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May, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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प्रमोद भार्गव का आलेख - खतरनाक है बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता

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खतरनाक है बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता प्रमोद भार्गव अब तक बोतलबंद पानी को पेयजल स्‍त्रोतों से सीधे पीने की तुलना में सेहत के लिए ज्‍यादा सुरक्षात्‍मक विकल्‍प माना जाता रहा था, किंतु नए अध्‍ययनों से पता चला है कि राजधानी दिल्‍ली में विभिन्‍न ब्राण्‍डों का जो बोतलबंद पानी बेचा जा रहा है, वह शरीर के लिए हानिकारक है। इसकी गुणवत्‍ता इसे शुद्ध करने के लिए इस्‍तेमाल किए जा रहे रसायनों से हो रही है। भारतीय अध्‍ययनों के अलावा अंतरराष्‍टीय संस्‍थाओं ने इस सिलसिले में जो अध्‍ययन किए हैं, उनसे भी साफ हुआ है कि नल के मुकाबले बोतलबंद पानी ज्‍यादा प्रदूषित और नुकसानदेह है। इस पानी में खतरनाक बैक्‍टीरिया इसलिए पनपे हैं, क्‍योंकि नदी और भूजल ही दूषित हो गये है। इन स्‍त्रोतों को प्रदूषणमुक्‍त करने के कोई ठोस उपाय नहीं हो रहे हैं, बावजूद बोतलबंद पानी का कारोबार सालाना 10 हजार करोड़ से भी ज्‍यादा का हो गया है। ऐसी पुख्‍ता जानकारियां कई अध्‍ययनों से आ चुकी हैं कि देश के कई हिस्‍सों में धरती के नीचे का पानी पीने लायक नहीं रह गया है, इससे छुटकारे के लिए ही बोतलबंद पानी चलन में आया था। इसकी गुणवत्‍ता के ख…

ईबुक - लघुपत्रिका प्राची

लघुपत्रिकाओं में सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली पत्रिका प्राची का नवीनतम अंक पढ़ें नीचे दिए गए विंडो में एक्सपांड/ओपन बटन पर क्लिक कर. या फिर आप इसे पीडीएफ ईबुक के रूप में यहाँ से डाउनलोड कर भी पढ़ सकते हैं.

राजीव आनंद की कहानी - एक फरिश्‍ते से मुलाकात

एक फरिश्‍ते से मुलाकातदोनों किडनी तुम्‍हारी फेल हो चुकी है, अब किडनी बदलवाना ही एकमात्र उपाय है, डाक्‍टर साहब ने बिरजू माली को कहा. बिरजू घबरा गया, किडनी बदलवाने में कितना खर्च आता है डाक्‍टर साहब, उसने पूछा ? डाक्‍टर साहब कुछ देर सोचने के बाद कहे कि यही कोई ढाई-तीन लाख रूपए. बिरजू बेहोश होते-होते बचा और नीम-बेहोशी में ही डाक्‍टर के चेंबर से निकल कर, बस स्‍टैंड की तरफ जाने लगा. जीने की अब कोई आशा नहीं बची थी. घर पर भरा-पूरा परिवार, दो लड़के, तीन लड़कियां, एक पत्‍नी, बूढ़े मां-बाप सभी तो थे, सोचते हुए बिरजू स्‍टैंड पहुंच चुका था. गांव के लिए अभी बस आने में देर थी, बिरजू वहीं एक फुटपाथी चाय की दूकान के बेंच के छोटे से हिस्‍से में बैठ गया. उसे मितली आ रही थी. वह समझ नही पा रहा था कि वह अब क्‍या करें. इतने में उसके गांव जाने वाली आखिरी बस आ चुकी थी पर बिरजू को हिम्‍मत नहीं हुआ कि वह उठ कर बस पर जा बैठे. देखते-देखते रात घिर आयी, बिरजू चुपचाप उठकर यात्री शेड में एक कोने में बैठ गया, बैठ क्‍या गया, दीवार के ओट में पीठ सटा कर लेट सा गया. उसे पेट में दर्द भी हो रहा था और मितली भी आ रही थी. उसी…

महावीर सरन जैन का आलेख - पालि भाषाः व्युत्पत्ति, भाषा-क्षेत्र एवं भाषिक प्रवृत्तियाँ

