रविवार, 22 दिसंबर 2013

प्रमोद यादव की लघु-कथाएं - सच कितना बेबस, लिफ़्ट और आ बैल मुझे मार

सच कितना बेबस

सप्ताह भर पहले की घटना है. जबसे सुदेश के दुर्घटनाग्रस्त होने व पैर फ्रेक्चर होने की खबर मिली, तबसे उनके घर जाने का विचार था पर आफिस में कार्य अधिक होने की वजह से नहीं जा पा रहा था. महीने भर पहले ही रिटायर हुए थे सुदेश. मेरे बहुत अपने थे सुदेश. हम दोनों एक साथ एक ही विभाग में काम करते थे. आफिस टाईम के बाद घर जाकर उनके घर जाना बहुत नागवार लगता था क्योंकि मेरा घर आफिस से बहुत दूर है, लगभग पन्द्रह कि. मी. और सुदेश का घर आफिस से केवल तीन कि. मी. की ही दूरी पर. अतः हमेशा सोचता कि किसी दिन लंच समय में उन्हें देख आऊंगा, पर दिन यूं ही निकल रहे थे, जा नहीं पा रहा था.

एक दिन अपनी व्यथा आफिस के एक और मित्र अजय से कही तो उसने कहा- ‘ चलो, आज ही चलते हैं. ‘ लंच के समय हम दोंनो उनके घर पहुंचे. बड़े दिनों बाद मिले तो समय का पता ही न चला. लगभग दो-ढाई घंटे वहाँ बैठ गये. वापस लौटे तो मालूम हुआ कि ‘ बॉस ’ हम दोनों को बड़ी सरगर्मी से खोज रहे हैं. सामना हुआ तो वे बिफर पड़े- ‘ कहाँ रहते हैं मिस्टर ? घंटों से खोज रहा हूँ, अत्यंत जरुरी काम आया है और आप हैं कि बिना बताये सैर-सपाटा कर रहें हैं..’

मैंने सच्ची बात कही तो वे भड़क उठे- ‘ जिससे मिलना आप इतना जरुरी समझते हैं, वो आदमी रिटायर हो गया है, घर पर ही रहेगा..कहीं नहीं जाएगा..आफिस टाईम में ही मिलना क्या जरुरी था? पहले आफिस का काम देखिये, उसके बाद समाज-सेवा कीजिये...ऐसा न हो कि किसी दिन आपको चार्जशीट थमा दूं ‘

मैं बॉस को कुछ कहता इसके पूर्व ही एकाएक अजय उनके सामने पड़ गया. उसे देखते ही कहा- ‘ और आप कहाँ थे जनाब ?

अजय ने मासूमियत-भरे स्वर में कहा- ‘ सर, पेमेंट लेने बैंक जा रहा था कि रास्ते में स्कूटर पंचर हो गया...आसपास कोई बनाने वाला नहीं था...बड़ी मुश्किल से घसीटते- घसीटते तीन कि. मी. दूर जाकर बनवाया....आफिस लौटने की हड़बड़ी में पेमेंट भी नहीं ले पाया..’

बॉस नरमी से बोले- ‘ ठीक है..जाओ काम करो..ऐसे वक्त में आफिस फोन कर हमसे मदद लेनी चाहिए..’

अजय तुरंत खिसक गया. बॉस पुनः मेरी ओर मुखातिब हो बोले- ‘ आफिस के काम में मन लगाओ...नहीं तो किसी दिन सचमुच मुझे कुछ एक्शन लेना पड़ जाएगा. ‘

उस दिन मुझे ज्ञान-बोध हुआ, मैंने जाना कि झूठ के आगे सच कितना बेबस और बौना होता है.

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लिफ्ट

अक्सर आफिस जाने के रास्ते वह विकलांग युवक लोगों से लिफ्ट मांगते दिख जाता. कभी-कभार कोई उसे बैठा लेता अन्यथा अधिकांश स्कूटर व बाईकवाले उसे नजरअंदाज कर आगे निकल जाते क्योंकि यह उसका रोज का सिलसिला था लेकिन मैं उसे कभी निराश नहीं करता, अपनी स्कूटर रोक ही देता, कारण कि मैं भी एक पैर से थोड़ा विकलांग हूँ और एक विकलांग का दर्द एक विकलांग व्यक्ति ही समझ सकता है.

मेरे आफिस से एक फर्लांग आगे सीधे रास्ते में उसका आफिस था. अक्सर पहले उसे उसके आफिस ड्राप करता फिर अपने आफिस लौटता. धीरे-धीरे अच्छी जान-पहचान हो गई. अब वह किसी से लिफ्ट नहीं मांगता, केवल मेरे ही इन्तजार में खड़ा रहता. मैं भी यंत्रवत उसे देख रुक जाता, वह लपककर पीछे बैठ जाता. उसे पहले ड्राप करता फिर अपने आफिस जाता.

एक दिन हम दोनों जा रहे थे कि अचानक स्कूटर लहराने लगा. ब्रेक लगा स्कूटर को सड़क के किनारे किया तो देखा – गाड़ी पंचर. दोनों उतरे. मैं परेशान कि अब इसे बनवायें कहाँ. मार्केट काफी दूर और सेक्टर के बहुत अंदर था. आफिस भी समय से पहुंचना था और फिर इन महाशय को भी ड्राप करना था. यह सब मैं अभी सोच ही रहा था कि अचानक जो दृश्य देखा, मेरी आँखें फटी की फटी रह गई. मैंने देखा, मेरा वह विकलांग मित्र एक बाईकवाले को रुकवाया, लपककर पीछे बैठा और फुर्र हो गया. उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा तक नहीं.

