रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

March 2013
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

image

1. एक बूंद

एक बूंद में सागर के तूफान छिपे हैं ,

एक बीज में धारा के असंख्य उद्यान छिपे हैं ।

एक कण में अथाह शक्ति  है व्याप्त ,

एक स्वर में गुथे अनंत गाँ छुपे हैं ।

एक चिंगारी आग लगा सके चहूँ दिशा  ,

पाठ दीप जलाने को उसमे अरमान छुपे हैं  ।

युगों से बंद पड़े अँधेरों के ताले  ,

उन्हें खोलने एक किरण में प्रावधान छुपे हैं  ।

एक पत्ते की हथेली भाग्य रेखा में  ,

समस्त हरियाली के विधान छिपे हैं  ।

बिजलियों ने शरण ली घटा में ,

कण कण में उनके निशान छिपे हैं ।

अनंत राह की धूल में कालचक्र ,

अपनी मंजिल के लिए गतिमान छिपे हैं  ।

एक कली से सुगंध धार बह रही निरंतर ,

कितने निर्झर जिसमे प्रवाहमान छिपे हैं ।

एक कलम के ह्रदय झांक कर देखो,

मूक जीवहा पर जिसके मधुर गाँ छिपे हैं ।

एक हाथ , जहां नहीं चमकता कंगन कोई ,

उन उँगलियों में कितने नवनिर्माण छिपे हैं ।

एक धागे पिरोये अनगिनत सुंदर पुष्प,

पंखुड़ियों में अभिलाषा के सामान छिपे है ।

जिस एक को पाकर सब एक हो जाएँ ,

उस एक की दया में अनंत कल्याण छिपे हैं

 

2. मानव हो तो

मानव हो तो मन से मनन कीजिये,

चित्त की चिंता को छोड़ें , चिंतन कीजिए।

श्वासों में  खूशबू गुलाब खिल जाएगी ,

जीवन  की डगर पर सत्कर्म कीजिए।

       सम्मान से  पलक उठें , नयन कीजिए ,

       सफलता की मंज़िलें मिलें , प्रयत्न कीजिए ।

       रूप संवारना है तो दर्पण लीजिये,

       आत्मा को निखारना है , समर्पण कीजिए।

विश्व को पहचानना है , विचरण कीजिए,

ईश्वर को पाना है तो स्मरण कीजिए।

तप साधना से नव सृजन कीजिए,

यज्ञ वेदी पर बैठकर कर हवन कीजिए ।

 

3. जग आग का दरिया

जग आग का दरिया है कागज की तेरी कश्ती,

इंसान जरा पहचान, यहाँ क्या है तेरी हस्ती।

लपटें लहरों की तरह किस तरह उछलती हैं ,

हाथों से रह रह कर पतवार फिसलती है ।

इस पार से उस पार का लंबा सफर है ,

आसमान में रह रह बिजली चमकती है ।

धुआँ इतराता हुआ , किस ठौर से उठ रहा ,

धुएँ की तरह यहाँ ठहरती कैसी मस्ती है ।

दिशाएँ गुम हो गईं गुमराही के अंधेरे में ,

आखेँ  हैं भरी जो मंजिल को ताकती हैं ।

मोम को चट्टान बना दे जो इरादे ,

ध्रुव से सिखनी हमें एसी भक्ति है ।

प्रहलाद ने सहारा लिया जिस विश्वास का ,

उससे जीवन नैया भाव पार उतरती है ।

 

4. प्रेम की गंगा

आओ इस धरा पर, प्रेम की गंगा बहाएँ ,

कर्म के उपवन में, धर्म के फूल खिलाएँ ।

आँधियाँ उड़ रही , घृणा द्वेष, स्वार्थ की ,

अंधकार में लौ जले, कैसे परमार्थ की।

चहूँ दिशा घिर रही, जहां काली घटाएँ ,

आओ इस धरा पर, प्रेम की गंगा बहाएँ ।

ज्योति पुंज प्रवाह देखो अवरूद्ध कहाँ है,

सौम्य पूनम मुखमंडल , गौतम बुद्ध कहाँ है ?

महावीर के प्रेम संदेश, मन से मैल  हटाएँ ,

आओ इस धरा पर, प्रेम की गंगा बहाएँ ।

फहराई धर्म पताका वो , शंकराचार्य कहाँ हैं ?

नानक,कबीर,गोरखनाथ से आचार्य कहाँ हैं ?

मीरा फरीद के गीत पल पल अमृत बरसाएँ ,

आओ इस धरा पर, प्रेम की गंगा बहाएँ ।

मानवता आज पुकारे रामकृष्ण विवेकानन्द को,

दया का अमृत बरसाने वाले ऋषि दयानन्द को ।

मानव सेवा में रमण, ईश के दर्शन पाएँ,

आओ इस धरा पर, प्रेम की गंगा बहाएँ ।

सत्ता के गलियारों में, हथियार उड़ाए आँधी,

प्रेम अहिंसा की लौ बुझे नहीं जिसे जलाए गांधी।

मानव पाठ से शूल हटाएँ अधर्म की धूल हटाएँ,

आओ इस धरा पर, प्रेम की गंगा बहाएँ ।

 

5. राहों में दीप आशा का जगा दो

राह में घनघोर अंधेरा ,

दीप आशा का जगा दो ।

किस ओर मंजिल है हमारी,

कोई उसकी दिशा बता दो ।

निर्जन पथ काँटों  से पूर्ण हैं,

इक सुगंध भरा फूल खिला दो ।

मिट जाए युग का अँधियारा,

कोई ऐसा दीप जला दो ।

अचेत हैं आशाएँ सभी ,

और खुशियाँ घायल हैं।

अपनी राह जो बढ़ सकें,

इतनी उनमें शक्ति जगा दो ।

बादल के सीने में बिजली,

कोई उसकी तड़प मिटा दो।

अभिलाषा का पंछी पिंजरे में,

उसको मुक्त करा दो।

 

6. एक परीक्षण

एक परीक्षण पहले कर ले, उस बीज पर,

बोना चाहता है, तू जिसे क्षितिज पर ।

फल हल की तेज कर ले सोचकर,

तय करना है तुझे, किस चीज पर ।

बांध ले घोड़े वक्त के जो थकते नहीं,

हिनहिनाएं वो तेरी दहलीज पर ।

खोदनी है नहर तुझको ऊंचे गगन में,

टूट न जाएं किनारे तेरी खीज पर ।

फसलें आके काटें, भावी पीढियाँ ,

हीरे लुटाएगा गगन, तब रीझ कर ।

एक परीक्षण पहले कर ले, उस बीज पर,

बोना चाहता है , तू जिसे क्षितिज पर ।

 

7. कुल्हाड़ी और वृक्ष

बड़े नाज बड़ी शान से,

कुल्हाड़ी पेड़ से बोली, बड़े गुमान से,

“ छोटी हूँ पर तुझे काट सकती हूँ,

छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट सकती हूँ । “

विषाद की रेखाएँ घिरी वृक्ष के मुख पे,

कसमसा कर कहा, उसने बड़े दुख से ।

वृक्ष बोला, “ आज तेरी शक्ति में जो तेरे संग है

वो मेरा ही तो काटा हुआ अंग है ।“

किसको सुनाएँ इस मन दुखड़ा,

तुम्हारी ताकत बन गया हमारा टुकड़ा,

अपना ही जब कोई गैरों से जुड़ता है ,

सच मानिए मुसीबत का पहाड़ टूटता है ।

 

8. फूल और धूल

फूल धूल में मिले, शाख से टूटकर ,

रिश्ते सभी मुरझा गए , अपनों से रूठकर ।

सियासत के कारोबार चमके केवल झूठ पर ,

सत्य बार बार रोया , हाय फूट फूट कर ।

तूफान कहाँ धनवान हुए , चमन लूटकर,

अंधियों की कहाँ प्यास बुझी एक घूंट पर ।

चन्दन में सुगंध भरी , देखो कूट कूट कर ,

परम शांति प्राप्त  होती है स्वार्थ से छूटकर ।

हवाएँ नहीं बंधा करतीं डोर से छूटकर,

व्यक्तित्व गगन छू सके श्रद्धा से झुककर ।

 

9. दीपक

जब भी घना अंधेरा या रात होती है ,

घर में दीपक जलाना अच्छी बात होती है ।

जब पड़ोसी के घर डूबे हों अंधकार में ,

महापुरूष दीपक जलाते हैं उनके द्वार में ।

जब युग भटक रहा हो , यहाँ अज्ञान अंधकार में ,

युग पुरूष स्वयं दीपक बन जलते हैं तूफान में ।

महापुरुष अपने बलिदानों में महान काम करते हैं ,

उनकी स्मृतियों को सब श्रद्धा से प्रणाम करते हैं ।

 

10. शिक्षा का भगवाकरण

ज्ञान और त्याग का ,

निस्वार्थ कर्म वैराग्य का,

सत्कर्म धर्मानुराग का,

प्रचंड यज्ञ की आग का

       प्रतीक है भगवा ।

प्रात:के शृंगार का ,

सांध्य से साक्षात्कार का,

शौर्य के आधार का ,

शांति के विस्तार का

       प्रतीक है भगवा ।

कर्म संग सौभाग्य का ,

गीत संग वाद्य का ,

सात्विकता संग खाद्य का ,

अनादि संग आद्य का

प्रतीक है भगवा ।

मानवता के उत्थान का ,

विश्व के कल्याण का ,

विध्वंस में निर्माण का ,

संस्कृतियों  के मान का ,

प्रतीक है भगवा ।

विद्या और वेद का ,

भेद में अभेद का ,

विज्ञान में विच्छेद का ,

द्वैत में अद्वैत का

प्रतीक है भगवा ।

प्रेम में संबंध का ,

कलियों में सुगंध का ,

फूलों में मकरंद का ,

सद्ज्ञान में  आनंद का ,

प्रतीक है भगवा ।

भगवा भाव रंग समर्पण कीजिए ,

भगवा से भगवान मिले स्मरण कीजिए ,

वसुधैव कुटुंबकम् सब एक हो जाएँ,

ऐसी शिक्षा का भगवाकरण कीजिए ।  

 

  लेखक-

विजय गुप्त 

कवि,नाटककार,चित्रकार,शिक्षाविद्

एफ-1/135, मदनगीर अंबेडकर नगर –iv

नई दिल्ली-62

9313161393

व्‍यंग्‍य

मुझसे भला न कोय

पूरन सरमा

हो सकता है दुनिया में और भी भले लोग हों, लेकिन मैंने इसे खोजने की आवश्‍यकता नहीं समझी। मुझे प्रारम्‍भ से ही लगता रहा कि तमाम ब्रह्माण्‍ड में मुझसे भला और कोई नहीं है। यह बात इसलिए भी सही है कि लोग मेरे बारे में यही कहते पाये जाते हैं कि बेचारा भला आदमी है। भले आदमी के मुझमें सभी गुण विद्यमान हैं। मेरे सामने किसी की यह हिम्‍मत नहीं होती कि मुझे गलत आदमी बता दे। बुरे आदमी की तो हालत यह है कि उसे खोजने की आवश्‍यकता ही नहीं है, एक ढ़ूँढ़ो हजार मिलते हैं। कदम-कदम पर डेरा डाले बैठे हैं। लेकिन मेरा जैसा भला अन्‍यत्र मिलना दुर्लभ है। यह कहिये कि यह प्रजाति लुप्‍तप्रायः हो गई है। मेरी राय में तो मिस यूनिवर्स की तरह मिस्‍टर भला अथवा मिस्‍टर जेन्‍टलमैन प्रतियोगिता हो तो उसका ताज पहनने का मौका ऊपर वाले की कृपा से मुझे ही मिलेगा।

मेरे भले होने के अनेक कारण हैं। पहला कारण तो मेरी आर्थिक विषमता है। वस्‍तुस्‍थिति यह है कि आर्थिक विषमता में आदमी अपराध की ओर बढ़ता है लेकिन मैंने इस अभिशाप को भले रूप में अपनाया तथा दयनीय हो जाने से भलेपन का तमगा हर कोई देने लगा, हो सकता था कि यदि मैं धनाढ्‌य होता तो फिर शायद मेरा भला बने रहना कठिन था। धनवान का सारा आचरण ही बदल जाता है। गरीब होने से मैं आचरण से शुद्ध बना रहा। कहावत भी है कि ‘गरीब की जोरू सबकी भाभी' भले आदमी की दशा आज यही है। सत्‍य को नहीं छिपाना भी भलाई में माना गया है और मैं ही पहला व्‍यक्‍ति हूँ, जिसने यह बात सार्वजनिक रूप से स्‍वीकार की है। अन्‍यथा आजकल तो गरीबी के सताये भी टेढ़ी चाल चलने लगे हैं, जिसमें गरीबी की सीमारेखा के नीचे वालों के तो नखरे ही न्‍यारे हैं। दो रूपये किलो का गेहूँ और तीन रूपये का चावल खाकर मद में चूर हैं।

मौटे तौर पर मेरे भले होने का दूसरा कारण मेरा शारीरिक रूप से कमजोर होना भी है। यानि धनबल के साथ-साथ मेरे पास अपना भुजबल भी नहीं है। भुजाओं में ताकत आज के युग की परम आवश्‍यकता है। चोरी, डकैती तथा अन्‍य अपराध इसी की देन हैं। भुजबल का तो अब उग्रवाद के रूप में अन्‍तर्राष्‍ट्रीयकरण हो चुका है। मैंने प्रारम्‍भ में अच्‍छे-से-अच्‍छा च्‍यवनप्राश खाया, लेकिन मैं स्‍वास्‍थ्‍य नहीं बना पाया और अन्‍त में इस निरीहता का नाम भले मानुष के रूप में मेरे साथ जुड़ गया। शारीरिक अक्षमता भला आदमी बनने में काफी कारगर रही, उसी की बदौलत आज मैं मनोबल के साथ यह कह पाता हूँ कि मुझसे भला न कोय। मेरे शरीर की संरचना ही ऐसी है कि जो भी देखता है वह एकदम ही मुझे भला आदमी घोषित कर देता है।

2

इसलिए भलमनसाहत को मैंने वरदान के रूप में अंगीकार किया और उसका सुखद परिणाम यह है कि मैं चाहे विवशता में ही सही भला आदमी बना हुआ हूँ।

भले आदमी बनने की विवशताएँ कुछ भी हो सकती हैं, लेकिन इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। अब भला रूप ही मेरी हर प्रकार से सहायता करता है। मैं शालीनता को तहेदिल से अपनाये हुए हूँ, सबसे अच्‍छा व्‍यवहार रखता हूँ, मीठा बोलता हूँ, तो मेरे काम भी बन ही जाते हैं। जब काम बन जाता है, उल्‍लू सीधा हो जाता है तो भला बने रहने में भला आपत्ति क्‍या है ? मौहल्‍ले में सब मेरा सम्‍मान करते हैं, ऐसा मुझे लगता है। एक-दो मित्रों ने मुझसे कहा भी कि भलापन बेवकूफी में गिना जाता है, इसीलिए इसे त्‍यागने में भलाई है। लेकिन उन्‍हें अपनी विवशताएँ बताना मैं अपनी बेवकूफी मानता हूँ। भले आदमी की अपनी मुसीबतें हो सकती हैं, लेकिन यह इमेज बनाने के बहुत काम आता है। महिलायें मानती हैं कि भला आदमी है, इससे बात करने में कोई हर्ज नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में थोड़ा-बहुत स्‍कोप मुझे कई बार आशा की किरण की तरह कौंधता दिखाई देता है।

चाहे जो हो, भलापन मैं छोड़ूँगा नहीं। क्‍योंकि संसार में जब मुझसे भला दूसरा कोई है ही नहीं तो गिनीज बुक में मेरा नाम दर्ज भले आदमी के रूप में हो जाये, इसकी जुगाड़ में मैं आजकल लगा हुआ हूँ। भला आदमी खोजने मैं जाऊँगा नहीं, क्‍योंकि दूसरा मिल गया तो ‘मुझसे भला न कोय' का अर्थ क्‍या रह जायेगा।

---

(पूरन सरमा)

124/61-62, अग्रवाल फार्म,

मानसरोवर, जयपुर-302 020,

(राजस्‍थान)

फोनः-0141-2782110

image

(मनोरंजन व्यापारी)

म्‍नोरंजन व्‍यापारी एक रिक्‍शा चालक जो कोलकाता की सड़कों पर रिक्‍शा खिंचते हुए या फिर कहीं रिक्‍शे पर बैठे किसी साहित्‍यिक पुस्‍तक या पत्रिका को पढ़ते मिल जायेंगे. उनके रिक्‍शे में एक दिन एक शिक्षिका टाइप की महिला कहीं जाने के लिए बैठी, चलते-चलते मनोरंजन व्‍यापारी ने उक्‍त महिला से ‘जिजीविषा' शब्‍द का अर्थ पूछा क्‍योंकि किसी पुस्‍तक में इस शब्‍द को पढ़ने के बाद उसका अर्थ उन्‍हें समझ में नही आ रहा था. उस महिला ने शब्‍द का अर्थ ‘जीने की इच्‍छा' बता तो दिया लेकिन जब उस महिला ने अपना परिचय दिया तो मनोरंजन व्‍यापारी के खुशी की सीमा नहीं थी क्‍योंकि वह महिला कोई और नहीं बल्‍कि स्‍वंय प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी थी. उन्‍होंने मनोरजन व्‍यापारी को अपनी पत्रिका ‘वर्तिका' में रिक्‍शा चालकों के जीवन पर कुछ लिखने को आमंत्रित कर दिया. मनोरंजन व्‍यापारी की इस तरह शुरू हुयी साहित्‍य साधना, वे लिखते जाते और महाश्‍वेता देवी उसे संपादित कर अपनी पत्रिका वर्तिका में छापती जाती.

24 मार्च को पटना में लिटरेचर फेस्‍टिवल के मंच से मनोरंजन व्‍यापारी ने अपनी कहानी का पाठ किया. उन्‍होंने बताया कि उनके पिता बतौर रिफयूजी कलकता आए थे, उनका बचपन चाय दूकान चलाते, फिर गाय, बकरी चराते हुए बीता, नक्‍सलियों के प्रति सहानुभूति रखने के कारण जेल भी जाना पड़ा. जेल में ही उन्‍होंने बंगला अक्षरों को अपने जेल सहपाठियों की मदद से सीखा और जब वे जेल से बाहर आए तो उन्‍हें पुस्‍तकें और पत्रिकाएं पढ़ना आ चुका था. रोजी-रोटी के जुगाड़ में उन्‍होंने रिक्‍शा चलाना शुरू किया और साथ में साहित्‍य साधना भी. उनकी लगन और मेहनत को देखते हुए उपरवाले ने स्‍वयं महाश्‍वेता देवी जैसी प्रसिद्ध साहित्‍यकार को उनके रिक्‍शा में बतौर सवारी एक दिन भेज दिया और इस तरह उनका साहित्‍यिक सफर शुरू हुआ.

महाश्‍वेता देवी जैसी संवेदनशील साहित्‍यकार की मदद से मनोरंजन व्‍यापारी आज बंगला साहित्‍य के जाने माने साहित्‍यकार बन चुके है. उन्‍होंने अपनी आत्‍मकथा ‘इतिवृति चांडाल जीवन' के नाम से लिखा है जो प्रकाशित होकर देश-दुनिया में धूम मचा रहा है लेकिन हिन्‍दी क्षेत्र की उदासीनता बरकरार है. ध्‍यान देने की बात यह है कि पटना लिटरेचर फेस्‍टिवल के आयोजकों ने जिस तरह मनोरंजन व्‍यापारी को मंच पर जगह दिया वैसे किसी भी साहित्‍यिक मंच ने आजतक मनोरंजन व्‍यापारी को तर्जी नहीं दिया. अंग्रेजी अखबार हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स ने प्रथम पृष्‍ठ पर मनोरंजन व्‍यापारी को छापा परंतु हिन्‍दी के किसी भी अखबार ने मनोरंजन व्‍यापारी को दूसरे या तीसरे पन्‍ने पर भी जगह नहीं दी.

क्‍या मनोरंजन व्‍यापारी द्वारा रिक्‍शा खींचते-खींचते जिजीविषा शब्‍द के अर्थ ढूढ़ते-ढूढ़ते साहित्‍यकार बन जाना अपने आप में एक कहानी नहीं है अगर है तो उनकी अवहेलना क्‍यों ? मुझे श्री बिष्‍णु प्रभाकर लिखित ‘आवारा मसीहा' की याद आ रही है जिसे लिखने में उन्‍हें 14 वर्ष के कड़े तपस्‍या से गुजरना पड़ा था क्‍योंकि शरतचंद्र जैसे महान साहित्‍कार के जीवन काल में कुछ ऐसी ही अवहेलना हुयी थी. कही ऐसा नहीं हो कि मनोरंजन व्‍यापारी को उनके जीतेजी हिन्‍दी साहित्‍य के पुरोधाओं व मठाधीशों द्वारा की जा रही अवहेलना भी शरतचंदीय रूप ले ले. मनोरजन व्‍यापारी द्वारा अब तक लिखित कहानियों में से मात्र एक कहानी का अनुवाद हिन्‍दी भाषा में हो पाया है. श्री व्‍यापारी की लिखी हुई कहानियां भोगी हुयी कहानियां है कल्‍पना का प्रयोग उनमें करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. इसलिए भी मनोरजन व्‍यापारी के साहित्‍य को हिन्‍दी साहित्‍य में उचित स्‍थान मिलनी चाहिए इससे हिन्‍दी साहित्‍य समृद्ध ही होगा.