पालि भाषाः व्युत्पत्ति, भाषा-क्षेत्र एवं भाषिक प्रवृत्तियाँप्रोफेसर महावीर सरन जैनकुछ विद्वान संस्कृत से पालि-प्राकृत की उत्पत्ति मानते हैं। (प्रकृतिः संस्कृतम्। तत्र भवं तत् आगतं वा प्राकृतम् – सिद्धहेमशब्दानुशासन, 8/1/1) यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि प्रा0भा0आ0भा0 काल में संस्कृत संस्कारित भाषा थी। समाज के शिक्षित वर्ग की भाषा थी। उसी के समानान्तर विविध जनभाषाओं/ लोकभाषाओं की भी स्थिति थी।संस्कृत काल में भी अनेक लोकभाषाएँ बोली जाती थीं। http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_5218.html.प्राकृत का अर्थ ही है – प्रकृत। (प्रकृत्या स्वभावेन सिद्धं प्राकृतम्)। ( - - - प्रकृतीनां साधारणजनानामिदं प्राकृतं)। इनके परिप्रेक्ष्य में अधिक तर्कसंगत यह मानना है कि संस्कृत के समानान्तर जो जन-भाषाएँ थीं, उन्हीं के विकसित रूप प्राकृत हैं। व्युत्पत्तिः पालि भाषा की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। पालि शब्द का अर्थ क्या है और वह कहाँ की भाषा थी। इन दोनेां प्रश्नों को लेकर भी विद्वानों में मतभेद हैं। पालि शब्द की निरुक्ति को लेकर अनेक कल्पनाएँ की गई हैं। (1)पंक्ति शब्द से निम्नलिखित …

श्याम गुप्त की लघुकथा - जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा

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जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा ...लघु कथा     ( डा श्याम गुप्त ) गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी में वर्मा जी ने सुन्दर कविता पाठ के अनन्तर कवितांश... “ नयनों में अश्रु कलश छलके” पर डा शर्मा ने मध्य में टोक कर कहा ,’नयनों में... नहीं, ‘नयनों के अश्रु-कलश .’ कहिये| क्यों, क्या अर्थ है आपका ? वर्माजी पूछने लगे, अब ज्यादा बाल की खाल न खींचिए। ‘यह तथ्यात्मक व कथ्यात्मक त्रुटि है।’ डा शर्मा बोले, ‘अश्रु कलश नयनों में कैसे छलकेंगे...अश्रु नयनों में या नयनों से छलकते हैं तो अश्रु-कलश स्वयं नयन हुए या नयन के अन्दर ...तो नयनों के छलकेंगे या नयनों से।’ ‘आप सदैव छींटाकशी करते ही रहते हैं। आपके कमेन्ट भी तीखे होते हैं| आप छिद्रान्वेषी प्रवृत्ति के हैं हर बात में छिद्र खोजते हैं और दूसरों के छिद्र उजागर करते रहते हैं। यह अवगुण है|’ लाल साहब बोले, ‘ तुलसी बावा कह गए हैं .. ’                                   जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा ,वन्दनीय सोई जग यशु पावा। इस प्रकार आप न वन्दनीय होते हैं न वन्दनीय होने के यश का आनंद उठा पाते हैं, अधिकाँश लोग आपसे दूर हो जाते हैं| ‘और बीच में टोकते भी हैं।’ चौहान जी…

राकेश भ्रमर की कहानी - कितनी देर तक

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कहानी कितनी देर तक राकेश भ्रमर चिता में आग लगने के बाद एक-एक करके लोग जाने लगे थे. अंत में केवल मैं ही चिता के पास रह गया था. कुछ दूरी पर एक डोम उत्सुक आंखों से चिता की तरफ ताक रहा था. मेरी नजरें कभी-कभी उसकी तरफ उठ जाती थीं. सबके जाते ही मैं अपने आपको बेहद अकेला महसूस करने लगा. इस दुनिया में अंत तक कोई किसी का साथ नहीं देता. फुरसत ही नहीं है किसी के पास. वरना क्या चिता ही आग ठण्डी होने तक यहां नहीं रुकते. मैं सूनी आंखों से चिता से उठती लपटों को ताकता जा रहा था. कल तक वह इस दुनिया में हमारी तरह हंस-बोल रहा था. आज वह चिता में लेटा हुआ था. आत्मा तो पंचतत्व में मिल गई थी. अब शरीर भी मिल रहा था. समय का चक्र कितनी जल्दी आदमी को मौत के कुएं में धकेल देता है, पता ही नहीं चलता है, किसे पता था कि विनोद इतनी जल्दी हम सबसे मुंह मोड़कर चला जाएगा. मुझे भी पता नहीं था, जबकि हम दोनों एक ही कमरे में रहते थे. हर सुख-दुःख में एक दूसरे का साथ देते थे. उसकी कोई भी बात मुझसे छिपी नहीं थी, लेकिन मौत को हम सबसे छुपाए रखा. किसी को आभास तक नहीं होने दिया कि वह सबसे जुदा होकर जा रहा है. वह हमसे जुदा हो गया. इस …

