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January, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - मुख्यधारा

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मुख्यधारा सारा घर अस्त व्यस्त था। मिसेज बनर्जी सब  कुछ समेटने में जुटी थीं. आज उनके बेटे सुहास का जन्मदिन था। उसने और उसके मित्रों ने मिलकर खूब धमाल किया था। सुहास अपने कमरे में बैठा अपने उपहार देख रहा था। " मम्मी देखो विशाल ने मुझे कितना अच्छा गिफ्ट दिया है। ड्राइंग बुक। अब मैं इसमें सुंदर सुंदर ड्राइंग बनाऊंगा।" सुहास अपने कमरे से चिल्लाया। अपने पति से अलग होने के बाद सुहास की सारी जिम्मेदारी मिसेज बनर्जी पर आ गयी। उन्होंने भी पूरे धैर्य और साहस के साथ स्थिति का सामना किया। सुहास अन्य बच्चों की तरह नहीं था। उसकी एक अलग ही दुनिया थी। वह अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था। आज वह पूरे इक्कीस बरस का हो गया था किन्तु उसके भीतर अभी भी एक छोटा बच्चा रह रहा था। लोगों को यह मेल बहुत बेतुका लगता था। अक्सर पारिवारिक कार्यक्रमों में उनके रिश्तेदार उन्हें इस बात का एहसास करते रहते थे। शुरू शुरू में मिसेज बनर्जी  को लोगों का व्यवहार बहुत कष्ट देता था। उन्होंने बहुत प्रयास किया की सुहास भी अन्य बच्चों की तरह हो जाये। किन्तु समय के साथ साथ उन्होंने अपनी सोच बदल दी। वह क्यों अपने बेटे में दो…

महावीर सरन जैन का आलेख - जयपुर में साहित्य महोत्सव के बहाने से रचनाकारों से सवाल

जयपुर में साहित्य महोत्सव के बहाने से रचनाकारों से सवाल:दिनांक 23 जनवरी, 2013 को राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर के डिग्गी पैलेस में राज्यपाल मार्गेट अल्वा और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साहित्य महोत्सव की शुरूआत की । उद्घाटन भाषण में राज्यपाल मार्गेट अल्वा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रेखांकित किया। इसी के साथ इस बात पर भी जोर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा यह है कि उससे लोगों की भावनाओं को चोट न पहुँचे ।
राज्यपाल ने हाल ही में भारत, पाकिस्तान और अरब देशों में हुए प्रदर्शनों को रेखांकित किया। पूरी दुनिया में असहनशीलता और साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ती जा रही है। साहित्यकारों का कर्तव्य है कि इनके उन्मूलन के लिए प्रयास करें।
23 जनवरी,2013 से लेकर 28 जनवरी,2013 तक पांच दिनों तक चलने वाले महोत्सव में अनुमान था कि महोत्सव के 174 सत्रों में करीब 280 से अधिक साहित्यकार,लेखक,अदाकार, स्क्रिप्ट राइटर,सोशल एक्टिविस्ट और विभिन्न विधाओं के महारथी भागीदारी करेंगे तथा विचार विमर्श करेंगे। दुनिया की प्रतिष्ठित महिला पत्रकार टीना ब्राउन ने भारत में होने वाले इस साहित्यिक मेले को दुनिया का सबसे महान साहित्…

पुनीत बिसारिया का आलेख - दलित साहित्‍य : कितना दालित्‍य, कितना लालित्‍य!

