रविवार, 22 दिसंबर 2013

लता सुमन्त की लघुकथा - नयनसुख

नयनसुख

डा. लता सुमन्त

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सुजीत माँ को दवाई देते हुए उसके मुख को देख रहा था. कितना शांत, क्लांत, निर्लिप्त ! वास्तव में उसकी माँ वैसी ही थी जैसी दिखती थी. ना कोई कृत्रिमता, ना कोई स्वार्थ और ना ही कोई दिखावा. वो तो जैसे अपनों के लिए ही जी रही थी. अपने भी केवल पति और बच्चे ही नहीं बल्कि उसके पडोस में रहनेवाले समीर और अमीना उसके अपने ही थे. उनके लिए भी वह किसी तरह से पीछे नहीं ह़टती थी.

सुजीत को याद नहीं आ रहा था कि इसके पहले कब उसकी माँ बीमार हुई थी. वह एक कम्पनी में काम करती थी बस उसी थोडी - सी तनख्वाह से वह घर चलाती थी. एकबार लौटते वक्त वह मेरे लिए कहानी की कुछ पुस्तकें ले आई जो मुझे बहुत पसंद थी. माँ से मैंने कहा -माँ , तुम व्यर्थ ही परेशान होती हो. माँ कहने लगी -बेटा, परेशानी कैसी? अपनों के लिए कुछ करना मुझे अच्छा लगता है. वह हर दूसरे दिन कुछ न कुछ ले आती. तब शायद. मैं ये नहीं सोच पाता था कि माँ इतना सब कैसे कर लेती है. आज उसी कि दुआ से मैं इस काबिल हुआ कि मैं कुछ सोच सकता हूँ. और भगवान से यही दुआ करता हूँ कि वहीं सोचूँ जो माँ चाहती है.

पढ लिखकर मैं इस काबिल हुआ कि माँ के बोझ को हल्का कर सकूँ. मैंने माँ से कहा माँ अब तुम्हें नौकरी करने की कोई आवश्यकता नहीं है. लेकिन माँ ये बात मानने को तैयार ही नहीं थी. वह कहती- क्या इसी दिन के लिए मैंने तुझे पाल पोस कर ब़ड़ा किया था कि बडा होते ही सारी जिम्मेदारी तुझ पर डाल दूं. नहीं तूने भी तो अभी - अभी सुख देखा है. तुझे सुख भोगने का और परिवार के साथ आनंद करने का पूरा अधिकार है. मैं तो हमेशा से तेरे साथ हूँ. मैं कहाँ जा रही हूँ?माँ की बातें सुनकर उसे लगा वास्तव में उसकी माँ इस पृथ्वी पर बसनेवाली वो माँ है -जो बेटा होने के बावजूद अपनी जिम्मेदारियों तथा अपेक्षाओं तले उसके अरमानों को रौंदना नहीं चाहती थी. कुछ देर माँ की आँख लगी थी. मगर उसे तो वह नयनसुख प्राप्त हुआ था जो आज के इस दौर में अन्य सुखों से बढकर था.

बेटा तो नयन सुख प्राप्त कर रहा था मगर नींद में भी लीला हर माँ के लिए अपने जैसा बेटा चाहती थी जो केवल माँ के बुढापे का सहारा ही नहीं उसकी भावनाओं का कद्रदान भी बने.

7 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर लघुकथा

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  2. dil kii gahraai tak pahunchti sarthak rachna

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  3. ईश्वर ऐसी माँ और ऐसा बेटा सभी को दे ....मगर आज की तारीक में ऐसा बेटा मिलना असंभव सी बात लगती है। सुंदर भाव संयोजन से सजी संवेदनशील रचना।

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  4. आपकी काहानी अच्छी लगी. मां बेटे का प्रेम दुनिया के सभी प्रेम से बढ कर है

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  5. कम शब्दों में एक विस्तृत भाव को समेटने की सफल कोशिश,स्वागत

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  6. एक समर्थ लघुकथा ,प्रशंसनीय

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  7. एक सुन्दर लघुकथा , स्वागत

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