कुबेर की हास्य व्यंग्य कविता - भाया! बहुत गड़बड़ है

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कुबेरभाया! बहुत गड़बड़ हैबहुत गड़बड़ है, भाया! बहुत गड़बड़ है। इधर कई दिनों से दिन के भरपूर उजाले में भी लोगों को कुछ दिख नहीं रहा है दिखता भी होगा तो किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है फिर भी या इसीलिए सब संतुष्‍ट हैं? कोई कुछ बोल नहीं रहा है। भाया! बहुत गड़बड़ चल रहा है। गंगू तेली का नाम उससे जुड़ा हुआ है क्‍या हुआ वह उसके महलों से दूर झोपड़पट्टी के अपने उसी आदिकालीन - परंपरागत झोपड़ी में पड़ा हुआ है? षरीर, मन और दिमाग से सड़ा हुआ है। पर नाम तो उसका उससे जुड़ा हुआ है? उसके होने से ही तो वह है गंगू तेली इसी बात पर अकड़़ रहा है? भाया! बहुत गड़बड़ हो रहा हैउस दिन गंगू तेली कह रहा था - 'वह तो ठहरा राजा भोज भाया! क्‍यों नहीं करेगा मौज? जनता की दरबार लगायेगा उसके हाथों में आश्‍वासन का झुनझुना थमायेगा और आड़ में खुद बादाम का हलवा और, शुद्ध देसी घी में तला, पूरी खायेगा तुम्‍हारे जैसा थोड़े ही है, कि- नहाय नंगरा, निचोय काला? निचोड़ने के लिये उसके पास क्‍या नहीं है? खूब निचोड़ेगा निचोड़-निचोड़कर चूसेगा तेरे मुँह में थूँकेगा। मरहा राम ने कहा - ''गंगू तेली बने कहता है, अरे! साले च…

नूतन प्रसाद शर्मा की कहानी - मैनेजर लीला

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नूतन प्रसाद शर्मा  कहानी मैनेजर लीला हमारे गांव वाले कम श्रद्धालू नहीं हैं. उस साल जब अच्छी फसल हुई तो ईश्वर ने कृपा की,ऐसा सोच रामलीला मंडली को बुलवाया. मंडली वालों ने आकर ऐसा जीवंत खेल खेला कि पूरा गांव राम मय हो गया. अंतिम दिन ग्रामीणों में चढ़ौत्री चढ़ाने की होड़ लग गयी. बहुतों ने विभोर हो एक जून का राशन रख, बाकी सर्वस्व भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया. इधर चढ़ौत्री का कार्यक्रम समाप्त हुआ. उधर रामलीला के पात्रों की बैठक प्रारंभ हो गयी. यह बैठक मैनेजर के शोषण के विरुद्ध हो रही थी. राम और रावण दोनों दलों के लोग गंभीर मुद्रा में बैठे थे कि राम ने मौन तोड़ा-जब हम मर मर कर कमाते है तो हमें भी बराबर हिस्सा मिलना चाहिए लेकिन मैनेजर हमें अधिकारों से वंचित कर देता हैं. यही नहीं जो वेतन बंधा है उसे भी पूरा नहीं देता. रावण ने साथ दिया - हां भैय्या राम,मैनेजर पूरा राक्षस है. अभी ही देखो न- भण्डारपुर वालों ने कितनी तगड़ी चढ़ौत्री की उसे मैनेजर ने अपने पास रख लिया मानों सिर्फ उसका ही पसीना गिरा है. हमें छूने तक नहीं दिया सीता - मुझे डेढ़ सौ रुपये मासिक वेतन देने का आश्वासन देकर लाया है . तीन महीने…