दलित साहित्‍य : कितना दालित्‍य, कितना लालित्‍य!डॉ0 पुनीत बिसारियाबीते कुछ सालों से हिन्‍दी जगत में दलित विमर्श एक बड़ी आहट के रूप में हमारे सामने उपस्‍थित हुआ है। वास्‍तव में बीसवीं शताब्‍दी के ढलते हुए वर्षों में यह आहट मराठी से होते हुए हिन्‍दी साहित्‍य में प्रविष्‍ट हुई और देखते ही देखते इसने एक विमर्श का रूप ले लिया। इसने आते ही साहित्‍य जगत में उथल-पुथल मचा दी क्‍योंकि इसने पूर्व परंपरा को नकारते हुए हमारी अपनी परंपरा के मूल्‍य को अधिक महत्‍वपूर्ण माना, जिससे स्‍वानुभूति बनाम समानुभूति या सहानुभूति जैसे बुनियादी सवाल आए। ऐसे सवालों से ब्‍लैक लिटरेचर तथा नीग्रो लिटरेचर एवं अन्‍य भाषाओं के साहित्‍य पहले ही दो चार हो चुके थे लेकिन हिन्‍दी साहित्‍य में यह विमर्श इसलिए भी विवाद का विषय बन गया क्‍योंकि हिन्‍दी में गैर दलित लेखकों ने भी उत्‍कृष्‍ट दलित व्‍यथा का साहित्‍य लिखा है। फिर परंपरा के नकार से साहित्‍य को वे जड़ें नहीं मिल सकतीं, जिनकी आवश्‍यकता एक नवोदित विमर्श के लिए अपरिहार्य है। शुक्रवार' पत्रिका की साहित्‍य वार्षिकी में अभी हाल में लेखन में आरक्षण' शीर्षक से एक बह…

कविता "किरण" का आलेख - औरतनामा

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औरतनामा----डॉ. कविता "किरण"         मैं! हां! मैं! एक हादसे की तरह इस दुनिया में आई! जिंदगी को जिसे अनचाहे झेलना पडा। मेरा स्वागत मुस्कुराहट ने नहीं, मातम ने किया। आँख खोलते ही दर्द की सांवली परछाइयों ने मुझे अपने वजूद में समेट लिया और शुरू हो गया चिंता से चिता तक का कांटों भरा सफर।जिंदगी बहुत वाहियात चीज रही है मेरे लिए। इसे जीने में कभी सुकून महसूस नहीं हुआ। मैं तन्हाइयों के किले में कैद थी। आज भी हूं और मेरी दुनिया इसी किले की चहारदीवारी में सिमटकर रह गई। मेरे खयालों ने, मेरे जज्बातों ने कभी इन दीवारों को तोडने की, इनसे बाहर आने की कोशिश भी नहीं की।हां! वक्त और उम्र के साथ कुछ ख्वाब जरूर आते-जाते मेरी आँखों के रोशनदान में चुप-से झांक गये और मेरे भीतर किसी दूसरे का अनजाना, अनपहचाना-सा वजूद छोड़ गये।मैं उन डूबती हुई शामों का आईना रही हूं, जिसमें आसमान पर एक सुनहरी सुबह की तरह उगने की ललक है, लेकिन अफसोस ! वो शाम कभी उस सुबह का नाम अपने होठों पर नहीं ला सकी।मैं उन अंधेरी काली रातों की अनजान राहों की मुसाफिर हूं, जो सिर्फ गमजदा लोगों लिए बनी है, जिनका आगाज तो है, पर अंत नहीं।

मंजरी शुक्ल की कहानी - मीठे बोल

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राजा चन्द्रसेन बहुत ही पराक्रमी और प्रतापी राजा था I वह अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था I  उनकी सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहता था I पर इन सबके बावजूद उसे एक भी व्यक्ति पसंद नहीं करता था और आस पड़ोस के राजा भी उसके शत्रु बन चुके थे क्योंकि उसकी वाणी बहुत कठोर और रुखी थी I वह सोचता था कि वह सबका हित चाहता हैं इसलिए कुछ भी बोल सकता हैं पर सुनने वाले को कटु वचन सुनकर बहुत दुःख होता था, और वे उसे बिलकुल भी पसंद नहीं करते थे I सारे राज्य में किसी की इतनी हिम्मत नहीं थी,जो राजा को यह बात कह सकता इसलिए वे उसकी तमाम अच्छाइयों के बाद भी बुराई ही करते रहते थे I  राजा के पास एक जादुई पलंग था जो उसे रोज रात एक कहानी सुनाया करता I वह राजा को बहुत प्यार करता था जब वह दिन भर राजा की बुराइयाँ सुनता रहता तो उसे बहुत दुःख होता क्योंकि वह जानता था कि राजा दिल का बहुत अच्छा हैं I उसने निश्चय किया कि वह कहानी के माध्यम से ही राजा का एकमात्र अवगुण दूर कर देगा उस रात जब राजा  ने पलंग से कहानी सुनाने के लिए कहा तो पलंग ने कहानी सुनाना शुरू किया - महाराज, बहुत समय पहले की बात हैं एक गाँव में एक बहुत ही आल…

