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February 2013
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एक  हसीन बस का सफ़रनामा

उस समय मेरी मोटर साइकिल की स्पीड 70 किमी/घंटा के आस -पास  रही होगी। सामान्यता दो पहिया वाहनों को जिस तेज़ गति से चलाने वाले व्यक्तियों को मैं असामाजिक तत्वों में गिनता हूँ , उसी  गति से चलना उस समय मेरी मज़बूरी बन गई  थी और मज़बूरी क्यूँ न हो मामला जो इतना गंभीर था। मुझे हर हाल में उस एक मात्र बस को पकड़ना था, जिसे इस अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र में चलाकर परिवहन विभाग ने अपनी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा ली थी।

आखिरकार मैं उस गड्ढेदार ऊबड़-खाबड़ सड़क पर पहुँच ही गया जो इस ग्रामीण क्षेत्र को शेष भारत से जोड़ती थी। सड़क के ही नजदीक वह स्थान था जहाँ पहले से ही पचासों और लोग खड़े होकर बस के आने का इंतज़ार कर रहे थे। वहां प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के बीच के समय की तरह शीतवार वाला  कुछ व्यक्त और कुछ अव्यक्त भयावह तनाव फैला हुआ था।  जिस तरह प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच के समय में हर देश दूसरे देश को शक, प्रतिस्पर्धा और डर की नज़र से देख रहा था,ठीक  उसी तरह वहां मौजूद हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को देख रहा था। मैंने अपनी मोटरसाइकिल अपने छोटे भाई को थमाई और उस भीड़ का हिस्सा बन गया।

लगभग आधा घंटा इस तनाव पूर्ण माहौल में बस का इंतज़ार करते बीते होंगे कि अचानक कुछ अति जागरूक  लोग रोड की उस दिशा की तरफ भागने लगे जिधर से बस आने वाली थी। पहले मैं कुछ समझ नहीं पाया पर थोड़ी देर बाद जब मुझे उसी दिशा से बस जैसी कोई आकृति नज़र आने लगी तो मैं भी सम्पाती जैसी दूर दृष्टि  वाले उन व्यक्तियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। जैसे त्रेता में सम्पाती ने समुद्र के उस पार बैठी सीता को दूर से ही देख लिया था, उसी प्रकार वे व्यक्ति भी बस को दूर से ही देखकर पहले बस पर चढ़ने के लिए उसी दिशा में भागने लगे थे। थोड़ी देर बाद पहले से ही लगभग भरी हुई बस   हमारे नज़दीक आकर रुकी।  उसके रुकते ही वहां एक जलजला-सा आ  गया। चारों ओर  से यात्री बस में घुसने लगे, कुछ गेट से, कुछ खिड़की से, जो जहाँ जरा सा भी स्थान पा रहा था वहां से अन्दर जाने की जुगत में लगा था और धन्य हैं इस देश की वीर महिलाएँ  जो एक हाथ में अपना बच्चा लिए -लिए  रानी लक्ष्मीबाई की तरह दुश्मनों को चीरते हुए बस मेन धँसने  में सफल हो गई थीं । लेकिन इतनी ज्यादा मारामारी देख कर मैं तो सहम गया और शहर जाने के अपने निर्णय पर पुनः विचार करने लगा। शहर में आवश्यक कार्य होने के कारण मैंने अपने आप को सम्हाला और उस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गया। अपने पूर्वजन्मों  के पुण्य और अपने पूर्वजों के आशीर्वाद की बदौलत आखिरकार मैं भी उस बस में स्थान पाने में सफल हो गया। एक बात तो है हमारी भारतीय बसों का मॉडल ज़रूर 'पुष्पक विमान' , जिसके बारे में कहा जाता है कि उस विमान में चाहे जितने लोग बैठते थे  पर उसमें एक सीट हमेशा खाली ही रहती थी, का विकसित जमीनी प्रारूप  है ।पुष्पक विमान की तरह ही  भारतीय बसें भी  कभी फुल नहीं होती हैं, उनमें एक क्या अनेक  यात्रियों के लिए जगह सदैव बरकरार रहती है। 

मैं अपने इन्हीं  विचारों में खोया हुआ और उस भरी भीड़ में दबा कुचला साँस लेने के लिए ऑक्सीजन की तलाश कर रहा था कि उसी समय अचानक ड्राइवर की सीट की तरफ से जोर-जोर से गालियों की बौछार होने लगी।  स्त्री जननांगों  पर आधारित कुछ पारंपरिक तो कुछ नवीन आविष्कृत गालियाँ सुनकर मैं इतना तो समझ ही गया कि  हम भारतीय और किसी विषय में मौलिक और सृजनात्मक हों चाहे न हों पर गालियों के मामले में हमसे ज्यादा सृजनधर्मी  विश्व में कोई दूसरा नहीं है। कुछ  देर बाद मुझे पता चला कि इस गाली- गलौज का मूल उत्स या कारण वे लोग थे जो ड्राइवर की सीट वाली खिड़की से अन्दर घुस रहे थे।  उनके इस अपावन आचरण से  ड्राइवर साहब के चरण घायल हो गए ।इसी से वे अपना आपा खो बैठे थे और जंग शुरू हो गयी थी।

कुछ समझदार अवसरवादी व्यक्तियों ने मामले को शांत कराया जिससे कि  ड्राइवर बस स्टार्ट करने की  प्रक्रिया शुरू कर सके। यहाँ यह उल्लेख उत्तर प्रदेश के निवासियों को भले ही अनावश्यक लगे  पर अन्य  देश वासियों को यह बताना ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसों को स्टार्ट करने के लिए एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है , जिसमे सबसे पहले ड्राइवर रूपी बस का पुजारी किसी देवी-देवता को अगरबत्ती से मनाता है। कभी-कभी ख्वाजा साहब भी याद किए जाते जाते हैं। उन्हें लोबान सुलगा और आँखें मूँद कर रिझाया जाता है। इसके आधे घंटे बाद  आँखें खुलीं तो खुलीं नहीं तो बंद आँखों से ही चाभी लगाकर दसों बार खुल चुके बस के इंजन को जगाने की कोशिश की जाती  है।  इस जागरण प्रक्रिया में यात्रीगण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं । वे भी ड्राइवर के साथ-साथ अपने-अपने इष्टों का ध्यान करते हैं। यह सब होने के बाद सारे यात्रियों से उतारने का अनुरोध किया जाता है।कुछ बेहया मर्द और औरतें लाख प्रार्थनाओं के बावजूद अपना वज़ूद बस मेन ही बनाए रखने में विश्वास रखते हुए अपनी-अपनी सीटों को जकड़े बैठे रहते हैं। तदुपरान्त कुछ युवा यात्रियों को धक्का देने के लिए आमंत्रित किया जाता है। प्रायः अंत में धक्का मार-मार के कुम्भकरण की तरह सोये हुए बस के इंजन को जगा ही लिया जाता है। इस तरह दुर्गा ,बजरंगबली या अली की जय-जयकार के साथ बस रवाना हो जाय तो ठीक वरना दूसरी किसी बस का ऐलान हो जाता है। सभी तरफ भागमभाग मच जाती है ।

इस पूरी प्रक्रिया को ग्रामीण क्षेत्र का हर यात्री आत्मसात कर चुका है ।  इसलिए उसे बहुत ज्यादा कष्ट नहीं होता और वैसे भी कष्ट, वेदना, प्रसन्नता, आदि भाव महसूस करने की चीज़े हैं, महसूस करो तो हैं न करो तो नहीं है। इस तरह इस पूरी प्रक्रिया का अक्षरशः पालन करने के बाद बस स्टार्ट हुई और उसके चलते ही बस में बैठे हुए यात्रियों ने जोर का नारा लगाया "बोलो बजरंग बली की जय।"

बस की स्थिति को देखते हुए मुझे भी लगा कि  इसे शहर तक पहुंचने के लिए वाह्य बल (बजरंग बली) की आवश्यकता जरुर पड़ेगी इसलिए मैंने भी जयकारे में सहयोग किया। 

कुछ छिटपुट मारपीट, गाली गलौज की घटनाओं के बीच उस बस रूपी यातना शिविर में लगभग 8 घंटे बिताने के बाद आखिरकार शहर के बस स्टेशन पर मैं उतरा।

बस स्टेशन पर दो तरह की प्रजातियों का जमावड़ा अधिक होता है, ये दो प्रजातियाँ हैं चोर और भिखारी।

वैसे तो ये प्रजातियाँ पूरे शहर में फैली हैं पर अपने पूर्ण कौशल को प्रदर्शित करने के लिए बस स्टेशन जैसी भीड़ भाड़ वाली जगह को ये प्रजातियाँ सबसे उपयुक्त मानती हैं।शहर के इस बस स्टेशन पर इन दोनों प्रजातियों में से कोई एक आपको न मिले ऐसा असंभव है और हुआ भी वही, मैं बस के नीचे उतरकर ये चेक करने में लगा था कि मेरे शरीर के सभी अंग मेरे पास हैं या कुछ बस ही में छूट गए हैं की अचानक एक छह साल का बच्चा मेरी टाँगों में आकर लिपट गया और चिल्लाने लगा "बाबू  पैसा दे दो ...भगवान तुम्हारा भला करे। " वहीँ थोड़ी दूर बैठी उसकी माँ कि आँखों में ये नज़ारा देख कर कुछ वैसी चमक आ गई  जैसी एक पैदायशी किसान की आँखों में पहली बार अपने बेटे को खेत जोतते देखकर आती है। 

मैंने उस बच्चे  को टालने की कोशिश की लेकिन तभी उसने ऐसी बात कही जो मेरी तरह किसी भी बेरोजगार आदमी से कहकर कोई भी व्यक्ति पैसे ऐंठ सकता है। असल में वो बच्चा मेरी नौकरी लग जाए  ऐसी दुआ दे रहा था, मैंने तुरंत पैसे देकर उसका आभार व्यक्त किया। उससे मैंने अपना पिंड छुड़ाया ही था कि दूर खड़े टेम्पो स्टैंड के दो ड्राइवर भागते हुए मेरे  पास आये और पूछने लगे "कहाँ जायेंगे साहब ....अमीनाबाद, कैसरबाग, आलमबाग, अलीगंज।" उसको छेंक कर दूसरा ड्राइवर मुझे लगभग घसीटता हुआ अपने टेम्पो की तरफ ले जाते हुए बोला, " आप जहाँ जायंगे मैं ले चलूँगा आप मेरे साथ चलिए।" 

मैं जब तक पूरी स्थिति समझने की कोशिश करूँ तब तक दोनों ड्राइवर मुझे लेकर आपस में झगड़ने लगे।

पहला- "मैंने पहले सवारी देखी  थी। "

दूसरा- " तो क्या मैं पहले सवारी के पास पहुँचा था इसलिए इस पर मेरा हक है।" इस वार्तालाप के अवसान से पहले दोनों में खूब जमकर हाथापाई भी हुई । कुछ लातों और घूसों के उपहार मुझे भी मिले।

किसी तरह मैं अपनी उखड़ी हुई साँसों को व्यवस्थित करके उन दोनों से अपनी जान बचा अपने नज़दीक से गुज़र रहे एक टेम्पो पर जाकर लगभग लेट गया। लगा कि जैसे किसी बड़े पुण्य के चलते जान बची है वरना जेब या गले में से कुछ भी कट-फट सकता था।


शहर के टेम्पो वालों, आर टी ओ ऑफिसर्स तथा शहर वासियों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता-सा हुआ लगता है। समझौता ये है कि टेम्पो की 3 व्यक्तियों वाली सीट पर 4 बैठेंगे। 3 व्यक्ति जो पहले बैठ जाते हैं उनको तो थोडा आराम रहता है परन्तु चौथा व्यक्ति अवैध संतान की तरह पूरे सफ़र भर अपने हक़ की सीट के लिए संघर्ष करता रहता है।


मुझे टेम्पो ड्राइवर के बगल वाली सीट मिली और यहाँ भी तीन की सीट पर ड्राइवर सहित 4 लोग बैठे थे। ड्राइवर के बगल वाली सीट पे बैठने के आप तभी योग्य हो सकते हैं जब आप अपने शरीर को 'अष्टावक्र' ऋषि की भांति कई स्थानों से मोड़ सकें तथा ड्राइवर की बकवास में हाँ में हाँ मिला सकें।


इस टेम्पो ड्राइवर की उम्र लगभग 18 साल रही होगी और वो अपने टेम्पो को इस तरह चला रहा था मानो वो टेम्पो  न होकर अमेरिका के राष्ट्रपति का विमान 'एयर फ़ोर्स वन' हो, जिस पर मिसाइल का भी असर नहीं होता। हवा से बाते करते टेम्पो में उसने टेप रिकॉर्डर ऑन कर दिया जिसमें एक लोकप्रिय भोजपुरी गायक का द्वि अर्थी गाना चल  रहा था। जिसका एक अर्थ तो महान कवि कबीर के निर्गुण से भी ज्यादा गूढ़ था तथा दूसरा अर्थ  निहायत ही अश्लील था, जिसमें  प्रेमी अपने प्रेयसी के आगे अपने प्रेम का प्रस्ताव रख रहा था।


थोड़ी दूर चलने पर टेम्पो एक जाम में फँसगया, फिर क्या था चारों ओर हॉर्न बजाने का कम्पटीशन शुरू हो गया। इसी  ऊहापोह में टेम्पो ड्राइवर ने थोड़ा आगे बढ़ने की कोशिश की ही थी कि एक कार वाला व्यक्ति जिसकी कार टेम्पो के बगल में थी,उसने बहुत जोर से टेम्पो ड्राइवर को गाली दी। टेम्पो वाला समझे या न समझे परन्तु मैं उस कार चालक की वेदना समझ सकता था। भला कार वाला ये कैसे बर्दाश्त कर सकता था कि एक टेम्पो उससे आगे निकल जाये। अचानक उसी जाम में फंसे एक रिक्शेवाले ने जैसे रिक्शे को टेम्पो से आगे ले जाने की कोशिश की, टेम्पो चालक ने अपने ऊपर पड़ी समस्त गालियों को चक्रवृद्धि ब्याज सहित उस रिक्शा चालक को सौंप दीं। सामंतवाद का इससे अच्छा  उदाहरण कहाँ मिल सकता है, जहाँ एक वर्ग अपने से  उच्च वर्ग द्वारा शोषित होकर भी इसलिए खुश था क्योंकि वह भी अपने से निम्न वर्ग का  शोषण कर सकता था।


उस रिक्शा चालक पर गालियों की बौछार करने के बाद टेम्पो ड्राइवर गर्व से मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया, जवाब मुझे भी मुस्कुराकर देना था। मैं अपने शरीर की बची हुई समस्त शक्ति की बदौलत मुस्कुराने में कामयाब रहा।


अंत में वो भी क्षण  आया जब मेरी यात्रा की पूर्णाहुति हुई । मैं अपने गंतव्य स्थान जो कि शहर में ही किराये पर लिया हुआ एक घर था, तक पहुँच चुका था। अपने शरीर को लगभग ढोते हुए मैंने अपने कमरे में प्रवेश किया। मेरे मित्र ने जो कि  मेरे साथ ही रहता था, मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया


और पूछा, " सफ़र कैसा रहा?"


उसके इतना कहते ही लाइट चली गयी। मैंने उसके प्रश्न के जवाब में उस पर केवल एक नज़र डाली और बिस्तर पर ढेर होते हुए उस पंखे के परों को तोलने  लगा जो पंगु होने के बावजूद ईश कृपा से गिरिवर को जीतने का उपक्रम कर रहे थे यानी बहुत ही धीरे-धीरे घूम रहे थे।
                                                                                              

  -----दीपक शर्मा 'सार्थक'

 

सौर

दिनेश को आज घर लौटने में देर हो गयी थी। जूते उतार कर वह पलंग पर लेट गया। वह बहुत थका हुआ था। आज का दिन अच्छा नहीं बीता था । काम भी और दिनों से कुछ अधिक था उस पर उसे बॉस की डांट भी खानी पड़ी। वह आँखें मूंदे लेटा था तभी उसकी पत्नी कुसुम ने उसके हाथ में एक कार्ड थमा दिया। उसने एक उचटती सी नज़र डालते हुए पूछा "क्या है।"

"वो मेरी बरेली वाली मौसी हैं न उनकी छोटी बेटी की शादी है। इस महीने की 15 तारीख को। जाना पड़ेगा"

" हूँ ....तो चली जाना।" कह कर दिनेश ने कार्ड एक तरफ रख दिया।

" हाँ जाउंगी तो लेकिन कुछ देना भी तो पड़ेगा। मौसी हमें कितना मानती हैं। जब भी मिलाती हैं हाथ में कुछ न कुछ रख देती हैं।"

" देख लो अगर तुम्हारे पास कुछ हो, कोई अच्छी साड़ी या  और कुछ, तो दे दो।"

" मेरे पास कहाँ कुछ है मैं कौन रोज़ रोज़ साडियाँ या गहने खरीदती हूँ।"

" तो मैं भी क्या करूं मेरी हालत तुमसे छिपी है क्या। मेरे पास कुछ नहीं है।" दिनेश ने कुछ तल्ख़ अंदाज़ में कहा।

दिनेश की माँ ने अपनी बहू  की तरफदारी करते हुए कहा " उस पर क्यों चिल्ला रहा है। अब दुनियादारी तो निभानी ही पड़ती है।" अपनी सास का समर्थन पाकर कुसुम बोली " मैं कौन आपने लिए कुछ मांग रही हूँ। पर चार लोगों के बीच खाली हाथ जाउंगी तो बदनामी इनकी ही होगी।" कह कर वह सुबकने लगी।

दिनेश का मन पहले ही खराब था। वह उबल पड़ा " दिन भर का थका हारा घर लौटा हूँ, एक गिलास पानी पूछना तो दूर फरमाइशों की लिस्ट लेकर सर पर सवार हो गयीं।" यह कह कर वह उठा और चप्पल पहन कर घर से बाहर निकल गया।

कुसुम सन्न रह गयी। उसे पछतावा हो रहा था। उसे कुछ देर रुक जाना चाहिए था। समय देख कर ठंडे  दिमाग से बात करनी चाहिए थी। दिनेश की परेशानी वह समझती है। जी तोड़ मेहनत करते हैं। फिर भी कमाई पूरी नहीं पड़ती। हर चीज़ के लिए मन मारना पड़ता है। दिनेश कहते कुछ नहीं पर अन्दर ही अन्दर इस बात को लेकर परेशान रहते हैं। वह मन ही मन स्वयं को कोसने लगी। उसे इस वक़्त यह बात नहीं करनी चाहिए थी।