राजीव आनंद

मो. 9471765417

गुड़िया' को देखते हिंदी साहित्‍य का भविष्‍य

image

डॉ. विजय शिंदे

परिवर्तन जीवंतता का प्रतीक है। साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं में परिवर्तन की अपेक्षा से सहित विचारों का लेखन लेखक करता है पर कथन करने की उसकी तकनीक निराली होती है, अद्‌भुत होती है। भूतकाल और वर्तमान को देखते हुए सत्‍य घटनाओं का रेखांकन साहित्‍य में किया जाता है और उसमें मनुष्‍य जीवन की पेचिदगियां, पीडा, संघर्ष, शोषण का वास्‍तव वर्णन होता है। उन्‍हीं बातों का वर्णन करते लेखक अपनी रचनाओं में भविष्‍य के ऐसे सूत्र जोड़ देता है जो अवाक करनेवाले होते हैं। सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना ने ‘सौंदर्य बोध' कविता में लिखा,

‘‘बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती है

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

फूल और कफन का प्रबंध नहीं करेंगे।

-

ओछी नहीं है दुनिया

महज उसका सौंदर्य बोध' बढ़ गया है।''

कवि के दृष्‍टिकोण से सौंदर्य बोध बढ़ना कोई आम बात नहीं यह संकेत है बाजारीकरण की तरफ। वर्तमान देखते दांवे से कह सकते है भविष्‍य में बाजारीकरण से प्रभावित मनुष्‍य की दयनीय स्‍थिति का साहित्‍य में प्रलय आएगा। बाजार के दबाव, समूह, उनके प्रत्‍यक्ष - अप्रत्‍यक्ष मारक तत्‍व, आक्रमण, निर्मयता और इंसान की एक लंबी ‘रेस' दुनिया में रहेगी। इस रेस में मनुष्‍य की मानवीयता आहत होगी, वह पीड़ित होगा और उसकी कराह साहित्‍य के भीतर उतरेगी। बच्‍चे पढ़ रहे हैं। विदशों में जा रहे हैं। वह गांधी- आंबेडकर- नेहरु युग गुजर चुका जो विदेशों में पढ़े और अपने देश वापस आकर अपने जाति, धर्म और देश के लिए क्रांति की। अब भारतीय युवक पढ़-लिखकर नौकरियां विदेशों में ढूंढकर वहां जाकर बसता है, एक शादी नहीं ‘शादियां' भी वहीं रचा रहा है और उससे नवीन समस्‍याओं की निर्मिति हो रही है भविष्‍य में साहित्‍य के भीतर उतरेगी ममता कालिया का ‘दौड' उपन्‍यास उसी को वर्णित करता है। प्रभा खेतान का ‘अन्‍या से अन्‍यना' आत्‍मकथन सच्‍चाई और विद्रोह का चलता पुरजा। सारी परंपराओं को तोड़कर सफल व्‍यावसायिक, मनमुताबिक एक डॉक्‍टर पुरुष के साथ रहना जो विवाहित है। समाज क्‍या बोल रहा है, परिवार क्‍या कहेगा कोई चिंता नहीं और उस पुरुष के साथ शादी भी नहीं। कितना साहसीक बर्ताव भविष्‍य में ऐसे साहित्‍य की भरमार आएगी कोई आश्‍चर्य नहीं होगा।

साहित्‍य वह किसी भी भाषा का हो एक रचना के भीतर से दूसरी रचना को जन्‍म देता है। भारतीय और हिंदी जगत्‌ की अपेक्षा अंग्रेजी साहित्‍य में वर्णित विषय एवं ‘बोल्‍डनेस' अधिक है, भविष्‍य में हिंदी साहित्‍य के भीतर आएगा ही आएगा। किसी के रोके रुकेगा नहीं। पुरानी फिल्‍मी दुनिया एवं साहित्‍य में हाथों का गालों का होठों से स्‍पर्श कर चुमना आश्‍चर्य माना जाता था पर आज कहां-कहां चुमेंगे इसका भरौसा नहीं और उस चुमाचाटी में पवित्रता नामशेष। अर्थात्‌ यह सब परत-दर-परत परिवर्तन हुआ, अचानक नहीं। साहित्‍य भी ऐसे ही, परत-दर-परत, ‘गुड़िया भीतर गुड़िया'।

मैत्रेयी पुष्‍पा ने आत्‍मकथन लिखा ‘कस्‍तूरी कुंडल बसै' मां के साथ जुड़कर अपना और नारी जाति का लेखा-जोखा। कस्‍तूरी मां। उस मां से जन्‍मी अकेली बेटी पुष्‍पा। अपने उपनाम को नकार कर साहित्‍यिक नाम धारण किया मैत्रेयी पुष्‍पा। विद्रोह रूढि- परंपराओं से, पुरुष प्रधान समाज का नकार, सांस्‍कृतिक बंधनों का नकार, जाति-पाति का नकार। कस्‍तूरी के पेट से जन्‍मी एक गुड़िया पुष्‍पा, पुष्‍पा के पेट से जन्‍मी तीन गुड़ियां- नम्रता, मोहिता, सुजाता। आज जहां गर्भ मेें पल रहे बच्‍चे के लिंग की जांच, पड़ताल कर उसके स्‍त्री लिंगी होते ही मारने वाले सामाजिक मानसिकता के विरोध में लड़ती इन तीन पीढ़ियों की गुड़ियों कों सादर नमन। जबरदस्‍त संघर्ष की गाथा, घुटन और विद्रोह। ऐसा नहीं की मैत्रेयी ने हाथों में बंदुके थामकर गोलियां दागी हो। नारी जगत, की पीड़ाओं का बखान करते पुरुष प्रधान संस्‍कृति को भविष्‍य के खतरों से आगाह करती है। संपूर्ण रचना में ईमानादार मांग,े कि हम भी जीवंत है, हम भी मनुष्‍य है। आजादी हमें भी चाहिए और ये हमारा हक है। आज अगर हमारा मौन आग्रह आपने सुना नहीं तो कल बंदुके भी उठ सकती है। जैसे अदिवासियों के अधिकारों को नकारा वे नक्‍सलाईट हो गए। खैर मेरा उद्‌देश्‍य यहां पर ‘गुड़िया भीतर गुड़िया' को देखते भविष्‍य के कौन से संकेत मिलते हैं जो हिंदी साहित्‍य का निर्देशन कर रहे हैं। ‘‘यह है, मैत्रेयी पुष्‍पा की आत्‍मकथा का दूसरा भाग। ‘कस्‍तूरी कुंडल बसै' के बाद ‘गुड़िया भीतर गुड़िया।' अगर बाजार की भाषा में कहें तो मैत्रेयी का एक और धमाका।'' ;प्‍लैपद्ध जो पाठक को, भारतीय व्‍यक्‍ति को झंकझोर देता है, चकित करता है। और भविष्‍य में ऐसे धमाकें एक नहीं कई हो सकते हैं, सभी महिला लेखिकाओं से। मैत्रेयी ने इस रचना में नारी होने के नाते सारी सीमाओं को लांघकर खतरों को उठाया और समाज का कान पकड़कर बताया कि ‘यूं अन्‍याय न कर मोरे राजा, ऐसी चोट पहूंचेगी उठ न पावै' लेखिका ने इस किताब में बडी ईमानदारी के साथ आत्‍मकथन को खोला है, जो मन में था वहीं लिखा। घटनाएं तो सच है ही परंतु उन घटनाओं के दौरान मन के भीतर क्‍या हलचलें शुरु थी उसका भी ईमानदारी से लेखन, नई बात है। यहीं हलचलें भविष्‍य में सहित्‍य का, समाज का सच बनते देखी जा सकती है। ‘‘घर-परिवार के बीच मैत्रेयी ने वह सारा लेखन किया है जिसे साहित्‍य में बोल्‍ड, साहसिक और आपत्‍तिजनक, न जाने क्‍या-क्‍या कहा जाता है और हिंदी की बदनाम मगर अनुपेक्षणीय लेखिका के रूप में स्‍थापित है।'' (प्‍लैप) पुष्‍पा जी परिस्‍थिति और मां से सीख चुकी की बदनामियों को नजरअंदाज करें। चाहे वह परिवार द्वारा लगाए गए लांछन हो या समाज द्‌वारा। अब वह दौर आ चुका है शहरों एवं महानगरों में बदनामी कोई विशेष बात नहीं। अब स्‍थितियां ऐसे है मानो ‘सौ चुहे खाकर बिल्‍ली चली हज'। पुरुषों ने तो अपनी हदें कब की लांघी है उसके देखा देखी नारियां भी लांघ रही है और कह रही है-‘आपने क्‍यों दूसरी शादी की? रखैल रखी? दूसरी औरतों के पीछे भाग रहे हो? हम भी दूसरी शादी करेंगे, पुरुष रखेंगे, दूसरे पुरुषों के साथ समय गुजारेंगे-मानसिक, शारीरिक, उन्‍हें उगलियों पर नचाएंगे। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया' में एक लड़की का जिक्र है जो अपने टयुशन मास्‍टर के साथ अफेअर कर चुकी है कई स्‍तरों का और मकान मालकिन प्रतिक्रिया दे रही है ‘यह भाग न जाए, यही चिंता है। इश्‍क विश्‍क तो चलता चलाता रहता है। ;पृ.41द्ध संकेत है भविष्‍य का लडकियों द्वारा शारीरिक आजादी प्राप्‍ति का और इसको पास-पडोसिनों स्‍वीकार करेंगी मौज-मस्‍ती करें पर शादी ना करें। लड़की और पौढ नारी की आत्‍मस्‍वीकृति केवल संकेत मात्र भविष्‍य में साहित्‍यिक दुनिया में उफान आएगा। भारतीय मूल्‍यों का हनन है पर रोके कैसे, मुश्‍किल है!

मैत्रेयी के मन में विवाह संस्‍था के प्रति विरक्‍ति निर्माण हो चुकी है। बंधन, पाबंदी, मॅुंह पर पट्‌टी, ऐसा न करो, यहां बैठो मत, बाहर निकलो मत, रसोयी घर ही तुम्‍हारी दुनिया, दहलिज, बच्‍चे और अंत में पति-पुरुष। क्‍या यही महिलाओं की दुनिया? प्रश्‍नचिह्‌न मैत्रेयी खड़ी कर रही है, ना! ये तो नहीं हमारी दुनिया। हमारी दुनिया अपने हाथों से गढे़गी एक नारी का आक्रोश पीढ़ी-दर-पीढ़ी उतर रहा है। मैत्रेयी कहती है, ‘‘मैं धर्म के खिलाफ थी, न नैतिकता विरूध्‍द। मैं तो सदियों से चली आ रही तथाकथित सामाजिक व्‍यवस्‍था से खुद को मुक्‍त कर रही थी।'' (पृ. 7) लेखिका का यह मौन संघर्ष है मुक्‍ति का, पुरुष धर्म के विरूध्‍द का जो संपूर्ण नारी जाति का बनता है। पर भविष्‍य संकेत दे रहा है साहित्‍य में कल ऐसी रचनाओं की भरमार होगी जहां पीड़ित होकर नारियां पुरुषों को मौनता तोड़कर फौश गालियां देंगी जिसे सुनने की मानसिकता आज से बनानी पडेगी। नारी बंधनों से मुक्‍त होने के लिए तड़प रही है, उन्‍हें बंधन रास नहीं आते और यहां पर उनका विवाह संस्‍था पर से विश्‍वास उठ जाता है। मैत्रेयी एकांत में कई बार सोचती है शादी करके गलती की? प्रभा खेतान का बिना विवाह पुरुष के साथ रहना, मन चाहा सुख प्राप्‍त करना भी तो यही दिखाता है (अन्‍या से अन्‍यना), समाज चाहे तो कुछ भी कहे ‘मैं तो अपने मन की रानी रे' का स्‍वर। अब यह स्‍वर भविष्‍य में ताकदवर बनेगा साहित्‍य में उतरेगा। मैत्रेयी भी पति के साथ बहस करते हुए पुरुष सत्‍ता को नकार रही है, ‘‘यदि कोई पति अपनी पत्‍नी की कोमल भावनाओं को कुचलकर खत्‍म करता है तो पत्‍नी को पतिव्रत के नियमों का उल्‍लंघन हर हालत में करना होगा।'' (पृ.15) विद्रोह लेखिका का फिलहाल वर्तमान स्‍थिति में, पवित्र भाषा में, पर कल भविष्‍य में, भाषा जरुर बदलेगी ‘अबे कमिने....... मैं तेरे पांव की जुती थोड़ी ही हूंं। बकते जा रहे हो। मेरे मन पर जो आघात तुम कर रहे हो उससे भी खतरनाक चोटें दे दुंगी।' विद्रोह और विद्रोह से पनपता ‘बदला' और बदले की भावना साहित्‍य के केंद्र में भविष्‍य का संकेत है। रोके स्‍त्री अत्‍याचारों को, स्‍त्री भ्रुण हत्‍याओं को। पुरुष सत्‍ता का नकार जहर बन न जाए, आज सोचना जरुरी है। हो सकता कल ‘पुरुष और स्‍त्री,' दो दलों में सारा सामाजिक ढांचा बंट जाए और इनकी लड़ाइयां साहित्‍य में वर्णित हो। विदेशों में ‘सेक्‍स' आजादी है धीरे-धीरे भारतीय समाज में उतर रही है। सेक्‍स के लिए पुरुष तो आजादी ले चुका है पर नारियां भी मंशा रख रही है। पति के साथ रहनेवाली पुष्‍पा जी मन पर थोड़े ही रोक लगा सकती चाहे शरीर को बंधनों में बांधे। ‘‘लगता यह भी, कोई हमारी जिंदगी में क्‍यों नहीं आता? पतिव्रत ढोते-ढोते कंधे झुके जा रहे हैं। अच्‍छी पत्‍नी होकर उकता रहे हैैं।...... जब ना तब मन का मौसम बदलने लगता है। मेरे कदम मेरी नजरों के साथ चलने लगते हैं। व्‍यवस्‍था गड़बड़ाने लगती है। समर्पन डगमगा जाता है।'' (पृ. 70-71) मैत्रेयी की फिलहाल उम्र 56 बरस है, मैं उन्‍हें उमर ढल चुकी कहूं तो गालियां मिलेगी। पर विज्ञान और प्रकृति को आधार माने तो यहां पर महिलाएं शरीर सुख से निवृत्‍त हा चुकी होती है। समर्पित जीवन जीया। उनको केवल लगता था, मन में उमडन-घुमडन चल रही थी। भविष्‍य की प्रौढ महिलाएं इसी मानसिक हलचल को सच बनाने की संभावना है और इससे पीड़ित पुरुष एवं नारियों का चित्रण नव-नवीन घटनाओं के साथ साहित्‍य में उतरेगा।

संवेदनशील और चिंता निर्माण करनेवाला विषय है बेटा बेटी भेदा-भेद। स्‍त्री भ्रुण हत्‍या, पुरुष-स्‍त्री प्रमाण का असंतुलन सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करेगा। अब पैसों को लेकर लड़ाइयां होती कल लड़कियों को लेकर होगी। मजाक-मजाक में कहते हैं रामायन-महाभारत सीता-द्रौपद्री के लिए हुआ। युध्‍द का कारण स्‍त्री। पर भविष्‍य में पुरुषों की लड़ाइयां स्‍त्री के लिए किस कदर होगी कल्‍पना भी नहीं कर सकते। स्‍त्रियों का प्रमाण इस तरह घटता गया तो भविष्‍य खतरों से भरेगा और वे साहित्‍य में उतरते रहेंगे। ‘‘एक बेटा जरुर हो का रिवाज परिवार नियोजन की रीढ दबाए रहता है। सभ्‍य समाज में फैमिली प्‍लानिंग का रूप है- दो बेटे एक बेटी। एक बेटा एक बेटी। दो बेटे हों फर्क नहीं पड़ता मगर जैसे ही लड़कियों की संख्‍या दो हो जाती है, लड़के की पुकार तेज होती है।'' (पृ.95) यह दृष्‍टिकोण देश को कौनसी कगार पर लेकर जाएगा बताया नहीं जा सकता और वह कगार, साहित्‍य स्रोत जरुर बनेगी।

पाकिस्‍तान में जितने मुसलमान है उतने ही भारत के भीतर अर्थात्‌ भारत में एक और मुस्‍लिम राष्‍ट्र जी रहा है, बंधुत्‍व के साथ पर पुष्‍पा जी ने भारत-पाकिस्‍तान युद्‌ध को लेकर थोड़ा-सा वर्णन किया है जहां पर भारत के भीतर रह रहे मुसलमानों को पाकिस्‍तानी जासूस की नजरों से देखा गया था। और मुसलमान अपने घरों के भीतर सहमे-सिमटे जा रहे थे असुरक्षित महसूस कर रहे थे। पाकिस्‍तान टूटने की खबरें भी आ रही थी। कुछ पाकिस्‍तानी अपने रिश्‍तेदारों के साथ भारत में भी थे जो मैत्रेयी के पड़ोसी घर में थे। खैर बात यह है कि मैत्रेयी का उनसे दोस्‍ताना रिश्‍ता हार्दिक था। (पृ. 77) प्रश्‍न यह उठता है कि कल, भविष्‍य में भारत-पाकिस्‍तान एक अच्‍छे दोस्‍त हो सकते हैं? भारत-पाकिस्‍तान के भीतर रोटी-बेटी का व्‍यवहार हो जाएगा? व्‍यापक रूप में शादियां होगी? अगर ऐसा हो तो आज भारत में कभी-कभार होनेवाले सांप्रदायिक दंगे पूर्ण मिट जाएंगे और भारत का सतरंगी पंखोंवाला सपना साकार होगा। पर यह केवल भविष्‍य की कल्‍पना है जो मैत्रेयी पुष्‍पा के ‘गुड़िया भीतर गुड़िया' के माध्‍यम से मन में आ जाती है। अगर दोनों संप्रदायों के रिश्‍ते मृदु और हार्दिक होते गए तो साहित्‍य में वहीं प्रतिबिंब आएगा और खिंचते गए, दरारे बढ़ती गई तो भयानक, दर्दनाक दिनों का वर्णन आएगा। बस मैत्रेयी पुष्‍पा के ‘गुड़िया भीतर गुड़िया' के माध्‍यम से भविष्‍यकालीन साहित्‍य के परिदृश्‍य को आंकते हुए साहित्‍य और देश के भविष्‍य का शुभ चाहते हैं।

आधार ग्रंथ

गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्‍मकथन) -मैत्रेयी पुष्‍पा, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. पहला संस्‍करण -2008, पृ.352, मूल्‍य - 395

--

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद

 

आत्मा का वस्त्र

“अमोदा, तुमसे दूर नहीं रह सकता । ओ..... तुमने क्यों किया ऐसा? मेरे लिए जीने से आवश्यक तुम हो और अगर तुम मेरे जीवन में नहीं हो तो मृत्यु का वरण ही सही है।”, 

अनुराग मन ही मन ये सोचता चला जा रहा था। समुद्र की लहरों की तरह सदैव प्रसन्न रहने वाला अनुराग का अंतर-मन आज समुद्र की तरह गहरा हो गया था। अंतर-मन की हलचल किसी को दिखाई नहीं दे रही थी, आँखे थोड़ी सी नम थी लेकिन ह्रदय बहुत ही तीव्र था। गले से शब्द नहीं निकल रहे थे, लेकिन मस्तिष्क में इतने विचार आ रहे थे कि हर विचार को देखना भी असंभव लग रहा था।

मनुष्य के जीवन में जब स्वयं के विचार ही विकार उत्पन्न करना आरम्भ कर दें तो यह मस्तिष्क में रोग उत्पन्न कर सकता है और धीरे-धीरे विकृत विचार, मानसिकता को भी विकृत करना आरम्भ कर देते हैं और इस निराशा में व्यक्ति कुछ भी कर सकता है, रोगी हो सकता है, आत्मघातक भी हो सकता है और अपराध भी कर सकता है। सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होने पर ऐसा होना स्वाभाविक है।

अमोदा और अनुराग बचपन से ही साथ पढ़ते थे और अमोदा, अनुराग को पहले दिन से ही मोहित करती थी, अनुराग आरम्भ में तो समझा नहीं, लेकिन धीरे धीरे अमोदा उसके जीवन का अभिन्न अंग बनती गयी। दोनों का नाम भी स्कूल से लेकर कॉलेज तक के उपस्थिति रजिस्टर में भी आगे-पीछे ही रहा। अनुराग का बचपन मन युवा होने तक समझ गया था कि अमोदा उसके जीवन के लिए ही है। अनुराग मितभाषी, अंतर्मुखी व्यक्ति था लेकिन अमोदा इसके विपरीत सबके साथ हंसती रहती और हंसाती रहती थी। अमोदा, अनुराग के प्रेम को भी हंसी ठठ्ठा ही समझती थी और अनुराग उसके लिए एक अच्छे मित्र के सामान था।

आज अमोदा ने बड़ी मासूमियत भरी खुशी से अपनी मंगनी की बात सबको बताई थी। अनुराग हक्का-बक्का रह गया, उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी, बड़ी खुशी के साथ उससे दूर जा रही थी और उसको खुश देखकर वो निराश हो रहा था। वो अपने कॉलेज से निकल कर समुद्र तट पर आ गया और उसी समुद्र में विलीन होने के विचार उसके मन में स्वतः ही प्रकट होने लगे। वो सोच रहा था कि काश ये लहरें अपने साथ में उसे भी ले जाए और वह फिर कभी भी लौट कर धरती पर नहीं आये।

आत्मघात के विचार उसके मस्तिष्क पर हावी हो चुके थे। और उसने निर्णय कर लिया कि अब वो जीवित नहीं रहेगा। किसी भी हाल में नहीं, अमोदा उसका जीवन थी अब जब वो ही बिछड़ गयी तो जीवन ही बिछड़ गया। अब तो मृत्यु ही साथी है।

“मुझे जीवित नहीं रहना है”, उसने अंतिम निर्णय ले लिया।

उसने एक स्थान तलाश कर लिया, जहां पर सैलानी और अन्य लोग नहीं जाते थे क्योकि वह स्थान संकटमय था और वहां कई दुर्घटनाएं पहले भी हो चुकी थी। आज भी उस स्थान पर कोई नहीं था। कुछ क्षण अनुराग नम आँखों से लहरों का उतार-चदाव देखता रहा, उसे हर लहर में अमोदा का अक्स दिख रहा था और उसने ठान लिया कि उसे अमोदा में विलीन होना है, उसकी हंसी के साथ एकाकार होना है, और ये लहरें अमोदा का ही प्रतिरूप है।

अमोदा मैं आ रहा हूँ, तुम्हारे पास”, अनुराग चिल्ला कर बोला, उसकी वाणी में दर्द के साथ कुछ मस्तिष्क की विकृति भी झलक रही थी, और यह कहते ही उसने बड़े बड़े क़दमों के साथ एक चट्टान की तरफ चलना आरम्भ कर दिया, उस चट्टान से पहले भी कई दुर्घटनाएं हो चुकी थी और कुछ व्यक्ति मर भी गए थे।

उसने उस चट्टान पर चढना शुरू कर दिया, चट्टान पर फिसलन थी, लेकिन उसका मन केवल वही शब्द दुहरा रहा था, “अमोदा मैं आ रहा हूँ...... तुम्हारे पास”, मृत्यु उसके समीप आ रही थी यह कहना सही नहीं होगा, लेकिन अनुराग मृत्यु के समीप जा रहा था, उसे पता था, कुछ क्षणों के पश्चात उसकी आत्मा इस शरीर को त्याग देगी, आत्मा जिसे पानी नहीं गला सकता है, आग नहीं जला सकती है, शस्त्र नहीं काट सकता है..... लेकिन ये शरीर अमोदा रूपी लहरों से एक होने वाला है और उसी में हमेशा के लिए समा जाएगा। अमोदा, यही प्रेम की पराकाष्ठा है। अपने जीवन का त्याग कर देना। इन्हीं विचारों के साथ अनुराग चलता ही जा रहा था कि एक तीव्र ध्वनि ने उसका ध्यान भंग कर दिया,

“रुको... मरने जा रहे हो तो जाओ, लेकिन मुझे कुछ दे जाओ।”

उसने मुड कर देखा, तो एक भिखारी किस्म का व्यक्ति, जिसकी दाढी बड़ी हुई थी, चेहरे पे वक्त की कालिमा थी, बिखरे अधपके बाल, फटे हुए कपडे, लेकिन आँखों में कुछ चमक सी थी, चट्टान के नीचे खड़ा हुआ था।

अनुराग ने भर्राई धीमी आवाज़ में पूछा, “क्या चाहिए?”

उस व्यक्ति की आँखों की चमक बढ़ गयी, बोला, “तुम तो मरने जा रहे हो, कुछ क्षणों में तुम ईश्वर के पास चले जाओगे, शरीर ना रहकर आत्मा बन जाओगे, आत्मा तो निर्विकार है और निरंकार है, उसे वस्त्रों की क्या आवश्यकता? आत्मा के वस्त्र तो होते नहीं। तो अपने वस्त्र तुम मुझे दे दो। बाकी चाहो तो तुम जाओ मरने, हमारा क्या? हम तुम्हें लम्बी उम्र की दुआ भी नहीं देंगे।”

एक भिखारी किस्म के व्यक्ति के मुंह से ऐसी बात सुनकर, अनुराग की गंभीरता बढ़ गयी और चेहरा थोड़ा और सख्त हो गया। उसने कहने की कोशिश की लेकिन आवाज़ बहुत धीरे निकली, “तुम्हे पता है मुझे क्या दुःख है?”

उस व्यक्ति ने कहा, “तुम मरने जा रहे हो, तो कोई ऐसा दुःख होगा, जिससे बड़ा दुःख कुछ भी नहीं हो सकता, वो असहनीय होगा, तभी इतना बड़ा निर्णय लिया।”

अनुराग ने कहा, “हाँ!! जिस लड़की से मैं बचपन से प्रेम करता हूँ, उसकी आज मंगनी किसी और से हो गयी। अब मैं मरने के अलावा और क्या करूँ?”

उस व्यक्ति ने कहा, “तुम्हारे माता-पिता से प्रेम नहीं है, वो तुम्हें उतना ही प्रेम उस क्षण से करते हैं, जिस क्षण तुम पहली बार धरती पर आये”

अनुराग ने कहा, “है, क्यों नहीं है, लेकिन अमोदा मेरा जीवन है। चलो तुम मेरे वस्त्र ले लो। आत्मा को तो वस्त्र की आवश्यकता नहीं होती।”

उस व्यक्ति ने कहा, “ऐसा नहीं है कि आत्मा को वस्त्र की आवश्यकता नहीं होती। आत्मा का वस्त्र है शरीर। अगर तुम्हें यह लग रहा है कि अपने शरीर को समाप्त करके, तुम अमोदा को भूल जाओगे तो तुम गलती कर रहे हो। तुम्हारी आत्मा भटकती रहेगी, अपने वस्त्र के लिए, क्योंकि अपने वस्त्र के साथ ही वो अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर सकती है। बिना वस्त्र के तुम्हारी आत्मा बिना अभिव्यक्ति के केवल तड़पती रहेगी।”

अनुराग ने कहा, “लेकिन मुझे अमोदा में मिलना है, वो मुझे इन लहरों में दिखाई दे रही है।

उस व्यक्ति ने कहा, “अमोदा तुम्हें अगर इन लहरों में दिखाई देती है तो मृत्यु के पश्चात् तुम्हारा निर्जीव शरीर तो इन लहरों में गल जाएगा लेकिन आत्मा इन लहरों से बाहर आ जायेगी, तुम आत्मा बन जाओगे, और फिर अमोदा में मिलने के लिए अपने वस्त्रों के लिए तरसोगे।”

एक भिखारी के मुंह से इतनी ज्ञान भरी बात सुन कर अनुराग थोड़ा चौंका, अब तक वो थोड़ा संयत भी हो चुका था। उसने धीरे से पूछा, “तुम्हें ये सब बातें क्या पता? क्या तुम कोई साधू हो?”

