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June, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रामवृक्ष सिंह की कहानी - घर की तलाश

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कहानीघर की तलाशडॉ. रामवृक्ष सिंहउस सुबह दफ्तर आते समय बस पकड़ने के लिए मैं बस स्टैण्ड पर पहुँचा ही था कि पहले से वहाँ खड़ी एक महिला मेरे पास आई और पूछने लगी- “सर, आप सामनेवाली कॉलोनी में रहते हैं क्या?” “जी हाँ।” मैंने सहजता से उत्तर दिया । शुरुआती संकोच के बाद उसकी वाणी में आत्म-विश्वास लौट आया था- “नहीं, वो क्या था न कि मुझे एक घर की तलाश थी...खरीदने के लिए....पर, कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।” उसने बात आगे बढ़ाई। मैंने सरसरी तौर पर उसका मुआयना कर लिया। कद लगभग पाँच फुट। बदन दोहरा, कमर के इर्द-गिर्द चरबी, जैसीकि बच्चेदार महिलाओं के अकसर हो जाती है। चेहरा गोल। रंग काफी गोरा। उम्र लगभग पैंतीस-छत्तीस। लेकिन पहली नज़र में उसे मैंने तीस या उससे कम उम्र की समझ लिया था। बस स्टैंड पर उसे मैंने कई बार देखा होगा, लेकिन दुपट्टे से नकाब बनाकर चेहरा पूरी तरह ढका होने के कारण शायद ही उसका मुँह कभी दिखाई पडा हो। लेकिन आज उसके चेहरे पर नकाब नहीं थी। “इसमें करना क्या है! अपनी ज़रूरत और बजट के हिसाब से कोई प्रॉपर्टी देखिए। थोड़ा-सा बयाना देकर, उसके मालिक से सेल का ऑफऱ लिखवाकर ले लीजिए। पैसे का जुग…

सप्ताह की कविताएँ

श्याम गुप्त१. क्यों धड़के वह दिल
दिशा बोध जिस दिल में नहीं हो
उसको हलचल से क्या लेना |
प्रीती भाव जिस ह्रदय नहीं हो,
उसको धड़कन से क्या लेना |
क्यों धड़के वह दिल कि आज भी-
लुटे द्रौपदी चौपालों पर |
जलती बाहें अभी घरों में ,
लटके फांसी बेटी -बहना |.....दिशा बोध जिस .....||
क्यों धड़के वह दिल कि आज भी,
जनता दो रोटी को तरसे |
होटल की कृत्रिम वर्षा में,
जाने कितने साए थिरके |
अब भी राशन की चीनी को,
लम्बी लम्बी लगी कतारें |
हेरीपौटर की खरीद में,
मस्त साहिबानों की सेना |  ....दिशा बोध जिस....||
आज न जाने शास्त्र धर्म पर ,
लोग उठाते विविधि उंगलियाँ ?
देश समाज राष्ट्र की खातिर,
नहीं खौलती आज धमनियां |
सत-साहित्य औ कथा कहानी,
की बातों में अब क्या बहना|
हीरो-हीरोइन के किस्से ,
बन बैठे मानस का गहना| ----  दिशा बोध जिस.....||
२. सच्चा जीवन....
जीवन जो व्यस्त सदा ऐसा,
मित्रों का ध्यान भी रहे नहीं |
उस जीवन को हम क्या समझें,
स्वच्छंद सुरभि सा बहे नहीं |
उस जीवन को हम क्या समझें,
रिश्ते नातों को चले भूल |
उस जीवन को कह सकते हैं,
सूखे गुलाब के तीक्ष्ण शूल |
उस जीवन को भी क्या समझें,
जो नहीं भरा शुचि भावों से |
वह जीवन भी क्या जीवन है ,
जो …

