सोमवार, 9 दिसंबर 2013

मनोज 'आजिज़' की दो लघुकथाएँ

(लघुकथा)

जाएँ तो कहाँ ?

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             -- मनोज 'आजिज़'

खबर आई कि कई औरतें, युवतियाँ और छोटी बच्चियाँ भी एक मोहल्ले में उस काम में लिप्त थीं । एस.पी. साहब ने छापा मारने की तैयारी की । एक अधिनस्थ  अधिकारी के पूछने पर गुर्राते हुए एस.पी. साहब ने कहा-- इतने दिन से क्या कर रहे थे ? वर्षों से एक ही क्षेत्र में पदस्थापित हैं, फिर भी आप लोगों को खबर नहीं है कि सामने के ही एक मोहल्ले में काफी तादाद में महिलाएँ जिस्म-फ़रोशी के धंधे चला रहे हैं । क्या मुखबिरी है आप लोगो की ? लानत है !

साहब तो गुस्से में गरम थे । किसी को भी सुनने को राजी नहीं थे । फ़ौरन चलने की बात हुई । रस्ते में डी.एसपी से बात-चीत के क्रम में पता चला कि ये कोई नयी खबर नहीं है । पुलिस कई दफ़ा छापेमारी कर चुकी है पर कोई असर नहीं । उनके पास लाइसेंस भी हैं । एस.पी साहब ने साथ में दो-चार सामाजिक-कार्यकर्ता और एक मनोवैज्ञानिक भी लिए चले । 

रात के अँधेरे में छापा मार कर करीब पचास से अधिक लड़कियाँ, औरतें हिरासत में लिए गए । रात में कोई कुछ मानने-सुनने को तैयार नहीं थे । सुबह अधिकारियों, सामाजिक-कार्यकर्ताओं और मनोवैज्ञानिक के साथ एस.पी ने सख्ती से पूछताछ शुरू की । सबके सब अदम्य थे । हिरासत में लिए गए महिलाओं के बॉस ने सबके लाइसेंस झलकाते हुए बोली-- साहब आप हम लोगों पर जिस्म फरोशी का मामला मत जड़िए । हम सेक्स-वर्कर हैं । किसी भी तरह से वे नरम नहीं हो रहे थे और थाने पर ही विरोध शुरू कर दिया । एसपी ने एनजीओ के अधिकारियों से काउन्सलिंग करने को कहा पर ढाक के तीन पात । 

एक अधेड़ उम्र की महिला उठ कर कहती है-- जनाब, खानदानी धंधा है ये हमारा । पूर्वज भी करते आये हैं । अब काहेला छुड़वाते हैं ? और इसी से हम खुश हैं साहिब । छोड़ कर देखें हैं, बचवा सब भूख से बिलबिलाता है हुजूर और ताना मार कर चल देते हैं लोग । जेल भेजना है भेज दो हुजूर पर धंधा मत छुड़वाओ ताकि लौट कर फिर पेट का जुगाड़ में लग सकें । जवाब से एस पी की बोलती बंद हो गयी । 

एसपी साहब को यह भी पता चला कि किसी के पिता नहीं हैं तो किसी के शौहर ने छोड़ दिया और कोई खानदानी पेशा समझ कर इस धंधे में लगी हुई है । अपने ऑफिस वापस आते ही उन्होंने ऐसे सेक्स-वर्करों के लिए वैकल्पिक उपाय निकालने के सम्बन्ध में गृह मंत्रालय को पत्र लिखा और यह भी दर्शाया कि उन महिलाओं को न समाज अपनाता है और न ही कोई उचित व्यवस्था है । 

युवा एस पी के मन-मस्तिष्क में यह सवाल कौंधता रहा कि आखिर वे जाएँ तो कहाँ जाएँ । इस सवाल का उत्तर मिलता, तब तक उनका ट्रांसफर का पत्र आया और वे नयी जगह में योगदान दिए । वहाँ भी वही हाल । एस पी ने अपनी डायरी में एक रात यह लिखा कि कुछ सवालों का शायद जवाब नहीं होते । 

दुनिया की समझ 

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                 -- मनोज 'आजिज़'

स्कूल में खेलते हुए फटे सलवार को रंजना सी रही थी । घर के अन्य दो सदस्य, माँ-पापा बाजार गए हुए थे । एक छोटी सी डिबरी जल रही थी और बाहर सड़कों पर लाइटों की कतार, साथ में अन्य सभी घर भी रौशन । सरकार से मिली रंजना की साइकिल घर के बाहर दरवाजे पर सिकड़ी से बंधी हुयी थी । किसी के आने की आहट रंजना को सुनाई पड़ी । घबराकर अंदर से ही चिल्लाई-- कौन? कोई आवाज नहीं । फिर कुछ देर बाद सिकड़ी की टूटने की आवाज आयी और रंजना के बाहर आते ही साइकिल गायब । रंजना सदमे में धपाक से गिर पड़ी, बेसुध, बेबाक ! कुछ ही देर में उसके माँ-पापा घर आये तो रंजना को बाहर देख अचंभित थे । रंजना कुछ कहने की हालत में आई तो सब बात सुनाई । उसकी माँ रोने लगी थी । पापा कहने लगे -- ये कैसी परीक्षा है प्रभु ! बिटिया की साइकिल भी चोरी कर ली गयी और ठेकेदार ने पैसे नहीं दिए तो कुछ खरीद भी नहीं पाये । आखिर इतना दुःख क्यों! 

किसी तरह रात बीती । सुबह पुलिस नोटिस । दो दिन में घर छोड़ना था । अतिक्रमण कह कर आस-पास के रसूखदार उस जमीन को हड़पना चाहते थे और पैसा क्या-कुछ न करवा दे । रंजना अपने माँ-पापा के साथ अब घर छोड़ने को मजबूर थी । अब वे बेघर थे । रंजना एक ईंटा-भट्टा में काम करने लगी । भट्टे के मालिक रंजना को कुछ ज्यादा पैसा दे देते थे । रंजना को यह उनकी महानता लगती थी । एक दिन किसी ने रंजना से कहा -- बाल श्रम अधिनियम से बचने के लिए तुम्हे ज्यादा पैसा दिया जाता है ताकि तुम पुलिस छापा पड़ने पर मुंह न खोलो । 

वर्षों बाद युवती रंजना को दुनिया की समझ आने लगी थी और अपना लड़खड़ाता-बेचारा बचपन को याद कर अक्सर पलकों को भिंगो लेती थी । 

पता-- आदित्यपुर-२, जमशेदपुर-१४, झारखण्ड

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