उसे परेशान  देख कर  उसकी सास ने समझाया " परेशान मत हो, थोड़ी देर में जब गुस्सा शांत होगा तो लौट आएगा।"  कुसुम दिनेश के घर लौटने का इंतज़ार करने लगी।

                           घर से निकल कर दिनेश यूँ ही सड़क पर चलने लगा। उसकी आमदनी की सौर इतनी छोटी थी की पाँव सिकोड़ते सिकोड़ते घुटने दुखने लगे थे।  उसके मन के भीतर बहुत कुछ चल रहा था। 'क्या ज़िन्दगी है दिन भर खटने के बाद भी छोटी छोटी चीज़ों के लिए तरसना पड़ता है।'  वह क्या करे। अम्मा के ऑपरेशन के लिए क़र्ज़ लेना पड़ा। तनख्वाह का एक हिस्सा तो क़र्ज़ की अदायिगी में चला जाता है। जो बचता है उसमें बड़ी मुश्किल से घर चल पाता है। वह अपने ख्यालों में चलता हुआ घर से काफी दूर निकल आया था। यह इलाका शहर के पॉश इलाकों में से एक था। दोनों तरफ बने बड़े बड़े मकानों को दिनेश बड़ी हसरत से देख रहा था। चलते चलते वह थक गया था। सामने एक पार्क नज़र आया। वह पार्क में घुस गया। पार्क खाली था। अतः वह बेंच पर लेट गया। अब तक उसका गुस्सा शांत हो गया था। वह सोचने लगा ' बेकार ही कुसुम पर नाराज़ हुआ। सही तो है वो कहाँ कभी अपने लिए कुछ मांगती है। जो भी उसे देता हूँ उसी में संतुष्ट रहती है। इन आठ सालों में चार अच्छी साड़ियां भी नहीं दिलाई होंगी उसे।' यही सब सोचते सोचते उसे झपकी लग गयी। उसकी आँख खुली तो उसे अपने सीने पर कुछ हिलाता सा महसूस हुआ। उसका फ़ोन वाईब्रेट कर रहा था। जब तक फ़ोन उठाता काल मिस हो गयी। उसने देखा कुसुम की चार मिस कॉल थीं। ' घर में सब परेशान होंगे' वह उठा और तेज़ी से घर की तरफ चल दिया।

उसके दस्तक देने से पहले ही दरवाज़ा खुल गया। कुसुम नज़रें झुकाए खड़ी थी। जब वह भीतर आया तो अम्मा ने डांटा  " कहाँ चला गया था, बेचारी इतनी देर से भूखी बैठी है। जा अब खाना खा ले।"  कुसुम ने धीरे से कहा      " आप हाथ मुंह धो लीजिये मैं खाना लगाती हूँ।" जब वह हाथ मुंह धो कर आया तो कुसुम तौलिया  लिए खड़ी थी " आप परेशान मत हों मैं मौसी से कोई बहाना बना दूँगी, मैं शादी में नहीं जाउंगी।"

दिनेश  हाथ पोंछने के बाद तौलिया उसे पकड़ाते हुए बोला " तुम फिक्र मत करो शादी में जाने की तैयारी करो, मैं दो तीन दिन में कुछ इंतज़ाम करता हूँ।"

कुसुम ने खाना लगा दिया। दिनेश की पसंद के भरवां करेले की सब्जी थी। दिनेश ने एक ग्रास तोड़ा और कुसुम की तरफ बढ़ा  दिया। कुसुम ने मुस्कुराते हुए वह कौर मुंह में रख लिया। उसके बाद दोनों पति पत्नी शांति से खाने लगे

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परिचय
नाम - आशीष कुमार त्रिवेदी

जन्म तिथि - 7-11-1974

शिक्षा - B .COM [1994]

पेशा- प्राइवेट टयूटर

अपने आस पास के वातावरण को देख कर मेरे भीतर जो भाव उठाते हैं उन्हें लघु कथाओं के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।

C -2072 इंदिरा नगर

लखनऊ-226016

चंद्रेश कुमार छतलानी

और चाँद डूब गया

वो था मेरा ही तो अस्थि-कलश, मैं ही जान ना पाया |

लिख रहा था बिना स्याही की कलम से, मान ना पाया |

 

बन के चकोर डूब गया था चमकते चाँद की रोशनी में,

वो रात अमावस्या की थी, चाँदनी को पहचान ना पाया |

 

मैं अधूरा था, परछाई में फिर भी देखता रहा मेरी संपूर्णता

दुनिया से तो तारीफें बटोर ली, अक्स से सम्मान ना पाया |

 

क्या सवाल पूछ के खुदा ने सारी ज़िंदगी की रहमतें दी थी,

जवाब ढूँढते सारे जहां को पा लिया, लेकिन राम ना पाया |

 

झील की लहरों में कई दिनों तक बह के डूब गया तन्हा चाँद

कैसे जुस्तजू करूँ, ज़मीं क्या आसमाँ में भी निशान ना पाया |

 

चंद्रेश कुमार छतलानी

३ प् ४६, प्रभात नगर

सेक्टर-५, हिरन मगरी

उदयपुर (राजस्थान) - भारत

http://chandreshkumar.wetpaint.com

chandresh.chhatlani@gmail.com

Cellphone: 9928544749

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गिरिराज भंडारी

आदतन हम पुकार लेते हैं

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मन का कोना बुहार लेते हैं

चलो खुद को संवार लेते हैं

 

आसमानों में उड़ न जाएँ कहीं

ज़मीं पर उतार   लेते हैं

 

जीना क्या है, और मरना क्या

हम तो वो भी उधार लेते हैं

 

कौन उसपे यक़ीन   करता है

फिर भी ,कर इन्तिज़ार लेते हैं

 

वो बड़ों के सगे - वगे   होंगे

हर किसी को सुधार लेते हैं

 

घर,खुद का भी नहीं खुलता है

आदतन हम पुकार लेते हैं

 

तय है, उनको कहीं लगी होगी

लफ्ज़ हम धारदार लेते हैं

 

कभी इक बार ही हुए थे ग़लत

तुहमतें   बार बार लेते हैं

 

अपना तो बस यही सलीक़ा है

प्यार   देते   हैं  प्यार लेते हैं

 

पतझड़ों ने नहीं सताया मुझे

इम्तिहान, पर बहार लेते हैं

 

हार जब भी हुई तो उनकी हुई

वो जो हिम्मत को हार लेते हैं

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नीरा सिन्हा

औरतनामा

आया था गांव बन के परदेशी

गंवार दुल्‍हन की तलाश में

रिश्‍तेदारों से संपर्क साध कर

फंसा लिया अपने मोहपाश में

चिकनी चुपड़ी बातें करता

शहर में घर का दिखाता था सपना

नीम का पेड़ लगा है आंगन में

बनाया है गौरैया ने जिसपर घोंसला अपना

शहर में क्‍या लड़कियां नहीं है

पूछते परदेशी से बाबू औ' माई

लड़कियां तो कई मिल जावे है

अब तक मुझे एक न भाई

खाने को कुछ मिला नहीं

कहते हुए घर में घुसपैठ बनाया

महुआ कुर्थी खा-खा कर

विश्‍वास हम सबों पर जमाया

माई-बाबू का एक दिन जीतकर विश्‍वास

ब्‍याह कर मुझे ले आया शहर

बहुत खुश थी बन कर दुल्‍हन

सपनों में खोयी जिंदगी कर रही थी बसर

एक दिन उनकी मौसी ने आकर

घर पर मेरे डेरा जमाया

काम के सिलसिले में पति मेरा

कई महीने तक घर नहीं आया

घर पर राशन हो गए खत्‍म

कुछ दिनों तक फांका किया

मौसी ने फिर रास्‍ता दिखाया

रोजगार के लिए नौकरी दिया

नौकरी पहुंची करने जब मैं

पता चला मैं गुलाम हुयी

पच्‍चीस हजार मेरी कीमत आंकी

मौसी मुझको बेच गयी

कई रातों तक दिल जला

जब मालिक था देह को नोचता

असहनीय पीड़ा की बेला में

दिल अक्‍सर था मरने की सोचता

किंतु कहां मेरे पीड़ा का था अंत

नोचा-खरोंचा मुझे फिर बेच दिया

मालिक बदलते गए पीड़ा वही रही

तहे दिल से पति का प्‍यार किया

उन्‍नीस-बीस मालिकों ने

नित्‍य नये तरीके आजमाए

शहर-दर-शहर भटकती रही

जिस्‍म औ' जान को रोज लुटवाए

पति बनकर सपने जिसने दिखलाए

बेचा था पहले-पहल उसी ने मुझे

खरीद-बिक्री का था अंतहीन सिलसिला वह

जिस्‍म औ' जान की लौ थे बुझे-बुझे

मासूम दिल मगर मानने को तैयार नहीं था

आया जो गांव था वो दलाल पति नहीं था

लग गया था दाग मेरी कोरी चुनरी में

किया था तिजारत वो प्‍यार नहीं था

आंखें पथरा गयी थी प्‍यार ढूढंते

देह नुचवाने का पति ने व्‍यापार किया

जवान, अधेड़ औ' बूढ़ों ने

बंद कमरे में मेरा शिकार किया

फर्श पोंछते बर्तन मांजते

मिट गयी लकीरें हाथों की

याद आया कहना ब्राहमण का

बड़ी भाग्‍यशाली हॅूं हर्फ कहती ज्‍योतिष शास्‍त्रों की

छलनी शरीर मेरा था बिखरा

खरीददारों के कमरे में

समेटती-सहेजती जिसे रोज मैं

रातों को फिर लुटवाने में

माँ बनने का मेरा सपना

हर रोज होता लहूलुहान

कई बार खैराती अस्‍पतालों में

सपनों को चढ़ाया परवान

कारण नहीं था जीवित रहने का

मरना मेरी लाचारी थी

मन तो कब का मर चुका था

शारीरिक स्‍पंदन बाकी थी

लूटी जिसने प्रतिष्‍ठा मेरी

समाज में वे सभी प्रतिष्‍ठित है

बन गयी मैं कुलटा-बेहया

समाज कहता मुझे अप्रतिष्‍ठित है

जब तक रहेगा समाज में

यह रूढ़िवादी चलन जारी

मरती रहेगी बेमौत मेरे

जैसी बेहया-कुलटा बेचारी

समाज के ठेकेदारों को समझना होगा

खोलते रहने से औरतों की साड़ी

कब तक चलेगी आखिर

देश के लोकतंत्र की गाड़ी

अगर मुझे छला गया है समाज में

लौटाना होगा मुझे प्रतिष्‍ठित जीवन समाज को

नहीं तो बदल डालो संविधान के इबारतों को

जो मानता है समान समाज को

अगर ऐसा नहीं हो सका भारतीय समाज में

छल से रोज ब्‍याही जाती रहेगी भारतीय नारी

रोज छलनी होता रहेगा शरीर औ' आत्‍मा

रोज मरती जाएगी कहीं-न-कहीं भारतीय नारी

गांवों का देश है हमारा भारत

घूमते है भेडिए जहां परदेशी के भेष में

जात-बिरादरी-रिश्‍तेदारों के कारण

कभी बिकती, कभी फंसती है नारियां इस देश में

मेरा तो लगभग आ गया है अंत

मरते-मरते यह बता देना चाहती सभी को

अंत महिला जाति का भारत देखेगा तुरंत

सुरक्षित न किया गया अगर महिला जाति को

तारों के बीच से देखेगी मेरी आंखें

किसे परदेशी धोखे से ब्‍याहेगा

ढूंढ़ने से नहीं मिलेगी नारी कहीं

समाज फिर जीवित कहां रहेगा, मर जावेगा

आयात करना फिर नारियों का

कौन भला यहां आना चाहेगी ?

नारी का अपमान जहां पुरूष करता हो सरेआम

कौन नारी भला ऐसे पुरूष को चाहेगी !

नीरा सिन्‍हा

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह 815301 झारखंड़

nirasinha54@gmail.com

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उमेश मौर्य

!! शब्‍द !!

शब्‍द, केवल शब्‍द,

जो लग जाते हैं दिल में, काँटे की तरह,

कर देते हैं बीमार, शरीर को,

शब्‍द केवल शब्‍द, निरर्थक शब्‍द, बेकार शब्‍द,

बीमार से शब्‍द, बिना भार के शब्‍द,

बिना आधार के शब्‍द, भार बन जाते है,

पहाड़ बन जाते है,

तीर और गोली की बौछार बन जाते हैं,

यही शब्‍द, यही शब्‍द,

यही शब्‍द, जो तुम्‍हारे कानों में पड़ते हैं, हमारे कानों में पड़ते हैं,

वही शब्‍द, कभी-कभी हमारे दिल की झनकार बन जाते हैं,

कभी प्‍यार बन जाते है, कभी इकरार बन जाते है,

कभी तकरार बन जाते है,

यही शब्‍द, यही शब्‍द,

यही शब्‍द, कभी बुद्ध के अवतार बन जाते हैं,

विवेकानन्‍द की हुंकार बन जाते हैं,

चाणक्‍य का चमत्‍कार बन जाते हैं,

यही शब्‍द, गीता का सार बन जाते हैं,

यही शब्‍द, जब पिरोये जाते हैं

चुन चुन कर तो, हार बन जाते हैं,

शब्‍द ही, ज्ञान का भण्‍डार बन जाते है,

शब्‍द ही, मधुर जीवन का आधार बन जाते हैं,

शब्‍द ही, संसार का आकार बन जाते हैं,

शब्‍द, केवल शब्‍द।

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!! हादसे !!

हादसे बिखर गये हैं ,

कितने जीवन सड़कों पर,

सपनों का क्‍या होगा इनके,

टूट गये जो सड़कों पर ।

हादसे बिखर गये हैं।

इंसा दूर तलक जाता है

आशाओं की डोर लिए।

कभी-कभी मन घबराता है,

सूनामी सी सड़कों पर।

हादसे बिखर गये हैं।

माँ की साड़ी, बीबी का कुछ,

बच्‍चों की चाभी गाड़ी।

एक जतन से कितने सपने,

जुड़े हुए इन सड़कों पर।

हादसे बिखर गये हैं।

मेरी साँसों से चलती है,

घर के लोगों की साँसें ।

एक साँस पे कितने जीवन,

आधारित इन सड़कों पर।

हादसे बिखर गये हैं।

माँ का बेटा, बहन का भाई,

पिता कोई तो, पति किसी का।

एक बदन से कितने दुख सुख,

झेल रहा मनु सड़कों पर।

हादसे बिखर गये हैं।

अगले पल की खबर नहीं कुछ,

पल-पल में पल मिट जाता।

एक धमाके से कितनों का,

जीवन बिखरा सड़कों पर।

हादसे बिखर गये हैं।

खून नहीं ये सपने फैले,

नहीं मोल सपनों का है।

किसके खातिर इनका सौदा,

किसके सपने सड़कों पर।

हादसे बिखर गये हैं।

-उमेश मौर्य

सुलतानपुर, उत्‍तर प्रदेश, भारत।

ukumarindia@gmail.com

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मनोज 'आजिज़'

रंगों का त्योहार होली में

 

दीनदयाल जी दीन हाल में

गये पास मंत्री के

उनसे पहले पूछा गया

क्या मिला उन्होंने संत्री से?

दीनदयाल जी विनम्र होकर

कहा-- जरुर मिला हुजूर

मिलने की अनुमति उसने दी

आप कर दें कष्ट दुर.।

मंत्री पूछे जल्दबाजी में

कहिये क्या संवार दूँ

हर भाषण में नाम जपता हूँ

अब कितना प्यार दूँ ।

जनता-जनता जप कर तो

हरि नाम भी बिसर गया

धर्म-कर्म की बात अब तो

न जाने कब किधर गया ।

दीनदयाल जी हाथ जोड़कर

बोले-- मेरी एक पीड़ा है

चार पुत्रियों का बाप हूँ

शादी करवाने की बीड़ा है ।

इस होली में एक के लिए

लड़के वाले आएंगे

हम बेलचा-गैंता मारकर

क्या माँग पूरी कर पाएंगे ?