उस व्यक्ति ने कहा, “नहीं, मैं साधू नहीं हूँ। तुमसे कपडे मांग रहा हूँ, लेकिन भिखारी भी नहीं हूँ। मैं नमक का व्यापारी हूँ। नमक की खानें हैं मेरी। एक दिन मैं अपने परिवार के साथ तिरुपति बालाजी में तीर्थ के लिए गया हुआ था, एक महीने तिरुपति में रहने के बाद जब हम वापस लौट रहे थे तो कुछ अनजान लोगों ने हमला कर दिया, और मेरी पत्नी और दो बच्चों को लेकर पता नहीं कहाँ चले गए।”

उस व्यक्ति का गला भर्रा गया, लेकिन वो कहता रहा,”वो बच्चे, जिनसे मैं उनके पहले क्षण से उतना प्यार करता हूँ, जितना तुम अमोदा से करते होंगे, मुझसे बिछड़ गए। मैं पागल सा हो गया, पुलिस ने तहकीकात  की, अपने जासूस लगाए, मंत्रियों से सिफारिश लगवा कर सब जगह ढूंढवाया, लेकिन कुछ पता नहीं चला। जैसे तैसे मैं अपने घर पर पहुंचा, वहां जाकर पता चला कि, मेरा चचेरा भाई अब मालिक बन गया है, उसने धोखे से मेरा सब कुछ हथिया लिया, मेरी खानें, मकान, धन और मुझे विश्वास हो गया कि उसीने मुझ पर हमला करवाया था।”

कुछ क्षण रुक कर उसने फिर कहा, “मैं हर तरह से बेसहारा हो गया। मेरे पास मेरा कहने कुछ भी नहीं रहा। मुझे पता नहीं मेरा परिवार कहाँ है, इस धरती पर भी है या नहीं, मैं तुम्हारी तरह खुशकिस्मत नहीं हूँ, कम से कर तुम्हें पता तो है कि तुम्हारी अमोदा, इस धरती पर खुश है और तुम चाहो तो उसे और भी खुशियाँ किसी ना किसी तरह से दे सकते हो और मैं अपने परिवार को खुश कैसे रखूँ, मुझे ये भी नहीं पता”

उसकी आँखों में आंसू आ गए।

उसने फिर कहा, “लेकिन फिर भी एक आस है, आज नहीं तो कल मेरा परिवार मुझे फिर मिलेगा, मैं फिर कानूनी लड़ाई लड़ कर अपनी खुशियाँ फिर से पा सकता हूँ। इसलिए मुझे कुछ कपड़ों की आवश्यकता है ताकि उनकी तलाश में कुछ तो आसानी हो।”

अनुराग के पास एक दिन में दूसरी बार हक्का-बक्का होने का क्षण आ गया था, उसके पूर्व विचार कहीं छुप गए थे और उसे केवल यही सुनाई दे रहा था कि, “....... तुम्हारी अमोदा, इस धरती पर खुश है और तुम चाहो तो उसे और भी खुशियाँ किसी ना किसी तरह से दे सकते हो ...... और मैं अपने परिवार को खुश कैसे रखूँ, मुझे ये भी नहीं पता........... ”

अचानक से उसे बोध हुआ कि उसकी आत्मा उसीके स्वरुप में उसके सामने खड़ी हो गयी है, और उससे कह रही है, “अनुराग....!!! अनुराग का अर्थ होता है प्रेम और अमोदा का अर्थ आनदं, प्रेम के भीतर आनंद ही आनंद है लेकिन आनंद के भीतर प्रेम हो, आवश्यक नहीं। अमोदा सदा तुम्हारे भीतर है, तुम अमोदा के भीतर हो या नहीं इसकी तकलीफ को छोड़ दो। यह कोई दुःख नहीं है। जो चीज़ तुम्हारे भीतर है, उसे बाहर तलाश मत करो, उसके लिए दुखी मत हो, उसकी कोई आवश्यकता नहीं। तुम्हारा शरीर मेरा वस्त्र है, और मैं तुम्हारे भीतर हूँ, मैं केवल तुम्हारा ही नहीं अमोदा का प्रतिरूप भी हूँ, लेकिन तुम दोनों के प्रतिरूप बनने के लिए मुझे मेरा वस्त्र चाहिए। मैं ही प्रेम और आनंद का स्वरुप हूँ, फिर भी अदृश्य हूँ......................... अब अपने अनुराग में अमोदा को तलाश करो.... अपने जीवन को आनंदमय (अमोदामय) कर दो... कर दो अनुराग” उसकी आत्मा यह कहते हुए कहीं लुप्त हो गयी।

अनुराग ने मन ही मन दुहराया, “अमोदा, तुमसे दूर नहीं रह सकता, लेकिन मैं भूल गया था कि तुम तो हमेशा मेरे साथ हो, अगर मैं दुनिया में प्रेम बांटता हूँ तो मुझे आनंद अपने-आप ही मिल जाएगा, मुझे मेरी अमोदा मिल जायेगी। मेरी अमोदा इन समुद्र की लहरों में नहीं, मेरे द्वारा दी गयी आखों की चमक  में है, दुनिया में बहुत दुःख भरा है... थोड़ा भी कम कर दूं तो अमोदा मेरे साथ है ।”

अनुराग ने उस व्यक्ति का हाथ पकड़ लिया और चल दिया... उसके साथ उसका परिवार ढूँढने के लिए... 

- चंद्रेश कुमार छतलानी

३ प् ४६, प्रभात नगर 

सेक्टर-५, हिरन मगरी 

उदयपुर - राजस्थान 

फोन: 9928544749

chandresh.chhatlani@gmail.com

http://chandreshkumar.wetpaint.com


 

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

सब्र खोने का वक्‍त आ गया है
कुल जमा तस्‍वीर धुंधली है
कहने का लब्‍बोलुबाब यही है
देश फेल हो रहा है?
देश के अन्‍दर से
नये देश फूट रहे हैं
जो देश के लिए नहीं
अपनी राजनीति चमकाते हैं
सत्‍ता की खातिर
झूठ को सच मनवाते हैं
और लगता है
हमने मान लिया है
देश नहीं क्षेत्रीयता की बारी है
सपनोको तोडने की तैयारी है
थेाड़े बेसब्र रहे और हम
तब तक जोड़ घटाव करे
दोराहे पर रहे देश!
हम हाथ पर हाथ धरे
जो वो चाहे करे
हमें सिर्फ चुप करे।

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री
ए-305, ओ.सी.आर.
बिधान सभा मार्ग;लखनऊ
मो0ः 9415508695

 

0000

मुरसलीन साकी

मुझे गिला नहीं तेरी जफाओं का।

मैं आशिक हूँ तेरी निगाहों का॥

मुझे शोहरत यूँ ही नहीं मिल गई।

ये असर है तेरी दुआओं का॥

खबर हम को नहीं है गुलशन की।

कुसूर इसमें है क्‍या बहारों का॥

हसद से जल गये हैं दिल खुद ही।

असर दिखता नहीं शरारों का॥

फकत रहमत से अपनी कर अता।

सलीका हम को नहीं दुआओं का॥

 

0000

आमद थी उनकी इसलिये गुलशन संवारा था।

क्‍या मिल गया है तुम को मेरा ख्‍वाब तोड़ कर॥

हमने तो इन्‍तजार में सदियां गुजार दीं।

वो जा रहे हैं देखिये इक शब गुजार कर॥

मैं अब भी उसी राह पे मिल जाऊंगा तुम्‍हें।

जहां तुम चले गये थे मेरा साथ छोड़ कर॥

शायद कभी खयाल मेरा आये इसलिये।

जलते चराग आ गया राहों में छोड़ कर॥

उसने मेरे खतों का दिया इस तरह जवाब।

कांटे ही खत में रख दिये फूलों को छोड़ कर॥

0000

 

ये खौफ जदा शहर ये गमनाक हवायें।

हर सू है कत्‍लेआम अदावत की सदायें॥

अब नफरतों ने अपने तरीके बदल लिये।

अस्‍मत जनी है तो कहीं खून की धारें॥

वीरान हुआ शहर लगी आग हसद की।

ऐसी फजा में आयेंगी क्‍या खाक बहारें॥

हाकिम तो सो रहें हैं हसी महलों में अपने।

हम खौफ जदा है कि कहां रात गुजारें॥

कितने हसीन होते हैं से जख्‍म दिलों के।

मिल जायें कहीं राह में उनको भी दिखायें॥

 

मुरसलीन साकी

लखीमपुर-खीरी उ0प्र0

मो0 9044663196

पिन- 262701

0000

नीरा सिन्हा

आत्‍महंता होते युवा

अति संवेदनशील आज के युवा

खूद को गुनहगार समझने लगे

पिता के अकांक्षा को नही कर सके पूरा

तो खूद को सजा देने लगे

क्‍लर्क पिता ने पुत्र के कंधे पर

अपनी दमित अकांक्षा को दिया लाद

पुत्र बनना चाहता था चित्रकार

अफसर बनने का पिता ने बनाया दबाव

पिता की अकांक्षा को कर नही सका पूरा

मुजरिम खूद को समझ लिया

अवसाद में घिर कर भरी जवानी में

पंखे से झूल कर आत्‍महत्‍या कर लिया

फैशनेबल भाषा

भाषा बन गयी है फैशन

युवा कॉलेज की लड़की को

कहता है आइटम

परीक्षा में प्रश्‍नों के उतर

एसएमएस की भाषा में देता है

पवन पुत्र हनुमान को

सोर्टकट में हाय हनु कहता है

विद्या की देवी की पूजा में

मुन्‍नी बदनाम हुई गाने पर

पीकर थीरकता है

माँ औ बहनों को सजी-धजी देखकर

सेक्‍सी लग रही हो

कहता है !

घर एक संग्राहालय

भौतिक वस्‍तुओं का बनता

जा रहा है घर एक संग्राहालय

जिंदगी की संगीत का

जिसमें नही है कोई ताल औ लय

खो गयी है जिंदगी

चीजों के ढेर में

बिन सोचे-समझे चीजों

को खरीदने के फेर में

नीरा सिन्‍हा

मो. 9931584588

00000

 

सुधीर कुमार सोनी

        ''निश्चिंतता से जीने के कुछ पल''
निश्चिंतता
ठहर नहीं पाती है मेरे पास
अकारण ही
मैं ढूंढता हूँ
निश्चिंतता से जीने के कुछ पल
बावजूद इसके
की समय के सम्पूर्ण अंग में
विस्फोटक लेप चढ़ा हुआ है
देखता हूँ
कितनी निश्चिन्त होकर
घास के शीश पर बैठी है
ओस की बूंद
बिना किसी भय के
बुन   रही है मकड़ी अपना जाल
कि पृथ्वी के इस भाग में
कम्पन नहीं होगा अभी
आबादी से दूर सही
चिड़ियों ने ढूंढ लिया है
अपने घोंसले के लिए ठिकाना
बहुमंजिले भवन को
जीभ दिखाती
बकरी ढूंढ रही है चारा
चल रही है कतार में चीटियाँ
बेखबर
की समय उतावला है
पहुँचने के लिए
इक्कसवीं सदी के द्वार पर
वह नौजवान
जो प्रतियोगिताओं को
लगातार लाँघने की कोशिश में है
निश्चिंतता की कसौटी पर
खरा उतर पायेगा
क्या पता
घास के शीश पर बैठी
ओस की बूंद
उस पर ठहाका लगाये


     ''सुबह ''
सूरज की किरणों की
पलके खुलने के पहले
पंछियों की पलकें खुल जाती हैं
ग्वाले का हाथ
अपने पशुओं के थन के पास
पहुँच जाता है
सुबह होने का आभास होते ही
दुनिया की खबरों को
घर-घर तक पहुँचाने का सिलसिला
शुरू होता है
सुबह होने के पहले
चौराहों के ठेलों और गुमटियों में
केतली में घुलने लगती है
चाय की कडुवाहट
सुबह होने के पहले 
सुबह
धीरे-धीरे
तैरता जाता है शोरगुल हवा में
घुलता जाता है जहर
क्षमा
तुमसे सुबह
इससे पहले कि
तुमसे छीन जाए
तुम्हारी
शीतलता
मधुरता
और सहजता

0000

उमेश मौर्य

॥ सीखो॥

 

न केवल अपनें स्‍वजनो पे,

गैरों पे भी रोना सीखो।

महलों के बाहर की दुनियॉ,

खुली हवा में सोना सीखो।

कॉटे बोये, कॉटे काटे,

फूल प्रेम के बोना सीखो।

एक अलग दुनियाँ मस्‍ती की,

चीत्‍कारों मे जीना सीखो।

जीवन तो निकलेगा यू भी,

अॉसू पोंछ के जीना सीखो।

दुख से भरी अमीरी कैसी,

मस्‍त फकीरी सोना सीखो।

लघु, अतिलघु प्रश्‍नों में उलझे,

खुले विचार में उड़ना सीखो।

पग-पग लिए मशीनी कुबड़ी,

पैदल भी तो चलना सीखो।

ऊॅच नीच और जाति पाति से,

अब हे आर्य निकलना सीखो।

पश्‍चिम में अब देख न भारत,

अपना भाग्‍य बदलना सीखो।

जख्‍मी जापानी घोड़ों से,

अपनें दम पे जीना सीखो

 

उमेश मौर्य

सुलतानपुर, उत्‍तर प्रदेश, भारत

 

0000

विजय वर्मा    

 

  ग़ज़ल

बा-रहम थें जो,वो अब बे-रहम है .

इसे मानने में भला कैसी शरम है .

मौसमे-जहाँ का भरोसा नहीं रहा

सुबह खुशनुमा थी ,शाम गरम है

आमरण -उपवास फिर होगा पुरअसर

मुगालतें न पाल,यह मात्र भरम है .

अहले-कू-ए-सियासत के एक सा मिजाज़

कोई थोड़े शख्त,कोई थोड़े नरम है .

अब ये कौन सा दौर आया है मुल्क में

आबाद है मयखानें ,वीरां दैरो-हरम है . 

चाँद  खुद बाहरी समर्थन पे टिका है

रौशनी तभी है जब जुगनुओं की रहम है .

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

डाँ.नन्दलाल भारती

एम.ए. । समाजशास्त्र। एल.एल.बी. । आनर्स ।

पी.जी.डिप्लोमा-एच.आर.डी.

। । श्रमवीर। ।

खेवसीपुर वाली महन्थ नानी कहने को तो अनपढ़ थी। पराधीन भारत में वे भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ मुहिम चला रखी थी। नाना कालूराम शिवनरायनी परम्परा के बड़े महन्थ थे उन्हें लोग आदर के साथ नानाजी कहने लगे थे। शोषित समाज के उत्थान के लिये वे आजीवन संघर्षरत रहे। उनके शिष्यों की संख्या हजारों में थी। उनके संदेशों पर अमल करने वाले कई लोग शैक्षिक और आर्थिक विकास की धारा से भी जुड़ रहे थे। अचानक बड़े महन्थजी का देवलोक गमन हो गया। महन्थजी के देवलोक गमन के बाद उनकी धर्मपत्नी महन्थदेवी ने उनकी गद्दी संभाल ली जो बाद में चलकर खेवसीपुर वाली महन्थ नानी के नाम से मशहूर हुई। महन्थ नानी नाना कालूराम के मिशन को आगे बढ़ाने में जुट गयी। वे अपने शिष्यों के साथ पुत्रवत् व्यवहार करती वे अपने संदेश में कहती बच्चों मन से हीन भावना को कोसों दूर रखो जातिवाद एक भ्रम है। कमजोर वर्ग का आदमी साजिश का शिकार है। हर आदमी में शूद्र वैश्य,क्षत्रीय और ब्राहमण के गुण विद्यमान होते हैं। एक वर्ग को अछूत मानकर उसका शोषण करना दैवीय सत्ता के खिलाफ है। बच्चों सदकर्म की राह चलो जमाना तुमको एक दिन सिर पर बिठायेगा। नानी का आध्यात्मिक संदेश कई लोगों के जीवन बदल दिये थे। भले ही नानी को अछूत वर्ग का होने के कारण प्रचार-प्रसार जो साधन उपलब्ध थे उनसे कोसों दूर थे पर पर उनके शिष्यों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही थी। खेवसीपुर वाली नानी की प्रसिद्धि निम्न वर्णिक समाज में खूब थी पर कुछ उच्च वर्णिक लोग भी नानी के महन्थई पर यकीन करने लगे थे। नानी के संदेश उनके घर-मंदिर से सैकड़ों कोस दूर से श्रमवीर को खींच लाया। श्रमवीर अंग्रेजों के जमाने में दूसरी जमात तक पढ़ लिख गया। लिखना पढ़ना उसे अच्छी तरह से आता था। अंग्रेजो की गोदाम में कामगार हो गया था। वह नानी की शरण में पहुंचा। नानी ने उसे अतिथि देवो भवः का सम्मान करते हुए उच्च आसन पर बिठाया। श्रमवीर के माथे पर उदासी के मंड़राते बादल देखकर नानी बोली बेटा तुम्हारी क्या परेशानी है।

श्रमवीर-मैं आपका शिष्य बनने की तमन्ना लेकर कोसों दूर से आया हूं।

नानी-बेटा मेरा शिष्य बनने के लिये घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। घर-परिवार के अपने दायित्वों को निभाते हुए भक्ति परम्परा पर खरे उतर सकते हो। नानी ने उसके घर-परिवार हित-मित के बारे में कुशल क्षेम पूछी। पत्नी, बच्चों- बुद्धायन, शरणायन, गीतायन, संन्ध्यान की जानकारी ली।

श्रमवीर-महन्थ नानी को घर परिवार के बारे में विस्तार से बताते हुए बोला माता मैं आपकी हर आज्ञा का पालन करूंगा बस मुझे शिष्य बना लीजिये।

नानी ने श्रमवीर के कान में बिना किसी औपचारिकता के गुरू-मन्त्र फूंक दिया था।

श्रमवीर दीक्षा लेकर अपने गांव लौट आया। नानी के संदेशों को दूर -दूर फैलाने में जुट गया।

बेटा बुद्धायन,शरणायन,बेटी गीतायन और संन्ध्यान स्कूल जाने लगे थे। श्रमवीर भैंस को हौंद पर लगाकर नीम की छांव के नीचे खटिया पर बैठा ही था कि गांव के जमींदार जो प्रधान भी थे आ धमके। डनहे देखकर श्रमवीर खटिया से उठ खड़ा हो गया।

प्रधानजी बोले-अरे श्रमवीर तुम लोगों को आरक्षण क्या सरकार ने दे दी तुम लोग हम जमीदारों के मुकाबले में उतर आये। तुम्हारे बच्चे तो स्कूल जाने लगे है,तुम तो अंग्रेजी सरकार के दमाद थे तुम्हारी औलादें स्वतन्त्र देश की दमाद हो जायेगी। तुम लोगों के लिये जब से स्कूल के दरवाजे खुले है तब से तो तुम लोग सरकारी बा्रहमण हो गये हो।

श्रमवीर-माथे ठोंकते हुए बोला प्रधानजी हमसे क्या गुस्ताखी हो गयी कि इतना ताना महना मार रहे हैं।

प्रधानजी-तुमसे क्या होगी ? हमसे हो गयी हमारे पूर्वजो से हो गयी कहते हो साइकिल आगे बढ़ा दिये। प्रधानजी के जाने के बाद घण्टों वह प्रधान की बात पर विचार मंथन करता रहा पर मर्म नहीं समझ पाया। घण्टों बाद बात भेजे में उतरी तो वह जोर से चिल्ला उठा अरे संध्यायन की मां आज तो गजब हो गया प्रधान जी अपनी ही नहीं पुरखों की गलती पर अफसोस जता गया। वह बोली हम लोग तो ठहरे सीधे-साध ये बाबू लोग ऐसे ही मीठी बोल-बोल कर हमारी जड़ उखाड़ते रहे हैं। अब तो बाबू लोगों की बात पर विश्वास नहीं होता।

श्रमवीर-देखो भागवान जमाना बदल गया है,बाबूलोग भी बदल रहे हैं,सरे-राह ऐसी बात एक दबंग जमींदार के मुंह से निकलना बदलाव की बयार है।

संध्यायन की मां बुद्धिमती बोली-यही लोग तो तुमको सरकारी ब्राहमण,सरकारी दमाद और बहुत कुछ कहकर अपमान करते हैं।

श्रमवीर-तुम क्या चाहती हो बच्चों को इंजीनियर बनाकर मिलिट्री और दूसरी सरकारी नौकरी में ना भेजूं।

बुद्धिमती-मैंने तो मना नहीं किया पर मरे बच्चे सरकारी दमाद नहीं बनेंगे।

श्रमवीर-मतलब......................?

बुद्धिमती-मेरे बेटी-बेटे बिना-रिजर्वेशन वाली नौकरी में जायेगे या तो............

श्रमवीर-या तो का मतलब ?

बुद्धिमती-देखो हमारे पुरखों की समझदारी की वजह से अपनी जमीन बची है। तुम खेतीबारी के काम के साथ राशन की दुकान भी चला रहे हो। तुम्हारे श्रम की बरक्त की वजह से कोई कमी नहीं है। क्यों न तुम बच्चों के व्यापार के ज्ञान देते । अरे अपने समाज के लोग जिनके पास कोई आसरा नहीं हैं,उन्हें सरकारी नौकरी करने दो।

श्रमवीर-बात तो दिमाग झकझोरने वाली कर रही हो । मांता महन्थदेवी का आगमन होने वाला है बच्चों के सामने उनसे रायशुमारी करेंगे। काश तुम्हारे जैसे सभी अपने वाले सक्षम लोग सोच लेते तो कम से कम हमारे शोषित समाज के बहुत लोगों का उद्धार हो जाता।

बुद्धिमती-बुद्ध किसी वक्त राजा थे,दुनिया के हित के लिये राजपाट और अपना परिवार छोड़कर जंगल चले गये थे आज उन्हें भगवान कहा जाता है,उनकी पूजा आराधना हो रही है। अपने बच्चे भी तो बुद्धम् शरणम् गच्छामि का मन्त्र बोलने लगे हैं।

श्रमवीर-बच्चों का भविष्य उन्हें निश्चित करने दो। हम तो उनके पालक है। लालन-पालन,उनको उचित शिक्षा-दीक्षा देना अपना दायित्व है।

बुद्धिमती-अरे खेवसीपुर वाली माताजी के शिष्य वह तो बड़ी ईमानदारी से कर रहे हो।

श्रमवीर-ठीक है माताजी पर छोड़ दो।

बुद्धिमती-चलो बच्चों को भूख लग रही है खाना खा लो।

श्रमवीर-क्या बच्चों को भूख लग रहे हैं हम है कि गप्पें लड़ा रहे हैं। रात में ही तो पूरे परिवार को एक साथ बैठकर खाने का मौका मिलता है। सुबह तो चारों बच्चों का स्कूल कालेज जाने का अलग-अलग टाइम होता है,वही हाल आने का भी। चलो खाना खा लेते हैं।

गीतायन रोटी तोड़ते हुए बोली मां बापू कौन सी गप्पों की बात कर रहे थे।

श्रमवीर-लो मेरी बात इनके कान तक पहुंच गयी।

संध्यायन-बापू कैसी बात करते हो आपकी बात हमारे कोनों को नहीं छुयेगी ?

