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June 2013
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कहानी

घर की तलाश

डॉ. रामवृक्ष सिंह

उस सुबह दफ्तर आते समय बस पकड़ने के लिए मैं बस स्टैण्ड पर पहुँचा ही था कि पहले से वहाँ खड़ी एक महिला मेरे पास आई और पूछने लगी- “सर, आप सामनेवाली कॉलोनी में रहते हैं क्या?” “जी हाँ।” मैंने सहजता से उत्तर दिया । शुरुआती संकोच के बाद उसकी वाणी में आत्म-विश्वास लौट आया था- “नहीं, वो क्या था न कि मुझे एक घर की तलाश थी...खरीदने के लिए....पर, कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।” उसने बात आगे बढ़ाई।

मैंने सरसरी तौर पर उसका मुआयना कर लिया। कद लगभग पाँच फुट। बदन दोहरा, कमर के इर्द-गिर्द चरबी, जैसीकि बच्चेदार महिलाओं के अकसर हो जाती है। चेहरा गोल। रंग काफी गोरा। उम्र लगभग पैंतीस-छत्तीस। लेकिन पहली नज़र में उसे मैंने तीस या उससे कम उम्र की समझ लिया था। बस स्टैंड पर उसे मैंने कई बार देखा होगा, लेकिन दुपट्टे से नकाब बनाकर चेहरा पूरी तरह ढका होने के कारण शायद ही उसका मुँह कभी दिखाई पडा हो। लेकिन आज उसके चेहरे पर नकाब नहीं थी।

“इसमें करना क्या है! अपनी ज़रूरत और बजट के हिसाब से कोई प्रॉपर्टी देखिए। थोड़ा-सा बयाना देकर, उसके मालिक से सेल का ऑफऱ लिखवाकर ले लीजिए। पैसे का जुगाड़ कीजिए और रजिस्ट्री करा लीजिए।” मैंने ऐसे कहा कि जैसे संपत्ति खरीदना और ठेले से आलू-प्याज खरीदना एक ही बात हो।

“जी, मैंने एक प्रॉपर्टी देखी तो है। लेकिन आगे कैसे क्या करूँ, समझ नहीं आ रहा। दरअसल मैं अकेली हूँ न। कोई ऐसा है नहीं जो मेरा मार्ग-दर्शन कर दे।” महिला ने अपनी मज़बूरी बताई।

उसके अकेलेपन पर मुझे अचानक तरस आने लगा। पैंतीस-छत्तीस वर्ष की कोई ठीक-ठाक-सी दिखनेवाली महिला अपने अकेलेपन का जिक्र करे तो यह तो समझ आ ही जाता है कि या तो वह अब तक अविवाहिता रह गई और माता-पिता, भाई-बहन भी साथ छोड़ गए या विधवा अथवा तलाकशुदा है और नाते-रिश्तेदारों से दूर अकेले रहने को विवश है। हमारी मुलाकात बस कुछ ही मिनट पुरानी थी, और हमारी बातचीत का केन्द्र उसका अकेलापन नहीं, बल्कि उसके लिए घर खरीदना था, इसलिए इस विषय में कुछ भी पूछना मुझे उचित नहीं लगा। मैंने मान लिया कि मदद की अपेक्षा में ही उसने अकेलेपन का ज़िक्र किया है, किसी और प्रयोजन से नहीं। लेकिन फिर भी, किसी अकेली युवा महिला की खुलकर मदद करना भी मुझे निरापद नहीं लगा। लिहाजा मैंने बस इतना ही पूछा- “कोई तो होगा, जो आपके साथ खड़ा हो सके ? ”

“सर, कोई नहीं है। किराए के मकान में रहती हूँ। पाँच हजार रुपये महीने किराया देना पड़ता है। सर्वहारा कंपनी में काम करती हूँ। चौदह हजार रुपये तनख्वाह मिलती है। मेरठ की रहनेवाली हूँ। यहाँ मेरा कोई भी सगा-संबंधी नहीं है। चार बच्चे हैं। दो बेटियाँ, दो बेटे। सब पढ़ने जाते हैं। ” उसने अपनी पारिवारिक और माली हालत संक्षेप में, लेकिन बड़ी बेबाकी से बयान कर दी।

चूंकि उसने मकान खरीदने के सिलसिले में मेरी मदद चाही थी, इसलिए उसके परिवार के बारे में अधिक चर्चा करना मुझे मुनासिब नहीं लगा। लेकिन यह तो तय था कि मकान या प्लॉट खरीदने के लिए धन चाहिए और धन या तो हमारे पास पहले से जमा हो या उधार लिया जाए। उधार लिया जाए तो उसे लौटाने की हमारी क्षमता होनी चाहिए। लौटाने की क्षमता हमारी आय, हमारे वर्तमान और भावी खर्चों तथा हमारी अवशेष आय-अर्जक आयु पर निर्भर करती है। महिला ने यह तो बताया कि उसकी मासिक आय चौदह हजार रुपये है, उसे हर महीने पाँच हजार रुपये भाड़े के देने पड़ते हैं। चार बच्चे हैं जो स्कूल जाते हैं। इसलिए उनके खर्चे तो होंगे ही। सभ्यता के नाते मैं उसकी वर्तमान आयु नहीं पूछ सकता था। इसलिए लोन लेने पर चुकाने के लिए उसके पास कितने साल की सर्विस बकाया होगी, उसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता था। इतनी कम आय...., इतने ढेर सारे खर्चे..., इसमें वह मकान कैसे खरीदेगी, या प्लॉट खरीदकर उसपर मकान कैसे बनवाएगी, यह सोचकर मैं परेशान हो उठा।

“बच्चे कौन-कौन-सी क्लास में हैं?” संकोच करते-करते भी मैंने पूछ लिया।

“बड़ी बेटी नौवीं में है। बाकी सब उससे छोटी कक्षाओं में ..।”

“इसका मतलब यह हुआ कि दो-तीन साल में आपकी बच्ची कॉलेज जाएगी। उसके पीछे-पीछे दूसरे बच्चे भी बड़े होंगे और उनकी पढ़ाई का इन्तजाम भी आपको करनी होगी। चौदह हजार में आप कैसे ये सब मैनेज करेंगी!” मैंने चिन्तातुर लहजे में ऐसे कहा जैसे मैं न जाने कितने बरसों से उससे परिचित हूँ।

“नहीं पाँच लाख रुपये तो मेरे पास पहले से जमा हैं। बाकी लोन ले लूँगी।”

“जो मकान आप खरीदने की सोच रही हैं, उसकी कीमत कितनी है?”

“बेचनेवाले तो बारह लाख रुपये माँग रहे हैं। लेकिन हो सकता है पचास हजार तक कम कर दें।”

“इसका मतलब है कि आपको लगभग सात लाख रुपये का लोन लेना पड़ेगा। बेहतर होगा कि आप ये लोन अपनी कंपनी से ले लें, जो धीरे-धीरे आपके वेतन से कटता रहेगा।...” इस बीच हमारी बस आ गई। हमने आगे-पीछे की सीटें लीं। वह अगली सीट पर तिरछी होकर बैठ गई और पीछे मुड़कर मुझसे बातें करती रही। जब तक वह उतर नहीं गई, मैंने जमीन-जायदाद खरीदने के बारे में उसे ढेर सारी व्यवहारिक बातें बताईं। और बीच-बीच में यह भी कहना नहीं भूला कि इस मामले में थोड़ा बड़ा ही सोचना चाहिए, क्योंकि कालान्तर में हमारी आय बढ़ती ही है और उसी अनुपात में हमारी आकांक्षाएं, आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। तब छोटा मकान हमें बार-बार याद दिलाता है कि काश, हमने समय रहते थोड़ा और पैसा लगाकर थोड़ा-सा और बड़ा मकान या बड़ा प्लॉट ले लिया होता।

उसने मेरी सारी बातें ध्यान से सुनीं। मेरा विजिटिंग कार्ड माँगकर पर्स में रख लिया और अपना मोबाइल नंबर दिया। मैंने उसका नाम पूछने की जरूरत नहीं समझी। बल्कि अपने मोबाइल में उसका नंबर “घर-खरीददार” नाम से दर्ज़ कर लिया। वह बार-बार बस एक ही रट लगाए रही- “सर, मुझे तो कुछ पता नहीं है। अब तो बस जो कुछ करना है आपही को करना है।” जितनी बार उसने यह जुमला बोला, उतनी बार मैं उसके प्रति और चिन्तित होता गया। मैंने मन ही मन ठान लिया कि इस बेबस महिला के लिए ज़रूर कुछ न कुछ करूँगा।

फिर भी उसके ऐसा कहने पर हर बार मैं संकोच से गड़ता रहा और बार-बार यंत्रवत एक ही उत्तर देता रहा- “करना तो मैडम आपही को है। मैं तो सिर्फ आपको गाइड कर सकता हूँ।” जैसाकि मेरा स्वभाव है, कई बार मन में आया कि उससे कहूँ कि कभी आप बच्चों सहित मेरे घर आइए। लेकिन बहुत कोशिश करके मैंने खुद को ऐसा कहने से रोका। कहीँ अंदर ही अंदर यह डर भी था कि इसे अपना घर दिखाकर मैं आगे के लिए कोई मुसीबत न मोल ले लूँ। मेरे ज़हन में ऐसे कितने ही किस्से तैर गए, जिनमें सुनने में आया कि किसी चालबाज महिला ने पहले मदद माँगी और फिर पुरुष को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। यह महिला वैसी नहीं लगी, फिर भी....।

उसका स्टैंड आया तो वह बस से उतरकर चली गई।

उसके बाद हमारी मुलाकातें बस स्टैंड पर और वह भी सुबह के समय ही होतीं। जब भी वह मिलती, मैं उससे संपत्ति की खरीद के मामले में हुई प्रगति के विषय में पूछता। इसी क्रम में पता चला कि जो छोटा-सा घर वह खरीदना चाह रही थी, वह प्राधिकरण द्वारा आश्रयहीन लोगों को रियायती दामों पर आवंटित किया गया था और उसे किसी दूसरे को बेचने की अनुमति नहीं थी। बेचनेवाला उससे पचास हजार रुपये बयाना माँग रहा था और मकान के कागजों की फोटोकॉपी तथा बेचने के बारे में कोई ऑफऱ लेटर आदि देने को तैयार नहीं था। लिहाजा उस संपत्ति की रजिस्ट्री किसी दूसरे के नाम कराना और खरीद के लिए नियोक्ता अथवा सरकारी बैंक से लोन लेना संभव नहीं था। महिला की उलझन समझकर मैंने उसे आश्वस्त किया- “आप चिन्ता न कीजिए। कई प्रॉपर्टी डीलर मेरे जाननेवाले हैं। मैं उनसे बात करके आपको घर दिलवाऊँगा।”

हर रोज शाम को घर लौटने के बाद मैं पत्नी से भी इस पूरे प्रकरण के विषय में बातें करता और घर के ही फोन से अपनी जान-पहचान वाले कई डीलरों से कहता कि वे दस-बारह लाख के किसी छोटे मकान या सात-आठ लाख रुपये तक के प्लॉट के बिकाऊ होने पर मुझे सूचित करें। अगले शनिवार-रविवार को मैं गाड़ी ठीक कराने गैराज गया तो उससे सटा हुआ दफ्तर देखा, जिसपर किसी प्रॉपर्टी डीलर का बोर्ड लगा था। मैंने वहाँ से भी कुछ संपत्तियों के ब्यौरे जुटा लिए। अब मैं आश्वस्त हो गया कि उस बेचारी अकेली महिला की घर की तलाश पूरी करने में कुछ न कुछ मदद तो मैं जरूर पाऊँगा।

अगले कुछ दिन हम बस स्टैंड पर कई बार टकराए। मैं हमेशा की तरह एक ओर खड़ा होकर बस का इंतजार करता। वह बस स्टैंड पर आती, और एक ओर खड़ी रहती। बस आने पर मेरी ही बस में चढ़ती, लेकिन कभी पास आकर बोलती नहीं थी। जैसे आजकल की लड़कियाँ और युवा महिलाएँ अपने पूरे चेहरे को किसी कपड़े से लपेटे नकाबपोश बनी रहती हैं, वैसे ही उसका भी बाना रहता। उससे बात करने का विचार मन में होने पर मुझे यही लगता कि यदि ज़रूरत होगी तो वह खुद बात करेगी, कि यदि उसे संपत्ति खरीदने के बारे में मेरी मदद दरकार होगी या वह बात को आगे बढ़ाना चाहेगी तो खुद ही पहल करेगी, क्योंकि मेरा सड़क पार करके बस स्टैंड पर आना तो वह देख ही लेती होगी। मेरा कार्ड उसके पास था ही, जिसमें मेरे दफ्तर, घर और मोबाइल- तीनों नंबर दिए हुए थे। हाँ, उसका मोबाइल नंबर भी मेरे पास था, लेकिन उसका जो सीमित परिचय मुझे प्राप्त था, उससे मुझे यह आश्वस्ति नहीं थी कि उसे फोन करना निरापद होगा या नहीं। इसलिए उसे फोन न करना ही मुझे श्रेयस्कर लगता। यदि फोन करने का विचार मन में आया भी तो मैंने बार-बार अपने खुद को समझाया कि छोड़ो, जाने दो, उसे ग़रज होगी तो खुद ही फोन करेगी, कि मैं एक सीमा से अधिक चिन्ता दिखाने लगा तो वह कुछ और न समझ बैठे, माता-पिता, भाई-बहन और पति-विहीन, अकेली व सुन्दर महिला...!

ऐसे ही कुछ दिन बीत गए। इसके बाद उसे जब भी देखा, नकाब में देखा। न उसके चेहरे की नकाब उतरी, न जुबान से कोई बात निकली। लेकिन उसकी देहयष्टि की बनावट, कद-काठी और कपड़ों से ही उसे पहचानता रहा। फिर एक परिवर्तन आया। पहले जहाँ वह पैदल चलकर बस स्टैंड तक आती थी, वहीं अब किसी तीस-पैंतीस वर्षीय युवक की बाइक पर बैठकर आने लगी। युवक उसे बस स्टैंड पर उतारता और आगे निकल जाता। वह बस पकड़ती और अपने नियत स्टैंड पर उतर जाती। लगभग एक-डेढ़ महीने यह सिलसिला चला। फिर उसका बस स्टैंड पर आना बंद हो गया। कई हफ्ते बीत गए और उसे मैंने फिर कभी नहीं देखा। उसके लिए कई मकानों और प्लॉटों की जानकारी मैंने एकत्र कर ली थी, लेकिन अब शायद उसे उनकी मदद की ज़रूरत नहीं थी। इस बीच जिन दलालों से मैंने बात की थी, वे मेरे पीछे पड़ गए कि साहब, पहले तो प्रॉपर्टियों के बारे में बड़ी तत्परता से पूछ रहे थे और अब जब बता दिया तो क्या बात हो गई, जो फोन करना भी छोड़ दिया। अब मैं उन्हें क्या समझाता! उलटे अपने मन को ही समझा लिया कि शायद उस महिला ने अपने लिए कोई उपयुक्त घर तलाश लिया होगा और अब वहीं रहने चली गई होगी। मेरे मन ने बार-बार चाहा कि काश, ऐसा ही हुआ हो, कि काश उस महिला को कोई घर मिल गया हो।

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श्याम गुप्त

१. क्यों धड़के वह दिल
दिशा बोध जिस दिल में नहीं हो
उसको हलचल से क्या लेना |
प्रीती भाव जिस ह्रदय नहीं हो,
उसको धड़कन से क्या लेना |
क्यों धड़के वह दिल कि आज भी-
लुटे द्रौपदी चौपालों पर |
जलती बाहें अभी घरों में ,
लटके फांसी बेटी -बहना |.....दिशा बोध जिस .....||
क्यों धड़के वह दिल कि आज भी,
जनता दो रोटी को तरसे |
होटल की कृत्रिम वर्षा में,
जाने कितने साए थिरके |
अब भी राशन की चीनी को,
लम्बी लम्बी लगी कतारें |
हेरीपौटर की खरीद में,
मस्त साहिबानों की सेना |  ....दिशा बोध जिस....||
आज न जाने शास्त्र धर्म पर ,
लोग उठाते विविधि उंगलियाँ ?
देश समाज राष्ट्र की खातिर,
नहीं खौलती आज धमनियां |
सत-साहित्य औ कथा कहानी,
की बातों में अब क्या बहना|
हीरो-हीरोइन के किस्से ,
बन बैठे मानस का गहना| ----  दिशा बोध जिस.....||


२. सच्चा जीवन....
जीवन जो व्यस्त सदा ऐसा,
मित्रों का ध्यान भी रहे नहीं |
उस जीवन को हम क्या समझें,
स्वच्छंद सुरभि सा बहे नहीं |
उस जीवन को हम क्या समझें,
रिश्ते नातों को चले भूल |
उस जीवन को कह सकते हैं,
सूखे गुलाब के तीक्ष्ण शूल |
उस जीवन को भी क्या समझें,
जो नहीं भरा शुचि भावों से |
वह जीवन भी क्या जीवन है ,
जो जूझ न सका अभावों से |
जिसने जीवन-जग के सारे,
सुख-दुःख को जाना सुना नहीं |
परसेवा या सत्कर्मों के ,
तानों बानों से बुना नहीं |
वह जीवन क्या निज देश-राष्ट्र,
के प्रति गौरव का भान न हो  |
निज शास्त्र-धर्म के गौरव का,
मन में कोई अभिमान न हो |
मानवता के हित चिंतन का ,
जिसमें कोई अरमान नहीं |
मानव मानव प्रति प्रीति भाव,
का कोई भी संज्ञान नहीं |
वह शुष्क शून्य जड़ जीवन, यदि-
शत वर्ष मिले, क्या जीवन है |
पलभर जीबन परमार्थ भाव,
जीवन ही सच्चा जीवन है ||


३.एक नियम है इस जीवन का ....
एक नियम है इस जीवन का,
जीवन का कुछ नियम नहीं है ।
एक नियम जो सदा-सर्वदा,
स्थिर है,  परिवर्तन ही है ॥

पल पल, प्रतिपल परिवर्तन का,

नर्तन होता है जीवन में  |

जीवन की हर डोर बंधी है,

प्रतिपल नियमित परिवर्तन में ||

जो कुछ कारण-कार्य भाव है,

सृष्टि, सृजन ,लय, स्थिति जग में |

नियम व अनुशासन,शासन सब,

प्रकृति-नटी का नर्तन ही है ||

विविधि भाँति की रचनाएँ सब,

पात-पात औ प्राणी-प्राणी  |

जल थल वायु उभयचर रचना ,

प्रकृति-नटी का ही कर्तन है ||

परिवर्धन,अभिवर्धन हो या ,

संवर्धन हो या फिर वर्धन |

सब में गति है, चेतनता है,

मूल भाव परिवर्तन ही है |

चेतन ब्रह्म, अचेतन अग-जग ,

काल हो अथवा ज्ञान महान |

जड़-जंगम या जीव सनातन,

जल द्यौ वायु सूर्य गतिमान ||

जीवन मृत्यु भाव अंतर्मन,

हास्य, लास्य के विविधि विधान |

विधिना के विविधान विविधि-विधि,

सब परिवर्तन की मुस्कान  ||

जो कुछ होता, होना होता ,

होना था या हुआ नहीं है |

सबका नियमन,नियति,नियामक .

