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July 2013
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कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनकी दो लघुकथाएं (31 जुलाई-1880 ) (प्रस्तुति : गोवर्धन यादव)

राष्ट्र का सेवक

राष्ट्र के सेवक ने कहा:- देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव, दुनिया में सभी भाई हैं, कोई नीचा नहीं, कोई ऊँचा नहीं.

दुनिया ने जयजयकार की---कितनी विशाल दृष्टि है, कितना भावुक हृदय ! उसकी सुन्दर लडकी इन्दिरा ने सुना और चिंता के सागर में डूब गई. राष्ट्र के सेवक ने नीची जात के नौजवान को गले लगाया. दुनिया ने कहा- “यह फ़रिश्ता है, पैगम्बर है, राष्ट्र की नैया का खेवैया है.” इन्दिरा ने देखा और उसका चेहरा चमकने लगा. राष्ट्र का सेवक नीची जात के नौजवान को मन्दिर में ले गया, देवता के दर्शन कराए और कहा- “हमारा देवता गरीबी में है, जिल्लत में है,परस्ती में है.”

इन्दिरा ने देखा और मुस्कराई. इन्दिरा राष्ट्र के सेवक के पास जाकर बोली- “श्रद्धेय पिताजी, मैं मोहन से ब्याह करना चाहती हूँ.” राष्ट्र के सेवक ने प्यार की नजरों से देखकर पूछा-“मोहन कौन है ?”. इन्दिरा ने उत्साह भरे स्वर में कहा-“ मोहन वही नौजवान है, जिसे आपने गले लगाया, जिसे आप मन्दिर ले गए, जो सच्चा, बहादुर और नेक है”.

राष्ट्र के सेवक ने प्रलय की आंखों से उसकी ओर देखा और मुंह फ़ेर लिया.

देवी

रात भीग चुकी थी. मैं बरामदे में खडा था. सामने अमीनुद्दौला पार्क नींद में डूबा खडा था. सिर्फ़ एक औरत एक तकियादार बेंच पर बैठी हुई थी. पार्क के बाहर सडक के किनारे एक फ़कीर खडा राहगीरों को दुआयें दे रहा था-“ खुदा और रसूल का वास्ता....राम और भगवान का वास्ता....इस अन्धे पर रहम करो”. सडक पर मोटरों और सवारियों का तांता बन्द हो चुका था. इक्के-दुक्के आदमी नजर आ जाते थे., फ़कीर की आवाज जो पहले नक्कारखाने में तूती की आवाज थी, जब खुले मैदानों की बुलन्द पुकार हो रही थी. एकाएक वह औरत उठी और इधर-उधर चौकन्नी आंखों से देखकर फ़कीर के हाथ में कुछ रख दिया और फ़िर बहुत धीमे से कुछ कहकर एक तरफ़ चली गई. फ़कीर के हाथ में कागज का एक टुकडा नजर आया जिसे वह बार-बार मल रहा था. क्या उस औरत ने यह कागज दिया है?.यह क्या रहस्य है?. उसको जानने के कुतूहल से अधीर होकर मैं नीचे आया और फ़कीर के पास जाकर खडा हो गया. मेरी आहट आते ही फ़कीर ने उस कागज के पुर्जे को उंगलियों से दबाकर मुझे दिखाया और पूछा-“बाबा, देखो यह क्या चीज है?.”

मैंने देखा-दस रुपये का नोट था. बोला-“दस रुपये का नोट है, कहाँ पाया ?”. मैंने और कुछ न कहा. उस औरत की तरफ़ दौडा जो अब अन्धेरे में बस एक सपना बनकर रह गई थी. वह कई गलियों में होती हुई एक टूटे-फ़ूटे मकान के दरवाजे पर रुकी, ताला खोला और अन्दर चली गई.

रात को कुछ पूछना ठीक न समझकर मैं लौट आया. रात भर जी उसी तरफ़ लगा रहा. एकदम तडके फ़िर मैं उस गली में जा पहुंचा. मालूम हुआ, वह एक अनाथ विधवा है. मैंने दरवाजे पर जाकर पुकारा-“देवी, मैं तुम्हारे दर्शन करने आया हूँ.”. औरत बाहर निकल आयी-गरीबी और बेकसी की जिन्दा तस्वीर. मैंने हिचकते हुए कहा-“ रात आपने फ़कीर को.........”. देवी ने बात काटते हुए कहा—“ अजी वह क्या बात थी, मुझे वह नोट पडा मिल गया था, मेरे किस काम का था.”

मैंने उस देवी के कदमॊंपर सिर झुका दिया.

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गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

 

पचास धन

1:-

मुस्‍कान तेरी

दिल में उतर गई

सद्‌यःस्‍नात अभिनेत्री

सुनयना मुस्‍कुराई

2:-

मीनाबाजार

प्रणय में मंहगाई

आवाज खड़खड़ाई

प्रीत तुमने निभाई।

3:-

पचास धन

सपना में समा गई

एक बहाना है काफी

हमारे जीने के लिए

4:-

पाटल पुष्‍प

अंग अंग लगे तेरे

अधर अमृत पीउंॅ

बस इतनी चाहत

5:-

मधुर योग

पल पल हठ योग

न समझे इसे रोग

प्रकृति पुरूष योग

6:-

भंवर गीत

रात सरोज में सोए

प्रातःकाल उड़ चले

भंवर को चैन कहांॅ

7:-

बारह बजा

मिलन की घड़ी आई

तन मन करे योग

मेघ जल बरसाई

8:-

मन मोहिनी

तरस रहे हैं कान

सुनने आवाज तेरी

एक बार कहो प्रेम

9:-

पाली की प्‍यारी

अंॅगनियांॅ की दुलारी

मुखिया का अपमान

मत कर तू गुमान

10:-

मधु यामिनी

खनखनाती चूड़ियांॅ

महमहाती बदन

नव विवाहिता वधु

11:-

अक्षर ज्ञान

प्राथमिक पाठशाला

नव सृजन का शाला

हंॅसमुख मतवाला

12:-

तुलसीदास

रामचरित मानस

समन्‍वयक सहारा

सत्‍य हरदम जीता

13:-

रोग की दवा

तुम ही हो राधारानी

मरते प्राणी की सुधा

मेरी जागृत कल्‍पना

14:-

मेरी आराध्‍या

तुमने रचाई रास

और हुआ नाम मेरा

अद्‌भुत तेरी साहस

15:-

निर्दयी विश्‍व

देती है सिर्फ यातना

दुनिया मत बांॅधना

अपनी मोटी जंजीर

16:-

प्‍यासा क्‍या देख्‍ो

कहीं भी मुंॅह मारता

कुपथ पथ मानता

सभी को एक जानता

17:-

निंदिया लागी

आओ सो ले साथ साथ

प्रिये बाकी रहा बात

जाने को है अब रात

18:-

गायत्री माता

बस तेरा ही सहारा

स्‍ंासार में मैं हूंॅ हारा

तेरे बिन हूंॅ आवारा

19:-

आह वेदना

साहित्‍य सृजनकर्ता

सबमें लाता एकता

मिलाता है मानवता

20:-

गड़गड़ाना

प्रकृति का नगाड़ा

गड़गड़ गड़गड़

वसुधा गगन योग

21:-

कर्म का फल

विपरीत प्रतिक्रिया

सत्‍कर्म होता शहद

हमेशा कर सत्‍कर्म

22:-

म्‍ोरी गोमाता

देती है गोबर धन

करें हम गोवर्धन

गो का वध करें बंद

23:-

मांॅ की ममता

बड़ी होती अनमोल

संसार में नहीं तोल

मांॅ से तू मधुर बोल

24:-

सावन भादों

हरा भरा वसुन्‍धरा

झर झर जल झरा

नदी नाले सब भरा

25:-

क्‍वांर कार्तिक

छिटके श्‍वेत चांदनी

फसल लहलहाती

सबका मन है लुभाती

26:-

काला अंगूर

पीकर हैं सभी बढ़े

नारी का रूप सौन्‍दर्य

आकर्षण है अनोखा

27:-

हमसफर

तो सुहाना है सफर

हम सभी हैं जानते

परमेश्‍वर मानते

28:-

राधिका रानी

अनुराग बरसाती

प्रेम पथ पर आती

कनुप्रिया कहलाती

29:-

प्रणय योग

रसधर चक्रधर

बंशीधर गीतेश्‍वर

रूपधर विश्‍वेश्‍वर सीताराम पटेल

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उॅं भूर्भुवः स्‍वः तत्‍सवितुर्वरेण्‍यं भर्गो देवस्‍य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्‌।

श और धन पाने की लालसा किसे नहीं रहती,पर मिले तो कैसे!आप ईमानदार हैं. सत्यपथ के राही हैं. बदनाम होंगे ही. कंगाल रहेंगे लेकिन चार सौ बीसी करेंगे. दूसरों का गला काटेगें तो यश और धन आपके कदम चूमेंगे.

उस दिन एक मंत्री जिसका नाम हरिश्चंद्र था मेरे पास आये. बोले-भैय्या,मैं जनता में लोकप्रिय होना चाहता हूं. अपनी जय जयकार कराना चाहता हूं. विरोधियों के कारण मेरी इच्छाओं पर तुषाराघात हो जाता है. तुम कोई ऐसा रास्ता निकालो,जिससे लोग मुझ पर श्रद्धा करें. जब तक सूरज चांद रहे तब तक मेरा नाम रहे.

मैंने कहा- आप लोग गरीबों के पैसे से ऐश करते हैं . जनता को धोखा देते हैं तो बदनामी मिलेगी ही. अब तक यह अच्छा हुआ कि बीच चौराहे पर पीटे नहीं गये.

- वह तो ठीक है पर तुम्हारे पास आया हूं तो कुछ तरकीब तो भिड़ाओ.

मैं लेख और जुबान से नेताओं का कच्चा चिठ्ठा खोलता हूं पर वास्तविकता यह है कि कुर्सी से चिपके रहने के उन्हें तरीका बताता हूं. श्रमिकों को क्रांति करने के लिए उकसाता हूं पर आंदोलन के समय कारखाने के मालिक का पक्ष लेता हूं. मैंने कहा- आप लोग कलयुग के राजा हैं. इन्द्र के समान सुरा पान करते हो. कृष्ण की रास रचाते हो. आप हरिश्चंद्र है और राजा हरिश्चंद्र के समान सत्यवादी,ईमानदार कहलाना चाहते हैं तो उनके ही कर्मों का अनुसरण कीजिये न !

उन्होंने पूछा - क्या सच ?

- हां,राम चरित्रवान थे पर रामलीला का राम दुराचारी होकर भी पूजित होता है. यह मूर्खता है लेकिन जब तक दुनिया में मूर्ख है,बुद्धिमानों को अपना स्वार्थ सिद्ध कर ही लेना चाहिये.

मैंने राशि का मिलान कर उसका गुण बता दिया तो वे बड़े प्रसन्न हुए. ज्योतिषी मोहन और महेन्द्र को एक राशि होने के कारण एक ही प्रकार का फल बता देता है पर मोहन को पदोन्नति मिल जाती है और महेन्द्र निलम्बित हो जाता है. कोई जीये या मरे ज्योतिष को क्या मतलब!उसकी तो जेब गर्म होनी चाहिये.

हरिश्चंद्र ने नेक सलाह देने के बदले मुझे पुरस्कार दिलाने का आश्वासन दिया और चले गये. वे एक दिन अन्य मंत्री विश्वामित्र के पास पहुंचे. बोले- मैं अपना विभाग तुम्हें दान करना चाहता हूं.

विश्वामित्र चकराये-बिना मांगे मोती कैसे मिल रहा है. उन्होंने कहा- तुम पगला गये हो क्या!अपना विभाग मुझे सौंप रहे हो. यहां तो मंत्री पद पाने के लिए एक दूसरे की गर्दन काटी जाती है.

- तुम्हें इससे क्या मतलब,लेनी है या नहीं.

- लूंगा क्यों नहीं. दस विभाग मिले फिर भी संभाल लूंगा. छप्पर फाड़ कर आये धन को कोई लतियाता है!एक विभाग ने कार बंगला दिया तो दूसरा एकाध कारखाना खुलवा देगा. तुम्हारी बात स्वीकार है पर तुम छोड़ क्यों रहे हो कारण भी तो ज्ञात हो. क्या साधु बनने जा रहे हो?

हरिश्चंद्र ने बताया-वैसे साधु बनना उत्तम है. क्योंकि उसे बिना मिहनत किये भोजन मिल जाता है. साथ ही उसकी पूजा भी होती है. लेकिन अपनी समस्या यह नहीं. दरअसल मैं एक नाटक खेलना चाहता हूं.

- कैसा नाटक. . . ।

- तुम अच्छी तरह जानते हा कि आज हर कोई नेताओं के ऊपर ऊंगली उठा रहा है. इसलिये इनकी छवि को चमकाने के लिए हरिश्चंद्र का नाटक खेलना चाहता हूं. मुझे विश्वास है कि तुम पात्र बनकर मेरी सहायता करोगे. खेल खत्म होने के बाद मेरा विभाग मुझे वापस करने के लिए नाटकबाजी नहीं करोगे.

और हरिश्चंद्र ने अपना विभाग विश्वामित्र को थमा दिया. इसके बाद वे अपनी पत्नी तारा तथा रोहित को लेकर गली-गली चिल्लाने लगे-है कोई हमें खरीदने वाला. हम नीलाम होने को तैयार है.

शहर के चौराहे पर मजदूर रोज बिकते हैं. पर हल्ला नहीं मचता. लेकिन नेता बिक रहे थे तो भीड़ लग गई. लोगों ने पूछा- आपके पास कोई कमी नहीं है फिर क्यों बिक रहे हैं.

हरिश्चन्द्र ने स्पष्ट किया-भाइयों,जैसे ढोल के अंदर पोल रहता है वैसी ही स्थिति मेरी है. मैंने अपनी सारी पूंजी गरीबों में बांट दी तथा जनता की भलाई के लिए मद से अधिक खर्च कर दिया पर यही उदारता मेरे लिए घातक हो गई. सरकार मुझसे रुपये वसूलना चाहती है. मैं कंगाल तो हो ही गया हूं. रुपये कहां से लाऊं इसलिए मुझे परिवार सहित बिकना पड़ रहा है. कोई बात नहीं ,चाहे मैं नीलाम हो जाऊं पर जनता की सेवा करना छोड़ नहीं सकता.

लोग हरिश्चन्द्र की प्रशंसा करने लगे-इनके समान त्यागी पुरुष कौन होगा. धन्य है हरिश्चन्द्र,इनकी जय हो.

हरिश्चन्द्र ने कहा- मुझ जैसे अभागे का गुणगान क्यों करते हो !मुझे खरीदो साथ में पत्नी और बच्चे को भी . . . ।

लोगों को पता चला कि तारा बिकने वाली है तो अनेक ग्राहक मैदान में कूद पड़े. उनमें मारा मारी हो गई. अपने देश में नारी पूज्य है. अतः बिकती है. उसका सम्मान हम करते हैं इसलिए जिन्दा जला देते हैं और कहते हैं-वह सती हो गई. खिड़की दरवाजा बनाने के लिए लकड़ियों का अभाव है पर नारी दहन के लिए नहीं. इस देश को बारम्बार प्रणाम .

तारा बिक गई साथ ही रोहित भी. रोहित को भीख मंगवाने के लिए खरीद लिया गया होगा. बच्चे सबसे अच्छे और आंखों के तारे होते है. इसलिए उनके हाथ पांव तोड़ कर भीख मंगवाये जाते हैं. आंदोलन करना हो तो बच्चों को सामने कर दो. वे गोलियों के शिकार हो जाये तो कह दो कि वे वीर थे. हंसते- हंसते शहीद हो गये.

अब हरिश्चन्द्र को अपने को बेचना था. उन्हें विरोधियों या उद्योगपतियों के पास बिकना होता तो कब के बिक चुके होते. उन्हें आम आदमी के पास बिक कर खास बनना था. वे डोम के पास पहुंचे. बोले- अबे,तुम्हें मुझे खरीदना पड़ेगा.

डोम सकपकाया. बोला-सरकार आप कैसी बातें कर रहे हैं. राजा को प्रजा कैसे खरीदेगी. गंगुवा को भोज ने खरीदा था क्या ?

- मुझे ज्ञात है कि तेरा बाप भी नहीं खरीद सकता पर सिर्फ हां कह दे.

- जब खरीदना ही नहीं है तो झूठ क्यों बोलूं ?

- बड़ा सत्यवादी है न जो सच ही बोलेगा. सच के सिवा कुछ नहीं बोलेगा. अरे,जब मैं ही दली हूं,प्रपंची हूं. तो तुम्हें झूठ बोलने में क्या हैं. जैसे राजा वैसी प्रजा को भी होनी चाहिए.

