सोमवार, 16 दिसंबर 2013

रामवृक्ष सिंह का आलेख - अंग्रेजी का लुगदी बनाम हिन्दी का छुई-मुई साहित्य

(डॉ. रामवृक्ष सिंह)

हाल ही में लखनऊ में संपन्न हुए लिटरेचर फेस्टिवल (6 से 8 दिसंबर 2013) में प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र कोहली ने अंग्रेजी के वर्तमान भारतीय लेखन को लुगदी साहित्य करार दिया। अपनी सामान्य मेधा से हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि लुगदी साहित्य से आशय अंग्रेजी के उस स्लीज और लिजलिजे साहित्य से है, जो समकालीन अंग्रेजी लेखकों की कथा-सामग्री का मुख्य उपजीव्य बनकर उभर रहा है। उथले काम-संबंधों का बेबाक वर्णन इस लेखन की खासियत है। मज़े की बात यह है कि अंग्रेजी साहित्य-जगत में इस लेखन को मानक स्वीकार किया जाता है, और इस पर अंग्रेजी साहित्य के इदारों में पुरज़ोर तरीके से प्रशंसात्मक चर्चा होती है।

प्लेटो, अरस्तू और सुकरात के समय में जब प्रायः पूरी दुनिया में साहित्यिक विधा के तौर पर पद्य का ही बोलबाला था, और भारतीय साहित्य में काव्य तथा साहित्य शब्द प्रायः समानार्थी रूप में व्यवहृत किए जाते थे, तब प्लेटो ने “दि रिपब्लिक” में कहा कि काव्य पढ़ने से मनुष्य की कुत्सित भावनाओं का पोषण होता है, लिहाजा बच्चों और युवाओं को कविता जैसी वाहियात चीज कतई नहीं पढ़नी चाहिए। प्लेटो ने व्यवस्था दी- कवियों का रिपब्लिक में कोई स्थान नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट पता चलता है कि पश्चिमी जगत में लुगदी साहित्य की परंपरा बहुत पुरानी है, जिसके चलते प्लेटो जैसे नीतिकारों को भी यह लगा कि यदि युवा पीढ़ी को इस गलाज़त से बचाना है तो काव्य जैसी बुराई से ही इनको दूर रखा जाए। इसके बावज़ूद अंगरेजी साहित्य में कामुकता का सन्निवेश बराबर होता आया है और आज वह भारत के मूर्धन्य अंग्रेजी लेखकों, खासकर कथा-साहित्यकारों का प्रमुख उपजीव्य बनकर उभरी है। इस प्रवृत्ति से ग्रस्त साहित्य को कोहली महोदय ने लुगदी साहित्य कहकर अभिहित किया है।

भारतीय काव्य-शास्त्र में साहित्य में नौ रसों के परिपाक का उल्लेख मिलता है। मुक्तक आदि लघु आकार वाली रचनाओं में जहाँ रसों के छींटे पड़ते हैं, वहीं महाकाव्यों में रस-निष्पत्ति के पूर्णतया संपन्न होने की परिस्थिति निर्मित हो पाती है। महाकाव्यों में मुख्यतया तीन स्थायी रसों की परिकल्पना की गई है, वे हैं- शान्त, वीर और शृंगार। जिस लुगदी साहित्य की चर्चा कोहली महोदय ने की है, उसके कुछ उदाहरण भारतीय साहित्य में भी मिल जाते हैं। कालिदास-कृत अभइज्ञानशाकुंतलम्, ऋतुसंहार और कुमारसंभव में जिस घोर, उद्दाम श्रृंगारिकता का वर्णन मिलता है, उसके आगे किसी भी काल का कोई भी कामुकतापूर्ण साहित्य पानी भरता है। पिछली सदी में उर्दू लेखकर इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। इस नाते लुगदी साहित्य अंग्रेजी के एकाधिकार की विषय-वस्तु नहीं, बल्कि यह सार्वभौमिक है और स्वभावतः भारतीय साहित्य में भी इसके निदर्शन होते हैं। आदिकालीन विद्यापति की पदावली और पृथ्वीराज रासो में भी यह प्रवृत्ति दिखती है।

रीतिकालीन काव्य में आकर यह परंपरा और जोर पकड़ती है। मध्यकालीन सामंतों के दरबारी कवियों द्वारा हिन्दी के इस लुगदी साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा रचा गया। इसके लिए रीतिकालीन कवियों को उत्तर मध्यकालीन, विलासी सामंतों से राजकीय प्रश्रय भी मिला और पुष्कल पुरस्कार भी।

