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अनुरूपा चौघुले की कविताएँ - मेरे कॉलेज की वह लंबी लड़की

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ओस बनूँगा तांक झांक कर रही दुपहरिया अल्हड़ हो गई सारी अमियाँ गुलमोहर से कुमकुम बरसे सजी सेज पर सजनी हरसे छांव नीम की ठंडी ठंडी मदहोशी में आंखे मूँदी मटके से अमृत ले पीया तर हो आया रोआं रोआं आँगन में तसला भर पानी रोज़ नहाती चिड़िया रानी दादी कैसे रोज़ दिखाती बबुआ देख, गिलहरी प्यारी धन्य भाग , रामजी की दुलारी अम्माँ की लोरी में सपनों की डोरी से बंधा हुआ था गाँव इस मिट्टी में सने सने ही बूढ़े हो गए पाँव मैं इनमें था कहीं न खोया जीवन के लंबे धागे में एक एक कर इन्हें पिरोया नहीं मिटूँगा इनमें मिलकर इनमें मिलकर जी जाऊंगा हवा बनूँगा ,ओस बनूँगा सौंधी मिट्टी ,दूब बनूँगा अमराई का बौर बनूँगा अमलतास का फूल बनूँगा यहीं रहूँगा आसपास मैं इनमें खोजो तभी दिखूँगा तभी दिखूँगा । ************************************* मेरे कॉलेज की वह लंबी लड़की जिसे मैंने गूंगा प्रेम किया था वेलेंटाइन पर कभी फूल नहीं दिया था मेरे एकतरफा प्रेम की उसे भनक पड़ गई थी एक दिन वह तैश में आकार बोली थी देखो तुम्हारा मुझे प्यार करना एकदम गलत है मेरी सगाई हो गई है मैंने हँसकर उसी की तर्ज़ पर कहा देखो प्या…

महावीर सरन जैन का आलेख - भारतीय भाषा परिवार

भारोपीय भाषा परिवार : प्रोफेसर महावीर सरन जैन(मैंने इधर कुछ विद्वानों के आलेख पढ़े हैं जिनमें यूरोपीय भाषाओं के अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति को संस्कृत से खोजने का प्रयास किया गया है। उन पर कोई टिप्पणी न करके, यहाँ मैं 'भारोपीय भाषा परिवार' के बारे में टिप्पण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसके अवलोकन के बाद अध्येता स्वयं अपना अभिमत, धारणा अथवा नजरिया स्थापित कर सकें।)भारत-यूरोपीय भाषा परिवार का महत्व जनसंख्या, क्षेत्र-विस्तार, साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, वैज्ञानिक प्रगति, राजनीति एवं भाषा विज्ञान- इन सभी दृष्टियों से निर्विवाद है। नामकरणःभारत-यूरोपीय परिवार को विभिन्न नामों से अभिहित किया गया है। आरम्भ में भाषा विज्ञान के क्षेत्र में जर्मन विद्वानों ने उल्लेखनीय कार्य किया और उन्होंने इस परिवार का नाम 'इंडो-जर्मनिक' रखा। यूरोप के इंगलैण्ड, इटली, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, रोमानिया, रूस, पोलैण्ड आदि अन्य देशों में भी इसी परिवार की भाषाएँ बोली जाती हैं, पर वे न तो भारतीय शाखा के अन्तर्गत आती हैं और न जर्मनिक शाखा के। यूरोप के अन्य देशों के विद्वानों को यह नाम इसी कारण स्वीकृत नहीं हुआ।…