बुद्धिमती-बेटा खाते समय बातें नहीं करते तुम्हारे बापू कहते हैं ना ।

गीतायन-मां टाल रही हो।

श्रमवीर-टालने जैसी कोई बात नहीं है बेटा,मेरी गुरू मां का आगमन होने वाला है।

बुद्धायन-कब खेवसीपुर वाली नानी मां के चरणों से हमारा घर धन्य होने वाला है।

शरणायन-क्या.......? हमारे घर नानी मां आ रही है।

बुद्धिमती- हां बेटा। खाना खाओ। माता अपने घर विश्राम करेगी।

शरणायन-भईया ठीक कह रहा है हमारा घर धन्य हो जायेगा,महन्थ नानी मां के पांव पड़ते ही।

महीनों बाद नानी मां का आगमन श्रमवीर के गांव में हुआ सभी लोग नानीमां की आगवानी किये। नानीमां सप्ताह भर गांव में रूकी हर शाम उनका उपदेश होता नानीमां अधिकतर शिक्षा,सामाजिक समानता और देशप्रेम के मुद्दे पर दिल को छू लेने वाली अमृत वचन सुनाती थी। नानीमां कहती थी सभी तरक्कियों की चाभी शिक्षा है। तरक्की से दूर फेंके गये लोगों को शिक्षा को हथियार बनाना चाहिये। बिना शिक्षा के आदमी अपाहिज समान है। सेठ-साहूकारों ने कमजोर तबके लोगों के अनपढ़ होने का भरपूर फायदा उठाया है। सौ रूपये के कर्ज देकर हजारों पर अंगूठा लगवा लेते थे । आज जबकि देश को आजाद हुए पच्चास साल हो गये इसके बाद भी अनपढ़ों के साथ हादसे हो रहे हैं। शिक्षित आदमी को हर जगह मान-सम्मान मिलता है। लड़कों के साथ लड़कियों को भी पढ़ाना जरूरी हो गया है। जब घर में पढ़ी लिखी बहू आयेगी तो ऐसी बहू आने से तरक्की स्वयं चलकर आयेगी। नानीमां शिक्षा पर बहुत जोर देती थी। बीच-बीच में श्रमवीर के बच्चों का जिक्र भी कर देती थी क्योंकि श्रमवीर का मानना था कि बच्चों को विरासत में धन नहीं शिक्षा,वह भी ऐसी शिक्षा देनी चाहिये जिससे बच्चा अपने पांव पर खड़ा हो सके। नानीमां अपने संदेश में शिष्य श्रमवीर का उदाहरण पेश करती थी। रविदास और कबीर के दोहों से नानीमां अपना शिष्यों को संदेश देना प्रारम्भ करती थी और अन्त भी।

आखिरी संदेश के बाद नानीमां की आंखे भर आयी थी। श्रमवीर का गांव छोड़ते हुए उन्हें तकलीफ तो हुई,गांव वाले भी उन्हें नहीं देना जाना चाहते थे। नानीमां बोली शिष्यों जैसे पानी एक जगह रूक सड़ने लगता है वैसे ही साधु का जीवन होता है, भले ही मैं गृहस्त हूं पर गृहस्ती का भार मेरे उपर नहीं है,सब कुछ तीनों बेटों को सौंप कर महन्थ का जीवन जी रही हूं। अब मैं संदेश देकर चलते रहना मैं अपना कर्म समझती हूं।

नानीमां के विश्राम का इन्तजाम श्रमवीर के आवास पर था। रात में परिवार के साथ श्रमवीर घण्टों बतियाता रहता था। अलसुबह नानीमां को प्रस्थान करना था । श्रमवीर नानीमां से बोला नानीमां एक प्रश्न मेरे दिल में मेरे बच्चों के भविष्य को लेकर है,आज्ञा दे तो पूछूं।

नानीमां-श्रमवीर के उपर मातृत्व भरा हाथ फेरते हुए बोली पूछो बेटवा।

श्रमवीर गदगद होकर बोला नानी मां बच्चों के भविष्य में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

नानीमां-बच्चों को खुद अपनी राह चुनने दो।

श्रमवीर-दोनों बेटे बोलते हैं नौकरी नहीं करना है सरकारी दमाद नहीं कहलाना है। नानीमां बच्चों को इंजीनियर बनाने का क्या फायदा।

नानीमां-बच्चे क्या करना चाहते हैं।

श्रमवीर-दोनों नौकरी करने की नहीं नौकरी देने की बात करते हैं। बेटियां शिक्षा की मशाल जलाना चाहती है।

नानीमां-बच्चों की तो बहुत उंची सोच है श्रमवीर बेटा।

श्रमवीर-नानीमां इतनी उंची-उंची शिक्षा लेकर बच्चे नौकरी नहीं करने को कह रहे हैं,आप कह रही है उंची सोच है। ये कैसी सोच मां ।

नानीमां-बच्चों का सपना उद्योग लगाना है।

श्रमवीर-नानीमां उद्योग खड़ा करने के लिये तो बहुत रकम की जरूरत होगी। मैं कोई उद्योगपति खानदान का नहीं,ठहरा निम्न वर्णिक बच्चों का सपना कैसे पूरा कर सकूंगा।

नानीमां-बच्चों की मंशा अच्छी है,ज्ञान की पूंजी उनके पास है। जरूर सफल होगे। तुम उनका साथ दो। शिक्षा की पूंजी तुम्हारे खानदान में आ चुकी है। मुझे विश्वास है दोनों बेटे बुद्धायन और शरणायन उच्च उद्योगपति बनकर तुम्हारा ही नहीं तुम्हारे गांव का नाम रोशन करेंगे। बेटियां गीतायन और संन्ध्यायन ने शिक्षा की मशाल जलाने का प्रण कर चुकी है। अपने लिये रास्ता भी बनाने लगी है। उनके पांव जमने के बाद सुयोग वर तलाश की उनका ब्याह गौना कर दो। डां अम्बेडकर बाबा ने कहा ही है शिक्षित बनो संघर्ष करो अब वक्त आ गया है शिक्षित होकर सम्पन्न बनने का विकास करने का। श्रमवीर बेटा बच्चों को अपने भविष्य का फैसला लेने दो । बैसाखी मत बनो बच्चे उच्च शिक्षित है जो करेंगे अच्छा करेंगे, विश्वास रखो इससे तुम्हारे कुनबे का मान-सम्मान बढ़ेगा ।

बुद्धायन बोला-नानीमां यही तो हम भी कह रहे हैं पर बापूजी हैं कि मानते नहीं। रोज-रोज अखबार में छपे नौकरी का इश्तहार लेकर आ जाते हैं कहते हैं यह नौकरी अच्छी रहेगी। नानीमां हम दोनों भाईयों ने नौकरी नहीं करने का मन बना लिया है। बहनें भी अपनी राह चुन चुकी हैं।

श्रमवीर-तुम दोनों नौकरी नहीं करोगे तो क्या करोगे ।

बुद्धायन और शरणायन-उद्योग स्थापित करेंगे।

श्रमवीर-करोड़ों की पूंजी कहां से आयेगी फिर क्या भरोसा उद्योग चलेगा।

बुद्धायन-विश्वास करो बापूजी आपका मान जरूर बढेगा। रही बात पूंजी की तो सरकार कर्ज देती है उद्योग लगाने के लिये।

श्रमवीर-मुझे तो डर लग रहा है,हम तो उद्योगपति घराने से नहीं रहे।

बुद्धायन-बापूजी जोखिम तो उठाना पड़ेगा कुछ बनने के लिये। नौकरी में भी तो खतरे हैं। जातीय भेद के कारण अपरोक्ष रूप उच्च शिक्षितों को दण्डित किया जाता है। निम्न वर्र्णिक अफसरों कर्मचारियों की चरित्रावली खराब कर दी जाती है। उनका विकास रूक जाता है,कई उच्च शिक्षित निम्न वर्णिक कर्मचारियों ने आत्महत्या तक कर लिये हैं। कालेज के छात्रों का भविष्य सुरक्षित नहीं है। जातीयता को आधार बनाकर उनका मूल्याकंन होता है,कई होनहारों ने आत्महत्या कर लिये हैं। बापूजी दोनों तरफ खतरे हैं। जिस राह पर हम दोनों भाई जाने की सोच रहे हैं उसके लिये हम खुद जिम्मेदार होंगे।

नानीमां-श्रमवीर तुमको तो और खुश होना चाहिये कि तुम्हारे औलादें फैसला लेने की कूवत रखती हैं। मेरा आर्शीवाद है बुद्धायन,शरणायन,गीतायन और संन्ध्यायन जो भी फैसले लेंगे तुम्हारे लिये ही नहीं दूसरे और नवजवानों के लिये प्रेरणादायी होगा।

श्रमवीर-मुझे अब कुछ नहीं कहना है नानीमां आपका आशीष बच्चों के साथ हैं तो मुझे डर कैसा ?

दूसरे दिन अलसुबह नानीमां प्रस्थान कर गयी। बुद्धायन और शरणायन उद्योग स्थापित करने से पहले कुछ महीनों की ट्रेनिंग के लिये शहर चले गये। ट्रेनिंग के बाद दोनों भाईयों ने मिलकर श्रमवीर इंजिनियरिंग कम्पनी की स्थापना कर दिये। धीरे-धीरे कम्पनी की साख में वृद्धि होने लगी। कम्पनी का कारोबार चल निकला। क्पनी का टर्नओवर करोड़ों का हो गया। बुद्धायन और शरणायन की जिद रंग लायी। बुद्धायन और शरणायन की खुली आंखे का सपना सच हुआ। दोनों भाई बिना किसी धार्मिक एवं जातीय भेदभाव के नवजवानों को नौकरी देने लगे। श्रमवीर इंजिनियरिंग कम्पनी मानवीय समानता की मिशाल साबित होने लगे। बुद्धायन और शरणायन कम्पनी के आम कर्मचारियों के साथ काम करते,इससे कर्मचारियों का मनोबल बढ़ गया था। कर्मचारी खुद की कम्पनी समझकर बड़े ईमानदारी से काम करते थे। बुद्धायन और शरणायन कम्पनी के निदेशक होकर भी आम कर्मचारियों के साथ काम करते और उनकी तरह कम्पनी से तनख्वाह लेते थे। कम्पनी को जो मुनाफा होता उसका आधा हिस्सा कर्मचारियों में बांट जाता था,25 प्रतिशत कम्पनी के विकास पर बाकी कर्मचारियों के वेलफेयर,चिकित्सा,शिक्षा और समाजिक कार्यो पर खर्च होने लगा था। कम्पनी के अध्यक्ष श्रमवीर ने एक योजना चालू कर दी थी,कम्पनी का जो भी कर्मचारी अपने बच्चे को उंची शिक्षा दिलाने में असमर्थता होगे उनके बच्चे की शिक्षा का भार कम्पनी बिना किसी ब्याज के ऋण के कर्ज देकर शिक्षा पूरी करवाने भार वहन करेगी। यदि कर्र्मचारी के पुत्र-पुत्री के शिक्षा पूरी करने के बाद कम्पनी में नौकरी करना चाहेंगे तो उन्हें योग्यतानुसार नौकरी भी देगीं। श्रमवीर के इस योजना का कम्पनी को बड़ा लाभ हुआ। कम्पनी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगी। श्रमवीर अब सेठ श्रमवीर महन्थायन हो गये थे। बुद्धायन और शरणायन ने मानवीय समानता के प्रतीक के रूप में कम्पनी के मुख्य कार्यालय परिसर में भगवान बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा का निर्माण करवा दिया था। सेठ श्रमवीर महन्थायन से कुछ विदेशी पत्रकारों ने उनकी तरक्की का कारण जानना चाहा तो उन्होंने बेहिचक बुद्धायन और शरणायन की उच्च शिक्षा के साथ कुछ नया करने की जिद बताया। सच भी है शिक्षा ही तो है जो सर्व-उन्नति की जननी है। ऐसे ही शिक्षा की जरूरतों आज देश के शोषित-पीड़ित समाज के नवयुवकों के लिये। देखना है भारतीय समाज और सरकार कब अपने फर्ज पर खरी उतरती थी

-------

डाँ.नन्दलाल भारती...19.03.2013

आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर । म.प्र। -452010,

Email- nlbharatiauthor@gmail.com

 

http://www.nandlalbharati.mywebdunia.com

http;//www.nandlalbharati.blog.co.in/

http:// nandlalbharati.blogspot.com http:// http;//www.hindisahityasarovar.blogspot.com/ httpp://wwww.nlbharatilaghukatha.blogspot.com/ httpp://wwww.betiyaanvardan.blogspot.com

httpp://www.facebook.com/nandlal.bharati

000000000

जनप्रवाह। साप्ताहिक। ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

उपन्यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त

नेचुरल लंग्वेज रिसर्च सेन्टर,आई.आई.आई.टी.हैदराबाद द्वारा भाषा एवं शिक्षा हेतु रचनाओं पर शोध कार्य ।

सूरज भैया


              अम्मा बोली सूरज भैया जल्दी से उठ जाओ।
              धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।  
 
             मुर्गे थककर हार गये हैं कब से चिल्ला चिल्ला।
             निकल घोंसलों से गौरैयां मचा रहीं हैं हल्ला।।
             तारों ने मुँह फेर लिया है तुम मुंह धोकर जाओ।।
            धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।  
 
             पूरब के पर्वत की चाहत तुम्हें गोद में ले लें।
             सागर की लहरों की इच्छा साथ तुम्हारे खेलें।।
             शीतल पवन कर रहा कत्थक धूप गीत तुम गाओ।।
             धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।  


 image


             सूरज मुखी कह रहा" भैया अब जल्दी से  आएं।
             देख आपका सुंदर मुखड़ा हम भी तो खिल जायें।।'
            जाओ बेटे जल्दी से जग के दुख दर्द मिटाओ
            धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।  
 
            नौ दो ग्यारह हुआ अंधेरा कब से डरकर भागा।
            तुमसे भय खाकर ही उसने राज सिंहासन त्यागा।।
            समर क्षेत्र में जाकर दिन पर अपना रंग जमाओ।।
           धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।  
 
            अंधियारे से क्यों डरना कैसा उससे घबराना। 
            जहां उजाला हुआ तो निश्चित है उसका हट जाना।।
            सोलह घोड़ों के रथ चढ़कर निर्भय हो तुम जाओ।।
           धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।  
        
           
           --


             

निश्चित सात रोज़ाना


                    हार्न‌ बजाकर बस का आना,
                    निश्चित समय सात रोज़ाना।

                            चौराहों पर सजे सजाये,
                            सारे बच्चे आँख गड़ाये,
                            नज़र सड़क पर टिकी हुई है.,
                            किसी तरह से बस आ जाये।
                            जब आई तो मिला खज़ाना।
                            निश्चित समय सात रोज़ाना।

                      सात बजे सूरज आ जाता,
                      छत आँगन से चोंच लड़ाता,
                       कहे पवन से नाचो गाओ,
                      मंदिर में घंटा बजवाता।
                       कभी न छोड़े हुक्म बज़ाना।
                        निश्चित समय सात रोज़ाना।
      
                           सात बजे आ जाता ग्वाला,
                           दूध नापता पानी वाला,
                           मम्मी पापा पूछा करते,
                           रास्ते में मिलता क्या नाला।
                           न ,न करके सिर मटकाना।
                          निश्चित समय सात रोज़ाना।

                       सात बजे दादा उठ जाते,         
                     "भेजो चाय"यही चिल्लाते,
                      कभी समय पर नहीं मिली तो,
                      सारे घर को नाच नचाते।
                     बहुत कठिन है उन्हें मनाना।
                     निश्चित समय सात रोज़ाना।

image

धुंधली तस्वीर
(अँधेरे से दो शक्लें उभरती हैं- जावेद दूल्हा बना हुआ और मरियम दुल्हन) ।

निहाँ अब्र में १ चाँद कब तक रहेगा
भला इश्क से हुस्न कब तक छुपेगा
तू शर्माई जाती है मेरी नजर से
हिजाब' और गुल को नसीम-ए-सहर से
तू क्या मेरी फित्रत की महरम' नहीं है?
तू क्या मेरे बचपन की मरियम नहीं है?
गुजारी जो रातें तिरी आरजू में
सिमट आई हैं काकुल-ए-मुश्कनूजू में
जो पलकें हया से झुकी जा रही हैं
वो कुछ और दिल में चुभी जा रही हैं
तिरे रुख पे' हुस्न-ओ-मुहबत का हाला
यही है मेरी जिन्दगी का उजाला
ये शपफ़ाफ़ आँखें, ये आँखों के डोरे
छलक जाएँ जैसे गुलाबी कटोरे
जो हाथों को रंग-ए-हिना मिल गया है
हथेली पे' गोया कँवल खिल गया है
मुहब्बत की रातों की कंदील तू है
जवानी के ख्वाबों की तकमील' तू है
यह इक आँच सी तेरी नीची नजर में'
तिरे हुस्न से रौशनी मेरे घर में
तकल्लुम से नग्मों की दुनिया जगा दे
तबस्तुम' से फूलों को हँसना सिखा दे
(मरियम जरा मुस्कुराती है )
तिरी मुस्कुराहट में क्या दिलकशी है
यह फूलों पे सोई हुई चाँदनी है
मगर रूह की प्यास क्यूँकर बुझेगी '
समन्दर से क्या सिर्फ शबनम मिलेगी '
मुहब्बत है, नग्मा है, मै है, सुबू है
मिरें वास्ते जो भी कुछ है वो तू है
तिरी खामुशी कह रही है फसाना
तजाहुल है तेरा बड़ा आरिफ़ाना

हमारे दिलों की है हसरत पुरानी

हमारी शराब-ए-मुहब्बत पुरानी

वो गुजरी हुई शाम है याद अब तक
वो है मेरे सीने में आबाद अब तक
दिन आहिस्ता-आहिस्ता ढलने लगा था
फजाओं में सोना पिघलने लगा था
धुंधलके की परछाइयाँ नाचती थीं
हर इक सिम्त अँगड़ाइयाँ नाच ती थीं
उफुक पर किरन ख्वाब सा बुन रही थी
दुपट्टे को अपने शफ़क़ चुन रही थी
तिरी रूह-ओ-दिल पर थे बादल से छाए
खड़ी थी मिरे पास गर्दन झुकाए
मगर नकहतें अपनी बरसा रही थी
तिरे पैरहन से महक आ रही थी

तिरे सर से आँचल जो ढलका हुआ था
मिरे खून में साज सा बज रहा था
उसी रात की तर्ह पलकें झुकी थीं
धड़कता था दिल और नब्जें रुकी थीं।
किया प्यार सूरज ने झुक कर जमी को
सजाया सितारों से शब ने जबीं को
फिसल कर सियह जुल्फ शानों पर आई
तिरे रुख पे इक शम्अ सी झिलमिलाई
मुझे तूने देखा निगाहें उठाकर
कहा फिर इशारों में कुछ मुस्कुराकर
समझ कर निगाहों का पैगाम हमने
मुहब्बत का पहला पिया जाम हमने
इसी जाम ने हमको सरशार रक्खा
हमारी तमन्ना को बेदार रक्खा
जुदाई में भी सब्र करना सिखाया
हमें आग पर से गजरना सिखाया
मुरादों की माँगी हुई रात है यह
कि बिछडे हुओं की मुलाकात है यह


(मरियम जावेद की तरफ़ मुहब्बत भरी नजरों से देखती है और फिर पलकें झुका
लेती है । उसकी आँखों से दो चमकते हुए आँसू टपक पड़ते हैं और चंपई रुख्सारों
पर चाँदनी की दो लकीरें-सी खिंच जाती हैं । )

मरियम-

मिरी सारी दौलत मुहब्बत के आँसू

जावेद –

मुहब्बत के आँसू, मसर्रत के आँसू
ये आँसू है टूटे दिलों के सहारे
ये तकदीर-ए-आदम' के रौशन सितारे
तिरी सारी हस्ती तिरी चश्म-ए-नम' में
मिरे घर की बरकत है तेरे कदम में
हर इक रंज-ओ-राहत' की साथी है औरत
जहन्नुम को जन्नत बनाती है औरत
जबीं पर तजल्ली' की अंजुम फिशानी'
नजर मे जुलेख़ा की हँसती जवानी
वो गमख्वार भी और दिलदार भी है
वो है साज भी, नग्मा भी, नग्मासार भी
गुलिस्ताँ भी, गुल भी, नसीम-ए-सहर भी

मरियम-

मुझे भी तो है याद वो रात अब तक
है मुट्ठी में मेरी वो लम्हात अब तक
कली की तरह जो खिले जा रहे थे
जो घुलकर लहू में मिले जा रहे थे
तमन्नाएँ लहराती वीं ख्वाब बनकर
बरसते थे जुगनू अँधेरे से छनकर
हिजाब उठ गए थे जमान-ओ-मकाँ के'
दरीचे थे वा लल्लत-ए-जाविदाँ के
रगों मे मिरी दौड़ते थे शरारे
मिरे गिर्द थे रक्स में चाँद तारे
वो रात आई थी एक तूफान बनकर
समन्दर के सीने का हैजान' बनकर
मुहब्बत की कैफ़ आफ़रीं'' रात थी वो
जवानी की सबसे हसीं रात थी वो

जावेद-

वो रात आज तक हुस्न बरसा रही है
वो रात आज की रात लहरा रही है

image

भीष्‍म साहनी

गंगो का जाया

गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुन्‍ज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसायी हुई पृथ्‍वी अपने पहले ठण्‍डे उच्‍छ्‌वास छोड़ रही थी, और शहर-भर के बच्‍चे-बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्‍वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था। मजदूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्‍थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्‍पर्श ले लेती। पर हर शगुन के अपने चिन्‍ह होते हैं। गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्‍य की आवाज़ सुन ली थी।

नौकरी छूटने में देर नहीं लगी। गंगो जिस इमारत पर काम करती थी, उसकी निचली मंजिल तैयार हो चुकी थी, अब दूसरी मंजिल पर काम चल रहा था। नीचे मैदान में से गारे की टोकरियाँ उठा-उठाकर छत पर ले जाना गंगो का काम था।

मगर आज सुबह जब गंगो टोकरी उठाने के लिए ज़मीन की ओर झुकी, तो उसके हाथ ज़मीन तक न पहुँच पाये। ज़मीन पर, पाँव के पास पड़ी हुई टोकरी को छूना एक गहरे कुएँ के पानी को छूने के समान होने लगा। इतने में किसी ने गंगो को पुकारा, “मेरी मान जाओ गंगो, अब टोकरी तुमसे न उठेगी। तुम छत पर इर्ंट पकड़ने के लिए आ जाओ।”

छत पर, लाल ओढ़नी पहने और चार इर्ंटें उठाये, दूलो मजदूरन खड़ी उसे बुला रही थी।

गंगो ने न माना और फिर एक बार टोकरी उठाने का साहस किया, मगर होंठ काटकर रह गयी। टोकरी तक उसका हाथ न पहुँच पाया।

गंगो के बच्‍चा होने वाला था, कुछ ही दिन बाकी रह गये थे। छत पर बैठकर इर्ंट पकड़नेवाला काम आसान था। एक मज़दूर, नीचे मैदान में खड़ा, एक-एक इर्ंट उठाकर छत की ओर फेंकता, और ऊपर बैठी हुई मज़दूरन उसे झपटकर पकड़ लेती। मगर गंगो का इस काम से ख़ून सूखता था। कहीं झपटने में हाथ चूक जाये, और उड़ती हुई इर्ंट पेट पर आ लगे तो क्‍या होगा?

ठेकेदार हर मज़दूर के भाग्‍य का देवता होता है। जो उसकी दया बनी रहे तो मज़दूर के सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, पर जो देवता के तेवर बदल जायें तो अनहोनी भी होके रहती है। गंगो खड़ी सोच ही रही थी कि कहीं से, मकान की परिक्रमा लेता हुआ ठेकेदार सामने आ पहुँचा। छोटा-सा, पतला शरीर, काली टोपी, घनी-घनेरी मूँछों में से बीड़ी का धुआँ छोड़ता हुआ, गंगो को देखते ही चिल्‍ला उठा-

“खड़ी देख क्‍या रही है? उठाती क्‍यों नहींऋ जो पेट निकला हुआ था, तो आयी क्‍यों थी?”

गंगो धीरे-धीरे चलती हुई ठेकेदार के सामने आ खड़ी हुई। ठेकेदार का डर होते हुए भी गंगो के होंठों पर से वह हल्‍की-सी स्‍निग्‍ध मुस्‍कान ओझल न हो पायी, जो महीने-भर से उसके चेहरे पर खेल रही थी, जब से बच्‍चे ने गर्भ में ही अपने कौतुक शुरू कर दिये थे और गंगो की आँखें जैसे अन्‍तर्मुखी हो गयी थीं। ठेकेदार झगड़ता तो भी शान्‍त रहती, और जो उसका घरवाला बात-बात पर तिनक उठता, तो भी चुपचाप सुनती रहती।

“काम क्‍यों नहीं करूँगी? छत पर इर्ंटें पकड़ने का काम दे दो, वह कर लूँगी।” गंगो ने निश्‍चय करते हुए कहा।

“तेरे बाप का मकान बन रहा है, जो जी चाहा करेगी? चल, दूर हो यहाँ से। आधे दिन के पैसे ले और दफ़ा हो जा। हरामख़ोर आ जाते हैं...”