मंत्री थोड़ा सोचकर बोले--

'कन्यादान योजना' जारी है

इस योजना के सामने तो

बड़ी गरीबी भी हारी है।

लेकर आयें चारों का वर

हम व्यवस्था करवाते हैं

' आपको क्या पता दयाल जी

हम इस पर भी कमीशन खाते हैं'।

दीनदयालजी खुश होकर

वर ढूंढने लग गए

विवाह के दिन कहीं कोई नहीं

मंत्री जी तो ठग गए ।

चार कन्यायों का पैसा तो

गया मंत्री की झोली में

दीनदयाल जी फीका पड़ गए

रंगों  का त्योहार होली में ।

पता- आदित्यपुर-२

जमशेदपुर

झारखण्ड

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सुधीर मौर्य 'सुधीर'

वो हिन्दू थे।

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उन्होंने विपत्ति को

आभूषण की तरह

धारण किया

उनके ही घरों में आये

लोगों ने

उन्हें काफ़िर कहा

क्योंकि

वो हिन्दू थे।

उन्होंने

यूनान से आये घोड़ो का

अभिमान

चूर - चूर

कर दिया

सभ्यता ने

जिनकी वजह से

संसार में जन्म लिया

वो हिन्दू थे।

जिन्होंने

तराइन के मैदान में

हंस - हंस के

हारे हुए

दुश्मनों को

जीवन दिया

वो हिन्दू थे।

जिनके मंदिर

आये हुए लुटेरो ने

तोड़ दिए

जिनकी फूल जैसी

कुमारियों को

जबरन अगुआ करके

हरम में रखा गया

जिन पर

उनके हीघर में

उनकी ही भगवान्

की पूजा पर

जजिया लगया गया

वो हिन्दू थे।

हा वो

हिन्दू थे

जो हल्दी घाटी में

देश की आन

के लिए

अपना रक्त

बहाते रहे

जिनके बच्चे

घास की रोटी

खा कर

खुश रहे

क्योंकि

वो हिन्दू थे।

हाँ वो हिन्दू हैं

इसलिए

उनकी लडकियों की

अस्मत का

कोई मोल नहीं

आज भी

वो अपनी ज़मीन

पर ही रहते हैं

पर अब

उस ज़मीन का

नाम पकिस्तान है।

अब उनकी

मातृभूमि का नाम

पाकिस्तान है

इसलिए

अब उन्हें वहाँ

इन्साफ

मांगने का हक नहीं

अब उनकी

आवाज़

सुनी नहीं जाती

'दबा दी जाती है'

आज उनकी लड़कियां

इस डर में

जीती हैं

अपहरण होने की

अगली बारी उनकी है।

क्योंकि उन मासूमो

में से

रोज़

कोई न कोई

रिंकल से फरयाल

जबरन

बना दी जाती हैं

इसलिए

जिनकी बेटियां हैं

वो हिन्दू है

और उनके

पुर्वज

हिन्दू थे।

(रिंकल कुमारी को समर्पित)

सुधीर मौर्य 'सुधीर'

गंज जलालाबाद, उन्नाव

209869

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शशांक मिश्र भारती

1 रोज नया एक वृक्ष लगाओ

आज पुनः व्‍याप्‍त देखो

कुहासा अपरम्‍पार है

खग'विहग व्‍याकुल भए

संत्रस्‍त समस्‍त संसार है

समय की अच्‍छी दौड़ लगी

पर्यावरण की न चिन्‍ता है

पृथ्‍वी का रक्षक जो था

विनाशी वही नियन्‍ता है

चहुंओर घट रही वनस्‍पति

नित वृक्ष कटते जाते हैं

वादे हो रहे रोज अनेक

पर लगना कहीं पर पाते हैं

स्‍वार्थ लिप्‍सा बढ़ गयी इतनी

स्‍व ? ही सब कुछ सार है,

त्‍याग का कहीं पता नहीं है

भोगवाद साकार है

इसीलिए यह प्रश्‍न जगा है

पर्यावरण क्‍यों दूर भगा है

उसको जीवन का अधिकार

जो प्रकृति की गोद में उगा है

यदि नहीं लगा सकते तुम हो

काटते क्‍यों फिर जाते हो,

नित घटा रहे वनस्‍पति

धरा से नमी भगाते हो

तुम्‍हारा कर्त्तव्‍य यही है

रोज नया एक वृक्ष लगाओ

चहुं ओर आये हरियाली

प्रकृति-धरा खुशहाल बनाओ।

प्रकाशनः-साहित्‍यप्रवाह मासिक साहित्‍यिक पत्र अगस्‍त 2012 पृ....04

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2 वृक्ष जीवन के पचास वर्ष

जिसके कारण जीवित हम सब

प्रकृति मानव सन्‍तुलन बनाते हैं,

उपकार करता लाखों रुपये का

क्षण भर में हम उसे भुलाते हैं।

वृक्ष के जीवन के पचास वर्ष

पच्‍चीस लाख का लाभ दे जाते हैं।

बदले में मानव बतलाए तो

क्‍या आभार प्रकट भी कर पाते हैं।

उर्वरता,आर्द्रता,प्राणवायु सब

वृक्षों से ही हम रहते पाते हैं।

मूर्खों सा फिर भी व्‍यवहार करते

पल भर में काट गिराते हैं।

स्‍वंय परोपकार करें न किसी का

वृृक्षों का सहन नहीं कर पाते हैं।

स्‍वार्थ अपना पूरा होता रहे बस

धरा पे असन्‍तुलन बढत्राते हैं।

फले वृक्षों की झुकी डालियां,

न प्रेरणा हमको दे पाती हैं।

कार्बन की बढती मात्रा भी तो

समझ न हमको दिला पाती है।

प्रकृति मानव संस्‍कृति का

सन्‍तुलन मनुज न बचा पाएगा

धरती के प्राणियों की श्रेष्‍ठता कैसी

स्‍वपूर्ति माप पशु बन जाएगा।

प्रकाशनः-सरयूपरिवार मासिक अक्‍टूबर 2012 पृ..09

संपर्क:

हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ.प्र.

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इंसानियत की ख़ुश्बू से लबरेज़ है .... “ख़ाकी में इंसान”

बहुत पहले हुक्का बिजनौरी की कुछ पंक्तियाँ सुनी थी , सुनकर हंसी भी आयी और दुःख भी हुआ कि “हुक्का” बिजनौरी साहब को आख़िर ऐसा क्यूँ लिखना पड़ा :--

पुलिस कर्मचारी और ईमानदारी ?

आप भी क्या बात करते हैं श्रीमान ...

सरदारों के मोहल्ले में नाई की दूकान ..

आज भी समाज का नज़रिया ख़ाकी के प्रति ये ही है। चाहें हमारी फ़िल्में हों या फिर हमारा मीडिया इन्होंने पुलिस के चेहरे पे एक आध चिपके भ्रष्ट चेचक के दाग तो समाज को दिखाए मगर ख़ाकी के मर्म , ख़ाकी की टीस ,ख़ाकी के भीतर के इंसान को कभी आवाम से मुख़ातिब नहीं करवाया।

ऐसा नहीं है कि पुलिस अपने काम को सही तरीक़े से अंजाम नहीं दे रही , ऐसा भी नहीं है कि ख़ाकी लबादे के पीछे सिर्फ़ संवेदनहीन लोग हैं और ऐसा भी नहीं है कि ख़ाकी में इंसान नहीं होते मगर आम आदमी को किसी ने सिक्के का दूसरा पहलू कभी दिखाया ही नहीं

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भारतीय पुलिस सेवा के 89 बैच के अधिकारी अशोक कुमार ने अपने दो दशक ख़ाकी में पूरे करने के बाद इस इलाके में एक बेहतरीन कोशिश अपनी किताब “ख़ाकी में इंसान” के ज़रिये की। उन्होंने अपनी इस किताब में छोटे –छोटे अफ़सानों के माध्यम से पुलिस की तस्वीर के वो रंग दिखाए जिसे समाज अपने पूर्वाग्रहों से ग्रसित चश्में से कभी देखता ही नहीं था।

राजकमल पेपरबैक्स से 2011 में छपी “ख़ाकी में इंसान “ इतनी मक़बूल हुई कि 2012 में इसका दूसरा संस्करण भी आ गया।

ख़ाकी में बीस साल से भी ज़ियादा अपने तजुर्बे को किस्सों की शक्ल में ढालकर किताब के पन्नों पर जिस तरह अशोक साहब ने उकेरा है उससे लगता है कि एक बेहतरीन पुलिस अफ़सर के साथ - साथ वे एक मंझे हुए क़लमकार भी हैं।

ख़ाकी पहनने के बाद ख़ाकी के अन्दर तक के तमाम पेचो-ख़म ,काम करने के तौर-तरीक़े , काम नहीं करने के सबब , इंसाफ़ की गुहार करते मज़लूम की दिल से इमदाद और कभी ख़ाकी का वो बर्ताव जो आज उसकी शिनाख्त हो गया है ये तमाम चीज़ें लेखक ने बड़े सलीक़े और सच्चाई के साथ अपने किस्सों में चित्रित की हैं।

हरियाणा के एक छोटे से गाँव से तअल्लुक़ रखने वाले अशोक कुमार ने अपनी मेहनत और लगन से हिन्दुस्तान के जाने – माने संस्थान आई.आई.टी ,दिल्ली से बी.टेक और एम्.टेक किया। साल 1989 में इनका चयन भारतीय पुलिस सेवा में हुआ फिलहाल लेखक सीमा सुरक्षा बल ,दिल्ली में महानिरीक्षक के पद पर हैं।

पुलिस सेवा में अपने व्यक्तिगत अनुभवों को अशोक साहब ने पंद्रह –सोलह किस्सों में बांटा है और हर किस्से में उन्होंने अपने महकमें के अच्छे कामों के साथ – साथ बड़ी बेबाकी से उसकी ख़ामियों को भी उजागर किया है।

“लीक से हटकर इंसाफ़ की एक डगर”..इस उन्वान से लिखे शाहजहांपुर के 1997 के एक संस्मरण में वे दबंगों के ज़ुल्मों-सितम से त्रस्त एक महिला और उसके परिवार को इंसाफ़ दिलाने में पुलिस के इंसानियत की सतह पर किये प्रयासों को वर्णित करते है। प्राय देखने में आता है कि पुलिस अपनी ख़ामियों पे लीपा-पोती करती है मगर इस किस्से में अनोखी बात ये नज़र आती है कि लेखक पूर्व में की हुई पुलिस की तमाम ग़लतियों को सरेआम स्वीकार कर पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए एक नई राह अख्तियार करते है।

चक्रव्यूह शीर्षक वाले अपने किस्से में लेखक पाठकों को पुलिस अकादमी हैदराबाद से तरबीयत (ट्रेनिंग ) मुकम्मल करने के बाद अपनी इलाहाबाद की पहली पोस्टिं के संस्मरण से रु-ब-रु करवाते हैं। प्रारम्भ में वे इलाहाबाद के धार्मिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक पृष्ठ भूमि का जिस तरह वर्णन करते हैं तो लगता है कि साहित्य से हुज़ूर का तआर्रुफ़ बहुत पुराना है। छोटे कस्बों के पुलिस थानों में कैसा निज़ाम चलता है इसका चित्रण इस अफ़साने में अशोक साहब बड़ी साफ़गोई से करते हैं। दलालों , दबंगों ,बदमाशों और कुछ पुलिस वालों के जटिल चक्रव्यूह को अगर भेदना है तो पुलिस में इंसानियत का जज़्बा और जनता के साथ बेहतर समन्वय होना बेहद ज़रूरी है। फूलपुर थाने में थानाध्यक्ष की ट्रेनिंग के दौरान अपने अनुभव को इस किस्से में लेखक ने बड़ी ईमानदारी से बयान किया है।

अपनी हरिद्वार पोस्टिंग के दौरान अशोक साहब 1996 में हुए रुड़की के एक बहुचर्चित केस में पीड़िता को इंसाफ़ दिलाने में इसलिए क़ामयाब होते है कि पूरी तफ़्तीश के वक़्त अपनी टीम में वे इंसानियत का जज़्बा कम नहीं होने देते। ”पंच परमेश्वर या “...उन्वान से उनका ये संस्मरण कई जगह रौंगटे खड़े कर देता है। आख़िर में मज़लूम को इंसाफ़ मिलता है , एक औरत पर

ज़ुल्म ढाने वाले समाज के ठेकेदार सलाखों के पीछे भेज दिए जाते हैं। एक इंसान दोस्त रहनुमा की अगुवाई में रुड़की पुलिस के शानदार काम पर ख़ाकी को सलाम करने का दिल करता है।

समाज को पुलिस की क़दम क़दम पर ज़रूरत पड़ती है इसी तरह पुलिस भी बिना समाज की मदद के अपने फ़र्ज़ को अंजाम नहीं दे सकती। इन दिनों ज़मीनों की बढ़ती हुई क़ीमतों की वजह से ज़मीन से संम्बंधित अपराधों की तादाद में इज़ाफा हुआ है। ज़मीन के कब्ज़े से मुतअलिक जब कोई केस पुलिस के पास आता है तो वो या तो कुछ ले दे के उसे रफ़ा-दफ़ा करने की फिराक़ में रहती है या फिर इसे दीवानी का मुआमला बता कर अपना पल्ला झाड़ लेती है। भू-माफ़ियाओं और कुछ पुलिस वालों के इस तंत्र का पूरा लेखा जोखा अपने किस्से “भू-माफ़िया” में अशोक साहब ने बड़ी सच्चाई से लिखा है। केन्द्रीय सुरक्षा बल का एक सेवानिवृत इंस्पेक्टर अपने रिटायर्मेंट के पूरे पैसे से एक प्लाट खरीदता है और वो भू-माफ़ियाओं की जालसाज़ी का शिकार हो जाता है। पीड़ित की गुहार थाने में नहीं सुनी जाती और हताश हो वो आख़िरी उम्मीद के साथ लेखक के पास पहुंचता है। लेखक जानते हैं कि मुआमला उतना आसान नहीं है ,क़ानूनी पेचीदगियां है , भू –माफ़ियाओं के बड़े बड़े रसूक हैं मगर सिर्फ़ फरियादी के दर्द को इंसानियत के नाते अपना दर्द समझ कर अशोक साहब उस पीड़ित इंस्पेक्टर की मदद करते है। किसी काम के पीछे अगर नीयत साफ़ हो तो नतीजा भी अच्छा निकलता है अन्ततोगत्वा पीड़ित को अपने डूबे हुए बारह लाख वापिस मिल जाते है और लोगों की खून पसीने की गाढ़ी कमाई को निगलने वाले सलाख़ों के पीछे भेज दिए जाते हैं।

जब लेखक भारतीय पुलिस सेवा से जुड़े उस वक़्त पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था और उसकी जड़े तत्कालीन यूपी के तराई क्षेत्र तक फ़ैल चुकी थी। जून 93 में अशोक साहब को तराई के रूद्रपुर इलाके में दहशतगर्दी से दो–दो हाथ करने के लिए पदस्थापित किया गया। “तराई में आतंक” वाले अफ़साने में लेखक ने तराई में क्यूँ और कैसे आतंक ने अपनी चादर बिछाई का वर्णन बहुत ख़ूबसूरती से किया है। उस वक़्त के कुख्यात आतंकवादी हीरा सिंह और उसके साथियों का सफाया पुलिस ने किस तरह किया इसे भी लेखक ने शब्दों की माला में उम्दा अंदाज़ से पिरोया है। ये अफ़साना पढने के बाद ये तो कहा जा सकता है कि अशोक कुमार साहब ने तराई में आतंक के खात्मे की पूरी प्रक्रिया और संक्रिया में कई मर्तबा फ़ैसले दिमाग से नहीं दिल से लिए । ख़तरात के उबड़-खाबड़ रास्तों पर पुलिस द्वारा अंजाम दिया गया ये पूरा ऑपरेशन वाकई काबिले तारीफ़ था। पुलिस के इस तरह के कारनामे आवाम तक पहुँचने चाहियें और “ख़ाकी में इंसान “ ने इस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है।

“ख़ाकी में इंसान “ में लेखक ने अपने तजुर्बात की राह में मिले हर तरह के अपराध को अफ़साने की शक्ल देने की कोशिश की है। जेल से अपराधी किस तरह अपनी गतिविधियाँ संचालित करते हैं और जेल से ही भोले –भाले लोगों को डरा धमका उनसे वसूली करते हैं ऐसे अनुभवों से भी लेखक का पाला पड़ा। किसी बुज़ुर्ग की शिकायत पर एक ऐसे ही केस को अशोक साहब सुलझाते हैं। जेल के कुछ कार्मिकों और अपराधियों के बीच पनप चुके गठजोड़ को ध्वस्त करते हैं।

एक दूसरे अफ़साने में लेखक रूड़की के उस किस्से को बयान करते है जिसमे एक कारोबारी को कोई अपराधी फिरौती के लिए धमकी देता है और व्यापारी लेखक के पास फ़रियाद लेकर आता है। अपनी सूझ –बूझ और तमाम तकनिकी दक्षता का इस्तेमाल करते हुए अशोक साहब की टीम अपराधियों को मार गिराती है। ऐसे अपराधियों के खात्मे के बाद लोगों के चेहरों पर जो सुकून दिखाई देता है वो सुकून “ ख़ाकी में इंसान “ के हर सफ़्हे ( पन्ने ) से टपकता है।

“अंधी दौड़ “ उन्वान से गढ़े एक किस्से में लेखक मथुरा के गोवर्धन मेले में पुलिस इन्तेज़ामात का और लोगों की बेतहाशा भीड़ का ज़िक्र करते हैं। अपने दौरे के दौरान उन्हें राजमार्ग पर एक बस पलटी हुई दिखाई देती है और पूरे दर्दनाक मंज़र को जब अशोक साहब लफ़्ज़ों का लिबास पहनाते हैं तो सोई हुई संवेदनाएं जाग जाती हैं। लोग कितने संवेदनहीन हो गएँ है , एक तरफ़ मदद को लोग चिल्ला रहें होते हैं दूसरी तरफ़ लोग ये सब देखकर गुज़र जाते हैं और यहाँ भी लोगों की नज़र में संवेदनहीन पुलिस अपने कर्तव्य के साथ - साथ इंसानियत का धर्म भी निभाती है।

“ख़ाकी में इंसान” में अशोक साहब के अनुभवों की और भी बहुत सी कड़ियाँ है जिन्हें उन्होंने कहानियां बनाकर अपने अफ़साना निगार होने के पुख्ता सुबूत दिए हैं। यू.पी और उतरांचल में मुख्तलिफ़-मुख्तलिफ़ जगहों पर अपनी मुलाज़्मत के दौरान अपने और भी बहुत से तजुर्बात उन्होंने साझे किये हैं।

दहेज़ के लिए किसी अबला को जला देने से लेकर दहेज़ क़ानून के ग़लत इस्तेमाल पर भी उन्होंने रौशनी डाली है। अपहरण , रिश्वतखोरी , बलात्कार , और दूसरे अन्य अपराधों से जुड़े अफ़साने भी “ख़ाकी में इंसान “ में पढ़े जा सकते हैं।

“ख़ाकी में इंसान “ में किस्सों का एक अलग मनोविज्ञान देखने को मिलता है। सामान्यतः कहानियों में किरदारों की गुफ़्तगू और किरदार से जुड़े सिलसिले को अफ़सानागो किसी फिल्म के दृश्य की भाँती पेश करता है मगर अशोक साहब ने

पुलिस महकमे से सम्बंधित पूरे निज़ाम (व्यवस्था) की मंज़रकशी की है जो सताईश (तारीफ़ ) के क़ाबिल है। किसी अपराधिक घटना के घटने से लेकर मुक़द्दमे ,तफ़्तीश , गिरफ़्तारी, और पीड़ित को इंसाफ़ मिलने तक के घटनाक्रम का रोज़मर्रा इस्तेमाल में आने वाले लफ़्ज़ों के सहारे खाका खींचना इस किताब की सबसे बड़ी ख़ूबी है।

जहां – जहां लेखक को लगा कि इस जगह पुलिस सही नहीं है तो उन्होंने उसे बड़ी साफ़गोई से स्वीकार भी किया है। इंसानियत एक ऐसी शय है जिसकी बुनियाद पर हर मज़हब की इमारत खड़ी होती है। “ख़ाकी में इंसान “ पहले सफ़्हे से आख़िरी सफ़्हे तक इंसानियत की महक से लबरेज़ है। किताब पढ़ते वक़्त कई बार लगता है कि क्या पुलिस इस तरीक़े से भी काम करती है ?