राजीव आनंद का आलेख - 30 जून-झारखंड़ में संथाल हूल की 158वीं वर्षगांठ पर विशेष

30 जून-झारखंड़ में संथाल हूल की 158वीं वर्षगांठ पर विशेष झारखंड़ में बिरसा मुंड़ा के जन्‍म से कई वर्षों पहले संथाल परगना के भगनाडीह गांव में चुनका मुर्मू के घर चार भाईयों यथा, सिद्धू, कान्‍हू, चांद एवं भैरव तथा दो बहनें फूलो एवं झानो ने जन्‍म लिया. सिद्धू अपने चार भाईयों में सबसे बड़े थे तथा कान्‍हू के साथ मिलकर सन्‌ 1853 से 1856 ई. तक संथाल हूल अर्थात संथाल विपल्‍व, जो अंग्रेजी साम्राज्‍य के खिलाफ लड़ा गया, का नेतृत्‍व किया. भगनाडीह ग्राम में 30 जून 1855 को सिद्धू एवं कान्‍हू के नेतृत्‍व में एक आमसभा बुलाई गयी जिसमें भगनाडीह ग्राम के जंगल तराई के लोग तो शामिल हुए ही थे, दुमका, देवघर, गोड्‌डा, पाकुड़ जामताड़ा, महेषपूर, कहलगांव, हजारीबाग, मानभू, वर्धमान, भागलपूर, पूर्णिया, सागरभांगा, उपरबांध आदि के करीब दस हजार सभी समुदायों के लोगों ने भाग लिया और सभी ने एकमत से जमींदारों, ठीकेदारों, महाजनों एवं अत्‍याचारी अंग्रेजों एवं भारतीय प्रशासकों के खिलाफ लड़ने तथा उनके सभी अत्‍याचारों से छुटकारा पाने के लिए दृढ़ संकल्‍प हुए तथा सर्वसम्‍मति से सिद्धू एवं कान्‍हू का अपना सर्वमान्‍य नेता चुना. अप…

पद्मा मिश्रा का आलेख - गांधी और कबीर

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-- कबीर जयंती पर आलेख --पद्मा मिश्रा
गाँधी और कबीर
[एक तुलनात्मक विवेचन ]

पूजित था जीवन में ,मानव का प्रेम जहाँ ,
भक्ति ,प्रेम ,सेवा के वाहक कबीर थे .
गाँधी की मानवता सत्य और अहिंसा थी ,
सहज पथ प्रदर्शक थे ,लाखों की भीड़ में ,
दोनों ही संत पुरुष ,युग द्रष्टा कहलाये ,
जीवन उत्सर्ग किया जन जन की पीर में।.[स्व रचित ]सचमुच संत कवि उस पीयूष वर्षी मेघ के सामान हैं जो अपनी अमृतमयी रसधार से सम्पूर्ण समाज को आप्लावित कर निरंतर उसकी कल्याण कामना में निरत रहते हैं ,पर बात जब युग द्रष्टा कबीर की हो तो एक संत व् समाज सुधारक के रूप में उन्होंने जो कुछ भी समाज को दिया ..दिशाहीन भ्रमित जन मानस को एक नई राह दिखलाई उसके लिए हम उनके सदैव ऋणी रहेंगे .पर जहाँ मानवता और दीन सेवा पर सर्वस्व न्योछावर कर त्याग ,सेवा सत्य और कर्तव्य निष्ठांपर निस्वार्थभाव से आत्म समर्पण की बात हो ,वहां कबीर के साथ गाँधी भी स्वयम
प्रासंगिक हो उठते हैं ,और मानवीय प्रेम तथा संवेदना के धरातल पर साथ खड़े दिखाई देते हैं ,तब उनकी तुलना अवश्यम्भावी हो जाती है .
कबीर ईश्वर को परम ब्रह्म के रूप में मानते थे ,क्योंकि उनका विश्वास अवतार वाद में नहीं …

सुशील यादव का व्यंग्य - हमारा (भी) मुंह मत खुलवाओ

उनको मुंह बंद रखने का दाम मिलता है। कमाई का अच्छा रोजगार इन्ही दिनों ईजाद हुआ है| सुबह ठीक समय पर वे दफ्तर चले जाते हैं। खास मातहतों को केबिन में बुलवाते हैं ,प्यून को चाय लाने भेजते हैं। गपशप का सिलसिला चलता है| केदारनाथ के जलविप्लव, लोगों की त्रासदी ,बाढ़ के खतरे ,सरकार की व्यवस्था-अव्यवस्था ,देश में हेलीकाफ्टर की कम संख्या ,सब पर चर्चा करते लंच का समय नजदीक आने पर, एक-एक कर मातहत खिसकने लगते हैं| अंत में शर्मा जी बच पाते हैं ,वे उनसे पिछले सप्ताह भर की जानकारी शाम की बैठक का दावत देकर ,मिनटों में उगलवा लेते हैं। शर्मा जी की दी गई जानकारी, उनके लिए, एक मुखबिर द्वारा ‘ठोले’ को दी गई जानकारी के तुल्य होती है। वे इसे पाकर अपनी पीठ थपथपाना नहीं भूलते। वाहः रे मैं ? वाले अंदाज में वे साहब के केबिन की ओर बढ़कर, ‘नाक’ करते हैं। वे ‘में आई कम इन सर’ की घोषणा इस अंदाज में करते है जैसे केवल औपचारिकता का निर्वाह मात्र कर रहे हों वरना साधिकार अंदर घुस कर कुर्सी हथिया लेना उनका हक है। और ये हक उनको, साहब को ‘वैतरणी’ पार कराने का, नुस्खा देने के एवज में सहज मिला हुआ है। साहब आपत्ति लेने का अपना अ…