“तुम्‍हें क्‍या फ़रक पड़ेगा, दूलो मेरा काम कर लेगी, मैं उसकी जगह चली जाऊँगी, काम तो होता रहेगा।”

“पहले पेट खाली करके आओ, फिर काम मिलेगा।”

क्षण-भर में ठेकेदार का रजिस्‍टर खुल गया और गंगो के नाम पर लकीर फिर गयी।

ऐन उसी वक़्‍त बारिश का छींटा भी पड़ने लगा था। गंगो ने समझ लिया कि जो आसमान में बादल न होते तो काम पर से भी छुट्‌टी न मिलती। आकाश में बादल आये नहीं कि ठेकेदार को काम ख़त्‍म करने की चिन्‍ता हुई नहीं। इस हालत में गर्भवाली मज़दूरन को कौन काम पर रखेगा। गंगो चुपचाप, ओढ़नी के पल्‍ले से अपने गर्भ को ढँकती हुई बाहर निकल आयी।

उन दिनों दिल्‍ली फिर से जैसे बसने लगी थी। कोई दिशा या उपदिशा ऐसी न थी, जहाँ नयी आबादियों के झुरमुट न उठ रहे हों। नये मकानों की लम्‍बी कतारें, समुद्र की लहरों की तरह फैलती हुई, अपने प्रसार में दिल्‍ली के कितने ही खण्‍डहर और स्‍मृति-कंकाल रौंदती हुई, बढ़ रही थीं। देखते- ही-देखते एक नयी आबादी, गर्व से माथा ऊँचा किये, समय का उपहास करती हुई खड़ी हो जाती। लोग कहते, दिल्‍ली फिर से जवान हो रही है। नयी आबादियों की बाढ़ आ गयी थी। नया राष्‍ट्र, नये निर्माण-कार्य, लोगों को इस फैलती राजधानी पर गर्व होने लगा था।

जहाँ कहीं किसी नयी आबादी की योजना पनपने लगती, तो सैकड़ों मज़दूर खिंचे हुए, अपने फूस के छप्‍पर कन्‍धों पर उठाये, वहाँ जा पहुँचते, और उसी की बगल में अपनी झोंपड़ों की बस्‍ती खड़ी कर लेते। और जब वह नयी आबादी बनकर तैयार हो जाती, तो फिर मज़दूरों की टोलियाँ अपने फूस के छप्‍पर उठाये, किसी दूसरी आबादी की नींव रखने चल पड़तीं। मगर ज्‍योंही बरसात के बादल आकाश में मँडराने लगते, तो सब काम ठप्‍प हो जाता, और मज़दूर अपने झोंपड़ों में बैठे, आकाश को देखते हुए, चौमासे के दिन काटने लगते। कई मज़दूर अपने गाँवों को चले जाते, पर अधिकतर छोटे-मोटे काम की तलाश में सड़कों पर घूमते रहते। काम इतना न था जितने मज़दूर आ पहुँचते थे। दिल्‍ली के हर खण्‍डहर की अपनी गाथा है, कहानी है, पर मज़दूर की फूस की झोंपड़ी का खण्‍डहर क्‍या होगा, और कहानी क्‍या होगी? हँसती-खेलती नयी अबादियों में इन झोंपड़ों का या इन नये झोंपड़ों में खेले गये नाटकों का, स्‍मृति-चिन्‍ह भी नहीं मिलता।

उस रात गंगो और उसका पति घीसू, देर तक झोंपड़े के बाहर बैठे अपनी स्‍थिति का सोचते रहे।

“जो छुट्‌टी मिल गयी थी तो घर क्‍यों चली आयी, कहीं दूसरी जगह काम देखती।”

“देखा है। इस हालत में कौन काम देगा? जहाँ जाओ, ठेकेदार पेट देखने लगते हैं।”

झोंपड़े के अन्‍दर उनका छः बरस का लड़का रीसा सोया पड़ा था। घीसू कई दिनों से चिन्‍तित था, तीन आदमी खानेवाले, और कमानेवाला अब केवल एक और ऊपर चौमासा और गंगो की हालत! उसका मन खीज उठा। अगर और पन्‍द्रह-बीस रोज मज़दूरी पर निकल जाते, तो क्‍या मुश्‍किल था? गर्भवाली औरतें बच्‍चा होनेवाले दिन तक काम पर जुटी रहती हैं। घीसू गठीले बदन का, नाटे कद का मज़दूर था, जो किसी बात पर तिनक उठता तो घण्‍टों उसका मन अपने काबू में न रहता। थोड़ी देर चिलम के कश लगाने के बाद धीरे-धीरे कहने लगा, “तुम गाँव चली जाओ।”

“गाँव में मेरा कौन है?”

“तू पहले से ही सब पाठ पढ़े हुए है, तू इस हालत में जायेगी, तो तुझे घर से निकाल देंगे?”

“मैं कहीं नहीं जाऊँगी। तुम्‍हारा भाई ज़मीन पर पाँव नहीं रखने देगा। दो दफे तो तुमसे लड़ने-मरने की नौबत आ चुकी है।”

“तो यहाँ क्‍या करेगी? मेरे काम का भी कोई ठिकाना नहीं। सुनते हैं सरकार जियादह मज़दूर लगाकर तीन दिन में बाकी सड़क तैयार कर देना चाहती है।”

“मरम्‍मती काम तो चलता रहेगा?” गंगो ने धीरे-से कहा।

“मरम्‍मती काम से तीन जीव खा सकते हैं? एक दिन काम है, चार दिन नहीं।”

काफ�ी रात गये तक यह उध्‍ोड़-बुन चलती रही।

सोमवार को गंगो काम पर से बरख़ास्‍त हुई, और सनीचर तक पहुँचते-पहुँचते झोंपड़ी की गिरस्‍ती डावाँडोल हो गयी। माँ, बाप और बेटा, तीन जीव खानेवाले, और कमानेवाला केवल एक। गंगो काम की तलाश में सुबह घर से निकल जाती, और दोपहर तक बस्‍ती के तीन-तीन चक्‍कर काट आती। किसी से काम का पूछती तो या तो वह हँसने लगता, या आसमान पर मँडराते बादल दिखा देता। सड़कों पर दर्जनों मज़दूर दोपहर तक घूमते हुए नज़र आने लगे। फिर एक दिन जब घीसू ने घर लौटकर सुना दिया कि सरकारी सड़क का काम समाप्‍त हो चुका है, तो घीसू और गंगो, मज़दूरों के स्‍तर से लुढ़ककर आवारा लोगों के स्‍तर पर आ पहुँचे। कभी चूल्‍हा जलता, कभी नहीं। भर-पेट खाना किसी को न मिल पाता। छोटा बालक रीसा, जो दिन-भर खेलते न थकता था, अब झोंपड़े के इर्दगिर्द ही मँडराता रहता। पति-पत्‍नी रोज़ रात को झोंपड़े के बाहर बैठते, झगड़ते, परामर्श करते और बात-बात पर खीज उठते।

फिर एक रात, हज़ार सोचने और भटकने के बाद घीसू के उद्विग्‍न मन ने घर का खर्चा कम करने की तरकीब सोची। अधभरे पेट की भूख को चिलम के धुएँ से शान्‍त करते हुए बोला, “रीसे को किसी काम पर लगा दें।”

“रीसा क्‍या करेगा, छोटा-सा तो है?”

“छोटा है? चंगे-भले आदमी का राशन खाता है। इस जैसे सब लड़के काम करते हैं।”

गंगो चुप रही। कमाऊ बेटा किसे अच्‍छा नहीं लगता? मगर रीसा अभी सड़क पर चलता भी था, तो बाप का हाथ पकड़कर। वह क्‍या काम करेगा? पर घीसू कहता गया, “इस जैसे लौंडे बूट-पॉलिश करते हैं, साइकिलों की दूकानों पर काम करते हैं, अख़बार बेचते हैं, क्‍या नहीं करते? कल इसे मैं गणेशी के सुपुर्द कर दूँगा, इसे बूट-पॉलिश करना सिखा देगा।”

गणेशी घीसू के गाँव का आदमी था। इस बस्‍ती से एक फर्लांग दूर, पुल के पास छोटी-सी कोठरी में रहता था। एक छोटा-सा सन्‍दूकचा कन्‍धे पर से लटकाये गलियों के चक्‍कर काटता और बूटों के तलवे लगाया करता था।

दूसरे दिन घीसू काम की खोज में झोंपड़े में से निकलते हुए गंगो से कह गया-

“मैं गणेशी को रास्‍ते में कहता जाऊँगा। तू सूरज चढ़ने तक रीसे को उसके पास भेज देना।”

रीसा काम पर निकला। छोटा-सा पतला शरीर, चकित, उत्‍सुक आँखें। बदन पर एक ही कुर्ता लटकाये हुए। गणेशी के घर तक पहुँचना कौन-सी आसान बात थी। रास्‍ते में प्रकृति रीसे के मन को लुभाने के लिए जगह-जगह अपना मायाजाल फैलाये बैठी थी। किसी जगह दो लौंडे झगड़ रहे थे, उनका निपटारा करना ज़रूरी था, रीसा घण्‍टा-भर उन्‍हीं के साथ घूमता रहाऋ कहीं एक भैंस कीचड़ में फँसी पड़ी थीऋ कहीं पर एक मदारी अपने खेल दिखा रहा था, रीसा दिन-भर घूम-फिरकर, दोपहर के वक़्‍त, हाथ में एक छड़ी घुमाता हुआ घर लौट आया।

कह देना आसान था कि रीसा काम करे, मगर रीसे को काम में लगाना नये बैल को हल में जोतने के बराबर था। पर उधर झोंपड़े में बची-बचायी रसद क्षीण होती जा रही थी। दूसरे दिन घीसू उसे स्‍वयं गणेशी के सुपुर्द कर आया, और पाँच-सात आने पैसे भी पॉलिश की डिब्‍बिया और ब्रुश के लिए दे आया।

उस दिन तो रीसा जैसे हवा में उड़ता रहा। दिल्‍ली की नयी-नयी गलियाँ घूमने को मिलीं, नये-नये लोग देखने को मिले। चप्‍पे-चप्‍पे पर आकर्षण था। रीसे की समझ में न आया कि बाप गुस्‍सा क्‍यों हो रहा था, जब उसे यहाँ घूमने के लिए भेजना चाहता था। दूकानें रंगबिरंगी चीज़ों से लदी हुइर्ं और भीड़ इतनी कि रीसे का लुब्‍ध मन भी चकरा गया।

रीसे की माँ सड़क पर आँखें गाड़े उसकी राह देख रही थी, जब रीसा अपने बोझल पाँव खींचता हुआ घर पहुँचा। अपने छः सालों के नन्‍हें-से जीवन में वह इतना कभी नहीं चल पाया था, जितना कि वह आज एक दिन में। मगर माँ को मिलते ही वह उसे दिन-भर की देखी-दिखायी सुनाने लगा। और जब बाप काम पर से लौटा तो रीसा अपना बु्रश और पॉलिश की डिब्‍बिया उठाकर भागता हुआ उसके पास जा पहुँचा, “बप्‍पू, तेरा जूता पॉलिश कर दूँ?”

सुनकर, घीसू के हर वक़्‍त तने हुए चेहरे पर भी हल्‍की-सी मुस्‍कान दौड़ गयी-

“मेरा नहीं, किसी बाबू का करना जो पैसे भी देगा।”

और गंगो और उसका पति, अपने कमाऊ बेटे की दिनचर्या सुनते हुए, कुछ देर के लिए अपनी चिन्‍ताएँ भूल गये।

दूसरा दिन आया। घीसू और रीसा अपने-अपने काम पर निकले। दो रोटियाँ, एक चिथड़े में लिपटी हुइर्ं, घीसू की बगल के नीचे, और एक रोटी रीसे की बगल के नीचे। दोनों सड़क पर इकट्ठे उतरे और फिर अपनी-अपनी दिशा में जाने के लिए अलग हो गये।

पर आज रीसा जब सड़क की तलाई पार करके पुल के पास पहुँचा तो गणेशी वहाँ पर नहीं था।

थोड़ी देर तक मुँह में उँगली दबाये वह पुल पर आते-जाते लोगों को देखता रहा, फिर गणेशी की तलाश में आगे निकल गया। शहर की गलियाँ, एक के बाद दूसरी, अपना जटिल इन्‍द्रजाल फैलाये, जैसे रीसे की इन्‍तज़ार में ही बैठी थीं। एक के बाद दूसरी गली में वह बढ़ने लगा, मगर किसी में भी उसे कल का परिचित रूप नज़र नहीं आया, न ही कहीं गणेशी की आवाज़ सुनायी दी। थोड़ी देर घूमने के बाद रीसा एक गली के मोड़ पर बैठ गया, अपनी पॉलिश की डिब्‍बियाँ और ब्रुश सामने रख लिये और अपने पहले ग्राहक का इन्‍तज़ार करने लगा। गणेशी की तरह उसने मुँह टेढ़ा करके ‘पॉलिश श श श...!' का शब्‍द पूरी चिल्‍लाहट के साथ पुकारा। पहले तो अपनी आवाज़ ही सुनकर स्‍तब्‍ध हो रहा, फिर निःसंकोच बार-बार पुकारने लगा। पाँच-सात मर्तबा ज़ोर-ज़ोर से चिल्‍लाने पर एक बाबू, जो सामने एक दूकान की भीड़ में सौदा खरीदने के इन्‍तज़ार में खड़ा था, रीसे के पास चला आया।

“पॉलिश करने का क्‍या लोगे?”

“जो खुसी हो दे देना।” रीसे ने गणेशी के वाक्‍य को दोहरा दिया। बाबू ने बूट उतार दिये, और दूकान की भीड़ में फिर जाकर खड़ा हो गया।

रीसे ने अपनी डिब्‍बिया खोली। गणेशी के वाक्‍य तो वह दोहरा सकता था, मगर उसकी तरह हाथ कैसे चलाता? बूट पर पॉलिश क्‍या लगी, जितनी उसकी टाँगों, हाथों और मुँह को लगा। एक जूते पर पॉलिश लगाने में रीसे की आधी डिब्‍बिया खर्च हो गयी। अभी बूट के तलवे पर पॉलिश लगाने की सोच ही रहा था कि बाबू सामने आन खड़ा हुआ। रीसे के हाथ अनजाने में ठिठक गये। बाबू ने बूटों की हालत देखी, आव देखा न ताव, ज़ोर से रीसे के मुँह पर थप्‍पड़ दे मारा, जिससे रीसे का मुँह घूम गया। उसकी समझ में न आया कि बात क्‍या हुई है। गणेशी को तो किसी बाबू ने थप्‍पड़ नहीं मारा था।

“हरामजादे, काले बूटों पर लाल पॉलिश!” और गुस्‍से में गालियाँ देने लगा।

पास खड़े लोगों ने यह अभिनय देखा, कुछ हँसे, कुछ-एक ने बाबू को समझाया, दो-एक ने रीसे को गालियाँ दीं, और उसके बाद बाबू गालियाँ देता हुआ, बूट पहनकर चला गया। रीसा, हैरान और परेशान कभी एक के मुँह की तरफ, कभी दूसरे के मुँह की तरफ देखता रहा, और फिर वहाँ से उठकर, धीरे-धीरे गली के दूसरे कोने पर जाकर खड़ा हो गया। हर राह जाते बाबू से उसे डर लगने लगा। गणेशी की तरह ‘पॉलिश श श!' चिल्‍लाने की उसकी हिम्‍मत न हुई। रीसे को माँ की याद आयी, और उल्‍टे पाँव वापिस हो लिया। मगर गलियों का कोई छोर किनारा न था, एक गली के अन्‍त तक पहुँचता तो चार गलियाँ और सामने आ जातीं। अनगिनत गलियों में घूमने के बाद वह घबराकर रोने लगा, मगर वहाँ कौन उसके आँसू पोंछनेवाला था। एक गली के बाद दूसरी गली लाँघता हुआ, कभी गणेशी की तलाश में, कभी माँ की तलाश में वह दोपहर तक घूमता रहा। बार-बार रोता और बार-बार स्‍तब्‍ध और भयभीत चुप हो जाता। फिर शाम हुई और थोड़ी देर बाद गलियों में अँधेरा छाने लगा। एक गली के नाके पर खड़ा सिसकियाँ ले रहा था, कि उस- जैसे ही लड़कों का टोला यहाँ-वहाँ से इकट्ठा होकर उसके पास आ पहुँचा। एक छोटे- से लड़के ने अपनी फटी हुई टोपी सिर पर खिसकाते हुए कहा, “अबे साले रोता क्‍यों है?”

दूसरे ने उसका बाजू पकड़ा और रीसे को खींचते हुए एक बराण्‍डे के नीचे ले गया। तीसरे ने उसे धक्‍का दिया! चौथे ने उसके कन्‍धे पर हाथ रखते हुए, उसे बराण्‍डे के एक कोने में बैठा दिया। फिर उस छोटे-से लड़के ने अपने कुर्ते की जेब में से थोड़ी-सी मूँगफली निकालकर रीसे की झोली में डाल दी।

“ले साले, कभी कोई रोता भी है? हमारे साथ घूमा कर, हम भी बूट-पॉलिश करते हैं।”

आधी रात गये, नन्‍हा रीसा, जीवन की एक पूरी मंजिल एक दिन में लाँघकर, सिर के नीचे ब्रुश और पॉलिश की डिब्‍बिया और एक छोटा-सा चीथड़ा रखे, उसी बराण्‍डे की छत के नीचे अपनी यात्रा के नये साथियों के साथ, भाग्‍य की गोद में सोया पड़ा था।

उधर, झोंपड़े के अन्‍दर लेटे-लेटे, कई घण्‍टे की विफल खोज के बाद, घीसू गंगो को आश्‍वासन दे रहा थाः “मुझे कौन काम सिखाने आया था? सभी गलियों में ही सीखते हैं। मरेगा नहीं, घीसू का बेटा है, कभी-न-कभी तुझे मिलने आ जायेगा।”

घीसू का उद्विग्‍न मन जहाँ बेटे के यूँ चले जाने पर व्‍याकुल था, वहाँ इस दारुण सत्‍य को भी न भूल सकता था कि अब झोंपड़े में दो आदमी होंगे, और बरसात काटने तक, और गंगो की गोद में नया जीव आ जाने तक, झोंपड़ा शायद सलामत खड़ा रह सकेगा।

गंगो झोंपड़े की बालिश्‍त-भर ऊँची छत को ताकती हुई चुपचाप लेटी रही। उसी वक्‍त गंगो के पेट में उसके दूसरे बच्‍चे ने करवट ली। जैसे संसार का नवागन्‍तुक संसार का द्वार खटखटाने लगा हो। और गंगो ने सोचा- यह क्‍यों जन्‍म लेने के लिए इतना बेचैन हो रहा है? गंगो का हाथ कभी पेट के चपल बच्‍चे को सहलाता, कभी आँखों से आंसू पोंछने लगता।

आकाश पर बरसात के बादलों से खेलती हुई चाँद की किरनों के नीचे नये मकानों की बस्‍ती झिलमिला रही थी। दिल्‍ली फिर बस रही थी, और उसका प्रसार दिल्‍ली के बढ़ते गौरव को चार चाँद लगा रहा था।

--

(शब्द संगत / रचना समय से साभार)

मन्‍नू भण्‍डारी से ज्‍योति चावला की बातचीत

हिन्‍दी साहित्‍य में स्‍त्री-विमर्श का श्रेय राजेन्‍द्र को मिलने का तो प्रश्‍न ही नहीं उठता।

इस साक्षात्‍कार को बहुत पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन इसके आड़े आया मन्‍नू जी का स्‍वास्‍थ्‍य। इसका पहला ड्राफ्‍ट तो मध्‍य अक्‍टूबर की किसी तारीख़ में तैयार हो गया था, लेकिन तब से मन्‍नू जी निरन्‍तर अस्‍वस्‍थ चलती रही, और मैं उनके स्‍वास्‍थ्‍य की कामना करती रही, और इसमें अगर जोड़ दिया जाए, तो हरि भटनागर फोन पर फोन करते रहे। इस बीच घोषित होने के बवजूद यह साक्षात्‍कार ‘शब्‍द-संगत' का एक और अंक लाँघ गया। परन्‍तु इसी बीच हमारी मन्‍नत काम आई, ठण्‍ड कम हुई, धूप निकली और मन्‍नू जी ने फिर से अपनी कुर्सी पकड़ी, किसी साक्षात्‍कार के लिए कोई लेखक इतना कॉन्‌शॅस हो सकता है, इसका अनुभव मुझे इस दौरान हुआ। उन्‍होंने इस साक्षात्‍कार को कई बार आर-पार देखा। घण्‍टों हम साथ बैठे, और हर बार इसका अन्‍त डायनिंग-टेबल पर हुआ। तभी मैंने जाना कि मन्‍नू जी रोज़ खाना खाने के बाद सोती हैं... और यह कि राजस्‍थानी लोग खाना खाने के बाद पापड़ खाते हैं।

ज्‍योति ः आपकी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ सन्‌ 1950-60 के आसपास की हैं, जिस समय नई कहानी का दौर चल रहा था। आप खुद उसका एक महत्त्वपूर्ण हस्‍ताक्षर रही थीं, तो क्‍या नई-कहानी के बारे में कुछ बताएँगी?

मन्‍नू ः मैंने सन्‌ 55-56 से लिखना शुरू किया था पर मेरी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ तो सन्‌ 64 के बाद यानी दिल्‍ली आने के बाद आई। हाँ, इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि मेरे लेखन की शुरुआत जरूर नई-कहानी के दौर में ही हुई थी। पर उसके बारे में कुछ बताने से पहले मैं इस प्रचलित धारणा को ज़रूर ध्‍वस्‍त करना चाहती हूँ मैं उसका एक महत्त्वपूर्ण हस्‍ताक्षर थी। ईमानदारी की बात तो यह है कि दो कहानी-संग्रह छपने तक तो मुझे नई कहानी का ककहरा भी नहीं आता था और न ही मेरा इससे कोई विशेष सरोकार था। मैं तो बस कहानियाँ लिखती थी वे छपती थीं और पाठको द्वारा स्‍वीकृत होती थीं और यही मेरा प्रमुख सरोकार था और सबसे बड़ा सन्‍तोष भी। अब क्‍यों कि मैं अपने लेखन के शुरुआती दिनों से ही राजेन्‍द्र, राकेश जी और कमलेश्‍वर जी के साथ रहती थी, जो नई-कहानी आन्‍दोलन के पुरोधा थे सो मेरा नाम भी इनके साथ जुड़ गया। यह भी हो सकता है कि मेरी कहानियों में भी वे सारी विशेषताएँ रही हों जो नई-कहानी के साथ जुड़ी हुई थीं और इसलिये मुझे भी इसके झण्‍डे तले डाल दिया हो। आज सोचती हूँ तो यह भी लगता है कि उस समय इन लोगों के नामों के साथ जुड़ने से मुझे भी कुछ महत्त्वपूर्ण होने का बोध होता होगा इसीलिये मैंने भी तो कभी इसका मुखर विरोध किया ही नहीं पर महत्त्वपूर्ण होने का बोध होना और महत्त्वपूर्ण हस्‍ताक्षर होना दो बिल्‍कुल अलग बातें हैं। हस्‍ताक्षर होने के लिये जरूरी है कि आपका उस आन्‍दोलन के साथ गहरा सरोकार हो और उसे आगे बढ़ाने में निरन्‍तर सक्रिय भी हों। सरोकार क्‍या होता, बरसों तक तो मुझे इसकी कोई जानकारी ही नहीं थी और बिना जानकारी के इसकी गतिविधियों को आगे बढ़ाने का तो प्रश्‍न ही कैसे उठता भला?

अब नई-कहानी की कुछ विशेषताएँ -जिस विषय पर कुछ लोगों ने पुस्‍तकें लिख डालीं, उसे तुम मुझसे एक-डेढ़ पृष्‍ठ में जानना चाहती हो। तो बहुत मुश्‍किल, फिर भी बहुत मोटे रूप में कुछ बातें बताने की कोशिश करूँगी!