लेखक का अदब से गहरा जुड़ाव साफ़ नज़र आता है। अपने ज़ाती अनुभव और सच्ची घटनाओं को किस्सों में तब्दील करते वक़्त अशोक साहब ने बड़े आसान और आम बोल चाल के अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किये है। एक अच्छी तक़रीर वही है जो सीधे – सीधे पढ़ने और सुनने वाले के दिल में उतर जाए।

“ख़ाकी में इंसान “ के हर नए किस्से से पहले अशोक साहब ने अपनी डायरी से ली कुछ पंक्तियाँ लिखीं है या फिर किसी के हवाले से छोटी –छोटी कवितायें जिनका राब्ता उस अफ़साने से है , उनका ये प्रयोग वाकई अनूठा है। लेखक की डायरी से निकली पंक्तियाँ पढ़कर लगता है कि वे पुलिस में आने से पहले भी कुछ ना कुछ लिखते रहे हैं। लेखक ने अपने अफ़सानों में जिन –जिन शहरों का ज़िक्र किया है उन्होंने उस शहर की ऐतिहासिक ,भौगोलिक ,धार्मिक , और सांस्कृतिक पहचान से भी पाठकों को अवगत करवाया है।

इस पूरी किताब को पढने के बाद एक बात तो तय है कि लेखक की धमनियों में रक्त के साथ –साथ संवेदना का संचार भी प्रचुर मात्रा में है। उनके भीतर पसरी हुई ये संवेदना ही है कि वे अपहरण से मुतअलिक अपने एक अफ़साने में लिखते हैं कि “” मैंने महसूस किया है कि एक ह्त्या के पेचीदा केस को सुलझाने में जितनी ख़ुशी होती है उससे कई गुना अधिक ख़ुशी अपहृत को बरामद करने में होती है। “”

“ख़ाकी में इंसान” को पढ़कर आप पुलिस तंत्र की पूरी व्यवस्था से वाकिफ़ हो सकते है। इस किताब में ख़ूबियों की कोई कमी नहीं है मगर इसे पढने के बाद कारी ( पाठक ) के ज़ेहन में ये सवाल ज़रूर आयेंगे कि .. “ क्या पुलिस ऐसे भी काम करती है ? क्या ख़ाकी में भी इंसानियत के रंग हो सकते हैं ? वगैरा .. वगैरा.. इन सवालों के जवाब अशोक साहब ने किताब के ठीक पीछे मोटे-मोटे शब्दों में स्वयं ही सवाल करके दे दिया है , वे लिखते हैं ..” मेरा कहना है ..पुलिस की वर्दी में होते हुए भी इंसान बने रहना ..इतना मुश्किल तो नहीं ?

“ख़ाकी में इंसान” के एक–एक हर्फ़ को तन्मयता से पढने के बाद मेरा ये मानना है कि इस किताब को आम आदमी के साथ –साथ तमाम पुलिस वालों को भी पढ़ना चाहिए। मुल्क के हर थाने में जहां हिंदी पढ़ी समझी जाती हो ये किताब होनी चाहिए। इस किताब का अनुवाद मुल्क की दूसरी भाषाओं में भी होना चाहिए और यदि संभव हो तो पुलिस की बुनियादी तरबीयत ( बेसिक ट्रेनिंग ) में भी इस किताब के किस्से पढ़ाए जाने चाहियें ताकि बुनियाद के वक़्त ही इंसानियत और संवेदना के बीज पुलिस कर्मियों में डाल दिए जाएँ।

मुझे यक़ीन है कि “ख़ाकी में इंसान” को पढने के बाद लोगों की नज़रों में पुलिस की एक बेहतर छवि बनेगी जिसकी दरकार आज पुलिस को बहुत ज़ियादा है और इससे समाज और पुलिस के बीच जो खाई बन गयी है वो भी ख़ुद ब ख़ुद भर जायेगी।

इस ख़ूबसूरत किताब को अपने नायाब छायाचित्रों से जनाबे चंचल ने सजाया है और जनाबे लोकेश ओहरी ने भी इसमें अपना भरपूर सहयोग दिया है ये दोनों फ़नकार भी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं।

आज के परिवेश में इस किताब की उपयोगिता और सार्थकता को देखते हुए गृह मंत्रालय ,भारत सरकार ने “ख़ाकी में इंसान” को गोविन्द वल्लभ पन्त पुरस्कार से नवाज़ा है।

“ख़ाकी में इंसान” जिस मक़सद से लिखी गयी थी उस मक़सद में क़ामयाब हो रही है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज के माहौल में ख़ाकी को देखकर हमारी आँखों का ज़ायका खराब हो जाता है मगर “ख़ाकी में इंसान” को पढने के बाद आँखों का ये बिगड़ा हुआ ज़ायका ठीक किया जा सकता है। परवरदिगार से यही दुआ करता हूँ कि इंसानियत की महक वाला ये गुलदस्ता ज़ियादा से ज़ियादा नज़रों के आगे से गुज़रे और इसे पढने के बाद ख़ाकी में हमे इंसानियत के रंग नज़र आने लगे ...आमीन।

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बदलेगा फिर नज़रिया ,सच जाओगे जान।

एक बार पढ़ लीजिये , ख़ाकी में इंसान।।

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विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

आतंकवादः कड़े कानूनी उपायों की जरुरत

प्रमोद भार्गव

आतंकवादी रंग की दलीलों के बीच एक बार फिर हैदराबाद में आतंकी हमले ने खून से लाल इबारत लिख दी है। 23 निर्दोषों की जानें गईं और 100 जीवन-मृत्‍यु के झमेले से जूझ रहे हैं। हैदराबाद में इसके पहले 25 अगस्‍त 2007 में भी इसी दिलसुखनगर के गोकुल चाट भंडार पर आतंकी हमला हो चुका है। इसमें 42 लोग मारे गए थे। विस्‍फोट के तरीके से यह माना जा रहा है कि यह हरकत आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन की हो सकती है। लेकिन यहां हैरानी इस बात पर है कि इस बम विस्‍फोट की आशंका दो दिन पहले खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों को मिल गई थी। आंध्रप्रदेश समेत देश के सभी राज्‍यों को सतर्कता बरतने की हिदायत दे दी गई थी, बावजूद सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक हो गई ? जाहिर है, हमारी खुफिया एजेंसियों में पर्याप्‍त तालमेल की कमी है। जबकि इसी कमी को दूर करने के नजरिये से राष्‍टीय जांच एजेंसी, मसलन एनआईए वजूद में लाई गई थी। इस हमले के मद्‌देनजर जरुरी हो जाता है कि राजनीतिक दल अपने क्षुद्र स्‍वार्थों से उपर उठकर ‘राष्‍टीय आतंक रोधी केंद्र' यानी एनसीटीसी कानून को इसी बजट सत्र में पारित कराएं, जिससे आतंकी गतिविधियों पर अंजाम तक पहुंचने से पहले ही अंकुश लगाया जा सके।

केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने मंजूर किया है कि उनके पास दो दिन पहले ही यह जानकारी आ चुकी थी कि आतंकवादी गंभीर वारदात कर सकते हैं। बावजूद हरकत को न रोक पाना इस बात की तसदीक है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां और राज्‍य पुलिस जवाबदेही से बेफिक्र हैं। उनमें परस्‍पर विश्‍वास और सामंजस्‍य का भी जबरदस्‍त अभाव है। समान पद, श्रेणी और वेतनमान होने के इनके अहंकार भी परस्‍पर टकराकर सच्‍चाई को टालने का काम करते हैं। यही वजह है कि एनआईए और राज्‍यों के आतंक रोधी दस्‍तों के बीच टकराव के हालात पैदा होते रहते हैं। इसीलिए हमारे यहां घटनाओं पर घटने से पहले काबू नहीं पाया जाता है। इस विसंगति को दूर करने के लिहाज से ही केंद्र सरकार एनसीटीसी कानून अस्‍तित्‍व में लाना चाहती है, कई राज्‍य सरकारों के विरोध करने के कारण यह लंबित विधेयक कानूनी रुप नहीं ले पा रहा है। खासतौर से गैर कांग्रेसी सरकारों को अशंका है कि गुप्‍तचर ब्‍यूरो के मातहत बनने वाली इस संस्‍था का केंद्र सरकार सीबीआई की तरह दुरुपयोग कर सकती है। यह सही है कि यह शंका भी एकदम निराधार नहीं है, बावजूद ऐसी एक संस्‍था को वर्चस्‍व में लाने की जरुरत है, जो राजनीतिक, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक और जातीय संकीर्णताओं से उपर उठकर काम करे।

दरअसल इस कानून का प्रारुप पूर्व गृहमंत्री पी․चिंदबरम्‌ ने अमेरिका के आतंक-रोधी दस्‍ते एनसीटीसी का अध्‍ययन करने के बाद तैयार किया था। गोया, अमेरिका में 9/11 के हमले के पहले वहां की एफबीआई, सीआईए और पेंटागन जैसी तमाम सुरक्षा एजेंसियों के पास आतंकी हमले की जानकारियां थीं, लेकिन इन सूचनाओं को साझा न कर पाने के अभाव में वे हमले को रोकने में नाकाम रहीं। इस हमले की जांच हेतु गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में खुफिया एजेंसियों की कमजोरी का खुलासा करते हुए कहा कि तमाम एजेंसियों में तालमेल न होने के कारण यह घटना घटी। साथ ही आयोग ने एक ऐसी संस्‍था बनाए जाने का सुझाव दिया जो कि सुरक्षा मामलों से जुड़ी विभिन्‍न एजेंसियों के बीच समन्‍वय का काम कर सके। इस सिफारिश को अमेरिकी सरकार ने स्‍वीकार किया और वहां ‘नेशनल काउंटर टेरररिज्‍म एजेंसी ;एनसीटीसीद्ध 2004 में वजूद में लाई गई। इसे वहां की गुप्‍तचर संस्‍था सीआईए से अलग रखा गया। इसका निदेशक पृथक से बनाकर इसे सीधे राष्‍टपति के अधीन रखा गया। बाद में इसे आतंक रोधी कानून के तहत मान्‍यता भी दे दी गई।

चिदंबरम्‌ ने इस अध्‍ययन के बाद इसका अनुकरण भारत में किया। उन्‍होंने एनसीटीसी का गठन किए जाने की दृष्‍टि से, गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत एक कार्यकारी आदेश जारी करके इसका मसौदा भी तैयार किया किया। लेकिन इसे स्‍वतंत्र एजेंसी बनाने की बजाय गुप्‍तचर ब्‍यूरो के अधीन रखने की भूल कर दी। साथ ही इसे पूरे देश में कहीं भी स्‍वतंत्र रुप से तलाशी लेने, संदिग्‍ध व्‍यक्‍ति को हिरासत में लेने और आपत्‍तिजनक सामग्री जब्‍त करने के अधिकार भी दे दिए। इसके बाद जब इस कानून पर सहमति के लिए प्रांतों के मुख्‍यमंत्रियों की बैठक बुलाई गई तो टकराव के हालात बन गए। इसकी दो प्रमुख वजहें रहीं, एक तो आईबी के पास भी उतने अधिकार नहीं हैं, जितने एनसीटीसी को दिए गए, जबकि इसे आईबी के अधीन रखे जाने का प्रावधान है। दूसरे, संविधान में कानून व्‍यवस्‍था राज्‍य का विषय है। इसलिए इस हस्‍तक्षेप को संविधान के साथ खिलवाड़ माना गया। एक तरह से राज्‍य पुलिस का दर्जा भी एनसीटीसी को दे दिया गया। लिहाजा मुख्‍यमंत्रियों में यह आशंका पैदा होना सहज है कि एनसीटीसी को ये अधिकार मिल जाने के बाद राजनीतिक लोगों के आतंकवादियों से संबंध जोड़कर उन्‍हें नाहक परेशान किए जाने का सिलसिला चल निकलेगा। जाहिर है पी․ चिंदबरम्‌ की 2008 में मुबंई में हुए आतंकवादी हमले के परिप्रेक्ष्‍य में आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए राष्‍टीय स्‍तर पर एक साझा कानूनी ढांचा वर्चस्‍व में लाने की परिकल्‍पना जन्‍मी थी, वह विचार शैशवास्‍था में ही धनराशायी हो गया। सुशील कुमार शिंदे इस विचार को आगे बढ़ा पाएंगे, उनसे यह उम्‍मीद कम ही है।

दरअसल इस पूरे मामले में पारदर्शिता की कमी रही। सरकार मुख्‍यमंत्रियों के समक्ष यह साफ नहीं कर पाई कि एनसीटीसी लाकर वह क्‍या अनूठा और कारगर कानूनी उपाय करना चाहती है। सरकार ने इसी दौरान यह भी जताया था कि वह पुलिस बलों की कानूनी संरचना में भी बदलाव चाहती है। इनमें सीमा सुरक्षा बल और आरक्षित पुलिस बल शामिल हैं। इसके पहले केंद्र एनआईए को भी वजूद में ला चुका था। लेकिन एनआईए की आतंकवाद से संघर्ष की अभी तक कोई सार्थक भूमिका सामने नहीं आई। इस वक्‍त नरेन्‍द्र मोदी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि केंद्र राज्‍य के भीतर राज्‍य का गठन करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है। इन बदलावों से यह आशंका पैदा होना लाजिमी है कि कहीं केंद्र यह तो नहीं चाहता कि जिस तरह सीबीआई का इस्‍तेमाल राजनीतिक हथियार के रुप में करता है, उसकी वही मंशा इन बलों और एनसीटीसी को लेकर तो नहीं हैं ? क्‍योंकि देश के पास अर्धसैनिक सशस्‍त्र बल और विशेषाधिकार कानून तथा सेना ही ऐसी इस्‍पाती ताकतें हैं, जो आतंकवाद, माओवाद, नक्‍सलवाद और कश्‍मीर जैसे आतंरिक सुरक्षा से जुड़े मसलों से जूझ रहे हैं। बहरहाल बढ़ते आतंकवाद को काबू में लेने के लिए यदि एनसीटीसी अमेरिका की तर्ज पर भारत में लाया जाता है तो यह उम्‍मीद की जा सकती है कि यह खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों में समन्‍वय भी बना लेगा और आतंकवादियों की नाक में नकेल भी डाल देगा। लेकिन इसे अमल में लाने के लिए केंद्र को साफ दृष्‍टि और पारदर्शिता अपनानी होगी।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492 232007, 232008

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

उपवास की महत्ता

सर्वप्रथम मैं पाठकों को एक सच्ची राय देना चाहूंगा, इस लेख को पढिए, एक बार, दो बार, फिर इसे भूल जाइए। अगर आप इसे कागज़ पर पढ रहे हैं और मन चाहे तो इसकी चिन्दी - चिन्दी करके ज़ोर से फूंकें, और फिर मौज से इसे धरती पर बिखरता हुआ देखिए।

सच पूछें तो उपवास पढ़ने की नहीं वरन् करने की चीज है। लेख, पुस्तकें आदि सिर्फ इसका सामान्य ज्ञान देकर आपको प्रेरित तो कर सकते हैं, लेकिन, अगर उपवास को वास्तव में जानना चाहते हैं तो उपवास कीजिए। यह अनुभव का ज्ञान है।

चलिए, अब हम चर्चा करते हैं कि रोग कैसे होते हैं ? थोड्रा सा घ्यान स्थिर कीजिए, और फिर पढि़ए, प्रत्येक रोग के फलस्वरूप किसी न किसी रीति से शरीर से श्लेष्मा बाहर आता है। खांसी में, जुकाम में, क्षय में, मिरगी में, इत्यादि और भी कई रोग, कान के, आखों के, त्वचा के, पेट के एवं हृदय के, जिनमें श्लेष्मा का का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता है, उनमें भी रोग का कारण श्लेष्मा ही होता है। श्लेष्मा, तब शरीर से बाहर न आने की वजह से रक्त में मिल जाता है, और ठंड की वजह से जहां रक्त नलिकाएं सिकुड़ गई हैं, वहां पहुंचकर दर्द पैदा करता है, और जब रोग बढ़ जाता है तो मवाद (सड़ा हुआ रक्त) उत्पन्न होता है।

यूं तो थोड़़ा श्लेष्मा प्रत्येक स्वस्थ - अस्वस्थ शरीर में होता ही है और यह मल के साथ थोड़ी - थोड़ी मात्रा में निकलता रहता है।

रोग की दशा में रोगी को श्लेष्मा विहीन खाद्य देना चाहिए। जैसे कि कोई फल या सिर्फ नींबू पानी।

चिकनाई, मांस, रोटी, आलू एवं अन्य कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थ जैसे चावल आदि के रूप में श्लेष्मा शरीर में पंहुचना बंद हो जाता है तो शरीर की जीवनी-शक्ति इकट्ठी होकर रक्त में मौजूद श्लेष्मा एवं मवाद को बाहर फैंकने को प्रवृत्त होती है। यह साधारणतः पेशाब के साथ निकलने लगता है। रोग के अनुसार शरीर के अन्य भागों से भी श्लेष्मा उत्सर्जित हो सकता है।

तो फिर भोजन की क्या आवश्यकता हैं ? इसलिए क्योंकि साधारण कार्यों एवं श्रम करने से शरीर की जो छीजन होती है, मस्तिष्क भूख लगने की सूचना भेजता है और खाने के पश्चात, यदि मस्तिष्क को किसी अन्य कार्य में न लगाया जाए तो वह अपनी सारी शक्ति लगाकर किए हुए भोजन को पचाने का कार्य करता है, ताकि शरीर के सेल (कोषों) की मरम्मत हो सके, जीवन-दायिनी शक्ति उत्पन्न हो सके और शरीर गर्म रह सके।

मस्तिष्क को भोजन कहां से मिलता है ? मस्तिष्क अपनी खोई हुई ऊर्जा को आराम और निद्रा से पुनः प्राप्त कर लेता है।

अगर मस्तिष्क कहता है कि रोग में भूख नहीं लगनी चाहिए, तो भूख बन्द हो जाती है, ताकि शरीर की सारी ऊर्जा विजातीय द्रव्यों को शरीर से बाहर निकालने में ही खर्च हो, भोजन को पचाने में नहीं।

हमारे भोजन का जो भाग पचकर शरीर में लग जाता है, वही पुष्टिवर्धक होता है। बाकी या तो उत्सर्जित हो जाता है अथवा शरीर में जमा होता रहता है।

जब शरीर में इकट्ठे मल, विष, विजातीय द्रव्य अपने स्वाभाविक मार्ग से (श्वास, पसीना, मल उत्सर्जन आदि से बाहर नहीं निकल पाते हैं तो अस्वाभाविक तरीकों से शरीर उन्हें उत्सर्जित करने की चेष्टा करता है, सामान्य तौर पर इसे रोग कहा जाता है।

दूसरे तरह के रोग वे होते है, जो विकार की अधिकता से जीवन शक्ति के हृास के कारण अंगों की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलने में बाधक होते है। धीरे-धीरे जीवन शक्ति का हृास इतना अधिक हो सकता है कि इसका पुननिर्माण अत्यन्त ही कठिन हो जाता है। प्रारम्भिक स्थितियों में अनावश्यक द्रव्य का शरीर में भोजन द्वारा जाना बन्द होने पर रोगमुक्त होने की पूर्ण संभावना होती है।

अर्थात् उपवास के द्वारा हम रोगमुक्त हो सकते है। उपवास प्रकृति की स्वास्थ्य संरक्षक विधि है, पूर्ण एवं स्थायी स्वास्थ्य का दाता है।

तो फिर उपवास कैसे किया जाए?