मनोज 'आजिज़' की ग़ज़ल

ग़ज़ल  कर दिया कुछ ने  ---------------------                   -- मनोज 'आजिज़' बागे-वतन को जहन्नम कर दिया कुछ ने  दिले-वतन में जखम कर दिया कुछ ने  ग़रीबों का खून पीकर मस्ती से जीते हैं कुछ  बेशर्मी से खूब दामन भर दिया कुछ ने  रौशन था नाम बेहद दुनिया में एक ज़माने  लूट मचाकर झुका सर दिया कुछ ने  इन्सां को इन्सां से इंसानियत की आस थी  हर सू दह्शती आलम कर दिया कुछ ने  --- जमशेदपुर  झारखण्ड  mkp4ujsr@gmail.com

नीरा सिन्हा की कविता - अबला न रहे हम

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अबला न रहे हम अबला न रहे हम ऐसी हो हमारी सशक्‍तीकरण हत्‍या न हो हमारी भ्रूण अवस्‍था में बदलाव ऐसी आए सामाजिक व्‍यवस्‍था में मॉ-बाप पालने में न बना दे हमें कुपोषित लड़के की तरह हमें पालने की हो कोशिश मिलने चाहिए हमें भी समान सुअवसर देने में सरकार सुअवसर न रखे कोई कसर कार्यालयों में न हो हमसे छेड़छाड़ बॉस करें त्‍वरित न्‍याय आरोपी हो तड़ीपार दहेज के लिए न हम जलाएं जाएं क्रांति हो औ' समाज में ऐसा बदलाव आए घरेलू हिंसा से घर में हो हम स्‍वतंत्र तभी भारत में होगा सत्‍य में गणतंत्र नीरा सिन्‍हा गिरिडीह 815301 झारखंड़

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ और ग़ज़लें

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इतिहास में कतरा-कतरा खून बंद है आजादी के इतिहास में हमने इसे नहीं पाया खेल-खेल में ना जाने कितनी माँओं ने अपने लाल खोये हैं !आंचल को आंसुओं से भिगोये हैं !ना जाने कितनी पत्नियों ने अपने सुहाग खोये हैं चूड़ियों को तोड़-तोड़ ,कर सिने पर जख्म खाए हैं ना जाने कितने पिताओं ने अपने जिगर खोये हैं !अपनी सर जमीं के लिए बलिदान सपूत किये हैं !ना जाने कितनी बह्नों ने न्योछावर भाई किये ,अपने वतन के खातिर तीर दिल पर सहे हैं !फिर भी देश वासी क्यों अपने ही देश को लुट रहे हैं !नेताओं के भेष में विदेशी यहाँ घूम रहे हैं !कतरा-कतरा खून बंद है आजादी के इतिहास में हमने नहीं पाया इसेखेल-खेल में !--ग़ज़ल इन चरागों में रौशनी कम क्यों आजकल लो जला दो दिलजलों को चरागों में रौशनी कम है ना लेला सा हुस्न ना केश का जिगर आलकल लो जला दो के तक्तो-ताज को चरागों में रौशनी कम हैआज मुझ से कल तुम से मुहोब्बत क्यों है आजकल आशिकों को जलने दो के चरागों में रौशनी कम है क्यों नहीं जलने दे ते शमा को जमाना आजकल जलने दो परवानों को के चरागों में रौशनी कम है क्यों नहीं आते वो रुसवा करने को आजकल लो आओ फिर से दगा देने के लिए के चरागों में…

विजेंद्र शर्मा का आलेख - विवादों की जन्मस्थली ....जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