डोम ने डरकर हरिश्चन्द्र को खरीद लिया. हरिश्चन्द्र तत्काल मरघट आये और कर वसूलने लगे. वे जलती लाश को देखकर प्रसन्न होते कि जनसंख्या तो कम हो रही है. जीवित मनुष्य नेताओं के कुकर्मों का विरोध करते अतः उनके मरने पर वे विजयगान गाते हैं. लेकिन उनकी कलुषित भावना को कोई पढ़ न पाये इसलिए श्रद्धांजलि अर्पित कर देते हैं. यही नहीं वे कफन और लकड़ियों का भी इंतजाम कर देते हैं ताकि वे पुण्यात्मा कहलायें.

एक आदमी मर गया. उसे जलाने के लिए लकड़ियां नहीं मिल रही थी. तो एक नेता ने प्रबंध कर दिया. यही नहीं वे लाश को भस्म करने के लिए बांस मारने लगे. मैंने उनसे पूछा- आपको पुल का उदघाटन करने जाना था पर आप यहां डंटे हैं,ऐसा क्यों ?

वे मुझ पर चिढ़ गये. बोले-तुम बड़े अधर्मी हो. तुममे मनुष्यता लेशमात्र नहीं है. यदि लाश को छोड़कर चला जाता हूं तो लोग मुझ पर थूकेंगे नहीं.

-अपनों से कभी झूठ बोला जाता है. आप सच सच बताइये.

उन्होंने इधर उधर देखा. जब उन्हें विश्वास हो गया कि हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं है तो वे बोले-हकीकत यह है कि मृतक मेरा विरोधी है. मैं उसे छोड़कर इसलिए नहीं जा रहा हूं कि वह पुनः जीवित न हो जाये. यदि वह जिंदा हो गया तो मेरा बखिया उघेड़ देगा. इसलिए उसे राख में बदले बिना यहां से मैं हट नहीं सकता.

इधर हरिश्चन्द्र अपने कर्तव्य का पालन सहजता पूर्वक रहे थे. उधर एक दुर्घटना यह घट गई. रोहित को सांप ने डस लिया. उसे चिकित्सकों के पास दिखाया गया पर वे ठीक न कर सके. चिकित्सकों को अलग से फीस नहीं मिली होगी. चिकित्सक वेतन पाते हैं पर उन्हें फीस न मिले तो रोगी को बिना टिकट स्वर्ग की सैर करा देते हैं. रोहित का प्राण नहीं बचे तो तारा रोती पीटती उसे मरघट लायी. इसके लिए पाठकों से अनुरोध है कि वे तारा के दुख से द्रवित होकर आंसुओं की नदी न बहा डालें क्योंकि यह नाटक है. हकीकत नहीं. नाटक फिल्म और प्रेमपत्र सत्य पर आधारित नहीं होते. फिल्म में गरीब की भूमिका निभाने वाला पात्र वास्तविक जीवन में करोड़पति होता है. मरियल अभिनेता दस-बीस गुण्डों की धुलाई एक साथ कर देता है. साध्वी-पतिव्रता दिखने वाली अभिनेत्री के पांच-पांच प्रेमी होते हैं.

तारा ने जैसे ही रोहित का अग्नि संस्कार करने का विचार किया वैसे ही हरिश्चन्द्र दौड़ कर आये. डपट कर बोले-ऐ स्त्री,तुम कौन हो यह किसका लड़का है.

तारा ने कहा-आप कितने निष्ठुर हैं. अपनी पत्नी और बच्चे को भी भूल गये.

-कैसी पत्नी,कैसा बच्चा. न तो मैं किसी को पहचानता हूं न पारिवारिक सम्बन्धों पर मेरा विश्वास है. कर पटाये बिना मैं दाह संस्कार करने ही न दूंगा.

-भांग तो नहीं छान लिए हैं. लोग परिवार के लिए दुनिया भर की बेईमानी करते हैं पर आप ईमानदारी दिखा रहे हैं. लानत है ऐसे पति पर. . . ।

पत्नी को नाराज देखकर हरिश्चन्द्र को हकीकत पर उतरना पड़ा. बोले- तुम समझती क्यों नहीं. पल-पल में मुंह फूला लेती हो. मैं अपने परिवार के लिए ही तो दंद फंद कर रहा हूं. बस,कुछ क्षण धैर्य रखो फिर इस संसार में हम लोग ही पूज्य होगे.

रोहित जो मरने का ढोंग करते उकता गया था,बोला-पिता जी ड्रामा जल्दी खत्म कीजिये. परीक्षा देने का समय आ गया है. पढ़ाई बिलकुल नहीं हुई है. उत्तीर्ण कैसे होऊंगा !

हरिश्चंद्र ने कहा - तुम उसकी चिंता बिल्कुल मत करो क्योंकि जनरल प्रमोशन दे दिया गया है.

- क्या, सच ?

- हां, आखिर तूने सच बोलने के लिए मजबूर कर ही दिया.

हमारी सरकार बड़ी उदार है. वह अनुत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थियों को भी उत्तीर्ण कर देती है. परीक्षा बोर्ड की उपयोगिता समाप्त हो गयी है. इसलिए उसे भंग कर देना चाहिए.

उनका नाटक पुनः प्रारंभ हुआ. तारा ने आंसू गिराते हुए कहा- स्वामी मैं कर पटाने के लिए रुपए कहां से लाऊं ?

हरिश्चन्द्र ने फटकारा - चोरी करो,डांका डालो पर कर तो पटाना ही पड़ेगा. तुम्हारे लिए नियम बदल देता हूं तो दुनियां क्या कहेगी.

- आप मुझ पर नहीं तो कम से कम अपने बच्चे पर तो रहम खाइये. उसका दाहकर्म तो होने दीजिए.

हरिश्चन्द्र आग के शोले बन गये - तुम मुझे सत्यपथ से डिगाने आयी हो. बेईमानी बनाकर मुझ पर कलंक लगाना चाहती हो. हट जाओ सामने से वरना मार डालूंगा.

हरिश्चन्द्र जैसे ही तारा को मारने दौड़े कि विश्वामित्र धड़ाम से कूदे. बोले - बस करना यार,तुम्हारी इच्छा तो पूर्ण हो गई. तुम्हारे यश का डंका सर्वत्र बज रहा है. लोग तुम्हारी जय- जयकार रहे हैं.

हरिश्चन्द्र प्रसन्नता के मारे उछल पड़े. उन्होंने पूछा- क्या सच ?क्या मैं सत्यवादी और ईमानदार मान लिया गया ?

- और नहीं तो क्या ? दूरदर्शन,आकाशवाणी और समाचार पत्रों के द्वारा तुम्हारे यश का प्रचार हो चुका है. अब अपना विभाग सम्हालो और मौज करो .

हरिश्चन्द्र ने अपना विभाग झटका और पूर्ववत मंत्री बन गये.

श्रोताओं, मै तुम्हें एक कहानी सुनाऊंगा. तुम्हारी इच्छा सुनने की नहीं तो भी तुम्हारे कान में जबरदस्ती उड़ेल दूंगा. जबरदस्ती का जमाना है. जब भाषावादी क्षेत्रीयता की और जातिवादी लड़ाइयां अनिच्छा से लड़ रहे हैं तो मेरी कहानी भी सुननी पड़ेगी.

तो परम्परानुसार सर्वप्रथम गणेशजी को प्रणाम कर कहानी शुरु करता हूं. गणेशजी दूसरे देवताओं को ठगकर याने उनके अधिकार छीनकर प्रथम पूज्य बने थे वैसे ही दूसरी की लिखी कहानी तुम्हें सुनाकर सर्वश्रेष्ठ कहानीकार घोषित होना चाहता हूं . साहित्य की यही नियति है कि मुर्गी मिहनत करती है और अंडे फकीर खाता है. नाटककार पर्दे की पीछे दुबका रहता है तो कलाकार स्टेज पर वाहवाही लूटते हैं. तुलसीबाबा कथावाचकों के समक्ष कब नतमस्तक नहीं हुए.

मैं नतमस्तक हूं अकाल के आगे जो बिना बुलाये मेहमान बन जाता है. इस अतिथि का पदार्पण नहीं होता तो ग्रामीणों को नगर भ्रमण करने का मौका नहीं मिलता. सरकार को लोगों को सहायता देने की घोषणा करने का सुअवसर प्राप्त नहीं होता. वैसे वह उस समय भी सहायता करने की घोषणा करती है जब लोग दंगे में मर जाते हैं. पहले से ही सुरक्षात्मक कदम उठा देगी तो दयालु कैसे कहलायेगी ! लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. राज्य शासन ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिये. उसने अकालग्रस्त क्षेत्र को सहायता देने की बात किसी को नहीं बताया. यहां तक कि विरोधी दल को भी इसका पता नहीं चला. वैसे विरोधी दल को कुछ मालूम भी नहीं रहता. उसके सदस्य की नीलामी हो जाने के बाद ही उसे ज्ञात होता है तब उसका सिर्फ एक काम बच जाता है - सत्ता पक्ष का विरोध करने का । विरोधपक्ष की परिभाषा में ही यह लिखा है कि वह सरकार की गलत नीतियों की ही नहीं वरन अच्छी नीतियों का भी विरोध करें.

नाजुक स्थिति को सुधारने के लिए तत्काल कार्यवाही करनी थी इसलिए रात को विधानसभा सत्र लगाया गया. सत्तापक्ष के सारे सदस्य धड़ाधड़ आ गये. एक मंत्री ने जुए की जीतती बाजी छोड़ दी. चार सदस्यों ने फिल्म आधी छोंड़ दी. पांच सदस्य बार रुम से सीधे यहीं दौड़े क्योंकि अकालग्रस्त क्षेत्र को तत्काल सहायता पहुंचाना था.

यद्यपि कागजी घोड़े नहीं दौड़ने थे,ठोस कार्य होना था फिर भी मुख्य सचिव, उपसचिवों को गुप्त रुप से बुला लिया गया. उन्हें सख्त आदेश दिया गया कि किसी सदस्य को निंद्रादेवी अपनी आलिंगन में लेती है तो बेमौसम पानी बरसा कर उन्हें जगा दें ताकि चलते कार्य में बाधा उपस्थित न हो क्योंकि अकालग्रस्त क्षेत्र को तत्काल सहायता पहुंचाना था.

उस रात बिजली बंद थी. मोमबत्तियां लालटेन खरीदने का वक्त नहीं था इसलिए कुर्सियों को जला कर रोशनी की गई. वैसे कई सदस्य चड्डी बनियान के सिवा बाकी कपड़ों को जलाकर सभा की कार्यवाही जल्दी निपटाने उत्सुक थे क्योंकि अकालग्रस्त क्षेत्र को तत्काल सहायता पहुंचाना था.

सभा की कार्यवाही प्रारंभ हुई. अध्यक्ष को औपचारिकता पूरा करने का अवसर नहीं मिला. यहां तक कि मुख्यमंत्री भी बिना भूमिका बांधे कहने लगे - मित्रों आप लोगों को बताने की आवश्यकता नहीं कि भंयकर दुर्भिक्ष पड़ा है. लोग त्राहि त्राहि कर रहे हैं. सुनने में यहां तक आया है कि रोटियां बनाने के लिए घास भी नहीं मिल रही है इसलिए. . . . ।

चन्द्रभान ने बीच में छलांग लगायी - महोदय, मुझे लोगों के साथ सहानुभूति है लेकिन दो तिहाई सदस्य सहायता देना चाहते हैं कि नहीं इसके लिए मतदान तो हो जाय.

मुख्यमंत्री ने उनका गला दबाया -मैं जानता हूं कि तुम मेरी कुर्सी पर बैठना चाहते हो. इसके लिए षड़यंत्र भी रच रहे हो लेकिन इस वक्त तो टांग मत अड़ाओ.

चन्द्रभान चुप हो गये. मुख्यमंत्री फिर बोले - तो मेरा विचार है कि लोगों के पास चांवल, दाल, गेहूं , तेल यानि आवश्यक वस्तुएं जल्दी भेजी जाये. . . . . ।

प्रतापनारायण जिनका मुंह बहुत देर से बोलने के लिए खुजला रहा था ने मुंह मारा - मैं ये नहीं कहता कि लोग तड़प तड़प कर असार संसार त्याग दें पर यह भी तो पता होना चाहिए कि वे किसके समर्थक हैं. अगर विरोधियों के समर्थक हुए तो व्यर्थ खर्च करने से क्या लाभ ?

मुख्यमंत्री ने उनकी भी धुनाई की - शटअप, यही तुम्हारी शराफत है ! तुम्हारे जैसों के कारण ही सत्तापक्ष बदनाम होता है. कौन किसका है अभी देखने का समय नहीं है.

अन्य सदस्य चन्द्रप्रताप और प्रतापनारायण को धिक्कारने लगे. रामशरण ने कहा - मुख्यमंत्री जी ठीक कह रहे हैं. तुम दोनों ऐसे ही उटपुटांग वक्तव्य देते हो और सम्हालना हमें पड़ता है.

यह सच है कि ये दोनों हमेशा समाज विरोधी हरकतें करते हैं. पर उनका दल उबार ही लेता है अभी भी उन्होंने गलत बयान दिये हैं पर सुनने को मिलेगा कि चन्द्रप्रताप और प्रतापनारायण लोगों की दयनीय स्थिति का समाचार सुनकर रो पड़े.

मेरे साथ भी इसी प्रकार का उल्टा नियम लागू है. जिसे मैं कहानी कह रहा हूं वह हकीकत है. ऐसा भी हो सकता है कि कहानी मैंने शुरु की पर समाप्त कोई दूसरा करे. श्रोता भी सोच रहे होंगे कि विरोधी दल के बिना विधानसभा का सत्र कैसे लग गया. लो भाई, तुम्हारी बात मान लेता हूं- विरोधी आ ही गये. वे एक साथ दरवाजे से नहीं घुस सके तो खिड़कियों से अंदर पहुंचे. सबसे पहले उनने सरकार मुर्दाबाद के नारे लगाये. मुख्यमंत्री के पुतला जलाने का अवसर नहीं मिला तो संसदीय गाली का प्रयोग कर उनका दिल ही जलाया. इस पर अध्यक्ष ने आक्षेप किया तो विरोधी नेता ने कहा - हमें स्पष्ट रुप में बताया जाये कि रात में ही सत्र क्यों लगाया गया. इसकी सूचना हमें क्यों नहीं दी गई ?क्या जनता का दुख हमारा दुख नहीं है ?

मुख्यमंत्री ने लिखित उत्तर दिया- कार्यवाही तत्काल करनी थी. हमारे पास इतना समय नहीं था कि सुबह का इंतजार करते या तुम्हें सूचना देते.

विरोधी दल नाराज हो गया. वह वाक आउट कर गया. वह उस वक्त भी वाक आउट कर जाता है जब जनता के हित में प्रस्ताव रखा जाता है लेकिन इस समय वह लोगों का हित करने को कटिबद्ध था. वह लौट कर आया. जल्दी आया और कहा - बेमतलब देरी की जा रही है ! लोगों के ऊपर क्या बीत रही है किसी को पता है ! अगर सरकार अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकती तो इस्तीफा दे ।

सत्तापक्ष ने दुलत्ती लगायी - तुम्हें तो बस आलोचना करने का बहाना मिलना चाहिए. तुम्हारे कहने से इस्तीफा क्यों दे !सत्ता जनता ने सौंपी है इसलिए उसकी जल्दी सहायता करने हम खुद चिंतित हैं.

- खाक चिंतित हो ! लोग कितने दिनों से भूखे हैं. कमजोरी के कारण उन्हें बीमारियां तो नहीं लग गयीं. अगर लग गयी तो कौन सी दवाइयां देनी पड़ेगी इसके बारे में कुछ मालूम है ?

इस प्रश्न का सरकार के पास कोई जवाब नहीं था इसलिए तुरंत सात सदस्यों की एक कमेटी गठित की गई . जिसमें दो मंत्री, दो विरोधी, और तीन अधिकारी नियुक्त हुए . वे अकालग्रस्त क्षेत्र में गये और सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी एकत्रित कर लौट आये. ऐसे ही तथ्य लाने के वे आदि थे. एक बार भंयकर बाढ़ आयी. वहां की स्थिति का वे अवलोकन कर रहे थे कि एक आदमी डूबता हुआ दिखा. अधिकारियों को उसके ऊपर दया आयी तो उनने कहा - इसे कोई बचा लेता तो कितना अच्छा होता ?

विरोधियों ने कहा - बड़े उपकारी हो तो तुम्हीं बचा लो न !

मंत्रियों ने झगड़ा शांत किया - आपस में क्यों लड़ते हो ?कोई जिये या मरे इससे हमें क्या ! हम तो बस जानकारी एकत्रित करने आये हैं.