डाक्टर चंद जैन अंकुर की कविता - संगे मर मर से श्री विग्रह तक

मेरी कविता  " संगे मर मर से श्री विग्रह तक" उस अमर चेतना का प्रतिनिधित्व करता  है जो कण कण में समाया है । जड़ और चेतन से विश्व विकसित हुआ है पर जड़ता पूरे मानव जगत में धुंद बन कर छा गया  है  । आज का मानव समाज भौतिकता के पागलपन से इतना ग्रसित हो गया है कि सारे रिश्ते नाते गौड़ हो  गये  हैं । मनुष्य चेतनाविहीन होते जा रहा है और मानव  मुद्रायंत्र  बन गया है ,सचमुच ये कलयुग का विशेष सोपान है । ईश्वर के मंदिर और मूरत में भी कालेधन से बने  हीरे जडित स्वर्ण मुकुट ,हार अर्पित कर उस परमात्मा का विशेष प्रतिनिधि बन जाता है ।     मनुष्य में मनुष्यता के "अंकुर "को तलाशता ये कविता अपनी चेतना को संगे मर मर संग जीने का प्रयास किया  है। अद्वैत की कल्पना द्वैत की सापेक्षता में संभव  है । ये कविता जड़ता का विरोधी है ,पर जडत्व का नहीं । संग मर मर की यात्रा पत्थर से मूरत ,मंदिर ,मस्जिद और गुरुद्वारा बनने तक की आध्यात्मिक यात्रा है । गुरु और ईश्वर की प्रतिमा को श्री विग्रह कहा गया है और  विग्रह्जी भी कहा गया है । हमें ये  जीवन  जिस अनंत से मिला है उनकी प्रति मूर्ति  बना कर हम अपना प्राण उस…

अनिल मेलकानी की कविताएँ

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ख़ामोशी
कितना अजीब?
कि इतनी नजदीकियों बाद भी,
तुम हमें आम-लोगों में ही गिन पाते हो;
और ये भी,
कि इतना कुछ  होते हुए;
तुम हमें दिल के उतने ही करीब नज़र आते हो !
कुछ बातें,
लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं की जाती;
फिर तुम न जाने क्यों, हर एहसास को,
कह कर ही जताते हो;
अगर हम कहते,
तो फिर कह जाते दिल की हर बात;
तुम अगर कहते भी हो,
तो नजर से कुछ और,  जुबाँ से कुछ और कह जाते हो !
वादे :)कई सारे तुम्हारे
मुझे अब तक याद आते हैं
लोगों को तो पूरे किये वादे भी याद नहीं रहते
और मुझे तो कमबख्त अधूरे ही अब तक सताते हैं
रिश्तों के कमज़ोर धागे तोड़ कर तुम
न जाने अपनी यादों का भारी झोला क्यों दे गयी हो मुझे
देखो ना अब तक छुपा कर रखी हैं
तुम्हारी इतनी बेशकीमती यादें
बस कभी-कभी ही निकालता हूँ नज़र के सामने, अकेलेपन में
जब कभी लडखडाता हूँ, तो हाथ सबसे पहले इन्हें ही सम्हालता है
तुम जानती थी ना अधूरेपन की मिठास ?
बस थोडा सा प्यार का रसगुल्ला चखा दिया और छोड़ दिया फिर तड़पने को
और ये तो चीज़ भी ऐसी कि जिसकी दुकान भी एक ही है
और एक तुम ही अकेली दुकानदार
वहीँ मेरे जाने पर पाबंदी हो, तो फिर बचा क्या है ?
सुनो ! और कुछ नहीं तो अपनी यादों का बोझ ही वापस ले…

बशर नवाज की नज्म - मुझे जीना नहीं आता

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मुझे जीना नहीं आता
                                     मूल उर्दू शायर- बशर नवाज
                                     अनुवाद- डॉ. विजय शिंदे

मैं जैसे दर्द का मौसम, (2)
घटा बन कर जो बस जाता है आंखों में
इंद्रधनुष के रंग, खुशबू नजर करने की तमन्ना लेकर
जिस नजारे तक जाऊं
उसे आंसुओं के कोहरे में, डूबा हुआ पाऊं। (2)मैं अपने दिल का सोना, प्यार के मोती,
तरसते उम्मीदों के फूल, जिस दरवाजे पर सजाता हूं,
वहां जैसे रहता नहीं कोई। (2)बना हूं कई दिनों से, आवाज ऐसी
जो दीवारों से टकराए,
हताश होकर लौट आए,
धडकते दिल के सूनेपन को सूना और कर जाए। (2)मैं अपने आपको सुनता हूं,
अपने आपको छूता हूं,
अपने आप से मिलता हूं, सपनों के सुनहरे आईना घर में।
तब मेरी तसवीर मुझ पर मुस्कुराती है
कहती यह है
हुनर तुझे जीने का न आना था, नहीं आया। (2)आवाजें पत्थरों की तरह मुझ पर
मेरे सपनों के बिखरते आयना घर पर बरसती है।
इधर तारा, उधर जुगनू
कहीं फूल की पत्ती, कहीं ओस का एक आंसू,
बिखर जाता है सब कुछ आत्मा की सुबह में। (2)मैं फिर से जिंदगी जीने के अरमानों में
एक-एक रेशे को चुनता हूं, सजाता हूं, नई मूरत बनाता हूं।
इंद्रधनुष्य के रंग, खुशबू नजर करने क…