बसंत भट्ट की कहानी - डर का अहसास

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डर का अहसास
               बात उस समय की है। जब अपने मामा के वहा रहता था। मेरे मामा एक किसान थे| जो उतरांचल के  पहाड़ी गाव में रहते थे। एक बार मेरे साथ एक अजीब सी घटना हुई। हुआ ये एक दिन में सुबह उठा और नाश्ता करने के लिए रसोई में बैठा था। तभी मुझे अपने मामा की लड़की जो मुझसे बड़ी थी। उसकी आवाज सुनाई दी जो सांप –सांप कह कर चिल्ला रही थी। में दौड़ते हुए उस और को चल दिया। लेकिन तब तक सांप भाग चूका था। वह मुझे हाथ से इशारा कर बता रही थी। वो जा रहा है। लेकिन में देख नहीं पाया सांप मेरी आँखों से ओझल हो चूका था। वह बोली बहुत बड़ा सांप था। मैंने कहा मुझे तो नहीं दिखा वह बोली ऐसा नहीं बोलते है। मैंने कहा ऐसा क्यों नहीं बोलते है।  वह बोली ऐसा बोलने वाले को दिन भर सांप ही दिखाई देते है। मैंने हँसते हुए कहा मुझे ठग रही हो वह बोली ये बात सही है। मैंने अपनी दादी से सुना है। उसकी दादी जो  मेरी नानी थी। में उसके पास गया और उनसे पूछा वह क्या यह बात सही है। वह बोली हा , अब में भी थोडा डर सा गया। मुझे डरा देखा कर नानी बोली ये सिर्फ कुछ पुराने किस्से है। इसमें डरने की कोई बात नहीं है। में मुस्करा कर बाहर चला…

उमेश मौर्य की व्यंग्य कहानी - अंगूरी जनता

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अंगूरी जनतागणित, मैथ और अंग्रेजी ये तीनों विषय मेरे पैदा होने के पहले से ही कमजोर थे। आकलन करना, अन्‍दाजा लगाना तो मेरे लिए टेढी जलेबी थी। टेढी खीर क्‍यों कहें उसमें क्‍या टेढ़ापन होता है। इसलिए मॉ के पेट में जब से प्रवेश मिला। संसार देखने की उत्‍कट अभिलाषा जाग उठी। कवि हृदय के कारण एक नये अनुभव के लिए लालायित था। विज्ञान के अनुमान से तो नौ माह की गणित बैठा लिया था। लेकिन वहॉ भी मेरा अनुमान गलत ही निकला। सात महीने में ही संसार वालों के लिए आफत बन बैठा। उस जमाने में न आईसीयू, न एन आईसीयू । बहुत मुश्‍किल से जिन्‍दा बचा रहा। मेरी बुआ जी मुझे चिड़िया का बच्‍चा कहा करती थी। बुकवा उबटन लगाते समय खाल के बाल, नहीं, बाल के खाल, ये भी गलत है। शरीर से चमड़ी निकल जाती थी, उबले आलू के छिलके की तरह। मॉ ने वहॉ भी मुझे जी भर के दर्द से चिल्‍लाने न दिया। बोलती बेटा सो जा नहीं तो बिल्‍ली खा जायेगी। जैसे आज लोग चिल्‍लाते हैं, किसी मॉग को लेकर, सरकार की परेशानियों से तो लोग कहते हैं-चुप हो जा नहीं तो पुलिस पकड़ लेगी। लाठियाँ बरसेगी। बचपन में बिल्‍ली का डर अब पुलिस और सरकार का डर। चोर डाकू और लुटेरों से …

