रविवार, 1 दिसंबर 2013

प्रमोद यादव का व्यंग्य - कहानी बेसुरे राग की

कहानी बेसुरे राग की / प्रमोद यादव

‘ सुनो जी...’ पत्नी की प्यार-भरी आवाज गूंजी.

जब भी इस तरह की प्यार-मनुहार भरी आवाज कानों में प्रवेश करती है,मैं समझ जाता हूँ कि कोई न कोई सुनामी , हेलेन या टारनेडो मेरे करीब है. दहशतजदा हो जाता हूँ कि न मालूम इस बार ‘ कितने से ‘ उतरूंगा...पत्नी लड़ाकू जुबान में ही अच्छी लगती है..दो-चार छक्के उसने मारी..एकाध चौका आप भी लगा दो..ट्वेन्टी- ट्वेन्टी चलने दो..बिना पैसे के बढ़िया ‘टाईम-पास’.. मामला ‘फ़ास्ट-ट्रेक’ में निपटाना हो तो उसकी काली जुबान चलने दो , कोई प्रतिक्रिया न दो ...मामला मिनटों में फिनिश...पर प्यार-भरी जुबान से बेहद डर लगता है.

‘ अजी..आपसे कह रही हूँ..’ आवाज कुछ ऊँची हुई पर..मिठास में कोई कमी नहीं आई. मैं समझ गया- दो-चार नोट (हजार के) का उड़ना तय.

‘ हाँ..सुनाओ...कहाँ चलना है ? क्या लेना है ?..’ मैं सीधे मुद्दे पर आया.

‘ अरे..आप ऐसा क्यों कह रहें है ?..’

‘ अरे भागवान..इतने सालों से घास नहीं छील रहा हूँ..जब-जब तुम इस तरह पेश आती हो ..मेरा दिवाला निकलना तय होता है..इसलिए पूछ लिया..’

‘ चलिए..आज मैं आपका यह मिथक तोड़े देती हूँ..मुझे न कहीं जाना है और न ही कुछ लेना है..’

मैं खुश हुआ कि बचे..; कहा- ‘ फिर इत्मीनान से बोलो ..क्या बात है ?

‘ कोई खास बात नहीं जी...एक बात भर पूछनी थी “संत” के बारे में..’

मैं बौखलाया- ‘ सुनो यार. दुनिया-जहान की कोई भी बातें पूछ लो...जो “गूगल” भी ना बता सके,वो भी पूछ लो...पर साधू-संतों के बारे में कुछ न पूछो...बेचारों के बुरे दिन चल रहें हैं..उनके ग्रह-दशा ठीक नहीं..वो कहते हैं ना कि गुरु में शनि की छाया पड़ रही है या बुध में राहू का प्रकोप है...ऐसा ही कुछ एक्सीडेंट हो गया है उनके साथ..’

‘ अरे ..मैं उन संतों के बारे में नहीं कह रही ..मैं तो खजाने वाले संत के बारे में कह रही थी..’

‘ अच्छा..अच्छा....हजार वोल्ट वाले...मेरा मतलब.. हजार टन सोना वाले संत की बात कर रही हो...मान गया यार तुम्हें भी....पूरा देश उस चमचमाते-झूठे सपने को बिसार गया.. सरकार तक जड़ तक बदनामी झेल भूल गई..और तुम अब तक उसका रिकार्ड बजा रही हो..’

‘ ऐसा नहीं है जी..मैं तो केवल यह जानना चाह रही थी कि जब सरकार उस खजाने को निकालने में नाकामयाब रही तो उस बेचारे संत ने खुद ही निकालने जे.सी.बी.मशीन मंगवाई अब प्रशासन उसे अनुमति क्यों नहीं दे रही ? वो तो अब भी कह रहें हैं कि सारा सोना निकालकर सरकार को ही भेंट करेंगे..’ उसने अपने अखबारी ज्ञान का बखान किया.

मैंने भी चुटकी ली और कहा-

‘ वो क्या है ना..हमारा देश “गरीब देश” के नाम से पूरे विश्व में मशहूर है...हराम का हजार टन सोना लेकर हमें देश का नाम खराब नहीं करना..’

‘ लो आप तो मजाक करने लगे.. बताइये ना..संत को अनुमति क्यों नहीं दिए ? ‘

‘ अरे यार..जब सरकार की एजेंसी ए.एस.आई. को सिवा मिट्टी के दो-चार बर्तनों के कुछ नहीं मिला तो संत भला कहाँ से सोने निकाल देगा..वह भी हजार टन..वो तो ऐसे बताता है जैसे नीचे से अभी-अभी तौलकर आया है..मुझे तो अभी तक समझ नहीं आया कि संत होकर वो सोने-खजाने के पीछे क्यों पड़ा है ? और तुम एक गृहिणी होकर उस संत के पीछे क्यों पड़ी हो ? ‘

‘ अरे ..कैसी बात करते हो जी ..मैं क्यों उनके पीछे पडूँगी..मैं तो सिर्फ इतना कह रही हूँ कि जब किला उनका है..जमीन उनकी है..तो उन्हें खोदने दो ना..सोना निकले तो ठीक ..न निकले तो ठीक..निकला तो सरकार को ही फायदा है..संत को तो रत्ती भर सोना रखना नहीं..’

‘ रत्ती भर निकले तो सही.. एक कहावत है न- “ दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर

पीता है “ ऐसा ही कुछ हाल है..एक बार लोग उल्लू बन गए. मीडिया मात खा गयी...सरकार की भी किरकिरी हो गई..अब दुबारा ऐसा कुछ होनेवाला नहीं.. दुबारा भीड़ इकट्ठी करना उस संत के कूवत की बात नहीं..जे. सी. बी. क्या..वह एक्स.वाई.जेड. लगा ले..पर तय है- सोना एक ग्राम भी निकलने वाला नहीं..’