एक नियम परिवर्तन ही है ||




४.निर्बंध बंधन ....


जीवन मेरा छंद के बंधन सा निर्बंध रहा है |

तन तो बंधन का भोगी पर मन स्वच्छंद रहा है     ...जीवन मेरा.....||


गद्य पद्य क्या, छंद बंद क्या ,
कविता हो मन भावन ही |

उमड़ घुमड़  कर रिमझिम बरसे,
जैसे वर्षा सावन की |


कभी झड़ी लग जाए , जैसे -
झर झर छंद  तुकांत झरें |

कभी बूँद -बौछार छटा सी ,
रिमझिम मुक्त छंद विहरें |


गीत-अगीत, कवित्त सरस रस ,
दोहा चौपाई बरवै |
कुण्डलिया, हो मधुर सवैया ,

हर सिंगार के पुष्प झरें |


कविता तो जीवन का रस है, छंद छंद आनन्द बहा है |

जीवन मेरा  छंद के बंधन सा  निर्बंध  रहा  है ||


माँ वाणी की कृपा दृष्टि,
मानव मन को मिल जाती है |

नवल भाव सुर लय छंदों की ,
भाव धरा बन  जाती है |


छंद बंद, नव कथ्य, भाव-स्वर,
कवि  के मानस में निखरें |

विविधि छंद लेते अंगडाई ,
नवल सृजन के पुष्प झरें |


छंद पुराने या नवीन हों,
छंद छंद मुस्कानें हैं |

छन्द ही कविता का जीवन है,
नित नव पुरा सुहाने हैं |


छंद को बाँध सका कब कोई, छंद छंद निर्द्वंद्व रहा है |

जीवन मेरा छंद के बंधन सा निर्बंध रहा है ||


                          


डा श्याम गुप्त , के-३४८, आशियाना, लखनऊ


-----------------------.

 
 

जसबीर चावला

 
विचारों के बंदी
''''''''''''''''''
 
 
ये  न    दवा  करते    हैं
न    ये  दुआ  करते    हैं 
            ~*~
टी वी    के  चैनलों    पर
बस  हुआ  हुआ  करते  हैं
            ~*~
बंदी    हैं  कुंद  विचारों  के
गैर    को  बंधुआ कहते हैं
            ~*~
बोलते  गुलामी  की  बोली
हम पिंजरे का सुआ  कहते हैं
            ~*~
देश को  मारते  निस  दिन
श्राद्ध  में हलुआ  करते हैं
            ~*~
बहस  को  जिंदा  रखना  है
ये  तो  बददुआ  करते  हैं
            ****

नौ कणिकाएं
 
 
 
बीते
दिन 
रीते
~*~
पल
आना
कल
~*~
रूक
मत 
झुक
~*~
आई
रुकी
गई
~*~
आग
गई
जाग
~*~
प्रेम
खुला 
फ्रेम
~*~
रात
खुला
गात
~*~
दिन
तारे
गिन
~*~
हारा
जग
मारा
[]*[]
 
          "आय बट व्हाय"-"हूं पर क्यूं"-इंग्लिश में लिखी इस अर्थ पूर्ण कविता की तर्ज पर ये लघू कणिकाएं/कविताएं अचानक एक कौंध-एक छपाक् की ध्वनि करती हैं ओर फिर गहरा मौन/गुड़ुप...........!
 
आओ गठबंधन तोड़ें
 
 
 
घात          हुआ
प्रतिघात    हुआ
            +
 
तनी        मुट्ठियां
आघात        हुआ 
            +
 
शब्द  बाण    चले 
विश्वासघात  हुआ
            +
 
गुर्राये  बड़बड़ाये
सन्निपात      हुआ
              +
 
पेट दिमाग बंद  हुए
शहर में उत्पात हुआ
              +
 
मर  गई    संवेदना
तन में पक्षाधात हुआ
 
           
हर खास और आम को इत्तला:चुनावी मुनादी
 
 
ढम...ढम...ढम...ढम.........
 
नंगो का
मौसम आ गया
  *
जंगो का
मौसम आ गया
  *
फिज़ा में 
चुनाव तैर रहे
  *
दंगो का 
मौसम आ गया
  *
ढम...ढम...ढम...ढम.........
 
आल इज वेल
 
 
पापा पापा
हां बेटा
राजनीति खेलें
हां बेटा
मम्मी का बेटा
हां बेटा
पापा का बेटा 
ना बेटा
?.....?.......?
 
सीख : राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता

--------------------.

 

संजीव शर्मा


कंकड़

उपासना

पत्थर की,

उस पत्थर की

जो एक रूप

विस्तृत विस्तीर्ण अटल

पर्वत बना खड़ा है

या फिर

उस पत्थर की

जो टूट-टूटकर

अंतत:

एक कण में

बदल गया है ।

मन की पीड़ा

चाहती है कि मैं भी

उपासना करूं,

पर्वत हो या कण

है प्रतिरूप ही

एक टूटकर बना

एक जुड़कर स्थिर

है तो समान ही

है तो पत्थर ही

कौन दीर्घ, कौन दीप्त

कौन महं, कौन ईश्

जो कभी पहाड़ था

टूटकर शिला बना

और टूटकर गिरा तो

दीर्घ खण्ड बन गया

और फिर नया दुख

और एक नयी पीड़ा,

फिर से टूटा

और टूटा

रह गया पत्थर बन

पीटकर, फेंककर, तोड़कर

अंतत:

बन गया कंकड़,

मैं नहीं चाहता

मान देना धन्य को

या उसे जो मंदिरों में

मूक निश्चल सा

खड़ा है

देखकर सब कुछ

निर्जीव है निर्बोध है

चाहता हूं मैं भी

करना उपासना

उस कण की

धूल कण की

जो महत का अंश है

और तप-तप कर

धरा की आग में

और घिस-घिसकर

दुखों के रंद पर

बनके हीरा

आ अवस्थित हो गया है

हां यही कण, कंकड़

 

प्रियसी

प्रियसी तुम कितनी सुंदर हो

सरितामय आवेग तुम्हारा

गगन समान है नैन तुम्हारे

मुख उल्लासों की प्रतिछाया

मृग शावक की चाल तुम्हारी

जल प्रपात सादृश चपलता

जिस पर गिरती है मह धारा

उस पत्थर की पीड़ा जितनी

है अविकल अवधारा,

सुरभित-सुरभित पात-पात पर

नव रचना जैसे मधु पुष्प

सुरभित-सुरभित पात-पात पर

नये प्रभात की मधुर कल्पना

नव मधुमास तुम्हीं हो

नये-नये प्रभास मधुर का

नया-नया जैसा संसार

वैसे ही सुरभित हो तुम

वैसा ही आलोक तुम्हारा,

युद्ध अश्व सी सुगठित तुम

छुईमुई सी कोमल तुम हो

झुण्ड, झुरमुटों से सकुचाई

तुम भयभीत नमित हो

आसमान सा चेहरा सुरतिज

तुम निस्सार नहीं पुलकित हो

चंदा-सूरज ऑंख तुम्हारी

नये-नये प्रभात मधुर का

नया-नया जैसा श्रंगार

वैसे ही सुरभित सी तुम हो

वैसा ही आलोक तुम्हारा,

प्रियसी तुम कितनी सुंदर हो

सरितामय आवेग तुम्हारा ।

 

संजीव शर्मा

मोबा नं 9868172409

रामनगर शाहदरा

दिल्‍ली

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मोतीलाल



कद

याद आता है मुझे
एक खुला आसमान
घाटियों से बहती नदी
उसका इतराना
उठ-उठ कर गिरना
और आगे बढ़ते जाना
अपने पूरे वजूद के साथ ।
 
याद आता है
हरीतिमा के आलोक से
आलोकित वह जंगल
पत्तों से बना
सुन्दर सा घर
और शाम की लालिमा में
थिरकते पावों की झंकार ।
 
याद आता है
एक साथ पूरे आकार लिए
हमारी पुरखें
जिसने हमें दिया यह आजादी
अपना खून बहाकर
और हम हैं कि
आजादी के बहाने
उजाड़ रहे हैं जंगल
बाँध रहे हैं नदी का रास्ता
और खड़े कर रहे हैं अट्टालिकाएँ
उन पत्तों के घरों को अनदेखा कर ।
 
अब भी
प्रतीक्षा है तुम्हारी
कि तुम लौट आओ
और दे जाओ
एक सार्थक दिशा
इन जंगलों को
इन नदियों को
ताकि पा सके ये
अपना वह स्वाभाविक कद ।
 
* मोतीलाल/राउरकेला 
* 9931346271

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चंद्रेश कुमार छतलानी


कभी खामोशी है दर्द का सबब, कभी दर्द खामोशी से गुज़र जाए|
जुनून को छोड़ दें यही बेहतर है, चुपचाप ज़िंदगी ये गुज़र जाए|

लगता है कि हार सा गया मैं सोये हए ज़मीरों और लाशों से,

फिर भी उम्मीद है कि अब दुनिया इस मुर्दापरस्ती से गुज़र जाए|

मैं जुस्तजू में था कि मुड़ जाएँ बहके कदम कभी उसकी राह को,

निशाँ क़दमों के ऐसे जमे थे कि सागर भी गहराई से गुज़र जाए|

वक्त कभी पराया हो जाता है तो कभी अपनों से भी अपना लगे,

दुआ बस इक ये क़ुबूल हो जाये कि वक्त हर तन्हाई से गुज़र जाए|

--

ये परबत पे प्यासी घटाओं का मौसम,

आओ यहाँ पे खो जाएँ हम|

ये झरनों का संगम, गुलों सा है हमदम,

आँचल तले सो जाएँ हम|

सूरज की पहली किरण जगाये,

चाँद थपकी दे कर सुलाए,

ये चिनारों के पत्ते, बारिश की रिमझिम, 

इस जहां में खो जाएँ हम|

ये परबत पे प्यासी घटाओं का मौसम...

हवाएं महकती चली जा रही,

बारिश की बूँदें गुनगुना रही,

ये किताबों सी मंजिल, बर्फ का दर्पण,

हौले से इनको छू जाएँ हम|

ये परबत पे प्यासी घटाओं का मौसम...

-

क्यों बच गयी मूर्ति मेरी केदार में|

कभी प्रकृति के तांडव ने

कितना कुछ तोड़ा संसार में |

कितने बिछ गए, कितने रह गए

मृत्यु के भीषण हाहाकार में |

ओ ईश्वर! ये कैसी है लीला

कितनों को जल ने है लीला|

तेरे दर्शन को प्यासे भक्त

क्यों ना पहुंचे अपने घर-बार में|

बस तेरे इशारे से ही हिलता

इस जहाँ का इक इक पत्ता|

फिर क्यों इतने अनाथ हुए,

ये बच्चे-बूढ़े तेरे ही दरबार में.|

शिव ही सत्य है शिव ही शाश्वत

शिव ही वेद और शिव ही भागवत|

शिव की भक्ति जीवन दायिनी

फिर बह गये कैसे काल की धार में|

जी जाता है गणेश जो कट जाए सिर

जो मरे केदार में तेरे ही बच्चे थे फिर|

हे शिव! भक्ति कौन करेगा,

जब भक्त ही न रहेंगे इस संसार में|

रौद्र है, तू ही भोला, तू ही तो विधान है

तेरे नयनों में बता क्यों अश्रु अंतर्धान है|

भजनों की छिन गयी वाणी और,

बहा हाथों से लहू तेरे नमस्कार में|

कब तक रहते चुप अब तो शिव भी बोले,

मैं हर क्षण रोता हूँ संग मेरे तू भी रो ले|

मैं भी काल का ग्रास हुआ हूँ,

साथ उनके जो मिल गए निराकार में|

बस मेरे नाम के मोह में पड़े हो

सच्चे और दुखियों से दूर खड़े हो|

भूखों को देते नहीं एक अन्न का दाना,

पकवान रख देते हो मेरे सत्कार में|

क्यों लड़ते हो तुम मेरे ही नाम के लिए,

मुहम्मद के लिए तो कोई राम के लिए|

क्यों नहीं सुनते मेरी चीख को,

हर इक बच्चे की चीत्कार में|

माता-पिता को बड़ा बोझ जान के

क्या पा लोगे ईश्वर को मान के |

क्षीण कर दी मेरी ही शक्ति,

जो मैं बस गया ऐसे संस्कार में|

प्रकृति से कितनी खिलवाड़ करते,

मन में फिर अंधविश्वास को भरते|

वृक्षों को भेदा, वायुमंडल को छेदा

ऐसे बढ़े हो अपने आत्मोद्धार में|

वायु भी प्रदूषित है, दूषित है जल भी,

तरंगे मंडल में, बारूद भरा है थल भी|

नियंत्रण किस स्थान पर मेरा है

तुम्हारे इस संसार में|

क्रिया-प्रतिक्रिया का ही बस खेल है सारा,

याद करो कितने दिलों को तुमने मारा|

दया, धर्म और प्रेम बह गया

मोह, लोभ और काम के विकार में|

मैं तो बसा हूँ सृष्टि के हर इक कण में,

एक बार तो देख रहता हूँ तेरे ही मन में|

भूल ना करो स्वयं को मानव जान कर,

लाओ तुम मुझे अपने व्यवहार में|

हर इक के दुःख में त्रिनेत्र रोते हैं मेरे,

अपनों को स्नेही जब खोते हैं मेरे |

जो हो चुका इतना असंतुलन तो,

क्यों बच गयी मूर्ति मेरी केदार में|



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एकता नाहर 'मासूम'


अबकी बार तू सीता बनके मत आना

स्त्री तेरे हज़ारों रूप,
तू हर रूप में पावन,सुन्दर और मधुर।
पर अबकी बार तू सीता या राधा बनके मत आना,
द्रौपदी और दामिनी बनके भी मत आना,
तू जौहर में जलती वीरांगना और,
प्रेम के गीत गाती मीरा बनके भी मत आना,
मेरी तरह चुप्प,बेबस और मूर्ख बनके भी मत आना।
अबकी बार तुम गुस्सैल,बिगडैल और मुंहफट लड़की बनके आना,
वहीँ जो अपनी आज़ादी का राग आलापते,मुंबई के एक हॉस्टल में रहती है।
और कल जिसने एक लड़के को बुरी तरह पीटा,
क्योंकि लड़का उसकी छाती पर कोहनी मार के निकल गया।
अबकी बार तुम शालीनता और सभ्यता के झंडे फहराने मत आना,
और वो मोहल्ले की रागिनी भाभी बनकर भी नहीं,
जिसकी सहेली से मिलने की इच्छा भी पति की इज़ाज़त पर निर्भर है।
तुम, वो काँधे पे स्वतंत्र मानसिकता का बैग टाँगे, समुद्र लांघ के
स्वीडन से इंडिया घूमने आई,दूरदर्शी और आत्मनिर्भर लड़की बनके आना।
अब नहीं बनके आना तुम मर्यादा न लांघने का प्रतीक,
तुम गली की गुंडी बनके आना।
ताकि तुम्हारी आबरू को घायल करने वाले ये नपुंसक,
तुम्हारे अस्मित को नोचने वाले ये दरिन्दे,
तुम्हारे दम भर घूरने से ही अपने बिलों में छिप कर बैठ जाएँ।
और घर की कुण्डी लगाके कमरे के बिस्तर पर न फेंकी जाएँ,
तुम्हारी ख्वाहिशें,स्त्री होने का ठप्पा लगकर।
अबकी बार तुम समाज के प्रहरियों के आदर्श-मूल्यों में,
अपनी संवेदनाओ और इच्छाओ को खंडित करके,
सीधी,चुप्प,दुपट्टा सम्हाले,'मासूम' गुडिया बनके मत आना।
तुम निडर,अमूक और आफतों से लड़-झगड़ने वाली,
अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करने वाली,
सीमा,बंधन और गुलामी में अंतर कर पाने वाली,
उपहास,आलोचना,और उलाहना को गर्दो-गुबार करने वाली,
आज़ाद,खूबसूरत और खुले विचारों वाली,
जीवन से भरपूर वो पागल लड़की बनके आना।
मुझे तुम वैसी ही अच्छी लगती हो।
नैतिकता और आदर्शवाद के पुराने उदाहरण पर्याप्त हैं
हम बेटिओं,बहनों और स्त्रिओं के जीवन मूल्य तय करने के लिए
अब मेरे कस्बे की लडकियां तुम्हारे स्वछंद,स्वतंत्र
और बिंदास होने का उदाहरण देखना चाहती हैं,
समाज की परम्पराओं की जंजीरों में जकड़ी ये लडकियां,
तुम्हारे उस बिंदास व्यक्तित्व में कहीं न कहीं,
खुद का भी तुम्हारी तरह होना इमेजिन करती हैं।
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सरोज कांत झा



1

ढूंढती रही वो जाने क्‍या खोयी ।

वो मेरा खत पढ़कर रातभर रोयी ॥


है अंधरों में कैद ये जिंदगी अपनी

वो उजालों का वास्‍ता दे कहां खोयी।


बदल रहें हैं जिस्‍म और जुबान अपनी

वो बूढ़ी मां पूछे तुमका का होयी।


कई दिनों से वो गुमसुम, तन्‍हा सा है

फिर कोई दर्द पुराना दे गया कोई॥

वो मेरा खत पढ़कर रातभर रोयी......