सुरेश सर्वेद की कहानी - जागृति

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खेत की मेढ़ पर कदम रखते ही मनहरण की द्य्ष्टि खेत के भीतरी हिस्से में दौड़ी. खेतों में बोई फसल को देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उसे फसलें दुश्मनों की तरह लगी. वह बौखला गया- सबको जला दूंगा. स्साले मुंह चिढ़ाने उतारु है. . . ।यह तो वह क्रोधावेश में कह गया था. वह एक किसान था. खेती किसानी उसका मुख्य कार्य था. जीविकोपार्जन का साधन. कहीं किसान अपनी बोई फसलों से चिढ़ेगा? मगर मनहरण को चिढ़ हुई थी. क्षण भर नहीं सरका था कि उसे अपने बौखलाए पन का ध्यान आया. विचार मे बदलाव आया और उसने स्वतः को कोसने से परहेज नहीं किया-मैं कितना मूर्ख हूं. खेत के इन पौधों की क्या गलती ? पानी ही न हो तो फिर कहाँ से इनमें हरियाली आयेगी. . . . । मनहरण ने मन की कड़ुवाहट को निकालने के लिए पंच सरपंच से लेकर विधायक और मंत्री तक को बड़बड़ा कर गालियां दे डाली-भिखमंग्गों की तरह आ जाते है ंस्साले वोट मांगने. प्रलोभन पर प्रलोभन देते हैं स्वार्थ सधा नहीं कि भूल जाते हैं कहाँ सड़क बनवानी है. कहाँ नहर बांध बनवाना है. कहाँ स्कूल खोलनी है और कहाँ अन्य व्यवस्था देनी है. प्रपंच ही प्रपंच रचते हैं. मिट्टी से भी सस्ती हो चुकी है स्सालो…

सुरेश सर्वेद की कहानी - हलकू इक्कीसवीं सदी का

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हलकू शहर से वापस अपने गाँव आ गया.उसके पास अब लबालब सम्पति थी.धन दौलत के कारण ग्रामीण उसे अब हलक ू कहने से परहेज करने लगे.अब वह सेठ के नाम से पुकारा जाने लगा.उसे भरपूर मान सम्मान मिलने लगा.जो लोग हलकू को देखकर कन्नी काटते थे वे ही लोग उसके करीबी हो गये थे.आज से कुछ वर्ष पूर्व हलकू इसी गाँव का एक छोटा किसान था.यहां थोड़ी सी खेती थी. उसमें फसल उगा कर जीवन यापन करता था.एक समय नील गाय उनकी खेतो ं की फसलों को चर गयी.उसकी पत्नी मुन्नी ने कहा-यहां हर साल यही हाल होता है.फसल बर्बाद होती है.साहूकारों का कर्ज अदा नहीं होता.ऊपर से और कर्ज चढ़ते जाता है.इससे अच्छा तो शहर जाकर काम करते.वहां दो वक्त की रोटी तो चैन से मिलती. कुछ बचा भी लेते....।मुन्नी की सलाह हलकू को पसंद आयी .उसने कहा- तुम्हारा कहना गलत नहीं.शहर में कैसी भी स्थित में दो वक्त की रोटी तो मिलेगी ही साथ ही मैं पूस की रात में ठण्ड सहने से भी बच जाऊंगा.यहां तो ठण्ड सहते प्राण ही निकल जायेगे.दूसरे दिन वे शहर जाने निकल गये.सही समय पर वे रेल्वे स्टेशन पहुंचे.वहां उनके साथ जबरा भी आया था.रेल छूटने के बाद जबरा वापस लौट गया था- उदास..निराश...।हलक…