भारतीय काव्य-शास्त्र में साहित्य के हेतुओं के रूप में नैतिक मूल्यों की भी प्रतिष्ठा हुई है। मध्यकालीन साहित्यकारों में बहुत-से ऐसे हैं जो प्रमुखतया कोरे नीतिकार ही थे। बहुत-से साहित्यकारों के लिए साहित्य स्वयं में कोई हेतु नहीं था, बल्कि राधिका-कन्हाई के लीला-वर्णन का माध्यम मात्र था(आगे के कवि रीझिहैं तो कविताई, न तो राधिका कन्हाई सुमिरन कौ बहानो है)। राम-काव्य परंपरा के मूर्धन्य कवि गोस्वामी तुलसीदास के लिए तो रामजी की भक्ति ही प्रथम प्राप्य थी। कविता तो उनकी राम-भक्ति उपोत्पाद मात्र है। लिहाजा भक्ति-काव्य-परम्परा के इन कवियों ने बहुत मर्यादित रूप में भक्ति-काव्य की रचना की और इस प्रकार शान्त रस की तरंगिणी प्रवाहित की। इस काल को हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने स्वर्णिम युग कहकर अभिहित किया है। इस नाते इस काल की प्रवृत्तियाँ परवर्ती रचनाकारों के लिए कहीं न कहीं आदर्श के रूप में अवस्थित हैं। उत्तर मध्यकाल यानी रीतिकाल की रचनाओं में श्रृंगारिकता के बाहुल्य के कारण कतिपय विद्वानों और समालोचकों ने तो उसे ‘शृंगार काल’ कहना ही श्रेयस्कर समझा।

बाद में, यानी सन 1850 के उपरान्त स्वतंत्रता आन्दोलन, सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पुनर्जागरण आदि के कारण भारतीय साहित्य में श्रृंगारिकता एक प्रकार से वर्ज्य विषय हो गई और उसका स्थान वीरता, ओजस्विता, देश-भक्ति आदि ने ले लिया। हृदय की कोमल भावनाओं का वर्णन कहीं हुआ भी तो वीरता और देश-भक्ति के क्रोड़ में, जैसाकि प्रसाद, हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त आदि की रचनाओं में देखने को मिलता है।

पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी कविता के विरेचक प्रभाव और औदात्यकारी रूप के परिकल्पना है। वहाँ भी काव्य का उद्देश्य मनुष्य की कुत्सित भावनाओं को जगाकर उसे पतन की ओर ले जाना नहीं है। किन्तु भोगवादी पाश्चात्य संस्कृति में साहित्य हमेशा ही जीवन के करीब रहा है। इसलिए वहाँ प्रेम और भोग के लिए सहज स्वीकार भाव मिलता है। भारत ने चाहे दुनिया को कामसूत्र दिया हो, किन्तु जब जन-साहित्य में काम-चर्या की बात आती है तो यह अपने आदर्शों के खोल में चला जाता है। कहीं-कहीं हमारे महाकाव्यों, महाभारत आदि में प्रेम और शृंगार का चर्चा है भी तो अत्यन्त मर्यादित रूप में। कहते हैं कि कुमारसंभव में महादेव शिव और माँ पार्वती की रति-क्रियाओं का खुलकर वर्णन करने के कारण महाकवि कालिदास को कुष्ठ हो गया था। हमारा ज्यादातर साहित्य धार्मिक आख्यानों के इर्द-गिर्द रचित है। स्वयं कोहली महोदय भी ऐसे ही रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। कालिदास को कुष्ठ हुआ था या नहीं, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। कुष्ठ दैवी प्रकोप का परिणाम होता है, इसके प्रमाण तो और भी नहीं मिलते। बुद्धिमान और तर्कप्रवण व्यक्ति तो यही धारणा बनाएगा कि कवियों को देवी-देवताओं की काम-लीला करने के काम से विमुख करने के लिए ही यह हवा उड़ा दी गई होगी। वैसे उस ज़माने में यदि नैतिकता के ठेकेदारों का वश चलता तो कालिदास का बहुत-सा साहित्य गायब करवा देते। पर साहित्यानुरागियों के सौभाग्य से वे सफल मनोरथ नहीं हो पाए, और हमारा देश उस अमूल्य साहित्यिक विरासत से वंचित होते-होते रह गया।