और उनने आदमी को मरने दिया पर कागजात सुरक्षित बचा कर ले आये. इस बार वे प्रमाण देने के लिएं चित्र भी खींच कर लाये थे तथा दुखी स्वर में बताया कि वहां की गंभीर स्थिति का वर्णन करने के लिए हमारे पास वाणी नहीं है लेकिन जल्दी सहायता नहीं पहुंची तो अनर्थ हो जायेगा. . . . ।

सत्ता और विरोध पक्ष की आवाज एक साथ निकली - तो यहां देरी कौन कर रहा है. हम भी तो यही चाहते हैं कि वहां की स्थिति सम्हालकर दूसरा काम करें.

सभा का कार्य सम्पन्न हुआ. सदस्यों ने पारित प्रस्ताव पर हस्ताक्षर भी नहीं किया. उनने कहा कि इसके कारण जेल जाने का दण्ड मिलेगा तो सहर्ष स्वीकार कर लेंगे लेकिन किसी भी स्थिति में समय नहीं गंवाना है. वाहनों में खाद्यान्न लदना शुरु हो गया. आधा कार्य हो चुका कि विरोध पक्ष की पैनी आंखों ने देखा कि सामान अत्यंत घटिया है. उसने तुरंत अपना कर्तव्य निभाया- ऐसी सरकार को धिक्कार है जो जीवन देने के नाम पर जहर खिलाने उतारु है. चांवल में कीड़े गेंहू में कंकड़ तो तेल से मिट्टी तेल की बू आ रही है. लोग इनके सेवन करेंगे तो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा.

समान तुरंत बदला गया. स्वास्थ्य वर्धक तथा अच्छी वस्तुएं वाहनों पर लादी गई. भोजन पकाने में देरी होती इसलिए सेव, अंगूर, पेड़े रसगुल्ले भी रख लिए गये. वाहन रवाना होने वाले थे कि विरोध पक्ष ने कहा - हमें किसी पर विश्वास नहीं. बीच रास्ते में माल उतार लिये गये या डाकूओं ने लूट लिया तो मिहनत बेकार चली जायेगी. इसलिए समानों को सुरक्षित पहुंचाने के लिए हम भी साथ जायेंगे.

उनकी चालाकी को सत्तापक्ष ने ताड़ लिया. खाद्यमंत्री ने मुख्यमंत्री के कान में कहा - सर , दाल में काला नजर आ रहा है. ये अपनी खिचड़ी पकाने की सोच रहे हैं. देखिये न , सामान तो हम भेज रहे हैं लेकिन हमारे दुश्मन ये प्रचार कर सम्पूर्ण यश लूट लेंगे कि खाद्यान्न तो हम लाये हैं. अतः हमें साथ चलना होगा यही नहीं अपने हाथ से बांटेगे भी. . . ।

खाद्यन्न के साथ दोनों दल हो लिए. लो साहब, मैं वर्णन भी नहीं कर पा रहा पर वे अकालग्रस्त क्षेत्र मे पहुंच गये . सत्तापक्ष ने ऊंची स्वर में आवाज लगायी -भाइयों, हम तुम्हारी आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु लाये हैं. इसके लिए भारी मुसीबतें उठानी पड़ी पर कोई गम नहीं. तुम्हें सुख सुविधा देना हमारा कर्तव्य है. आओ, और अपना हिस्सा ले जाओ .

विरोध पक्ष भी पीछे न रहा. उसने भी ऊंची आवाज में चिल्लाया - दुखी मित्रों, सत्तापक्ष झूठा है. उसकी बातों पर विश्वास मत करो क्योंकि खाद्यान्न तो हम लाये हैं. आओ जल्दी आओ और अपने अधिकार की वस्तुएं ले जाओ. हम लूटने तैयार हैं.

इधर ये लोगों को आमंत्रित कर रहे थे पर दूसरी ओर से आदमी तो क्या उनकी आवाज तक नहीं आ रही थी. प्रतीक्षा करते बहुत देर हो गई तो उन्हें बहुत गुस्सा आया. सत्तापक्ष ने चिड़चिड़ाकर कहा - अजीब तमाशा है. वैसे तो मांगे पूरी कराने अनशन, हड़ताल और प्रदर्शन करते हैं पर जब स्वयं मदद देने आये हैं तो उनकी सूरत तक नहीं दीख रही. कुछ भी हो जब सामान लाये हैं तो सौंपकर जायेंगे.

विरोध पक्ष भी भन्नाया - देखो इन घमन्डियों को, सरकार इनकी नहीं सुनती तो हमारी शरण में गिरते हैं लेकिन स्वयं कष्ट हरने आये है तो इनके मुंह सिल गये हैं. जवाब तक नहीं देते. तो हमारा भी प्रण है कि लायी हुई वस्तुओं को उनके मुंह में ठूंस देंगे.

कहानी रोककर बेताल ने विक्रमार्क से पूछा- राजन, तुम इस ध्रुव सत्य से परिचित हो कि कुंए के पास प्यासे को ही जाना पड़ता है लेकिन इस बार सत्ता और विरोध पक्ष पुराने सिद्धांतों की अवहेलना कर सहायता देने स्वयं पधारे हैं तो लोग उनके पास क्यों नहीं आ रहे है ! उन्हें तो खाद्य वस्तुओं पर टूट पड़ना था ?

विक्रमार्क शव को कंधे पर लादे चलता ही रहा क्योंकि वह शव से ही अतिशय प्रेम करता था. वह नहीं बोला तो बेताल ने पुनः कहा - तुम समय बर्बाद कर रहे हो. मैं लास्ट वर्निंग देता हूं कि दस के गिनते तक तुमने उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारा सिर टुकड़े - टुकड़े होकर बिखर जायेगा.

विक्रमार्क ठठाकर हंस पड़ा. बोला -बेताल, तुम बहुत जल्दी नाराज मत हो जाया करो. सोचो, भला मैं मर गया तो शासन कौन करेगा ! और अकालग्रस्त क्षेत्र के लोगो के सम्बंध में पूछते हो तो वे सहायता लेने आते ही कैसे, वे भी तो तुम्हारे समान लाश बन चुके थे !

नारद जी वैष्णव तंत्र लिख चुके तो उसे प्रकाशित कराने की समस्या आयी. उन्होंने प्रकाशकों के नाम विनम्र शब्दों में कई रजिस्टर्ड पत्र लिखे लेकिन पत्र कि स कूड़ेदानी में फिके पता ही नहीं चला. जब घर बैठे काम नहीं बना तो वे ब्रह्मा के पास दौड़े . बोले - आप बुजुर्ग हैं. प्रकाशकों से जान पहचान होगी ही. एप्रोच मार कर मेरी एक पुस्तक तो छपवा दीजिए.

ब्रह्मा बोले - बेटे , तुम तो रोगी के पास चिकित्सा कराने आये हो प्रकाशकों से सम्पर्क स्थापित करते - करते मेरे बाल पक गये. किसी ने घास नहीं डाली. वेद आज तक अप्रकाशित पड़े हैं. उन्हें जीवित रखने के लिए शिष्यों को कंठस्थ करा रहा हूं.

- लेकिन डैडी, अपना तो कोई चेला नहीं है जो आपके कार्यक्रम का अनुसरण हो. मेरी रचनाएं तो बेमौत मर जायेंगी.

- यदि ऐसा है तो प्रकाशकों से स्वयं मिल लो. लेकिन याद रखना उनकी तुलना वनैले जानवरों से की गई है. जो हाथ तो नहीं आते ऊपर से आहत कर देते हैं.

नारद ने ब्रह्मा के चरण स्पर्श किये. आर्शीवाद प्राप्त कर वहां से विदा हुए. रास्ते में कठिनाईयों ने उस पर धावा बोला. फिर भी वे संघर्ष करते हुए प्रकाशक गोपीलाल के पास पहुंचे. उस समय प्रकाशक महोदय अपने मित्र मनोहर के सामने अपने मुंह मियां मिठ्ठू बन रहे थे -हमने कई असहाय और उपेक्षित साहित्यकारों को अंधेरे उजाले में लाया. आज जो राकेश शर्मा से भी ऊंची उड़ानें भर रहे हैं. इनके मूल में हम है.

मनोहर ने पूछा - लेकिन इसके संबंध में मुझे किसी ने नहीं बताया.

अब गोपीलाल मछली की गति पाने को हुए. बचने के लिए उन्होंने नारद की ओर इंगित करते हुए कहा - प्रत्यक्षं किं प्रमाणं. आपके पास जो खड़ा है उसे ही पूछ लीजिए .

मनोहर ने नारद से पूछ ही लिया - क्यों जी, गोपीलाल सच कह रहे हैं.

नारद के लिए तुरंत एक ओर कुंआ दूसरी ओर खाई खुद गयी. यदि हां कहते तो पुस्तक नहीं छपी थी. और नहीं कहते तो गोपीलाल के नाराज होने का भय था.

प्रकाशक को सत्यवादी हरिश्चंद्र प्रमाणित कर अपना उल्लू सीधा करना था. उसने कहा- गोपीलाल जी ने मेरी नौ पुस्तकें छापी है. उनमें से एक विश्वविद्यालय में चल रही है.

- कुछ मुद्राराक्षस भी दिये हैं. . . ?

- जी हां, तभी तो मेरे बालबच्चे पल रहे हैं.

इतने में मनोहर के घर से बुलावा आ गया. वे चले गये. नारद ने उपयुक्त अवसर देखा. पाण्डुलिपि प्रकाशक के सामने रख दी. प्रकाशक ने पूछा- यह क्या है ?

नारद ने स्पष्ट किया - अप्रकाशित रचनाओं की पाण्डुलिपि

- दुनिया में एक तुम ही लेखक हो जो तुम्हें ही छापता रहूं.

- आप गलत कह रहे हैं, मैं तो अभी तक अप्रकाशित हूं.

- इतने दिनों तक नेता धोखेबाज और मक्कार रहे. अब उनके श्रेणी में भी आ गये.

- आपके प्रति मेरी धारण ऐसी नहीं है.

- झूठा कहीं का. कुछ समय पूर्व नौ पुस्तकें प्रकाशित होने की बात कह अब उसे ही काट रहो हो. ऐसे में तुम पर कौन विश्वास करेगा?

- वो तो आपको सच्चा व्यक्ति साबित करने के लिए मैं झूठा बना था.

- याने तुमने विष्णु बनकर मुझ गजेन्द्र को उबार लिया. जब तुम दूसरे का उद्धार कर सकते हो तो मुझसे सहायता मांगने की क्या आवश्यकता ?

प्रकाशक की दुलत्ती से नारद जरा भी विचलित नहीं हुए. क्योंकि दूध देने वाली गाय की लात भी मीठी होती है. बोले - बहुत भरोसा लेकर आया था इसे पढ़कर तो देख लीजिये !

प्रकाशक ने दो तीन पत्ते उलटकर देखे. बोले - वाह, तुम तो क्रांतिकारी लगते हो. रचनाओं के माध्यम से अपना आक्रोश जाहिर किया है. . . . ।

नारद को आशा बंधी. पूछा- तो मेरा काम हो जायेगा.

प्रकाशक ने गुर्रा कर कहा - मैं रेवड़िया नहीं बांट रहा हूं. यदि तुम्हारे जैसे की पुस्तकें छापता रहूं तो सुदामा बन जाऊंगा.

अब नारद ने व्यवसायिक नीति चलायी. बोले - जितनी भी आमदनी होगी, आप रख लीजिएगा. मुझे रायल्टी भी नहीं चाहिए.

- जब पैसे वाले बनते हो तो छपाई के पैसे दे दो. पूरा लाभ तुम ही कमा लेना.

- यही तो रोना है कि मैं धनवान नहीं हूं.

- तो साहित्य के झमेले में क्यों पड़े ?मालूम नहीं कि बीड़ी पीने वाले को माचिस भी रखनी चाहिए.

- कुछ तो दया कीजिए.

-छोड़ों जी, गर्ज टल जाने पर कहते फिरोगे कि मैंने प्रकाशक को अच्छा उल्लू बनाया. तुम लोग जिस पत्तल पर खाते हो उसे ही छेद करते हो.

- मैं कृतध्न नहीं हूं. कुछ तो रास्ता बताइये.

- अंधे हो जो दिख नहीं रहा कि दरवाजा खुला है पीछे मुड़ो और नाक की सीध में चले जाओ .

नारद हर चौकी पर हार चुके थे. उन्होंने पाण्डुलिपि संभाली और वापस हुए. इसी तरह कई प्रकाशकों के चरणों पर मत्था टेके लेकिन सबने इंकार दिया. वे चिंतामग्न दर - दर भटक रहे थे कि एक पत्रकार से मुलाकांत हो गई. उसने कहा - प्यारे, चिंता करते करते चिता की भेंट चढ़ जाओगे. तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं होगी. मेरी सुनो - राजा शीलनिधि की पुत्री विश्वमोहनी का स्वयंवर होने वाला है. यदि उससे शादी हो गई तो तुम मुफ्त में मालामाल हो जाओगे फिर किसी के सामने भीखरी बनना नही पड़ेगा.

पत्रकार की सलाह ने संजीवनी का काम किया. नारद विद्युत गति से विष्णु के पास पहुंचे. विष्णु ने पूछा- बहुत दिनों के बाद आज आये हो. कोई स्पेशल न्यूज है क्या ?

नारद बोले - नहीं,मैंने आपकी बड़ी सेवा की है मैं उसके बदले सहायता मांगने आया हूं.

- कहो. . . ।

- मैं विवाह करना चाहता हूं लेकिन न सूट है और न संवरने के लिए कोई सामान.

- तो फिक्र क्यों करते हो. मैं इंतजाम कर देता हूं .

विष्णु ने नारद को एक सूटकेश पकड़ाया और कहा -इसके अंदर ऐसी ऐसी वस्तुएं है जिनके उपयोग से तुम्हारे व्यक्तिव में चार चांद लग जायेगे.

नारद खुशी से झूम उठे. उन्होंने सूटकेश उठाया और विष्णु का गुणगान करते हुए वहां से लौटे. जब स्वयंवर की तिथि आयी तो विष्णु का दिया सूट - बूट डंटाया और शीलनिधि के दरबार में उपस्थित हुए. वे कुर्सी पर ठाठ से जम गये. वहां और भी लोग थे. वे उन्हें देखकर मुस्कराने लगे. एक ने पूछा- कोई बता सकता है कि विश्वमोहनी किसके गले माला डालेगी ?

दूसरे ने कहा - सबसे अधिक भाग्यशाली नारद साहब ही लगते हैं. देखो न, कैसे सजधज कर आये हैं.

तीसरे ने हामी भरी - हां यार, तुम्हारी भविष्यवाणी सत्य उतरेगी.

इतने में विश्वमोहनी माला लेकर आयी. नारद उचक कर अपने को दिखाने लगे. विश्वमोहनी उसके पास गयी और मुंह बिचकाकर आगे बढ़ी कि नारद ने पूछा - जब मो सम पुरुष न तो सम नारी फिर मेरा तिरस्कार क्यों कर रही हो ?

- तुमसे शादी करके क्या अपना जीवन बर्बाद कर लूं.

- देखते नहीं, कीमती सूट पहना हूं.

- यह तो दूसरे का दिया हुआ है जब कपड़े नहीं सिलवा सकते तो मुझे खिलाओगे क्या ?

नारद ने पैतरा बदला. कहा - मेरी गरीबी से क्या मतलब ! तुम्हें खूबसूरत पति चाहिए. देखो भला मैं कितना सुन्दर हूं.

- हां- हां, कामदेव भी लजा जायेगा. पहले अपना मुंह दर्पण में तो देख लो. बन्दर जैसे दिख रहे हो.

नारद ने दर्पण में मुंह देखा तो स्वयं से घृणा करने लगे. वे अपने पक्ष में तर्क देते कि इसके पहले ही विश्वमोहनी ने विष्णु के गले में वर माला डाल दी. नारद विष्णु के पास गये. रोष भरे शब्दों में बोले -जब आपको शादी करनी थी तो मुझे धोखे में क्यों रखा ?यह तो सरासर बेईमानी है.

विष्णु ने कहा - तुम तो संत हो . तुम्हें घर गृहस्थी के चक्कर में पड़ने का विचार भी नहीं करना चाहिए.

इतना कह विष्णु विश्वमोहनी को लेकर चले गये. एक आदमी ने नारद से कहा - आप बुद्धू है इसलिए नहीं जान पाये कि लक्ष्मी शासक के पास रहती है.

नारद कुछ नहीं बोले. चुपचाप खिसकते नजर आये. यद्यपि प्रकाशन के नाम पर उनकी प्रतिष्ठा कौड़ी के भाव बिक चुकी थी लेकिन संघर्ष के पथ से मुंह नहीं मोड़ा. आज भी जो बगल में पाण्डुलिपि दबाये प्रकाशकों के दरवाजे खटखटा रहे हैं , वे नारद ही है.