सुरेश सर्वेद की कहानी - आक्रोश

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बादल की टुकड़ियों को देखकर विश्राम तिलमिला रहा था.मानसून के आगमन की खबर फैली और एक बारिस हुई भी.फिर बारिस थमी तो बरसने का ही नाम नहीं ले रही थी.इधर किसान खेत में हल चला चुके थे.बीज छींच चुके थे.बीज अंकुरित होने के बजाय सड़ने लगे थे.अकाल की स्थिति बनती जा रही थी.उधर देश की सीमा पर लड़ाई चल रही थी.घुंसपैठियों को खदेड़ने लगे थे रंणबांकुरे.इन चिन्ताओं से दूर देश के राजनेता चुनाव की तैयारी में लगे थे.विश्राम का दिमाग सोच-सोच कर सातवें आसमान पर चढ़ा जा रहा था .खींझन इतनी थी कि उसके मुृंह से अनायस गालियां निकल पड़ती-स्साले हरामी के पिल्लों को चुनाव की पड़ी है.अब बनाएंगे अकाल और सीमा पर चल रही लड़ाई को चुनावी मुद्दा.इन नौंटकी बाजों का बिगड़ता भी क्या है ? देश की जनता की भावनाओं से खेलना ही एक मात्र कार्य है इन हरामखोरों का.हानि सहते हैं किसान.भूख सहते हैं इनके बच्चें.राष्ट्र को बचाने शहीद होते हैॅ सीमा पर डंटे सैनिक.उजड़ती हैं मांग उनकी पत्नियों की.उनके माता पिता को पुत्र खोना पड़ता है.पिता के हाथ का साया उठता है तो उनके बच्चे के सिर से.इन सफेदपोशों का क्या? शहीद के परिवार जन से मिल कर दो शब्द संवेदना क…

सुरेश सर्वेद की कहानी - परिवर्तन

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संध्या होते होते अमृतपाल शराब के नशे में चूर हो जाता. कोई दिन ऐसा नहीं गया कि वह बिना शराब पिये घर पहुंचा हो। वह दिन भर रिक्शा खींचता और जो कमाई होती उसे शराब में उड़ा देता.उसकी पत्नी ने समझाने का बहुत प्रयास किया मगर वह असफल रही हार कर उसने समझाना छोड़ दिया. आलम यह था कि कई कई दिनों तक उसके घर चूल्हा नहीं जलता था पूरे परिवार को भूखे सोना पड़ता था. उसकी पत्नी रमशीला बच्चों को समझा - बुझा कर सुला देती थी. शराब के नशे में मदमस्त अमृतपाल आता और घर में धमाचौकड़ी मचाता सो बच्चे नींद से जाग जाते और घर का महाभारत देखते.अमृतपाल की इस आदत से बच्चे सहम गये थे और स्थिति यहां तक निर्मित होती कि उन्हें भूख रहती पर भूख न लगने की बात कह देते.आज भी अमृतपाल ने इतनी शराब पी ली थी कि उससे रिक्शे का हेंडिल सम्हाले नहीं जा रहा था मगर वह रिक्शे को ओटे जा रहा था.सड़क सूनी थी वरना दुर्घटना की संभावना बनती ही थी.घर के पास पहुंच कर उसने रिक्शा रोका. डगमगाते पैरों से घर के पास गया.वह कुंडी खटखटाना चाहा कि भीतर से उभर रही आवाज ने उसे क्षण भर के लिए रोक दिया.उसका बड़ा लड़का जीवेश अपनी मां से कह रहा था - मां, बाबू जी कब …