भक्ति और नीति के दम पर जिस प्रकार काम को भारत के आम साहित्य से विस्थापित रखा गया, उसी प्रकार कई अन्य मानवोचित सरोकारों व आवश्यकताओं से भी। यही कारण है कि दलितों, मजदूरों, किसानों, महिलाओं आदि के अधिकारों की चेतना से हमारा पारंपरिक साहित्य प्रायः शून्य ही रहा। बंगाल में राजा राममोहन राय, उत्तर में आर्य समाज आदि के प्रयासों से इनमें से कुछ का वर्णन भारतीय साहित्य में हुआ भी, किन्तु साम्यवाद, यथार्थवाद आदि की लहरें पश्चिम के पूरी तरह भारतीय राजनीति, साहित्य और चिन्तन पर हावी हो जाने के बाद ही भारत में पूरी तरह उठ पाईं। क्षणवाद और उत्तर आधुनिकता के फलसफे भी पश्चिम से आए।

यह ठीक है कि मध्य-कालीन भारत में दर्शन, अध्यात्म आदि के स्तर पर बहुत गहन चिन्तन हुआ और बड़े पैमाने पर हुआ, किन्तु आम आदमी के जीवन को रोज मथनेवाले काम और सेक्स की एक प्रकार से वर्जना ही रही। यदि किसी को उसके प्रकटीकरण, प्रस्तुतीकरण और अंकन की आवश्यकता प्रतीत हुई तो उसने खुद को समाज से निष्काषित कर लिया, घने वनों और कंदराओं में छिपकर उसने अपने मन की रमणीय भावनाओं को उकेरा। अजंता, एलोरा, खजुराहो आदि ऐसे ही कलाकारों के शिल्प हैं।

सच्चाई तो यह है कि हिन्दी का दक्षिण-पंथी आलोचक मानक हिन्दी साहित्य को छुई-मुई साहित्य बनाने पर आमादा है। इन आलोचकों की चेतना मध्य-युगीन है और मानव-जीवन की प्रायः सभी सहज वृत्तियाँ उनके तईं वर्ज्य हैं। यही कारण है कि बहुत-सा हिन्दी साहित्य आज भी हमारे साहित्यिक समालोचकों के लिए अस्पृश्य और सर्वथा त्याज्य है। इस साहित्य में बहुत-से रूमानी उपन्यास और कहानियाँ भी शामिल हैं, जो हमारे समाज की कच्ची-पक्की सच्चाइयों और विद्रूपों को सतह पर लाकर पटक देते हैं, उनका डाइसेक्शन कर डालते हैं।

पूर्वोल्लिखइत, उर्दू -लेखक सआदत हसन मंटो और लेखिका इस्मत चुगताई को अपने बेबाक लेखन के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़े, क्योंकि जिस समाज के लिए उन्होंने लिखा, समाज का जो तबका उनकी लिपि और लेखन को पढ़-समझ सकता था, उसके लिए उनका लेखन असह्य हो उठा था। हालांकि उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज की सच्चाइयों का वर्णन किया और इस नाते वे अपने-अपने पाठकों द्वारा खूब पसंद भी किए गए। हिन्दी में ऐसे लेखकों को अदालत में घसीटने के उदाहरण नहीं मिलते। अलबत्ता उनके लिए इससे बड़ी सजा तजवीज की जाती है और पैदा होते ही, हमेशा-हमेशा के लिए जाति व समुदाय से बाहर कर दिया जाता है। बल्कि कोशिश तो यह की जाती है कि उन्हें सीधे-सीधे काला पानी ही भेज दिया जाए। ‘माज़रा क्या है’ शीर्षक अपनी पुस्तक में डॉ. कोहली ने लिखा है कि अपनी रचनाओं के प्लॉट पर किसी से चर्चा कर लेने से उस रचना की भ्रूण-हत्या हो जाती है। यह सच है। इन पंक्तियों के लेखक को इसका तजुर्बा है। लेकिन किसी लेखक को उसकी बेबाकी, या यों कहें कि जिन्दगी की सच्चाइयाँ बयान करने के एवज़ उसे हमेशा के लिए लेखकीय बिरादरी से बहिष्कृत कर देना कहाँ की भलमनसाहत है? इससे उस बेचारे गरीब लेखक की सारी रचनात्मक संभावनाओं की बाल-हत्या नहीं होती क्या? हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखकों, समालोचकों और मठाधीशों को इस मुद्दे पर ज़रा सहृदयता से सोचना चाहिए।