1.            उपवास करने के लिए शरीर में कुछ बल भी होना चाहिए और एक दृढ़ निश्चय भी।

2.            सर्वप्रथम छोटे-छोटे उपवासों का अनुभव होना चाहिए, उपवास का अनुभव न होने पर सदैव किसी अनुभवी के निर्देशन में ही उपवास करे। पहले 2-3 दिन, फिर एक सप्ताह का और फिर और आगे।

3.            उपवास में प्रकृति के निकट शुद्ध वायु में रहें।

4.            कोशिश करें कि अकेले रहें।

5.            आराम अवश्य करें। उपवास के प्रारम्भ में सिरदर्द, कमजोरी, मूर्छा, अनिद्रा, आदि की शिकायत हो सकती है, जीभ गन्दी रह सकती है। धैर्य रखें व चिकित्सक की सलाह लें।

6.            थोड़ी-थोड़ी कसरत रोज करें।

7.            बिना चिकित्सक की सलाह के, उपवास के साथ अन्य चीज़े, जैसे कि वाष्प स्नान आदि न मिलाएं।

8.            उपवास आरंभ करने के एक सप्ताह पूर्व हल्का भोजन करें और इसे निरन्तर कम करते रहें।

9.            उपवास के आरंभिक दिनों को शरीर की सफाई में लगाओ। एनिमा लो, पानी पीओ, गहरी सांसें लो, नींबू पानी पीयो, रगड़-रगड़ कर स्नान करो।

अच्छा है कि एक सप्ताह तक एनिमा लेना चाहिए। सारे बदन को रगड़ कर नहाना चाहिए। रोज टहलना चाहिए। पाव-पाव भर करके दिनभर में 2-2) सेर पानी पीना चाहिए। नींबू मिलाकर पीये तो और भी ठीक है। पर आधा पाव से अधिक नहीं । अंगूर, संतरे का रस भी लिया जा सकता है। अनुभव के आधार पर धूप स्नान भी किया जा सकता है।

10.          उपवास के समय वायु विकार होने पर चोकर या इसबगोल का उपयोग किया जा सकता है साधारण ज्वर, दुर्गंधपूर्ण पसीने एवं बेस्वाद मुँह की चिंता नहीं करनी चाहिए।

11.          मानसिक स्थिति को संतुलित रखें। भय, चिंता को दूर रख कर शांत रहे।

12.          उपवास को अत्यन्त सावधानी से तोड़ना चाहिए। उपवास में पाचन शक्ति मंद हो जाती है एवं आंतें भी आराम की स्थिति में होती है। अतः शुरू में आसानी से पचने वाले खाद्य ही लेने चाहिए और एनीमा का प्रयोग भी करते रहने चाहिए। पहले दो-तीन दिन संतरे या अंगूर के रस पर फिर वो भी थोड़ा-थोड़ा, उसके बाद दूध या भूने आलू, भात, दलिया, पत्तेदार शाक आदि 3-4 दिन तक।

13.          तले हुई, मैदे से बने हुए, चीनी युक्त, शराब या सिरका युक्त, कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य से उपवास के पश्चात कुछ दिन दूर ही रहना चाहिए।

14.          जितना हो उपवास संतरे के रस से तोड़ना चाहिए। बाद में पत्तेदार शाक उत्तम है। उपवास के फलस्वरूप बहुत सा विष रक्त में मिल जाता है, इसे नष्ट करने एवं फिर शरीर से उत्सर्जन के लिए प्राकृतिक लवणों की आवश्यकता होती है। ये लवण शरीर में फल-सब्जियों के द्वारा पहुँचाए जा सकते है। इसके विपरीत पूर्ण भोजन (रोटी आदि) करना खतरे से खाली नहीं हैं। इसे कुछ समय तक स्थगित रखना चाहिए।

15.          उपवास को ठीक ढ़ंग से ना तोड़ा जाए तो, लाभ की बजाय नुकसान देह हो सकता है। प्रथम दिन केवल थोड़ा सा रस, दूसरे दिन पाव भर रस एक बार में, तीसरे दिन खट्टे/खटमीठे फल का गूदा, चौथे दिन फल के साथ थोड़ी सी कच्ची तरकारी। इसी तरह क्रम से उपवास तोड़ना चाहिए।

16.          उपवास कब्ज, रक्तल्पता, जोड़ो का दर्द, उदासी, चिंता, बेहद खुशी, दमा, मधुमेह आदि कईं स्थितियों (अधिकतर रोगों) में अत्यन्त लाभदायक है।

17.          उपवास के समय सदैव प्रसन्न व आशावादी रहें, खुले में सोये, खुली हवा में रहें, त्वचा स्वच्छ रखें, पानी पीएं (सादा या नींबू मिलाकर), एनीमा लें।

18.          कोई भी विकार अत्यधिक बढ़ने पर, कमजोरी बहुत होने पर चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

उपवास में प्रत्येक उपवासी का अनुभव भिन्न हो सकता है, हालांकि आधार सभी का समान है। परन्तु यह सर्वथा सत्य है कि उपवास के द्वारा केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नहीं वरन् नैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी ऊँचाईयों को छुआ जा सकता है।

- चंद्रेश कुमार छतलानी 

(ध्यान दें - उपर्युक्त उपायों को अपनाने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें, अन्यथा लाभ के बजाए हानि हो सकती है. उदाहरण के लिए, मधुमेह के रोगियों को उपवास की सलाह नहीं दी जाती है)

आंखों का जाल

अच्‍छा होना भी कितनी बुरी बात है आज के जमाने में। ज्‍यादातर लोग एक खूबसूरत लड़की को बूरी नजर से ही देखते है। सोचते हुए इंटर स्‍कूल जा रही थी रश्‍मि। परेशानी का सबब रश्‍मि के लिए यह था कि चाहे पैंसठ पार के मिश्राजी हो या पचास पार के सिंहजी या तीस पार के वर्माजी, सभी की नजरें खा जाने वाली ही होती थी।

रश्‍मि को रास्‍ते पर चलते हुए लगता था कि उसके आगे-पीछे, उपर-नीचे, दांयें-बांयें आंखों का जाल सा बिछ गया है, जो बस उसे घूर रहा है। नहीं रश्‍मि का दिमाग खराब नहीं था, उसकी किस्‍मत खराब थी कि वो बला की जहीन थी, छरहरा नाजुक बदन, लंबे चेहरे पर झील सी बड़ी-बड़ी आंखें, स्‍याह पुतलियां, गुलाबी नाजुक होंठ, लंबी नाक, मुस्‍कुराते गालों पर दो गडढ़े, भरा हुआ सीना, कमर तक लहराते गेंसू जिसपर जीन्‍स और कुर्ती पहन कर गजब की खूबसूरत लगती थी वो। पर उसे क्‍या मालूम देखने वाले उसे कपड़े सहित कहां देखते थे। लोग आज गलत दिशा में अपने कल्‍पना चक्षु को खेल रखा है जहां सिर्फ नंगापन है अगर ऐसा नहीं होता तो हर दस मिनट में बलात्‍कार कतई नहीं होता।

खैर जो भी रश्‍मि को देखता देखता ही रह जाता। बूढ़े से लेकर जवान सिर्फ खा जाने वाली नजरों से उसे देखते थे। घूरने वालों की निगाहों ने रश्‍मि को समय से पहले जवान बना दिया था। घर से निकलते ही रश्‍मि खूद को आंखों की जाल में फंसी पाती थी। स्‍वच्‍छंदता के लिए तड़पती रहती थी रश्‍मि, क्‍या वो एक स्‍वतंत्र देश की नागरिक है उसे शक सा होता था।

रश्‍मि अपनी सहेली रागिनी को कहा करती थी कि ‘या तो भगवान मुझे खूबसूरत न बनाया होता या तो फिर पिता सरीखे लोगों को किसी खूबसूरत लड़की को देखने की तहजीब दिया होता।' आज भी रश्‍मि आंखों के जाल में फंसी कथित सभ्‍य समाज में छटपटा रही है।

अकेला

मनमोहन राय का मानना था कि उनकी अच्‍छी नौकरी, अच्‍छा तलब उन्‍हें समाज के अन्‍य लोगों से अलग करता है और उन्‍हें समाज के कमजोर लोगों से कोई लेना-देना नहीं है। समाज के कमजोर तबके के लोग स्‍वार्थी होते है और उनके जैसे अमीरों से समाजिकता के नाम पर सांठ-गांठ कर रूपए-पैसे ऐंठते रहते है। इनलोगों से दूर रहने में ही भलाई है।

घर में पत्‍नी और दो बच्‍चों को उन्‍होंने सभी सूख-सुविधा दे रखा था। रायजी अपने बढ़ते हुए बच्‍चों को घर पर ही मोबाइल फोन, क्‍म्‍प्‍यूटर, आईपैड, टेबलेट वगैरह से खेलते हुए रहने की ताकिद कर रखा था। मैदान में जाकर खेलना, दोस्‍त बनाने से अपने बच्‍चों को मना करते थे। उन्‍हें अपना परिवार के अलावा कुछ दिखता ही नहीं था, वे भूल गए थे कि मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी है। उनके बच्‍चे, पत्‍नी एकांतवास से व्‍यथित रहते थे, इसका एहसास शायद उन्‍हें नहीं था या रायजी एकसास करना नहीं चाहते थे।

राज जी अपना बंग्‍ला शहर से दूर एकांत में ही बनवा रखा था। कार्यालय जाने के लिए राय जी की कार थी तथा बच्‍चे स्‍कूल दूसरे कार से अपनी माँ के साथ जाते थे। राय जी समाज से अपना और अपने परिवार का नाता तोड़ रखा था।

राय जी एक दिन अपने कार्यालय में अखबार देख रहे थे कि उन्‍हें पता चला कि शहर में मलेरिया और डायरिया फैला हुआ है। वे मन ही मन खूश हो रहे थे कि उनका घर शहर से दूर होने के कारण उनके यहां किसी तरह की बीमारी फटक ही नहीं सकती है। अभी वे सोच ही रहे थे कि फोन की घंटी बजी, रायजी ने फोन उठाया तो उनकी पत्‍नी कह रही थी कि स्‍कूल से लौटने के बाद उनका आठ वर्षीय पूत्र को बुखार आ गया है और वो उल्‍टी भी कर रहा है। आंखें लाल हो गयी है बच्‍चे की। राय जी तुंरत घर की ओर रवाना हुए और घर पहुंच कर पुत्र को शहर के अस्‍पताल में भर्ती करवाया। उस रात राय जी और उनकी पत्‍नी को अस्‍पताल में ही रूकना पड़ा तो उनकी छह वर्षीय बेटी अकेली कहां रहती लिहाजा पूरा परिवार उस रात अस्‍पताल में ही रहा।

बंगले में ताला लगाना पड़ क्‍योंकि घर पर काम करने वाली बाई का पति मौके-बेमौके रह जाया करता था परंतु आज वह भी मलेरिया की चपेट में आ चुका था इसलिए राय जी के घर के रखवाली के लिए रात में उनके घर में नहीं रह सका।

दूसरे दिन जब राय जी अस्‍पताल से घर गए तो देखा कि घर का ताला टूटा हुआ है और ऐसा मालूम हो रहा था कि किसी ने ठेले में लदवाकर घर का सारा सामान ढो कर ले गया है। राय जी के आंखों में आंसू छलक आए थे लेकिन उसे पोंछने वाला कोई साथ नहीं था, राय जी ने कभी समाज के किसी भी लोग से कोई सरोकार रख ही नहीं तो ऐसे वक्‍त में कौन आता आंसू पोंछने। राय जी एक-एक सामान चोरी हो जाने के बाद बिरान पड़े बंगले को देख रहे थे और अकेला महसूस कर रहे थे।

सुख

गुहिया अपने चार सुअरों को लेकर रोज जंगल चराने चला जाता। जंगल में सुअरों को चरने छोड़ देता और झूरी-लकड़ी जमा करने लगता, उसकी गठरी बनाता, छोटे-छोटे झाड़ियों से पौधे में फले चिंयाकोर को थैली में तोड़-तोड़ कर जमा करता और शाम होते-होते घर आ जाता। झूंरियां जलावन के काम आती और चियाकोर को गहिया की घरवाली सुगनी दूसरे दिन गांव के हाट में जाकर बेच आती। जिस दिन जंगल में चिंयाकोर नहीं मिलता गुहिया उस दिन सखूआ के पत्‍तों से दोना और पत्‍तल बना लाता और दोपहर को जब सुगनी मडुए की रोटी और प्‍याज और हरी मिर्च लेकर आती तो अपने बनाए पत्‍तल में मडुए की रोटी, प्‍याज और हरी मिर्च को बड़े प्रेम से धीरे-धीरे चबाता हुआ खाता और खाने के बाद एक लोटा पास में बह रहे छोटा झरना जिसे पिछहरिया दह के नाम से जाना जाता था के पानी को पीता और सखूआ पेड़ के छांव में आराम करता था।

गुहिया पढ़ा-लिख नहीं था और इसका उसे मलाल भी नहीं था। सुगनी जब अपने बेटे भीमा को पढ़ाने की बात करती तो गुहिया प्रतिकार तो नहीं करता था पर अपने बेटे को पढ़ाने का प्रयत्‍न भी नहीं करता था। गांव के सरकारी स्‍कूल में जब सुगनी अपने बेटे को भर्ती करवा आयी तो गुहिया अपने बेटे को कहा था कि बेटा पढ़-लिख कर तू भी उन बाबूओं की तरह हो जाएगा जो रिश्‍वत लिए बिना सांस ही नही लेते। भीमा छोटा था पहली कक्षा में उसका नामांकरण हुआ था लेकिन बमुश्‍किल महीने में दो-तीन दिन ही मास्‍टर साहब स्‍कूल आते थे। भीमा स्‍कूल जाता और कुछ देर स्‍कूल में इधर-उधर घूम कर बिताने के बाद सीधा जंगल की ओर अपने पिता गुहिया के पास चला जाता। गुहिया जब पूछता कि स्‍कूल से क्‍यों आ गया तो भीमा बताता कि मास्‍टर साहब स्‍कूल नहीं आए। स्‍कूल में दो मास्‍टर थे लेकिन दोनों ने गांव में दवा की दुकान और क्‍लिनिक खोल रखा था। स्‍कूल दिन भर में कभी चले जाते थे और हजारी बना लिया करते थे। तनख्‍वाह समय पर उठा लेते थे।

भीमा स्‍कूल कम जंगल ज्‍यादा जाने लगा था। जगंल जाने के बाद सुअर के पीठ पर गुहिया उसे बिठा दिया करता था और भीमा मस्‍ती में झूमते हुए कंधे में छोटा सा डंड़ा लेकर सुअर के पीठ में बैठा जंगल की सैर करता था। भीमा को जंगल में खेलने के लिए सुअर के अलावे गिलहरी, खरगोश, कई तरह के पक्षी थे जिसमें कब सुबह से शाम होता था भीमा को पता भी नहीं चलता था। रात को गुहिया महुआ का शराब पीकर जब बांसुरी बजाता था तो लगता था कि चांद-सितारे मस्‍ती में झूम रहे है। भीमा को बचपन से ही बांसुरी के धुन से प्‍यार हो गया था जिस दिन गुहिया ज्‍यादा शराब पीने के कारण बांसुरी नहीं बजाता था उस दिन भीमा बांसुरी को अपने पिता की तरह ही बजाने का अभ्‍यास करता थक जाता और सो जाता था।

गुहिया का पिता अनुपवा गांव के दीवान के यहां काम किया करता था। अनुपवा के मरने के बाद न तो जमींदारी रही और न दीवानी इसलिए गुहिया को अपने पिता की तरह दीवान के यहां काम करने का मौका नहीं मिला। हालांकि दीवान के यहां के लोग गुहिया को अपने साथ शहर ले जाना चाहते थे लेकिन गुहिया परोक्ष रूप से मना तो नहीं कर सकता था लेकिन शहर जाकर दो-एक दिन रहकर फिर गांव वापस आ जाता और जंगल की ओर रूख कर लेता था।

एक बार गुहिया को शहर ले जाने के लिए दीवानघर के एक बड़े ओहदे वाले अफसर गुहिया से मिलने उसके घर गए और शहर से बिना बताए उसके गांव आ जाने के कारण नाराजगी जाहिर करते हुए गुहिया को शहर चलने का आदेश दिए। गुहिया मन ही मन यह फैसला कर चुका था कि इस बार वह शहर नहीं जाएगा। अफसर साहब ने गुहिया को कहा कि तुम बेवकूफ हो हमारे साथ चलोगे तो तुम्‍हारी जिंदगी बन जाएगी। यहां जंगल में सुअर चराकर तुम्‍हें क्‍या मिलेगा, तुम्‍हारा बेटा भी बड़ा होकर सुअर ही न चराएगा। तुम अगर मेरे साथ चले गए तो बाद में तुम्‍हारा बेटा भी शहर आ जाएगा और वो भी आदमी बन जाएगा।

गुहिया बोला देखिए साब जी हम जंगल में सुअर चराकर जितना खुश है उतना शहर जाकर नहीं रह सकते। शहर में हमको सब पराया लगता है और जंगल में एक-एक पेड़, पौधा, झरना, पहाड़ सब हमारा रिश्‍तेदार लगता है। जब हम पेड़ के छांव में बैठ कर बांसुरी बजाते है तो जंगल का गिलहरी, भालू, मोर, कोयल सब सुनता है साब, रोटी-प्‍याज खकर जब झरना से पानी पीने जाते है न साब तो लगता है झरना अपने हाथ से पानी पीला रहा है। इधर हम बांसुरी में एक तान छेड़ते है उधर कोयल उसका जवाब देती है साब और हमारा बेटवा भीमा है न साब उसे भी जंगल के सब पेड़, पौधा, पशु, पक्षी, झरना, पहाड़ पहचानने लगा है साब, आप पूछ लीजिए भीमा से अगर हम झूठ बोलते हों तो साब।