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विवादों की जन्मस्थली ....जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पिछले दो-तीन सालों से राजस्थान की राजधानी जयपुर में जनवरी माह में होने वाले जयपुर साहित्य उत्सव ने सुर्ख़ियों में बने रहने के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। गुलाबी नगरी में होने वाला ये आयोजन पहली बार ज़ियादा सुर्ख़ियों में तब आया जब इसके एक सेशन में अंग्रेजी के कुख्यात लेखक सुहेल सेठ मंच पर ही मदिरा सेवन करते हुए देखे गए। इस कु-कृत्य का विरोध होना जायज़ था और हुआ भी ,उत्सव में शाम को सजने वाली शराब से सराबोर महफ़िलों ने भी लोगों का ध्यान बड़ा आकर्षित किया। इस उत्सव के आयोजकों ने जैसे ही इसमें ग्लैमर का तड़का लगाया भीड़ के साथ–साथ प्रायोजक भी कतार में आकर खड़े होने लगे। मात्र दो–चार लाख के मामूली बजट से शुरू हुए इस मेले का बाज़ार आज करोड़ों तक पहुँच गया। साहित्य के नाम पर होने वाले इस उत्सव को विश्व के नक्शे पर जगह दिलाने के लिए आयोजकों ने बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत जानबूझकर गत वर्ष सलमान रुश्दी का नाम उछाला। ये लोग जानते थे कि प्रशासन रुश्दी को यहाँ आने तो नहीं देगा मगर उसके नाम और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हम इस “जयपुर लिकर उत्सव “को मक़बूल…

नूतन डिमरी गैरोला की कहानी - एक तितली की मौत

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एक तितली की मौत "ग". वह लाल, पीली, नारंगी, नीली, आड़ी, तिरछी रेखाओं वाली या गोल बूटी वाली साड़ी में बेतरतीबी से लिपटी सेब के बगीचों में, अखरोट के पेड़ों के नीचे, तो कभी खुबानी के या पूलम के बगीचों में पहाड़ी नदी की तरह उछलती मचलती, घास काटती किसी रंगीन तितली से कम न दिखती थी …कभी वह प्यूली के फूलों सी पीली तो कभी लाल बुरांस सी लाल लाल हो जाती .. कोई उसे रोक नहीं सकता था वह इतना खिलखिला कर हँसती कि सामने वाला समझ नहीं पाता था कि वह इतना क्यों हँसी .. दिल की इतनी साफ़ थी कि जो कुछ भी मन में आया रोका नहीं उसने, कह दिया सामने वाले से … और कभी तो जोर जोर से रो भी जाती जब कोई उसका मन दुखाता …तब रास्ते आते जाते लोग ठिठक जाते …पर उसे अपनी फिकर न रहती या कहिये कि उसे किसी की फिकर नहीं रहती कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे .. वह नदी जैसी थी जो कि आने वाले आयें या जाये या कुछ भी कहे उसके लिए, उसकी धारा को, उसकी कलकल को कोई रोक नहीं सकता था … वह निष्कपट खुल कर हँसती उसकी खनकती हँसी वादियों में गूंजती मंदिर की घंटियों से कम न लगती थी जिसको सुन कर एकबारगी लोग रुक जाते और दूसरी तरफ गुस्से का…

सुधीर मौर्य की कविताएँ

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6) ना सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले************************************************ एक दरिया जो मेरी आँख से बहता है अभी उसके साहिल पे तेरे नाम की इमारत है कोई मेरी आँखों के नमकीन पानी की वजह खंडहर सी दिखती हुई वो मिस्मार सी है तेरे इश्क में ये बात मैंने कुफ्र की कर दी तेरी याद में वहां इबादत तेरे बुत की कर दी न धूप, न कपूर, न लोबान की खुशबू तेरी यादें, मेरी आहें,और अश्कों की माला ऐ दोस्त मेरे वजूद ने तुझे इश्क की देवी माना न सही प्यार, मेरी इबादत तो कबूल कर ले 7) दिनचर्या*********************** दिन गुज़रा जब रो रोके और आँखों से बरसात हुई दिल और भी तब बेचैन हुआ जब साँझ ढली और रात हुई घडी की हर एक टिक टिक का सम्बन्ध बना मेरी करवट से तेरी याद में कितना तड़पा हूँ पूछो चादर की सलवट से छिपते ही आखिरी तारे के मेरी आँख की नदिया फूट पड़ी सूरज की पहली किरन के संग तेरी यादें मुझ पर टूट पड़ी दिन गुज़रा जब रो रो के और आँखों से बरसात हुई 8) सबसे खूबसूरत पल************************ ओ ! प्रियतमे हमारी जिन्दगी का सब से खूबसूरत पल हमारे इंतजार में बेकरार है वहां जहाँ पे फलक और जमी आलिंगन बद्ध होते हैं…