हिन्दी के मठाधीशों की असहिष्णुता का आलम यह है कि यहाँ विश्वविद्यालय के शिक्षकों और पत्रकारों के अलावा कोई और रचनाकार साहित्यकारों की जमात में बैठ ही नहीं सकता। हिन्दी साहित्य-जगत का अपना सीधा-सा गणित है। जब तक आपका लिखा छपता नहीं, तब तक आप बहुत अच्छे रचनाकार होकर भी प्रकाश में नहीं आ पाते। आपको कोई जानता-पहचानता नहीं है। प्रकाश में लाने का काम करता है प्रकाशक। वह तब तक किसी को प्रकाश में नहीं लाता, जब तक प्रकाशित कृति के खरीददार विपुल संख्या में उपलब्ध न हों, यानी उससे आर्थिक लाभ न हो। इस नाते प्रकाशक पक्का व्यवसायी होता है, जोकि आज के अर्थ-प्रधान युग में कुछ अनुचित भी नहीं है।। विश्वविद्यालय के शिक्षक एक-दूसरे का लिखा अपने-अपने यहाँ खरीदते-खरीदवाते हैं। उनकी बहुत-सी पुस्तकें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के पुस्तकालयों में खरीदी-रखी जाती हैं। पढ़ी जाती हैं या नहीं, यह अपने-आप में पुस्तकालय-विज्ञान और साहित्य, दोनों ही संकायों के अनुसंधित्सुओं के लिए शोध का विषय हो सकता है। शिक्षक-लेखक के साहित्यानुरागी शिष्य भी कुछ पुस्तकें खरीद लेते हैं।

उधर पत्रकारों के साथ यह सुविधा है कि वे खुद अपने पत्र-पत्रिका में अथवा साथी पत्रकारों के रिसालों में अपनी रचनाएं आराम से छपवा लेते हैं। कुछ नैसर्गिक प्रतिभा, कुछ रुचि और कुछ अभ्यास, इन सबके दम पर धीरे-धीरे इन दोनों श्रेणियों के लेखक साहित्यकार व रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित होते चले जाते हैं।

हिन्दी जगत में जितने लेखक हुए हैं, सबकी पृष्ठभूमिक कमोबेश शिक्षक, पत्रकार वाली ही रही है। किसी अन्य माध्यम से जीविकोपार्जन करनेवाला रचनाकार जब ऐसे लोगों के बीच जगह बनाने की कोशिश करता है तो ये भाई लोग उसे कुहनिया कर बाहर कर देते हैं। हमारे अधिकार-क्षेत्र से बाहर निकलो। वहाँ जाकर मरो या जियो, इससे हमें कोई वास्ता नहीं। वे अपने बीच किसी और को बैठने या पैठने नहीं देते।

हिन्दी के मठाधीशों की इस असहिष्णुता का साबका हर उस साहित्यकार से पड़ता है, जो न शिक्षक है न पत्रकार।

हिन्दी वालों की यह अनुदारता ही देश में हिन्दी की दुर्दशा का कारण है। देवनागरी से इतर लिपियों में लिखी गई हिन्दी को हम हिन्दी नहीं मानते। भला हो उन उदार साहित्येतिहासकारों का, जिन्होंने अरबी लिपि में रचित प्रेमाख्यानों को अवधी-हिन्दी की रचना माना। यदि हमारे आजकल के हिन्दी-इतिहासकार होते तो बहुत-सा सूफी साहित्य आज हिन्दी जगत से बाहर होता। उर्दू लिपि में लिखा होने के कारण बहुत-सी ग़ज़लें और शेर-ओ शायरी हिन्दी साहित्य की परिधि से बाहर है। जिन फिल्मी गीतों को हिन्दी वाले गाते नहीं अघाते, वे वस्तुतः देवनागरी से इतर लिपि में लिखे गए। तो क्या कारण है कि हमारे शिक्षक-साहित्यकार इन पद्य रचनाओं को हिन्दी की रचना नहीं मानते?

ऐसे अनुदार शिक्षकों, लेखकों और समालोचकों के हाथों जाकर भाषा और साहित्य की क्या दुर्गति हो सकती है, उसका मुजाहिरा हिन्दी की वर्तमान दशा से सहज ही हो जाता है। सरकारीकरण के कारण हिन्दी का कितना अपकार हुआ है, कभी इसपर हम लोगों ने ग़ौर फर्माया है? सरलीकरण और तथाकथित मानकीकरण के नारे ने हिन्दी व देवनागरी की जो दुर्गति की है, वह किसी से छिपी नहीं है। आज यूनीकोड के प्रचलन में आ जाने के बाद, टाइपराइटर की सीमाओं से आक्रान्त लंगड़ी-लूली हो चुकी देवनागरी का किस प्रकार उद्धार किया जा सकता है, कभी इस पर किसी ने ध्यान दिया है? बेहतर होता कि हिन्दी के मठाधीश इन मुद्दों पर ध्यान देते।