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दुनिया में भाई भतीजावाद की बीमारी को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है मगर मैं ऐसा हूं कि पारिवारिक संबंध को सुदृढ़ बनाने पर तुला हुआ हूं. कई महानुभावों क ी कड़ी आपत्ति के बावजूद प्रतिष्ठित व्यक्तियों से दादा, चाचा के रिश्ते जोड़ लिए हैं. जब लोग धर्मबहन बनाकर बाद में धर्मपत्नी बनाने से नहीं चूकते तो मेरे भी इस पुनीत कार्य में गहरा राज होगा ही.

जिनका यश - वर्णन करने अभी बैठा हूं. वे पिता के साले याने मेरे मामा हैं. उनसे मामा का सम्बन्ध उसी दिन जुड़ा जिस दिन उन्होंने सरपंच पद संभाला. इससे पहले पोता भी मानना अस्वीकार था. उनके संबंध में फिलहाल एक लेख ही तैयार कर रहा हूं बाद में पाठकों की टिप्पणी देखकर महाकाव्य या उपन्यास लिखूंगा. जब बाल्मीकि ने अपने मित्र दशरथ के पुत्र को लोकनायक सिद्ध करने के लिए एक बड़ी पोथी ही लिख डाली,अपने राज्य को ही स्वराज कहने वाले तथा दूसरों राज्यों को लूटने वाले शिवाजी को इतिहास कारों ने राष्ट्रीय महापुरुष के पद पर विभूषित कर दिया तो अपने प्यारे मामा को राष्ट्रीय स्तर का नहीं तो प्रांतीय स्तर के श्रेष्ठ नेता प्रमाणित करने के लिए उनकी प्रसंशा में चार चांद लगाऊंगा ही.

मंगलाचरण के पश्चात उनके दयालु स्वभाव की चर्चा करना चाहता हूं -वे दीन दुखियों के अनन्य सेवक हैं. एक बार उन्हें सूचना मिली कि शासन निराश्रितों को सहायता बतौर रुपये देने वाला है. उन्होंने अपने ग्राम पंचायत क्षेत्र में असहाय व्यक्ति ढूंढे लेकिन मिले ही नहीं. अंत में सोचा कि मैं पंचों की राय के बिना कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं कर सकता. शिक्षक,  पंचायत सचिव, तथा कोटवार तक वेतन भोगी हैं लेकिन शासन मुझे एक पैसा भी नहीं देता. मुझसे बढ़कर गरीब और दुखी कौन है. फिर क्या था, वे निराश्रितों को बांटने के लिए आये रुपयों से अपनी गरीबी हटाने लगे.

मुख्यमंत्री विधानसभा में दहाड़ते हैं तो मामा जी ग्राम पंचायत भवन में. किसी पंच में इतनी हिम्मत नहीं कि उनके खिलाफ आवाज उठा सके. एक बार कुछ पंचों ने उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखने का दुस्साहस किया. मामा जी ने तत्काल केन्द्रीय नेताओं  के कदमों का अनुशरण किया. जो पंच पैसों के बल पर बिक सकते थे उन्हें उचित मूल्य में खरीदा और जो ऐंठबाज थे उन्हें लठैतों के द्वारा पिटाई दिलाई लेकिन अंत में दो तिहाई मत अर्जित करके ही रहे. जिन पंचों ने उनकी पवित्र आत्मा को ठेस पहुचाई थी उन्हें ऐन - केन प्रकारेण पंच पद से निकलवा दिया. तभी उनकी टेढ़ी हुई भृकुटि सीधी हुई. साम दाम दण्ड भेद के सच्चा पालनकर्त्ता होने के कारण मार्कण्डेय की तरह सरपंच पद पर अमर रहने की प्रबल संभावना है.

पारिवारिक झगड़े हो या जमीन संबंधी झगड़े, उन्हें वे विद्वान न्यायाधीश की तरह सुलझा कर रहते हैं. दो भाई थे. उनके पास १ हेक्टेयर जमीन थी. वे जमीन को आपस में बांटना चाहते थे लेकिन बराबर बंट नहीं पाती थी. वे न्याय कराने मामा जी के पास आये. मामाजी न्यायी तो है ही. उन्होंने तीन तीन हेक्टेयर दोनों भाईयों को दे दी. बाकी जमीन अपने पास रख लिया. भाईयों ने आपत्ति की तो मामा जी ने एक कहानी बतायी- दो बिल्लियां थी. उनके पास कुछ रोटियां थीं. वे भी तुम्हारी तरह बंटवारा चाहती थीं. लेकिन वे ठीक से नहीं बांट सके तो वे एक बंदर के पास पहुंचे. बंदर ने त्रेतायुग का तराजू निकाला और रोटियां तौलने लगा. जिस पलड़े की ओर भार अधिक होता उधर की रोटी वह खा जाता. कभी एक पलड़ा भारी होता तो कभी दूसरा. इसी तरह उसने सभी रोटियां खा ली. बिल्लियां रोती हुई वापस हुई.

कहानी समाप्त कर मामा ने लाल आंखें दिखाते हुए कहा - जब बंदर ने न्याय के नाम पर पूरी रोटियां हजम कर ली फिर मैं मनुष्य हूं . फिर भी दयावश तुम्हें जमीन दे दी. बोलो और कुछ कहना हैं.
मामाजी की जुबान ही कानून है. भागते भूत की लंगोटी ही सही , ऐसा सोचा दोनों भाईयों ने अपनी राह पकड़ ली.

मामाजी श्रमिकों के पक्षपाती हैं. वे उनके हितों का ध्यान बगुलों की तरह रखते हैं. वे मजदूरों के स्वास्थ्य सुधार के लिए उनसे ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्यास्त के बहुत बाद तक काम लेते हैं पर मजदूरी आधी देते हैं. एक दिन मजदूरों ने इसी बात पर हड़ताल कर दी. मामाजी बिगड़े - अगर तुम लोग मेरे खेत में जाना बंद करोगे तो गांव में रहना मुश्किल पड़ जायेगा. दूसरे शहर जाओगे तो किसी न किसी अपराध मे फंसवाकर जिला से निष्कासित करा दूंगा. दूसरे प्रांत जाओगे तो देश निकाला का दण्ड दिलवा दूंगा. दिल्ली तक मेरी पहुंच है. फिर वे समझाने लगे - हमारे जैसे लोगों के घर कमाने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है. विश्वास न हो तो शास्त्र उठा कर पढ़ लो. पैसे वाले कितने दुखी होते हैं,बताने की आवश्यकता नहीं. तुम्हारे आध्यात्मिक विकास के लिए ही कम मजदूरी देता हूं. यदि उचित पारिश्रमिक दूंगा तो तुम लोग आलसी हो जाओगे. बीमारियां जकड़ लेगी इसलिए उपवास रह कर शरीर स्वस्थ रखो.
मजदूरों ने कान पकड़कर गलती के लिए क्षमा मांगी. मामा ने एवमस्तु कर अभयदान दिया.

मामाजी बड़े स्वच्छता प्रेमी हैं. वे अपने घर के कचड़े को पड़ोसी के घर के सामने फिेंकवा देते हैं. एक बार वे तालाब में फैली गंदगी को देखकर चिंता में डूब गये. उन्होंने मछली मारने के लिए तत्काल जाल डलवाया. ग्रामीणों ने विरोध किया तो मामाजी के त्रिनेत्र खुल गये. बोले - जब एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है तो यहां बहुत मछलियां हैं. मछलियों के कारण ही पानी रोगीला हो गया है. लोग उपयोग करेंगे तो बीमार पड़ेंगें इसलिए मछलियों को निकलवा कर तालाब को स्वच्छ रखना मेरा कर्तव्य है.

ग्रामवासियों की बोलती बंद हो गयी. मामाजी ने मछलियों की बिक्री करा दी. आये दिन बैंकों में डकैतियाँ पड़ती है अतः आय के रुपयों को अलीगढ़ी पेटी में सुरक्षित कर दिया.

मामाजी इलाके के शेर हैं तो जनता बकरी. मजाल कि उनसे कोई मुंह लड़ा सके. शासकीय कर्मचारियों को डांटना उनके अधिकार क्षेत्र के अंर्तगत आता है. शिक्षकों के वेतन देयक प्रपत्र पर दस्तखत करना न करना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है. जिस प्रकार लेखकों की रचनाएं फेंक देते हैं उसी प्रकार वे वेतन देयक प्रपत्र की दुर्गति कर देते हैं. शिक्षकों का वेतन कटा देना उनके बांयें हाथ का खेल है. एक शिक्षक मामाजी को नमस्कार नहीं करता था. मामाजी ने अपमान का बदला लेने के लिए शिक्षक के पूरे माह का वेतन ही कटवा दिया. शिक्षक अपने पापकर्म का फल भोग चुका तो अब दिन में तीन बार दण्डवत करता है.

मामूजान बच्चों के प्रति नेहरु जी से भी अधिक स्नेह रखते हैं. उनके भविष्य के प्रति चिंतित हुए तो उन्हें अपने खेतों में काम दे दिया. शिक्षक उनके पास गये. बोले - सभी बच्चों को शिक्षित होना अनिवार्य है अतः आप उन्हें शाला भेजिये.

मामाजी शिक्षकों की बुद्धिहीनता पर हंसे. बोले - जब सभी पढ़ लेंगें तो हल कौन चलायेगा !अन्न कौन पैदा करेगा !मैं बच्चों को अपढ़ रखकर राष्ट्र की उन्नति में योगदान दे रहा हूं. यदि सभी शिक्षित हो गये तो नौकरी दोगे ! जवाब दो !

मामाजी के सुतर्क की बल्लेबाजी से शिक्षक विकेट आउट हो गये. एक बार उन्हें किसी ने बताया कि मंत्री घूंस लेते हैं,फिर क्या था उन्हें घूस लेने की धुन सवार हो गई. बांस का प्रमाण पत्र बनवाने वाले से घूस तो साधारण बैठक बुलाने वाले से घूस लेने लगे. मैंने पुलिस - सरकार और अधिकारियों के भ्रष्टाचारण पर कितने ही कागज खराब किये. लेकिन मामा के काला चिठ्ठा कभी नहीं खोला. उनका विरोध कर रिश्तेदारी थोड़ी ही खत्म कर लूं.

गांव के पास एक नाला बहता है. उनमें बांध बंध जाये तो खेतों की सिंचाई हो सकती है. अकाल में भी धान पक सकता है. बांध निर्माण के लिए शासन से स्वीकृति मिल चुकी थी लेकिन मामा ने यह कह कर काम बंद करा दिया कि बांध फूट गया तो फसल चौपट होगी ही उसके साथ गांव भी बह  जायेगा. सड़क इसलिए नहीं बनने देते कि दुर्घटना होने की खतरा रहता है. इसी प्रकार उनके अथक प्रयासों से क्षेत्र के गांव निरंतर विकास कर रहे हैं. मामाजी के जनहितैषी कार्यों का गुणगान कहां तक करुं. यदि सम्पूर्ण पर्वतों को स्याही बना कर समुद्ररुपी पात्र में घोला जाये. कल्पवृक्ष की विशाल  शाखा लेखनी बने और भूमि रुपी कागज पर सरस्वती निरंतर लिखे तो भी मामाजी के गुणों का वर्णन होना असम्भव है.

मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिकता 29 जुलाई जन्‍म दिवस पर विशेष

29 जुलाई 1880 को बनारस के निकट लमही ग्राम में अजायब राय के घर जन्‍में धनपत राय आठ वर्ष के उम्र में ही अपनी माँ को खो दिया․ पिता ने दूसरा ब्‍याह कर लिया, सौतेली माँ क्‍या होती है इसका कटु अनुभव उन्‍हें बचपन से ही था․ अपनी माँ के याद में धनपत राय तड़प-तड़प कर बड़े हुए․

समाजिक कुरीतियों के प्रति धनपत राय का विद्रोही स्‍वभाव की एक बानगी थी उनका शिवरानी नामक एक विधवा से दूसरा विवाह तब करना जब समाज में विधवा विवाह का विरोध चंहुओर होता था․ विधवा से विवाह कर उन्‍होंने समाज में होने वाली उस क्रांति का संकेत दिया जिसमें सधवा-विधवा का ध्‍यान न रखकर युवक-युवती एक-दूसरे से विवाह के बंधन में बंध जायेंगे․

नबाब राय के नाम से पहले प्रेमचंद कई रचनाएं की जिसमें 1907 में पांच कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन' के नाम से प्रकाशित हुआ जिसमें देशप्रेम की रचनाएं होने के कारण अंग्रेज सरकार ने इसे जब्‍त कर लिया․ 1918 में प्रेमचंद ने ‘असरारे मआविदा' नामक उपन्‍यास लिखा․ प्रेमचंद की पहली हिन्‍दी कहानी ‘पंच परमेश्‍वर' सन्‌ 1916 में प्रकाशित हुई और अंतिम कहानी ‘कफन' सन्‌ 1936 में प्रकाशित हुई․ इस काल को प्रेमचंद युग कहा जाता है यद्यपि सन्‌ 1930 से 1936 ई․ तक का कालखंड़ प्रेमचंद की कहानी कला का उत्‍कर्ष काल है․ किसी अन्‍य कथाकार ने जीवन के इतने व्‍यापक फलक को अपनी कहानियों में नहीं समेटा जितना प्रेमचंद ने․ अपने जीवन काल में प्रेमचंद लगभग 300 कहानियों की रचना की जो ‘मानसरोवर' के आठ खंड़ों में प्रकाशित हुई․ प्रेमचंद की कहानियों में जीवन के यथार्थ का चित्रण एवं मनोवैज्ञानिक विशलेषण किया किया गया है․ प्रेमचंद की कहानियों में सच्‍चाई का नग्‍न रूप देखने को मिलता है․ इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रेमचंद लिखित तीन सौ कहानियों को हदय से पढ़ जाने के बाद कोई भी उच्‍च कोटि का कथाकार बन सकता है․ कथाकार बनने के लिए प्रेमचंद की तीन सौ कहानियों का पाठ्‌यक्रम काफी है․ इस मायने में प्रेमचंद को ‘कहानियों का विश्‍वविद्यालय' कहने में कोई अतिशियोक्‍ति नहीं होगी․ प्रेमचंद की कहानियों में पंच परमेश्‍वर, आत्‍माराम, बूढ़ी काकी, गृहदाह, परीक्षा, नशा, बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुंआ, सवा सेर गेंहू, ईदगाह, शतरंज के खिलाड़ी, कजाकी, माता का हदय, लाटरी, सुजान भगत, पूस की रात और कफन आदि है․ प्रेमचंद के उपन्‍यासों में प्रमुख सेवा सदन, प्रेमाश्रय, निर्मला, प्रतिज्ञा, रंगभूमि, कायाकल्‍प, गबन, कर्मभूमि तथा उनके जीवन का सर्वश्रेष्‍ठ कृति गोदान आदि है․ प्रेमचंद का अंतिम उपन्‍यास ‘मंगलसूत्र' है जो अधूरा रहा जिसके सत्‍तर पृष्‍ठों से ऐसा प्रतीत होता है कि अगर यह उपन्‍यास पूरा किया गया होता तो प्रेमचंद की आत्‍मकथा होता․ 18 जून 1936 को रूस के महान साहित्‍यिकार मैक्‍सिम गोर्की के निधनपर अपने श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद 18 अक्‍टूबर 1936 को प्रेमचंद स्‍वयं इस संसार से विदा हो गए․

आज से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व अपने जीवन का सर्वश्रेष्‍ठ कृति ‘गोदान' की रचना प्रेचंद ने किया जो अपने युग का प्रतिबिम्‍ब ही नहीं अपितू आने वाले युग में होने वाली कांति की भी रूपरेखा प्रस्‍तुत करता है․ प्रेमचंद अपने युग के प्रतिनिधि साहित्‍यकार थे और गोदान उनकी प्रतिनिधि रचना है․ गोदान भारतीय किसानों की सशक्‍त गाथा है․ जहां तक गोदान की प्रांसगिकता का प्रश्‍न है तो भारत आज भी कृषि प्रधान देश है जहां की अधिकांश जनता गांवों में रहती है तथा किसान भारत की रीढ़ है और गोदान किसानों अर्थात ग्रामीण जागृति की कहानी है․ कृषि प्रधान देश भारत की जनता का प्रतिनिधित्‍व होरी करता है और होरी की समस्‍याएं भारत की समस्‍याएं है․ गोदान सम्‍मिलित रूप में भारतीय जन-जीवन को समग्र रूप में प्रस्‍तुत करता है․ प्रेमचंद अपने उपन्‍यास गोदान के माध्‍यम से भारतीय किसान के प्रति न सिर्फ करूणा उत्‍पन्‍न करने में सफल हुए है अपितु किसानों की वर्तमान दशा पर सोचने-विचारने को बाध्‍य भी करते है․ इस दृष्‍टिकोण से गोदान को भारतीय ग्रामीण जीवन का ही नहीं अपितु भारतीय राष्‍द्रीय जीवन की प्रतिनिधि रचना मानी जानी चाहिए जिसकी प्रांसागिकता आज भी उतनी ही है जितनी प्रेमचंद युग में थी․

गोदान में प्रेमचंद ने अपने युग को प्रतिबिम्‍बित करने के साथ-साथ आने वाल युग में होने वाली क्रांति को भी पहचाना है․ प्रेमचंद की दूरदर्शिता एवं संवेदनशीलता ने अगामी युग की आहट को पहचानकर उपन्‍यास में नयी पीढ़ी की विचारधारा और परम्‍परा-विरोधी कार्यों का चित्रण भी प्रस्‍तुत किया है․ गोदान में दो पीढि़यों का संघर्ष पूरी शक्‍ति और सजीवता के साथ अंकित किया गया है․ इस संघर्ष के माध्यम से प्रेमचंद ने उस क्रांति की सुगबुगाहट का संकेत दिया है जिसकी पहचान उनके संवेदनशील कानों को सुनायी देने लगी थी और सजग मस्‍तिष्‍क ने रूपरेखा तैयार कर दिया था․ गोदान भारतीय जीवन के सम्‍पूर्ण स्‍वरूप को अंकित करता है तथा हिन्‍दी की औपन्‍यासिक रचना को प्रतिनिधि महाकाव्‍योपन्‍यास की संज्ञा से विभूषित किया जाए तो निसंदेह वह गोदान' ही है

राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

बात ग़ज़ल की----अंदाज़े बयां श्याम का....