तबसे मुझे ज्ञान-बोध हुआ कि अपना सर्वस्व दे दो पर किसी को लिफ्ट कभी न दो.

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आ बैल मुझे मार

मेरे एक मित्र हैं – अनुराग , निहायत ही शरीफ, नम्र, हंसमुख और ईमानदार. हम दोनों के आफिस एक ही इमारत में है, लेकिन विभाग अलग-अलग है. जब भी वे खाली होते हैं, हमारे आफिस में आकर सबसे मिलते-जुलते हैं, कुशलक्षेम पूछते हैं और ज्यादा समय रहा तो गप्पबाजी भी कर लेते हैं. उनका मुख्य काम है - यूनिट के अधिकारियों के लिये रेल्वे की टिकिट आरक्षित कराना. इस सिलसिले मे वे अक्सर रेल्वे स्टेशन आते-जाते रहते हैं.

एक बार की घटना है, मुझे किसी कार्यवश रेल्वे स्टेशन जाना था. मैंने अनुराग से पूछा तो उसने कहा – ‘ घंटे भर बाद चलते हैं, मुझे भी काम है.’ ठीक एक घंटे बाद वे अपनी स्कूटर में आये, मैं उनके पीछे बैठ गया. रास्ते भर इधर-उधर की बातें करते बढते रहे. स्टेशन से फर्लांग भर पहले एक चौक है जहाँ कुछ ट्रेफिक पुलिस के जवान व अधिकारी दुपहिया वाहनों को रोककर वाहनों के कागजात देख रहे थे और गाड़ियों का चालान भी कर रहे थे. एक जवान ने अनुराग के स्कूटर को भी रुकने का संकेत दिया लेकिन वह बातचीत में इतना मशगूल था कि ध्यान ही नहीं दिया और रफ़्तार से आगे बढ़ गया. मैं पीछे बैठे सब देख रहा था. फर्लांग भर आगे बढ़ने के बाद मैंने जब बताया कि पुलिसवाले रोकने कह रहे थे पर तुम रुके नहीं तो वह हडबडा गया, एकदम से ब्रेक लगाया, स्कूटर को किनारे कर कहा – ‘ अरे यार, मैं देख नहीं पाया..चलो वापस चलते हैं..’ मैंने कहा – ‘ अरे नहीं यार..अब निकल आये हैं तो चलो आगे बढ़ो..वापस नहीं जाते..’ वह नहीं माना, बोला – ‘ नहीं यार..हमें ट्रफिक के नियमों का पालन करना चाहिए, सम्मान करना चाहिए...’

और अंततः वापस चौक पर तैनात अधिकारी के पास पहुँच विनती करने लगा – ‘ सर जी , गलती हो गई..मैं आगे बढ़ गया था...कागजात दिखाऊँ ? ‘

अधिकारी बोले – ‘ हाँ...दिखाइये..’

अनुराग ने डिक्की से .कागजात निकाल उनके हवाले किया. उन्होंने सरसरी निगाह से कागजात देख ‘ ठीक है ‘ कहते वापस लौटा दिया. डिक्की में कागजात रखते-रखते अनुराग ने अधिकारी से कहा – ‘ इंश्योरेंस के कागज भी दिखाऊँ क्या सर ? ‘

अधिकारी बोले – ‘ लाओ भई..वो भी देख लेते हैं...

’ अनुराग ने फिर कागजात निकाल अधिकारी को दिया. इस बार उसने काफी देर तक पढ़ा और रूखे शब्दों में कहा – ‘ ये तो पिछले साल का है जनाब...इस साल का दिखाइये..’ मैं पास ही खड़े अनुराग के मूर्खतापूर्ण क्रियाकलापों पर अपना सिर पीट रहा था. वह पूरी डिक्की को छान मारा, पर और कोई कागजात नहीं मिला. अधिकारी ने अपने मातहत को संबोधित करते कहा – ‘ अरे कदम..इनका चालन काटो...इनके पास इंश्योरेंस के कागज नहीं है. मातहत ने स्कूटर का नंबर व नाम-पता लिख दो सौ रूपये का चालान काटा. इस प्रक्रिया के बाद जैसे उसे सांप सूंघ गया...एकदम ख़ामोशी से स्कूटर चलाता स्टेशन पहुंचा. मैं भी चुप्पी साधे बैठा रहा.

उस दिन मुझे ज्ञानबोध हुआ कि व्यक्ति को ‘ आ बैल मुझे मार ‘ वाला काम भूलकर भी नहीं करना चाहिए.

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प्रमोद यादव

दुर्ग, छत्तीसगढ़, भारत

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  1. पहली वाली लघु कहानी " सच कितना बेबस " में कुछ ख़ास नहीं है श्री प्रमोद यादव जी , दूसरी" लिफ्ट " एक सच को बयान बयान करती है और तीसरी एकदम बेहतरीन है !

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  2. कमेंट्स के लिए धन्यवाद योगीजी, आपका- प्रमोद यादव

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  3. आस -पास बिखरी कथाओं का अलग स्वाद होता है |

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  4. लिफ्ट लघुकथा मापदंड की बेहतरीन कृति , इसी मिज़ाज की कहानियां मुझे पसंद है .

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