अंग्रेजी की लुगदी चाहे जैसी हो, अंग्रेजी का प्रकाशक और पाठक उसे अपना हृदय-हार बनाए हुए है। अधिकतर हिन्दी और हिन्दीतर भाषी भारतीय अंग्रेजी नहीं जानते। फिर भी वे अंग्रेजी की चिन्दी-चिन्दी करके उसे सीने से लगाए फिरते हैं। हिन्दी को जो सोने का मुकुट आपने पहनाया था, वह आपकी अहम्मन्यता और बेरुखी के चलते, किस गंधैले कमोड में पड़ा जंग खा रहा है, ज़रा उसपर भी तो ध्यान दीजिए।

यदि ऐसा न होता तो हिन्दी के हृदय-प्रदेश लखनऊ का ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ शुद्ध भारतीय शब्दों में ‘साहित्य-समारोह’ के नाम से जाना और पुकारा गया होता। अपनी परंपरा और भाषा के प्रति इतना गौरव-बोध तो हमारे मन में बचा नहीं और हम दूसरी पनपती, पल्लवित होती भाषा और साहित्य-धारा को गरियाते नहीं थकते।

जब हम निर्णय देने बैठते हैं तो अपने समय और युग की सच्चाइयों पर भी हमारी निगाह होनी चाहिए। न्यायपालिकाएँ प्रायः ऐसा करती हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो हमारे न्यायालय लिव-इन रिश्तों को जायज न ठहरा रहे होते, न ही दुनिया के ढेरों देशों में समलैंगिक विवाहों को मान्यता मिल रही होती। इसके विपरीत जब हम ज़मीनी सच्चाइयों को नज़रअन्दाज़ करके निर्णय देने की ठसक पूरी करने निकलने हैं तो अकसर अपनी तंगदिली का परिचय दे रहे होते हैं।

बचपन में उत्सुकतावश गौरैया के चूज़े को हाथ से छू देने के बाद हमने पाया कि गौरैया ने उसे घोंसले से बाहर फेंक दिया। बच्चा मर गया। हिन्दी भाषा और साहित्य-जगत में जिन लोगों के पास नव-लेखकों को पालने-पोसने की कूवत है, वे उस निर्मम गौरैया जैसा आचरण क्यों करते हैं? उन्हें ऐसा रवैया नहीं अपनाना चाहिए, बल्कि प्रदूषित हो चुके चूज़ों को भी अपनाने का माद्दा दिखाना चाहिए। समाज में हर जिन्स का कोई न कोई खरीददार है। हर तरह का साहित्य समाज में पसन्द किया जाता है। यदि आप की दृष्टि में अंग्रेजी का साहित्य लुगदी साहित्य है, तो हिन्दी का वह साहित्य जिसे आप पाठ्यक्रमों में रखते-रखवाते हैं, जिसे आप पुस्तकालयों के लिए ऊंचे दामों पर खरीदवाते हैं, और तीन लोगों के बीच ‘अहो रूपं अहो वाणी’ की शैली में जिस पर आप गोष्ठियाँ करके चंद साहित्यिक मठों के अधिष्ठाता होने का दंभ पाले फिरते हैं, उसे हम छुई-मुई साहित्य करार देते हैं।

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  1. लुगदी साहित्य क्या है इसे न तो नरेन्द़ कोहली ने स्पष्ट किया और न आप ने। लखनऊ में हुआ जमावड़ा लिट्रेरी फ़ेस्टीवल था । भले ही कोहली ने हिन्दी लेखकों का प्रतिनिधित्व किया । फ़ेस्टीवल मौजमस्ती के लिए होते हैं । लखनऊ में भी शायद यही हुआ हो । तो अंग़ेज़ी साहित्य की लाठी से हिन्दी साहित्य को पीटने की आवश्यकता नहीं है ।

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  2. आलेख विचोरोतेजक्त है, लुगदी साहित्य के बहाने अंजता-ऐलोरो और कालिदास आदि को संक्षिप्त रुप से खंगाला गया है। काम मानव जीवन का अहंम भाग है। आज के खुले माहौल में साहित्य भी इससे अछूता नहीं रह सकता। पर जो लेखक जबरदस्ती चटखारे लेकर इसे अपनी रचनाओं में लाते हैं वो अखरता है। प्रतीकों का सहारा भी लिया जा सकता है, जैसे कि पुरानी फिल्मों में होता था, वहीं भट्ट कैंप की फिल्में इसे खुले और स्पष्ट रुप में प्रस्तुत करती हैं।

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