2

इन परिंदों को जरा सा पर दे दो।

हम गरीबों को अपना कोई घर दे दो॥


माना तुझको अपना साथी, माना है मसीहा

भूले से सही इक नजर दे दो....


बड़ें जालिम हो, बेखौफ होकर घूमते हो

ये खुदा इनको जरा सा डर दे दो....


हर हाथों में मशाल हो, जुबॉ पर हो इंकलाब

इस मुल्‍क में ऐसी गदर दे दो....


ये तेरा है, ये मेरा है सब कहते हैं

सबका हो अपना इक शहर दे दो....

3

हाशिये पर खड़े लोग अब भी हिसाब मांगते हैं।

जाहिल अपने हिस्‍से की किताब मांगते हैं॥


शर्म भी हो गयी है हमारे यहां खूब शर्मसार

अब लोग मुंह छुपाने को नकाब मांगते हैं...


हमारे अरमानों को तोड़ा, हमें अंधेरों में छोड़ा

फिर भी आके हमसे वोट जनाब मांगते हैं......


यूं ही लगते रहेगें सालो-साल जम्‍हूरियत के मेले

हर साल वो आवाम से खिताब मांगते हैं....


जो रहनुमा थे हमारे, थे हमारे मसीहा भी

वो आज हमारा गोश्‍त-ए-कबाब मांगते हैं.....


आज हम भी पूछे उनसे उनकी कैफियत

हमें चाहिए न ख्‍वाब, जवाब मांगते हैं.....

4


हम भटक ही रहें हैं शहर-शहर।

जब से छोड़ के आये अपना गांव घर॥


आदमी बस बना हे खिलौना यहां

जज्‍बातों की यहां नहीं है कदर...


हर चेहरे पर कई चेहरे यहां

अब तो अपनों से भी लगता है डर...

लोगों का समुद्र है उमड़ा यहां

कौन तन्‍हा किनारे पर बैठा मगर....

 

सरोज कांत झा(पत्रकार)

भुरकुण्‍डा जयप्रकाशनगर

पो. भुरकुण्‍डा बाजार जिला रामगढ़

झारखण्‍ड पिन-829106

मो. संख्‍या-09431394154

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शरद कुमार श्रीवास्तव


भिखारी

दिखेंगे ये अकसर चौराहों पर

मन्दिर मस्जिद के द्वारों पर

लिये कटोरे कभी खाली हाथ 

पैसे माँगते यह निपोरे दाँत

कुछ बन्द शीशा  बिना खोले ही

इन्हे धिक्कार देतें, दुतकार देते

या कार की खिडकी खोलकरभी

मौके बे-मौके फट्कार भी  देतें

कि हट्टे-क्ट्टे हो मुफ्त की खाते हो 

तुम कामचोर हो काम से जी चुराते हो 

जब भी काम माँगा तो मिली है दुत्कार

रोटी माँगते हैं यह तो पक्की है फटकार

शक्सियत ही ऐसी, कोई चारा नहीं

नसीब मे फटकार, कोई सहारा नहीं

भूख की  मार है वरना बेचारा नहीं

ईश आया ही नही क्या पुकारा नहीं

खुश हैं बच्चों के लिये ही जिये जाते हैं

जैसे तैसे भी हॉ तय काम छोड जाते हैं

पढे लिखे बेरोजगार लोगों से ये हैं अच्छे 

तय काम सुरक्षित हैं भावी पीढी के बच्चे  

 

-------------------------.

 








अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव


कलम और तलवार .....

 
.इतिहास गवाह है उन तमाम छड़ों  के .....कि .
जब जब कलम और तलवार में हुआ है  टकराव .....
कलम ने तलवारों  की धारों को किया है ..कुन्द ...
और छाँटी    है ..............अज्ञानो कि धुँध ......
प्रकाशित किया है ...ज्ञान के प्रकाश से ...समस्त विश्व ...
 
 
कलम ने उगायी है दिमागों की फसल ...
कलम ने पैदा की है आजादी के दीवानों की नसल ..
कलम ने एकता के बीज बोये हैं
कलम ने निखारी किसी भी जाति .....या धर्म की विशेष चमक ...
कलम की है   अपनी चमक ...अपनी    दमक .......
कलम के आदेश पर .........
अपराधियों  की   गर्दन उतारती है ...........तलवार ..
और ....कलम से .......होते भी  है  .......करार ....
बदलते हैं ............राजे   और राजपरिवार ....
 
 
(अतः )   कलम की ताकत ......असीम है ...
कलम को मगर अब अपनी ताक़त पहिचान नी होगी ...
इस देश से अज्ञान ....बेरोज़गारी .........
गरीबी ..की धुँध ........मिटानी होगी
 
(क्योकि )जब कलम अपनी करनी पर .......आ जायेगी ..
तलवार ... स्वयं .......उसकी रक्षा में ........आ जायेगी ...
तब न रहेगा         अज्ञान .....न ...........अँधेरा ........
निकलेगा ..............तब एक ...........नया सबेरा ....
 
 
तब कोई .......नहीं करेगा तुलना ...कलम और तलवार की ..
दोनों तब ....दिखायेंगी जौहर ....अपनी ...अपनी ....और
अपने ..........आपसी  प्यार  की .............समझ की ...
एक सवारेंगी ......विचार ...बनायेगी .........जनमत ...
दूसरी ...सम्भालेगी ......अपराधियों को ...गुनाहगारों को ....
 
 
 ( और ) बनाएँगी इसी ..पावन धरा को .
.जन्नत .जन्नत और .....और सिर्फ़ जन्नत
काश ऐसा सम्भव हो पाता .........
तो इस देश का .......बेडा पार ....हो जाता ...
 
आइये हम इस    ओर .......सघन प्रयास करें ....
और अपनी पावन धरा के .........प्रति ...
अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करे .........
अपने कर्त्तव्य का   निर्वाह करें ...
 
 
मरता हुआ निरीह
 
खड़ा था ..सवारी की आस में .....
तांगा पंहुचा पास ...में ...
घोड़ा थका ...थका ...सा ...
तांगा ..रुका ...रुका ...सा ..
लाचारी .....बेचारी   थी ...
बोझ ....और ...बेजारी  थी ...
लगातार ...पीटता ...मालिक  था
गर्मी थी ट्राफिक ..था ..सिपाही  था ..
 
घोड़े से… .....आँख मिली .....
ममता .......हृदय  में  बही ...
आँखों में (घोड़े की )..सूनापन था ..
घोड़ा   क्यूँ  बना ...इसका ..गम था ..
प्यास से गला सूखा था ...
पेट ....बहुत  भूखा   था ...
 
मालिक  की ....चाबुक थी ..
बेतहाशा .....पड़ती मार थी ...
घोड़ा हिनहिनाया ....
रुका .....लहराया ......
गिरा जमीन पर बेदम ...
निकल  गया ...उसका दम ...
 
और अब ....रो रहा है ताँगेवाला ..
उसे अपने परिवार .....
और उसकी रोटी की पड़ी थी ...
मेरे सामने घोड़े की लाश पड़ी थी ....
मेरे मन में बेजुबान जानवर के प्रति ...
ममता उमड़ी थी ...श्रध्दा उमड़ी थी ..
पर ....पर ..घोड़ेवाले के प्रति भी ...
नफ़रत नहीं थी ...नफ़रत नहीं थी ..
 
कहीं ...न ...कहीं उसकी
 बेचारगी का एह्सास  था ..
कल से बेचारा क्या खायेगा ...
इस   ..सोच  का भास था ..
 
इतने में ...मेरा  वाहन  आ गया
और मैं चढ़ कर अपनी
 मंज़िल पर .....आ गया ..
घोड़े की लाश ....और ...
रोते तांगेवाले  से .दूर आ गया ...
 
पर ....न भुला सका  मैं ....वो मंज़र ...
आज भी दिल पर चलते हैं  खंज़र ...
कब ..हम जानवरों को न्याय दे पायेंगे ..
कब ..हम  उन्हें प्यार करना ..सीख  पायेंगे ..
 
कब न तोड़ेगा कोई घोड़ा ...
इस तरह   से    दम .......
कब इस पर ...विचार करेंगें हम ....
कब हम दया भाव से जीना ...सीखेंगे ..
कब हम ईश्वरीय सन्देश समझेंगे ...
कब हम उन पर आचरण करेंगे ...
 
ये  सब विचार की बात है ...
वर्ना ....घोड़े यूँ ही  ...मरते  रहेंगें ...
और ...तांगेवाले  ...रोते रहेंगें
बस ....रोते रहेंगें .....
 

-------------.


विचार कण ......

१) करो वही जो तुम्हारा मन कहे ,क्योंकि मन में ईश्वर का वास है ...दबाव

में कोई काम मत करो ...क्योंकि वह धर्म विरुद्ध एवम ईश्वर विरुद्ध है /

२) मन का सारथी ईश्वर है ..और तन का सारथी मन ..अतः ईश्वर की इच्छा और

सेवा में तनमन का अर्पण कर दो ...देखो वोह आपको सही दिशा में ले

जायेगा और किसी का अहित नहीं होगा /

३)ज्योति से ज्योति जलती है ...और मन से मन प्रकाशवान होता है ..अतः

ज्ञानरूपी प्रकाश को बाँटो बहुत ख़ुशी मिलेगी /

४)दान केवल सुपात्र को करो ..जिसे उसकी आवश्यकता है और जो उसका सही उपयोग

कर सकता है .. भिखारी .. और ब्राहमण को दान ..आपके धन

का अप्पव्य और अकर्मण्यता को बढ़ावा देता है /

५)कर्म ही धर्म है ...कर्म के बिना धर्म नहीं ..अतः यदि धर्म करना है तो

कर्म करो… कभी स्वार्थ नहीं परमार्थ करो ...तभी शांति मिलेगी /

६)मुख से केवल ईश्वर का नाम लो ...उसके ही काम करो ,दूसरों की सेवा और

दान करो आपको शांति मिलेगी /

---

मिलना साँप के केंचुल का

आज सुबह…….
टहलते   टहलते ...
अपने घर के गार्डन में ...
अचानक दिखी .......
एक केंचुल साँप की ...
जी   धक्  से रह गया ....
एक ठण्डी  सी सिहरन ...
उतर गयी रीढ़ के ऊपर से नीचे तक ...
हाँथ  पाँव  ठन्डे .....
चीख निकल गयी ....
अरे बाप रे….
केंचुल है तो साँप भी होगा ...
नज़र दौड़ाई नज़दीक ...नज़दीक ..
दूर .........दूर ......
कहीं तो  कुछ भी तो नहीं ....
पड़ोसी इक्कठे हो गये ....
चीख सुन कर ....
इतना बड़ा साँप ...बाप रे ...
नहीं ...नहीं छोटा ही होगा ....यह तो ....
केंचुल का एक टुकड़ा ही है ....
मैंने अपने मन  को धिक्कारा ...
अरे ...डरे भी किससे ... तो केंचुल से ...
साँप से डरे तो फिर भी  समझ में आता है ..
फिर साँप से भी क्यों डरें ..
वोह किसी का क्या बिगाड़ता है
बेचारा अपने रास्ते आता है
अपने रास्ते जाता है ..
किसी से कुछ नहीं कहता ...
खतरा दिखा तो ही फुफकारता है ...
नहीं माने तो ही काटता है…
उसे भी तो आखिर जीने का  हक है ...
आत्मरक्षा का हक़ है ...
 
 
अतः ना तो केचुल से डरना है ...
और ना ही साँप से ....
और साँप बड़ा हों या छोटा ....
पतला हो या मोटा ...
उसके विष से आदमी मरता है
(साँप के )साइज़ से नहीं ..
 
 
अतः यह बहस ही बेकार है
कि साँप बड़ा था या छोटा ..
पतला था या मोटा ..
उसे तंग न किया जाये ..
उसे  यदि ढँग से जीने दिया जाये ..
तो वोह किसी का कुछ  बिगाड़ता  नहीं है
किसी का कुछ लेता नहीं है
 
 
वोह तो है दोस्त मानव का ....
ख़त्म करता है चूहे और वे तमाम नस्लें ...
जो आदमी की दुश्मन है
अतः आइए आज से हम ..
डरना छोड़ दें केंचुल से
साँप से ...
 
क्योंकि साँप हमारा ..
.पारिवारिक मित्र है ..
और मित्रता उसका
 उत्तम चरित्र है
आप उसके रास्ते में मत आइये
वह आपके रास्ते में नहीं आयेगा
आप को देख कर वह स्वयं ही ..
भाग जायेगा ...
 

------------------.

देशद्रोही कौन होता है ......

देशद्रोही कौन  होता है ........वो ..ही ..
_ जिसका विदेशी  बैंकों में गुप्त खाता होता है ..
_जिसका विदेशियों से गुप्त सम्बन्ध होता है…
_जो देश के टुकड़े टुकड़े करके राज करने का सपना देखता है
_जो शत्रु राष्ट्र को धन देने की बात करता है ...
_जिसके बच्चे कान्वेंट में पढ़ते है और स्वयं हिंदी हिंदी करता है ..
_जों ऊपर से दहेज़ विरोधी है ...और चुपचाप दहेज़ लेता है ...
_जो जाति पांति के ..धर्म के नाम पर  देश में  दंगे कराता है .....
_जो पब्लिक क पैसा .......      डकार जाता है ......
_जो निजहित को देशहित के ऊपर रखता ..और निभाता है ..
_जो अपराधियों ...तस्करों ...को प्रश्रय देता है ..
_जो कालाबाजारी को ..........बढ़ावा देता है ...
_जो गुंडाराज .........चलाता है ..माफिया चलाता है ...
 
 
और वोह भी देशद्रोही है ..............
_जो उपरोक्त को सहता है ...और चुप रह जाता है ..
मेरे विचार से ..सबसे बड़ा देशद्रोही वही है ...वही है ...क्योकि
उसकी यह भूमिका ही सही नहीं है ........सही नहीं है ....
वह आँख मूँद कर सोया है ........
देश का भाग्य भी इसीलिए सोया है ...
 
 
इस देश के संसाधनों को जो बिंदास चरते हैं ...
अपनी अपनी जेबें और तिजोरियाँ भरतें हैं ...
बेहिसाब ...अविराम ...देश विरोधी
अवाम विरोधी ..हरकतें करते हैं ...
ऐसे छुट्टे सांड जब ...बे रोकटोक ....
देश की धन संपत्ति ..दौलत चरते हैं ...
तब इस देश के आम मानव ...
तथाकथित भारतीय नागरिक ....
सो   कर ......या रो कर ........
गुजारा करते हैं ...
गुजारा करते हैं ....
बस गुजारा करते हैं ...
 

