शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

राजीव आनंद की लघुकथाएँ

 

जिंदगी चलती रही......

पिताजी पिछले एक वर्ष से खटिया पर थे. शुरू-शुरू में घर के सभी सदस्‍यों ने बड़ी सेवा-टहल किया. ब्‍याहता बेटियों ने भी कुछ महीनों के अंतराल में आती-जाती रहीं. रिश्‍तेदारों ने भी दो एक दिनों के अंतर में व्‍यग्रता से हाल समाचार जानने के लिए फोन करते रहे. साल भर गुजरते-गुजरते सभी को पिताजी के वर्तमान हालात की आदत सी हो गयी और सभी ने चुप्‍पी साध ली, जिंदगी सभी की पूर्ववत चलती रही.....

अंतर

एक टीस सी उठी थी हृदय में जब पिंकी सभी किताबें लौटा गयी थी. लगा था जैसे किताबें उसके पास ही रहती तो ज्‍यादा अच्‍छा था. मुझे पिंकी से किताबें वापस पाकर जरा भी अच्‍छा नहीं लगा था.

जबकि मेरे तथाकथित मित्र ने जब सालभर बाद मेरी किताब एक दिन वापस कर दिया तो मेरी जान में जान आयी. मुझे मेरी किताब वापस मिल जाने से बेहद खुशी हुयी थी.

गरीबी का फायदा

बच्‍चे को डेयरी मिल्‍क चॉकलेट, कुरकुरे, मोबाइल फोन, लैपटॉप, आईपॉड खरीद कर दिलाने की हैसियत नहीं थी मेरी. बारह साल बाद अचानक वकालत के रोजगार में मंदी आ गयी थी. एक-एक पैसा जोड़कर भी घर चलाना मुश्‍किल हो रहा था. बड़ी मशक्‍कत से मैंने बच्‍चों को किताबें पढ़ने की आदत डाली और उन्‍हें मैदान में खेलाना शुरू किया. माड़-भात खाने की आदत अब बच्‍चों को लग गयी थी. बच्‍चे तंदुरूस्‍त हो रहे थे, शारीरिक तौर से भी और अच्‍छी-अच्‍छी किताबें पढ़ने से मानसिक तौर से भी.

अब बच्‍चों की भविष्‍य की चिंता मुझे नहीं थी क्‍योंकि खेलना और किताबों को अपना दोस्‍त समझना किसी भी बच्‍चे का भविष्‍य उज्‍जवल बना सकता है. सचमुच गरीबी का बहुत बड़ा फायदा मिला था मुझे.

आंखों की मुस्‍कान

बहुत से सड़क छाप आवारा कुते एक बकरी को अचानक दौड़ाने लगे. रास्‍ते में भगदड़ मच गयी थी. ट्यूशन पढ़कर लौटती लड़की फंस गयी थी आवारा कुत्तों की भगदड़ में. एक छड़ी जैसे ही मैंने दो एक कुते को मारी, बकरी भी बच गयी और वो लड़की भी. सहमी हुयी बकरी और सहमी हुयी लड़की दोनों के आंखों में मुस्‍कान देखकर मेरा प्रयास सार्थक हो गया था.

सच्‍चा आनंद

ऋचा को देखकर मेरा मन आनंदित हो जाता जैसे भोर में उगते हुए सूरज को देखकर, जैसे शाम के डूबते सूरज की लालिमा का देखकर. सूरज हमें आनंद देता है और ऋचा का सौंदर्य भी. हम न सूरज से कुछ चाहते है और न ऋचा से. यही सच्‍चा आनंद का राज है.

लिव-इन

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शादी क्‍यों नहीं कर लेते, विक्‍की ने पूछा राकेश से. पिछले छह महीने से तू रह रहा है उस लड़की के साथ, क्‍या जिस्‍मानी संबंध भी बना लिया है तुमने, विक्‍की ने राकेश से जानना चाहा ?

राकेश बोला, अरे यार, बिना जिम्‍मेवारी उठाए औरत, उसका जिस्‍म, उसका साथ मिलना तो सिर्फ लिव-इन में ही संभव है और फिर देश का कानून भी तो हमारे साथ है, अगर शादी कर लिया तो फिर यह स्‍वच्‍छंदता कहां ?

राजीव आनंद

1 blogger-facebook:

  1. ​​ये समाज और परिवार की हकीकत है जो आपने अपनी कहानी में दिखाई है जिंदगी चलती रही......, और दूसरी कथा "अंतर " स्वाभाविक है , गरीबी का फायदा, सार्थक और प्रभावी , आंखों की मुस्‍कान, बेहतरीन सच्‍चा आनंद सच में अच्छा अनुभव कराती है ! एक कथा बाकी है अभी

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