आत्माराम यादव पीव की कविताएँ

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सम्पादक जी नमस्कार। मैंने जीवन में अनेक अवसरों मनोकाश पर उभरे.. . . शब्दों की लड़ियों में दर्जनों अभिव्यक्तियां अपने डायरी के पन्नों में बिखेर रखी थी जिन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराये जाने हेतु धनाभाव के कारण वे मेरी डायरियों  के पन्नों से बाहर नहीं आ सकी थीं, किन्तु अचानक एक दिन आपके स्तम्भ रचनाकार का अवलोकन कर, आपको रचनायें प्रेषण किये जाने की जिज्ञासा होने पर मैंने, उन्हें प्रेषित किया, आपने  रचनाकार में मेरी रचनाओं को प्रकाशित कर  मुझ गुमनाम को स्थान देकर अनुग्रहित किया है। अब तक मैं रचनाओं के प्रकाशन उपरांत मिलने वाले आनंद से वंचित रहा हूँ, जिसका रसास्वादन आपने कराया है, इसलिये आपको धन्यवाद। कुछ और रचनाएँ प्रेषित हैं।
                    आत्माराम यादव पीव
प्रेमपर्ण,कमलकुटी,विश्वकर्मा मंदिर के सामने, शनिचरा मोहल्ला, होशंगाबाद मध्यप्रदेश
    मोबाईल-०९९९३३७६६१६] ०७८७९९२२६१६सुख की चाह में-
      एकमेरे जीवन में,
सुख का
भीषण अकाल पड़ा है,
दूर तक
नजर नहीं आती
राहत की
कोई बदली
दुख की भीषण
महातप्त आंधियों ने
बिबाईयों की तरह
अनगिनत दरारें
पाड़ दी है
मेरे जीवन में।
आकाश के अन्तिम छोर पर बैठा
जगतप…

सुरेश सर्वेद की कहानी - नहीं बिकेगी जमीन

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पुस्तैनी सम्पत्ति को बिगाड़ने की जरा सी भी इच्छा गोविन्द के मन में नहीं थी.वह चाह रहा था जिस तरह उसके दादा की सम्पत्ति को पिता ने सहज कर रखा और पूरी ईमानदारी के साथ उस सम्पत्ति की रक्षा की, उसी तरह उसका पुत्र जीवेश भी उसे सम्हाल कर रखे पर जीवेश खेती किसानी न करके व्यवसाय करना चाहता था. वह भी जमीन बेंचकर.गोविन्द की पत्नी मालती ने कहा - जब लड़का खेती किसानी करना ही नहीं चाहता तो उस पर जबरन क्यों लादते हो ? वह धंधा करना चाहता है तो जमीन बेचकर उसे रुपये क्यों नहीं दे देते ? - मालती तुम समझती क्यों नहीं. आजकल व्यवसाय में भारी प्रतिस्पर्धा है. व्यापार करने वाले ही जानते हैं कि वे कि स तरह दो वक्त की रोटी लायक कमाते हैं । पत्नी के प्रश्न का उत्तर गोविन्द ने दिया. - यहां लाभ - हानि सबके साथ लगा रहता है. हम भी तो खेत में बीज डालकर कभी - कभी हानि उठाते हैं. जैसे हम खेती में जुआ खेलते हैं वैसे ही उसे व्यवसाय में जुआ खेलने दो.लड़के का मन खेती - किसानी में बिलकुल नहीं है. जबरन थोपोगे तो वह मन लगाकर खेती करेगा क्या यह संभव है ? - तुम्हारा कहना सच है पर वह निश्चय तो करे कि आखिर कौन सा व्यवसाय करना चाहत…

आशीष कुमार त्रिवेदी की लघुकथा - मेरी इच्छा

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मेरी इच्छा  ईशान बेसब्री से अपने मम्मी डैडी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। बंसी ने कई बार कहा की वह खाना खाकर सो जाए नहीं तो मेमसाहब नाराज़ होंगी  किन्तु वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था। विभा और प्रसून दोनों मिलकर एक कंसल्टेंसी फर्म चलाते थे। बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा था। दोनों सुबह बहुत जल्दी ही एक साथ दफ्तर को निकल जाते थे और एक साथ ही लौटते थे। अक्सर उन्हें बहुत देर हो जाती थी। आज भी उन्हें देर हो गयी थी। दरवाज़े की घंटी बजी। बंसी ने दरवाज़ा खोला। प्रसून घुसते ही सोफे पर पसर गया। विभा अपने बेडरूम में चली गयी। बंसी उन दोनों के लिए पानी लेकर आ रही थी। ईशान ने लपक कर उसके हाथ से ट्रे ले ली। पहले वह अपने डैडी के पास गया। प्रसून ने गिलास उठा लिया। ईशान ने कुछ कहना चाह तो उसे रोक कर वह बोला " बेटा जो कुछ भी कहना है अपनी मम्मी से कहो। आज मैं बहुत थका हुआ हूँ। यू आर अ गुड बॉय।" ईशान चुप चाप वहां से चला आया। जब वह विभा के पास पहुंचा तो उसे देखते ही बोल पड़ी " ईशान तुम अभी तक सोये नहीं। कितनी बार कहा जल्दी खाना खाकर सो जाया करो। सुबह स्कूल जाना होता है।" उसने एक घूँट में ही सारा…

