
कि भीनी भीनी
बरसात हुई।

और फिर
इसी बरसात में
उस नये चेहरे से
इक नये रिश्‍ते
की शुरुआत हुई।

उस नये चेहरे
में छुपा
इक रिश्‍ता
शायद मेरा ही था
पहचानने में
देर सी हो गयी।

 

अश्‍वनी कुमार शर्मा
सेवा निवृत स्‍टेशन अधीक्षक
रतलाम-मध्‍यप्रदेश

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------