इतना सुनने के बाद अफसर साहब को समझ में आ गया कि गुहिया और उसका बेटा भीमा को जंगल के सान्निध्‍य में जो सूख है वह कंक्र्रीट के जंगल शहर में कभी नहीं मिल सकता। भावना की कद्र करने वाले साहब जी ने गुहिया को कुछ नहीं कहा सिर्फ गुहिया को मिला हुआ नैसर्गिक सुख के बारे में सोचते हुए शहर की ओर चल दिए।

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा, गिरिडीह, झारखंड़ 815301

मो. 9471765417


एक लड़की एक लड़का
                                डॉ. विजय शिंदे
                               
    मनुष्य की पहचान है, मानवीयता। मनुष्य बनता ही है मानवीयता के कारण। जहां मानवीयता का हनन होता है वहां मनुष्य का हनन होकर राक्षस बन सकता है, जो सारी मनुष्यता की सीमाओं को लांघकर अमानवीय एवं राक्षसी व्यवहार करता है। उसकी यह कृति सारी प्रकृति के लिए हानिकारक हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर विषय पर इस बार-बार चर्चा हुई, चिंता प्रकट की गई एवं कार्रवाइयां भी हुई। जैसे-जैसे उसकी तह में जाने की कोशिश होती गई वैसे-वैसे हमारे ‘मनुष्य’ होने के दांवे का खात्मा कर रही थी। ‘स्त्री भ्रूण हत्या’ विषय की गंभीरता की ओर सबका ध्यान केंद्रित करना उद्देश्य है। पुरुष की तुलना में स्त्रियों की घटती संख्या प्राकृतिक नहीं तो मनुष्य द्वारा निर्मित आपत्ति है, जो उसके अमानवीय, राक्षसी प्रवृत्ति का द्योतक है। हम कल्पना भी..... हां कल्पना भी नहीं कर सकते कितनी कन्याओं की हत्या की होगी, सालों साल से। ‘हत्या’ कानूनी अपराध है और वर्तमान भारतीय समाज धड़ल्ले से हत्याएं करते जा रहा है; और आधार विज्ञान, विद्वान, डॉक्टर, घर-परिवार के सदस्य, पुरुष और स्त्री भी, बाप और मां भी सभी उस छोटी बच्ची के दुश्मन बने हैं, ‘हत्यारे‘ बने हैं, और कानून आंखों पर पट्टी बांधे हाथ पर हाथ धरे बैठा है


    कौनसा अपराध है उस बच्ची का? हम जो कल्पना करते हैं उसके उल्टा सत्य होता है। आम तरीके से कहा जाता है ग्रामीण-अनपढ़ इलाकों में कन्या भ्रूण हत्याएं ज्यादा होती है। पर नहीं आंकडे तो यह बता रहे हैं कि पढ़ा-लिखा, बुद्धिमान, शिक्षित शहरी समाज ही कन्या भ्रूण हत्याएं ज्यादा कर रहा है। यहां प्रश्न कौन कम कौन ज्यादा का नहीं। शहरी लोग ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं कर रहे हैं इससे ग्रामीण समाज छूटता नहीं है। दोनों क्षेत्रों का अपराध उतना ही घृणास्पद अमानवीय है। इस सामाजिक घिनौने कृत्य के लिए दोनों भी उतने ही दोषी और सजा के हकदार है।


    यंत्रों और डॉक्टरों के विरोध में व्यापक मुहिम कानूनी तरीके से छिड़ चुकी है। इसका होना अत्यंत आवश्यक है, पर इससे बड़ी पहल मनुष्यों की मानसिकता को बदलने की हो। सामाजिक मानसिकता दोषी है, उसे पकड़कर सजा देना असंभव है, परंतु बदला जरूर जा सकता है। अर्थात् समाज मन में परिवर्तन और दुरुस्ति अत्यंत आवश्यक हो गई है। कानून को अब सख्त होना पड़ेगा। देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए ‘हम दो हमारे दो’ का नारा लगाया और उसे कानूनी स्वरूप भी दिया। बीच में इसका भी प्रचलन आया ‘हम दो हमारा एक’ और वह ‘एक’ लड़का हो ऐसी अपेक्षा से हत्याएं-दर-हत्याएं। लालच, अमानवीयता, राक्षसी कृत्य। अब कानून को  सख्त होकर पुराने नारे को कड़ाई से दुबारा लागू करना होगा- ‘हम दो हमारे दो, एक लड़की एक लड़का।’
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हद हो गई
                                    डॉ. विजय शिंदे

    ‘हद हो गई’ जैसे शब्दों का कोई ऐसे ही इस्तेमाल नहीं करता। सारी मर्यादाएं एवं सीमाएं लांघने के बाद ही इसको मुंह से निकाला जाता है। प्राकृतिक तौर पर जब इंसान असल में इंसान था, अपनी प्राचीन-आदिम अवस्था में। प्रकृति के साथ जुड़कर जैसे प्राकृतिक ताकतों ने भेजा था, रखा था वैसे रह रहा था। आज वह बिल्कुल वैसे नहीं हैं, उसने विकास की सीमाओं को लांघा है। शेष प्राणीजगत् एवं प्राकृतिक जीवजंतुओं में इंसान की प्रगति को देखे तो ‘हद हो गई’ कहा जाएगा। परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या मनुष्य ने सच्चे मायने में सही विकास किया है? वह अपनी सभ्यता और संस्कृति को भी विकसित कर पाया? इन प्रश्नों का उत्तर देते नहीं बन पाता। मैं क्यों आप भी और अन्य सभी उत्तर स्वरूप चुप ही रहेंगे। अगर कोई ‘हां’ या ‘ना’ में उत्तर देने की कोशिश करेगा तो ‘ना’ ही कहेगा। इंसान ने भौतिक सुख-सुविधाओं के दृष्टि से अचंभित करनेवाली प्रगति को छुआ है। उसके लिए वह अभिनंदन का  पात्र है। उसके प्रगति की हद हो गई। पर सभ्यता एवं सांस्कृतिक दृष्टि से वह पतित और पतित होते जा रहा है, अर्थात् कहा जाएगा कि हद हो गई उसके पतन की। व्यक्ति वेशभूषा परिवर्तन से, भाषा शुद्घ बोलने से एवं हेअर स्टाईल बदलने से सभ्य नहीं होता, उसका आंतरिक हृदय, विचार एवं कृति सभ्य होनी चाहिए, जो आज नहीं के बराबर है।


    यह विचार आपको निराश कर सकते हैं। या आप कह सकते हो कि निराशावादी लेखन है। पर करें क्या? निराशा, दुःख, पीडा, आतंक ही पैदा होता है आस-पास के माहौल को देखकर, देश-दुनिया की स्थितियों को देखकर। मेरा संकेत ‘दिल्ली की दरंदगी’ से है। क्या इससे पहले किसी महिला, लड़की, बच्ची के साथ बलात्कार नहीं हुआ? हां हुआ है। सालों-साल से हो रहा है। युगों से हो रहा है। दिल्ली के सामूहिक रेप कांड के पश्चात् पूरे देश भर में कोहराम मचा। देश भर की मीड़िया में खबरें छपी और चर्चाएं होती रही। एक के पश्चात् एक रेप की घटनाओं की खबरें छापी जा रही हैं। दो-चार-पांच साल की बच्ची से लेकर साठ साल की औरत पर अत्याचार  की खबरें। यह खबरें आज आ रही हैं, इसका अर्थ ‘रेप’ इन दिनों हो रहे हैं ऐसा नहीं युगों से हो रहे हैं। जब से मनुष्य ने अपनी सभ्यता और संस्कृति को छोड़कर भौतिकवाद के पीछे दौड़ना शुरू किया और अपनी हवस के लिए हदों को पार किया। आप, हम, देश और दुनिया स्त्रियों की घटती आबादी पर चिंता कर रहे हैं, विचार-मंथन शुरू है, संगोष्ठियां ले रहे हैं पर सामाजिक बदलाव नहीं हो रहा है, जो होना चाहिए। स्त्रियों का सम्मान होना चाहिए वह नहीं हो रहा है।


    जिस समाज में लड़की के जन्म को नकारा जाता है उसके पीछे एक नहीं हजारों कारण होते हैं। जहां लड़कियों पर बलात्कार हो, दहेज के लिए जलाया जाए, वस्त्रहरण हो, मार-पिट हो, विधवा जीवन की त्रासदी हो, हजारों सामाजिक पाबंदियां हो, अग्निपरीक्षाएं हो, जीवन पत्थर बनाया जाए, गुलामी हो, परिवार वालों से यौनत्याचार हो.... वहां स्त्री जीवन का स्वागत न स्त्री कर सकती है न पुरुष। अपने घर में केवल पुरुष नहीं तो स्त्री भी जन्म ले रही लड़की को नकारती है उसका कारण है समाज में घटित हजारों दुर्घटनाएं, जिसमें उसके जीवन को ध्वस्त किया जाता है। इस पर स्त्री ने और पुरुष ने भी उपाय ढूंढ़ निकाला, अपने घर मे लड़की के प्रवेश को निषिद्घ करो। शुरू हो गई स्त्री भ्रूण हत्याएं । अब चारों ओर ढोल नगाड़े बजाए जा रहे हैं स्त्री जन्म का स्वागत करें। परंतु किसके घरों में हमारे, अपने नहीं तो दूसरों के घरों में। वाह रे! दोगली सामाजिक मानसिकता। कितनी बड़ी विड़ंबन है! अपने घरों में क्यों नहीं?


    खैर ऐसी सामाजिक मानसिकता क्यों है सोचना पड़ेगा। उत्तर एक ही भूतकाल और वर्तमान में स्त्री जीवन का सम्मान नहीं हुआ। थोड़ा हुआ, हो रहा है ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते। बिल्कुल साफ और स्पष्ट कहा जाएगा कि स्त्रियों का सम्मान नहीं हुआ और नहीं हो रहा है। अतः न केवल पुरुष बल्कि नारियां भी लड़की को नकारती है। यहां तक मां.... मां भी अपनी बच्ची को नकारती है। उसका कारण समय-दर-समय हो रही छेड़खानियां, बलात्कार, अपमान, शोषण, सीता जैसी अग्निपरीक्षाएं, द्रौपदी जैसा वस्त्रहरण, अहिल्या जैसा पत्थर बनाए जाना है....। चारों ओर लड़कियों एवं महिलाओं को डंसने के लिए सांपों के झुंड़ फुत्कार रहे हैं, अपनी सभ्यता और संस्कृति की हदों को लांघ कर। अज्ञेय ने सच ही लिखा है-
                   सांप!
                    तुम सभ्य तो हुए नहीं
                    नगर में बसना
                    भी तुम्हें नहीं आया।
                    एक बात पूछूं - (उत्तर दोगे?)
                    विष कहां पाया?

निष्कर्षतः  कह सकते हैं कि पुरुषों के पाशविक कृत्यों की ‘हद हो गई’ है। अब अपने आत्मसम्मान के लिए नारियों को खुद उठना है। सम्मान पुरुषों से, समाज से एवं इंसानों से मिलने से तो रहा। जहां स्त्रियों-लड़कियों पर कोई गंदी टिप्पणी एवं गंदी नजर उठती है वहां वे चप्पल उठाए, लाठी उठाए, जीभ उठाए और सांपों के फनों को कुचल दें। नारी जब तक कुचलना नहीं सिखेगी तब तक शारीरिक, मानसिक एवं बौद्घिक रेप कांड रूकेंगे नहीं। उठो रण-रागिनी बनो। आपके प्रंचड़, रागिनी, चंड़ी रूप को देखकर खुशी होगी और अनायास ही मुंह से शब्द फूट पडेंगे-‘हद हो गई’।

                                डॉ. विजय शिंदे
                                देवगिरी महाविद्यालय,औरंगाबाद.
                                फोन  :- ०९४२३२२२८०८
                                ई.मेल :-
drvtshinde@gmail.com

व्यंग्य

छींक रे छींक

डॉ. रामवृक्ष सिंह

छींक शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह तो हमें ज्ञात नहीं। किन्तु छींकने की स्वाभाविक प्रक्रिया में यदि कोई व्यवधान न डाला जाए और मुख-विवर के आगे कोई परदा न किया जाए तो थूक, बलगम, वायु और ध्वनि का जो अद्भुत स्फोट होता है और कुछ मिश्रित द्रव-पदार्थों का जैसा अपूर्व छिड़काव होता है, उसमें कहीं न कहीं इस शब्द का निहितार्थ अवश्य छिपा हुआ है। जब तक हम गाँव में थे, छींकना हमारे लिए बड़ी स्वाभाविक क्रिया प्रतीत होती थी। जो लोग भारत की ग्राम्य संस्कृति से जुड़े हैं, वे तसदीक करेंगे कि मनुष्य शरीर के सभी नैसर्गिक क्रिया-कलाप गाँव में खुले आम होते हैं। उनका विस्तार से जिक्र करने की जरूरत नहीं, क्योंकि समझदार को इशारा ही काफी है। लिहाजा जब बाकी सारे क्रिया-कलाप खुले आम होते हैं तो छींकना क्यों न हो!

सच्चाई तो यह है कि जब तक हम गाँव में रहे, छींकना हमारे लिए बड़े ही सुख और आनन्द का विषय था। हमारे परिवार के कुछ सदस्यों के लिए एक प्रकार से यह प्रभु स्मरण का अवसर भी होता था। कारण? जब भी हमें छींक आती, दादी, नानी या माँ पीछे-पीछे बोलतीं- ठाकुर जी। इधर हम छींके नहीं उधर उनके मुँह से उच्चार हुआ नहीं- ठाकुर जी। यह परंपरा पूर्वांचल के उस इलाके में आज भी कायम है, जहाँ से हमारा नैसर्गिक संबंध रहा है। शहर में आकर पता चला कि छींकना हमारे लिए चाहे सुखकर हो, किन्तु अपने आस-पास के लोगों के लिए तो बड़ा दुखदायी होता है। गाँव की महिलाएं तो दुख झेलने के लिए जन्म-जन्मान्तर से शापित हैं। किन्तु बच्चों या किसी के भी के छींकने पर उन्हें जरा भी कष्ट होता हो, ऐसा हमें कभी नहीं लगा।

इस लिहाज से छींकना हमें हमेशा से ही बड़ा स्पृहणीय काम लगता रहा है। इस बात से तो शहराती भी सहमत होंगे कि छींक का आ जाना कितना सुखद होता है। छींक आने के कई शारीरिक-जैविक कारण हो सकते हैं। उसकी तफसील में हम नहीं जाते। किन्तु छींक की प्रक्रिया जब पूरी होती है तो लगता है हम आनन्द के चरम बिन्दु पर हैं। छींकने से मिलने वाले आनन्द की तुलना यदि हो सकती है तो केवल ब्रह्मानन्द से। केवल भुक्तभोगी ही इसका अनुमान लगा सकते हैं। इसीलिए जब छींक आते-आते चली जाती है तो बड़ी कोफ्त होती है। हम बड़ी उत्कंठा से मुँह खोले, नाक सिकोड़ते-फैलाते हुए छींक का इंतजार करते हैं कि अब आए-अब आए। कभी-कभी आ भी जाती है, लेकिन जब नहीं आती तो बड़ी मायूसी होती है। अपना आजमाया हुआ नुस्खा है कि जब कभी ऐसा हो आप सूरज की ओर नाक कर लें। सूरज की कुनकुनी छूप के नासिका-विवर के भीतर प्रवेश करते ही छींक का जीवाणु बिलबिलाता हुआ नाक से बाहर निकल आता है और उसके बाद आनन्द का जो फव्वारा निकलता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

तो शहर आने से पहले हमारा छींक के बारे में कुल मिलाकर यही अनुभव और मंतव्य रहा करता था। लेकिन शहर आते ही हमारे लिए छींक के निहितार्थ बदल गए। कभी कोई किसी काम से बाहर जा रहा हो और आपने छींक मार दी तो समझिए उसका बनता हुआ काम निश्चय ही बिगड़ जाएगा और उसकी सारी जिम्मेदारी बस आपकी होगी। यदि ऐसा हो गया तो स्वयं ब्रह्मा भी कोई ऐसा सुधारात्मक उपाय नहीं कर सकते कि छींक आ जाने मात्र से बिगड़ा हुआ काम वापस बन जाए। इसका बस एक ही उपाय है- एक और छींक। इसी को कहते हैं विषस्य विषमौषधम। छींक का इलाज छींक है। एक छींक आए तो रुक जाइए और दूसरी के आने का इन्तजार कीजिए। अच्छी बात यह है कि अमूमन ऐसा होता भी है कि एक छींक के बाद दूसरी जरूर आती है- एक से साथ एक फ्री।

वैसे तो छींक एक नैसर्गिक और अनैच्छिक क्रिया है। उसे जब आनी होता है आती ही है। उस पर किसी का जोर-जबर नहीं चलता। कुछ लोग कहते हैं कि छींक एक प्रकार की प्रत्यूर्जता यानी एलर्जी का लक्षण है। वातावरण में विभिन्न प्रकार के प्रत्यूर्जताकारी तत्व तैरते रहते हैं। धूल के कण, फूलों के पराग कण, तरह तरह की खुशबुएँ आदि इसी प्रकार के तत्व हैं। कभी अंधेरे से उजाले में जाने, गरम वातावरण से ठंडे वातावरण में जाने पर भी छींकें आने लगती हैं। ऐसी स्वाभाविक और नैसर्गिक क्रिया भी शहरातियों के लिए गोपन लगती है, यह देखकर हमें बड़ा आश्चर्य होता था। जब तक गाँव में रहे, जिधर मन हुआ मुँह उठाकर आ..छी.. कर देते थे। शहर आए तो पता चला कि यह तो अच्छी बात नहीं है। इस बात का पहले-पहल अहसास हमें मिसेज आधार ने कराया जो आठवीं कक्षा तक हमारी सिविक्स की टीचर थीं। ठीक भी है, सिविक सेन्स तो सिविक्स की टीचर ही सबसे अच्छा सिखा सकती हैं।