गज़ल दर्दे-दिल की बात बयाँ करने का सबसे माकूल व खुशनुमां अंदाज़ है। इसका शिल्प भी अनूठा है। नज़्म व रुबाइयों से जुदा। इसीलिये विश्व भर में व जन-सामान्य में प्रचलित हुई। हिन्दी काव्य-कला में इस प्रकार के शिल्प की विधा नहीं मिलती। परन्तु हाँ,घनाक्षरी-छंद ( कवित्त ) का शिल्प अवश्य ग़ज़ल की ही पद्धति का शिल्प है जिसमें रदीफ़ व काफिया के ही शब्द-भाव रहते हैं और गैर-रदीफ़ ग़ज़ल के भाव भी, परन्तु मतला नहीं होता। मेरे विचार से शायद कवित्त-छंद, ग़ज़ल का मूल प्रारम्भिक रूप है। उदाहरण देखिये....निम्न घनाक्षरी में “रही” रदीफ़ है एवं शरमा व हरषा...आदि काफिया हैं.....

गाये कोयलिया तोता मैना बतकही करें,

कोंपलें लजाईं कली कली शरमा रही

झूमें नव पल्लव चहक रहे खग वृन्द,

आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषा रही। “ --- डा श्याम गुप्त

इसी प्रकार गैर-रदीफ़ ग़ज़ल का प्रारूप घनाक्षरी देखें --- जिसमें पदांत स्वयं सुजानी ...पुरानी आदि काफिया है।

“थर थर थर थर कांपें सब नारी नर,

आई फिर शीत ऋतु सखि वो सुजानी

सिहरि सिहरि उठे जियरा पखेरू सखि,

उर मांहि उमंगाये प्रीति वो पुरानी

बाल वृद्ध नर नारी बैठे धूप ताप रहे,

धूप भी है कुछ खोई-सोई अलसानी

शीत की लहर तीर भांति तन वेधि रही,

मन उठे प्रीति की वो लहर अजानी।” ---डा श्याम गुप्त

हम लोग हिन्दी फिल्मों के गीत सुनते हुए बड़े हुए हैं जिनमें वाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशन की सुविधा हेतु गज़ल व नज़्म को भी गीत की भांति प्रस्तुत किया जाता रहा है। यथा साहिर लुधियानवी की प्रसिद्द ग़ज़ल ...

संसार से भागे फिरते हो संसार को तुम क्या पाओगे।

इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे|

हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूठा सपना है ,

हम जन्म बिताकर जायेंगे तुम जन्म गवां कर जाओगे।

छंदों व गीतों के साथ-साथ दोहा व अगीत-छंद लिखते हुए व गज़ल सुनते, पढते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उर्दू शे’र भी संक्षिप्तता व सटीक भाव-सम्प्रेषण में दोहे व अगीत की भांति ही है और इसका शिल्प दोहे की भांति ...अतः लिखा जा सकता है, और नज्में तो तुकांत-अतुकांत गीत के भांति ही हैं|

गज़ल मूलतः अरबी भाषा का गीति-काव्य है जो काव्यात्मक अन्त्यानुप्रास युक्त छंद है और अरबी भाषा में कसीदा” अर्थात प्रशस्ति-गान हेतु प्रयोग होता था जो राजा-महाराजाओं के लिए गाये जाते थे एवं असहनीय लंबे-लंबे वर्णन युक्त होते थे जिनमें औरतों औरतों के बारे में गुफ्तगू एक मूल विषय-भाग भी होता था। कसीदा के उसी भाग ताशिब को पृथक करके गज़ल का रूप नाम दिया गया।

गज़ल शब्द अरबी रेगिस्तान में पाए जाने वाले एक छोटे, चंचल पशु हिरण ( या हिरणी, मृग-मृगी ) से लिया गया है जिसे अरबी में ‘ग़ज़ल’ (ghazal या guzal ) कहा जाता है। इसकी चमकदार, भोली-भाली नशीली आँखें, पतली लंबी टांगें, इधर-उधर उछल-उछल कर एक जगह न टिकने वाली, नखरीली चाल के कारण उसकी तुलना अतिशय सौंदर्य के परकीया प्रतिमान वाली स्त्री से की जाती थी जैसे हिन्दी में मृगनयनी। अरबी लोग इसका शिकार बड़े शौक से करते थे। अतः अरब-कला व प्रेम-काव्य में स्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग, दर्द का प्रतिमान गज़ल’ के नाम से प्रचलित हुआ जैसे भारतीय काव्य-गीतों में वीणा-सारंग का पीड़ात्मक भावुक प्रसंग।

शायर फिराक गोरखपुरी के अनुसार जब कोई शिकारी जंगल में हिरन का पीछा करता है और हिरन भागते-भागते झाडी में फंस जाता है और निकल नहीं पाता तब उसके कंठ से दर्द भरी आवाज़ निकलती है उसी करुण आवाज़ को ग़ज़ल कहते हैं इसलिए विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना व स्वर का करुणतम होते जाना ही ग़ज़ल है| यही भारतीय काव्य-गीतों में वीणा-सारंग कथा का सुप्रसिद्ध प्रसंग है। यही गज़ल का अर्थ भी ..अर्थात ‘इश्के-मजाज़ी‘ - आशिक-माशूक वार्ता या प्रेम-गीत, जिनमें मूलतः विरह-वियोग की उच्चतर अभिव्यक्ति होती है|

गज़ल ईरान होती हुई सारे विश्व में फ़ैली और जर्मन इंग्लिश में काफी लोक-प्रिय हुई। यथा.. अमेरिकी अंग्रेज़ी शायर ..आगा शाहिद अली कश्मीरी की एक अंग्रेज़ी गज़ल का नमूना पेश है...

Where are you now? who lies beneath your spell tonight ?             Whom else rapture’s road will you expel to night ?

My rivals for your love, you have invited them all .

This is mere insult , this is no farewell to night .

गज़ल का मूल छंद शे’र या शेअर है। शेर वास्तव में दोहा’ का ही विकसित रूप है जो संक्षिप्तता में तीब्र व सटीक भाव-सम्प्रेषण हेतु सर्वश्रेष्ठ छंद है। आजकल उसके अतुकांत रूप-भाव छंद ..अगीत, नव-अगीत त्रिपदा-अगीत भी प्रचलित हैं| अरबी, तुर्की फारसी में भी इसे ‘दोहा’ ही कहा जाता है अंग्रेज़ी में कसीदा मोनो राइम( quasida mono rhyme)| अतः जो दोहा में सिद्धहस्त है अगीत लिख सकता है वह शे’र भी लिख सकता है..गज़ल भी। शे’रों की मालिका ही गज़ल है। ग़ज़लों के ऐसे संग्रह को जिसमें हर हर्फ से कम से कम एक ग़ज़ल अवश्य हो दीवान कहते हैं|

तुकांतता के अनुसार ग़ज़लें मुअद्दस या मुकफ्फा होती है| मुअद्दस गज़ल में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है इसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं .. यथा ....
“ उनसे मिले तो मीना ओ सागर लिए हुए,
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे आगई
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए।... - (जमील हापुडी)
एवं मुकफ्फा ग़ज़ल में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है इसे ग़ैरमुरद्दफ़ या गैररदीफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं| जैसे

जाने वाले तुझे कब देख सकूं बारे दीगर
रोशनी आँख की बह जायेगी आसूं बनकर
रो रहा था कि तेरे साथ हँसा था बरसों
हँस रहा हूँ कि कोई देख न ले दीदा ए तर”


ग़ज़ल में ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है| जब किसी ग़ज़ल के सभी शेर एक ही भाव को केन्द्र मानकर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं| यदि ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|

वस्तुतः काव्य के मूल भाव के अनुरूप ग़ज़ल में भी तकनीक की अपेक्षा भाव प्रभावोत्पादकता व प्रवाह ही अच्छी ग़ज़ल की पहचान है जिसमें मौलिकता हो। जिससे गीत व कविता ही की भांति पढ़ने वाला समझे कि यह उसके दिल की बातों का वर्णन है। प्रायः सुरुचिपूर्ण व जाने-पहचाने शब्दों का ही प्रयोग हो। क्लिष्ट शब्द प्रवाह, गति, सम्प्रेषणता व काव्यानंद में अवरोध उत्पन्न करते हैं, भाव चाहे जितने उच्च क्यों न हों। छंद चाहे कितना भी सुन्दर हो, कथ्य की अस्पष्टता, तथ्य की अवास्तविकता एवं भाषा-शब्द्क्रम उचित न होने से रचना प्रभावहीन हो जाती है। देखिये एक उदाहरण...प्रसिद्द शेर है...

“मगस को यूं बागों में जाने न दीजिये

महज़ परवाने बर्बाद हो जाएंगे

शेर लाजबाव होते हुए भी उसका अर्थ समझ से परे है। व्याख्या है कि...हे माली! तू मगस( मधुमक्खी ) को बाग़ में न जाने देना, वह रस चूसकर छत्ता बनायेगी, उससे मोम...फिर शमा जलेगी और परवाना बिना वज़ह मारा जाएगा।

इसी प्रकार शब्द-क्रम न रहने से ग़ज़ल में ( हर कविता में ही ) अर्थ-अनर्थ देखिये....

कहाँ खोगई उस की चीखें हवा में

हुआ जो परिंदा ज़िबह ढूँढता है- --- संजय मासूम

कवि कहना चाहता है कि जो पंछी जिबह हुआ वह हवा में अपनी चीखें ढूंढता है, परन्तु लगता ऐसा है कि वह जिबह को ढूंढ रहा हो।

भारत में शायरी व गज़ल फारसी के साथ सूफी-संतों के प्रभाववश प्रचलित हुई जिसके छंद संस्कृत छंदों के समनुरूप होते हैं। फारसी में गज़ल के विषय रूप में सूफी प्रभाव से शब्द इश्के-मजाज़ी के होते हुए भी अर्थ रूप में इश्के हकीकी’ अर्थात ईश्वर-प्रेम, भक्ति, अध्यात्म, दर्शन आदि सम्मिलित होगये। प्रारम्भिक दौर में उर्दू ग़ज़ल में श्रृंगार के संयोग-वियोग दोनों ही पक्षों का वर्णन रहता था बाद में उपदेश,नीति, दर्शन, चिंतन व देश-प्रेम का ज़िक्र आने लगा...

“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में हैं

वक्त आने दे बताएंगे तुझे ऐ आसमाँ

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। - --रामप्रसाद बिस्मिल

फारसी से भारत में उर्दू में आने पर सामयिक राजभाषा के कारण विविध सामयिक विषय व भारतीय प्रतीक व कथ्य आने लगे। उर्दू से हिन्दुस्तानी हिन्दी में आने पर गज़ल में वर्ण्य-विषयों का एक विराट संसार निर्मित हुआ और हर भारतीय भाषा में गज़ल कही जाने लगी। तदपि साकी, मीना ओ सागर व इश्के-मजाज़ी गजल का सदैव ही प्रिय विषय बना रहा। बकौल मिर्जा गालिव.... बनती नहीं है वादा सागर कहे बगैर

यूं तो हिन्दी में ग़ज़ल कबीरदास जी द्वारा भी कही गयी बताई जाती है जिसे कतिपय विद्वानों द्वारा हिन्दी की सर्वप्रथम ग़ज़ल कहा जाता है, यथा....

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?

रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

कबीरा इश्क का मारा, दुई को दूर कर दिल से,

जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सर बोझ भारी क्या ?

परन्तु मेरे विचार से इस ग़ज़ल की भाषा कबीर की भाषा से मेल नहीं खाती। हो सकता है यह प्रक्षिप्त हो एवं कबीर नाम के किसी और गज़लकार ने इसे कहा हो|

वास्तव में तो हिन्दी में गज़ल का प्राम्म्भ आगरा में जन्मे व पले शायर अमीर खुसरो’ (१२-१३ वीं शताब्दी) से हुआ जिसने सबसे पहले इस भाषा को हिन्दवी’ कहा और वही आगे चलकर हिन्दी’ कहलाई। खुसरो अपने ग़ज़लों के मिसरे का पहला भाग फारसी या उर्दू में व दूसरा भाग हिन्दवी में कहते थे। उदाहरणार्थ...

जेहाले मिस्कीं मकुल तगाफुल,

दुराये नैना बनाए बतियाँ

कि ताब--हिजां, दारम--जाँ, लेहु काहे लगाय छतियाँ।”

१७ वीं सदी में उर्दू के पहले शायर ‘वली’ ने भी हिन्दी को अपनाया व देवनागरी लिपि का प्रयोग किया। ..यथा....

सजन सुख सेती खोलो नकाब आहिस्ता-आहिस्ता,

कि ज्यों गुल से निकलता है गुलाव आहिस्ता-आहिस्ता

सदियों तक गज़ल राजा-नबावों के दरबारों में सिर्फ इश्किया मानसिक विचार बनी रही जिसे उच्च कोटि की कला माना जाता रहा। परन्तु १८ वीं सदी में आगरा के नजीर अकबरावादी ने शायरी को सामान्य जन से जोड़ा और १९ वीं सदी के प्रारम्भ में मिर्ज़ा गालिव ने मानवीय जीवन के गीतों से। उदाहरणार्थ.....

जब फागुन रंग झलकते हों, तब देख बहारें होली की

परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की।” - ....... नजीर अकबरावादी तथा....

गालिव बुरा मान जो वाइज़ बुरा कहे ,

ऐसा भी है कोई कि सब अच्छा कहें जिसे | -------गालिव ...

१८ वीं सदी में हिन्दी में गज़ल की पहल में भारतेंदु हरिश्चंद्र, निराला, जयशंकर प्रसाद आदि ने सरोकारों की अभिव्यक्ति व लोक-चेतना के स्वर दिए..यथा निराला ने कहा...

लोक में बंट जाय जो पूंजी तुम्हारे दिल में है

त्रिलोचन, शमशेर, बलबीर सिंह ‘रंग’ ने भी हिन्दी ग़ज़लों को आयाम दिए। परन्तु आधुनिक खड़ी बोली में हिन्दी-गज़ल के प्रारम्भ का श्रेय दुष्यंत कुमार को दिया जाता है जिन्होंने हिन्दी भाषा में गज़लें लिख कर गज़ल के विषय भावों को राजनैतिक, संवेदना, व्यवस्था, सामाजिक चेतना आदि के नए नए आयाम दिए। दुष्यंत कुमार की एक गज़ल देखिये....

दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,

आजकल नेपथ्य में संभावना है।”

वस्तुतः हिन्दी भाषा ने अपने उदारचेता स्वभाववश उर्दू-फारसी के तमाम शब्दों को भी अपने में समाहित किया, अतः आज के अद्यतन समय में हिन्दी कवियों ने भी ग़ज़ल को अपनाया व समृद्ध किया है| हिन्दी गजल के पास अपनी विराट शब्द-संपदा है, मिथक हैं, मुहावरे, बिम्ब, प्रतीक, व रदीफ-काफियेहैं। आज हिन्दी- गजल में पारम्परिक गजल की काव्य-रूढ़ियों से मुक्त होने का प्रयास है तथा नए शिल्प और विषय का उत्तरोत्तर विकास का भी| फलस्वरूप आज ग़ज़ल व हिन्दी ग़ज़ल में विषयों व ग़ज़लकारों का एक विराट रचना संसार है जो प्रकाशित पुस्तकों, पत्रिकाओं, रचनाओं व अंतर्जाल ( इंटरनेट )पर प्रकाशन द्वारा समस्त विश्व में फैला हुआ है तथा जो उर्दू गज़ल, हिन्दी ग़ज़ल, शुद्ध खड़ी-बोली, हिन्दी एवं हिन्दी की सह-बोलियों के शुद्ध व मिश्रित रूपों से समस्त शायरी-विधा व ग़ज़ल को समर्थ व समृद्ध कर रहे है तथा दिन ब दिन ग़ज़ल में गीतिका, नई ग़ज़ल आदि नाम से नए-नए प्रयोग भी हो रहे हैं| मेरे विचार से हिन्दी ग़ज़ल के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि शब्दों को हिन्दी व्याकरण के अनुसार रखा जाए और वैसे ही मात्रा गणना भी हो ताकि ग़ज़ल के शिल्प व कथ्य में तारतम्य रहे क्योंकि उर्दू जुवान का हिन्दी ग़ज़ल पर हावी होना उसके स्वरुप व निखार में बाधक है। उर्दू-बहुल हिन्दी ग़ज़लों में हिन्दी की सौंधी गंध का अभाव रहता है।...हिन्दी ग़ज़ल का उदाहरण देखिये....

साहित्य सत्यं शिवं सुन्दर भाव होना चाहिए ,

साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिए

ललित भाषा ललित कथ्य न सत्य तथ्य परे रहे ,

व्याकरण शुचि शुद्ध सौख्य समर्थ होना चाहिए |.....डा श्याम गुप्त

यदि हिन्दी में घुलमिल गए हिन्दुस्तानी उर्दू शब्दों का प्रयोग हो तो सौन्दर्य व प्रभाव बढ़ सकता है ....देखिये..

वो हारते ही कब हें जो सजदे में झुक लिए

यूं फख्र से जियो यूंही चलती रहे ये ज़िंदगी। ---डा श्यामगुप्त

यह आवश्यक नहीं कि ग़ज़ल उर्दू विधा है तो उर्दू के शब्द अवश्य हों अतः उर्दू के क्लिष्ट व फारसी-शब्द प्रयोग का क्या लाभ जिसे हिन्दी-भाषी तो क्या उर्दू-भाषी भी न समझ पायें ..यथा...

तहज़ीबो तमद्दुन है फ़कत नाम के लिए

गुम होगई शाइस्तगी दुनिया की भीड़ में ----कुँवर कुसुमेश

जब मैंने विभिन्न शायरों की शायरी—गज़लें व नज्में आदि सुनी-पढीं व देखीं विशेषतया गज़ल...जो विविध प्रकार की थीं..बिना काफिया, बिना रदीफ, वज्न आदि का उठना गिरना आदि ...तो मुझे ख्याल आया कि बहरों-नियमों आदि के पीछे भागना व्यर्थ है, बस लय व गति से गाते चलिए, गुनगुनाते चलिए गज़ल बनती चली जायगी, जो कभी मुरद्दस गज़ल होगी या मुसल्सल या हम रदीफ, कभी मुकद्दस गज़ल होगी या कभी मुकफ्फा गज़ल, कुछ फिसलती गज़लें होंगी कुछ भटकती ग़ज़ल| हाँ लय गति यति युक्त गेयता व भाव-सम्प्रेषणयुक्तता तथा सामाजिक-सरोकार युक्त होना चाहिए और आपके पास भाषा, भाव, विषय-ज्ञान व कथ्य-शक्ति होना चाहिए| यह बात गणबद्ध छंदों के लिए भी सच है। तो कुछ शे’र आदि जेहन में यूं चले आये.....

मतला बगैर हो गज़ल, हो रदीफ भी नहीं,

यह तो गज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं

लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंद रस बहे,

वह भी गज़ल है, चाहे कोई काफिया नहीं। “

और गज़लें-----  

ग़ज़ल की ग़ज़ल
शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है।
हो काफिया ही जो नहीं,बेचारी ग़ज़ल होती है।

और भी मतले हों, हुश्ने तारी ग़ज़ल होतीं है ।
हर शेर मतला हो हुश्ने-हजारी ग़ज़ल होती है।
हो बहर में सुरताल लय में प्यारी ग़ज़ल होती है।
सब कुछ हो कायदे में वो संवारी ग़ज़ल होती है।
हो दर्दे दिल की बात मनोहारी ग़ज़ल होती है,
मिलने का करें वायदा मुतदारी ग़ज़ल होती है ।
हो रदीफ़ काफिया नहीं नाकारी ग़ज़ल होती है ,
मतला बगैर हो ग़ज़ल वो मारी ग़ज़ल होती है।
मतला भी मकता भी रदीफ़ काफिया भी हो,
सोची समझ के लिखे के सुधारी ग़ज़ल होती है।
जो वार दूर तक करे वो करारी ग़ज़ल होती है ,
छलनी हो दिल आशिक का शिकारी ग़ज़ल होती है।
हर शेर एक भाव हो वो जारी ग़ज़ल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो वो भारी ग़ज़ल होती है।
मस्ती में कहदें झूम के गुदाज़कारी ग़ज़ल होती है,
उनसे तो जो कुछ भी कहें दिलदारी ग़ज़ल होती है।
तू गाता चल ऐ यार,  कोई कायदा न देख,
कुछ अपना ही अंदाज़ हो खुद्दारी ग़ज़ल होती है।
जो उसकी राह में कहो इकरारी ग़ज़ल होती है,
अंदाज़े बयान हो श्याम का वो न्यारी ग़ज़ल होती है॥

त्रिपदा अगीत ग़ज़ल......

     पागल दिल

क्यों पागल दिल हर पल उलझे ,

जाने क्यों किस जिद में उलझे ;

सुलझे कभी, कभी फिर उलझे।

तरह-तरह से समझा देखा ,

पर दिल है उलझा जाता है ;

क्यों ऐसे पागल से उलझे।

धडकन बढती जाती दिल की,

कहता बातें किस्म किस्म की ;

ज्यों काँटों में आँचल उलझे ।।

                                                                                

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डा श्याम गुप्त, के-३४८, आशियाना लखनऊ

डागी-टेस्ट / प्रमोद यादव

पहले के जमाने में दूसरी-तीसरी कक्षा का विद्यार्थी जब स्कूल से घर लौटता तो माँ पूछती-‘ बेटा, आज स्कूल में क्या पढ़ा ?’

अब की माँ पूछती है- बेटा, मध्यान्ह-भोजन में क्या खाया ?’

पहले माँ कहती थी- ‘ राजा बेटा थक गया होगा...चल खाना खा ले..’

अब माँ कहती है- ‘ राजा बेटा का पेट भरा होगा ..जा..पहले सो जा ’

पहले विद्यार्थी घर लौटते ही कहता था- ‘ माँ ..जोरों की भूख लगी है...’

अब विद्यार्थी घर लौटते ही कहता है- ‘ माँ...जोरों की “दुक्की” लगी है..’

पहले जब दो स्कूली बच्चे आपस में मिलते तो केवल पढाई की ही चर्चा करते.

अब आपस में मिलते हैं तो भोजन के मेनू पर चर्चा करते हैं.

पहले के माता-पिता अपने लाडले के विषय में कुछ इस तरह बातें करते थे- ‘ चुन्नू का अब स्कूल में मन लग गया है ..बिला-नागा , बिना रोये-धोये चला जाता है ‘

अब के मम्मी-पापा कहते हैं- ‘बच्चे का मन मध्याह्न भोजन में लग गया है..अब घर में भी रोज पहले ‘मेनू’ पूछता है..’

पहले की मांएं पूछती थी- ‘ बेटा, मास्टरजी अच्छा पढ़ाते हैं ना ? ‘

अब पूछती हैं- ‘ मास्टरजी खाना अच्छा बनाते हैं ना ?

पहले स्कूल के चपरासी के साथ छात्र एकाएक समय से पूर्व कहीं घर लौट आता तो मांएं ‘धक्’ से रह जातीं कि कहीं उसके लल्ले की तबियत तो नहीं बिगड़ गयी ?

अब लल्ला एकाएक लौटता है तो मांएं समझ जातीं हैं कि आज के मेनू में मरी छिपकली या मेंढक भी शामिल हो गया होगा.

पहले स्कूल छूटने के बाद भी बालक घर न पहुंचता तो अभिभावक उनके सहपाठियों के घर जाकर खोज-खबर लेते.

आज बालक छुट्टी के बाद भी घर नहीं पहुंचता तो माता-पिता सीधे सरकारी अस्पताल पहुँच जाते हैं.

‘तब’ और ‘अब’ में सदैव फर्क होता है.’तब’ को हमेशा पिछड़ापन माना जाता है और ‘अब’ को हमेशा- विकासोन्मुख.

देश के स्कूली इतिहास में ऐसा पहले कभी ना हुआ कि एक साथ २३ बच्चे खेलते-कूदते अचानक काल - कलवित हुए हों .पर पिछले दिनों ऐसा हुआ..दूषित भोजन परोसे जाने से बिहार के स्कूल में बच्चे अकस्मात् मौत के मुंह में समा गए. दुनिया की सबसे बड़ी योजना पर देश भर में हल्ला मचा. सरकार ने एहतियात बरतने बयान दिया कि भविष्य में बच्चों के लिए बने पोषाहारी भोजन का ‘पान’ ( टेस्ट) पहले शिक्षक करेंगे.यह फरमान सुन लाखों शिक्षकों ने इस स्कीम का ही बहिष्कार करने का मन बनाया और सरकार को साफ़ कह दिया कि पढ़ाना उनका काम है –खाना बनाना नहीं.

कल रात टी.वी.न्यूज में सुना कि मध्य प्रदेश के गुरुजनों ने भी भोजन टेस्ट करने से इनकार कर दिया है और मांग की है कि बच्चों से पहले कुत्ते को खिलाया जाए..’डागी-टेस्ट’ के बाद ही भोजन परोसा जाए.

यह सुन मैं हैरान हो गया कि कहीं सरकार ने इनकी बातें मान ली तो इतने कुत्ते लायेंगे कहाँ से ?देश के बारह लाख बासठ हजार स्कूल इस स्कीम से जुड़े हैं तो जाहिर है कि इस हिसाब से इतनी ही संख्या में कुत्तों की जरुरत होगी.चूँकि योजना सरकारी है तो स्पष्ट है कि कुत्तों की खरीद-फरोख्त भी वही करेगी.तब सारे कुत्ते भी सरकारी होंगे.किसी ऐरे-गेरे खुजली वाले देशी कुत्ते से तो ‘टेस्ट’ होगा नहीं ना ही सरकार को यह मान्य होगा. वह तो ले-दे कर रसोइये को बामुश्किल हजार रुपये मासिक देती है,उसी में उसकी जान निकली जाती है तो इतने सारे कुत्तों के लालन-पालन का खर्च कैसे वहन करेगी?

मान लो सरकार ये छूट दे दे कि स्कूल जैसा कुत्ता चाहे रख ले और उसका खर्च मासिक भोजन बजट में एडजेस्ट कर दिया जाए तब भी स्थितियां विचित्र ही होगी. कोई ‘जर्मन शेफर्ड ‘ रख लेगा तो कोई ‘लेब्राडोर’..तो कोई ‘अल्शेशियन’..तब .स्कूल का मासिक बजट तो अकेले कुत्ता ही चट कर जाएगा फिर बच्चे क्या खायेंगे ?गौर करने वाली बात ये भी है कि अभिजात्य वर्ग के ये कुत्ते टेस्ट करना तो दूर , भोजन को सूंघेंगे या नहीं..इसमें भी संदेह है.

कल रात से मैं यही सोच-सोच कर परेशान हूँ और सरकार है कि घोड़े बेच सो रही है.

मेरे पास भी विदेशी नस्ल के दो कुत्ते है.सरकारी कीमत पर इसे ‘दान’ करना चाहता हूँ.

एम.डी.एम.टेस्ट के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित है..साल भर की गारंटी. काम में खरे न उतरे तो पैसा वापस- कुत्ता भी वापस सारे स्कूलों में जब कुत्ते काबिज हो जायेंगे तो बच्चों की बातचीत कुछ यूँ होगी-

स्कूल से लौटे बच्चे से माँ पूछेगी- ‘ इतना थका-थका,उदास-उदास क्यों दिख रहा है लल्ला ? मास्टरजी ने कुछ कह दिया क्या ? ‘

तब बच्चा जवाब देगा- ‘ नहीं माँ ...किसी ने कुछ नहीं कहा ...दरअसल आज हमारे स्कूल के सरकारी कुत्ते की तबियत ख़राब थी तो उसने भोजन टेस्ट करने से इनकार कर दिया....मास्टरजी को बोले तो उसने भी पेट भरे होने का बहाना कर दिया ...इस तरह आज हम सब ‘उपवास’ पर रहे इसलिए थोडा कमजोरी है ..’

तब माँ दौड़कर अपने लखते-जिगर को घर का खाना(बिना टेस्ट वाला) खिलाएगी.

सरकार के फैसले का सबको इंतज़ार है ...मास्टरों को भी... मुझे भी.. और बारह लाख बासठ हजार कुत्तों को भी...

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प्रमोद यादव

दुर्ग,छत्तीसगढ़

मोबाईल- ०९९९३०३९४७५

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स्वाधीनता संग्राम के युग में दक्षिण-भारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

भारत की भाषाओं के अध्ययन के लिए नए प्रतिमानों एवं नई दृष्टि की आवश्यकता है। भारत में बोली जानेवाली भिन्न भाषा-परिवारों की भाषाओं के समान क्रोड के वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता असंदिग्ध है। किसी भी विषय का भेद दृष्टि से अध्ययन करने पर जहाँ हमें अन्तर, असमानताएँ, भिन्नताएँ अधिक दिखाई देती हैं, उसी विषय का अभेद दृष्टि से अध्ययन करने पर हमें एकता एवं समानता अधिक नज़र आती है। विद्वानों ने भारत की भाषाओं के भेदों की जाँच-पड़ताल तो बहुत की है; ‘ बाल की खाल बहुत निकाली है। कामना है, विद्वान-गण भारत की भाषाओं में विद्यमान सादृश्य के सूत्रों की खोज के काम में भी उसी निष्ठा के साथ प्रवृत्त हों, जिससे भारत की भाषिक एकता की अवधारणा और अधिक स्पष्ट एवं उजागर हो सके।

हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या विश्व में चीनी भाषा के बाद सर्वाधिक है तथा इसका प्रचार प्रसार एवं अध्ययन अध्यापन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है। कुछ ताकतें हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का कुचक्र रच रही हैं। इनकी शक्ति यद्यपि कम नहीं है तथापि इनके द्वारा समय समय पर किए जाने वाले षड़यंत्रों को बेपरदा एवं बेनकाब करने की आवश्कता असंदिग्ध है।

www.rachanakar.org/2009/09/blog-post_08.html

मेरा आकलन है कि हिन्दी को आगे बढ़ने से अब कोई ताकत रोक नहीं सकती। हिन्दी निरन्तर आगे बढ़ रही है। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में एक सम्मेलन का समापन करते हुए मैंने यह मत व्यक्त किया था कि 19वीं शताब्दी फ्रेंच भाषा की थी, 20 वीं शताब्दी अंग्रेजी भाषा की थी तथा 21 वीं शताब्दी हिन्दी की होगी। मैंने अपने इस मत की पुष्टि के लिए निम्नलिखित कारणों की विस्तार से विवेचना की थी –

1. भाषा बोलने वालों की संख्या

2. भाषा व्यवहार क्षेत्र का विस्तार

3. हिन्दी भाषा एवं लिपि व्यवस्था की संरचनात्मक विशेषताएँ

4. भविष्य में कम्प्यूटर के क्षेत्र में टैक्स्ट टू स्पीचतथा स्पीच टू टैक्स्टतकनीक का विकास

5. भारतीय मूल के आप्रवासी एवं अनिवासी भारतीयों की संख्या, श्रमशक्ति, मानसिक प्रतिभा में निरन्तर अभिवृद्धि।

मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोलीजाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें सन् 1998 के पूर्व, हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1991 के सेन्सॅस ऑफ इण्डिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ। यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फॉर द वॅःल्ड लैंग्वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा यूनेस्को प्रश्नावलीके आधार पर हिन्दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्त दायित्व के निर्वाह के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा। प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने दिनांक 25 मई, 1999 को यूनेस्को को अपनी विस्तृत रिपोर्ट भेजी।