भोलानाथ के 10 नवगीत

1 जिओ हजारों साल आदरणीय हमारे पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटलबिहारी बाजपेयी जी को उनके जन्म दिन पर शुभ कामनाएं
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
महक रहे हो बाग़ बगीचे
ओंठों के अनुराग ,
दिया दिवाली और दशहरा
तुम ही देश की फाग ,
दुगनी छाती भारत माँ की
तुम ही एक मिसाल !
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
सारे रंग त्याग के तुमने
देशभक्ति का पहना चोला ,
कठिन साधना के साधक तुम
मंत्र ह्रदय में सबके घोला ,
शादियों साथ रहो दुनियां के
करते रहो कमाल !
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
तुम ही तो हो
जनमानस की अविरल भाषा,
देश प्रेम की अमित छाप और
तुम ही हो परिभाषा ,
गंगोत्री बन बहो सदा तुम
रहे न धरती कोई मलाल !
तुम जियो हजारों साल
भारत माँ के लाल !
तुम ही तो इस धरती के
हल्दी चन्दन और गुलाल !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०९४२५८८५२३४ ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,…

दीप्ति शर्मा की कविताएँ

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1.सुनसान रास्ते

डर सा लगता है
अकेले चलने में
अँधियारे और तन्हा से
उन सुनसान रस्तों पर ।

जहाँ कोई नहीं गुजरता
बस एक एहसास है मेरा
जो विचरता है ठहरता है
और फिर चल पड़ता है
उन सुनसान रस्तों पर ।

चौराहे तो बहुत हैं पर
कोई सिग्नल नही
ना कोई आवाज़ आती है
जो रोक सके मुझे
उन सुनसान रस्तों पर ।

गहरे कोहरे और
जोरदार बारिश में भी
पलते हैं ख्याल
जो उड़ते दिखायी देते हैं
बादलों की तरह
और मेरा साथ देते हैं
उन सुनसान रस्तों पर ।

मैं तो बस चलती हूँ
अपने अहसास लिये
कुछ ख़्वाब लिये और
छोड़ जाती हूँ पदचाप
मंज़िल पाने की चाह में
उन सुनसान रस्तों पर ।
© दीप्ति शर्मा

2.शब्द

वो शब्द छोड़ दिये हैं असहाय
विचरने को खुले आसमान में
वो असहाय हैं, निरुत्तर हैं
कुछ कह नहीं पा रहे या
कभी सुने नहीं जाते
रौंध दिये जाते हैं सरेआम
इन खुली सड़को पर
संसद भवन के बाहर
और न्यायालय में भी
सब बहरे हैं शायद या
अब मेरे शब्दों में दम नहीं
जो निढाल हो जाते हैं
और अक्सर बैखोफ हो घुमते
कुछ शब्द जो भारी पड़ जाते हैं
मेरे शब्दों से...
आवाज़ तक दबा देते हैं
तो क्यों ना छोड़ दूँ
अपने इन शब्दों को
खुलेआम इन सड़कों पर
विचरने दूँ अंजान लोगों में
शायद यूँ ही आ जाये
सलीका इन्हें जीने का ।
© …

मधु शर्मा की पहली कविता

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मधु शर्मा की पहली कविताकल सुबह,
ओस की नन्हीं-नन्हीं बूंदों को
देखकर
मन खुश हो गया,
सोचा,
धूप निकलने से पहले
सहेज लूं इनको
अपने हाथों में,
वरना सूरज
इन्हें निगल लेगा.
हाथ में लेना चाहा तो बिखर गयी ओस,
रह गया केवल पानी,
लगा, कुछ लोगों का अस्तित्व
बस खत्म होने के लिये होता है,
खत्म करने वाला चाहे सूरज हो या
इन्सान.