तो मिसेज आधार के सामने जब पहली बार अपनी छींक का विस्फोट हुआ और खूब ढेर सारी फुहार हवा में बिखर गई तो उन्होंने हमें लगभग दुत्कारते हुए कहा- ‘ओए, खोत्ते दे पुत्तर! रुमाल नहीं रख सकता मुँह पे? रुमाल ना हो तो ना सही... कम से कम हाथ ही लगा ले।’ बस तभी से हमने ये सीख गाँठ बाँध ली कि छींकते समय मुँह को जैसे भी हो ढको, रुमाल से, हाथ से या आस्तीन से। कुछ न मिले तो सीधे डस्टबिन में घुस जाओ, लेकिन छींक का सार्वजनिक फुहारा मारना असभ्यता की निशानी है। ऐसी ही एक असभ्यता की निशानी और छुड़वाई मिसेज आधार ने। एक बार हम उनकी क्लास में जम्हाई पर जम्हाई लिए जा रहे थे। मिसेज आधार का लेक्चर बोरियत भरा होता था। हमारी जम्हाई का कारण यह बोरियत ही थी, लेकिन उन्होंने समझा कि हम सीधे बिस्तर से उठकर उनकी क्लास में चले आए हैं। उन्होंने अपने उसी चिर-परिचित अंदाज में कहा- ‘ओ...ए। खोत्तेआँ..। नहा के नहीं आया क्या आज? ... चल नहीं आया ते ना सही.. पर ऐसे मुँह ते ना फाड़..। हाथ रख लिया कर मुँह पे।’ इस प्रकार मिसेज आधार ने हमारे साथ-साथ ग्राम्य पृष्ठभूमि से जुड़े बहुत-से छात्रों के जीवन में शहराती सभ्यता की आधार-शिला रखी।

आधार-शिला तो रख दी गई, लेकिन उसपर सभ्यता के कंगूरे बाद में बने, तब जब हम पढ़-लिखकर, नौकरी पाकर साहब लोगों की जमात में शामिल हुए। यहाँ खुलकर बोलना, हँसना, खुलकर अपनी बात कहना सब कुछ वर्जित था। जो कहना है धीरे से कहो। न कहो तो और भी अच्छा। बस सुनो। सबकी सुनते रहो। बॉस की सुनो, नीचे वाले की सुनो। अल्लम-गल्लम जो भी कहा जाए, बस चुपचाप सुनते रहो। बोलना मना है। बोलना शुरू किया कि गए काम से। बोलने पर तो हमने कंट्रोल करना सीख लिया, लेकिन इस छींक का क्या करें? यह तो बिना बुलाए चली आती है। मौके-बेमौके, कब आ धमके और हमें रुमाल निकालने का भी अवसर न दे, कुछ ठिकाना है क्या इसका! साहब लोगों की जमात में भरती होने पर पता चला कि यदि गलती से, खुदा न खास्ता ऐसा हो जाए तो पट से कहो- एक्स्क्यूज मी। बाद में हमें पता चला कि यह जुमला तो बड़े काम की चीज है। छींक निकल गई तो कहो एक्स्क्यूज मी। हिचकी निकल गई तो कहो एक्स्क्यूज मी। दो लोग गलियारे में खड़े घंटों से गप मार रहे हों और उनके बीच से होकर गुजरना पड़े तो कहो एक्स्क्यूज मी। मीटिंग में बैठे हों और अचानक बीवी का फोन आ जाए तो उठकर बाहर भागने से पहले कहो एक्स्क्यूज मी। और तो और भाषण-वाषण देते समय आपको पानी का एक घूँट पीने की जरूरत महसूस हुई तो भी कहो एक्स्क्यूज मी। एक लिहाज से यह एक्स्क्यूज मी का जुमला हर मर्ज की रामबाण औषधि है। एक्स्क्यूज मी का हिन्दी अनुवाद होता है-मुझे माफ करें। गोया सामने वाले को आप मौका दे रहे हैं कि भइए, ये सारी प्राकृतिक क्रियाएं जो केवल इसलिए हो रही हैं कि मैं भी अंततः कपड़े पहनने और दाढ़ी बनानेवाला एक पशु ही हूँ, उसके लिए भी मुझे माफ करो। कि इन क्रियाओं पर मेरा कोई वश नहीं। चुनांचे अब अपने नैसर्गिक रूप में रहना शर्मिंदगी और माफी माँगने का सबब बन गया है। पता नहीं किस झक में विलियम वर्ड्सवर्थ नाम के अंग्रेज महाशय ने बैक टू नेचर यानी प्रकृति की ओर वापस लौटने का नारा दिया था। हमें तो लगता है कि आज के जमाने प्रकृतिस्थ होना सबसे बड़ी असभ्यता है। अपने असली चेहरे को मेकअप से ढके रहिए, सभ्यता का मुखौटा ओढ़े रहे, अपने चरित्र के भेड़िए को मेमने की खाल से छिपाए रहिए। यही आज का सर्व-स्वीकार्य युग-सत्य है।

अब हमें लगता है कि अंग्रेजों के पास ऐसी बहुत-सी कारगर दवाइयाँ और नुस्खे थे, जो गँवार से सुसभ्य बनाने के काम आते हैं और जिनको वे विलायत लौटने से पहले हम गँवार हिन्दुस्तानियों के लिए छोड़ गए। जब तक गाँव में रहे, अंग्रेजों की छोड़ी हुई इन नेमतों की भनक भी हमें नहीं लगी। लेकिन गाँव से शहर आए और पढ़ लिख गए, साहब लोगों के तबेले में भरती हो गए, तब पता चला कि ओहो..हम तो बड़े पिछड़े हुए थे। अब गाँव जाते हैं और छींकने पर माँ, बड़ी माँ, दादी या नानी ठाकुर जी बोलती हैं तो बड़ा अजीब लगता है। उनकी जहालत पर हमें तरस आता है। उनके अनसिविलाइज्ड होने पर कोफ्त होती है। छींकने के काम में ठाकुरजी कहाँ से बीच में आ गए? आना तो चाहिए था एक्स्क्यूज मी को। इसलिए अब इन बूढ़ी महिलाओं की मौजूदगी में कभी ऐसा होता है तो हम चट रुमाल निकालते हैं और उसी में सब कुछ लपेटकर जेब में रख लेते हैं। गाँव के लोगों को यह बड़ा अजीब लगता है। जिस चीज को आसानी से जमीन पर फेंका जा सकता था, उसे रुमाल में सहेजकर जेब में रखने की क्या जरूरत है। यह उन्हें कैसे समझाएँ?

क्या अच्छा है और क्या बुरा, यह फैसला करने की अपनी औकात नहीं। बस हम तो इतना जानते हैं कि एसी में रात-दिन रहनेवाले हम शहराती इंडियन लोगों ने अंग्रेजों की विरासत को अच्छे से सहेज लिया है। दूसरी ओर अपने अधिसंख्य भारत-वासी हैं जिनके तईं छींक का ठीक से आ जाना अब भी सुख और संतोष का विषय है, माफी माँगने का सबब नहीं।

मेरे मूर्तिकार-02
डा0 रमा शंकर शुक्ल
बीए का आखिरी साल था। ठण्ड चरम पर थी। हमारी कक्षाएं सुबह 6.30 से शुरू होती थीं। हम आठ भाई-बहन थे, जिनका खर्चा सामान्य किसान पिताजी को निकाल पाना आसान न था। उस पर भी पिताजी के स्वाभिमान का कड़ा अनुशासन। सो हम किसी से कुछ स्वीकार भी नहीं करते थे।


उन दिनों केबी कालेज के प्राचार्य हुआ करते थे डा0 सुधाकर उपाध्याय। बड़े दबंग और कानूनी आदमी। कालेज में किसी की हिम्मत न होती कि उनके सामने खड़ा भी हो जाए। वे कुछ शिक्षकों के साथ बैडमिन्टन खेल रहे थे। घंटी खाली थी, सो हम लोग वही खड़े होकर  उनका खेल देखने लगे। मेरे शारीर पर महज हाफ शर्ट, पैंट के अलावा चप्पल थी। कान भी ढंका न था।


डा0 उपाध्याय ने अचानक खेल बंद करने को कह दिया। वहाँ से सीधे मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैं अचकचा गया। कुछ न सूझा तो झुक कर पाँव छू लिया। उनकी एक ख़ास आदत थी, किसी के प्रणाम का उत्तर न देते थे। मैं डर गया की क्लास न लेने पर दण्डित करेंगे। लेकिन यह क्या उन्होंने कुछ पूछने की बजाय कंधे पर हाथ रख दिया और बड़े प्रेम से बोले, "का हो तोहके जाड़ ना लागत हौ?"


मैं संकोच में सिमट गया, नहीं सर, ठण्ड नहीं लग रही थी। सो ऐसे ही चला आया।
अगला सवाल, पिताजी क्या करते हैं?
जी किसान हैं। खेती-बारी करते हैं।
घर कहाँ है, कितने भाई बहन हो? जैसे कुछ सवाल पूछ डाले। फिर बोले, मेरा घर देखे हो?


जी।
तो बेटा शाम को पांच बजे आ जाना। कुछ काम है तुमसे।
पूरा दिन चिंता, आशंका और उद्विग्नता में बीत गए। शाम को डर और संशय के साथ उनके घर पहुंचा। वे कुछ लोगों से बात कर रहे थे। देखते ही वही रुकने का इशारा किये और घर में जाकर एक पोलिथिन ले कर आ गए। उसमे से स्वेटर निकालते हुए बोले, ल एके पहिन ला। हम जानीला की तू स्वाभिमानी हउव। पर हमका आपन बड़ भाई मानि लेब त तोहै दुःख ना होई।


हमें काटो तो खून नहीं। न ना कह सकता था और न हाँ।
डा0 उपाध्याय शायद हमारे असमंजस को समझ रहे थे। बोले, अरे भाई हमारी जिंदगी तो तुलसीदास की तरह गुजरी है। पता नहीं कितने लोगों ने मिलकर मेरा निर्माण किया है। मैं भी आपका गुरु हूँ। यह स्वाभिमान का मामला नहीं है। गुरु और पिता में कोई फर्क नहीं होता।


वह स्वेटर लेकर मैं कमरे पर लौट तो आया, पर ह्रदय में एक हुक सी उठ गयी। भीतर से कोई पुकारता था, जिस गुरु ने तुम पर इतनी करुणा बरसाई है, उसके प्रेम और विश्वास का ख्याल रखना। बस उसी दिन से जीवन साधक हो गया। आज मैं जो कुछ हूँ, डा0 उपाध्याय का उसमे बहुत बड़ा योगदान है।

नानी
ननिहाल में नानी न हो तो फिर उसकी गरमाहट ही क्या। माँ से भी ज्यादा नानी के प्यार की तासीर यूं ही नहीं महसूस होती।


मेरे जीवन से नानी को निकाल देने का मतलब बचपन को खारिज कर देना। साठ  साल की नानी की देह पर झुर्रियों ने अभी हमला करना शुरू किया था, पर रौनक कम न हुई थी। फूल सी पीली देह में आप ही नेह का विश्वास उग आता। माँ से प्यार कम न था, पर नानी तो नानी ही थी


उसने कभी साबुन न लगायी। कहती, इसमें चर्बी होती है।
नानी कड़क मिजाज। पूरे मोहल्ले के लोग उसके सामने सकते में रहते। पर मेरे लिए उसके भीतर छुपा हुआ प्यार का सोता बहता रहता। रात की नीद नानी के पास होने में ही आती। सुबह का जागना भी उसी जुबान से। नहला-धुला चुटिया गूंथ स्कूल के लिए तैयार कर देती। पर मजाल है जो सीसा देख कंघी कर लूं। या फिर माथे पर बाल लटकते दिख जाएँ। खुद से कभी न तो तैयार हुई न तैयार होने की इजाजत। क्या पता लड़की की सूरत से छिछोरापन झलक जाए।


घर में मेहमान आये यो इकलौती संतान होने के बावजूद बराबर चौकी पर नहीं जमीन पर ही बैठने की इजाजत।


होली के पहले एक रात गुझिया बनाने के लिए माँ ने पड़ोस से गोठ्नी लाने भेजा। लौटी तो सीढ़ी के सुराग से बगल वाले के घर में गिर गया। माँ ने दो थप्पड़ रसीद कर दिए। नानी का गुस्सा सातवे आसमान। पास में पड़ी पह्सुल चला दी। माँ उछल न गयी होती तो अस्पताल ही ले जाना पड़ता। फिर भी गुस्सा कम न हुआ। दौड़कर घर में गयी और सारा गुझिया का मशाला और लोई एक में गूंथ डाला। बोली, ले अनजानी गलती पर मारा तो अब गुझिया भी खा ले। नानी उस दिन कुछ न खायी। बस मेरा हाथ पकड़ सोने चली गयी।

न्दू वैसे तो स्कूल गया तो था पर दूसरी जमात पास नहीं कर पाया था। उसके गांव के जमींदारों के खेतों में पसीना बहाया पर कभी पेट भर खाने का मजा नहीं ले पाया। अच्छे कपड़े-लत्ते तो सपने की बाप थे। एक बार उनसे दूर के सर्वसम्पन्न रिश्तेदार देवसिंगार से मुलाकात हो गयी देवसिंगार आये वे अपनी आप बीती बताये। देवसिंगार की आप बीती से नन्दू के बाप खिरजू बहुत प्रभावित हुए और उनकी राह पर चलने की कसम खा लिये। एक दिन रात में वे चुपचाप बम्बई के लिये निकल पड़े। नसीब ने साथ दिया वे बम्बई की किसी कपड़ा मिल में बतौर मजदूर काम करने लगे थे। दो महीने बाद मनीआर्डर के साथ नन्दू के बाप का पत्र उसकी मां सुरजीदेवी को मिला था। बम्बई के चले जाने के बाद जिस जमींदार भैरव भाल की हलवाही खिरजू कर रहे थे उसका आतंक बढ़ गया था। दुर्भाग्यबस खिरजू ज्यादा दिन नौकरी नहीं कर पाये उपर वाले को प्यारे हो गये। जमींदार भैरवभाल की आंख में नन्दू का गठीला बदन खटकने लगा था। बदनसीबी ने नन्दू को जमींदार भैरवभाल का बधुवा मजूदर बनने पर मजबूर कर दिया था,जमींदार ने चक्रव्यूह जो ऐसा रचा भी तो था।

नन्दू अपने घर से सुबह निकलता और देर रात तक वापस लौटता,उसके छोटे भाई बहन सो चुके होते थे तब वह घर पहुंचता था वे सोये ही रहते थे तब भैरवभाल की हवेली को निकल चुका होता था इतनी व्यस्तता के बाद भी नन्दू को बिरहा गाने की शौक था उसने एक ख्यातिनाम स्वाजाति बिरहा गायक को अपना गुरू बना लिया था एकलव्य की तरह। खैर नन्दू भी निम्नवर्णिक था और उसके गुरू भी इस दृष्टि से बिरहा गायक को नन्दू को शिष्य बनाने में कोई आपत्ति तो नहीं रही होगी पर बंधुवा मजदूर ऐसा शौक कैसे पाल सकता है,यही दैत्याकार प्रश्न उसके सामने था। सप्ताह में एक दिन तो वह बस्ती के बच्चों और कुछ बिरहा में रूचि लेने वालो को इक्टठा कर नन्दू मण्डली सजा ही लेता था। सुबह हवेली पहुंचते ही जमींदार साहब भैरवभाल की फटकार भी सुननी पड़ती थी। नन्दू जमींदार साहब से कहता क्या करूं बाबू यही तो एक शौक है बाकी सब कुछ तो हवेली की चौखट पर कैद है।

जमींदार साहब डांटते हुए बोलते नन्दुवा तेरी जबान रोज-रोज बढ़ती जा रही है।

वह कहता बाबूजी को मेरी गायकी पसन्द आयी।

जमींदार बोलते अरे चूहा कभी शेर बना है क्या.......? कौआ कभी कोयल बन सकता है क्या.....? जा दूसरे जमींदारों के मजदूर घण्टा भर पहले से हल जोत रहे है,तू जबान लड़ा रहा है।

नन्दू सिर लटकाये हल बैल लिये खेत जोतने को निकल पड़ता या दूसरे काम में लग जाता। उसके घर से खाना पानी आता वही वह अपने पेट में उतारता। हवेली से उसे पीने तक को पानी नहीं मिलता था। कभी -कभी कुम्हारिन काकी होती तो वे उपर से पानी गिराती वह अंजुलि से पानी पी लेता। जमींदार काम तो पशुओं जैसे लेते पर पानी तक पीने को नहीं देते। सुबह लोटा भर रस और चबैना तो मिलता पर उसके घर से कोई आता तो उसके बर्तन में जमींदार के घर का कोई सदस्य ऐसे डाल देते थे जैसे कुत्ते को दूर से रोटी फेंक कर दी जाती है। लोटा भर रस,चबैना हवेली से खेत तक जाना भी इतना आसान नहीं होता था। रस चबैना देने से पहले घण्टों की बेगारी भी करवाई जाती थी। खेत तक पहुंचते-पहुंचते सूरज लटकने को हो जाता था। यदि उसके घर से कोई नहीं आ पाता था तो वह भी नसीब नहीं होता था फिर रात में घर वापसी पर ही रोटी नसीब हो पाती थी। एक दिन उसकी मां की तबियत खराब हो गयी नन्दू की घरवाली अपने बाप के मृत्यु शैया पर पड़े रहने की खबर सुनकर नैहर चली गयी थी ।मां बेचारी हवेली से रस चबैना लेकर जमींदार के खेत में हल जोत रहे नन्दू को नहीं पहुंचा पायी। भूखे प्यासे बेचारा हल जोतता रहा। मई का महीना लू ऐसी चल रही थी जैसे आग की लपटे हो।

आखिरकार वह दिन लटकते-लटकते नन्दू हल बैल लेकर आया ।उस इतनी भयंकर प्यास लग हुई थी उसकी गल बिल्कुल सूख चुका था वह खुद लू से तन्दूरी चिकन ।हवेली के सामने एकदम सन्नाटा  था इस सन्नाटे को लू तोड़ रही थी वह कुएं की जगत पर पशुओं की हौंद में पानी  डालने वाली बाल्टी भरी हुई देखा और तुरन्त कंध पर से हल नीचे रखकर कुएं की तरफ दौड़ा पर बाल्टी से पानी कैसे पीता उसे कुछ दूर पर लोटा दिखाई पड़ा जिसे कुत्ते चाट रहे थे । हांफते हुए कुत्तों से लोटा छीना और दौड़कर  बाल्टी से लोटा भर कर पानी पीया,पानी पीने के बाद उसे जीवनदान मिल गया हो। पानी पीकर बैलों को हौद पर लगाया,हल जुआठ रखा। इसके बाद फिर एक लोटा भर पानी पीकर लोटा मांजने लगा। इसी बीच रतीन्द्र जो जमींदार भैरवभाल के कुल का छंटा हुआ बदमाश लड़का था ।

रतीन्द्र भाल बोला क्यों बे लोटे में पानी पीया है क्या इसमें तो बड़े मालिक चाय पीते है।

 

नन्दू कोई गुनाह हो गया क्या कुत्तों से छीनकर लाया हूं।

रतीन्द्र-तू कुत्ते से अपनी तुलना क्यों कर रहा है ? कुत्ते अछूत तो होते नहीं ।

नन्दू-छोटे जमींदार कस्बे के बड़े कालेज में पढ़ते है,इंसान और जानवर में अन्तर करना ता आता होगा।

रतीन्द्र-जरूर पर तुम्हारी बिरादरी को सदियों से इंसान कहां माना गया ? तुम और तुम्हारे लोगों को बस उच्च लोगों की सेवा बिना किसी ना-नुकुर किये करना है। देश को आजादी क्या मिल गयी कि कीड़े-मकोड़ों को भी पंख निकल गये कहते हुए लोटा उसी बाल्टी से भरकर नन्दू के सिर पर दे मारा। नन्दू गिर पड़ा। कुछ देर बाद संभलते हुए उठा और रतीन्द्र का गर्दन पकड़कर उपर उठाया और धड़ाम से जमीन पर पटक दिया। रतीन्द्र चिल्ला-चिल्लाकर नन्दू को जातिसूचक गालियां देने लगा। रतीन्द्र के चिल्लाने की  आवाज सुनकर बड़ी मालकिन बोली अरे बहू देखो तो रतीन्द्र किसको गाली दे रहा है।

जमींदारन-किवाड़ का पल्ला खोलते हुए वे बोली किसी मजदूर पर रौब छांट रहे होगे। इनकी वजह से एक -एक कर सारे मजदूर भाग जावेंगे। मां साहब रतीन्द्रबाबू को समझाओं। वे मुंह पर हाथ रखते हुए बोली अरे बाप रे ...............?

