शनिवार, 28 दिसंबर 2013

मन्‍तोष भट्‌टाचार्य की लघुकथा - विधवा कौन?

विधवा कौन.....?

गुलाबी ठंड की एक खुशगवार सुबह बाहर लॉन में बैठकर मैं सुबह का ताजा अखबार देख रहा था। पास ही में टेबल के ट्रे पर रखी गर्म कॉफी का प्‍याला मुझे बदस्‍तूर कोसते ठंडी पड़ती जा रही थी, लेकिन इन सबसे वेखबर मेरी चश्‍मे से झांकती आंखे अखबार के काले अक्षरों पर चिपकी हुई थी।

तभी शोर मचाता मेरा इकलौता बेटा आया और मेरे कंधे पर झूलकर बोला पप्‍पा....पप्‍पा..... अखबार से ध्‍यान हटाकर मैंने तिरछी गर्दन कर पूछा क्‍या बात है बेटे...?

पप्‍पा...पप्‍पा.... रांड़ किसे कहते हैं? बारह वर्षीय मेरे नन्‍हें से बेटे सार्थक ने पूछा।

मैं चौंककर पल्‍टा सार्थक के चेहरे पर मासूमियत झलक रही थी। बहुत ही अजीब या कहना चाहिए वाहियात किस्‍म का सवाल था, आखिर ऐसे शब्‍द इसके जेहन में आए कहां से.....?

तमाम सोचो को एक तरफ झटककर मैंने पूछा बेटे ये कैसा सवाल हैं...?

पप्‍पा वो मेरा दोस्‍त पारुल है ना, वो कह रहा था तुम लोगों के घर के पीछे जो नया मकान खाली पड़ा है ना उसमें जो नये किरायेदार आ रहे हैं वो रांड़ हैं सार्थक एक सांस में बोल उठा, अच्‍छा तो पारुल ने बताया है तुम्‍हें...? मैंने चुभती आंखों से अपने बेटे को देखते हुए पूछा।

हां पप्‍पा लेकिन उसे ये बात उसकी मम्‍मी से पता चली।

हूं ........मेरे दिलो दिमाग में मानो बवंडर सा उठने लगा था। पप्‍पा क्‍या सोचने लगे....? सार्थक की आवाज ने मुझे मानों सोते से जगा दिया।

देखो बेटे....जिस किसी बच्‍चे के पापा इस दुनिया में नहीं रहते अर्थात जिसके पापा को भगवान अपने पास बुला लेते हैं उस बच्‍चे की मम्‍मी को रांड़ आई मीन विडो या बेवा कहते हैं। मैंने अपने बेटे को समझाते हुए कहा।

अच्‍छा पप्‍पा मैं समझ गया कि विडो को ही लोग रांड़ कहते हैं। जरा सा बच्‍चा सार्थक बड़ी समझदारी से सिर हिलाता हुआ बोला।

''बेटे लेकिन ऐसा शब्‍द इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए बुरी बात'', मैंने उसे समझाया।

सौरी पप्‍पा अब मैं नहीं कहूँगा, लेकिन पारुल की मम्‍मी तो कह रही थी कि कलमुंही रांड़ न जाने कहां से मेरे घर के बाजू में आकर बस रही हैं, रोज सुबह-सुबह उसका मुंह देखना पडे़गा, और फिर न जाने सारा दिन कैसा बीतेगा भला ? कहता हुआ सार्थक बाहर भाग खड़ा हुआ।

अखबार मेरे हाथों से फिसलकर न जाने कब लॉन में अनाथों सा गिर पड़ा था इसका मुझे होश ही नहीं मैं कुर्सी में पूरे आराम की मुद्रा में आंखे बंदकर बैठा सोच रहा था।

रांड़ कौन है वो नया किरायेदार जो आनेवाला है या मनीषा....? मनीषा याने सार्थक की मम्‍मी और मेरी पत्‍नी जो कि सार्थक के जन्‍म के बाद पूर्ण स्‍वस्‍थ होने के बावजूद भी उसने पत्‍नी धर्म निभाना बंद कर दिया। पति पत्‍नी के बीच प्रेम के साथ जुड़ा सैक्‍स संबंध जो होता है उससे मुझे पूरी तरह से वंचित कर रखा है इस विषय पर बात होने पर उसने हमेशा अरुचि दिखाई और कई वर्षो से हमारा संबंध पूर्ण समाप्‍त हो चुका है आज की तारीख में अपने ही घर में अपनी बीवी के होने के बावजूद बिना बीवी जैसा जीवन गुजार रहा हूँ।

डा0 मन्‍तोष भट्‌टाचार्य

क्‍वाटर नं0 594 मदर टेरेसा नगर, कटंगी रोड़

जबलपुर(म0प्र0) 482002

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------