प्रोफेसर जैन ने विभिन्न भाषाओं के प्रामाणिक आँकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्ताओं की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्थान हिन्दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया से अंग्रेजी मातृभाषियों की पूरे विश्व की जनसंख्या के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया गया। ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया ने इसके उत्तर में गिनीज बुक आफ नॉलेज (1997 संस्करण) का पृष्ठ-57 फैक्स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्सिल ने अपनी सूचना में पूरे विश्व में अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) प्रतिपादित की। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। मैंने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिद्ध किया कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभी देशों के अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या के योग से अधिक जनसंख्या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है।

प्रस्तुत आलेख का विवेच्य दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा के प्रचार एवं प्रसार की मीमांसा प्रस्तुत करना है। इस कारण इसी विशेष संदर्भ में विवेचना प्रस्तुत की जाएगी। इस विवेचना की पृष्ठभूमि के रूप में, स्वाधीनता आन्दोलन युग में हिन्दी की राष्ट्रीय भूमिका को स्पष्ट करना जरूरी है।

स्वाधीनता के लिए जब-जब आन्दोलन तीव्र हुआ, तब-तब हिन्दी की प्रगति का रथ भी तीव्र गति से आगे बढ़ा। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गई। स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व जिन नेताओं के हाथों में था उन्होंने यह पहचान लिया था कि विगत 600-700 वर्षों से हिन्दी सम्पूर्ण भारत की एकता का कारक रही है; यह संतों, फकीरों, व्यापारियों, तीर्थ-यात्रियों, सैनिकों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग तक प्रयुक्त होती रही है।

मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा की मान्यता उन नेताओं के कारण प्राप्त हुई जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। बंगाल के केशवचन्द्र सेन, राजा राम मोहन राय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस; पंजाब के बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय; गुजरात के स्वामी दयानन्द, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी; महाराष्ट के लोकमान्य तिलक तथा दक्षिण भारत के सुब्रह्मण्यम भारती, मोटूरि सत्यनारायण आदि नेताओं के राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्बंध में व्यक्त विचारों से मेरे मत की संपुष्टि होती है। हिन्दी भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई। हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक हो गई। इसके प्रचार प्रसार में सामाजिक, धार्मिक तथा राष्ट्रीय नेताओं ने सार्थक भूमिका का निर्वाह किया।

सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के चारों ओर देशवासियों द्वारा संग्राम में भाग लेने के लिए हिन्दी एवं उर्दू में पर्चे बाँटे गए।

भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय ने सन् 1828 में ब्रह्म सभाकी स्थापना की तथा बांग्ला, हिन्दी और फ़ारसी भाषाओं में बंगदूतनिकाला। इसी परम्परा में केशव चंद्र सेन ने भारतीय ब्रह्म समाजकी स्थापना की तथा इस भावना को जागृत किया कि भारत की एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। केशव चंद्र सेन ने सन् 1875 में सुलभ समाचारमें लिखाः अगर हिन्दी को भारतवर्ष की एक मात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाता है जो सहज में ही वह एकता स्थापित हो सकती है

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने भारतीय भाषाओं और राष्ट्र भाषा हिन्दी के अंतर-सम्बंधों की व्याख्या करते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषान कहकर भारत-भारतीकहा:

आधुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल के समान है जिसका एक एक दल, एक एक प्रांतीय भाषा और उसकी साहित्य-संस्कृति है। किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतीय बोलियाँ, जिनमें सुन्दर साहित्य की सृष्टि हुई है, अपने अपने घर में रानी बनकर रहें। प्रांत के जनगण की हार्दिक चिंता की प्रकाशभूमि स्वरूप कविता की भाषा होकर रहें और आधुनिक भाषाओं के हार के मध्य-मणि हिन्दी भारत-भारती होकर विराजती रहे

भारतीय नवजागरण के शंखनाद के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने सन् 1875 में मुंबई में आर्य समाज की तथा स्वामी विवेकानंद ने सन् 1897 में कोलकाता में रामकृष्ण मिशन आश्रम की स्थापना की। आरम्भ में दयानंद सरस्वती संस्कृत में व्याख्यान देते थे। कोलकाता में केशव चन्द्र सेन ने स्वामी दयानंद को संस्कृत के स्थान पर हिन्दी को अपने व्याख्यानों एवं ग्रंथों की भाषा बनाने का परामर्श दिया। प्रभावान्वित दयानंद सरस्वती ने हिन्दी को स्वभाषाकी संज्ञा दी, हिन्दी में ही व्याख्यान दिए तथा हिन्दी में ही सत्यार्थ प्रकाशलिखा एवं अनेक ग्रंथों की रचना की। आर्य समाज ने देश की शिक्षा प्रणाली में हिन्दी को अपनाए जाने पर बल दिया तथा न्यायालयों में हिन्दी के व्यवहार एवं प्रयोग के लिए आन्दोलन चलाए।

पंजाब में स्वामी रामतीर्थ, श्रद्धाराम फुल्लौरी तथा स्वामी श्रद्धानंद आदि ने धार्मिक प्रवचनों, उपदेशों और भजनों के माध्यम से हिन्दी को जनमानस से जोड़ दिया।

महाराष्ट्र भाषी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिन्दी को पूरे राष्ट्र की भाषा बनाने पर बल दिया। दिसम्बर, 1905 में नागरी प्रचारिणी सभा के सम्मेलन में उन्होंने प्रतिपादित किया कि हम अपनी बात पूरे देश में हिन्दी भाषा के माध्यम से ही पहुँचा सकते हैं :

यदि आप राष्ट्र में एकता लाना चाहते हैं, तो इसके लिए एक सामान्य भाषा के व्यवहार से अधिक शक्तिशाली और कोई वस्तु नहीं है। - - - हम भारतवासियों के लिए एकता एवं एकात्मकता लाने में देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी ही राष्ट्रभाषाबनकर सहायता पहुँचा सकती है

आपने पुणें से केसरीदैनिक समाचार पत्र निकाला जिसके एक पृष्ठ पर केवल हिन्दी में समाचार छपते थे। तिलक की तरह महादेव गोविंद रानाडे का हिन्दी प्रेम भी सर्वविदित है।

हिन्दी को सम्पूर्ण भारत में व्यवहार की भाषा बनाने, सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित करने एवं राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में महात्मा गाँधी की भूमिका एवं योगदान अप्रतिम है। गाँधी जी ने हिन्दी के महत्व का आकलन दक्षिण अफ्रीका में ही कर लिया था। यह सर्वविदित है कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति एवं अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध करने के लिए गाँधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन चलाया। नेटाल के सत्याग्रह आश्रम में हिन्दी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु आदि भाषाओं के बोलने वाले बच्चे रहते थे। गाँधी जी ने निरीक्षण किया कि खेलते समय वे भिन्न भाषी बच्चे हिन्दी बोलते हैं। इससे उन्होंने यह पहचान लिया कि भिन्न भाषियों की सम्पर्क भाषा हिन्दी ही हो सकती है। उन्होने उन बच्चों को हिन्दी के माध्यम से पढ़ाना शुरु कर दिया। भारत लौटने के बाद गाँधी जी ने पूरे देश का भ्रमण किया तथा हिन्दी की सार्वदेशिक भूमिका को जाना तथा यह भी महसूस किया कि देश के किस किस भाग में हिन्दी को जनता की कामचलाऊ भाषा बनाने के लिए क्या करणीय है जिससे पूरा देश हिन्दी के द्वारा एकजुट होकर राष्ट्रीय आन्दोलन की ज्योति को पूरी आभा के साथ आलोकित कर सके।

सन् 1910 में गाँधी जी ने कहाः हिन्दुस्तान को अगर सचमुच एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा हिन्दी ही बन सकती है

सन् 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में गाँधी जी ने हिन्दी में भाषण दिया तथा उद्घोष किया कि हिन्दी का प्रश्न मेरे लिए स्वराज्य के प्रश्न से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसी अधिवेशन में 26 दिसम्बर को आर्य समाज मंडपमें गाँधी जी के सभापतित्व में एक भाषा एक लिपिविषयक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें सर्वसम्मति से संकल्प पारित हुआ कि हिन्दी भाषा और देवनागरी का प्रचार प्रसार देश-हित एवं ऐक्य-स्थापना हेतु करना चाहिए। तमिल भाषी श्री रामास्वामी अय्यर और श्री रंगस्वामी अय्यर इस प्रस्ताव के समर्थक थे।

सन् 1917 में गुजरात शिक्षा सम्मेलनके अध्यक्षीय भाषण में गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा के मानकों का निर्धारण करते हुए प्रतिपादित कियाः

(1)किसी देश की राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जिसे वहाँ की अधिकांश जनता बोलती हो।

(2) वह सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो।

(3) वह सरकारी कर्मचारियों एवं सरकारी कामकाज के लिए सुगम और सरल हो।

(4) जिसे सुगमता तथा सरलता से सीखा जा सकता हो।

(5) जिसे चुनते समय क्षणिक, अस्थायी तथा तात्कालिक हितों की उपेक्षा की जाए और जो सम्पूर्ण राष्ट्र की वाणी बनने की क्षमता रखती हो।

इन मानकों पर कसने के बाद गाँधी जी का निष्कर्ष था कि बहुभाषी भारत में केवल हिन्दी ही एक भाषा है जिसमें ये सभी गुण पाए जाते हैं

सम्वत् 1974 (सन् 1918) में इन्दौर के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में दिया गया गाँधी जी का अध्यक्षीय वक्तव्य राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए मील का पत्थरहै।

यहाँ इसको रेखांकित करना अप्रसांगिक न होगा कि हिन्दीतर भाषी राष्ट्रीय नेताओं ने जहाँ देश की अखंडता एवं एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार की अनिवार्यता की पैरोकारी की वहीं भारत के सभी राष्ट्रीय नेताओं ने एकमतेन सरल एवं सामान्य जनता द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी का प्रयोग करने एवं हिन्दी-उर्दू की एकता पर बल दिया। हिन्दी के जो विद्वान क्लिष्ट हिन्दी का प्रयोग करते हैं, सामान्य जन द्वारा अपनाए गए अरबी, फारसी, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं तथा हिन्दी एवं उर्दू को अलग-अलग भाषाएँ मानते हैं, उनको अपने राष्ट्रीय नेताओं के इन विचारों को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए तथा उन विचारों को आत्मसात करना चाहिए। इस प्रसंग में, मैं उदाहरणरण के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन एवं महात्मा गाँधी जी के हिन्दी साहित्य सम्मेलनों के अधिवेशनों के सभापति भाषणों के अंश प्रस्तुत करना चाहता हूँ :

(क) जितनी भाषाएँ हैं, हमारी हैं। बंगाली हमारी भाषा, पंजाबी हमारी भाषा और गुजराती हमारी भाषा है। हिन्दी अपनी बहिनों में सबसे प्राचीनतम और बड़ी बहिन है - - - - उर्दू और हिन्दी, इन दोनों भाषाओं के रूप गाँठ बन गए हैं। अब इन दोनों को यथासम्भव एक स्थल में लाइए। इस बात के लिए यत्न करना जैसा हिन्दुओं के लिए आवश्यक है; वैसा ही मुसलमानों के लिए भी आवश्यक है। दोनों ओर से यत्न होने से हम भाषा के क्रम को बहुत कुछ एक कर सकते हैं।- - - मद्रास, बंगाल, बम्बई आदि के अनेक विद्वान देश में एक ही भाषा चलाना चाहते हैं। देश के बहुतेरे लोगों की जब ऐसी रुचि है, तब आप का भी एक कर्तव्य है। आप भी ऐसा यत्न करें, जिससे आपकी भाषा राष्ट्रभाषा होने का गौरव पाए। झगड़ों में फँसने के बदले उन्हें मिटाना चाहिए। उर्दू के प्रेमी कहते हैं कि हिन्दी भाषा उर्दू भाषा है। यही सही। यदि आप झगड़ा मिटाना चाहते हैं, तो कह दें, कि अच्छा यही सही। वह उसे एक नाम से पुकारना चाहते हैं, तो पुकारने दीजिए, उसी में उन्हें संतोष करने दीजिए। और यह कीजिए, कि हिन्दी में जो उर्दू-फारसी शब्द आ गए हैं, उनका व्यवहार कर उर्दू वालों को और भी संतुष्ट कीजिए। आपकी हिन्दी में कितने ही शब्द ऐसे हैं जो देश की बहुतेरी भाषाओं में ज्यों के त्यों या कुछ बदले हुए रूप में काम में लाए जाते हैं। आप उन शब्दों के व्यवहार में संकोच न कीजिए। हमें यह देखना चाहिए कि हमारी भाषा के शब्द ऐसे हों, जिनसे सब प्रदेश के लोग लाभ उठाएँ

(सन् 1910 में काशी (वाराणसी) के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में पंडित मदन मोहन मालवीय के सभापति भाषण से)

(ख) जिस भाषा में, मैं इस समय बोल रहा हूँ, वह हमारे देश की स्थानीय बोलियों से भिन्न है, किन्तु वह केवल शिष्टजनों की अप्राकृतिक नियमों से गढ़ी हुई भाषा नहीं कही जा सकती। ग्रामीण मनुष्य भी उस भाषा को पहचानता है और उसे अपनी भाषा कहता है, यद्यपि वह उसे उसी रूप में व्यवह्यत नहीं करता। हिन्दी साधारण ग्रामीण बोली न होते हुए भी किसी विशेष कार्य के लिए गढ़ी नहीं गई। वह पूर्णरूप से और अति व्याप्त और अव्याप्ति के दोषों से बचते हुए जनता की भाषा कही जा सकती है। हाँ, यदि हममें से कुछ चतुर विद्वान इस भाषा में साधारणतया और गौरव शून्यता का दोष देखकर इस प्रकार से उसका शोधन करने बैठे कि उसमें आए हुए प्रचलित शब्दों को काँट छाट कर व्याकरण के ऐसे अकाट्य नियम रखे, जिनको बिना सीखे कोई भी शिष्ट-भाषा-भाषी न कहा जा सके, तो अवश्य ऐसी संस्कृत-हिन्दीकी सूरत और दशा दूसरी ही हो जाएगी। - - - आज हिन्दी और उर्दू दो भिन्न सभ्यता की सूचक भाषाएँ बन गई हैं। उनका धार्मिक प्रोत्साहन भी भिन्न उपमाओं और रूपकों और भिन्न दिव्य पुरुषों द्वारा होता है। किन्तु वास्तव में, भाषा का आधार एक ही है और अभी यह दोनों स्रोत इतनी दूर एक दूसरे से नहीं हुए हैं कि फिर मिलकर एक प्रबल धारा में परिणत हो भारतवर्ष को अपनी शक्ति से उर्वरा कर सुसज्जित न कर दें। मुझे तो आधुनिक हिन्दी और उर्दू भाषाओं के पोषक देश-भक्तों का यही तात्कालिक कर्तव्य जान पड़ता है

(सन् 1922 में कानपुर के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में श्री पुरुषोत्तम दास टंडन के सभापति भाषण से)

(ग) ‘ - - - पचास वर्ष से हम अंग्रेजी के मोह में फँसे हैं, हमारी प्रजा अज्ञान में डूब रही है। - - - अंग्रेजी सर्वव्यापक भाषा है, पर यदि अंग्रेज सर्वव्यापक न रहेंगे तो अंग्रेजी भी सर्वव्यापक न रहेगी। - - जैसे अंग्रेज मादरी जबान अंग्रेजी में बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का गौरव प्रदान करें। हिन्दी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बना कर हमें अपना कर्तव्य-पालन करना चाहिए। - - - भाषा वही श्रेष्ठ है जिसको जनसमूह सहज में समझ ले। - - हिमालय में से निकलती हुई गंगा जी अनंत काल बहती रहेंगी। ऐसे ही देहाती हिन्दी का गौरव रहेगा और जैसे छोटी-सी पहाड़ी से निकलता हुआ झरना सूख जाता है वैसे ही संस्कृतमयी तथा फारसीमयी हिन्दी की दशा होगी। - - हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो भेद किया जाता है वह कृत्रिम है। ऐसी ही कृत्रिमता हिन्दी व उर्दू भाषा के भेद में है। हिन्दुओं की बोली से फारसी शब्द का सर्वथा त्याग और मुसलमानों की बोली से संस्कृत का सर्वथा त्याग अनावश्यक है। दोनों का स्वाभाविक संगम गंगा-यमुना के संगम-सा शोभित अचल रहेगा। मुझे उम्मीद है कि हम हिन्दी-उर्दू के झगड़े में पड़ कर अपना बल क्षीण नहीं करेंगे। - - भारतवर्ष में परस्पर व्यवहार के लिए एक भाषा होनी चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है। - - आज भी हिन्दी से स्पर्धा करने वाली दूसरी कोई भाषा नहीं है। - - हिन्दुओं को फारसी शब्द थोड़ा-बहुत जानना पड़ेगा। इसलामी भाइयों को संस्कृत शब्द का ज्ञान सम्पादन करना पड़ेगा। ऐसे लेन-देन से हिन्दी भाषा का बल बढ़ जाएगा और हिन्दू-मुसलमानों में एकता का एक बड़ा साधन हमारे हाथ में आ जाएगा।