नए कहानीकारों ने घोषित रूप में अपने को प्रेमचन्‍द जी परम्‍परा के साथ जोड़ा था। और इस ही आगे बढ़ाना इनका लक्ष्‍य था प्रेमचन्‍द की रचना दृष्‍टि और उनके लेखकीय मूल्‍य बहुत गहरे में समाज के साथ जुड़े हुए थे। समाज की विडम्‍बनाओं और विसंगतियों को उजागर करना, उन पर प्रहार करना ही उनकी रचनाओं के मुख्‍य विषय थे यानी कि समाज के बाहरी यथार्थ पर ही उनकी रचनाएँ केन्‍द्रित रहीं। इसीलिये नए कहानीकारों ने भी अज्ञेय, जैनेन्‍द्र जी आन्‍तरिक यथार्थ वाली दृष्‍टि को छोड़कर अपनी रचनाएँ भी समाज के बाहरी यथार्थ पर ही केन्‍द्रित की। इसके लिये उस समय बहुत ही अनुकूल अवसर भी था। गाँधीजी ने अपने समय में ही सामाजिक क्रान्‍ति की शुरूआत तो कर ही दी थी पर राजनैतिक आन्‍दोलन के चलते उस समय वह हाशिये में ही पड़ी थी। आजादी मिलते ही वह केन्‍द्र में आ गई, जिससे सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली। रूढ़िवादी, दकि�यानूसी समाज को बदलने के लिये विभिन्‍न स्‍तरों पर प्रयास ही नहीं होने लगे, उन पर प्रहार भी होने लगे। अब समाज का प्रमुख हिस्‍सा है परिवार और परिवार टिका है स्‍त्री-पुरुष या नई-पुरानी पीढ़ी के सम्‍बंधों पर... सो इनके बदलाव अनिवार्य हो गये। महत्त्वाकांक्षी युवा अपना भविष्‍य बनाने के उद्देश्‍य सेगॉव-कस्‍बे छोड़कर शहर आ गये थे। शिक्षित होकर स्‍त्रियाँ भी शहरों में आकर नौकरियाँ करने लगीं तो अपने सहकर्मियों के साथ मित्रता होना स्‍वाभाविक था। इस स्‍थिति ने स्‍त्री-पुरुष सम्‍बंधों के बने बनाये ढाँचे को तोड़कर नये आयाम सामने रखे और इसकी स्‍वाभाविक परिणति प्रेम-प्रसंगो का सिलसिला भी चल पड़ा, जो दोनों पीढ़ियों के द्वन्‍द्व का कारण भी बना। शहरों में बसने के दौरान नई पीढ़ी का संघर्ष अपनी जगह और पुरानी पीढ़ी की उनसे उम्‍मीदें और निराशाएँ अपनी जगह। अपने आरम्‍भिक दौर की नई-कहानियाँ मुख्‍तः इन्‍हीं स्‍थितियों के विभिन्‍न पक्षों और पहलुओं पर केन्‍द्रित रहीं... फिर जैसे-जैसे सामाजिक स्‍थितियाँ बदलती गइर्ं, इनके विषय भी बदलते गये पर रहे वे सामाजिक स्‍थितियों पर ही केन्‍द्रित!

जहाँ तक मेरा ख्‍़याल है, इस दौर के अधिकतर कथाकार प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े हुए थे। गनीमत यही है कि इनमे से किसी ने भी अपनी रचनाओं पर इस विचारधारा को आरोपित नहीं होने दिया वरना इनकी रचनाएँ कलात्‍मक कृति न रहकर इस विचारधारा की प्रचारक हो जातीं।

इसमे कोई सन्‍देह नहीं कि नये-कहानीकारों का आग्रह मुख्‍यतः रहता कथ्‍य पर ही अधिक था पर उसके बव़जूद किसी भी कथाकार ने शिल्‍प की उपेक्षा तो क�तईर् नहीं की। सब इस बात के प्रति पूरी तरह सचेत थे कि कलात्‍मक शिल्‍प ही किसी वास्‍तविक ब्‍यौरे को कला-सृजन में बदल सकता है और उनकी रचनाएँ अपने-अपने ढंग से इस बात का प्रमाण भी हैं।

वैसे जिस कथ्‍य पर कहानीकारों का आग्रह रहता था, उसके बारे में भी एक नारा उन दिनों काफ�ी प्रचलित था-भोगा हुआ यथार्थ या अनुभूति की प्रामाणिकता यानी कि वह कथ्‍य काल्‍पनिक नहीं बल्‍कि अपनी या किसी और की भोगी हुई वास्‍तविकता पर आधारित हो। हाँ, वह वास्‍तविकता कहानी बनने के दौरान यानी कि एक कलाकृत बनने के दौरान बदलेगी तो सही ही और कभी-कभी तो कहानी की ज़रूरत के हिसाब से इसका रूप इतना अधिक बदल जाएगा कि लेखक स्‍वयं नहीं पहचान पाएगा। कहने का तात्‍पर्य केवल इतना है कि बाहरी रूप चाहे कितना ही बदला हुआ हो पर उसका मूल-रूप जरूर किसी वास्‍तविकता पर ही केन्‍द्रित हो। कहानी के विश्‍वसनीय लगने के लिये यह अनिवार्य भी है।

अब होने को तो और भी कई विशेषताएं होगी पर मैं अब अपने हिसाब से अन्‍तिम पर सबसे महत्त्वपूर्ण बात कहकर इस प्रसंग को यहीं समाप्‍त करती हूँ। सच पूछा जाए तो यह प्रसंग नई-कहानी की विशेषता के अन्‍तर्गत तो आता भी नहीं है पर इस दौर की कहानी के सिलसिले में एक महत्त्वपूर्ण बात ज़रूर है

इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि नई-कहानी आन्‍दोलन के दौरान एक से एक सशक्‍त कथाकार सक्रिय थे पर यह जुड़ गया मात्र तीन नामों के साथ राजेन्‍द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्‍वर। इन्‍हें लोग नई कहानी की तिकड़ी भी कहते थे। कारण-अपने रचनात्‍मक लेखन के साथ-साथ इन तीनों ने पुरानी पीढ़ी की कहानी से इसे दौर की कहानी की भिन्‍नता स्‍पष्‍ट करने के साथ इसकी वैचारिक पृष्‍ठभूमि उजागर करते हुए भी बहुत कुछ लिखा। सबसेे पहले राजेन्‍द्र यादव ने एक बहुत ही लम्‍बा सा लेख लिखा, जो इनके द्वारा ही सम्‍पादित नए-कहानीकारों के संकलन ‘एक दुनिया समानान्‍तर' की भूमिका के रूप में छपा। आज मैं क्‍या, कई लोग इसकी कुछ बातों से असहमत भले ही हो पर उस समय, या तो पहला होने के कारण या अपनी बातो के कारण इसने निस्‍सन्‍देह एक छाप तो छोड़ी थी। उसके बाद कमलेश्‍वर ने ‘नई-कहानी की भूमिका' नाम से एक पुस्‍तक ही लिख डाली। मोहन राकेश भी इन विषयों में सम्‍बंधित छिटपुट लेख लिखते ही रहते थे। अपने इन लेखों से राकेश जी और कमलेश्‍वर जी ने जब जहाँ मौका मिला अपने धुंआधार भाषणो से ‘नई कहानी' का ऐसा दबदबा जमाया और उसे एक सक्ऱिय आन्‍दोलन का रूप देकर तीनों उसके पुरोधा भी बन बैठे। इधर रेणु, अमरकान्‍त, शेखर जोशी, भीष्‍म साहनी, कृष्‍णा सोवती, ऊषा प्रियम्‍बदा जैसे अनेक एक से एक सशक्‍त कथाकार चुपचाप अपनी कहानियाँ लिखने में लगे हुए थे। आज इस सच्‍चाई से कौन इन्‍कार कर सकता है कि इतनी बड़ी संख्‍या में ऐसे सक्षम और सशक्‍त कथाकार हिन्‍दी कथा-साहित्‍य के इतिहास में फिर कभी हुए ही नहीं। इसे मेरी पक्षघरता न समझा जाए तो यह भी सच है कि इतनी बड़ी संख्‍या में एक ही दौर में इतनी अच्‍छी कहानियाँ भी एक साथ फिर कभी शायद ही लिखी गई हो। ये मात्र स्‍वघोषित किये गये इन तीन पुरोधाओं का योगदान नहीं था बल्‍कि उस दौर के सभी कथाकारों का मिला-जुला योगदान था, जिसने उस समय कहानी को हिन्‍दी साहित्‍य की केन्‍द्रीय विधा बना दिया था।

ज्‍योति ः समकालीन, ख़ासतौर पर उदय प्रकाश के बाद की कहानी कथ्‍य और शिल्‍प दोनों ही स्‍तर पर बहुत हद तक बदल गई है, जिसका अपना एक स्‍टाइल है, एक शिल्‍प है। क्‍या आपको नहीं लगता कि इस, बदलाव के कारण आज की कहानी भी एक आन्‍दोलन की माँग करती है? इसका भी कोई नामांकन किया जाना चाहिये?

मन्‍नू ः इसमें कोई सन्‍देह नही कि अपनी पुरानी पीढ़ी की कहानियों से भिन्‍न होने के कारण ही हमारे दौर की कहानी को ‘नई कहानी' कहा गया था पर यह तो तुम भी जानती हो कि नई शब्‍द वैसे संज्ञा नहीं विशेषण है। यह तो जब कवि दुष्‍यन्‍त कुमार ने इन कहानियों के नयेपन को देखते हुए इन्‍हें “नई-कहानी ” नाम दे दिया, जो बाद में स्‍वीकृत होकर संज्ञा की तरह चल पड़ा। अब नई कहानी के तीन प्रमुख कथाकारों (राजेन्‍द्र यादव, कमलेश्‍वर, मोहन राकेश) ने अपने रचनात्‍मक लेखन के साथ-साथ, पुरानी पीढ़ी की कहानी से अपने दौर की कहानी की भिन्‍नता और उसकी वैचारिक पृष्‍ठभूमि को उजागर करते हुए भी बहुत कुछ लिखा (इसका संक्षिप्‍त उल्‍लेख मैं पहले कर चुकी हूँ, इसलिये दोहराऊँगी नहीं) और अपने ऐसे लेखन से ही धीरे-धीरे इन्‍होंने इसे एक आन्‍दोलन का रूप भी दे दिया। यहाँ कहना मैं सिफ�र् यह चाहती हूँ कि इस दौर की कहानी को नाम देना रहा हो या आन्‍दोलन का रूप देना, जो कुछ भी किया इस दौर के रचनाकारो ने ही किया

आज जब सामाजिक स्‍थितियाँबदल गई ... पूरा परिवेश बदल गया... पारस्‍परिक संबंधों का स्‍वरूप भी बदल गया (इसके विस्‍तार में जाना तो सम्‍भव ही नहीं) तो स्‍वाभाविक है कि न पुराने मूल्‍य रहे होंगे... न पुरानी संवेदनाएँ। अब ऐसे मूल्‍यहीन, संवेदनहीन परिवेश में जो कथाकार पनप रहे हैं, बहुत स्‍वाभाविक है कि उनकी रचनाओं के कथ्‍य भी बदलें क्‍यों कि हर रचनाकार अपने समाज में... अपने परिवेश से ही तो अपनी सामग्री... अपना कथ्‍य जुटाता है। और जब कथ्‍य बदलता है तो अपनी अभिव्‍यक्‍ति के लिये वह नए शिल्‍प की तलाश भी कर ही लेता है। अब अपनी पीढ़ी के कहानीकारों की पैखी करते हुए तुम्‍हारा आग्रह है कि जब कथ्‍य और शिल्‍प दोनों ही दृष्‍टि से अपनी पुरानी पीढ़ी की कहानी से समकालीन कहानी भिन्‍न हो गई तो क्‍या उसे भी नई-कहानी की तरह एक नाम नहीं मिलना चाहिये या कि इसकी विशेषताओं के आधार पर इसके नाम में भी कोई आन्‍दोलन नहीं चलाया जाना चाहिये?

सो ज्‍योति देवी मुझे इसमें कोई आपत्‍ति नहीं है... मैं सोचती हूँ शायद किसी को भी नहीं होगी... पर करेगा कौन यह काम? कोई बाहर से तो आएगा नहीं। बेहतर तो होगा कि नई-कहानी के रचनाकारों की तरह यह काम इस पीढ़ी के रचनाकार स्‍वयं करें। हाँ, इतना ध्‍यान जरूर रखें कि हर आन्‍दोलन का एक वैचारिक धरातल जरूर होता है सो पहले वे अपनी कहानियों के इस वैचारिक धरातल की तलाश कर लें। रवीन्‍द्र कालिया के पहले ‘वागर्थ' और अब ‘ज्ञानोदय' के दो विशेषांको नेे और ‘कथा-देश' के एक युवा-पीढ़ी विशेषांक ने इस काम को बहुत आसान कर दिया है। इन सारी कहानियों को एक साथ पढ़कर इनके वैचारिक धरातल और कुछ सामान्‍य विशेषताओं का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है और उसी के आधार पर कोई चाहे और किसी को ज़रूरी लगे तो एक आन्‍दोलन की शुरूआत भी की जा सकती है वरना कम से कम उसका नामांकन तो किया ही जा सकता है। इसमें किसी को भी क्‍या आपत्‍ति हो सकती है भला? पर करना यह काम युवा-पीढ़ी के रचनाकारों को ही होगा।

इस सन्‍दर्भ में एक बात और ज़रूर कहना चाहूँगी। तुम तो नई-कहानी के बाद छलाँग लगाकर उदयप्रकाश का ज़िक्र करते हुए सीध्‍ो समकालीन कहानी पर आ गइर्ं। यह शायद भूल ही गई कि नई कहानी के बाद साठ़ोतरी पीढ़ी की कहानी का दौर भी चला था। आज़ादी के मोहभंग की निराशा में लिपटी... राजनीति और राजनीतिज्ञों के निरन्‍तर पतन की प्रक्रिया का जीवन ओर सम्‍बंधों पर पड़ते प्रभाव को चित्रित करती इस युग की कहानियाँ क्‍या नई-कहानी से बिल्‍कुल भिन्‍न नहीं थीं? इस दौर में ज्ञानरंजन, रवीन्‍द्र कालिया, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह जैसे सशक्‍त कथाकार उभरे थे और बदले हुए इस परिवेश के चलते जिनका नज़रिया... जिनकी संवेदना की बिल्‍कुल बदल गई थी।

ज्‍योति ः यहाँ बीच में ही एक बात पूछ लूँ? आप तो साठोतरी पीढ़ी की शुरुआत ही मोहभंग से मान रही हैं पर राजेन्‍द्र जी ने तो अपने लेख में इसे नई-कहानी के साथ भी जोड़ रखा है। फिर?

मन्‍नू ः इस बात के जवाब में अब मैं एक बात तुमसे पूछ लूँ? जब तुमने उस लेख को पढ़ा है तो उस संकलन (एक दुनिया समानान्‍तर) की कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ो होगी। अपने हिसाब से राजेन्‍द्र ने उसमें प्रमुख नये-कहानीकारों की रचनाओं को ही संकलित किया है। अब तुम बताओं कि क्‍या उसमें से एक कहानी का कथ्‍य भी मोहभंग की मानसिकता पर आधारित है? हम कहानियों को आधार मानेंगे या लेख की बात को?

ज्‍योति ः पर एक जिम्‍मेदार लेखक जब ऐसी बात लिखता है तो उसका कुछ आधार तो रहता ही होगा?

मन्‍नू ः लगता है इस बात के चक्‍कर में हम अपनी बात के असली प्रंसग से ही भटक रहे हैं। चलो तुम्‍हारी इस बात का जवाब भी दे ही दूँ। असल में राजेन्‍द्र ने यह लेख सन्‌ 64 में लिखा था और देश में मोहभंग का सिलसिला शुरू होता है सन्‌ 62 में जब पहली बार काँग्रेस के राज्‍य को चुनौती देते हुए कुछ प्रान्‍तो में मिली जुली सरकारें बनी थी। अब इस समय तक आते-आते तो नई कहानी के रचनाकार भी इस भावना से न तो वंचित थे न ही अप्रभावित और न ही उनका लेखन बन्‍द हुआ था। पर उनकी रचनाओं का प्रमुख दौर तो मुख्‍य रूप से 50 से 60-65 तक ही माना जाता है..... उसके बाद तो सठोत्‍तरी पीढ़ी का दौर आ जाता है अब राजेन्‍द्र जी ने क्‍यों कि यह लेख 64 में लिखा था।तो मोहभंग की इस भावना से प्रभावित होना तो बहुत ही स्‍वाभाविक था पर ग़लती की तो यह कि इसे नई-कहानी पर चस्‍पा कर दिया। एक बात यहा और स्‍पष्‍ट कर दूँ कि किसी भी दौर के कहानीकार का लेखन-समय तो कभी निश्‍चित किया ही नही जा सकता क्‍यों कि नये कहानी कार या साठोत्‍तरी पीढ़ी के या सचेतन कहानी के कथाकार आज भी लिख रहे हैं पर जब उनकी पीढ़ी की बात की जाती हैं तो उसके प्रमुख दौर को नज़र में रखकर ही की जाती है। सोचती हूँ तुम मेरी बात समझ गई हो। अब यह प्रसंग बन्‍द और अपने असली प्रसंग पर ही लौटते हैं।

हाँ तो बात चल रही थी कि नई-कहानी के बाद कथ्‍य शिल्‍प भाषा, संवेदना सभी दृष्‍टि में भिन्‍न साठोत्‍तरी-पीढ़ी आई पर इस सारी भिन्‍नता के बावजूद न तो किसी ने उस समय इसके लिये किसी आन्‍दोलन की माँग की न ही नामांकन की। वह तो बस अपने समय के हिसाब में साठोत्‍तरी-पीढ़ी कहलाई। पर सच्‍चाई यह है कि बिना किसी नाम और आन्‍दोलन के इन कथाकारो ने हिन्‍दी कथा साहित्‍य के इतिहास में अपनी एक अमिट छाप तो छोड़ी ही। उसके बाद ‘सचेतन' कहानी ‘अकहानी' जैसे कुछ हिस्‍पुट पर आन्‍दोलन नाम के साथ ही आए तो जरुर पर न तो उनकी कोई पैठ बनी नही कोई खास पहचान। सो कहना मैं सिर्फ� इतना चाहती हूँ कि किसी भी युग की कहानियों की पहचान किसी आन्‍दोलन या नामांकन से नही बनती...बनती हैं तो उस युग के कथाकाएँ की अपनी सृजनात्‍मक क्षमता और महत्त्वपूर्ण योगदान से। इसकेे बावजूद यदि तुम आन्‍दोलन और नाम के प्रति आग्रण्‍ही हो तो मुझे तो उसमें कतई कोई आपत्‍ति नही। बस कुछ कथाकार मिल कर इस काम को सम्‍पन्‍न करे तो बेहतर होगा या फिर कोई समीक्षक करे यह काम।

ज्‍योति ः एक सपळल कहानीकार होते हुए आप कविता को क्‍या दर्जा देती हैं? राजेन्‍द्रजी इसे साहित्‍य का प्रदूषण कहते हैं। कविता के पाठक कम हैं। एक उपेक्षा की दृष्‍टि रही है कविता को लेकर। आखिर क्‍या कारण है कि कविता की तुलना में कहानी को ज्‍यादा महत्त्व मिल रहा हैं? क्‍या आपने कभी कविताएँ लिखी हैं?

मन्‍नू ः राजेन्‍द्र जी कविता के बारे में जो कुछ कहते हैं जरूरी नही कि वही धारणा मेरी भी हो। हालाँकि कविता में न मेरी रुचि है न गति उसके बावजूद यह तो मैं मानती हूँ कि रचना के केन्‍द्रीय भाव को एक अच्‍छा कवि बहुत ही थोड़े शब्‍दों में बहुत ही प्रभावपूर्ण ढंग से....मारक ढंग में कह सकता है पिळर हमारी तो परम्‍परा ही कविता की रही हैं। गद्य तो आधुनिक युग की देन है। रही उपेक्षा की बात सोे यह धारणा तुमने उनकी बिक्री के आधार पर बना ली है। इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि कविता कि पुस्‍तकें कहानी की अपेक्षा बहुत ही कम बिकती हैं क्‍यों की कथा-तत्‍व एक आम पाठक को भी बाँध लेता है जबकि कविता के लिये एक विशेष साहित्‍यिक समझ की ज़रूरत होती है जो सबके पास तो होती नही। पर बिक्री की बात छोड़ दे तो साहित्‍यक जगत में तो कविता की उपेक्षा है नही। साहित्‍य अकादमी के पुरस्‍कारों की सूची देखिये कवियों को कहानीकारों की अपेक्षा कही अधिक पुरस्‍कार मिले हैं। नई कहानी आन्‍दोलन के पहले नई कविता का आन्‍दोलन शुरू हुआ था जो खूब प्रचलित भी हुआ सो यह धारणा भ्रामक है कि कविता को लेकर उपेक्षा की दृष्‍टि रही है.... हाँ उसका क्षेत्र ज़रूर साहित्‍यिक जगत तक ही सीमित है जो निरन्‍तर छोटा भी होता चला जा रहा है और कहानी के लिये जरूरी है मात्र शिक्षित होना.....और शिक्षितों की संख्‍या तो निरन्‍तर बढ़ती ही जा रही है। पर इसके बावजूद प्रमुख कवि हमेशा पढ़े गये हैं और आगे भी पढ़े जायेंगे। इस तथ्‍य को क्‍या कहोगी कि अधिकतर लेखक अपना रचनात्‍मक-जीवन कविता से शुरू करते हैं। आखिर कुछ सोच कर ही करते होगें। मैंने जिन्‍दगी में न कभी कविता लिखी नही लिखने की क्षमता हैं। पर यह उपेक्षा नहीं मेरे अपने सामर्थ्‍य की बात है। मेरा व्‍यक्‍तित्‍व शुरू से ही काव्‍यात्‍मक नहीं गद्यात्‍मक रहा है।

ज्‍योति ः आपके महाभोज उपन्‍यास की रचना 1979 में हुई थी जबकि कांशीराम ने तो दलितो की पार्टी बसपा की स्‍थापना 1984 में की थी। आर्श्‍चय है कि आपने कांशीराम द्वारा उठाये गये दलित शक्‍ति और दलित राजनीति के मुद्दे को पहले ही समझ लिया और जान गई कि दलित-वोट बैंक क्‍या चीज़ है और भारतीय राजनीति में इसकी क्‍या अहमियत है? जानकारी की प्रेरणा स्रोत?

मन्‍नू ः लगता है तुमने इस उपन्‍यास को थोड़ा गलत समझ लिया है। हाँ इस उपन्‍यास का पे्ररण-स्रोत जरूर बेलछी-कांड रहा है और बेलछी में तेरह किसानो को पेड़ से बाँध कर जिन्‍द जला दिया जाना, इस कांड का आधार था। एक पत्रिका मेंं इसका वर्णन पढ़कर में इतनी भाव- विह्निल रही और सोचा भी कि इस पर कुछ लिखूगी पर तलाश थी किसी वैचारिक आधार की क्‍यों कि केवल भाव-विह्नलता के आधार पर तो कुछ लिखा नही जा सकता। कुछ महीनो बाद अपराधी-व्‍यक्‍ति के पैरोल पर छूटकर चुनाव लड़ने और थम्‍पिंग मैजोरिटी से जीतने पर मुझे वह आधार मिला-हमारे यहाँ की चुनाव-प्रक्रिया की जोड़-जोड़, उठा पटक और तिकड़म बाजी! सो इस उपन्‍यास का केन्‍द्रीय भाव दलित राजनीति से नही, यहाँ की चुनाव प्रक्रिया से सम्‍बधित है। हो सके तो इस दृष्‍टि से एक बार उपन्‍यास पिळर से पढ़ो.... बात सापळ हो जाएगी।

ज्‍योति ः यू. पी. में मायावती के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद आज दलितों की अपनी पार्टी की विजय तो हो गई लेकिन क्‍या यह प्रश्‍न आज भी बरकार नही है कि अत्‍यन्‍त दलितों की स्‍थिति का क्‍या होगा? महाभोज के सन्‍दर्भ में कहूँ तो उन दलितो का क्‍या होगा? जिन्‍हें जला दिया गया।

मन्नू ः वैसे तो यह खुशी की बात है कि यू. पी. जितने बड़े प्रान्‍त की मुख्‍यमंत्री आज एक दलित महिला बनी। वैसे कुछ दलितो को मैंने इस बात पर आपत्‍ति करते जरूर सुना कि सवर्णो का सहयोग लेकर वे कांशीराम केे लक्ष्‍य से ही च्‍युत हो गई। व्‍यक्‍तिगत रूप से मुझे तो इसमें कोई आपत्‍ति नहीं दिखाई दी बशर्ते वे निम्‍न वर्ग के दलितो की स्‍थिति सुधारने के लिये कुछ ठोस काम करे।

ज्‍योति ः वर्तमान में आप दलितों की स्‍थिति को कैसे देखती हैं?