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - घृणा

घृणामैं जीटी रोड पर पहुँचने वाला था। देखा उधर से रामू मुस्कराता हुआ चला आ रहा है। मैंने पूछा क्या बात है भाई ? बड़े खुश दिखाई दे रहे हो। रामू बोला अभी यूनिवर्सिटी से आ रहा था। ऑटो में एक सीट पर दो लड़कियाँ बैठी हुई थीं। ऑटो वाले एक सीट पर चार लोगों को बैठाते ही हैं। इसलिए मैं भी बैठ गया। कुछ देर बाद एक बाबाजी ऑटो में चढ़ने लगे तो मैं किनारे हो गया ताकि बाबाजी बीच में बैठ सकें। बाबाजी बैठते इसके पहले लड़की बोली आप उधर किनारे बैठिए और मुझसे कहा आप इधर आ जाइए। मैं लड़की की तरफ आ गया और बाबाजी किनारे बैठ गए। लड़की ने धीरे से कहा कि हमें बृद्धों से घृणा है। मैंने रामू से कहा कि तुम्हें लड़की से कह देना चाहिए था कि मैं यहीं ठीक हूँ और बाबाजी को बीच में बैठा लेना चाहिए था। रामू बोला लड़की बुलाकर मुझे अपने पास बैठा रही है और मैं कह दूँ कि यहीं ठीक हूँ। कभी तो किसी को सही सलाह दे दिया करो। रामू ऐसा कहकर मुस्कराते हुए चला गया। रामू तो यह घटना बताकर चला गया। लेकिन मैं सोचने लगा कि अपना घर-समाज कहाँ जा रहा है ? जिस देश में वृद्धों की सेवा से आयु, यश, धन, विद्या, बल आदि बढ़ने की बात शास्त्रों में कही गयी…

सुधीर मौर्य की कहानी - सुबह की कालिमा

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सुबह की कालिमा अंकिता आज थोड़ा उलझन में है। वो जल्द से जल्द अपने रूम पर पहुँच जाना चाहती है। न जाने क्यूँ उसे लग रहा है, ऑटो काफी धीमे चल रहा है। वो ऑटो ड्राइवर को तेज़ चलाने के लिए बोलना चाहती है, पर कुछ सोच कर चुप रह जाती है। आज उसे निर्णय लेना है। जिसके लिए उसे शांति चाहिए, शांत जगह। इस समय उसे अपने कमरे से ज्यादा कोई और जगह मुनासिब नहीं लग रही है। पर आज न जाने क्यूँ यह रास्ता उसे कुछ ज्यादा ही लम्बा लग रहा है। वैसे तो वो रोज़ ही इन रास्तों से गुजरती है। यूनिवर्सिटी से उसके घर का रास्ता। चाय का एक कप लेकर वो विंडो का पर्दा खिसका कर खड़ी हो जाती है। चाय का एक घूंट ले कर वो विंडो से नीचे नज़र दौड़ाती है। इस विंडो से वो एक पतली काली कोल तार की सड़क देख सकती है। रोज़ ही देखती है। इसमें अधिकतर पैदल राहगीर ही गुजरते है। कुछ दुपहिया वाहन भी। कभी कभार इक्का दुक्का लाइट मोटर व्हीकल भी। बड़े वहां गुजर नहीं सकते। सड़क के दोनों मुहाने पर जड़े वाहनों का प्रवेश निषेध का साइन बोर्ड भी लगा है। वो चाय का वापस घूंट लेती है। इस वक़्त सड़क लगभग सून-सान है। इक्का-दुक्का लोग गुजर रहे है। तभी उसकी नज़र आ रहे तीन …