(सम्वत् 1974 (सन् 1918) में इन्दौर के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में महात्मा मोहनदास कर्मचंद गाँधी के सभापति भाषण से)

दक्षिण भारत में हिन्दी की ज्योति ज्योतित करने वालों में सबसे उल्लेखनीय नाम गाँधी जी का है। इन्दौर के अधिवेशन में गाँधी जी का वक्तव्य राष्ट्र-भाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार की आधार-शिला है। गाँधी जी केवल भाषण नहीं देते थे। जो कहते थे, उसके अनुरूप आचरण करते थे। उन्होंने देश की अखंडता और एकता के लिए हिन्दी के महत्व एवं उसके प्रचार-प्रसार पर बल दिया। कांग्रेस द्वारा स्वीकृत चौदह रचनात्मक कार्यक्रमों में राष्ट्रभाषा हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार का कार्यक्रम भी समाहित था। गांधीजी का विचार था कि दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार का कार्य वहाँ के स्थानीय लोग ही करें। कार्य का सूत्रपात करने के लिए गाँधी जी ने अपने अट्ठारह वर्षीय पुत्र देवदास गाँधी को स्वामी सत्यदेव परिव्राजक के साथ दक्षिण-भारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने के लिए मद्रास (चेन्नै) भेजा। बाद में इस कार्य में पंडित हरिहर शर्मा भी शामिल हो गए। पंडित हरिहर शर्मा के साथ सुब्रह्मण्यम अपनी पत्नी सहित, का. मा. शिवराम शर्मा एवं आंजनेय शर्मा आदि कुछ नवयुवक हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग हिन्दी पढ़ने के लिए आए। इन्होंने साल भर तक हिन्दी का विधिवत अध्ययन किया तथा अगस्त, 1919 में विशारद की परीक्षा पास कर, दक्षिण-भारत लौटे। सन् 1919 में ही गाँधी जी ने उत्तर भारत से कुछ नवयुवकों को हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण-भारत भेजा। इनमें प्रताप नारायण वाजपेयी, पंडित अवधनंदन, पंडित रघुवर दयाल मिश्र एवं पंडित देवदूत विद्यार्थी आदि शामिल थे। मैंने जब-जब दक्षिण-भारत की यात्राएँ कीं तथा वहाँ के हिन्दी के पुरोधा-प्रचारकों से भेंट कीं, सबने पंडित हरिहर शर्मा, पंडित अवधनंदन तथा पंडित देवदूत विद्यार्थी को अत्यंत श्रद्धाभाव से याद किया। सन् 1993 में दिल्ली में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा का अमृतोत्सव समारोह आयोजित हुआ। उसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री पी. वी. नरसिंहराव ने किया। उन्होंने भी पंडित हरिहर शर्मा एवं श्री देवदूत विद्यार्थी के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। उनके शब्द थेः

दक्षिण के हिन्दी-प्रचार के बारे में सोचते समय खासकर हिन्दीतर भाषी प्रदेश के हिन्दी फैलाव के बारे में सोचते समय स्वर्गीय पंडित हरि हर शर्मा, श्री देवदूत विद्यार्थी जैसे निःस्वार्थ प्रचारकों का पावन स्मरण होता है

गाँधी जी की प्रेरणा से हिन्दी के प्रचारकों का दल गठित हुआ। इस दल के प्रचारकों में उपर्युक्त वर्णित नामों के अतिरिक्त मोटूरि सत्यनारायण, भालचंद्र आप्टे, पट्टाभि सीतारमैया, एस. आर. शास्त्री आदि के नाम अपेक्षाकृत अधिक उल्लेखनीय हैं। इस दल ने दक्षिण-भारत के प्रत्येक भूभाग में रहकर एवं जगह-जगह जाकर हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए साधक का जीवन व्यतीत किया। इनकी त्याग-भावना एवं तपस्या-मूलक जीवन स्तुत्य है।

दक्षिण-भारत में स्वाधीनता के पूर्व हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जिन संस्थाओं की स्थापना हुई, उनका परिचय निम्न हैः

1.दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा (सन् 1918)

महात्मा गांधी के हिन्दी प्रचार आंदोलन के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार के लिए एक सभा की स्थापना मद्रास नगर के गोखले हॉल में डॉ. रामास्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एनी बेसेन्ट ने की।

सन् 1927 में बेंगलूर (बंगलुरु) में गाँधी जी की अध्यक्षता में आयोजित अखिल कर्नाटक हिन्दी प्रचार सम्मेलन में यह अनुभव किया गया कि दक्षिण-भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से अलग स्वतंत्र संस्था का गठन करना जरूरी है। मद्रास नगर में स्थापित हिन्दी प्रचार सभा को नवगठित संस्था का रूप मिला तथा इसका नाम दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा रखा गया। वहीं इसको पंजीबद्ध किया गया। इसका कार्य दक्षिण-भारत के सभी भागों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना था। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के प्रचारक संतों की तरह जगह-जगह घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करते थे। दक्षिण भारत के विभिन्न भागों के हिन्दी प्रेमी सभा में आकर हिन्दी का प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे तथा प्रशिक्षित होकर अपने-अपने क्षेत्रों में हिन्दी की ज्योति प्रज्वलित करने लगे।

गांधीजी जी आजीवन इसके सभापति रहे। सन् 1920 तक सभा का कार्यालय जार्ज टाउन, मद्रास (चेन्नै) में था। बाद में मालापुर एवं ट्रिप्लिकेन में आ गया। मोटूरि सत्यनारायण के कारण त्यागराय नगर (टी. नगर) में इसका विशाल परिसर बना एवं भव्य भवन निर्मित हुए।

सन् 1932 में दक्षिण-भारत हिन्दी प्रचार सभा के चार प्रांतीय कार्यालय खोले गए। सन् 1933 में गाँधी जी विजयवाडा आए। वहाँ उनसे कुछ कार्यकर्ताओं ने यह अनुरोध किया कि आंध्र के लिए हिन्दी प्रचार की स्वतंत्र संस्था का गठन हो। सन् 1934 में गाँधी जी ने दक्षिण-भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का निरीक्षण करने तथा दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के संविधान में आवश्यक सुधार प्रस्तुत करने के लिए काका कालेलकर को अधिकृत किया। काका कालेलकर ने दक्षिण-भारत के सभी भागों का सघन दौरा किया तथा तदनंतर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के संविधान में आवश्यक परिवर्तन करने तथा दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के मद्रास मुख्यालय की चारों प्रांतों में अलग-अलग प्रांतीय सभाएँ स्थापित करने की संस्तुतियाँ कीं। सन् 1935 में तदनुसार संविधान में संशोधन सम्पन्न हुए तथा चार प्रांतीय सभाएँ स्थापित करने का निर्णय लिया गया। सन् 1936 में इन चार प्रांतीय सभाओं की स्थापना हुईः

1.आंध्रः हैदराबाद में हिन्दी प्रचार संघ तथा विजयवाडा में आंध्र राष्ट्र हिन्दी संघ काम कर रहे थे। दोनों को मिलाकर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की प्रांतीय शाखा के रूप में संस्था का गठन हुआ और इसका नाम दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, आंध्र शाखा, हैदराबाद रखा गया।

2.तमिलनाडुः तमिलनाडु शाखा का गठन तिरुचिनापल्ली में किया गया।

3.कर्नाटकः कर्नाटक शाखा का गठन धारवाड में किया गया। बाद में इसकी प्रशाखा बेंगलूर (बंगलुरु) में खोली गई।

4.केरलः केरल शाखा का गठन एर्नाकुलम में किया गया। वर्तमान में इस शाखा का मुख्यालय कोच्चि में है। डॉ. एन. ई. विश्वनाथ अय्यर के अनुसार केरल के विभिन्न नगरों व केन्द्रों में सभा के शाखा-कार्यालय भी अपने भवनों में हैं, जैसे – कालिकट, पालघाट, केल्लम, मावेलिक्करा आदि पर सभा के अपने प्रवीण विद्यालय, विशारद विद्यालय आदि हैं। इसके अलावा अनुदान पाने वाले प्रचारक सम्बद्ध विद्यालय चलाते हैं। (केरल में हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास, पृष्ठ 107)

इस प्रकार दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के मुख्यालय एवं उसकी प्रांतीय सभाओं के द्वारा दक्षिण-भारत के चारों राज्यों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का कार्य प्रशस्त हुआ।

2. हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद (सन् 1935)

हैदराबाद राज्य में हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने के लिए साहित्यिक-शैक्षणिक संस्था हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद की स्थापना की गई। सभा ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया। सन् 1956 से राज्यों के पुर्नसंगठन के कारण सभा में नवीन उत्साह का वातावरण बना। हैदराबाद रियासत का विलयन महाराष्ट्र, आन्ध्र एवं कर्नाटक के नए राज्यों में हो गया और इनमें सभा की शाखाएँ भी प्रस्थापित हो गईं, लेकिन मुख्यालय हैदराबाद ही रहा।

3. केरल हिंदी प्रचार सभा, तिरुवनंतपुरम (सन् 1934)

श्री के. वासुदेवन पिल्ले ने सन् 1934 में तिरुवितांकूर हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की। आरम्भ में यह सभा दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की परीक्षाओं के लिए छात्रों को तैयार करती थी। सन् 1948 ईस्वी से यह सभा स्वतंत्र रूप से अपनी परीक्षाएँ (हिन्दी प्रथमा, हिन्दी प्रवेश, हिन्दी भूषण और साहित्याचार्य) संचालित करने लगी। सन् 1961 से इस संस्था का नाम केरल हिन्दी प्रचार सभा हो गया। इस संस्था के प्रमुख उद्देश्य केरल राज्य में राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने के लिए हिन्दी की छोटी-बड़ी सभी परीक्षाओं को संचालित करना, हिन्दी की पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित करना तथा हिन्दी नाटकों को अभिनीत करना रहे हैं। यह संस्था हिन्दी, मलयालम और तमिल भाषाओं में सामंजस्य स्थापित करने के उद्देश्य से राष्ट्रवाणी नाम की एक त्रिभाषा साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन करती है। इसके अतिरिक्त इस संस्था द्वारा केरल ज्योति नामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता है। सभा भवन में एक केन्द्रीय हिन्दी महाविद्यालय कार्य कर रहा है। सभा का प्रकाशन विभाग भी सुचारू रूप से चल रहा है।

4. मैसूर रियासत हिंदी प्रचार समिति, बेंगलोर (बंगलुरु) (1938)

सन् 1938 में मैसूर रियासत के हिन्दी प्रेमियों तथा प्रचारकों का सम्मेलन बेंगलोर में आयोजित हुआ जिसमें मैसूर रियासत हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना मैसूर में की गई। सन् 1939 से इसका कार्यालय बेंगलोर (बंगलुरु) में कार्य कर रहा है।

5.मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद, बंगलुरु(सन् 1945)

डॉ. पी. आर. श्रीनिवास शास्त्री के अनुसार इस संस्था का बीजारोपण तो सन् 1942 में हो गया था किन्तु पंजीयन अधिनियम के अनुसार दिनांक 9 जनवरी, 1945 को इसकी अधिकृत स्थापना हुई। इसके अध्यक्ष डॉ. डी. के भारद्वाज, प्रधान सचिव श्री आर. के. गोडबोले तथा संचालक श्री पी. आर. श्रीनिवास शास्त्री थे। (कर्नाटक में हिन्दी प्रचार की गतिविधियाँ, पृष्ठ 115-121)

इन संस्थाओं में कार्य करने वाले हिन्दी प्रचारकों एवं शिक्षकों ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं अध्यापन का कार्य समर्पण एवं निष्ठा भाव से निष्पन्न किया। इनकी संख्या हज़ारों में है। इस लेख में सबके नामों का उल्लेख करना समीचीन नहीं है। यह सत्य है कि बहुत से प्रचारकों ने किसी एक राज्य में प्रचार न करके आवश्यकतानुसार अनेक राज्यों में प्रचार-प्रसार किया तथापि यह भी तथ्य है कि अधिकांश प्रचारकों का कार्य-क्षेत्र कोई राज्य विशेष रहा। इस दृष्टि से दक्षिण-भारत के वर्तमान चार राज्यों में कार्य करने वाले अपेक्षाकृत अधिक उल्लेखनीय प्रमुख हिन्दीतर भाषी अग्रगण्य प्रचारकों के नामों का उल्लेख किया जा रहा है।

(1) तमिलनाडुः

(1) मोटूरि सत्यनारायण (आपका जन्म यद्यपि सन् 1902 में आंध्र-प्रदेश में हुआ था तथापि इनका कर्म-क्षेत्र विशेष रूप से दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास रहा। इनका योगदान केवल तमिलमाडु में हिन्दी प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं है। एक लेख में लेखक ने इनके बहु-आयामी योगदान के सम्बंध में चर्चा की हैः

रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख : प्रयोजनमूलक ...

17 जुलाई 2009 ... महावीर सरन जैन का आलेख : प्रयोजनमूलक हिन्‍दी की संकल्‍पना के प्रवर्तक मोटूरि सत्‍यनारायण.

www.rachanakar.org/2009/07/blog-post_17.html

(2) एस. शारंगपाणि (3) बालशौरि रेड्डी (यद्यपि आपकी मातृ-भाषा तेलुगु है मगर आपका कर्म-क्षेत्र तमिलनाडु रहा है। (4) र. शौरिराजन (5) एस. चंद्रमौलि (6) सदाशिवम् (7) के. वी. रामनाथ (7) एम. सुब्रह्ममण्यम् (8) रुकमाजी राव (9) महीलिंगम् (10) पी. के. बालसुब्रह्मण्यम् (11) डॉ. एन. सुन्द्ररम्

(2) आंध्र प्रदेशः

(1) जंध्याल शिवन्न शास्त्री (2) पीसपाटि वेंकट सुब्बाराव (3) मुडुंबि नरसिंहाचार्य (4) मल्लादि वेंकट (4) सीतारामांजनेयुलु (5) दंमालपाटि रामकृष्ण शास्त्री (6) मेडिचर्ल वेंकटेश्वरराव (7) एस. वी. शिवराम शर्मा (8) भट्टारम वेंकट सुबय्या (9) आंजनेय शर्मा (10) जी. सुन्दर रेड्डी (11) बोयपाटि नागेश्वर राव

(3) कर्नाटकः

(1) शिवराम शास्त्री (2) पंडित सिद्धनाथ पंत (3) डॉ. जांबूनाथन (4) विनायक राव (4) पंडित वेंकटाचलय्या (5) के. वी. श्रीनिवास मूर्ति (5) हिरण्मय्या (6) एस. श्रीकंठमूर्ति (7) रामकृष्ण नावडा (8) एन. नागेशराव (9) लक्षम्मा देवी (10) नागोबाई (11) आर. के. गोडबोले (12) मुत्तूबाई माने (13) ना. नागप्पा (14) बी. एस. शान्ताबाई (15) एम. एस. कृष्णमूर्ति (16) तंगवेलन (17) कटील गणपति शर्मा (18) पी. आर. श्रीनिवास शास्त्री

(4) केरलः

(1) एम. के. दामोदरन उण्णि (2) पी. के. केशवन नायर (3) के. वासुदेवन पिल्लै (4) एन. वेंकटेश्वरन (5) ए. एस. दामोदरन आशान (6) सी. जी. अब्रहाम (7) लक्ष्मी कुट्टी अम्मा (8) एम. तंकम्मा मालिक (9) पी. जी. वासुदेव (10) अभयदेव (11) पंडित नारायण देव (12) पी. नारायण (13) शिवराम पिल्लै (14) ए. चंद्रहासन (15) के. भास्करन नायर (16) गोवर्धन शास्त्री (17) पंडित सी. वी. जोसेफ

मैं इन प्रचारकों को तथा इनकी प्रेरणा एवं मार्ग-दर्शन के कारण हिन्दी का कार्य करने वाले अन्य हजारों प्रचारकों को नमन करता हूँ तथा हिन्दी प्रचार-प्रसार के प्रति इनकी निष्ठा-भावना, संकल्प-शक्ति, समर्पणशीलता तथा प्रतिबद्धता को अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा-निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव, चाँदपुर रोड

बुलन्द शहर (उत्तर प्रदेश)पिन – 203 001

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