मन्‍नू ः खुशी की बात है ं कि सदियाँ से असह्‌य-यातनाएँ सहता हुआ हाशिये में पड़ायह वर्ग धीरे-धीरे अब सभी क्षेत्रों में केन्‍द्र में आ रहा है। सांसदो और विधायको की बढ़ती संख्‍या के साथ राजनीति में इसके बढ़ते प्रभुत्‍व से सभी परिचित है। यू. पी. जैसे बड़े प्रान्‍त की मुख्‍यमंत्री आज दलित वर्ग की महिला है। इधर आरक्षण द्वारा ऊँची शिक्षा पाकर ऊँचे ओहदों पर पहुँचना, अपळसर शाही में इनकी स्‍थिति को उजागर करता है। अनेक कवि-कथाकारों ने अपनी रचनाओं में विशेषकर अपनी आत्‍मकथाओं से दलित-साहित्‍य की भी एक अलग पहचान बनाई है। ये सारी बाते इसी बात का प्रमाण है कि दलितो की स्‍थित में (विशेषकर एक वर्ग के दलितो की) तो काफी सुधार आया है। पर जहाँ तक इस वर्ग के लोगों की बात भी है, सामाजिक स्‍तर पर गाँव-देहात के अशिक्षित लोगो के बीच आज भी बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता । एक छोटे से उदाहरण से अपनी बात स्‍पष्‍ट करूगी।

एक बार मुझे कॉलेज की छात्राओं के साथ सूखा पीड़ितो के राहत कार्य के लिये बीकानेर जाना पड़ा। कलेक्‍टर अन्‍दरूनी गाँवों में जाने की हमारी सारी व्‍यवस्‍था करवाने वाले थे, सो हम उनसे मिलने पहुँचे। उनके पास पहले से कोई बैठा हुआ था इसलिये हम बाहर इन्‍तज़ार करने लगे। एकाएक एक लड़की ने उनकी नेम प्‍लेट देखकर ऐसे ही जिज्ञासावश पूछ लिया-अरे इन्‍होंने अपना सरनेम तो लगा ही नहीं रखा.... अधूरी नहीं लग रही नेम प्‍लेट?

बाहर सापळा बाँध्‍ो स्‍टूल पर बैठे चपरासी ने यह सुनते ही जिस हिकारत से कहा “अरे कैसे लगाएगा सरनेम... मीणा जो है। “वह बात आज तक मेरे मन पर खुदी हुई हैं। ओहदे में चपरासी पर अपने बास कलेक्‍टर के लिये मन में ऐसी हिकारत सिर्फ इसलिये कि वह मीणा है। और अशिक्षितों के बीच में आज भी यह एक हक़ीक़त है जो शिक्षा के प्रचार-के साथ ही दूर होगी।

अब एक शिकायत इस वर्ग से मेरी भी। जो लोग किसी क्षेत्र में आज ऊपर पहुँच गये वे अपने से नीचे के दलितो को ऊपर उठाने की बजाए अपनी ही और और तरक्‍की की जोड़ तोड़ से लगे रहते हैं दबा कुचला एक बार भी नही सोचते कि और एक बहुत बड़ा वर्ग उनकी मदद की... उनके सहयोग की उम्‍मीद में आज भी नीचे ही पड़ा है क्‍यो नही ये लोग उनके लिये भी कुछ करते हैं।

ज्‍योति ः दलित जातियों में क्रीमीलेयर का भी एक मुद्दा है। आपकी इस बारे में क्‍या राय हैं?

मन्‍नू ः मुद्‌दा तो शायद क्रीमीलेयर के आरक्षण का है। जानती हूँ इस बारे मेें मुँह खोलते ही मुझ पर आरोपों की बौछार होने लगेगी पर अब इस से चुप रहना भी तो मेरे लिये सम्‍भव नही हैं।सच बात तो यह है कि क्रीमीलेयर में आने वाले दलित सभी स्‍तर पर सुविधा सम्‍पन्‍न है-चाहे राजनीति हो अफसरशाही हो या अर्थिक स्‍तर दलितो के नाम पर मिलने वाली सारी सुविधाएँ ये अपनी ही झोली में तो डालते रहे हैं आज तक। वंचित रहा है तो अन्‍त्‍योदेय वर्ग, इसीलिये उसकी स्‍थिति में आज तक कोई सुधार नहीं हुआ। इतना ही नहीं, इस वर्ग का शोषण करने में भी क्रीमीलेयर का दलित वर्ग पीछे नहीं रहा। शोषक और सब प्रकार से सम्‍पन्‍न क्रीमीलेयर के दलितो को आरक्षण ? अब आज यदि लालू यादव का मुलायम सिंह यादव के बच्‍चो को इस आधार पर आरक्षण मिले तो इससे बड़ा अन्‍याय और क्‍या हो सकता है? इस बारे में मेरी बहुत स्‍पष्‍ट धारणा है कि दलितो में भी आरक्षण का आधार आर्थिक ही होना चाहिए। इस स्‍थिति में क्रीमीलेयर के दलित अपने आप इस सुविधा से वंचित हो जाएँगे

ज्‍योति ः पहले हिन्‍दी साहित्‍य के रचनाकारो पर फ़िल्‍म बनने की एक परम्‍परा रही है, जैसे प्रेमचन्‍द, कमलेश्‍वर, राजेन्‍द्र यादव, और आपकी रचनाएँ आज ऐसा कम देखने को मिलता है-इसका कारण? साहित्‍य और फ़िल्‍म की इस बढ़ती दूरी को आप कैसे देखती हैं? फ़िल्‍मे ज्‍यादा कमर्शियलाइज़्‍ड हो गई है या साहित्‍य ज्‍यादा कठिन?

मन्‍नू ः हिन्‍दी कथा साहित्‍य के इतने लम्‍बे दौर में पाँच सात फ़िल्‍मे बन गई तो इसे परम्‍परा नही अपवाद स्‍वरूप हो कहा जाएगा। हाँ बंगला में ज़रूर साहित्‍यिक रचनाओं पर फ़िल्‍मे बनने की परम्‍परा है और शरदचन्‍द्र की रचनाएँ तो हिन्‍दी तक में बराबर बनती रही हैं। उनकी देवदास तीन बार और परिणीता अभी दूसरी बार बनी। कारण, एक तो इनकी रचनाओं में दृश्‍य तत्‍व बहुत है यानी विजुअल में बड़ी आसानी से ट्रान्‍सफॉर्म हो सकते है जो फ़िल्‍म के लिये बहुत ही आवश्‍यक गुण हैं.... दूसरा उनकी कहानी में दर्शकों को अपने साथ बाँध सकने की अद्‌भुत क्षमता भी है। हिन्‍दी में तुमने जिन फ़िल्‍म के नाम गिनाए उनमें प्रेमचन्‍द की केवल शतरंज के खिलाड़ी चर्चित रही पर शुद्ध सत्‍यजित के नाम की वजह से या बदले हुए अन्‍त पर कुछ विवाद चला पर अर्थिक रूप से तो यह भी सम्‍भव नही रही राजेन्‍द्र के ‘सारा आकाश' ने नाम कमाया केेवल इसलिये कि एक सही सफल कलात्‍मक फ़िल्‍म की शुरूआत हुई थी इस फ़िल्‍म से। पर चली यद भी कुछ बड़े शहर के मार्निग शो में ही। कमलेश्‍वर की फ़िल्‍म तो कमलेश्‍वर की कहानी पर ही बलात्‍कार थी... चली भी नही। केवल मेरी ‘यही सच है' कहानी पर बनी फ़िल्‍म रजनी गन्‍धा'..... एक साल तक डिब्‍बो में बन्‍द रहने के

बाद चली तो फिर केवल सिल्‍वर जुबली ही नही मनाई बल्‍कि कई अवार्ड भी जीते। मात्र एक अपवाद, सो तुम इस तकलीफ से तो मुक्‍त हो ही जाओ कि पहले की रचनाओं पर तो फ़िल्‍म बनने की परम्‍परा थी और समकालीन रचनाओं पर फ़िल्‍म बनने का कोई सिलसिला ही नज़र नही आता। वास्‍तविक स्‍थिति तो यह है कि हिन्‍दी की साहित्‍यिक कृतियों पर फ़िल्‍म बनने की बंगला की भाँति कोई नियमित परम्‍परा कभी रही ही नही हालाँकि इतना तो मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि हिन्‍दी में भी कुछ रचनाएँ तो ऐसी जरूर होगी जो फ़िल्‍म बनने की सारी जरूरतों को पूरी कर सके। उसके बाव़जूद यदि नही बनती तो इसे निर्देशक और साहित्‍य के बीच का अन्‍तराल ही कहा जाएगा अच्‍दी फ़िल्‍में तो हिन्‍दी में भी आती रहती हैं। अभी अभी कुछ अच्‍छी फिल्‍मे आई हैं जिन्‍हे कामर्शियल भी नही कहा जा सकता जैसे इकबाल ‘ब्‍लैक' और तारे जमीन पर'। ये निर्देशक की क्षमता तो प्रमाणित करती है पर साहित्‍य के साथ उनका रिश्‍ता नही, क्‍यों कि इनमें से तो एक भी फ़िल्‍म साहित्‍यिक कृति पर आधारित नही है। इन प्रसिद्ध निर्देशको के अकाउण्‍ट में कोई और साहित्‍यिक फ़िल्‍म भी नही मिलेगी क्‍योकि साहित्‍य के प्रति इनका कोई रुझान ही नही है।

ज्‍योति ः ‘आपका बंटी' एक मनोविश्‍लेषणात्‍मक उपन्‍यास है। इसमें आपने दिखलाया है कि आधुनिकीकरण और शहरीकरण की देन एकल-परिवार में से परिवार नामक संस्‍था में जो आस्‍था ख़त्‍म हो रही है उसके क्‍या दुष्‍परिणाम हैं और आजतो यह समस्‍या अपने विकराल रूप में है। परिवार-संस्‍था में आप कितना विश्‍वास रखती हैं?

मन्‍नू ः इसमें कोई सन्‍देह नही कि बंटी की समस्‍या परिवार के टूटने यानी माता-पिता के अलग होने से आरम्‍भ होती है पर वह विकराल रूप तो धारण करती है माँ के पुनर्विवाह से पिता से अलग होने पर भी वह माँ के साथ प्रसन्‍न है उसका घर है फूकी है, बगीचा है, माली काका हैं। माँ के नया-परिवार बसाते ही एक एक करके सब उसकी जिन्‍दगी से निकलते है और वह अपने और माँ के लिऐ एक साथ समस्‍या बन जाता है यहाँ बन परिवार में आस्‍था की नहीं क्‍यों कि परिवार तो अजय और शकुन दोनो ही फिर से बसाते हैं। तुम्‍हारा प्रश्‍न होना चाहिये कि आधुनिकीकरण के बावजूद (स्‍वेच्‍छा से शादी जिसमें निहित है) पति पत्‍नी में तलाक की नौबत क्‍यों आती है और दुर्भाग्‍य से जिनकी संख्‍या दिन...पर...दिन बढ़ती ही जा रही है। वैसे तो हर पति-पत्‍नी के अलग होने के अपने निजी कारण तो होते ही होंगें पर मैं यहाँ संक्षेप में कुछ सामान्‍य कारणों की बात जरूर करना चाहूँगी। पिछले 50-60 सालों में शिक्षित आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र और अपनी अस्‍मितो के प्रति पूरी तरह सचेत होने से स्‍त्री की स्‍थिति मेंं निरन्‍तर सुधार आता रहा हैं या कहूँ कि वह सही अर्थो में आधुनिक बोध से मुक्‍त हुई है। विभिन्‍न क्षेत्रों में बड़े बड़े ओहदो पर कार्यरत होकर उसका आत्‍मविश्‍वास भी बहुत बड़ा हैं अब इनकी तुलना में पुरुषों में कम परिवर्तन आया है। सारी शिक्षा-दीक्षा और आधुनिकता के बाव़जूद वे आज भी अपने सामन्‍ती संस्‍कारों से पूरी तरह मुक्‍त नही हो पाए हैं। आधुनिक से आधुनिक व्‍यक्‍ति की जरा सी खाल खींचिये एक सामन्‍ती पति बैठा मिलेगा। अब ऐसे पुरुष के साथ जिसका जामा तो आधुनिक हो पर संस्‍कार सारे सामन्‍ती हो अपनी सारी कोशिशों के बाव़जूद सही अर्थों में आज की आधुनिक स्‍त्री के लिये तालमेल बैठाना मुश्‍किल होता जा रहा है। परिणाम तलाक।

ज्‍योति ः अभी हाल ही में संडे-पोस्‍ट में राजेन्‍द्रजी ने कहा कि मात्र एक कप कॉफी माँगना भी मन्‍नू को मेरा फ्‍यूडल व्‍यवहार लगता है। इस पर आप क्‍या कहना चाहेगी?

मन्‍नू ः अपनी असली हरकतों को छिपाने के लिये ऐसी बातों के आवरण डालते रहना राजेन्‍द्र की मजबूरी सो है डालते रहते हैं। अभी जुमा-जुमा आठ दिन ही तो हुए हैं मेरी किताब आए। जिन्‍होंने उसे पढ़ा होगा वे ये सारी असलियत जानते ही होगें। मुझे ऐसी बातों पर कुछ नही कहना।

ज्‍योति ः आप भारत के सन्‍दर्भ में विवाह-संस्‍था को कैसे देखती हैं?

मन्‍नू ः मेरे ख्‍याल में तुम भारत के सन्‍दर्भ के विवाह-संस्‍था के भविष्‍य के बारे में जानना चाहती हो... तो इतना समझ लो कि सारे आधुनिकी करण के बावजूद कुछ सदियों तक तो इसे कोई ख़तरा नही है लेकिन इसके स्‍वरूप को ज़रूर बदलना होगा। इसके परम्‍परागत दक़ियानूसी रूप ने तो इसे परिवार में पुरुष के वर्चस्‍व का आधार बना रखा है, जिसमें स्‍त्री के लिये विवाह सम्‍बन्‍ध नही, मात्र बन्‍धन बनकर रह गया हैे। अब आजकी आधुनिक स्‍त्री इस बन्‍धन को स्‍वीकार करने को तैयार नहीं परिणाम जैसी कि अभी हमारी बात हुई थी तलाक की बढ़ती संख्‍या। ऐसी स्‍थिति में विवाह की जरूरत पर हो प्रश्‍न उठने लगे हैं। आजकल विशेषरूप से महानगरो में ‘लिव-इन' परम्‍परा की जो शुरूआत हुई है वह एक तरह से विवाह संस्‍था का नकार ही है। जब तक सम्‍बन्‍ध अच्‍छी तरह निभा साथ रहे...जैसे ही सम्‍बन्‍ध गड़बडाया अलग। यहाँ तलाक भी उस बेहुदी और झंझटिया प्रक्रिया से गुजरने की आवश्‍यकता नहीं होती। यही कारण है कि युवा लोगों का इसकी और रुझान बढ़ रहा है। पर बच्‍चों का इसमे एक तरह से नकार ही है और यदि स्‍वीकार है तो अलग होने पर उनकी समस्‍या फिर बंटी वाली ही होगी। अब बच्‍चों के लिये जो समस्‍या ग्रस्‍त हैं लिव-इन की वह परम्‍परा इस देश मेें जड़े जमा पाएगी भला?सम्‍भव ही नही है। स्‍कैंडिनेवियन-कंट्रीज-स्‍वीडन, फिनलॅड, नार्वे में कोई तीन पीढ़ियाँ से लिब-इन की परम्‍परा चल रही है पर मात्र चालीस पैंतालिस प्रतिशत लोग ही इस तरह रहते हैं। इन आँकड़ो की मेरी जानकारी बहुत प्रमाणिक नही है कुछ कम ज़्‍यादा हो सकती है पर इतना तो तय है कि वहाँ भी आधी जनता के करीब तो विवाह करके ही रहती हैं। अब हमारा तो परम्‍परा वादी देश है यहां से तो विवाह संस्‍था के समाप्‍त होने का प्रश्‍न ही नही उठता। बस जैसा कि मैंने पहले कहा विवाह के रूप को बदलना होगा और महानगरों में तो इसका सिलसिला शुरू भी हो गया है जा धीरे-धीरे आगे भी फैलेगा।

ज्‍योति ः सिंगल पेरेण्‍टस की अवधारणा जोर पकड़ती जा रही है सुस्‍मिता सेन इसका ताजा उदाहरण हैं। क्‍या परिवार को तोड़कर हम समाज की कल्‍पना कर सकते हैं?

मन्‍नू ः अभी तो सिंगल पेरेण्‍टस की स्‍थिति न के बराबर हैं। सुस्‍मिता सेन भी उस बच्‍चे को गोद लिया हुआ कहती हैं। केवल नीना गुप्‍ता ने यह साहस दिखलाया है देखोऋ एक समय में विधवा विवाह वर्जित था आज बच्‍चे के साथ विधवा स्‍त्री से विवाह किया जा रहा है या नहीं? लिव-इन परम्‍परा में तो ऐसी स्‍थितिेयाँ की पूर सम्‍मावना है। जब यह स्‍थिति बढ़ेगी तो इसके समाधान भी निकलेगे वैसे अभी मैं ऐसी लड़कियों की... थोड़ी बहुत अभी वे जहा कही भी हैं प्रशंसा ही करती हूँ जो लड़को के डिच कर देने पर बच्‍चे को अपने बलबूते पर पाल रही है... समाज के सारे आरोप और लाछन सहने के बावजूद।

ज्‍योति ः हिन्‍दी में जो स्‍त्री विमर्श है उसको लाने का श्रेय

बहुत हद्‌ तक राजेन्‍द्रजी को जाता है। हिन्‍दी का स्‍त्री विमर्श महज तीन चार स्‍त्री साहित्‍यकारो के साहित्‍य को ही स्‍त्री विमर्श का पुरोधा मानता है जिससे रमणिका गुप्‍ता, मैत्रयी पुष्‍पा, प्रभा खेतान, जैसी रचनाकार हैं। स्‍त्री विमर्श की जो परिभाषा हिन्‍दी में बन रही है वह है देह से मुक्‍ति। डॉ. धर्मवीर की पुस्‍तक ‘तीन द्विज हिन्‍दू स्‍त्रीलिंगो का चिंतन' मेें इन तीनों पर विचार किया गया है कि ये तीनों अपनी अनैतिकताओं को छिपाने का एक माध्‍यम ढूँढ रही हैं। स्‍त्री विमर्श में आप देह की महत्त्वा को किस तरह समझती है?

मन्‍नू ः एक ही प्रश्‍न में तुम कई बातें मिला देती हो इसलिये मेरे लिये मामला थोडा़ गड़बड़ा जाता है। फिर भी कोशिश करती हूँ कि सिलसिलेवार उत्तर दूँ।

हिन्‍दी साहित्‍य में तो स्‍त्री की दयनीय स्‍थिति, उसके अधिकारों की बात उस समय से लिखी जा रही थी जब विमर्श शब्‍दकोश में कहीं दबा पड़ा था। यह तो कोई पन्‍द्रहएक साल पहले एकाएक कोश से निकला और फिर तो चारों ओर अपना परचम फहराते हुए इसने सबको अपनी गिरफ्‍त में ले लिया नामवर सिंह के विमर्श ‘अशोक वाजपेयी के विमर्श' ‘दलित विमर्श' ‘स्‍त्री विमर्श। साहित्‍य मेें तो बरसों पहले लिखी गई महादेवी वर्मा की ‘श्रंखला की कड़ियाँ' क्‍या स्‍त्री विमर्श की पुस्‍तक नही है? इसीलिए हिन्‍दी साहित्‍य में स्‍त्री विमर्श का श्रेय राजेन्‍द्र को मिलने का तो प्रश्‍न ही नही उठता है हाँ हंस द्वारा प्रचारित स्‍त्री विमर्श का श्रेय जरूर राजेन्‍द्र यादव को जाता है। यदि अपने स्‍त्री विमर्श के प्रचार प्रसार के लिये उन्‍होंने मात्र तीन महिला-साहित्‍यकारों को इसके केन्‍द्र में रखा है तो यह उनका अधिकार है, इस पर मुझे कुछ नही कहना।

डॉ. धर्मवीर की पुस्‍तक मैंने भी देखी है ...उन्‍होंने इन तीन महिलाओं के बारे में जो निष्‍कर्ष निकाले है वह उनकी अपनी राय है और व्‍यक्‍ति को किसी भी विषय पर अपनी राय रखने और उसे लिखित रूप से व्‍यक्‍त करने का भी पूरा अधिकार तो है ही। उन्‍होंने बस वही तो किया है। बेहतर होगा हम असली बात पर चर्चा करे यानी कि स्‍त्री विमर्श का वास्‍तविक रूप।

मेरे हिसाब से ‘हंस' का जो स्‍त्री विमर्श है वह ‘कथनी' का स्‍त्री-विमर्श है.... मात्र बौद्धिक विलास और मेरा विश्‍वास है ‘करनी' के स्‍त्री विमर्श पर। आज दूर-दूर के कस्‍बो गाँवों में बेपढ़ी लिखी स्‍त्रियाँ कुछ संस्‍थाओें की मदद से जिस प्रकार अपने अधिकारो के प्रति सचेत होकर उन्‍हें पाने के लिये साक्रिय हो रही हैं वह ‘करनी' का विमर्श है। उदाहरण के लिये राजस्‍थान के अनेक गावो में चलाई जा रही साथिन संस्‍था। कैसे गाँव की स्‍त्रियाँ पहले सुन-समझ कर अपने अधिकारों के प्रति सचेत होती है और फिर उन्‍हेंं पाने के लिये... स्‍त्रियाँ के प्रति होने वाले किसी भी अन्‍याय और अत्‍याचार के विरुद्ध सामूहिक मोर्चा बाँधती हैं। इसी तरह हरियाणा की सरपंच महिलाओं का क़िस्‍सा पढ़ा। कैसे पहले तो वह अपने अधिकारो के प्रति सचेत हुई और फिर हिम्‍मत जुटाकर निष्‍क्रिय पड़े उस सरकारी तंत्र की कलाई मरोड़ कर उसे सक्रिय किया और औरतो को रोज चार-पाँच किलोमीटर से पानी लाने की यातना से मुक्‍ति दिलाई। पति या ससुराल द्वारा प्रताड़ित स्‍त्री का मुक़दमा सामने आया नही कि सबके अन्‍याय को ठिकाने लगाते हुए फैसला स्‍त्री के पक्ष में। ऐसे ही कई शहरों में स्‍त्रियो की काउन्‍सलिंग करने वाली संस्‍थाएँ पहले बातचीत से पतियों को रास्‍ते पर लाने की कोशिश करती है बाद में स्‍त्रियों को उनके कानूनी अधिकरों की जानकारी देकर जरूरत पड़ने पर उनके पतिया का कोर्ट में भी घसीटती हैं। इस तरह आज हर प्रान्‍त के शहरों में, गांवों में बिना किसी प्रचार प्रसार के स्‍त्रियों की स्‍थिति सुधारने के लिये कई संस्‍थाएँ सक्रिय है और मेरे लिये यही असली स्‍त्री विमर्श है।

ज्‍योति ः पर ये सारे उदाहरण क्‍या स्‍त्री सशक्‍तीकरण के नही है?

मन्‍नू ः तुम क्‍या स्‍त्री सशक्‍ती करण को स्‍त्री विमर्श सें भिन्‍न मानती हो?