नूतन प्रसाद शर्मा की कहानी – भ्रम निवारण

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नूतन प्रसाद शर्मा  कहानी  भ्रम निवारण अष्टावक्र के जीवन की रेल अटक - अटक कर चल रही थी. जिस दिन उसे भिक्षा मिल जाती,वह दीवाली मना लेता कुछ न मिलता तो रह जात भीमसेनी एकादशी का व्रत . एक दिन की बात है - उसके पेट में चूहे धमाचौकड़ी मचाने लगे. उसने आसन लगाया और लगा खीर पुड़ी के सपने देखने. हकीकत में कुछ न मिले मगर सपने में मनचाही वस्तु पा ही सकते हैं . इसी बीच नारद जी पधारे. बोले - यहां क्या झक मार रहे हो. जाओ राजा जनक के पास. वे बड़े दानी है. अपंगों व निराश्रितों के लिए उन्होंने अपना खजाना खोल दिया है. तुम भी लूटपाट करो. अष्टावक्र ने कहा - मेरा राजदरबार में पहचान नहीं है. जिसका कोई माई बाप नहीं उसे कुछ मिलने से रहा. मैं प्रयत्न करके हार गया. वैसे सरकार हम गरीबों पर कृपा ही कर रही है. . . . यदि वह हमारे जैसो के खाने पीने का प्रबंध ही कर देती तो दर दर सैर करने का ब्रह्मानंद प्राप्त नहीं होता. हम निकम्में हो जाते चर्बी बढ़ती तो शरीर बेडौल हो जाता. देखिए मैं कितना स्वस्थ हूं कि गाल पिचक गये हैं. पेट का पता नहीं. अब हाथ फैलाने का पुनः सलाह दे रहे हैं . मैंने तो कई महानुभवों के आगे हाथ फैलाये ले…

नूतन प्रसाद शर्मा की कहानी - कर्तव्य परायण

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नूतन प्रसाद शर्मा  कहानी कर्तव्य परायण लक्ष्मण अचेत पड़े थे. राम ने हनुमान से कहा - लक्ष्मण अंतिम सांसें गिन रहा है. उसका उपचार होना जरुरी है वरना लोग ऊंगली उठाएंगें कि राम सौतेले भाई है. लक्ष्मण स्वस्थ हो या न हो उन्हें क्या मतलब ! इसलिए तुम डा. सुषेण को इसी वक्त बुला लाओ. हनुमान को क्या, उन्हें आज्ञा पालन करना था. वे तैयार हो गये डा. को लाने. इतने में जामवन्त आ गये. उन्होंने कहा - आप ज्ञानीनाम अग्रगण्यम्, सकल गुण निधानम् कहलाते हैं मगर इस वक्त आपकी बुद्धि घास चरने तो नहीं चली गई ! सुषेण शत्रु राष्ट्र के डाक्टर है. वे लक्ष्मण को जीवन देंगे या मृत्यु ? दुख के कारण राम की मति मारी गई मगर आपको तो कुछ सोचना चाहिए ! हनुमान को होश आया. बोले - आपका कहना ठीक है. शत्रु को छोटा नहीं समझना चाहिए. सुषेण तो विख्यात डाक्टर है. उन्होंने जहर की सुई ही घुसेड़ दी तो उनका कोई क्या कर लेगा ! डाक्टरों को मृत्यु दान करने के लिए ही तो सर्टिफिकेट मिला रहता है. आप ही बताइये, क्या करुं ? जामवन्त ने रास्ता बताया - अयोध्या जाइये न,वहां भरत शत्रुघन है ही. एक क्या अनेक डाक्टर भेज देगें. या चलें जाइये जनकपुर, जनक…