बड़ी मालकिन- क्या हुआ बहू.....?

जमींदारन-नन्दू के सिर से खून बह रहा है। इतनी तेज लू चल रही है सुबह से मजदूर भूखा प्यासा है,शाम होने को आ गयी है,मजदूर के हवेली आते उसे रतीन्द्रबाबू ने मार दिया लगता है।

इतना सुनते ही बड़ी मालकिन,छोटी मालकिन,और हवेली से औरतें और बच्चे दालान में आ गये,भैरवभाल जमींदार कचहरी गये थे,बूढ़े जमींदार सुबह लोटा भर चाय पीकर देवदर्शन को चले गये थे,जिनके सप्ताह भर लौटने की उम्मीद थी। हवेली के बाकी लोग लू के आतंक से तंग आकर  शहर के महल में रहने चले गये थे।

नन्दू आव ना देखा ना ताव रतीन्द्र के मुंह पर थूक दिया और हवेली की लक्ष्मण रेखा पर कर गया।नन्दू घर पहुंचा बीमार मां नन्दू के सिर से बह रहे खून को देखकर रोने लगी। वह मां को चुप करवाते हुए बोला मां तू फिक्र ना कर अब मां जमींदारों की हैवानियत को नजदीक से जान गया हूं। मैंने एक फैसला कर लिया है।

बूढ़ी मां-क्या......?

नन्दू-मां चिन्ता ना कर मां खून का बदला खून से नहीं ले सकूंगा जानता हूं पर अपने मृतक बाप की राह पर तो चल सकता हूं।

बूढ़ी मां बेटे के सिर को नीम की पत्ती उबाल कर साफ की इसके बाद घाव को फिटकरी से भरकर पुराने कपड़े से पट्टी बांध कर उसे खटिया पर लेटा। बेचारी कांपते हाथों से दो रोटी बनायी और प्याज पर नमक छिड़ककर देते हुए बोली बेटा तुमको भूख लगी है,रोटी प्याज खाकर आराम कर लो,कल मैं जमींदार से गुहार लगाउंगी।

नन्दू-मां गुहार लगाने का कोई फायदा नहीं है,ये जमींदार लोग हम गरीबों का खून पीते आये है,पीते रहेंगे। इनसे निजात पाने के लिये दादा की राह पर चलना होगा।

बूढी मां-क्या परदेस जायेगा। बेटा तू परदेस चला गया तो हम लोगों का क्या होगा। जमींदार तो हम सबको जीते जी मौत के मुंह में ढ़केल देंगे।

नन्दू-ऐसा हो गया तो हवेली को मशान बन जावेगी।

बूढ़ी मां-उसके सिर पर हाथ सहलाते हुए बोली बेटा सब्र कर।

नन्दू-सब्र का ही तो नतीजा है हमारी गरीबी और आदमी होकर आदमी होने के सुख से वंचित रहना।

बूढ़ी मां-बेटा तेरी बात मेरे पल्ले नहीं पड़ रही है। तू सो जा।

नन्दू को रतीन्द्र छोटे जमींदार ने मारा है कि खबर पूरी मजदूर बस्ती में फैल गयी। उसकी हालचाल जानने के लिये बस्ती के लोग आते रहे। देर रात तक यह सिलसिला चलता रहा। बूढ़ी मां बोलती बेटा सो जा। बह बोलता मां सो रहा हूं तुम तो सोओ।

नन्दू को लिखना पढ़ना तो अधिक नहीं आता था पर टूटी-फूटी में लिख पढ़ लेता । बेचारे को पढ़ने लिखने का मौका ही कहां मिला बेचारा दूसरी जमात पास भी तो नहीं कर पाया था तभी से जमींदार का कैदी बन गया गया था। मां तम्बाकू हुक्की पर गुड़ाती रहती थी । सफेद कागज के टुकड़े में तम्बाकू की पुड़िया देखकर वह उठा उसी कागज पर उसने सुई अंगली में घुसाकर स्वयूं के खून से बड़ी मुश्किल से लिखा परदेस जा रहा हूं लिखकर सिर के नीचे रख लिया। रात भर करवटें बदलता रहा नींद तो उससे कोसों दूर थी। बूढ़ी मां की आंख लग गयी और वह घर से भाग चला। शायद नन्दू भागता नहीं तो उसकी लाश किसी नदी या कुयें में मिलती काफी सोच विचार कर उसने बूढ़ी मां धर्मपत्नी और छः महीने के बेटे का मुंह देखे बिना रात के अंधेरे में घर से निकल पड़ा।

बचते-बचाते उसका उद्यम साध्य हुआ। नन्दू मुसीबतों के समन्दर को पार करता हुआ दिल्ली शहर पहुंच गया। वह था तो मजदूर का बेटा उसे काम करने में शरम कैसा ? वह दिल्ली पहुंचते ही रेलवे स्टेशन के पास ढाबे के मालिक से अपनी व्यथा कथा एक सांस में कह सुनाया। ढ़ाबे के मालिक दिलेर को उस पर तरस आ गया बोले बेटा मेरे पास

 

तो तेरे लायक कोई काम नहीं है बर्तन धोने का और नल से पानी भरकर लाने का काम कर सकता है तो कर ले। समझ ले बर्तन धोना कोई खराब काम नहीं है। बेटा कोई काम खराब नहीं होता आदमी की नियति खराब होती है। कर्म तो भगवान की पूजा है,तुम्हारी पूजा भगवान को भा गयी तो वारे-न्यारे।

दिलेर की बात नन्दू की समझ में आ गयी। पहली बार शहर आया था दूर-दूर तक कोई जान-पहचान नहीं थी। तनख्वाह के साथ खाना-रहना मुफ्त था। भगवान का नाम लेकर वह काम पर  लग गया । नन्दू बड़ी ईमानदारी से काम करने गला ,ढाबे के मालिक को उसका काम खूब पसन्द आने लगा। सप्ताह भर के बाद नन्दू एडवांस रकम की मांग दिलेर के सामने रख दिया।

दिलेर बोले तुम लोगों का यही रोना है सप्ताह भर काम नहीं किये तगादा शुरू कर देते हो चल बता कितना एडवांस लेगा।

नन्दू-दो सौ.........।

दिलेर-पूरे महीने की तनख्वाह एडवांस,अभी तुम्हें काम करते-करते जुमे-जुमे आठ दिन भी नहीं हुए। चल तू भी क्या याद रखेगा कि किसी घुटने में अक्ल रखने वाले के ढाबे में काम करता है एक सौ रूपया और मनीआर्डर का खर्चा कुल मिलाकर एक सौ एक रूपया दिया। नन्दू ढाबे मालिक से रूपया लेकर मां के नाम मनीआर्डर किया। बेटा की खबर और मनीआर्डर पाकर उसके घर जैसी दीवाली छा गयी।

नन्दू ईमानदारी से काम कर ही रहा था,दो महीने में वह वेटर का काम भी सीख गया था । एक दिन दिलेर के एक मित्र आये नन्दू को अपने कारखाने में काम करने का न्यौता दे दिये।

नन्दू यह प्रस्ताव दिलेर को बताया।

दिलेर ने स्वीकृति दे दी।

नन्दू हंसी खुशी प्लास्टिक की मोल्डिंग के काम में लग गया । छः महीना काम करने के बाद उसको मन में विचार उपजा की वह क्यों ने एक मोल्डिंग मशीन लगा ले। यह बात उसने कम्पनी के मालिक दूसरे घुटने में अक्ल रखने वाले मरजीत से कह सुनाया।

मरजीत ने भी उसको बढ़ावा दिया। नन्दू एक मोल्डिंग मशीन लगाकर खुद मरजीत के आर्डर के अनुसार उत्पादन करने लगा। कहते है न मन सच्चे मन से किये काम का प्रतिफल सुखकारी और लाभकारी भी होता है। नन्दू के परिश्रम से बोया बीज खूब फलने फूलने लगा। उसका धंधा चल पड़ा अब वह नन्दराज सेठ के नाम से जाना जाने लगा। एक बेटा और दो बेटी का वह बाप भी बन चुका था। बच्चे शहर के स्कूल-कालेज में पढ रहे ।शहर से गांव उसका सब आबाद हो रहा था। उधर भैरवभाल की हवेली में रतीन्द्र कंस साबित हो चुका था। हवेली में कलह के नित नया विस्फोट हो रहा था। धीरे धीरे-पूरी हवेली वीरान हो गयी। जमींदार के खेत धड़ल्ले से बिक रहे थे। हवेली के हिस्सेदार शहर में जा बसे। भैरवभाल जमींदार की हवेली जहां उंचे-ओहदेदार,नेता लोगों का आना जाना लगा रहता था,वही हवेली अंवारा कुत्तों की ऐशगाह बन गयी थी। गांव के सबसे बड़े जमींदार हवेली भुतही हवेली के नाम से पहचानी जानी लगी थी। नन्दू की झोपड़ी की जगह पक्की कोठी तन गयी थी,वह जब शहर से आता तो मजदूर बस्ती ही नहीं जमींदार लोग भी अब नन्दराज सेठ से मिलने आते थे।नन्दू कहता वाह रे लोटा भर पानी की मार मुझे नन्दराज सेठ बना दिया।

उम्र की बीमारी नन्दराज सेठ को भी जकडने लगी थी। बाप तो पहले स्वर्गवासी हो चुके थे मां ने भी साथ छोड़ दिया वे भी बैकुण्ठवासी हो चुकी थी। नन्दराज सेठ का बेटा चमनराज एम.बी.ए.की पढ़ाई पूरी कर चुका था। दोनों बेटियां भी शहर में पढ़ाई कर रही थी। नन्दराज सेठ एम.बी.ए.बेटे चमनराज को कारोबार सौंप कर गांव में रहकर गरीब मजदूरों की सेवा में लगने के इच्छुक थे। बेटा चमनराज बाप को अपनी आंखों से दूर नहीं होने देना चाहता था। बाप की जिद पूरा करने के लिये चमनराज गांव में गरीब मजदूरों के बच्चों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के ध्येय से स्कूल खोलने का विचार बना लिया। दो साल में स्कूल तन गया। कुछ ही सालों में प्रसिद्ध हो गया। स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में नन्दराज सेठ सपरिवार उपस्थिति रहते। मेधावी बच्चों को पुरस्कार देते और गरीब बच्चों की आगे की पढ़ाई का जिम्मा भी। इसी सिलसिले में नन्दराज सेठ सपरिवार गांव आये थे। पहले की तरह इस बार भी आसपास के जरूरतमंद और मानिन्द लोग मिलने आये पर इस बार एक नया चेहरा जिसे देखकर कुत्तों भौंकने लगे थे। बस्ती के बच्चे पगला कहकर ढेला मार रहे थे। शोरगुल सुनकर नन्दराज सेठ खिड़की से बाहर देखने लगे। वे देखते पहचान गये इतने में वह फटेहाल आदमी कोठी के दरवाजे पर आ धमका। वहां उपस्थित लोग भौंचके रह गये। नन्दराज बोले घबराने की कोई बात नहीं है। सबको बैठने का अनुरोध करते हुए बोले अछूत के दरवाजे पर कैसे आना हुआ ?

कुछ बाहर के लोग पहली बार आये थे जो नहीं पहचान रहे थे बोले सेठजी पागल का इतना सत्कार?

नन्दराज सेठ-कोई मामूली आदमी नहीं हैं ये जनाब ?

कौन है..............?

 

नन्दराज-गांव के बड़ी हवेली के वारिस जमींदार रतीन्द्र भाल।

कैसी जमींदार बचा क्या है? भूतही हवेली गरीबी की आह ले डूबती है।

रतीन्द्र-मैं भी डूब चुका हूं बस एक आस बची है।

कामनाथ बोले-हवेली बेचना है। अरे भुतही हवेली किसी मजदूर के खरीदने की बस की बात तो नहीं। दो चार बीसा बचा हो तो अधिया टिकुरी पर कोई जोत बो सकता है।

रतीन्द्र-हवेली के हिस्सेदार है,अकेले बेंच नहीं सकता। जमींदारी पहले बिक चुकी है।

कामनाथ-फिर कैसी उम्मीद और किससे ?

रतीन्द्रभाल-नन्दराज सेठ से।

नन्दराजसेठ-बाबूजी पानी दाना कुछ तो अछूत के घर को लेंगे नहीं।

जमींदार रतीन्द्रभाल-अछूत तो मैं। तुमसे भीख मांगने आया हूं कहते हुए हाथ जोड़ लिये।

नन्दराज सेठ-बाबूजी मैं अछूत किस काम आ सकता हूं,बेहिचक बोलो।

रतीन्द्रभाल-एक और ख्वाहिश पूरी कर देते तो हमारी पीढ़ियां तुम्हारी कर्जदार रहती।

वैसे भी कर्जदार है जो कभी हवेली में मजदूर थे कामनाथ जो अब नन्दराज सेठ का विश्वासपात्र था  बड़े आत्मविश्वास के साथ बोला।

नन्दराजसेठ- क्या।

रतीन्द्रभाल-बेटवा को नौकरी ताकि चैन से मर सकूं और मरने के बाद एक गज कफन तो मिल जाये। अपने किये पर शर्मिन्दा हूं नन्दराजसेठ कहते हुए रोने लगे। रतीन्द्रजीमंदार की आंसुओं की बाढ़ को देखकर कामनाथ बोला क्यों लोटा भर आंसू गार रहे हो।

रतीन्द्रभाल-आंसू नहीं प्रायश्चित कर रहा हूं कामनाथ।

कामनाथ-पानी पीओगे।

क्यों नहीं बहुत जोर की प्यास लगी है।

कामनाथ-अछूत के घर का पानी पीकर नरक चले गये तो।

रतीन्द्रभाल-आत्मग्लानि से छुटकारा और स्वर्ग का सुख मिलेगा ।

अपने हाथ से पानी लेकर आउं कामनाथ बोला।

जरूर-जमींदारी के अभिमान से दरिद्र बन चुके रतीन्द्र बोले।

कामनाथ उसी लोटा में पानी लाया जिसे लोटा में पानी भरकर जमीदार रतीन्द भाल ने नन्दू के माथे पर मारा था साथ में चांदी का गिलास भी जो नन्दू सेठ ने अपने परिश्रम से बनवाया था।

कामनाथ के हाथ से लोटा लेकर,लोटा भर पानी पेट में उतारते पूर्व जमींदार अब कंगाल और प्रतिष्ठा खो चुके रतीन्द्रभाल बोले नन्दराज सेठ ने आंखे खोल दी है। मेरा प्रायश्चित तभी पूरा होगा जब नन्दराज सेठ के प्याउं पर लोटा भर-भर पानी पीलाते तो जीवन गुजार दूं। जाति से नहीं आदमी कर्म से महान बनता है समझ में अब आ गया है।

कामनाथ-काश समझने में लोग देर ना किये होते तो देश आदमी बहुखण्डित और देश खण्डित ना हुआ होता।  .नन्दलाल भारती 06.02.2013

समाप्त

दूरभाष-0731-4057553

 

डाँ.नन्दलाल भारती

एम.ए. ।समाजशास्त्र। एल.एल.बी. । आनर्स ।

पी.जी.डिप्लोमा-एच.आर.डी.

। लोटा भर पानी। कहानी

 

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जनप्रवाह।साप्ताहिक।ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

उपन्यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त
       नेचुरल लंग्वेज रिसर्च सेन्टर,आई.आई.आई.टी.हैदराबाद द्वारा भाषा एवं शिक्षा हेतु रचनाओं पर शोध कार्य ।  

मैं शाला न आ पाऊंगी

                    मां की तबियत बहुत खराब।
                     बापू को हो रहे जुलाब।
                     इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                     मैं शाला न आ पाऊंगी।

                    मुझे पड़ेगा आज बनाना।
                    अम्मा बापू,सबका खाना।
                    सुबह सुबह ही चाय बनाई।
                    घर के लोगों को पिलवाई।        
                    जरा देर में वैद्यराज के,
                    घर बापू को ले जाऊंगी।
                    इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                    मैं शाला न आ पाऊंगी।
                   
                   दादा की सुध लेना होगी।
                   उन्हें दवाई देना होगी।
                   दादीजी भी हैं लाचार।       
                   उन्हें बहुत करती मैं प्यार।
                   अभी नहानी में ले जाकर,
                   उन्हें ठीक से नहलाऊंगी
                   इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                   मैं शाला न आ पाऊंगी।

                   छोटा भाई बड़ा शैतान।
                   दिन भर करता खींचातान।
                  कापी फेंक किताबें फाड़।
                  रोज बनाता तिल का ताड़।
                  बड़े प्रेम से धीरे धीरे,
                  आज उसे मैं समझाऊंगी।
                  इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                  मैं शाला न आ पाऊंगी।

                  मुझे आज की छुट्टी देना।
                  शिक्षकजी गुस्सा मत होना।
                 गृह का कार्य शीघ्र कर लूंगी।
                 पाठ आज का कल पढ़ लूंगी।
                 काम पड़ा है कितना सारा,
                  आज नहीं पढ़ लिख पाऊंगी।
                  इसीलिये तो हे शिक्षकजी,
                 मैं शाला न आ पाऊंगी।

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