30 जून-झारखंड़ में संथाल हूल की 158वीं वर्षगांठ पर विशेष

झारखंड़ में बिरसा मुंड़ा के जन्‍म से कई वर्षों पहले संथाल परगना के भगनाडीह गांव में चुनका मुर्मू के घर चार भाईयों यथा, सिद्धू, कान्‍हू, चांद एवं भैरव तथा दो बहनें फूलो एवं झानो ने जन्‍म लिया. सिद्धू अपने चार भाईयों में सबसे बड़े थे तथा कान्‍हू के साथ मिलकर सन्‌ 1853 से 1856 ई. तक संथाल हूल अर्थात संथाल विपल्‍व, जो अंग्रेजी साम्राज्‍य के खिलाफ लड़ा गया, का

नेतृत्‍व किया. भगनाडीह ग्राम में 30 जून 1855 को सिद्धू एवं कान्‍हू के नेतृत्‍व में एक आमसभा बुलाई गयी जिसमें भगनाडीह ग्राम के जंगल तराई के लोग तो शामिल हुए ही थे, दुमका, देवघर, गोड्‌डा, पाकुड़ जामताड़ा, महेषपूर, कहलगांव, हजारीबाग, मानभू, वर्धमान, भागलपूर, पूर्णिया, सागरभांगा, उपरबांध आदि के करीब दस हजार सभी समुदायों के लोगों ने भाग लिया और सभी ने एकमत से जमींदारों, ठीकेदारों, महाजनों एवं अत्‍याचारी अंग्रेजों एवं भारतीय प्रशासकों के खिलाफ लड़ने तथा उनके सभी अत्‍याचारों से छुटकारा पाने के लिए दृढ़ संकल्‍प हुए तथा सर्वसम्‍मति से सिद्धू एवं कान्‍हू का अपना सर्वमान्‍य नेता चुना. अपने दोनों भाईयों को सहयोग देने के लिए सिद्धू एवं कान्‍हू के दो अन्‍य भाई चांद और भैरव भी इस जनसंघर्ष में कन्‍धे से कंधा मिलाकर लड़ा एवं अपना सर्वस्‍व न्‍योछावर किया 30 जून 1855 को सभी एकमत थे कि अब और नहीं सहेंगे और उन्‍होंने तय किया कि इस साल धान नहीं अत्‍याचारी अंग्रेजों और उनके समर्थकों के गर्दनों की फसल काटेंगे.

हूल अर्थात विप्ल‍व शुरू हुआ. संथाल परगना की धरती लाशों से बिछ गयी, खून की नदियां बहने लगी. तोपों और बंदूक की गूंज से संथाल परगना और उसके आसपास के इलाके कांप उठे. संथाल विप्लव की भयानकता और सफलता इस बात से लगायी जा सकती है कि अंग्रेजों के करीबन दो सौ साल के शासनकाल में केवल इसी आंदोलन को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया गया था जिसके तहत अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों एवं उनके समस्‍त सहयोगियों को कुचलने के लिए अमानुषिक अत्‍याचार किए जिसका जिक्र इतिहास के पन्‍नों में पूर्ण रूप से नहीं मिलता है परंतु अमानुषिक अत्‍याचारों की झलक संथाली परम्‍पराओं, गीतों, कहानियों में आज भी झारखंड़ में जीवित है.

संथाल विप्लव विष्‍व का पहला आंदोलन था जिसमें औरतों ने भी अपनी समान भागीदारी निभाई थी. भारत का यह दूसरा महान विप्लव था. सन्‌ 1831 ई. का कोल विप्लव भारत का प्रथम महान विप्लव था तथा सन्‌ 1857 का सैनिक विद्रोह भारत का तीसरा महान विप्लव था. सन्‌ 1855 ई. के संथाल विप्लव में अंतर्निहित शक्‍ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने विप्लव की शक्‍ति कम करने के लिए बिना मांगें भारत का सबसे पहला आदिवासी नाम का प्रमंडल ‘संथाल परगना' का निर्माण किया तथा संथाल परगना काष्‍तकारी अधिनियम बनाया. इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत का प्रथम राष्‍द्रीय आंदोलन कहा जाने वाला सन्‌ 1857 का सैनिक विद्रोह बहुत कुछ संथाल विप्लव के चरण चिन्‍हों पर चला और आगे इसी तरह भारत के स्‍वतंत्रता आंदोलन की अग्‍नि प्रज्‍वलित करता रहा.

संथाल हूल का महत्‍व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जर्मनी के समकालिन चिंतक कार्ल मार्क्‍स ने अपनी पुस्‍तक ‘नोटस अॉफ इंडियन हिस्‍द्री' में जून 1855 के संथाल हूल को जनक्रांति की संज्ञा दी है. परंतु भारतीय इतिहासकारों ने आदिवासियों की उपेक्षा करते हुए इतिहास में इनको हाशिये में डाल दिया परिणामस्‍वरूप्‍ आज सिद्धू, कान्‍हू, चांद, भैरव व इनकी दो सगी बहनें फूलो एवं झानो के योगदान को इतिहास के पन्‍नों में नहीं पढ़ा जा सकता है. झारखंड़ के बच्‍चों को उपरोक्‍त महानायकों एवं नायिकाओं के संबंध में पढ़ाया ही नहीं जाता है हूल विप्लव आज भी प्रसांगिक है क्‍योंकि जिस उद्‌देश्‍य से सिद्धू और कान्‍हू ने विप्लव की शुरूआत की थी वह आज 158 वर्षों के बाद भी झारखंड़ के आदिवासियों को हासिल नहीं हो पाया है. झारखंड़ राज्‍य के गठन के बाद आज तक मुख्‍यमंत्री व कई मंत्री आदिवासी रहे परंतु आदिवासियों का शोषण निरंतर जारी है. राज्‍य में जहां अबुआ दिशोम का नारा भी हाशिये में चला गया वहीं दूसरी ओर राजनीतिक व वैचारिक शून्‍यता के कारण जल, जंगल, जमीन को लेकर आज भी राज्‍य के आदिवासी संघर्षरत है.

राजीव आनंद

संपर्क-9471765417

-- कबीर जयंती पर आलेख --पद्मा मिश्रा
गाँधी और कबीर
[एक तुलनात्मक विवेचन ]


पूजित था जीवन में ,मानव का प्रेम जहाँ ,
भक्ति ,प्रेम ,सेवा के वाहक कबीर थे .
गाँधी की मानवता सत्य और अहिंसा थी ,
सहज पथ प्रदर्शक थे ,लाखों की भीड़ में ,
दोनों ही संत पुरुष ,युग द्रष्टा कहलाये ,
जीवन उत्सर्ग किया जन जन की पीर में।.[स्व रचित ]

सचमुच संत कवि उस पीयूष वर्षी मेघ के सामान हैं जो अपनी अमृतमयी रसधार से सम्पूर्ण समाज को आप्लावित कर निरंतर उसकी कल्याण कामना में निरत रहते हैं ,पर बात जब युग द्रष्टा कबीर की हो तो एक संत व् समाज सुधारक के रूप में उन्होंने जो कुछ भी समाज को दिया ..दिशाहीन भ्रमित जन मानस को एक नई राह दिखलाई उसके लिए हम उनके सदैव ऋणी रहेंगे .पर जहाँ मानवता और दीन सेवा पर सर्वस्व न्योछावर कर त्याग ,सेवा सत्य और कर्तव्य निष्ठांपर निस्वार्थभाव से आत्म समर्पण की बात हो ,वहां कबीर के साथ गाँधी भी स्वयम
प्रासंगिक हो उठते हैं ,और मानवीय प्रेम तथा संवेदना के धरातल पर साथ खड़े दिखाई देते हैं ,तब उनकी तुलना अवश्यम्भावी हो जाती है .
कबीर ईश्वर को परम ब्रह्म के रूप में मानते थे ,क्योंकि उनका विश्वास अवतार वाद में नहीं था ,बल्कि वे
मानते थे कि मनुष्य भी ईश्वर का ही एक अंश है ---

''पाणी ही ते हिम भया ,हिम ही गया बिलाई ''

''जो कुछ था सोई भया ,अब कुछ कहा न जाई ''


यहाँ पर गाँधी जी भी कबीर से सहमत दिखाई देते हैं दोनों का यह मानना था की ईश्वर एक है ,चाहे उसे राम कहो या रहीम ,नानक या ईशा ,किसी नाम से पुकारो सब प्रेम व् भक्ति की पराकाष्ठ है ,,जहाँ वर्ग ,जाति व् सम्प्रदाय के नाम पर कोई विभाजन नहीं होता --''ईश्वर अल्ला तेरो नाम ,सबको सन्मति दे भगवान ''दोनों का विश्वास केवल सत्य व् मानव प्रेम में था ,कबीर की भांति गाँधी जी भी युग पुरुष के रूप में समाज में सम्मानित थे ..कबीर जहाँ युग द्रष्टाके रूप में समाज की सम्पूर्ण गतिविधियों पर अपनी नजर रखते थे  ..अपने आस पास घटती घटनाओं ,दलितों पर अत्याचार, पाखंड का बढ़ता प्रभाव ,मुल्ला ,मौलवियों ,पंडितों का समाज पर कायम वर्चस्व ..इन सबसे वह अछूते नहीं रह सके थे ----

''जप माला छापा तिलक ,सरै न एको काम ''
मन कांचे नाचै वृथा ,सांचे रांचे राम ''


अथवा ''कर का मनका डार दै मन का मनका फेर ''..मुस्लिम समाज की कट्टरता उन्हें पसंद नहीं थी ---

''बकरी पाती खात है ,ताकी काढी खाल ''
जो नर बकरी खात है ,ताको कौन हवाल ?''


वहीँ गाँधी जी भी आधुनिक युग के संत व् भविष्य द्रष्टा थे .गाँधी जी की माँ कबीरपंथी थीं ,अतः उनकी शिक्षा व् संस्कारों का भी उनके मन और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था .गाँधी जी की सबसे बड़ी विशेषता जो उन्हें कबीर के समकक्ष ला खड़ा करती है ,वह है उनकी आध्यात्मिक प्रेरणा ''..कबीर की तरह गाँधी जी भी सत्य को परमात्मा का ही एक रूप मानते हैं ,और उनके सभी कार्यों का एक ही मानदंड था --''सत्य और प्रेम ''कबीर भी सत्य के ही अनन्य उपासक थे अतः वे स्वयम को सत्यनाम का उपासक और गाँधी अपने जीवन को सत्य का प्रयोग कहा करते थे .कबीर ने कहा ---

''सांच बराबर तप नहीं ,झूठ बराबर पाप ''
                           ''जेक हिरदय सांच है ,टेक हिरदय आप ''


गाँधी जी ने सत्य का पहला पाठ अपने जीवन से ही सीखा था जब पहली बार पिता से छिपा कर मांस भक्षण किया और परीक्षा के समय अध्यापक के चोरी छुपे नकल कर लेने पर आत्मग्लानि वश क्षमा मांगी ,पश्चात्ताप किया था क्योंकि वे असत्य भाषण नहीं कर सके थे ,..उन्होंने सिद्ध किया कि सत्य व्रत का पालन ही उनके जीवन का ध्येय है .सचमुच सत्य व्रत का पालन किसी तप से कम नहीं होता ,कबीर ने भी कहा है ----

''सत्य नाम कडुवा लगे ,मीठो लागे दाम ''


गाँधी व् कबीर दोनों ने अपने आराध्य के रूप में राम को अपनाया गाँधी जी के अभिन्न मित्र और सहयोगी महादेव देसाई कहते हैं --''प्रार्थना में गाँधी जी का ध्यान निराकार सर्वव्यापी प्रभु की ओर रहता था ,राम जिनको वे पूजते हैं ,उनकी कल्पना का है न कि तुलसी रामायण या वाल्मीकि रामायण का ''


कबीर भी दशरथ पुत्र राम को न मान कर परम ब्रह्म को ही राम मानते हैं ,दोनों ने ही अपने जीवन में ''राम'' नाम की महिमा का खूब बखान किया है .दोनों ही सेवा ,त्याग व् मानव प्रेम के लिए संकल्पित थे .


कबीर के अनुसार ''कबिरा संगत साधु की ,हरै और की व्याधि ''...वहीँ गाँधी जी ने भी उद्घोष किया --''पाप से घृणा करो ,पापी से नहीं ''सदैव सत्य का आचरण करो ''आदि आदि .कबीर जहाँ सज्जन पुरुष या साधू की नई परिभाषा गढ़ते हैं ---''साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ''सार सार को गहि रहै थोथा देई उडाय ''.वहीँ पर गाँधी का वैष्णव या साधू पुरुष भी समाज कल्याण के लिए समर्पित है ---वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ,पीर पराई जाने रे ''पर कबीर जहाँ किसी से मत विरोध होने पर अक्खड़ हो उठते हैं वहीँ गाँधी जी विरोध के सम्मुख भी संसार को कंपा देने वाली धमकी के सामने भी घुटने टेक देते हैं ..उनकी सत्य और अहिंसा ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी,  यह बात आप  ,हम सब जानते हैं ..  .यदि धर्म की बात करें तो दोनों को ही धर्म का सरल रूप प्रिय था ,और वे धर्म के मूल सत्य ,प्रेम, व् कर्म को ग्रहण करने सदैव तत्पर रहे हैं क्योंकि कथनी और करनी में पूर्ण साम्यता के पक्षधर होने के कारन दोनों ने ही समाज के पद दलित ,दीन हीनो के लिए संघर्ष किया .कबीर ने तत्कालीन सवर्णों ,व् ब्राह्मणों से जम कर लोहा लिया --''जो बामन बमनी जाया ,आन राह ते क्यों नहीं आया ?''


वहीँ पर गाँधी जी ने छुआछूत ,पाखंड और बाहरी आडम्बरों का विरोध करते हुए दलितों को ''हरिजन'' कह कर गले लगाया .दलितों का मन्दिर प्रवेश कराना ,तत्कालीन समाज में एक बड़ी क्रांति थी, पर गाँधी मत से पूर्णतः प्रभावित थे .---

''जाति पांत पूछहिं नहीं कोई ''
हरि को भजे सो हरि को होई ''


कबीर भी जन जन में ही ईश्व्र्र का वास मानते थे --
'' ज्यों बाती में तेल है ,ज्यों चकमकमें आग ,तेरा साईं तुज्झ में जाग सके तो जाग '' महादेव देसाई ने भी गाँधी जी की जीवनी के आधार पर कहा है कि --वह कबीर का एक पद अक्सर गुनगुनाया करते थे और उसे अपनी दैनिक प्रार्थना में भी शामिल कर लिया था --

मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे ,मै तो तेरे पास में
न मै मन्दिर ना मै मस्जिद ना काबे कैलाश में ''


इस प्रकार गाँधी और कबीर की समानता ,जो सर्वश्रेष्ठ है ..वह उनके जीवन दर्शन में दिखाई पड़ती है .जहाँ सम्प्रदायवाद ,वर्ग भेद ,जाति प्रथा और पाखंड का विरोध भी शामिल है,कबीर ऐसे ही विरोधाभासों के बीच पुकार बन कर सामने आये जहाँ वे यदि हिन्दुओं का विरोध करते तो मुसलमान उन्हें अपने पैगम्बर की तरह सम्मान देते और मुसलमानों की निंदा पर हिन्दू खुश हो जाते .पर कबीर ने निस्पृह भाव से हिन्दू मुसलमान दोनों को समझाया .कबीर मुसलमान होते हुए भी आजीवन उनकी बुराइयों का विरोध करते  .उनकी कट्टरता ,नमाज आदि पर एक व्यंग्य दृष्टव्य है --

कंकर पत्थर जोरी कै ,मस्जिद लई .बनाय ,
ता चढ़ मुल्ला बांग दे ,क्या बहरा हुआ खुदाय ?''


वहीँ हिन्दुओं को भी फटकारा --;;हिन्दू अपनी करें बड़ाई ,गागर छुअन न देइ ,वेश्या के पाँयन त्र सोवें यह कैसी हिन्दुआइ ?''..फिर दोनों धर्मावलम्बियों को समझाते भी हैं -हिन्दू कहैं मोहिं राम पियारा ,
तुरुक कहैं रहिमाना ,
आपस में दोउ लरी लरि मुएँ ,
मरम न कोउ जाना ''


गाँधी जी ने भी बंगाल के दंगों के समय मुसलमानों के प्रति अन्याय का विरोध करते हुए अनशन किया था .एक सच्चे वैष्णव के समान हीअपने प्रण पर टिके रह कर सत्य की राह नहीं छोड़ी थी . उनकी दृष्टि में जाति महत्त्व नहीं रखती थी ,बल्कि मानव सेवा व् अहंकार का त्याग करने वाला ही सच्चा मानव है ----''पर दुखे उपकार करे सोई मन अभिमान न आणे रे ''यहाँ पर गाँधी व् कबीर दोनों अहंकार विरोधी थे .कबीर ने कहा --''जब मै था तब हरि नहीं ,अब हरि हैं मै नाहि ,..सब अँधियारा मिट गया ,दीपक रेखा माहिं ''गुरु की महत्ता दोनों ने ही स्वीकार की ,कबीर के अनुसार --

''गुरु गोविन्द दोउ खड़े ,काके लगूँ पांय ,

बलिहारी गुरु आपणों गोविन्द दियो बताय ''


अपने व्यक्तिगत जीवन में भी गाँधी जी व् कबीर दोनों ने ही सादगी ,मितव्ययिता ,व् गरीबी को अपनाया .कबीर जुलाहे थे -अतः सूत कात कर अपना जीवन यापन करते थे ,वहीँ गाँधी जी ने भी चरखे पर सूत कात कर वही वस्त्र पहने और स्वदेशी प्रेम को अपनाया .क्योंकि देश की जनता भूखी नंगी थी . स्व.पितम्बर दत्त बडथ्वाल लिखते हैं ---

''भारत का सूर्य जाज्वल्यमान पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर कहलाया तो आधुनिक युग में गाँधी बना .दोनों ही युग द्रष्टा , समाज उन्नायक ,हर रूप में प्रासंगिक रहे हैं .हमें आज भी उनकी आवश्यकता है ----


  ''विचलित है न्याय ,सत्य आज भी पराजित है ,
पीड़ित मानवता के शूल चुभे पांवों को ,
आज भी एक गाँधी कबीर की जरूरत है ,
भक्ति और नीति में प्रेम का समन्वय कर ,
कौन पन्थ दिखलाए ?
जन जन का दर्द फिर पुकारता है बार बार ,
आओ फिर एक बार ,आओ फिर एक बार ''

 

नको मुंह बंद रखने का दाम मिलता है। कमाई का अच्छा रोजगार इन्ही दिनों ईजाद हुआ है|

सुबह ठीक समय पर वे दफ्तर चले जाते हैं। खास मातहतों को केबिन में बुलवाते हैं ,प्यून को चाय लाने भेजते हैं।

गपशप का सिलसिला चलता है|

केदारनाथ के जलविप्लव, लोगों की त्रासदी ,बाढ़ के खतरे ,सरकार की व्यवस्था-अव्यवस्था ,देश में हेलीकाफ्टर की कम संख्या ,सब पर चर्चा करते लंच का समय नजदीक आने पर, एक-एक कर मातहत खिसकने लगते हैं|

अंत में शर्मा जी बच पाते हैं ,वे उनसे पिछले सप्ताह भर की जानकारी शाम की बैठक का दावत देकर ,मिनटों में उगलवा लेते हैं।

शर्मा जी की दी गई जानकारी, उनके लिए, एक मुखबिर द्वारा ‘ठोले’ को दी गई जानकारी के तुल्य होती है।

वे इसे पाकर अपनी पीठ थपथपाना नहीं भूलते।

वाहः रे मैं ? वाले अंदाज में वे साहब के केबिन की ओर बढ़कर, ‘नाक’ करते हैं। वे ‘में आई कम इन सर’ की घोषणा इस अंदाज में करते है जैसे केवल औपचारिकता का निर्वाह मात्र कर रहे हों वरना साधिकार अंदर घुस कर कुर्सी हथिया लेना उनका हक है। और ये हक उनको, साहब को ‘वैतरणी’ पार कराने का, नुस्खा देने के एवज में सहज मिला हुआ है।

साहब आपत्ति लेने का अपना अधिकार मानो खोए बैठे हैं, वे पूछ लेते हैं ,कैसा चल रहा है ?