विजेंद्र शर्मा की समीक्षा - ख़ाकी में लिपटी संवेदनाएं हैं... “ वो तीन दिन ”

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ख़ाकी में लिपटी संवेदनाएं हैं... “ वो तीन दिन ” पिछले दिनों राजधानी की मसरूफ़ सड़कों पर हुआ हैवानियत का नंगा नाच फिर पूंछ में एलओसी पे पाक सेना की ना-पाक हरकत और उसके बाद झारखंड के लातेहार में सी.आर.पी.ऍफ़ के सत्रह जवानो का अपने घर के ही दुश्मन माओवादियों द्वारा की गयी बर्बरता पूर्ण कार्यवाही में शहीद हो जाने जैसे तमाम हादसात ने मन को व्यथित कर दिया।ऐसी अजीबो-गरीब फ़िज़ां में भीतर की बैचैनी बड़ी शिद्दत के साथ सुकून तलाशने के काम को अंजाम दे रही थी कि इतेफ़ाक़न कुरियर वाले ने एक लिफ़ाफ़ा थमाया और जब इसे खोल कर देखा तो ख़ूबसूरत कवर के लिबास में सजी एक किताब मिली जिस पर लिखा था.. “वो तीन दिन”....“ वो तीन दिन “ दरअस्ल इंसान दोस्त ,बेहतरीन शाइर और पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक मोहम्मद फ़ैयाज़ फ़ारूक़ी साहब के लिखे अफ़सानों (कहानियों ) का मजमुआ (संग्रह ) है। युवा रचनाधर्मी रीताज़ मैनी ने किताब का आवरण पृष्ठ बनाने से पहले यक़ीनन इस मजमुए की एक – एक कहानी को अहसास के प्यालें में पीया होगा तभी तो वे ऐसे मनमोहक कवर की तामीर ( निर्माण ) कर पाए। सबसे पहले भाई रीताज़ को उनके इस रचनात्मक काम के लिए मुबारकबाद देता हूँ…

गोविन्द बैरवा की कहानी - शुरा

शुरा (कहानी) - गोविन्‍द बैरवा ‘‘क्‍यों?,रे शुरा। आज मुँह लटकाए क्‍यों बैठा है।‘‘ सुदामा घर से बाहर निकलकर देखता है कि शुरा नाम का कुत्ता दोनों पैरों के बीच मुँह छुपाकर बैठा हुआ था। शुरा की नजर सिर्फ जमीन पर ही लगी हुई थी। सुदामा की आवाज को सुनकर एक बार सिर ऊँचा कर सुदामा को देखने के बाद फिर वहीं स्‍थिति में सिर नीचा कर खामोश स्‍थिति में बैठा नजर आया। सुदामा व शुरा का संबंध वात्‍सल्‍य प्रेम से जुड़ा हुआ था। आखिर निसंतान सुदामा को शुरा रूप में वात्‍सल्‍य प्रेम का सरोवर मिला। शुरा व सुदामा का प्रेम रूपी सरोवर में स्‍वार्थ, ईर्ष्‍या, द्वेष के साथ बनावटीपन का रूझान लेश मात्र भी नहीं था। दोनों का प्रेम, स्‍नेह, सहानुभूति के साथ एक-दूसरे की आंतरिक भावात्‍मक सहृदय से जुड़ा हुआ था। यह प्रेम एक मन का, दूसरे मन से, संवेदना के स्‍तर से बंधा हुआ। ‘‘देख शुरा। तू इस तरह मुँह लटकाए बैठा रहेगा तो, मैं तुझसे बात नहीं करूँगा।‘‘ सुदामा आवाज में कठोरता लाकर शुरा से कहने लगा। कहने के साथ धीरे से शुरा के सिर पर थप्‍पड़ मारकर, दुलारता हुआ नजर आता है। शुरा की स्‍थिति वहीं की वहीं नजर आ रही थी। सुदामा ने शुरा…

आशीष कुमार त्रिवेदी की बाल कहानी - चमत्कारी फल

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चमत्कारी फल  बबलू  एक साधारण लड़का था। उसमें आत्म विश्वास की कमी थी। वह कोई भी काम करने जाता तो उसे अधूरा ही छोड़ देता था। उसके स्कूल में स्पोर्ट्स वीक मनाया जाने वाला था। उसमें बहुत सी प्रतियोगिताएं होनी थीं। उसने भी रेस में भाग लिया था। वह रोज़ अभ्यास भी करता था किन्तु फिर भी उसे डर था।  बबलू  अक्सर कार्टून्स में देखता था की कैसे अलग अलग चरित्रों को कोई न कोई असाधारण शक्ति मिली है। वह सोचता की काश उसे भी कोई ऐसी शक्ति मिल जाए। रेस के एक दिन पहले वह बहुत ही परेशान था। बार बार उसके मन में यह विचार आ रहा था की वह बीमार होने का बहाना कर रेस में भाग न ले। वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था। वह सर झुकाए बैठा था। तभी पूरा कमरा तेज़ रोशनी से भर गया। उस रोशनी में उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। जब रोशनी कुछ कम हुई तो उसने देखा की उसके सामने एक परी खड़ी  थी। परी बोली " क्या बात है तुम इतने परेशान क्यों हो?" बबलू ने कहा " परी कल मुझे रेस में भाग लेना है। पर मैं डर रहा हूँ क्या तुम मेरी मदद करोगी। तुम मुझे ऐसी शक्ति दो की मैं सबको पीछे छोड़ दूं।" परी मुस्कुराते हुए बोली " बस इतनी स…

एस. के. पाण्डेय की गणतंत्र दिवस विशेष बाल कविता - हमारा भारत

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हमारा भारत  अपना भारत प्यारा भारत अपनी आँखों का तारा है ।
भारत में जो रहने वाले उन लोगों का नारा है ।
हम भारत के भारत मेरा भारत देश हमारा है ।।
सच्चे भारतवासी को भारत प्राणों से प्यारा है । दुनिया में हैं देश अनेकों सब देशों से न्यारा है ।
धरा गगन का अपना भारत सूरज जैसा तारा है ।।
ज्ञान विज्ञान का जिसके फैला दुनिया में उजियारा है ।
गौरवशाली गाथा इसकी सबने सुना पुकारा है ।।
गिरवर को किरीट सरीखा इसने सिर पे धारा है ।
सागर इसके पैरों को होकर मन  मुदित पखारा है ।
राम कृष्ण की पावन धरती देवों को भी प्यारा है ।
हम भारत के भारत मेरा भारत देश हमारा है ।
भारत माता ने जब-जब रक्षा हेतु पुकारा है ।
वीर सपूतों ने तब-तब अपना तन मन सब वारा है ।।
रहा हो दुश्मन कोई कैसा हमने उसको ललकारा है ।
चढ़-चढ़ कर उसकी छाती पर हम लोगों ने मारा है ।सभ्यता-संस्कृति की जोड़ न इसके अद्भुत भरा पिटारा है ।।
दुनिया की क्या बात कहें हम देवों ने भी उचारा है ।
गंगा, यमुना सरयू आदिक की बहती अविरल धारा है  ।
धन्य है भारत देश निराला वेद ग्रंथ का नारा है ।।
गद्दारों की बढ़ती टोली जिनका मन ही कारा है ।
चुन-चुन उनको देश निकालों भारत देश हमारा है ।।
उस…

डॉ॰गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविता - जन गण मन का हर्ष आज गणतन्त्र दिवस पर छाया