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - शहर में साँड़

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व्यंग्यशहर में साँड़डॉ. रामवृक्ष सिंहइधर हमारे शहर में साँड़ों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई है। और साँड़ से हमें अभिधा वाला अर्थ ही अभिप्रेत है, लक्षणा या व्यंजना वाला नहीं। यानी गाय का पुल्लिंगी, चौपाया पशु। इसलिए फिलहाल हम उसी पर चर्चा करना चाहते हैं। शहर में साँड़ का क्या काम? काम चाहे न हो, किन्तु वास्तविकता तो यही है कि हमारे शहरो में साँड़ों की संख्या में बहुत वृद्धि हो गई है। हम महानगरों की बात नहीं कर रहे। वहाँ साँड़ों की कमी मानव-प्रजाति के दो-पाए ही पूरी कर देते हैं। दरअसल हुआ यह है कि अब देश के कृषि-कार्यों में बैल की दरकार रही नहीं। लोग बैलों को हल में नाँधकर अपने खेत अब नहीं जोतते। जुताई का काम निजी अथवा भाड़े पर लिए गए ट्रैक्टरों से होने लगा है। यह किफायती, कम समय-साध्य और सुविधा-प्रद है। इस वजह से बैल हमारे खेती-बाड़ी के काम के लिए अप्रासंगिक हो गए। बैल-गाड़ियाँ भी अब इक्का-दुक्का ही दिखती हैं। गायें जब बछिया को जन्म देती हैं तो किसान लोग उन्हें पाल लेते हैं, क्योंकि बछिया वयःप्राप्ति के बाद ब्याएगी और दूध देगी। लेकिन यदि गैया बछड़ा ब्याती है तो लोग उसे कुछ दिन पालने के बाद…

बच्चन पाठक 'सलिल' की ऐतिहासिक कहानी - नियति चक्र

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नियति चक्र -डॉ बच्चन पाठक 'सलिल  मगध साम्राज्य के राज वैद्य आचार्य जीवक को उस रात  नींद नहीं आरही थी अपने प्रसाद में ,अपने पर्यंक पर लेटे लेटे वे विचारों में मग्न थे .उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि नियमित दिनचर्या वाले होने पर भी उन्हें रात के तृतीय प्रहार में अनिद्रा का भार क्यों वहन करना पड़  रहा है .  आचार्य जीवक ख्याति प्राप्त वैद्य थे ,सम्राट बिम्बसार ने उन्हें राज वैद्य नियुक्त किया था .सुंदर ,भवन दास दासियाँ ,गएँ और आने जाने के लिए सुंदर रथ -सब कुछ उन्हें उपलब्ध था .वे सप्ताह में एक दिन जाकर राजघराने के सदस्यों के स्वास्थ्य की जाँच कर आते थे ,इसके बाद उन्हें कोई राजकीय दायित्व नहीं था .पर वे प्रतिदिन प्रातः चार पांच घंटे अपने आम्रकुंज स्थित भवन में बैठ कर जन  साधारण की चिकित्सा करते थे कभी कभी कनिष्ठ वैद्य आकर उनका निदान देखते और आवश्यक परामर्श लेते ... आचार्य जीवक की ख्याति सम्पूर्ण आर्यावर्त में व्याप्त थी ,उन्होंने बिम्बसार की अनुमति से भगवान बुद्ध और अवन्ती नरेश चन्द्र्प्र्द्योत की चिकित्सा की थी .इससे बिम्बसार अत्यंत प्रसन्न रहते थे .आचार्य जीवक कभी किसी से कोई शुल्क नही…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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