उनके पूछने मात्र से, वे शर्मा जी वाला टेप स्लो साउंड में चला देते हैं| साहब जी क्या कहें ,सारा स्टाफ करप्ट है|

वे स्टाफ के साथ –साथ ,साहब को भी जगह-जगह लपेटने से बाज नहीं आते।

साहब, पेंट की जेब से रुमाल निकाल कर ,पसीना पोंछ-पोंछ कर ,घंटी बजाते हैं ,प्यून के घुसते ही कहते हैं –थोड़ा ए .सी .बढाओ।

ए.सी. से राहत पाकर वे पूछते हैं ,कोई खतरा तो नहीं है ?

सी.बी.आई. वालों से तुम्हारी कोई पहचान नहीं निकल सकती क्या ?

यों करो इस हप्ते इसी अभियान में लगे रहो ,देखो किसी से कुछ कहना मत ,बिलकुल चुप रहना।

तुम्हारा पहुंच जाएगा।

वे इत्मीनान से आफिस की गाडी ले के अपनी फेमली ट्रिप में दूर निकल जाते। शर्मा जी को खास हिदायत दे के रखते कि मोबाइल स्विच आफ न रखे।

उनका तर्क है कि कौन कितना खाता है ,कब खाता है ,किससे खाता है ,इतनी जानकारी आपके पास हो, तो आप अच्छे-अच्छों को हिला सकते हैं।

वे इसे समाज सेवा के बरोबर मानते हैं।

आपके नजर रखने मात्र से कोई अगर इस राह का राही नहीं बनाता तो हुई न देश की सेवा ?

वे वापस आकार दिल्ली ट्रिप का, जुबानी खर्चा-बिल साहब को बता जाते हैं|

वे साहब पर भारी पडने वाले अंदाज में कहते हैं ,फिलहाल सर आप फाइल-वायल को ठीक–ठाक कर लें|

दो-चार ठेकों को बिना लिए निपटा दें| आपकी छवि बनेगी।घर में नगदी वगैरा न रखें तो बेहतर होगा। बेनामी के कागज़-पत्तर को ठिकाने लगा ले| पता नहीं वे कब आ धमकें ?

साहब जी प्यून को बुला के ए.सी. बढ़वा लेते हैं।

वे साहब जी पर एहसान किए टाइप ,अपनी कुर्सी पर आकार ,स्वस्फूर्त फुसफुसाते हैं, बहुत अंधेरगर्दी मची है पूरे दफ्तर में।

सुशील यादव

  
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डर का अहसास
               बात उस समय की है। जब अपने मामा के वहा रहता था। मेरे मामा एक किसान थे| जो उतरांचल के  पहाड़ी गाव में रहते थे। एक बार मेरे साथ एक अजीब सी घटना हुई। हुआ ये एक दिन में सुबह उठा और नाश्ता करने के लिए रसोई में बैठा था। तभी मुझे अपने मामा की लड़की जो मुझसे बड़ी थी। उसकी आवाज सुनाई दी जो सांप –सांप कह कर चिल्ला रही थी। में दौड़ते हुए उस और को चल दिया। लेकिन तब तक सांप भाग चूका था। वह मुझे हाथ से इशारा कर बता रही थी। वो जा रहा है। लेकिन में देख नहीं पाया सांप मेरी आँखों से ओझल हो चूका था। वह बोली बहुत बड़ा सांप था। मैंने कहा मुझे तो नहीं दिखा वह बोली ऐसा नहीं बोलते है। मैंने कहा ऐसा क्यों नहीं बोलते है।  वह बोली ऐसा बोलने वाले को दिन भर सांप ही दिखाई देते है।

मैंने हँसते हुए कहा मुझे ठग रही हो वह बोली ये बात सही है। मैंने अपनी दादी से सुना है। उसकी दादी जो  मेरी नानी थी। में उसके पास गया और उनसे पूछा वह क्या यह बात सही है। वह बोली हा , अब में भी थोडा डर सा गया। मुझे डरा देखा कर नानी बोली ये सिर्फ कुछ पुराने किस्से है। इसमें डरने की कोई बात नहीं है। में मुस्करा कर बाहर चला गया। तभी मेरे मामा ने मुझे आवाज दी में दौड कर उनके पास गया। मामा जी बोले तू दीवान सिंह के वहा चला जा , उनके यहाँ कल शादी है। आज कामकाजी का निमंत्रण है।  कामकाजी निमंत्रण में शादी से पहले सब समान आदि को शादी वाले घर पर एकत्र किया जाता था। जिसकी शादी में जरुवत होती थी। में घर निकल पड़ा उनका घर करीब 2 किलोमीटर दूर  था। रास्ता खेत व वरसाती नाले के बीच से होकर जाता था। में अपनी धुन चला जा रहा था। अभी में कुछ दूर ही पहुंचा ही था कि मेरे सामने एक सांप था। में डर गया और रूक गया। सांप आराम से घूमता हुआ। रास्ते से एक और चल दिया और में दौड़ते हुए  आगे बढ़ गया। अभी थोड़ी दूर पहुंचा ही पाया दो सांप मुझे लड़ते हुए दिखाई दिए जो रास्ते से कुछ दूरी पर थे। में डर के मारे पसीने से नहा गया।

मैंने बजरंगबली का नाम लिया और दौड़ लगा दी। में हांफ्ते हुए उनके घर में पंहुचा। मुझे देखकर और लोगो ने मुझे डाटा बोले कहा के लिए देर हो रही थी। जो तू इतना दौड़ के आया में मुस्करा दिया। उसके बाद हम लोग इधर उधर से सामान ला कर जमा करने लगे। हम लोगों ने दोपहर का भोजन भी वही किया। उसके बाद सब लोगो ने जंगल लकड़ी लाने का प्रोग्राम बनाया। मुझे तो जंगल के नाम से मुझे सांप की याद आ गयी। में डर गया। पर उनसे कुछ नहीं कहा चुप चाप उनके साथ लकड़ी लेने चल दिया। हम लोग जंगल में लकड़ी जमा करने लगे में अपने चारों और लकड़ी और सांप दोनों को देख रहा था।

मुझे कुछ दूरी पर एक लकड़ी पड़ी दिखाई दी में बड़ी सावधानी से उस ओर बढ़ा अभी में लकड़ी के पास पंहुचा ही था। मुझे कुछ दूरी पर सांप दिखाई दिया में  डर के मारे चिल्लाया साथ वाले दोड़ते हुए आये तब तक सांप जा चूका था। में उनसे बोला आज सुबह से ही मुझे सांप ही सांप दिखाई दे रहे है। में अब तुम लोगो के ही साथ रहूगा अकेले नहीं जाउगा वे हस दिए थोड़ी देर में हम लकड़ी ले कर घर की और चल दिए में बड़ी सावधानी से चल रहा था। तभी मुझे झाड़ी में कुछ आवाज सुनाई दी मैंने उस देखा तो एक सांप तेजी से मेरी और आ रहा था। मैंने चिल्लाते हुए सांप –सांप कह कर, लकड़ी फैंक दी और  दौड़ लगा दी। साथ वालों ने मुझे आवाज दी और रोक कर पूछा कहा है। सांप मैंने उन्हें हाथ से इशारा किया। वहां पर है। उन्होंने वहा जाकर देखा और बोले कहा है। सांप मैंने का अभी तो यहाँ था। वे बोले लकड़ी उठा और हमारे साथ चल लकड़ी उठा कर में उनके साथ चल दिया।

घर पंहुच कर वे सब मेरा मजाक बना कर हस रहे थे। में चुपचाप खड़ा उनकी हंसी सुन रहा था। तभी राजकुमार जो गाव के रिश्ते से मामा लगते थे वह बोले चाय बनाओ सब थके हुए है। में खड़ा खड़ा ये सोच रहा था। कोई साथ मिल जाता तो में घर चले जाता।


तभी मुझे किसी रसोई से आवाज लगाई में वहा पहुंचा तो पता चला की चाय के लिए दूध नहीं है। मुझे   दूध लाने के लिए ही बुलाया था। नरोतम जी के वहा से मुझे दूध लाना था। जो गाव के आखिरी कोने में रहते थे| में मना भी नहीं कर पाया में दूध लेने के लिए चल दिया। मेरा डर फिर वापस आ गया था। मेरी चाल बहुत तेज थी में लगभग दौड़ते हुए चल रहा था। रास्ते के एक और बरसाती नाला था। उस नाले के दूसरी और एक भूमि देवता का मन्दिर था। मैंने सुन रखा था। उस मन्दिर के आस – पास एक मणि वाला नाग रहता है। जो रात के अंधेरे में कभी – कभी अपनी मणि के साथ दिखाई देता है।

मुझे डर के मारे चमकते हुए जुगुनु भी सांप लग रहे थे| आगे चढ़ाई थी में फिर भी दौड़ रहा था। में हांफ्ते – हांफ्ते उनके घर पहुंचा उनकी पत्नी ने मुझे दूध का डिब्बा दिया। में दूध ले कर चल दिया। में दौड़कर अभी बरसाती नाले को पार करके खेत में पहुंचा ही था। मुझे २ जोड़े सांप के दिखाई दिए जो मेरे रास्ते थे एक के उपर एक चिपके हुए थे। में डर के मारे चीख पड़ा और दौड़ने लगा मुझे ऐसा लग रहा था। की सांप मेरे पीछे भाग रहे है| में दौड़ता रहा  जब तक में अपने दोस्त के घर नहीं पहुंचा| 

वह मुझे अपने बरामदे  में ही मिल गया मैंने उसे हांफते हुए बताया की उनके घर को आने वाले रास्ते में सांप का जोड़ा है। वह तुरन्त लाठी लेकर मेरे साथ चल दिया। सांप तो नहीं देखे हा खेत में कुछ हल चल हुई उसे बिश्वास हो गया की में सच बोल रहा हूँ। मेरे निवेदन करने पर वह मेरे साथ चल दिया। हमने पहले दूध पहुंचाया फिर मुझे  अपने मामा के घर छोड़ कर वह चला गया। में सीधे बिस्तर में घुस गया और सो गया आज भी उस दिन को याद कर मेरे रौंगटे खड़े हो जाते है में आज तक यह समझ नहीं पाया उस ऐसा क्या हुआ था। जो मुझे ही सांप  दिखाई दिए।

अंगूरी जनता

गणित, मैथ और अंग्रेजी ये तीनों विषय मेरे पैदा होने के पहले से ही कमजोर थे। आकलन करना, अन्‍दाजा लगाना तो मेरे लिए टेढी जलेबी थी। टेढी खीर क्‍यों कहें उसमें क्‍या टेढ़ापन होता है। इसलिए मॉ के पेट में जब से प्रवेश मिला। संसार देखने की उत्‍कट अभिलाषा जाग उठी। कवि हृदय के कारण एक नये अनुभव के लिए लालायित था। विज्ञान के अनुमान से तो नौ माह की गणित बैठा लिया था। लेकिन वहॉ भी मेरा अनुमान गलत ही निकला। सात महीने में ही संसार वालों के लिए आफत बन बैठा। उस जमाने में न आईसीयू, न एन आईसीयू । बहुत मुश्‍किल से जिन्‍दा बचा रहा। मेरी बुआ जी मुझे चिड़िया का बच्‍चा कहा करती थी। बुकवा उबटन लगाते समय खाल के बाल, नहीं, बाल के खाल, ये भी गलत है। शरीर से चमड़ी निकल जाती थी, उबले आलू के छिलके की तरह। मॉ ने वहॉ भी मुझे जी भर के दर्द से चिल्‍लाने न दिया। बोलती बेटा सो जा नहीं तो बिल्‍ली खा जायेगी।

जैसे आज लोग चिल्‍लाते हैं, किसी मॉग को लेकर, सरकार की परेशानियों से तो लोग कहते हैं-चुप हो जा नहीं तो पुलिस पकड़ लेगी। लाठियाँ बरसेगी। बचपन में बिल्‍ली का डर अब पुलिस और सरकार का डर। चोर डाकू और लुटेरों से तो ज्‍यादा इनसे डर लगने लगा है। सही बोलो तो फॅसो, गलत बोलो तो मीडिया बिल्‍कुल तैनात है। कुछ भी बोलोगे वो अपना प्‍वाइंट निकाल ही लेगी। चर्चा करने की। इससे बढ़िया चुप ही रहो। अरे भाई एक बार एक बच्‍चे को एक अजगर ने पकड़ लिया। सौभाग्‍यबस वहॉ मीडिया आ पहुची। अब लाईव प्रसारण शुरू बच्‍चा तड़फड़ा रहा है। मीडिया वाला- देखो कैसे तड़फड़ा रहा है बच्‍चा। पिछले 30 मिनटों से अजगर इसे निगलने की नाकाम कोशिश कर रहा है। तभी गॉव से एक आदमी ने देखा बोला- ये आदमी पागल है क्‍या ? बच्‍चा तड़फड़ा रहा है और इसे वीडियो बनाने की पड़ी है। उसने अपनी घार दार हंसिया निकाली और अजगर के टुकड़े करके बच्‍चे की जान बचाई। क्‍या कहे मीडिया वालों को इन्‍हें तो बोर्डर पे होना चाहिए। जो इतने सारे घुसपैटी आते है। एक भी नहीं आयेंगे। आयेंगे तो पूरे चैनल के सामने। कहॉ-कहॉ से इन्‍हें खबर मिल जाती है। गोली से जादा तेज तो इनकी जुबान चलती है। सभी डरते है। दुनिया का ऐसा कोई भी पद या प्रतिष्‍ठित व्‍यक्‍ति न होगा जो इनसे न डरता हो। जनता तो आम बात है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती।

जनता को आम ही क्‍यों बोलते हैं। अंगूर जनता, केला जनता, सन्‍तरा जनता, कटहल जनता, सेव जनता, इतने सुन्‍दर सुन्‍दर फल लगे है। केवल आम ही मिला। जिसने भी ये नाम दिया है मैं उससे सहमत नही। समय के अनुसार सब कुछ बदलता है तो इसे भी बदलना चाहिए। जैसे आज का समय में मुझे नाम देना पडे़ तो मैं तो अंगूर जनता कहूँगा। अभी के सरकारी खांचे में बिल्‍कुल सही बैठता है। और ये प्रस्‍ताव संसद में पास भी हो जायेगा। पूर्णतया सिद्ध किया अनुभूत नुस्‍खा है। अब देखो सरकार जनता को पूरा का पूरा एकदम खाये जा रही है। निगल रही है। कुछ भी नही छोड़ रही है गुठली भी। अंगूरी जनता कहेंगे तो बिल्‍कुल एक साथ समूह में लगे अंगूर जैसे लटके लोग। एक एक कर तोड़ो और निगल लो। न आम न गुठली। हजम सब चाहे जब। ये आम नहीं अंगूरी जनता है। अब चूसने का और गुठलियों का जमाना गया। निगलने का समय आ गया। बड़े आसानी से पच भी जाता है।

''आम नहीं, अंगूर जनता। सुख सुविधा से दूर जनता॥''

-उमेश मौर्य

घृणा

मैं जीटी रोड पर पहुँचने वाला था। देखा उधर से रामू मुस्कराता हुआ चला आ रहा है। मैंने पूछा क्या बात है भाई ? बड़े खुश दिखाई दे रहे हो। रामू बोला अभी यूनिवर्सिटी से आ रहा था। ऑटो में एक सीट पर दो लड़कियाँ बैठी हुई थीं। ऑटो वाले एक सीट पर चार लोगों को बैठाते ही हैं। इसलिए मैं भी बैठ गया।

कुछ देर बाद एक बाबाजी ऑटो में चढ़ने लगे तो मैं किनारे हो गया ताकि बाबाजी बीच में बैठ सकें। बाबाजी बैठते इसके पहले लड़की बोली आप उधर किनारे बैठिए और मुझसे कहा आप इधर आ जाइए। मैं लड़की की तरफ आ गया और बाबाजी किनारे बैठ गए। लड़की ने धीरे से कहा कि हमें बृद्धों से घृणा है।

मैंने रामू से कहा कि तुम्हें लड़की से कह देना चाहिए था कि मैं यहीं ठीक हूँ और बाबाजी को बीच में बैठा लेना चाहिए था। रामू बोला लड़की बुलाकर मुझे अपने पास बैठा रही है और मैं कह दूँ कि यहीं ठीक हूँ। कभी तो किसी को सही सलाह दे दिया करो। रामू ऐसा कहकर मुस्कराते हुए चला गया।

रामू तो यह घटना बताकर चला गया। लेकिन मैं सोचने लगा कि अपना घर-समाज कहाँ जा रहा है ? जिस देश में वृद्धों की सेवा से आयु, यश, धन, विद्या, बल आदि बढ़ने की बात शास्त्रों में कही गयी है आज उसी देश के युवा कहते हैं कि हमें वृद्धों से घृणा है ?