पुस्तक समीक्षा - प्रीत मंजरी

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पुस्तक का नाम – प्रीत मंजरी ( काव्य – संग्रह ) लेखिका का नाम – डॉ प्रीत अरोड़ा प्रकाशक --- देवभूमि प्रकाशन ,नैनीताल पुस्तक मूल्य – ९० रूपये हिंदी कविता की प्रीतभरी सुवास इधर लिखी जा रही अधिकांश हिंदी कविता में एक खास किस्म की जड़ता है। नई कविता का ताना-बाना ऐसा है कि नया पाठक कविता की बगिया में जा कर भी वहाँ के फूलों से जुड़ नहीं पाता। न सौंदर्य, न गंध और न सौंदर्य। लगता है कागज के सुमन खिले हुए हैं। कविता की मंजरी ही नकली है। ऐसा इसलिए है कि अब अधिकांश कविताएँ दिल से नहीं, दिमाग से लिखी जा रही हैं, जबकि कविता कोमल अनुभूतियों की उपज होती है। जब तक अंतस में प्रीत न जगे, कविता संभव नहीं हो पाती। एक सार्थक कविता आत्मदर्पण भी होती है। वह चंद शब्दों का असंगत कोलाज भर नहीं होती, वह जीवन का जीवंत चित्र होती है। और आत्मा का अनगाया राग भी होती है। मन की बातों को अनुगुंंजन है कविता। जबकि समकालीन कविताओं में कविता के अनिवार्य तत्व लगभग अनुपस्थित हैं। यही कारण है ये कविताएँ पाठकों से दूर हंै। कविता की प्यास पुरानी कविताओं के पाठ से ही बुझ पाती है लेकिन ऐसा नहीं है कि सारी कवि-बिरादरी एक ढर्रे पर…

साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता

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साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता
- डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
Email : drsatappachavan@gmail.com
‘‘ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।
तन-मन को शीतल करे औरन को सुख होय।।’’ १
                    - महात्मा कबीर‘‘वाक्-संयम विश्व मैत्री की पहली सीढी है।’’२
                    - जयशंकर प्रसाद    ‘‘आज की स्थितियाँ भले ही उद्भ्रांत करती हों, पर मैं हार नहीं मानूँगा। मुझे वर्तमान परिवेश से कतई अफसोस नहीं है। मेरी आस्था अभी जीवित है। स्नेह मेरी पूँजी है और यही मेरे लेखन का आधार है’’३
                    - विष्णु प्रभाकर    उपर्युक्त विचार वर्तमानकालीन परिस्थितियों में उपयुक्त नजर आते है। ‘साक्षात्कार’ विधा पत्रकारिता के साथ - साथ साहित्य के क्षेत्र में भी अपना विशेष स्थान पा चुकी है। इसे मानना होगा। साहित्यिक साक्षात्कार का अपना अलग मंच है।
वर्तमानकालीन साहित्यकारों को प्रेरणा देने का महत्त्वपूर्ण कार्य  ‘साक्षात्कार’ विधा ने किया है। मूर्धन्य साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं् कृतित्व का अनुसंधान करते समय अनेक अनुसंधाताओं ने ‘साक्षात्कार’ विधा का आधार लिया है। इसमे…

डाक्टर चंद जैन "अंकुर " की कविता - माँ और मैं

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शरीर और आत्मा के योग से जीवन का निर्माण हुआ है । माता ,पिता माध्यम है किसी भी जीव के अवतरण का, पर जन्म देने वाला माँ है और जन्म लेने वाला "मैं" है । माँ और मैं के उभय से ही चेतना का प्रसार हुआ है, माँ ने ही जीवन को संभव बनाया है इसलिए माँ परम है और उसे व्यक्त करने वाला मैं है। " मैं " आदि है और माँ अनंत है अतः अनंत के गोद में आदि पलता है ,फलता और फैलता है । जब शिशु जन्म लेता है तो रोता है क्योकि माँ के नौ महीनों के योग का आनंद से ,अचानक रिश्ता टूट जाता है । अनंत के वात्सल्य से ही आदि का उदभव हुआ है । अनंत और आदि के सम्बन्ध कण कण में समाया है ,जड़ चेतन में समाया है । इसी , उभयता से सारे जीव जगत ,सारा विश्व समृद्ध हुआ है । "मैं "अनेकता में एकता का प्रतीक है, इसलिए शाश्वत है । मेरी कविता माँ और मैं, स्व उभय के निर्माण का गीत है, स्वयं में डूबने का गीत है । सबमें अपने मैं का दर्शन करने की आकांक्षा से ओतप्रोत है,और यही जीवन का उद्देश्य है । कैसा है , हम सब का पूर्वज याने ओ प्रथम "मैं "जो अनंत के गर्भ से जन्म लिया था , ओ प्रथम चेतना जिसका प्रसार सारा व…

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rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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