सुरेश सर्वेद की कहानी - यंत्रणा

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कहानी यंत्रणा सुरेश सर्वेद मेरे खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज होते ही मैं निकृष्ट जीवन व्यतीत करने लगा. मुझ पर विद्युत कर्मचारी से मारपीट करने का आरोप था. मेरे खिलाफ दो दो धाराएं लगी थी. हालांकि मैंने न मारपीट की थी न ही जान से मारने की धमकी दी थी चूंकि विद्युत कर्मचारी ने आरक्षी केन्द्र में मेरे विरुद्ध रिर्पोट दर्ज करा दी थी अतः मामला बना कर मेरे विरुद्ध कार्यवाही शुरु कर दी गई थी. मेरा प्रकरण न्यायाधीश मित्तल के न्यायालय में विचाराधीन था. लगी धाराओं के अनुसार प्रमाणित होने पर मुझे सात वर्ष तक की सजा मिल सकती थी. सात वर्ष के कारावास की सजा की याद से ही मैं कांप उठता. वैसे तो एक दिन की सजा भी सजा होती है पर मेरे विरुद्ध जो आपराधिक प्रकरण दर्ज किये गये थे. वह तो लम्बे समय तक जेल यात्रा की ओर संकेत कर रहे थे. सुनी सुनायी कहानी यह थी कि कारागृह का न सिर्फ प्रभारी ही अपितु वहां एक सिपाही से लेकर पुराने कैदी तक नये लोगों से वह व्यवहार करते है जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं. सिपाही हवलदार और प्रभारी तो पिटते ही हैं वहां के पुराने कैदी भी अपनी बात मनवाने के लिए पिटाई कर देते हैं. वहां काम भी…

सुरेश सर्वेद की कहानी - खोल न्याय का बंद कपाट

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खोल न्याय का बंद कपाट सुरेश सर्वेद की कहानी नीलमणी भवन के सामने जीप चरमरा कर रुक गयी. वह भवन वनक्षेत्र पाल हिमांशु का था. जीप से आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के क ई आरक्षक सहित अधीक्षक नित्यानंद नीचे आये. उनकी द्य्ष्टि ने नीलमणी की भव्यता देखी. भव्यता ने स्पष्ट कर दिया कि इसके निर्माण में कम से कम पचास लाख का खर्च आया होगा. विजयानंद का आदेश मिलते ही आरक्षकों ने नीलमणी को घेर लिया. कुछ आरक्षक सहित विजयानंद भीतर गये. उन्होंने भीतर से मुख्य द्वार को भी बंद कर दिया. इस कार्यवाही से भगदड़ मचनी ही थी. आसपास के लोगो का ध्यान इस ओर खींच गया. लोग जिज्ञासा वश नीलमणी भवन के सामने जुट गये. वे आपस में कानाफूंसी करने लगे. भीतर वनक्षेत्रपाल हिमांशु उपस्थित था. विजयानंद ने उसे अपना परिचय पत्र दिखाया. कहा- हमें आपके यहां छापा मारने का अधिकार मिला है. . . ।‘ फिर उन्होंने आरक्षकों को छानबीन करने का आदेश दिया. आरक्षक इधर उधर बिखर गये. हिमांशु को पूर्व से पता चल चुका था कि उसके घर छापा पड़ने वाला है. छापे से पूर्व स्वीकृति पत्र लेना पड़ता है. विजयानंद स्वीकृति लेने वनमंडलाधिकारी चन्द्रभान के पास गये वनमंडलाध…

सुरेश सर्वेद की कहानी - दया मृत्यु

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दया मृत्यु सुरेश सर्वेद तुलसीपुर, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) स्कड प्रक्षेपास्त्रों को आकाश में ही नष्ट करने पैट्रियड का अविष्कार हो चुका हैं पर तार पेट्रोल और बेल्ट बम धड़ल्ले से प्रयुक्त हो रहे है. आतंकी अपनी कमर में बेल्ट बम बांध कर जाता है और बटन दबाकर विस्फोट कर देता है. इससे लाशें बिछ जातीं हैं. यद्यपि मेटल डिटेक्टर बमों की उपस्थिति की जानकारी देता है पर उन्हें तत्काल नष्ट नहीं कर पाता. इसी विषय को लेकर वैज्ञानिकों की ‘ विज्ञान भवन ‘ में बैठक थी. वहां आकाश और नीलमणी भी उपस्थित थे. नीलमणी ने अपनी बात रखी - ‘ मित्रों,हम एक ऐसे बम का निर्माण करें कि बमों की उपस्थिति का पता तो लगे साथ ही वे तत्काल निष्क्रिय भी हो जाये. साथ ही अपराधी की पहचान भी बता दें. . . . ।‘ वैज्ञानिक गंभीरता पूर्वक विचार कर ही रहे थे पर उन्हें प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था . उधर आकाश के ओंठो पर मुस्कान थी. दरअसल उसने पूर्व में ही इस विषय पर विचार किया और उसने ‘सेफ्टी लाइफ‘ नामक यंत्र बनाने का काम भी प्रारंभ कर दिया. इस यंत्र में उपरोक्त चिंतन के समस्त उत्तर समाहित थे. आकाश ‘सेफ्टी लाइफ‘ बनने के बाद वैज्ञानिकों को…