जिस लड़की को वृद्धों से घृणा होगी, क्या वह अपने वृद्ध माता-पिता अथवा दादा-दादी से घृणा नहीं करेगी ? यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली लड़की कितना दिन और माता-पिता के साथ रहेगी ? शादी के बाद क्या वह अपने सास-ससुर की सेवा कर पाएगी ? क्या वह अपने वृद्ध सास-ससुर से घृणा नहीं करेगी ?

यही सब सोचते-सोचते मेरे लिए जीटी रोड मानो दूर होती जा रही थी। यह वाक्य अब भी मेरे मन-मस्तिष्क में गूँज रहा था कि ‘हमें वृद्धों से घृणा’ है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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सुबह की कालिमा

अंकिता आज थोड़ा उलझन में है। वो जल्द से जल्द अपने रूम पर पहुँच जाना चाहती है। न जाने क्यूँ उसे लग रहा है, ऑटो काफी धीमे चल रहा है। वो ऑटो ड्राइवर को तेज़ चलाने के लिए बोलना चाहती है, पर कुछ सोच कर चुप रह जाती है। आज उसे निर्णय लेना है। जिसके लिए उसे शांति चाहिए, शांत जगह। इस समय उसे अपने कमरे से ज्यादा कोई और जगह मुनासिब नहीं लग रही है। पर आज न जाने क्यूँ यह रास्ता उसे कुछ ज्यादा ही लम्बा लग रहा है। वैसे तो वो रोज़ ही इन रास्तों से गुजरती है। यूनिवर्सिटी से उसके घर का रास्ता।

चाय का एक कप लेकर वो विंडो का पर्दा खिसका कर खड़ी हो जाती है। चाय का एक घूंट ले कर वो विंडो से नीचे नज़र दौड़ाती है। इस विंडो से वो एक पतली काली कोल तार की सड़क देख सकती है। रोज़ ही देखती है। इसमें अधिकतर पैदल राहगीर ही गुजरते है। कुछ दुपहिया वाहन भी। कभी कभार इक्का दुक्का लाइट मोटर व्हीकल भी। बड़े वहां गुजर नहीं सकते। सड़क के दोनों मुहाने पर जड़े वाहनों का प्रवेश निषेध का साइन बोर्ड भी लगा है।

वो चाय का वापस घूंट लेती है। इस वक़्त सड़क लगभग सून-सान है। इक्का-दुक्का लोग गुजर रहे है। तभी उसकी नज़र आ रहे तीन लोगों पर पड़ती है। एक लड़की, दो लड़के। अंकिता उन्हें तब तक देखती रहती है, जब तक वे उसकी खिड़की के नीचे से गुजर कर सड़क के दूसरे मुहाने से टर्न लेकर दिखना बंद नहीं हो पाते।

अंकिता उन तीनों को आखिरी बिंदु तक देखती है। उनकी परछाई के छिप जाने तक। उसके होठों पर मुस्कान तैर जाती है, कप चाय से खली हो चूका है, अंकिता किचन में जा कर खली कप वाशबेसिन में रखती है। वापस आ कर बीएड पर लेट जाती है। सर के नीचे तकिया रख कर आँखे मीच लेती है।

- आज उसे निर्णय लेना है।

- किसी और के लिए नहीं, खुद के लिए।

उसकी आँखों में एक के बाद एक, दो आते है।

- पहला चित्र है, समीर का। जो इसी गली के मुहाने पर बसे एक घर में किराये पर रहता है। पिछले छह-सात महीने से वो उसे जानती है। समीर, स्थानीय स्तर पर नाट्य संस्था से जुड़ा है। नुक्कड़ नाटक का मंचन करता है। खुद ही लिखता भी है और निर्देशित भी। पर अब तक उसको कोई विशेष सफलता नहीं मिली है।

अंकिता एक नुक्कड़ नाटक देखने के समय समीर से मिली थी।

- पहली मुलाकात

- पहली मुलाक़ात में ही समीर, अंकिता को अलमस्त और खिल्दुंड नज़र आता है। हमेशा हँसता चेहरा, हमेशा मजाक के मूड में। पहली मुलाकात में ही समीर अंकिता से यू मिलता है ज्यों पहले कई बार मिल चूका हो।

उसका बेझिझक अंकिता को यार कह कर बुलाना, टाइम जानने के लिए बिना उसको पूछे, उसकी कलाई पकड़ कर घड़ी से टाइम देख लेना सब कुछ इतनी आसानी से समीर ने किया मानो वो काफी पुराने दोस्त हो।

उसी दिन समीर उसे बाइक पर उसके काम तक छोड़ता है। अंकिता जब बाइक से उतर कर जब उसे थैंक्स बोलना चाहती है। तो वह हंसने लगता है दीवानावार, काफी देर बाद वो खुद को संयत करके ऊँगली से इशारा करके गली के दूसरे छोर को दिखा कर बोलता है, वहां है मेरा रूम। इतना करीब रह कर भी इतनी देर से मुलाकात, अंकिता भी हंस पड़ती है।

फिर वो अक्सर मिलने लगते है। दोस्ती प्रगाढ़ हो जाती है। पर उनके बीच प्यार जैसा कुछ नहीं। अंकिता ने कभी उसकी अनुमति भी नहीं दी।

आज सुबह समीर उसे प्रपोज करता है। जब वो यूनिवर्सिटी के लिए निकलती है, तो गली के दूसरे छोर पर समीर अपनी बाइक पर बैठा हुआ है, अंकिता को देख कर मुस्कराता है।

अंकिता उसकी बाइक पर बैठ जाती है। लगभग रोज़ का नियम है। समीर, अंकिता को चौराहे तक छोड़ता है, जहाँ से उसे यूनिवर्सिटी जाने के लिए ऑटो मिल जाता है। और समीर वहां से नाट्य मंडली की तरफ चला जाता है।

आज अंकिता जब बाइक से उतर कर बाय करके जाने लगी, तो दो मिनट प्लीज बोल कर समीर उसे रोक लेता है। अंकिता उस के पास आकर खड़ी हो जाती है।

बाइक से उतर कर समीर, अंकिता के करीब आता है और होंठो पर मुस्कान लाकर बिखेर कर कहता है- यार रोज़ खाना-नास्ता बनाने में और बर्तन धुलने में काफी टाइम निकल जाता है। इस वजह से मेरा काम में पूरा ध्यान नहीं लगता है।

- अंकिता चुप रहती है, उसे समीर की बात का कोई जवाब नहीं सूझता है।

- समीर आगे कहता है- मैं सोचता हूँ, ये काम तुम्हारे हवाले कर दूँ।

- अंकिता चौक पड़ती है- 'व्हाट' मैं लखनऊ में क्या आयागिरी करने आई हूँ, अरे मैं यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म की स्टूडेंट हूँ। आप ने ये कैसे सोच लिया।

खिलखिला कर हंस पड़ता है समीर, कई पलों तक निश्छल हंसी। फिर सांसे संयत करके कहता है- अरे समझी नहीं आप- अरे मैं ये काम आपको आया समझकर नहीं बल्कि अपनी बीवी की हैसियत से देना चाहता हूँ।

''मुझसे शादी करोगी'' - अंकिता जी।

- अचम्भित रह गयी थी अंकिता, समीर के प्रपोज के इस अंदाज पर। प्यार के रस्ते को पार करके सीधे शादी। चुप रह गयी वो। आँखे नीचे करके वहां से जाने लगी तो पीछे से समीर बोला- जवाब नहीं दिया अपने।

- वो रुकी नहीं चलते-चलते बोली इस टॉपिक पर फिर कभी बात करेंगे, अभी क्लास को देर हो रही है।

- अंकिता क्लास रूम में आ के बैठ गयी। उसने कभी समीर को इस नज़र से नहीं देखा, न कभी सोचा। पर उसके प्रपोज का ये अंदाज उसे गुदगुदा गया।

अंकिता उठती है, वापस अपने लिए चाय बनाती है। चाय के हल्के-हल्के सिप लेते हुए उसकी आँखों में दूसरा चित्र आता है।

यूनिवर्सिटी में उसका एक साल सीनियर- 'अतुल' उसके गीतों और कविताओं की साडी यूनिवर्सिटी दीवानी है। सांवले और सौम्य अतुल को इस वर्ष उभरते हुए युवा कवि के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

उसके लेखन से अंकिता भी प्रभावित है और शायद उसकी तरफ आकर्षित भी है। कई बात उन दोनों की मुलाकात यूनिवर्सिटी के एकांत में होती है, और उस वक़्त अतुल, अंकिता को अपनी प्रेम कवितायें सुनाता है। जो अंकिता के दिल में गुदगुदी पैदा करती है।

आज लंच टाइम के बाद जब वो लाइब्रेरी में बैठी थी, तभी वहां अतुल आ जाता है। और कई कवितायें सुनाने के बाद झिझकते-शर्माते अंकिता को प्रपोज करता है।

- एक ही दिन में अंकिता को दो लोग प्रपोज करते है, जिन्हें वो आजतक अपना मित्र मानती आई है। पर उनमें से न जाने क्यूँ उसे अतुल ज्यादा भाता है। सौम्य और शांत। देश का सबसे ज्यादा उभरता हुआ कवि। जब वो बिस्तर पर लेट कर अतुल और समीर की तुलना करती है, तो खुद को अतुल के ज्यादा करीब पाती है। उसका भविष्य यकीनन अतुल के साथ सुरक्षित है, क्यूँ की वो एक स्थापित साहित्यकार हो चूका है। जबकि समीर एक स्ट्रगलर है और उसके खुद के भविष्य का ठिकाना नहीं है। सो वो फैसला करती है,अतुल के प्रपोज को स्वीकार करने का। अंकिता बिस्तर पर करवट लेती है वैसे ही उसके दीमाग में विचार भी करवट लेते है।

अंकिता एक बार उन दोनों को करीब से जानना चाहती है, कोई अंतिम फैसला करने से पहले। परसों उसका बर्थडे है। उस दिन वो अपने दोनों प्रेमियों में से किसी एक से मिलने का प्लान करती है।

पर इस बार वो समीर को प्राथमिकता देती है। क्यूँ की उसने उसे पहले प्रपोज किया है। अंकिता फ़ोन उठती है और कांपते हाथों से समीर का नंबर डायल करती है।

- हैल्लो ! समीर बोलता है, अरे इतनी रात को अंकिता क्या कुछ प्रोब्लम तो नहीं हुई।

- नहीं-नहीं समीर सब ठीक है, बस मैंने आपको इनवाइट् करने के लिए फ़ोन किया था। और फिर अंकिता उसे अपने बर्थ डे के लिए आमंत्रित करती है। जिसे समीर हँसते हुए कबूल कर लेता है।

- अंकिता मोबाइल डिसकनेक्ट करने से पहले बोलिती है तो फिर ठीक शार्प ग्यारह बजे आप पहुँच रहे है।

- रात के ग्यारह बजे न, समीर कन्फर्म करता है।

- हाँ यार क्यूँ की मैं रात ग्यारह बजे ही पैदा हुई थी, अंकिता थोड़ी शोखी से बोलती है।

उस दिन समीर, अंकिता को फ़ोन करता है दोपहर को,  पूछता है- बर्थडे की सब तैयारी हो गयी और क्या सब लोग इनवाइट् हो गए है।

- हाँ सब तैयारी हो गयी है- अंकिता बोलती है पर मेरे इस बर्थडे पर सिर्फ आप इनवाइट् है।

- सिर्फ मैं - समीर थोडा चौकता है।

- हाँ, अंकिता इतना ही बोल पाती है, की नेटवर्क प्रोब्लम की वजह से फ़ोन कट जाता है। थोड़ी देर ट्राई करने के बाद अंकिता अन्य कामों में व्यस्त हो जाती है।

आज अंकिता ने टी-शर्ट और स्कर्ट पहनी है, घुटने के उपर स्कर्ट। उसने एक दिन नाटक में समीर की नायिका को ऐसी ही ड्रेस में देखा था। वह आज समीर को अच्छी तरह से समझना चाहती है। टेबल पर उसने केक सजा दिया है, वहां सिर्फ दो चेहरे है। अंकिता की गोरी कलाई में बंधी घडी की सुइयां अब ग्यारह बजाना चाहती है।

अंकिता, समीर को याद दिलाने की गर्ज से उसे फ़ोन करती है, उधर से समीर कहता है, बस डियर पहुँच रहा हूँ, थोडा ट्राफिक में हूँ।

घडी की सुइयां ग्यारह क्रॉस कर चुकी है। समीर का फ़ोन नॉट रिचेबल है। अंकिता बेचैनी से टहलती है फिर बैठ जाती है।

अंकिता की आँख खुलती है, वो टेबल पर ही सर रख कर सो गयी थी। घडी पर नज़र डालती है तो तीन बज चुका है। समीर का फ़ोन अब भी नॉट रिचेबल है। अंकिता के चेहरे पर गुस्सा झलक पड़ता है। वो पैर पटक कर उठती है। और तेज़ क़दमों से टहलने लगती है। उसे समीर की इस अदा पर नफरत होने लगती है, और वो गुस्से में अतुल का नंबर डायल करती है।

केक खिलने के वक़्त अतुल के हाथ से केक फिसल कर अंकिता की शर्ट पर गिर जाता है। अंकिता अभी आती हूँ, कह कर वाश रूम की तरफ चली जाती है।

टी-शर्ट उतार कर वो उस पर लगे केक को साफ़ कर रही है, तभी वहां अतुल आ जाता है। सी एफ एल की रौशनी में अंकिता की नंगी पीठ और कंधे दूध की तरह चमक रहे है।

अतुल आगे बढ़ कर अपने होंठ अंकिता के कंधे पर रख देता है। अंकिता चिहुंक कर पलटती है तो बेलिबास उरोज अतुल के सीने में दुबक जाते है। अतुल उसे भींचते हुए आई लव यू अंकिता कहता है।

- आई लव यू टू - अंकिता के होंठो से सिसकारी के साथ निकलता है।

अतुल, अंकिता को गोद में उठा कर उसे बिस्तर पर लाकर लिटा देता है। इस वक़्त उसकी आखें बंद है और सांसे तेज़ है। वो अतुल को अपने बगल में महसूस करती है। कोई विरोध नहीं। अतुल के हाथों की हरकतों के आगे वह समर्पित हो जाती है। और अपने कौमार्य को उसके हवाले कर देती है।

किसी कवि सम्मलेन में जाने के लिए अतुल सवेरे छ: बजे अंकिता के रूम से निकलता है, दरवाज़े पर वो पानी नयी-नवेली प्रियतमा के होंठो को आधुनिक किस करता है।

अतुल को विदा करके, अंकिता वापस निढाल शरीर के साथ बिस्तर पर सो जाती है।

कई बार डोर बेल बजने के बाद उसकी आँख खुलती है। कोई बदस्तूर डोर बेल बजा रहा है। अंकिता झुंझुला कर उठती है। डोर खोलती है तो सामने समीर है। हाथ में फूलोंके गुलदस्ते के साथ।

अंकिता तंज लहजे में कहती है, अब क्या लेने आये हो, मेरा बर्थडे रात के ग्यारह बजे था, दिन के नहीं। इतना बोल कर वो वापस दरवाज़ा बंद करने को होती है पर समीर उसे के तरफ करके अन्दर आ जाता है।

टेबल पर रखे केक को समीर ऊँगली में लेके चखता है। फिर अंकिता के सामने घुटनों पर बैठ जाता है।

हाथ का गुलदस्ता उसकी तरफ बढ़ा के समीर कहता है- हैप्पी बर्थडे डियर।

- 'डोन्ट काल मी डियर '- इतना कह कर अंकिता घूम कर खड़ी हो जाती है।

उसके पीछे खड़े होकर समीर कहता है- मैं जनता हूँ आप नाराज़ है, मेरी वजह से आपका बर्थडे सेलिब्रेट न हो पाया।

पर मैं क्या करूँ अंकिता रात बहुत काली होती है। इतनी की इसमें जिंदगियां काली हो जाती है। जरा सोचो जब लोगों को मालूम पड़ता सारी रात हम साथ थे बंद कमरे में तो लोग न जाने क्या-क्या तुम्हारी पवित्रता के बारे में अफवाहें फैलाते। मैं कैसे सुन पाता ये सब तुम्हारे बारे में जिसे मैं प्यार करता हूँ।

- कुछ पलों बाद वो बोली - समीर तुम तो रात में चमकते सूरज की तरह, मैं तुम्हें जान ही न पाई। अब मैं तुम्हारे लायक नहीं क्यूँ की मैं रात में नहीं सुबह लुटी हूँ। सुबह की कालिमा में। इतना कह कर वो वहीं ज़मीन पर रोते-रोते गिर पड़ी। उसने एक महान इंसान को पहचानने में गलती कर दी थी।

कुछ लम्हों बाद समीर ने उसे उठा कर चेयर पर बैठाया और बोल- मैं अब भी अपने प्रपोज का जवाब मांगता हूँ, क्या मुझसे शादी करोगी तुम ?  