ज्‍योति ः अच्‍छा अब देह की मुक्‍ति पर आप क्‍या सोचती हो।

मन्‍नू ः बेहतर तो होता कि राजेन्‍द्र खुद स्‍पष्‍ट करते कि उनका इससे क्‍या तात्‍पर्य है? अपनी बात मैं स्‍पष्‍ट कर देती हूँ इस पुरुष प्रधान समाज में सदिया से स्‍त्री के शरीर के साथ पवित्रता का जो तमगा लटका रखा है उससे स्‍त्री के मुक्‍ति। क्‍यो कि इसके चलते ही तो आज तक विधवा तलाक़शुदा या बलात्‍कार की शिकार स्‍त्रियाँ त्‍याज्‍य मानी जाती थी किसी एक के साथ सम्‍बन्‍ध जुड़ने पर फिर वह किसी और के साथ सम्‍बन्‍ध रखने लायक मानी ही नही जाती थी... क्‍यों कि उस स्‍थिति में तो उसका शरीर अपवित्र माना जाता था। पुरुष चाहे दस जगह मुँह मारता फिरे उसके लिये पवित्रता का ऐसा कोई बन्‍धन कभी रहा ही नही पर स्‍त्री को केवल एक पुरुष यानी पति के साथ ही सारा जीवन गुजारना होता था । पति की मृत्‍यु के बाद वैधव्‍य-जीवन की यातनाओें से कौन परिचित नही? सो मेरा भी आग्रह है कि स्‍त्री के शरीर को पवित्रता के इस तमगे में बिल्‍कुल मुक्‍त किया जाए और जो अधिकार पुरुष को प्राप्‍त हैं वे उसे भी मिले।

हाँ देह की मुक्‍ति अगर किसी के लिऐ सेक्‍स की मुक्‍ति का पर्याय हो यानी कि स्‍त्री को एक साथ कई जगह सेक्‍स सम्‍ंबध रखने की छूट हो तो इससे मेरी असहमति है। कम से कम इस देश में तो यह सम्‍भव भी नहीं क्‍यों कि इसके लिऐ एक सम्‍बन्‍ध हीन जीवन अनिवार्य है और आज तक तो हमारे देश का स्‍त्री विमर्श न पति-परिवार निरपेक्ष है...न सन्‍तान-निरपेक्ष हाँ, इतनी छूट तो उसके लिये अनिवार्य है कि एक या पति के साथ सम्‍बन्‍ध गडबड़ाने पर वह उसे छोड़कर दूसरे के साथ सम्‍बन्‍ध जोड़ ले... पर कइयो के साथ सेक्‍स सम्‍बन्‍ध साथ-साथ चलने वाली स्‍थिति कम से कम मुझे तो स्‍वीकार्य नही, क्‍यों कि सम्‍बन्‍धों की भी अपनी एक नैतिकता होती है एक गरिमा होती है।

ज्‍योति ः स्‍त्री विमर्श कारों की जब भी चर्चा होती है तो आप उसकी गिनती में नही आना चाहती। जबकि सच यह है कि आपका साहित्‍य और आपका जीवन स्‍त्री विमर्श के कई आयामों को उठाता है। अभयकुमार दुबे भी अपने तद्‌मव वाले लेख में इस ओर इशारा करते है। क्‍या स्‍त्री विमर्श किसी झण्‍डे तले इकठ्‌ठे होने का नाम ही है।

मन्‍नू ः स्‍त्री विमर्श की धारणा को अपने साहित्‍य और जीवन में ढालने के लिये इस झण्‍डे के नीचे आना क्‍या जरूरी है? सच पूछो तो मैने तो विमर्श नाम ही कोई दस वर्ष पहले ही सुना होगा। इसके पहले तो न लेखन न भाषण में इसका कँही अता-पता ही नही था। पर मैं तो अनभिज्ञता के अपने उसी पुराने ठीये पर ही खड़ी रही। नाम तो जान लिया पर उसके साथ और लोगों की तरह जुड नही सकी। पर बिना जुड़े ही मुझे जो लिखना है ,लिखूँगी और जो करना है सोकरुँगी तो सही ही। अरे मेरी बात छोड़िये... मैंने अभी कस्‍बों गाँवों की जिन बेपढ़ी लिखी स्‍त्रियों का जिक्र किया था जो कैसे धीरे धीरे अपने अधिकारों के प्रति सचेत होकर उन्‍हें पाने के लिये सक्रिय भी हो रही हैऋ वे भी तो न इस झण्‍डे के नीचे है... न ही इसका नाम जानती हैं । पर स्‍त्री विमर्श में उनका योगदान कम तो नही ।

ज्‍योति ः दलित विमर्श और स्‍त्री विमर्श दोनो ही हशिये पर के विमर्श हैं। पर जब हम दलित साहित्‍य को देखते हैं तो उसमेे स्‍त्रियों की स्‍थिति उतनी ही बदहर है। ऐसे में स्‍त्री दोहरी मार रखा रही है। मोहनदास े नैमिश्‍यराय का एक महत्‍वपूर्ण लेख भी है इस सन्‍दर्भ में -दोनो गाल पर थप्‍पडे़ ऐसा क्‍यों है कि ये दोनो अस्‍तित्‍ववादी को विमर्श एक साथ नही चल पाते ?

मन्‍नू ः ज्‍योति समझ नही आता कि तुम्‍हारे इस प्रश्‍न पर हँसू या तुम्‍हारी अनभिज्ञयता पर चकित होऊँ। अरे इस बात को कौन नही जानता कि पुरुष हर जगह पुरुष ही होता है, वह चाहे सवर्ण वर्ग का हो या दलित वर्ग का। हशिये में पडे दलित वर्ग का पुरुष अपनी अस्‍मिता के लिये... अपने अधिकारो के लिये सवर्ण वर्ग से चाहे लोहा लेता रहे पर हाशिये में पड़े, दोहरी मार से रुटी स्‍त्री के अधिकरों की बात ... उसके सुख की बात तो कभी भूलकर भी नही सोचेगा। सोचना मलतब अपने अधिकारों मेे कटौती करना, ऐसा भाला वह क्‍यों चाहेगा? ऐसी बातें सोचना तक उसे दायरे के बाहार की बात है। शिक्षित होकर आज स्‍त्रियाँ हो इस दिशा में कुछ सचेत होने लगी है निर्मला पुतुल की कविताएँ इस बात का प्रमाण है जैसे-जैसे स्‍त्रियो में यह चेतना बढे़गी वे खुद अपने अधिकारो के लिये लड़गी और वह दिन भी अब बहुत दूर नहीं है यह भी सच है कि जैसे उनकी यातना दोहरी है वैसे ही उनकी लड़ाई भी दोहरी होगी-पहले अपने वर्ग के पुरुषों से बाद में सवर्णो से।

ज्‍योति ः एक अन्‍य महत्त्वपूर्ण प्रश्‍न, आज एक बहुत ही आमधारणा बना दी गई है कि यदि आप बौद्धिक है तो प्रगतिशील हैं और यदि प्रगतिशील है ता आपको धर्म , पूजा, पाठ, और त्‍यौहार आदि इन सब चीज़ों से कटे रहना पडे़गा। सही मायने में यदि पूरी तरह खु़द को धर्म से काट लिया जाए तो जीवन से अनुराग ही खत्‍म हो जाएगा। एक खालीपन आ जाएगा। ईश्‍वर और कट्टरता से अलग करेके भी ता इसे देखा जा सकता है। ईश्‍वर में आस्‍था संघर्ष के दिनों को सबसे बड़ा साथी है बड़े-बडे़ विकसित देशों में भी धर्म प्रभाव हीन तो नही हुआ है। आपकी इस बारे में क्‍या राय है। रिचर्ड डॉकिन्‍स की पुस्‍तक द गाड डिल्‍यूजन्‍स तथा भारत में ब्‍ैक्‍ै का धर्म में लोगो की आस्‍था का सर्वेक्षण एक अलग तरह से सोचने की माँग करता है।

मन्‍नू ः यह प्रगतिशील लोगो की नही बल्‍कि प्रगतिवादी लोगो की धारणा है जो लोगो को ईश्‍वर और धर्म से करने के लिये पेरित करती है। उनके हिसाब से व्‍यावहारिक स्‍तर पर धर्म लोगों के जीवन में अफीम का काम करता है। प्रश्‍न करने की उनकी बुद्धि को कुन्‍द करके उनकेे विकास को एक तरह से अवरूद्ध ही कर देता है। पर यही प्रगतिवादी मार्क्‍सवादी-कोलकाता में जहाँ सरकार भी उन्‍ही की है और बहुसंख्‍यक जनता भी दूर्गापूजा के समय किस कदर पगला जाते है यह तो मैने खुद अपनी आँखो से देखा है। दुर्गा जी स्‍थापना से लेकर भसन तक ये शायद अपनी घोषणाएँ भूल जाते है। दुर्गा पूजा इन का धार्मिक आयोजन भी है और शायद वर्ष का सबके बड़ा त्‍यौहार है। किसी भी धर्म के सिलसिले मेें कट्टरता की तो कतई पक्षध नही हूँ कट्टरता के बिना भी तो ईश्‍वर में ,धर्म मेंंं एक आस्‍था रखी जा सकती है और मेरा विश्‍वास है बल्‍कि अनुभव है कि यह आस्‍था संकट के दिनों में आपको एक अनाम सी शक्‍ति देती है। मैंने आज तक कभी पूजा पाठ नही किया, मन्‍दिर नही गई जैनी होने के बाव़जूद कोई व्रत उपवास तक नही किया उसके बाव़जूद ईश्‍वर मेेंं मेरी अटूट आस्‍था है बड़े से बड़े संकट के समय यदि कोई मुझे याद आता है तो या तो ईश्‍वर या फिर माँ जो मृत्‍यु के बाद मेरे लिये ईश्‍वर का ही पर्यायत बन गई है कौन नही जानता कि इस देश कीे बेहद गरीब संकट ग्रस्‍त जनना अपने सारे दुखों को भगवान भरोसे ही तो झेलती है।

जहाँ तक त्‍यौहारो की बात है, जीवन की उबाऊ एकरसता को तोड़ने के लिये त्‍यौहार भी अनिवार्य है। हालाकि बाजारवाद के चलहे आज उनका रूप काफी विकृत हो गया है।

रही ‘द गॉड डिल्‍यूजन' पुस्‍तक की बात या भारत में ब्‍ैक्‍ै के सर्वेक्षण का सन्‍दर्भ सो फिलहा ल तो मैं दोनो हो वातो से अनभिज्ञ हूँ

ज्‍योति ः यह तो सच है कि राजेन्‍द्र यादव ने अपनी दूसरी पारी की शुरूआत ‘हंस' से की जितने चर्चित वे एक लेखक क रूप में हुए उससे कहीं अधिक सम्‍पादक के रूप में। आखिर हंस में ऐसा क्‍या खास और नया था कि हंस भी इतनी सफल पत्रिका हुई और राजेन्‍द्र जी भी इतने सफल सम्‍पादक?

मन्‍नू ः इसमें कोई सन्‍देह नहीं हैं हंस ने राजेन्‍द्र को अपनी प्रतिष्‍ठा के चरम तक पहुँचाया अब हंस में ऐसा क्‍या था, यह तो उसके पाठक बताएँगें। मेरा जहाँ तक ख्‍़याल है पाठको का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो इसके संपादकीय का घोर प्रशंसक है। अनेक पाठकों के पत्र तो इसी आशय के आते है कि हम आपके संपादकीय के लिये ही हंस लेते और पढ़ते हैं। हालाँकि यह मेरी अपनी राय कतई नही है।

ज्‍योति ः हंस का भविष्‍य क्‍या हैं?

मन्‍नू ः यह हंस के लोगो से पूछो मैं कैसे बता सकती हूँ?

ज्‍योति ः आपका और राजेन्‍द्रजी का सम्‍बन्‍ध अब बहुत हद तक खुल कर आ गया है। दो छोटे छोटे प्रश्‍न जो अब भी खुल नहीं पाए हैं उसमें एक तो यह कि राजेन्‍द्र जी के वर्तमान जीवन पर, दिनचर्या और हंस के दफ़्‍तर पर क्‍या आप अब बिल्‍कुल विचार नही करती? दूसरा यह कि आपके सम्‍बन्‍ध अब क्‍या बिल्‍कुल समाप्‍त हो गये है ?

मन्‍नू ः ज्‍योति, इस तरह के साक्षात्‍कारो में अपने व्‍यक्‍तिगत जीवन पर बात करना मै बिल्‍कुल पसन्‍द नहीं करती। जितना लिखना था लिख दिया... अब बस।

ज्‍योति ः अपने समकक्ष साहित्‍यकारों में राजेन्‍द्र जी के अलावा नामवर जी जीवित हैं जिनसे आपका परिवारिक सम्‍बन्‍ध रहा है। नामवर जी का जितना राजेन्‍द्र जी से सम्‍बन्‍ध रहा उतना ही आपसे भी । उनके पत्रों मेंं आपका उल्‍लेख भी देखने को मिलता है । राजेन्‍द्रजी तो उन्‍हें कभी अपना अच्‍छा मित्र नही मान पाये पर आप अपने को उनके कितना करीब मानती हैं?

मन्‍नू ः मैने नामवर जी को अग्रज की तरह माना और आज भी वैसे ही मानती हूँ। कुछ बरसो पहले तक जो घरेलू गोष्‍ढियाँ होती थी उसमें वे आते थे आते थे और इसमें कोई सन्‍देह नही कि उनकी बाते मुझे बहुत इन्‍सपायरिंग लगती थी। अब गोष्‍ठियाँ ही समाप्‍त हो गई तो मिलना भी बन्‍द सा ही हो गया पर राजेन्‍द्र की तरह उनसे मेरी अन्‍तरंगता तो कभी रही ही नही। यह तुम्‍हारी गलत धारणा है कि राजेन्‍द्र कभी उन्‍हें अपना अच्‍छा मित्र नही मान पाए। मित्रता का यह मतलब तो नही कि विचारो में भी असहमति न हो और उसे खुलकर व्‍यक्‍त न किया जाए। राजेन्‍द्र बोलने के साथ-साथ उसे लिखकर भी व्‍यक्‍त करते हैं, नामवर जी केवल बोलकर सीलिये उनका विरोध ज्‍यादा प्रकट होता है। अभी कुछ दिन पहले ही प्रियंवद को साक्षात्‍कार देते हुए नामवर जी ने कहा था कि ‘राजेन्‍द्र ही मेरे एक मात्र मित्र है।' राजेन्‍द गद्‌गद्‌ होकर इसका उल्‍लेख करते रहते है। अब यह मित्रता इस हद्‌ तक तो एकतरफ। हो ही नही सकती पर मेरे साथ अन्‍तरंग मित्रता वाली बात न पहले थी न आज है। हाँ वक्‍त जरुर कभी फोन पर बात हो जाती है पर मात्र एक दो मिनिट की और वह तो हमेशा रहेगी ही इतना जानती हूँ कि मेरे मन में यदि उनके लिये सम्‍मान है तो उनके मन में भी मेरे लिये थोड़ा स्‍नेह तो अवश्‍य है।

ज्‍योति ः उन्‍हे आप बिल्‍कुल शुरूआत सेे देख रही हैं। उन पर यह आरोप लगता रहा है कि वे स्‍थिति को देखकर अपना विचार बदल देते हैं। पंत वाला विवाद उनमे सबसे ताजा है। आपको क्‍या लगता है?

मन्‍नू ः पिछले कुछ वर्षो से लिखित और मौखिक रूप से बराबर नामवरजी पर यह आरोप लगता रहा है तो यह निराधार तो होगा नही। मैंने तो पिछले कुछ वर्षो सेें उनके भाषण सुने ही नही पर पंत वाला भाषण संयोग से वसुधा में पढ़ने को मिला। महादेवी जी की शतवार्षिकी का अवसर, तो उन्‍हें ऊपर तो उठाना ही था... तो उनके पद्य गद्य और व्‍यक्‍तिगत जीवन को आधार बनाकर जितना चाहते उठाने... पंत को गिराना क्‍या जरूरी था? इसमें कोई सन्‍देह नही कि पंत की बाद की रचनाएँ उनकी आरम्‍भिक रचनाओं की अपेक्षा बहुत ही हल्‍की हैं... उनके बारे में नामवरजी ने कोई नकारात्‍मक टिप्‍पणी की तो इसे कुछ बहुत अनुचित तो नही कहा जा सकता । विचार हैं ये उनके, जिन्‍हें अभिव्‍यक्‍त करने की उन्‍हेें पूरी स्‍वतन्‍त्रता भी है। पर कूड़ा जैसे शब्‍दों का प्रयोग? नामवरजी जैसे दिग्‍गज समीक्षक सेे भाषा के संयम की अपेक्षा तो की ही जाती है। कूड़ कह देने से महादेवीजी ज़्‍यादा बड़ी हो जाएगी

कवि कवि की तुलना तो खौर फिर भी वाजिव है मुझे हँसी तो तब आई और हँसी से भी ज्‍यादा आश्‍चर्य हुआ जब महादेवी जी को उठाने के लिये उन्‍होंने एक तब दूलती मुझ पर झाड़ दी। वे पांक्‍तियाँ ज्‍यों कि त्‍यों कोट करूगी तभी बान समय में आएगी।

“सम्‍पूर्ण लेखन में महादेवी जी ने जिस व्‍यक्‍ति से उनकी शादी हुई थी उसके बारे में एक भी कटु शब्‍द नही लिखा। आजकल दो कहानीकारों स्‍त्री और पुरुष के बीच जो लिखा पढ़ी हो रही है वह आप पढ़ ही रहे होगे। कोई बख्‍शता नहीं है। इसलिये महादेवी के स्‍त्री-विमर्श पर बात करते हुए ये बात बराबर ध्‍यान में रहें। '' अगर महादेवी जी कुछ समय के लिये भी पति के साथ रहती... उनकी ज्‍यादतियों और उनलके अनौतिक सम्‍बंधो को बर्दाश्‍त करती और फिर भी कभी मँह नही खोलती तो तुलना करना बिल्‍कुल वाज़िब होता। पर इस स्‍थिति में... खैर छोड़िये इस प्रसंग को।

ज्‍योति ः आपकी पुत्री रचना के बारे में बहुत कम जानकारी है। आपका बंटी में कँहो आपकी बेटी की भी छवि हैं?

मन्‍नू ः उपन्‍यास की भूमिका में ही मैने स्‍पष्‍ट रूप से लिख दिया था कि किन तीन बच्‍चों की प्रेरणा से मैं यह उपन्‍यास लिख पाई। अन्‍नतः जब ये तीनों बच्‍चे गड्डमड्ड होकर एक सामाजिक समस्‍या के रूप में परिवर्तित हो गये तभी बंटी का जन्‍म हुआ था। उपन्‍यास लिखते समय रचना की उम्र भी बंटी के बराबर ही थी और मैं कुछ-कुछ उन्‍हीं हालात से गुज़र रही थी, इसलिये कँही अचेतन में उसकी भी कोई परोक्ष सी छवि उपन्‍यास में आई हैे, तो नही कह सकती पर प्रत्‍यक्ष रूप से तो वह कहीं नहीं है।

ज्‍योतिः आपके मना करने के बावजूद एक प्रश्‍न जरूर पूछना चाहती हूँ। कभी-कभी लोग जब कहते है कि पैंतीस साल तक तो साथ रह ली... राजेन्‍द्र जी से जितना फ़यदा उठाना था उठा लिया और अब यह अलग होने की मुदा्र। आपको भी बुरा तो जरूर लगेगा पर में चहती हूँ कि आप इसका उत्‍तर जरूर दें।

मन्‍नू ः नहीं बिल्‍कुल बुरा नही मान रही। पर उत्‍तर (कुछ देर सोचने के बाद) आत्‍मीय सम्‍बन्‍धों के दौरान भी कभी-कभी मनुष्‍य की यंत्रणाओं से असह्‌य यातनाओं के बीच से गुजरना पड़ता है, पर उस सबके बीच भी उम्‍मीद की डोर पकड़े कैसे वह आशा-अपेक्षाओं के बीच डूबता उतराता ही रहता है। मनुष्‍य-मन की इन बारीकियों की भावनाओं की... इस तरह ऊहापोह को जो लोग बिल्‍कुल समझ ही नही पाते... उसे हमेशा लाभ-हानि, फायदा नुकसान की तराज़ू पर ही तौलते रहते हैं, उनकी बात का भी कोई जवाब हो सकता हैं क्‍या? छोड़ो इस बात को।

ज्‍योतिः लेकिन अन्‍नतः फिर आपने सम्‍बन्‍ध तोड़ा ही।

मन्‍नू ः जीवन में एक बिन्‍दु ऐसा आता है, जब महसूस होता है कि बस। अब और आगे नहीं, और वही जीवन का निर्णायक क्षण होता है।

ज्‍योति ः बेटी ने इस अलगांव को किस तरह लिया?,

मन्‍नू ः बहुत ही सहज रूप में लिया। तब तक उसकी शादी हो चुकी थी और आज उसके हम दोनों से अलग-अलग और बहुत अच्‍छे सम्‍बन्‍ध हैं

ज्‍योति ः अभी हाल ही में कृष्‍णा सोबती को व्‍यास सम्‍मान देने की घोषणा की गई, और उन्‍होंने सम्‍मान ठुकरा भी दिया। आप इसे कैसे देखती है?

मन्‍नू ः उन्‍होने इंकार करके बहुत ही सही कदम उठाया । व्‍यास सम्‍मान तो उन्‍हें बहुत पहले मिलना चाहिए था। उनका कद बहुत ऊँचा हैं। व्‍यास सम्‍मान देने वाली समिति को यह सोचना चाहिऐ था। कृष्‍णा जी ने अस्‍वीकार करके अपने व्‍यक्‍तित्‍व की गरिमा के अनुकूल ही कदम उठाया।

ज्‍योति ः कृष्‍णा जी कहती है कि ये सम्‍मान अब युवाओं को दिया जाना चाहिए ।

मन्‍नू ः यह तो और भी अच्‍छी बात है। साहित्‍य अकादमी की महन्‍तर सदस्‍यता के बाद कोई सम्‍मान बाकी रह भी नहीं जाता। युवाओं के पक्ष में उनका यह निश्‍चय नििश्‍चित रूप से सराहनीय है।

ज्‍योति ः बार-बार इस घोषणा के बावजूद कि आपका लिखना बंद हो गया। कुछ वर्षों से टुकड़ों टुकड़ों में लिखी जा रही आपकी ‘एक कहानी यह भी' पुस्‍तक अंततः हमें पढ़ने को मिल ही गई। ऐसी ही कोई और रचना तो नही चल रही... जो निकट भविष्‍य में हमें पढ़ने को मिल सकेगी?

मन्‍नू ः हाँ, लिखना मुझे अब पक्‍का शुरू करना है। अपने पिता पर और कमलेश्‍वर पर शब्‍द चित्र लिखना है। कमलेश्‍वर की मृत्‍यु के बाद लोगों ने उन पर बहुत लिखा क्‍योंकि मृत्‍यु के बाद हर व्‍यक्‍ति महान्‌ बन जाता है। मुझे भी कई लोगों ने कहा कि मैंभी कुछ लिखू पर कमलेश्‍वर की पूजा अर्चना का दौर जरा खत्‍म हो जाए। मैं उनके सकारात्‍मक और नकारात्‍मक दोनो पक्षों पर लिखूगीं।

रिंकी भट्‌टाचार्य (विमल राय की बेटी) ने कुछ समय पहले अलग-अलग क्षेत्रों की छः महिलाओं से कहा कि अपने पिता का यदि एसेसमेंण्‍ट करें तो क्‍या पाएँगीं। मुझे भी लिखने को कहा गया। मैंने हिन्‍दी में लिखा,सुधा अरोड़ा ने उसका अनुवाद किया, और मीनाक्षी मुखर्जी ने उसकी समीक्षा की, और मुझे कटिगं भी भेजी और कहा कि आपका हिस्‍सा सबसे बढ़िया हैं

नामवर जी ने जब ‘एक कहानी' यह भी पढ़ी तो उसकी खूब तारीफ की और शुरू के हिस्‍से के बारे में कहा कि मैं अपने पिता और उज्‍जैन वाले हिस्‍से पर विस्‍तार से लिखू । सही बात तो यह है कि पिता जी के जीवनकाल में उनसे वैचारिक विरोध तो बहुत रहा, उनसे खूब लड़ी भी, पर आज बैठ कर देखने पर उनके कई प्‍लस प्‍वाइंट्‌स दिखाई देते है। कई कहानियाँ हैं, जो पूरी करनी हैं लेकिन आज कल तो कलम तक पकड़ना भारी लग रहा हैं। अब तो तुम लोग बस यही दुआ करो कि जल्‍दी से जल्‍दी मुझे इस बीमारी से मुक्‍ति मिले, रोज इस सेडेटिव की इतनी मात्रा न खानी पडे़।

ज्‍योति ः मैं तो हार्दिक रूप से आपके स्‍वास्‍थ्‍य की दुआ करूगीं ही, पर विश्‍वास रखिये आपके पाठक भी यही दुआ करेंगे कि आप जल्‍दी से जल्‍दी स्‍वस्‍थ होकर पहले की तरह सक्रिय होंगी, जिससे हमें फिर से आपकी रचनाएँ पढ़ने का मौका मिले, धन्‍यवाद।

--

मन्‍नू भण्‍डारी

103 हाज खास अपार्टमेन्‍ट्‌स

दिल्‍ली

 

ज्‍योति चावला

। 561/2 शास्‍त्री नगर

दिल्‍ली 110052

 

E-mail : jyoti-chl@redffmail.com

(शब्द संगत / रचना समय से साभार)

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][random][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][random][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][random][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][random][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget