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दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - एक हसीन बस का सफ़रनामा

एक  हसीन बस का सफ़रनामा उस समय मेरी मोटर साइकिल की स्पीड 70 किमी/घंटा के आस -पास  रही होगी। सामान्यता दो पहिया वाहनों को जिस तेज़ गति से चलाने वाले व्यक्तियों को मैं असामाजिक तत्वों में गिनता हूँ , उसी  गति से चलना उस समय मेरी मज़बूरी बन गई  थी और मज़बूरी क्यूँ न हो मामला जो इतना गंभीर था। मुझे हर हाल में उस एक मात्र बस को पकड़ना था, जिसे इस अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र में चलाकर परिवहन विभाग ने अपनी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा ली थी। आखिरकार मैं उस गड्ढेदार ऊबड़-खाबड़ सड़क पर पहुँच ही गया जो इस ग्रामीण क्षेत्र को शेष भारत से जोड़ती थी। सड़क के ही नजदीक वह स्थान था जहाँ पहले से ही पचासों और लोग खड़े होकर बस के आने का इंतज़ार कर रहे थे। वहां प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के बीच के समय की तरह शीतवार वाला  कुछ व्यक्त और कुछ अव्यक्त भयावह तनाव फैला हुआ था।  जिस तरह प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच के समय में हर देश दूसरे देश को शक, प्रतिस्पर्धा और डर की नज़र से देख रहा था,ठीक  उसी तरह वहां मौजूद हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को देख रहा था। मैंने अपनी मोटरसाइकिल अपने छोटे भाई को थमाई और …

आशीष कुमार त्रिवेदी की लघुकथा - सौर

सौर दिनेश को आज घर लौटने में देर हो गयी थी। जूते उतार कर वह पलंग पर लेट गया। वह बहुत थका हुआ था। आज का दिन अच्छा नहीं बीता था । काम भी और दिनों से कुछ अधिक था उस पर उसे बॉस की डांट भी खानी पड़ी। वह आँखें मूंदे लेटा था तभी उसकी पत्नी कुसुम ने उसके हाथ में एक कार्ड थमा दिया। उसने एक उचटती सी नज़र डालते हुए पूछा "क्या है।" "वो मेरी बरेली वाली मौसी हैं न उनकी छोटी बेटी की शादी है। इस महीने की 15 तारीख को। जाना पड़ेगा" " हूँ ....तो चली जाना।" कह कर दिनेश ने कार्ड एक तरफ रख दिया। " हाँ जाउंगी तो लेकिन कुछ देना भी तो पड़ेगा। मौसी हमें कितना मानती हैं। जब भी मिलाती हैं हाथ में कुछ न कुछ रख देती हैं।" " देख लो अगर तुम्हारे पास कुछ हो, कोई अच्छी साड़ी या  और कुछ, तो दे दो।" " मेरे पास कहाँ कुछ है मैं कौन रोज़ रोज़ साडियाँ या गहने खरीदती हूँ।" " तो मैं भी क्या करूं मेरी हालत तुमसे छिपी है क्या। मेरे पास कुछ नहीं है।" दिनेश ने कुछ तल्ख़ अंदाज़ में कहा। दिनेश की माँ ने अपनी बहू  की तरफदारी करते हुए कहा " उस पर क्यों चिल्ला रहा है। अ…

चंद्रेश कुमार छतलानी, गिरिराज भंडारी, नीरा सिन्हा, उमेश मौर्य, मनोज 'आजिज़', सुधीर मौर्य 'सुधीर', और शशांक मिश्र भारती की कविताएँ और ग़ज़लें

चंद्रेश कुमार छतलानीऔर चाँद डूब गया वो था मेरा ही तो अस्थि-कलश, मैं ही जान ना पाया | लिख रहा था बिना स्याही की कलम से, मान ना पाया | बन के चकोर डूब गया था चमकते चाँद की रोशनी में, वो रात अमावस्या की थी, चाँदनी को पहचान ना पाया | मैं अधूरा था, परछाई में फिर भी देखता रहा मेरी संपूर्णता दुनिया से तो तारीफें बटोर ली, अक्स से सम्मान ना पाया | क्या सवाल पूछ के खुदा ने सारी ज़िंदगी की रहमतें दी थी, जवाब ढूँढते सारे जहां को पा लिया, लेकिन राम ना पाया | झील की लहरों में कई दिनों तक बह के डूब गया तन्हा चाँद कैसे जुस्तजू करूँ, ज़मीं क्या आसमाँ में भी निशान ना पाया | चंद्रेश कुमार छतलानी ३ प् ४६, प्रभात नगर सेक्टर-५, हिरन मगरी उदयपुर (राजस्थान) - भारत http://chandreshkumar.wetpaint.comchandresh.chhatlani@gmail.comCellphone: 9928544749 ------------------------. गिरिराज भंडारी आदतन हम पुकार लेते हैं ********************* मन का कोना बुहार लेते हैं चलो खुद को संवार लेते हैं आसमानों में उड़ न जाएँ कहीं ज़मीं पर उतार   लेते हैं जीना क्या है, और मरना क्या हम तो वो भी उधार लेते हैं कौन उसपे यक़ीन   करता है फ…

पुस्तक समीक्षा - इंसानियत की ख़ुश्बू से लबरेज़ है .... “ख़ाकी में इंसान”

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इंसानियत की ख़ुश्बू से लबरेज़ है .... “ख़ाकी में इंसान” बहुत पहले हुक्का बिजनौरी की कुछ पंक्तियाँ सुनी थी , सुनकर हंसी भी आयी और दुःख भी हुआ कि “हुक्का” बिजनौरी साहब को आख़िर ऐसा क्यूँ लिखना पड़ा :-- पुलिस कर्मचारी और ईमानदारी ?आप भी क्या बात करते हैं श्रीमान ... सरदारों के मोहल्ले में नाई की दूकान ..आज भी समाज का नज़रिया ख़ाकी के प्रति ये ही है। चाहें हमारी फ़िल्में हों या फिर हमारा मीडिया इन्होंने पुलिस के चेहरे पे एक आध चिपके भ्रष्ट चेचक के दाग तो समाज को दिखाए मगर ख़ाकी के मर्म , ख़ाकी की टीस ,ख़ाकी के भीतर के इंसान को कभी आवाम से मुख़ातिब नहीं करवाया। ऐसा नहीं है कि पुलिस अपने काम को सही तरीक़े से अंजाम नहीं दे रही , ऐसा भी नहीं है कि ख़ाकी लबादे के पीछे सिर्फ़ संवेदनहीन लोग हैं और ऐसा भी नहीं है कि ख़ाकी में इंसान नहीं होते मगर आम आदमी को किसी ने सिक्के का दूसरा पहलू कभी दिखाया ही नहींभारतीय पुलिस सेवा के 89 बैच के अधिकारी अशोक कुमार ने अपने दो दशक ख़ाकी में पूरे करने के बाद इस इलाके में एक बेहतरीन कोशिश अपनी किताब “ख़ाकी में इंसान” के ज़रिये की। उन्होंने अपनी इस किताब में छोटे –छोटे अफ़सानों के…

प्रमोद भार्गव का आलेख - आतंकवाद का साया क्या भारत में अनंत काल तक मंडराता रहेगा?

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आतंकवादः कड़े कानूनी उपायों की जरुरत प्रमोद भार्गव आतंकवादी रंग की दलीलों के बीच एक बार फिर हैदराबाद में आतंकी हमले ने खून से लाल इबारत लिख दी है। 23 निर्दोषों की जानें गईं और 100 जीवन-मृत्‍यु के झमेले से जूझ रहे हैं। हैदराबाद में इसके पहले 25 अगस्‍त 2007 में भी इसी दिलसुखनगर के गोकुल चाट भंडार पर आतंकी हमला हो चुका है। इसमें 42 लोग मारे गए थे। विस्‍फोट के तरीके से यह माना जा रहा है कि यह हरकत आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन की हो सकती है। लेकिन यहां हैरानी इस बात पर है कि इस बम विस्‍फोट की आशंका दो दिन पहले खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों को मिल गई थी। आंध्रप्रदेश समेत देश के सभी राज्‍यों को सतर्कता बरतने की हिदायत दे दी गई थी, बावजूद सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक हो गई ? जाहिर है, हमारी खुफिया एजेंसियों में पर्याप्‍त तालमेल की कमी है। जबकि इसी कमी को दूर करने के नजरिये से राष्‍टीय जांच एजेंसी, मसलन एनआईए वजूद में लाई गई थी। इस हमले के मद्‌देनजर जरुरी हो जाता है कि राजनीतिक दल अपने क्षुद्र स्‍वार्थों से उपर उठकर ‘राष्‍टीय आतंक रोधी केंद्र' यानी एनसीटीसी कानून को इसी बजट सत्र में पारित कराएं,…

चंद्रेश कुमार छतलानी का आलेख - उपवास की महत्ता

उपवास की महत्तासर्वप्रथम मैं पाठकों को एक सच्ची राय देना चाहूंगा, इस लेख को पढिए, एक बार, दो बार, फिर इसे भूल जाइए। अगर आप इसे कागज़ पर पढ रहे हैं और मन चाहे तो इसकी चिन्दी - चिन्दी करके ज़ोर से फूंकें, और फिर मौज से इसे धरती पर बिखरता हुआ देखिए। सच पूछें तो उपवास पढ़ने की नहीं वरन् करने की चीज है। लेख, पुस्तकें आदि सिर्फ इसका सामान्य ज्ञान देकर आपको प्रेरित तो कर सकते हैं, लेकिन, अगर उपवास को वास्तव में जानना चाहते हैं तो उपवास कीजिए। यह अनुभव का ज्ञान है। चलिए, अब हम चर्चा करते हैं कि रोग कैसे होते हैं ? थोड्रा सा घ्यान स्थिर कीजिए, और फिर पढि़ए, प्रत्येक रोग के फलस्वरूप किसी न किसी रीति से शरीर से श्लेष्मा बाहर आता है। खांसी में, जुकाम में, क्षय में, मिरगी में, इत्यादि और भी कई रोग, कान के, आखों के, त्वचा के, पेट के एवं हृदय के, जिनमें श्लेष्मा का का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता है, उनमें भी रोग का कारण श्लेष्मा ही होता है। श्लेष्मा, तब शरीर से बाहर न आने की वजह से रक्त में मिल जाता है, और ठंड की वजह से जहां रक्त नलिकाएं सिकुड़ गई हैं, वहां पहुंचकर दर्द पैदा करता है, और जब रोग बढ़ जाता…

राजीव आनंद की 3 लघुकथाएं

आंखों का जालअच्‍छा होना भी कितनी बुरी बात है आज के जमाने में। ज्‍यादातर लोग एक खूबसूरत लड़की को बूरी नजर से ही देखते है। सोचते हुए इंटर स्‍कूल जा रही थी रश्‍मि। परेशानी का सबब रश्‍मि के लिए यह था कि चाहे पैंसठ पार के मिश्राजी हो या पचास पार के सिंहजी या तीस पार के वर्माजी, सभी की नजरें खा जाने वाली ही होती थी। रश्‍मि को रास्‍ते पर चलते हुए लगता था कि उसके आगे-पीछे, उपर-नीचे, दांयें-बांयें आंखों का जाल सा बिछ गया है, जो बस उसे घूर रहा है। नहीं रश्‍मि का दिमाग खराब नहीं था, उसकी किस्‍मत खराब थी कि वो बला की जहीन थी, छरहरा नाजुक बदन, लंबे चेहरे पर झील सी बड़ी-बड़ी आंखें, स्‍याह पुतलियां, गुलाबी नाजुक होंठ, लंबी नाक, मुस्‍कुराते गालों पर दो गडढ़े, भरा हुआ सीना, कमर तक लहराते गेंसू जिसपर जीन्‍स और कुर्ती पहन कर गजब की खूबसूरत लगती थी वो। पर उसे क्‍या मालूम देखने वाले उसे कपड़े सहित कहां देखते थे। लोग आज गलत दिशा में अपने कल्‍पना चक्षु को खेल रखा है जहां सिर्फ नंगापन है अगर ऐसा नहीं होता तो हर दस मिनट में बलात्‍कार कतई नहीं होता। खैर जो भी रश्‍मि को देखता देखता ही रह जाता। बूढ़े से लेकर जवा…

विजय शिंदे के दो लघु आलेख - एक लड़की एक लड़का, हद हो गई

एक लड़की एक लड़का
                                डॉ. विजय शिंदे

    मनुष्य की पहचान है, मानवीयता। मनुष्य बनता ही है मानवीयता के कारण। जहां मानवीयता का हनन होता है वहां मनुष्य का हनन होकर राक्षस बन सकता है, जो सारी मनुष्यता की सीमाओं को लांघकर अमानवीय एवं राक्षसी व्यवहार करता है। उसकी यह कृति सारी प्रकृति के लिए हानिकारक हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर विषय पर इस बार-बार चर्चा हुई, चिंता प्रकट की गई एवं कार्रवाइयां भी हुई। जैसे-जैसे उसकी तह में जाने की कोशिश होती गई वैसे-वैसे हमारे ‘मनुष्य’ होने के दांवे का खात्मा कर रही थी। ‘स्त्री भ्रूण हत्या’ विषय की गंभीरता की ओर सबका ध्यान केंद्रित करना उद्देश्य है। पुरुष की तुलना में स्त्रियों की घटती संख्या प्राकृतिक नहीं तो मनुष्य द्वारा निर्मित आपत्ति है, जो उसके अमानवीय, राक्षसी प्रवृत्ति का द्योतक है। हम कल्पना भी..... हां कल्पना भी नहीं कर सकते कितनी कन्याओं की हत्या की होगी, सालों साल से। ‘हत्या’ कानूनी अपराध है और वर्तमान भारतीय समाज धड़ल्ले से हत्याएं करते जा रहा है; और आधार विज्ञान, विद्वान, डॉक्टर, घर-परिवार के सदस्य, पुरुष और स्त्री भी, बा…

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - छींक रे छींक

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व्यंग्य छींक रे छींकडॉ. रामवृक्ष सिंह छींक शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह तो हमें ज्ञात नहीं। किन्तु छींकने की स्वाभाविक प्रक्रिया में यदि कोई व्यवधान न डाला जाए और मुख-विवर के आगे कोई परदा न किया जाए तो थूक, बलगम, वायु और ध्वनि का जो अद्भुत स्फोट होता है और कुछ मिश्रित द्रव-पदार्थों का जैसा अपूर्व छिड़काव होता है, उसमें कहीं न कहीं इस शब्द का निहितार्थ अवश्य छिपा हुआ है। जब तक हम गाँव में थे, छींकना हमारे लिए बड़ी स्वाभाविक क्रिया प्रतीत होती थी। जो लोग भारत की ग्राम्य संस्कृति से जुड़े हैं, वे तसदीक करेंगे कि मनुष्य शरीर के सभी नैसर्गिक क्रिया-कलाप गाँव में खुले आम होते हैं। उनका विस्तार से जिक्र करने की जरूरत नहीं, क्योंकि समझदार को इशारा ही काफी है। लिहाजा जब बाकी सारे क्रिया-कलाप खुले आम होते हैं तो छींकना क्यों न हो! सच्चाई तो यह है कि जब तक हम गाँव में रहे, छींकना हमारे लिए बड़े ही सुख और आनन्द का विषय था। हमारे परिवार के कुछ सदस्यों के लिए एक प्रकार से यह प्रभु स्मरण का अवसर भी होता था। कारण? जब भी हमें छींक आती, दादी, नानी या माँ पीछे-पीछे बोलतीं- ठाकुर जी। इधर हम छींके नही…

रमा शंकर शुक्ल का संस्मरण - मेरे मूर्तिकार -02

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मेरे मूर्तिकार-02
डा0 रमा शंकर शुक्ल
बीए का आखिरी साल था। ठण्ड चरम पर थी। हमारी कक्षाएं सुबह 6.30 से शुरू होती थीं। हम आठ भाई-बहन थे, जिनका खर्चा सामान्य किसान पिताजी को निकाल पाना आसान न था। उस पर भी पिताजी के स्वाभिमान का कड़ा अनुशासन। सो हम किसी से कुछ स्वीकार भी नहीं करते थे।
उन दिनों केबी कालेज के प्राचार्य हुआ करते थे डा0 सुधाकर उपाध्याय। बड़े दबंग और कानूनी आदमी। कालेज में किसी की हिम्मत न होती कि उनके सामने खड़ा भी हो जाए। वे कुछ शिक्षकों के साथ बैडमिन्टन खेल रहे थे। घंटी खाली थी, सो हम लोग वही खड़े होकर  उनका खेल देखने लगे। मेरे शारीर पर महज हाफ शर्ट, पैंट के अलावा चप्पल थी। कान भी ढंका न था।
डा0 उपाध्याय ने अचानक खेल बंद करने को कह दिया। वहाँ से सीधे मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैं अचकचा गया। कुछ न सूझा तो झुक कर पाँव छू लिया। उनकी एक ख़ास आदत थी, किसी के प्रणाम का उत्तर न देते थे। मैं डर गया की क्लास न लेने पर दण्डित करेंगे। लेकिन यह क्या उन्होंने कुछ पूछने की बजाय कंधे पर हाथ रख दिया और बड़े प्रेम से बोले, "का हो तोहके जाड़ ना लागत हौ?"
मैं संकोच में सिमट गया, नहीं सर, ठण्…

रमाशंकर शुक्ल की लघुकथा - नानी

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नानी
ननिहाल में नानी न हो तो फिर उसकी गरमाहट ही क्या। माँ से भी ज्यादा नानी के प्यार की तासीर यूं ही नहीं महसूस होती।
मेरे जीवन से नानी को निकाल देने का मतलब बचपन को खारिज कर देना। साठ  साल की नानी की देह पर झुर्रियों ने अभी हमला करना शुरू किया था, पर रौनक कम न हुई थी। फूल सी पीली देह में आप ही नेह का विश्वास उग आता। माँ से प्यार कम न था, पर नानी तो नानी ही थी
उसने कभी साबुन न लगायी। कहती, इसमें चर्बी होती है।
नानी कड़क मिजाज। पूरे मोहल्ले के लोग उसके सामने सकते में रहते। पर मेरे लिए उसके भीतर छुपा हुआ प्यार का सोता बहता रहता। रात की नीद नानी के पास होने में ही आती। सुबह का जागना भी उसी जुबान से। नहला-धुला चुटिया गूंथ स्कूल के लिए तैयार कर देती। पर मजाल है जो सीसा देख कंघी कर लूं। या फिर माथे पर बाल लटकते दिख जाएँ। खुद से कभी न तो तैयार हुई न तैयार होने की इजाजत। क्या पता लड़की की सूरत से छिछोरापन झलक जाए।
घर में मेहमान आये यो इकलौती संतान होने के बावजूद बराबर चौकी पर नहीं जमीन पर ही बैठने की इजाजत।
होली के पहले एक रात गुझिया बनाने के लिए माँ ने पड़ोस से गोठ्नी लाने भेजा। लौटी तो सीढ़ी के…

नन्दलाल भारती की कहानी - लोटा भर पानी

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नन्दू वैसे तो स्कूल गया तो था पर दूसरी जमात पास नहीं कर पाया था। उसके गांव के जमींदारों के खेतों में पसीना बहाया पर कभी पेट भर खाने का मजा नहीं ले पाया। अच्छे कपड़े-लत्ते तो सपने की बाप थे। एक बार उनसे दूर के सर्वसम्पन्न रिश्तेदार देवसिंगार से मुलाकात हो गयी देवसिंगार आये वे अपनी आप बीती बताये। देवसिंगार की आप बीती से नन्दू के बाप खिरजू बहुत प्रभावित हुए और उनकी राह पर चलने की कसम खा लिये। एक दिन रात में वे चुपचाप बम्बई के लिये निकल पड़े। नसीब ने साथ दिया वे बम्बई की किसी कपड़ा मिल में बतौर मजदूर काम करने लगे थे। दो महीने बाद मनीआर्डर के साथ नन्दू के बाप का पत्र उसकी मां सुरजीदेवी को मिला था। बम्बई के चले जाने के बाद जिस जमींदार भैरव भाल की हलवाही खिरजू कर रहे थे उसका आतंक बढ़ गया था। दुर्भाग्यबस खिरजू ज्यादा दिन नौकरी नहीं कर पाये उपर वाले को प्यारे हो गये। जमींदार भैरवभाल की आंख में नन्दू का गठीला बदन खटकने लगा था। बदनसीबी ने नन्दू को जमींदार भैरवभाल का बधुवा मजूदर बनने पर मजबूर कर दिया था,जमींदार ने चक्रव्यूह जो ऐसा रचा भी तो था।नन्दू अपने घर से सुबह निकलता और देर रात तक वापस लौटता,उसक…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता

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मैं शाला न आ पाऊंगी                    मां की तबियत बहुत खराब।
                     बापू को हो रहे जुलाब।
                     इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                     मैं शाला न आ पाऊंगी।                    मुझे पड़ेगा आज बनाना।
                    अम्मा बापू,सबका खाना।
                    सुबह सुबह ही चाय बनाई।
                    घर के लोगों को पिलवाई।        
                    जरा देर में वैद्यराज के,
                    घर बापू को ले जाऊंगी।
                    इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                    मैं शाला न आ पाऊंगी।

                   दादा की सुध लेना होगी।
                   उन्हें दवाई देना होगी।
                   दादीजी भी हैं लाचार।       
                   उन्हें बहुत करती मैं प्यार।
                   अभी नहानी में ले जाकर,
                   उन्हें ठीक से नहलाऊंगी
                   इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                   मैं शाला न आ पाऊंगी।                   छोटा भाई बड़ा शैतान।
                   दिन भर करता खींचातान।
                  कापी फेंक किताबें फाड़।
           …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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