कुछ बोल न सकी वो। उसे चुप देख समीर बोला- ठीक है तुम आराम से सोच के बताना कल या फिर ओर कभी, अभी मैं चलता हूँ। और वो पलट कर चल दिया।

अंकिता जाते हुए देवता को देख रही थी और फिर भाग कर वो समीर की पीठ से चिपट गयी और उसके होठ बार-बार यही दोहरा रहे थे- 

'' हाँ मैं तुमसे शादी करुँगी’’,’’ हाँ मैं तुमसे शादी करुँगी '' 

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पुस्तक का नाम – प्रीत मंजरी ( काव्य – संग्रह )

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लेखिका का नाम – डॉ प्रीत अरोड़ा

प्रकाशक --- देवभूमि प्रकाशन ,नैनीताल

पुस्तक मूल्य – ९० रूपये

हिंदी कविता की प्रीतभरी सुवास

इधर लिखी जा रही अधिकांश हिंदी कविता में एक खास किस्म की जड़ता है। नई कविता का ताना-बाना ऐसा है कि नया पाठक कविता की बगिया में जा कर भी वहाँ के फूलों से जुड़ नहीं पाता। न सौंदर्य, न गंध और न सौंदर्य। लगता है कागज के सुमन खिले हुए हैं। कविता की मंजरी ही नकली है। ऐसा इसलिए है कि अब अधिकांश कविताएँ दिल से नहीं, दिमाग से लिखी जा रही हैं, जबकि कविता कोमल अनुभूतियों की उपज होती है। जब तक अंतस में प्रीत न जगे, कविता संभव नहीं हो पाती। एक सार्थक कविता आत्मदर्पण भी होती है। वह चंद शब्दों का असंगत कोलाज भर नहीं होती, वह जीवन का जीवंत चित्र होती है। और आत्मा का अनगाया राग भी होती है। मन की बातों को अनुगुंंजन है कविता। जबकि समकालीन कविताओं में कविता के अनिवार्य तत्व लगभग अनुपस्थित हैं। यही कारण है ये कविताएँ पाठकों से दूर हंै। कविता की प्यास पुरानी कविताओं के पाठ से ही बुझ पाती है लेकिन ऐसा नहीं है कि सारी कवि-बिरादरी एक ढर्रे पर चल रही है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो कविता को शिल्प के स्तर पर और भाव के स्तर पर भी जीने की कोशिश कर रहे हैं। इनके यहाँ कविता बिल्कुल कविता की तरह ही उपस्थित होती है। इन लोगों में डॉ. प्रीत अरोड़ा सुपरिचित नाम बनता जा रहा है।

इस युवा कवयित्री ने अपनी कविता-यात्रा को एक प्रखर संभावना में तब्दील कर दिया है। प्रीत की कविताई में आडंबर नहीं है। सादगी है। और वह दिल से अपनी बात कहती है। चाहे वह प्रकति को देखे, या जीवन के विविध आयामों को। प्रीत की हर कविता प्रभविष्णुता के निकष पर खरी उतरती है। सभी कविताएँ अर्थवान हैं। इन्हें पाठक हृदयंगम कर लेगा। अधिकांश कविताओं को मैं फेसबुक या विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में देखता-पढ़ता रहा हूँ। कविता की सफलता इसी में है कि वह पढ़ते साथ ही भाव लोक से अर्थलोक की यात्रा करा दे। यह समझना न पड़े कि कविता के गूढ़ार्थ क्या हैं। कविता अपने अर्थ को नदी के जल की तरह पारदर्शी बनाए। एक फूल की तरह सुवास को प्राण तक पहुँचा दे। कविता के अर्थलोक तक पहुँचने के लिए पाठक अतिरिक्ति ज्ञान की कुंजी का सहारा न ले। प्रीत ने कविता की सही रीत से अपना रिश्ता जोड़ा है। उसने कविता को सरल किया। अपनी गहनतम अनुभूतियों को सरलतम अभिव्यक्ति दी है।

प्रीत की कविताओं की मंजरी मेरे सामने हैं। हर कविता की पंखुड़ी चटक रंग से भरी है। यह मंजरी अपनी सुवास बिखेर रही है। आकर्षित कर रही है। वह जीवंत है। यहाँ भावनाएँ नाना रूपों में सामने आती हैं। कभी कविता नव चेतना जगाती है , तो कभी संस्कारों से रिश्ता जोड़ती है। बेटियों की महत्ता पर विमर्श करती है तो माँ के अवदान पर भी अभिभूत हो कर उसका गुणगान करती है। कविता नन्हीं चिडिय़ा से भी बतियाती है तो प्रकृति का विहंगावलोकन भी करती है। प्रीत की कविता में नैतिक मूल्यों की बहुलता है। वह संस्कारों पर जोर देती है। यहाँ प्रेम भी है मगर उसकी अपनी नैतिकता है। प्रीत की स्त्री भी मुक्तिकामी है लेकिन संस्कारों के साथ। यह बड़ी बात है। क्योंकि इधर की अनेक कवयित्रियाँ पूरी तरह से मुक्त होने पर अआमादा हैं। वे देह से मुक्त हो रही हैं, परिवार से मुक्त हो रही हैं। मुक्ति की गलत परिभाषा को दिमाग में बिठा कर कविताएँ कर रही हैं। जबकित प्रीत की कविताएँ दिशा देती हैं और स्त्री को उसकी अस्मिता से प्रतिबद्ध रखती हैं। संस्कारों की जीत कविता में स्त्री का दर्द भी है और आगे बढ़ाने की ललक भी। लेकिन अंतत: जीतते हैं संस्कार। यही संस्कार कविता को बड़ा बनाते हैं, कवयित्री को भी भीड़ से अलग कर देते हैं। महान कवयित्री महादेवी वर्मा का स्त्री विमर्श भी कुछ इसी तरह का है। महादेवी भी मुक्ति के लिए बेचैन हैं मगर वे संस्कारों को नहीं छोड़ती। वह भारतीयता को नकारती नहीं। वे श्रेष्ठ परम्पराओं से बंध कर त्याग भी करती है। वे नीर भरी दुख की बदली भी है मगर नई रागिनी भी हैं। प्रीत भी इन्हीं स्थितियों का चित्र खींचती है कि -

''मन कहता उसका,बगावत करने को

तभी गूँजने लगती कानों में माँ की शिक्षा

और संस्कार देने लगते दुहाई

ठण्डी आह भर कर

पुन: कोशिश करती

लड़ती अपने विचारों से

आखिर

जीत जाते संस्कार और हार जाती वो

आदर्श समझाते और समझ जाती वो।''

कविता में इस तरह मूल्यवत्ता का आग्रह अद्भुत है। इधर की अधिकतर कवियित्रियों में यह बोध गायब है। अब कितनी कवयित्रियाँ नैतिकता की बातें करती हैं? नैतिकता एक हास्यास्पद शब्द बन कर रह गया है। यह स्त्री विमर्श से लगभग अनुपस्थित होता जा रहा है। क्योंकि बहुत-सी औरतें नैतिकता को भी बंधन मानती हैं। जबकि प्रीत की कविता में नैतिकता केंद्रीय स्वर बन कर उभरता है। प्रीत घर की बात करती है। नवचेतना भी जगाती हैं मगर उसके पीछे लोक मंगल है। सुधर जाने की वकालत है। कविता घर को जोडऩे के पक्ष में खड़ी है जबकि अब घर से मोहभंग होने की कविताएँ भी रची जा रही है। कुल मिला कर इस वक्त जबकि कवयित्रियाँ क्रांति के नाम पर सब कुछ छिन्न-भिन्न करने पर आमादा न•ार अआ ती है, प्रीत की कविताएँ जोडऩे का मंत्र देती हैं। सही कविता जोड़ती है तोड़ती नहीं। वह क्रांति करती है लेकिन सृजन का वातावरण बना कर। लोगों की ालाकियों को कवयित्री बखूबी समझती है इसलिए वह आगाह करती है कि

जरा संभल के

रोनी सूरत बना कर

लोग अक्सर हमदर्दी बटोर लेते हैं

भोली सूरत बनाकर

लोग अक्सर दूसरों को लूट लेते हैं

हुस्न के जलवे दिखाकर

लोग अक्सर बरबाद कर देते हैं

यारों ,जरा संभल के रहना इन जमाने वालों से

लोग अक्सर निर्दोष को बलि का बकरा बना देते हैं ।''

मतलब यह कि प्रीत की कविताएँ सबको संदेश देती है ताकि बेहतर दुनिया रची जा सके। घर को माँ को, जीवन मूल्यों को प्रीत ने अधिक महत्व दिया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि प्रीत निरीह स्त्री के पक्ष में है। वह स्त्री की मजबूती का आग्रह करती है और मुहिम चलाने पर भी जोर देती है। वह दो टूक कहती है कि बेटी हूँ पर कमज़ोर नहीं/ माँ-बाप का अभिमान हूँ मैं/ नए संकल्प और नई सोच से, देश का मान बढ़ाऊंगी/ होंगें सबके सपने पूरे/ये विश्वास दिलाऊंगी/ अत्याचारों से लड़कर/ जीत का बिगुल बजाऊंगी/ सत्कर्म,सदभावना से/ आगे बढ़ती जाऊंगी/ करना होगा सब का उत्थान, प्रीत-मंजरी के संग, ऐसी मुहिम चलाऊंगी ।''

मुझे उम्मीद है कि 'प्रीत' की यह काव्य-'मंजरी' लोगों को पसंद आएगी। इन ताजा युवा कविताओं में परम्परा के दर्शन हैं और आधुनिकता का संस्पर्श भी। बगावती तेवर भी हैं तो संस्कारों के प्रति प्रबल आग्रह भी। इस संग्रह की तमाम कविताओं पर सुदीर्घ विमर्श हो सकता है लेकिन अपनी बात को यही पर विराम दे रहा हूँ, इस विश्वास के साथ कि समकालीन कविता की गुमराह दुनिया में प्रीत की कविताएँ रास्ता सुझाएँगी और मरती हुई नई कविता को प्राणवान बनाने का काम करेंगी। यह अतिरंजित तारीफ नहीं है, दिल से निकली भावनाएँ है क्योंकि इस तरह की सरल, तरल और नैतिक कविताएँ दुर्लभ होती जा रही है।

--

गिरीश पंकज

साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता
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- डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
Email : drsatappachavan@gmail.com 

 


‘‘ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।
तन-मन को शीतल करे औरन को सुख होय।।’’ १
                    - महात्मा कबीर

‘‘वाक्-संयम विश्व मैत्री की पहली सीढी है।’’२
                    - जयशंकर प्रसाद

    ‘‘आज की स्थितियाँ भले ही उद्भ्रांत करती हों, पर मैं हार नहीं मानूँगा। मुझे वर्तमान परिवेश से कतई अफसोस नहीं है। मेरी आस्था अभी जीवित है। स्नेह मेरी पूँजी है और यही मेरे लेखन का आधार है’’३
                    - विष्णु प्रभाकर

    उपर्युक्त विचार वर्तमानकालीन परिस्थितियों में उपयुक्त नजर आते है। ‘साक्षात्कार’ विधा पत्रकारिता के साथ - साथ साहित्य के क्षेत्र में भी अपना विशेष स्थान पा चुकी है। इसे मानना होगा। साहित्यिक साक्षात्कार का अपना अलग मंच है।
वर्तमानकालीन साहित्यकारों को प्रेरणा देने का महत्त्वपूर्ण कार्य  ‘साक्षात्कार’ विधा ने किया है। मूर्धन्य साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं् कृतित्व का अनुसंधान करते समय अनेक अनुसंधाताओं ने ‘साक्षात्कार’ विधा का आधार लिया है। इसमें दो राय नहीं। डॉ. रणवीर रांग्राजी का मत दृष्टव्य है, ‘‘इंटरव्यू में उत्तर का महत्त्व तो होता ही है, पर प्रश्न का महत्त्व भी कम नहीं  होता, क्योंकि वही तो उस उत्तर-विशेष का प्रेरक - उद्दीपक बनता है। अपने उत्तर के माध्यम से इंटरव्यू देने वाला साहित्यकार और उसका अंतरंग तो खुलता ही है, अपने प्रश्नों में प्रश्नकर्ता और उसकी अपनी समझ, पक़ड सामथर्य भी झलक जाती है। वास्तव में, न तो प्रश्न अपने - आप में पूर्ण होता है और न उत्तर ही। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं, दोनों मिलकर ही इंटरव्यू देनेवाले के व्यक्तित्व और विषय को खोलते हुए अभीष्ट लक्ष्य की ओर ब़ढते हैं।’’४ कहना आवश्यक नहीं कि लोकचेतना के चितेरे

- २ -

मूर्धन्य साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी अपने साक्षात्कार के दौरान अभीष्ट लक्ष्य की ओर ब़ढते हुए वर्तमान परिस्थिती पर तिखा प्रहार करते हैं। साक्षात्कार के समय विष्णु प्रभाकर सिर्फ भाव-भावनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं करते बल्कि वर्तमान परिवेश का सच सामने रखते हुए परिलक्षित होते है। कहना ठिक होगा कि साहित्यकार विष्णु प्रभाकर सकारात्मक सोच के पक्षधर थे।

    आत्मतत्त्व, धीर और स्नेह को अपनाकर वर्तमानकालीन उद्भ्रांत परिस्थिती पर भी विजय पाने का उनका आशावाद वर्तमान साहित्यकारों को प्रेरणाप्रद रहेगा। इसे नकारा नहीं जा सकता। विष्णु प्रभाकरजी के अनेक साक्षात्कार प्रकाशित हो चुके है। से.रा. यात्री, रामदरश मिश्र, डॉ. रणवीर रांग्रा, मुलतान (पाकिस्तान) में जन्मे बलदेव वंशी, डोगरी की मूर्धन्य रचनाकार पद्मा सचदेव आदि साहित्यकारों द्वारा लिए गए साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के साक्षात्कार वर्तमान कालीन भारतीय साहित्यकारों के लिए निश्चित रुप में पथदर्शक सिद्ध होंगे।

    ‘‘हिंदी में इंटरव्यू की शुरुवात हिंदी - मासिक ‘समालोचक’ के सितंबर १९०५ के अंक में ‘संगीत की धुन’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित महान संगीतज्ञ विष्णु दिगंबर पलुस्कर से चंद्रधर शर्मा गुलेरी की भेटवार्ता से मानी जाती है। पर पहला साहित्यिक इंटरव्यू  ‘विशाल भारत’  के जनवरी, १९३२ के अंक में ‘प्रेमचंद के साथ दोन दिन’ शीर्षक से प्रकाशित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा लिया गया प्रेमचंद का इंटरव्यू माना जाता है।’’५

    निराला, डॉ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, गुलाबराय, रामनरेश त्रिपाठी, अज्ञेय, महादेवी वर्मा, देवेंद्र सत्यार्थी, रणवीर रांग्रा, डॉ. माजदा अझद, डॉ. रामविलास शर्मा, अक्षय कुमार जैन, मनोहर श्याम जोशी, विष्णुचंद्र शर्मा, हिमांशु जोशी, सुरेंद्र तिवारी, लक्ष्मीचंद्र जैन, शरद देव़डा आदि साहित्यकारोंने लिए अनेक विद्वजनों के साक्षात्कार पुस्तक रुप में और पत्र-पत्रिकाओं में प्राप्त होते हैं। ‘‘विष्णु प्रभाकर की पुस्तक ‘कुछ शब्द : कुछ रेखाएँ’ में थाई साहित्यकार फायां का इंटरव्यू भी सम्मिलित है। इसके अलावा शरत् के संपर्क में आए अनेक व्यक्तियों से भी उन्होंने दूर-दूर तक घूम-फिर कर इंटरव्यू लिए जिनका उपयोग उन्होंने अपनी पुस्तक ‘आवारा मसीहा’ में यथास्थान किया है।’’६  कहना आवश्यक नहीं कि स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद वर्तमान