कुमार गौरव अजीतेन्दु की कुण्डलियाँ

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***************************************कुण्डलिया - बंजर पड़ी जमीन है***************************************१. बंजर पड़ी जमीन है, धधक रही सम आग। दस्तक देती आपदा, जाग मनुज अब जाग॥ जाग मनुज अब जाग, नीर को रक्षित कर ले, भरा पात्र में खूब, जरा नयनों में भर ले। छीन रहा है चैन, भयानक है ये मंजर, पिसने को मजबूर, सिसकता जीवन बंजर॥ २. सूखा आमंत्रित हुआ, हरियाली के दाम। लालच ने साजिश रची, किया स्वार्थ ने काम॥ किया स्वार्थ ने काम, सुने बिन अंतर्मन को, लगा दिया ही दाग, चेतना के दामन को। घुसा सभी में आज, हवस का दानव भूखा, लाज-शर्म का स्रोत, पड़ा है जबसे सूखा॥ ३. समझाते पुरखे रहे, पानी है अनमोल। हँसी उड़ाई आपने, आज हुए गुम बोल॥ आज हुए गुम बोल, बूँद को तरस रहे हैं, बादल बनकर नैन, रात-दिन बरस रहे हैं। चार कोस चल रोज, घड़े दो भरने जाते, बचा-बचा उपयोग, करो सबको समझाते॥ ४. पानी काफी घट गया, बहुत बढ़ गई प्यास। व्याकुलता चहुँओर है, निशिदिन, बारहमास॥ निशिदिन, बारहमास, तभी तो छीना-छोरी, डाका, लूट-खसोट, चीखना, सीनाजोरी। दीख रहे हैं लोग, बने सम दुश्मन जानी, आये दिन ले रूप, खून का बहता पानी॥ ५. पाँवों में छाले …

रवि प्रकाश की कविताएँ

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रवि की मधुशालाबड़ी घृणा से उस को देखा जिसके हाथों में प्याला,
जिसकी आँखों में प्यास मिली जिसके अधरों पर हाला।
लेकिन जब ख़ुद पीने बैठा सारी नफ़रत भूल गया,
पीनेवाले भक्त हो गए मंदिर लगती मधुशाला॥तारों की छाया में मुझको देता था भर-भर प्याला,
जितना साक़ी अलबेला था उतना ही मैं मतवाला।
पीते-पीते यूँ लगता था लोक यहीं परलोक यहीं,
मिले ख़ाक में आलम सारा बनी रहे पर मधुशाला॥साँसें दे कर,नींदें दे कर नाज़ों से छप्पर डाला,
महलों सी शोभा पाता था दीवारों का उजियाला।
मुझे भरम था अटल रहेगी बिजली में,बरसातों में,
पर आँधी की आहट से ही उजड़ी मेरी मधुशाला॥साक़ी! तोड़ दिया क्यों तूने महफिल में मेरा प्याला,
अभी प्यास बाकी थी मुझमें बाकी सांसों में ज्वाला।
कभी जाम पे जाम दिए अब बूँदों को तरसाता है,
समझ न पाया तू कैसा है कैसी तेरी मधुशाला॥साक़ी! प्यासों में जी कर ही जप लूँगा तेरी माला,
आँखों में जो रोशन है वो दीप नहीं बुझने वाला।
जैसे तू रह लेगा मुझ बिन वैसे ही मैं रह लूँगा,
मुझे मुबारक मेरे आँसू तुझ को तेरी मधुशाला॥समझ गया मैं सब धोखा है कैसी हाला क्या प्याला,
पल दो पल का छल है केवल रूपवती साकीबाला।
नशा मिला अपने सीने में बाहर तो बस…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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