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जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र  दिवस पर छाया भूली -बिसरी यादें हमको फिर-फिर घेर रही हैं
और हमारी त्याग तपस्या हमको फेर रही हैं
बँधुआ बच्चों, मज़दूरों को उन्मुक्त करें
भारत माँ को भ्रष्ट तंत्र से मिलकर मुक्त करें
अपने दिल के घावों को है माँ ने खोल  दिखाया.
जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र  दिवस पर छाया ।         पंजाब,असम,कश्मीर प्रांत सब भारत माँ के हिस्से हैं 
बाहों को कंधों से काटें ये कैसे किस्से हैं
माँ के पूतों के शोणित से धरा लाल होगी तो
श्वान, गीध भी खा न सकेंगे दुश्मन की बोटी को
सवा लाख से एक लड़ा  है वीरभूमि का जाया .
जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र  दिवस पर छाया ।      बैरी को भी मीत मान लेते हैं मन से
मित्र कहीं गर शत्रु बन गये, त्यागेंगे तन-मन से
अर्जुन,त्रिशूल, पृथ्वी का जिसको भान नहीं हैं
मिट जायेंगे  धरती से यह अनुमान नहीं है
जो भी आगे बढ़ा समझ लो अपना नाम मिटाया। 
जन गण मन का हर्ष  आज गणतन्त्र दिवस पर छाया। -डॉ॰गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

राजीव आनंद की कविता - इंडिया औ' भारत : गणतंत्र दिवस पर विशेष

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इंडिया औ' भारत : गणतंत्र दिवस पर विशेष दस करोड़ के बंगले में कई इंडिया में रहते हैं ! आधी आबादी भारत की इंदिरा आवास को तरसते हैं ! इंडिया के कई लोग केक औ' दूध बिठा कर कार में कुत्‍ते को खिलाते हैं ! भारत में रहने वाले लाखों बच्‍चे चांद को देखकर रोटी-रोटी चिल्‍लाते हैं !
पूरा शहर पी ले इतना पानी इंडिया मेंहर रोज होता है बर्बाद रणवास में! एक परिवार के पीने भर पानी मयस्‍सर नहीं भारत के इंदिरा आवास में ! हिटरों औ' गिलाफों का ढेर लगा इंडिया के कई बंगले औ' आवासों में ! फटे बोरों में लिपटकर ठिठुरता मर रहा भारतीय सपूत फुटपाथों में ! हर वर्ष गणतंत्र दिवस मनाने का है क्‍या अर्थ ? गर बढ़ती जाती है असमानता की खाई हर वर्ष ! सही अर्थों में गर मनाना है भारत में गणतंत्र दिवस ! इंडिया औ' भारत का यह भेद हर हाल में मिटाने को हम सब हैं विवश !--राजीव आनंद प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा गिरिडीह, झारखंड़ 815301 मो. 9471765417

अर्जुन प्रसाद की कहानी - उद्धार

उद्धार श्याम सिंह भदौरिया रंगपुर में माध्यमिक स्कूल में हेडमास्टर थे। आंखों में शील और चित्त में बड़ी उदारता थी। बहुत ही शिक्षित और बड़े उदार पुरूष थे। दो पुत्र थे अजय और विजय। उनकी मंझली संतान पुत्री थी। जिसका नाम उन्होंने रखा था शालिनी। पति-पत्नी ने लाडली बेटी को बेटे-बेटी में बिना किसी भेदभाव के शालिनी को खूब पढ़ा-लिखाकर शिक्षित और काबिल बनाया। धीरे-धीरे वह सयानी और विवाह योग्य हो गई। भदौरिया जी और उनकी धर्मपत्नी शांता देवी को रात-दिन उसके व्याह की फिक्र सताने लगी। घर-वर तलाशते-तलाशते श्याम बाबू काफी परेशान हो उठे। पर, उनकी सारी भाग-दौड़ व्यर्थ गई। काफी प्रयास करने पर भी बात कहीं न बनी। वह बार-बार यही सोचते कि बेटी अब बड़ी हो गई है। आहिस्ता-आहिस्ता मेरे रिटायरमेंट का समय भी निकट आता जा रहा है। कहीं घर मिलता है तो ढंग का वर नहीं और वर मिलता है तो अच्छा घर नहीं। मैं क्या करूं, कहां जाऊं? जो भी जहां बताता है, फौरन चले जाते हैं। यह सोचकर पति-पत्नी चिंतित रहने लगे। साईंगंज के जाने-माने धनाढ्य जमींदार राघव तोमर का बड़ा बेटा विशाल एक नामी-गिरामी कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था। छोटा पुत्र विवेक …

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