- ३ -

इक्कीसवीं सदी तक के साहित्यकारों ने साक्षात्कार’ विधा को अपनाया है। साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का साक्षात्कार द्वारा आभिव्यंजित व्यक्तित्व वर्तमान रचनाधर्मिता के लिए मार्गदर्शक तत्त्व बन चुका है। इसे मानना होगा। विष्णु प्रभाकर अंतःप्रज्ञा को अपनाने वाले साहित्यकार थे। जनसाधारण को लढने की प्रेरणा देना उनका उद्देश्य था। विष्णु प्रभाकरने अपने जीवन में खुद को अपूर्ण माना और पूर्णत्व की खोज में सफल जीवन जीते रहें। बिल्कुल अभिव्यंजना की तरह। ‘‘अभिव्यंयजना एक आत्मिक क्रिया है, जिसे उपादान प्रकृति के माध्यम से पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह अभिव्यक्ति हमेशा ही अपूर्ण रहेगी’’७  कहना सही होगा कि विष्णु प्रभाकर के अपूर्ण जीवन को ‘साक्षात्कार’ विधाने पूर्णरूप दिया हुआ पर्याप्त मात्रा में दृष्टिगोचर होता है।

    विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार एक अनुसंधाता के रुप में प़ढने के अपरांत साहित्यिक विष्णु प्रभाकरजी का बहुआयामी व्यक्तित्व सामने आया -

जीवन-मूल्यों से लगाव -
    चिंतन और कर्म में समानता रखना मानों विष्णु प्रभाकरजीने अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया था। प्रभाकरजी के ‘साक्षात्कार’ प़ढने के बाद यह बात पहले सामने आती है। वर्तमान समय के अनेक साहित्यकार प्रभाकरजी की इसी परंपरा को आगे ब़ढाना चाहते हैं। साहित्य क्षेत्र में अनेक दिशाएँ हैं, फिर भी प्रभाकरजी ने जीवन - मूल्यों से लगाव रखा। पद्मा सचदेव कहती हैं, ‘‘मेरे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा पुरुष ने स्त्री को जितना दबाया उससे ज्यादा और नहीं दबा सकता. मगर स्त्री को जो आजादी मिल रही है उसके मायने उच्छृंखलता नहीं है, आजादी मर्यादा में होनी चाहिए’’८ कहना सही होगा कि साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी अपनी जमीन की समस्याओं का अध्ययन कर उन समस्याओं को मिटाने के लिए सतत प्रयासरत रहें।

गांधीवादी चिंतक -
    ‘‘टी हाउस - कॉफी हाउस मेरे विश्वविद्यालय है’’९ कहनेवाले विष्णु प्रभाकरजी प्रखर गांधीवादी चिंतक थे। गांधीविचारधारा को अपने जीवन के साथ-साथ नवसाहित्यकारों, पाठकों तक पहुँचाना प्रभाकरजी अपना कर्तव्य मानते थे। ‘‘जहाँ तक साहित्यिक आंदोलनों की बात है, गांधी और आजादी के लिए संघर्ष की भावना का साहित्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव था।... प्रायः सभी लेखकों के पात्र गांधी की प्रेरणा से

- ४ -

आप्लावित थे। वे देश के आजादी के लिए क्या कुछ नही कर जाना चाहते थे।’’१० विष्णुप्रभाकरजी के उपर्युक्त विचारों से ज्ञात होता है कि वे अंत तक गांधीवादी विचारधारा से जुडे रहें।

बहुआयामी और निडर व्यक्तित्व -
    विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार पाठकों को विचारशीला और कृतिशील बनने की प्रेरणा देते हैं। प्रभाकरजी का व्यक्तित्व बहुआयामी  और निडर होने के कारण साक्षात्कार के दौरान वे सहज अभिव्यक्त होते हुए परिलक्षित होते है। पत्रकार और पत्रकारिता पर अनेक वर्तमान साहित्यकार अपने विचार रखते वक्त मन में का-किंतु रखते है लेकिन वर्तमान रचनाधर्मिता को अपने विचारों से संघर्षरत रखने वाले प्रभाकरजी कहते हैं, ‘‘हमारे जमाने में पत्रकारिता एक मिशन थी और आज यह व्यवसाय बनकर रह गई है। व्यवसाय में लाभपूर्ण स्थितियों पर नजर रखी जाती है। पुराने पत्रकारों ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। पं. बाबूराव विष्णु पराडकर, गणेशशंकर विद्यार्थी, इंद्र विद्या वाचस्पति जैसे पत्रकारों ने पत्रकारिता के मर्म को समझा था आज उस भावना का लोप हो गया है। अब पत्रकारिता में चटपटापन और प्रचार घुस गया है। अवसरवाद ने अपनी जडें जमा ली हैं।’’११ हमेशा ही विष्णु प्रभाकरजी ने अवसरवादी मानसिकता का विरोध किया है। अपने साक्षात्कार में वे वर्तमान अवसरवादी परिदृश्य को मिटाने का आवाहन करते है। कहना आवश्यक नहीं कि विष्णु प्रभाकरजी निडर व्यक्तित्व के कारण ही यह सबकुछ कर सके। आमंत्रित होने के बावजूद राष्ट्रपति भवन मे प्रवेश न मिलने के कारण उन्हें मिला ‘पद्मभूषण’ लौटा देने की बात भी निडरता का उदाहरण है।

अक्षर पुरुष -
    विष्णु प्रभाकरजी को ‘अक्षर पुरुष’ मानना उचित होगा। भारतीय वाड्मय का उनका अध्ययन साक्षात्कार पढते वक्त स्पष्ट होता है। उपन्यास, कहानी, लघुकथा, नाटक, रुपांतर, एकांकी, जीवनी - संस्मरण, आत्मकथा, कविता, यात्रा -वृत्तांत, निबंध, संपादन, बाल साहित्य, जीवनी साहित्य, पत्र - पत्रिकाओं के लिए लेखन के साथ साहित्य की हर विधा में विष्णु प्रभाकरजी ने अपना योगदान किया है। ‘‘मैं खुद ही आवारा मसीहा हूँ। घुमना बहुत अच्छा लगता है। पत्नी थी तो वो भी साथ जाती थी। हिमालय से गोमुख तक हो आये। अब वो नहीं है तो बिल्कुल ही आवारा मसीहा हो गया

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हूँ। घुम कर ही मैंने आवारा मसीहा लिखा है। जहाँ जहाँ शरत् के पात्र थे, स्थान थे, सब जगह गया। वो सभी स्थान देखने में मुझे चौदह वर्ष लगे। बर्मा, थाईलैंड, रंगून सब जगह घुमा।... चीजों की उम्र बहुत लंबी है मनुष्य की उम्र जैसी नहीं।’’१२ कहना उचित होगा कि सचमुच ही साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी ‘अक्षर पुरुष’ बनकर हमारे बीच आज भी उपस्थित हैं।

भाषिक चातुर्य -
    विष्णु प्रभाकरजी के पास भाषिक चातुर्य था जो साक्षात्कार लेने वाले विद्वान की सोच को आवाह्न देता परिलक्षित होता है। भाषा का सही प्रयोग, अंतर्षिषयक ज्ञान, अनुसंधानात्मक दृष्टिकोण के कारण प्रभाकरजी की भाषा पाठकों को अपनी लगती थी। ‘‘आवारगी में हमने जमाने की सैर की....’’१३ कहने वाले विष्णु प्रभाकरजी के संदर्भ में ओम निश्चल कहते हैं, ‘‘आजादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में विष्णु प्रभाकरजी की लेखनी का भी अपना एक मिशन बन गया था जो आजादी के लिए प्रतिश्रुत और संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय, जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बनी।’’१४ कहना आवश्यक नहीं कि भाषिक चातुर्य के कारण विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार आदर्श साक्षात्कार बने।

भारतीय जनमानस का चितेरा -
    वर्तमान रचनाधर्मिता में दलनीति, गुटनीति का प्रभाव परिलक्षित होता है। विष्णु प्रभाकरजी को इसका दुख था। वे भारतीय जनमानस के साथ, अच्छे नवलेखकों के साथ, पाठकों के साथ अपने - आपको जुडे रखते थे। उनके साक्षात्कार भी आम भारतीय जनमानस का चित्रण करते हुए परिलक्षित होते है। ‘‘एक पूरी शताब्दी की हलचल को अपने भीतर समेटे विष्णुजी के निकट बैठें तो उनके चेहरे पर एक निष्काम आभा तैरती नजर आती थी। यश, धन, लोभ तथा मानवीय दुर्बलताओं से बहुत हद तक अछूते विष्णु जी पाठकों के पत्रों का मनोयोग से जवाब लिखते हुए देखे जा सकते थे।’’१५ साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी ने भारतीय जनमानस को केंद्र में रखकर ही अपना साहित्यविश्व समृद्ध किया। इसमें दो राय नहीं।


..६..
- ६ -
निष्कर्ष -
    साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता का सिंहावलोकन करने से पता चलता है कि विष्णू प्रभाकर जी ‘वाणी’ और ‘लेखनी’ का नम्रतापूर्वक प्रयोग करने वाले सफल साहित्यकार के रुप में परिलक्षित होते हैं। साहित्यिक साक्षात्कार शृंखला में साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी के साक्षात्कार जीवंतता की अनुभूति देते हैं। सहज अभिव्यंजना के कारण प्रभाकरजी के साक्षात्कार प्रश्नकर्ता और पाठक दोनों के मन में अपना विशिष्ट स्थान पाते नजर आते हैं। वर्तमान रचनाधर्मिता का विचार किया जाय तो किसी हेतु को केंद्र में रखकर साक्षात्कार लिए और दिए जाते है लेकिन लोकचेतना के चितेरे मूर्धन्य साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी अपने साक्षात्कार के दौरान अभीष्ट लक्ष्य की ओर बढते हुए वर्तमान परिस्थिती पर तिखा प्रहार करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। प्रश्नकर्ता को आनंद देनेवाले विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार वर्तमान परिवेश का सच भी सामने रखते हुए परिलक्षित होते हैं। आत्मतत्त्व, धीर और स्नेह को अपनाकर वर्तमान उद्भ्रांत परिस्थिती पर भी विजय पाने का उनका आशावाद वर्तमान कालीन साहित्यकारों को प्रेरणाप्रद रहेगा। इस नसकारा नही जा सकता। साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी का साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित व्यक्तित्व वर्तमान रचनाधर्मिता के लिए मार्गदर्शक तत्त्व बन चुका है। इसे मानना होगा।

    विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार एक अनुसंधाता के रुप में पढने के उपरांत साहित्यिक विष्णु प्रभाकरजी का बहुआयामी व्यक्तित्व सामने आया। चिंतन और कर्म में समानता, जीवनमूल्यों से लगाव, गांधीवादी विचारधारा का स्रोत, बहुआयामी और निडर व्यक्तित्व, साक्षात अक्षर पुरुष का रुप, भाषिक चातुर्य और भारतीय जनमानस के सफल चितेरे के रुप में अपने साक्षात्कार के दौरान विष्णु प्रभाकरजी दृष्टिगोचर होते है।  वर्तमान परिस्थिती एवं रचनाधर्मिता के संदर्भ में विचार करने पर ज्ञात होता है कि प्रभाकरजी के साक्षात्कार अत्यधिक प्रासंगिक लगते है। इस में दो राय नहीं।

संदर्भ - संकेत -
१.    जमनालाल बायती - साक्षात्कार कैसे दें, पृष्ठ,२०
२.    वही, पृष्ठ २०
३.    संपा. त्रिलोकनाथ चतुर्वेदी - साहित्य अमृत (मासिक), जून, २००९, पृष्ठे,४५
४.    संपा.वीरेंद्र सक्सेना - भाषा (द्वैमासिक) नंवबर-दिसंबर,१९९४, पृष्ठ,४३
५.    वही, पृष्ठ, ४५
६.    वही, पृष्ठ, ४९
- ७ -

७.    डॉ. अमरनाथ - हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, पृष्ठ ४३
८.    संपा. राजेंद्र यादव - हंस (कथा मासिक) अक्टूबर, १९८६, पृष्ठ,१४
९.    संपा. त्रिलोकनाथ चतुर्वेदी - साहित्य अमृत (मासिक), जून, २००९, पृष्ठ,७४
१०.    वही, पृष्ठ,३०
११.    वही, पृष्ठ,३२
१२.    संपा. राजेंद्र यादव - हंस (कथा मासिक) अक्टूबर, १९८६, पृष्ठ, १४
१३.    वही, पृष्ठ,१२
१४.    ु.ीहरलवीीळक्षरप.लश्रेसीेिीं.ळप ऊरींशव १२ चरू, २००९.
१५.    वही, ऊरींश १२ चरू, २००९.

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डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर ४१४००१.(महाराष्ट्र)
चेल - ०९८५०६१९०७४
ए-ारळश्र - वीीरींर`िरिहर्रींरपऽसारळश्र.लेा.

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शरीर और आत्मा के योग से जीवन का निर्माण हुआ है । माता ,पिता माध्यम है किसी भी जीव के अवतरण का, पर जन्म देने वाला माँ है और जन्म लेने वाला "मैं" है । माँ और मैं के उभय से ही चेतना का प्रसार हुआ है, माँ ने ही जीवन को संभव बनाया है इसलिए माँ परम है और उसे व्यक्त करने वाला मैं है। " मैं " आदि है और माँ अनंत है अतः अनंत के गोद में आदि पलता है ,फलता और फैलता है । जब शिशु जन्म लेता है तो रोता है क्योकि माँ के नौ महीनों के योग का आनंद से ,अचानक रिश्ता टूट जाता है । अनंत के वात्सल्य से ही आदि का उदभव हुआ है । अनंत और आदि के सम्बन्ध कण कण में समाया है ,जड़ चेतन में समाया है । इसी , उभयता से सारे जीव जगत ,सारा विश्व समृद्ध हुआ है । "मैं "अनेकता में एकता का प्रतीक है, इसलिए शाश्वत है । मेरी कविता माँ और मैं, स्व उभय के निर्माण का गीत है, स्वयं में डूबने का गीत है । सबमें अपने मैं का दर्शन करने की आकांक्षा से ओतप्रोत है,और यही जीवन का उद्देश्य है । कैसा है , हम सब का पूर्वज याने ओ प्रथम "मैं "जो अनंत के गर्भ से जन्म लिया था , ओ प्रथम चेतना जिसका प्रसार सारा विश्व है ,मैं "अंकुर "उसका केवल अंश मात्र हूँ । अनुभूति की आकृति नहीं होती ,लेकिन जो द्वेष मुक्त प्रेम है यही "मैं " की सत्य अनुभूति है ,और यही हर मैं को कर्त्तव्य के लिये प्रेरित करता है । उस "मैं "के प्रेरणा से ही ये कविता लिख पा रहा हूँ , मैं आप सब रचनाकार के पाठकों के आशीर्वाद की आकांक्षा लिये प्रस्तुत है ।

 

माँ और मैं

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

दूर से आया मुसाफिर अनजान है मंजिल अभी

आँख का ऐनक लगाये “मैं“ ही देखे जग हंसी

जग हँसा था, मैं था रोया,न जानें मैंने क्या ? था खोया

फिर से पाना है ,उसीको जो था खोया , मैं कवि

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

क्या है बचपन क्या जवानी क्या बुढापा आयेगी

आने वाला है मुसाफिर ,क्या? जिन्दगी रुख पायेगी

जब तक न बदले माने "अँकुर "तब तक" तू "केवल भीड़ है

रुक न कुछ पल रुक न अपने साथ जी ले ये कवि

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

दर्द का रिश्ता है “अंकुर “गम ,ख़ुशी संग कौन जीता

जिस्म है केवल बहाना, जिन्दगी एहसास है

मैं ही मैं से युद्ध करता चाहे लड़ता हो कोई

“माँ “ के आँचल में छिप कर सत्य लिखता मैं कवि

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं “उभय है “मैं “अभय है “मैं” ही पहला तत्व है

“मैं “ से सारा जग है फैला कौन कहता ” मैं ” नहीं

तू भी “मैं” है ,मैं भी “मैं” है ,वो भी “मैं” है, वे सब भी “मैं” की भीड़ है

“मैं “ से मिल कर “हम” है बनता “माँ “जगत जंजीर है

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

माँ से पहले “मैं “ही उपजा ,माँ जगत की मूल है

“मैं “ही नारी “मैं”ही पौरुष “मैं “से सारा लिंग है

“मैं “ही मौला “मैं “ही मुरशिद “मैं “अली अल ब्रम्ह है

“मैं “ही पहला बीज “अंकुर “ ”मैं” से फैला सर जमीं

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं” हि उर्जा “मैं “ हि कुदरत “मैं “हि अल्ला नूर है

माँ भुवन में “मैं “ ही रहता “मैं “ही रचता रूह है

“मैं “ से पहले “माँ” है “अंकुर “तभी तो “मैं “उदभूत है

माँ भंवर के बीच रक्षित विश्व में रहते सभी

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं” ही स्व का स्वर है अंकुर ,”मैं “ही स्व का सत्य है

“मैं” ही रहता साथ मेरे “तू “बदलता हर वक्त है

“वह “तो दूरी है बनाये “वे “ तो ’’’’’’’’’’’’’’’’बहुत दूर है

पर “मैं “ही सब में सत्य बन कर हर वक्त रहता है नबी

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं” ही बदले देह “अंकुर” हर मैं भी माँ का अंश है

नव रूप में माँ रस भरा है शुन्य में माँ राज़ है

माँ के रस में विश्व फैला माँ जगत का सार है

हर नाम के अंदर है बैठा एक "मैं " ओंकार है

 

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