सोमवार, 9 दिसंबर 2013

पत्रिका समीक्षा - निर्भीक संदेश

(समीक्षा )

द्विभाषिक सृजन-पट: निर्भीक सन्देश 

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                              -- प्रो मनोज 'आजिज़'

nirvhik sandesh coverpage

साहित्य चर्चा से सामाजिक बोध का निर्माण होता है और मानव-निर्माण का प्रकल्प को भी बल मिलता है । जहाँ भी साहित्य-साधना होती है, यह मान लेना चाहिए कि वहाँ मानवीय गुणों के वाहक एवं उदात्त-चेत्ता वर्ग कार्यशील है । झारखण्ड की जमशेदपुर नगरी भी कुछ ऐसी ही जगह है जहाँ साहित्यिक गतिविधियाँ चरम पर रहती हैं । यहाँ से कई पत्र-पत्रिकाएँ निकलती हैं और कई भाषाओँ में निकलती हैं । कुछ पत्रिकाएँ तो अंतर्राष्ट्रीय फलक पर अपना नाम कायम कर चुकी हैं । यहाँ से कई लघु पत्रिकाएँ भी निकलती हैं जिनमे भोजपुरी-हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका 'निर्भीक सन्देश' प्रमुख है । विगत दस वर्षों से यह पत्रिका अपनी उपस्थिति दर्ज कराती आ रही है और रचना-धर्म के भविष्य को उज्ज्वल करने में ईमानदार सहभागिता निभाती आ रही है । पत्रिका के संस्थापक प्रतिष्ठा लब्ध हिंदी-भोजपुरी साहित्यकार स्व डॉ रसिक बिहारी ओझा 'निर्भीक' थे जिनके निधन होने पर डॉ अजय कुमार ओझा पत्रिका का संपादन व प्रकाशन का प्रशंसनीय काम कर रहे हैं । यद्यपि यह पत्रिका नियमित नहीं है पर प्रत्येक अंक में अपने उद्येश्य पूर्ण कलेवर एवं सत साहित्य का समावेश से यह दर्शाती है कि लघु आकार के होने और ससमय प्रकाशित न होने पर भी पत्रिका जगत में यह एक निश्चित जगह रखती है । 

भाषा हमेशा ही दिलों को जोड़ती है और जब कोई पत्रिका द्विभाषिक हो तब तो एक बड़ा वर्ग एक सूत्र में बंधता है जो मानवीय मूल्यों को साझा कर पाने के लिए बहुत ही आवश्यक है और आज के कलुषित परिवेश में मेल-बंधन का सशक्त माध्यम बन उभरता है । निर्भीक सन्देश का सद्यः प्रकाशित उन्नीसवाँ अंक हाथों में है और रुचिपूर्ण अवलोकन के बाद यह कहा जा सकता है कि पत्रिका काफी अच्छी रचनाओं के साथ संग्रहणीय बन पड़ी है । विशेष उल्लेख्य यह है कि द्विभाषीय पत्रिकाओं में अक्सर किसी एक भाषा पर विशेष ध्यान रहता है पर निर्भीक सन्देश में भोजपुरी व हिन्दी दोनों पर ही लगभग समान और गम्भीर रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं । भोजपुरी खंड की शुरुआत ब्रजमोहन राय 'देहाती' का व्यंग्य 'दरिआई घोड़ा' से हुई है और फिर सुरेश कांटक का ललित व्यंग्य भी अच्छी रचना है । ख़ुशी की बात है कि भोजपुरी में भी सार्थक ग़ज़लें कहीं जा रही हैं और वरिष्ठ कवि-संपादक डॉ अशोक द्विवेदी की दो भोजपुरी ग़ज़लें पत्रिका के लिए ऊंचाई है । आज की परिस्थिति पर डॉ द्विवेदी का एक शेर है--

"सांच बोले में सभे बा भभतत 

झूठ के फैसला मढ़ल जाता ।"

विष्णुदेव तिवारी की कहानी 'सूरमा' भोजपुरी कहानी को बल प्रदान करेगी । युवा कवि वरुण प्रभात एवं वरिष्ठ कवि डॉ हरेराम त्रिपाठी 'चेतन' के गीत भी प्रतिनिधि बन पड़े हैं । 'संवरी' उपन्यास का तेरहवाँ अंक भी गतांक से आगे प्रकाशित हुआ है जिनकी रचयिता नीतू 'नित्या' हैं । 

हिंदी खंड में आशारानी लाल की कहानी 'थकान' अच्छी है और वहीँ उमेश पाठक 'रवि', राम शंकर चंचल, यमुना तिवारी 'आनंदित' और शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' की कवितायेँ भी पठनीय हैं । 

यह विशिष्टता ही है कि भोजपुरी-हिंदी पत्रिका में अंग्रेजी कविता का अनुवाद मिले । दिव्येन्दु ने मशहूर अंग्रेजी कवि सेमुएल टेलर कॉलेरिज की कविता का अनुवाद भोजपुरी में 'जदि होइतीं हम चिरईं' शीर्षक से किया है । वे साधुवाद के पात्र हैं । 

भारत में कभी हजारों भाषाएँ और बोलियां थीं जो हमारी पहचान भी थीं पर अब प्रतीक सी बन गई हैं और इतिहास की किताबों में आँकड़ों में दब गयीं हैं । आज कई बोल-चाल की भाषाएँ भी दम तोड़ने के कगार पर हैं । 'निर्भीक सन्देश' जैसी पत्रिका इन भाषाओँ के लिए संजीवनी है । इस पत्रिका का संपर्क प्रत्यक्ष रूप से भोजपुरी और हिंदी से है पर अन्य भाषाओँ के लिए यह उत्साह-वर्द्धक उदाहरण स्वरुप है । इस पत्रिका के साथ डॉ बच्चन पाठक 'सलिल', बी. एन तिवारी, डॉ संध्या सिन्हा सरीखे भाषा-विद्  व साहित्यसेवी जुड़े हुए हैं तो इसकी कटिवद्धता एवं गुणात्मकता के सम्बन्ध में कोई संशय नहीं है पर नियमितता की आशा जरुर रहेगी । 'निर्भीक संदेश' प्रबुद्ध एवं नव-लेखन का सेतु-बंधक बने रहे और भाषा-साहित्य की सेवा में रत रहे, यही हार्दिक कामना ।

समीक्ष्य पत्रिका-- निर्भीक संदेश

संपादक -- डॉ अजय कुमार ओझा

समीक्षक -- प्रो  मनोज 'आजिज़'

अंक-- १९ , २०१३

प्रकाशन-- जमशेदपुर, झारखण्ड

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  1. aapki samiiksha bahut pasand aai ,manoj ji ,vibhinn bhasaon ke samgra prasfutan orvikas ki prashast dhara ka hi nam 'sahity hai -shatashah badhai --padma mishra

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