‘लेकिन वहाँ के बाशिंदे तो अभी भी कह रहे हैं कि संत की बातें कभी गलत साबित नहीं हुए..उन्हें अब भी भरोसा है कि वे (संत) स्वयं होकर खुदाई करेंगे तो हजार टन सोना जरुर निकलेगा ..’

‘ दुनिया में पागलों की कमी नहीं..उसमें एक तुम भी हो..आज जब सारे चैनल्स देश के सबसे बड़े “ मर्डर-मिस्ट्री “ दिखाने में मशगूल है तो तुम कहाँ से फिर पुराना चैनल खोले बैठ गई हो..’

‘ अरे..मैं तो इतना ही कह रही हूँ कि उन्हें जमीन खोदने की अनुमति दे दो..वे कोई “ सीरियल ब्लास्ट “ करने तो नहीं जा रहे...’

‘ भागवान..तुम्हें मालूम भी है कि “ सबै भूमि गोपाल की “..यानी देश की सारी जमीन सरकार की है..और जमीन के अंदर से निकलने वाली हर चीज- सोना-चांदी हो, या हीरे-मोती, लोहा-तांबा हो या मूंगा-पन्ना ..सब पर सरकार का हक होता है..इसलिए खुदाई के पूर्व सरकार ( प्रशासन) से अनुमति लेनी होती है...’ मेरी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि उसने बात काट दी-

‘ लेकिन पिछले दिनों हमने आँगन में टंकी बनाने आठ फीट की खुदाई की तो कहाँ परमिशन ली..? ‘

‘ उस खुदाई में तुम्हें कुछ मिला क्या ? ‘

‘ नहीं...कुछ भी नहीं....मान लो अगर एक मन सोना मिल जाता तो सरकार या प्रशासन को पता ही कैसे चलता कि हमें मिला..हम किसी से जिक्र ही नहीं करते....फिर..? ’

‘ तुम औरतें जिक्र न करो..ऐसा हो सकता है ? पिछले दिनों मुन्ने की जेब से पांच का सिक्का कमोड में गिर गया और तुमने हाथ डाल निकाल लिया..इसके बारे में कपूर साहब को कैसे मालूम हो गया ?..उस दिन कह रहे थे – “यार..हमारे चिंटू का मोबाइल टायलेट में चला गया है...तुम्हारी श्रीमती निकाल देगी क्या ? सुना है, ‘अंदर’ का माल ‘बाहर’ निकालने में उन्हें महारत है..’

‘ अरे..वो तो हमने बातों-बातों में यूं ही श्रीमती कपूर को यह बात बता दी थी..सोने वाली बात होती तो किसी से भी जिक्र नहीं करती..चुपचाप पचा लेती..’

‘ तुम..और पचा लेती ? पेट में एक भी बात तो पचती नहीं...मन भर सोना कहाँ से पचा लेती..’

‘ आप भी ना..बात को कहाँ से कहाँ ले जाते हैं...मैं संत के बारे में पूछी और आप शौचालय तक पहुँच गए.. ‘

‘ अरे ..वही तो बता रहा हूँ..वो संत तुम्हारे आगे कुछ भी नहीं है.. तुम तो कम से कम ‘अंदर’ का माल ‘बाहर’ निकाल भी लेती हो..वो तो इस मामले में बिलकुल फेल है..अब तक रत्ती भर भी नहीं निकाल पाया बाहर ..उसे तो खजाना निकालने की ट्रेनिंग तुमसे लेनी चाहिए..’ इतना कह मैं हँस पड़ा.

पत्नी असमंजस में थी ..समझ नहीं सकी कि वो क्या करे ...बस, देखती और सोचती रही कि मैं उसकी तारीफ़ कर रहा हूँ या मजाक उड़ा रहा हूँ..उसकी परेशानी देख मैंने कहा-

‘यार अब न्यूज-चैनल्स देखना बंद करो...हालांकि गलती मेरी है कि मैंने पहले तुम्हें आलतू-फ़ालतू सास-बहू टाइप चैनल देखने से मना कर न्यूज-चैनल्स देख अपना नालेज अप-डेट करने कहा.. पर लगता है ..वही ठीक था..सास- बहू देखती तो कम से कम मेरे पास नहीं आती.(मेरा भेजा खाने).वैसे अब तुम्हें “आस्था”,”संस्कार”जैसे चैनल में मन लगाना चाहिए..’

वह भड़क गई- ‘ अभी इतनी बूढ़ी भी नहीं हुई कि ये चैनल्स देखूं....इससे बेहतर तो यही होगा कि केबल कनेक्शन ही कटवा दो ..न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी ..‘

‘ अरे भई.. हम भले ना रहे ..पर तुम हमेशा बजती रहो...लेकिन थोडा सुर से....संत वाला बेसुरा राग हमें पसंद नहीं ..’ मैंने छेड़ा तो उठकर वह रसोई की ओर भाग गई.

सोच रहा हूँ..अब क्या करूँ ? मेरे न्यूज देखने का टाईम है..टी.वी. पर बैठा तो बीबी सर पर बैठ जायेगी..भारी गुस्से में गयी है...अब तो ’लेपटॉप’ खोलने में ही भलाई है..चलिए..फिर मिलते हैं...शुभ-रात्रि..

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छ.ग.

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