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August 2013
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दलित विमर्श की कसौटी पर ‘मुर्दहिया’

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डॉ. विजय शिंदे

संसार में मनुष्य का आगमन और बुद्धि नामक तत्व के आधार पर एक-दूसरे पर वर्चस्व स्थापित करने की अनावश्यक मांग सुंदर दुनिया को बेवजह नर्क बना देती है। सालों-साल से एक मनुष्य मालिक और उसके जैसा ही दूसरा रूप जिसके हाथ, पैर, नाक, कान... है वह गुलाम, पीडित, दलित, कुचला। दलितों के मन में हमेशा प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों? पर उनके ‘क्यों’ को हमेशा निर्माण होने से पहले मिटा दिया जाता है। परंतु समय की चोटों से, काल की थपेडों से पीडित भी अपनी पीडाओं को वाणी दे रहा है। एक की गुंज सभी सुन रहे हैं और अपना दुःख भी उसी तरीके का है कहने लगे हैं। शिक्षा से हमेशा दलितों को दूर रखा गया लेकिन समय के चलते परिस्थितियां बदली और चेतनाएं जागृत हो गई। एक, दो, तीन... से होकर शिक्षितों की कतार लंबी हो गई और अपने अधिकारों एवं हक की चेतना से आक्रोश प्रकट होने लगा। कइयों का आक्रोश हवा में दहाड़ता हुआ तो किसी का मौन। अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण का स्वरूप अलग रहा परंतु वेदना, संघर्ष, प्रतिरोध, नकार, विद्रोह, आत्मपरीक्षण सबमें बदल-बदल कर आने लगा। ईश्वर से भेजे इंसान एक जैसे, सबके पास प्रतिभाएं एक जैसी। अनुकूल वातावरण के अभाव में दलितों की प्रतिभाएं धूल में पडी सड़ रही थी लेकिन धीरे-धीरे संघर्ष से तपकर निखरने लगी। ज्ञान का शिवधनुष्य हाथ में थाम लिया और एक-एक सीढी पर लड़खड़ाते कदम ताकत के साथ उठने लगे, अपने हक और अधिकार की ओर। एक के साथ दो और दो के साथ कई। संख्या बढ़ी और धीरे-धीरे मुख्य प्रवाह के भीतर समावेश। यह प्रक्रिया दो वाक्य या एक परिच्छेद की नहीं, कई लोगों के आहुतियों के बाद इस मकाम पर पहुंचा जा सका है। प्रत्येक दलित की कहानी अलग और संघर्ष भी अलग। उसके परतों को बड़े प्यार से उलटकर उनकी वेदना, विद्रोह, नकार और संघर्ष को पढ़ना बहुत जरूरी है ताकि प्रत्येक दलित-शोषित-गुलाम व्यक्ति के मूल्य को आंका जा सके। भारतीय साहित्य की विविध भाषाओं में बड़ी प्रखरता के साथ दलितों के संघर्ष की अभिव्यक्ति हुई है और हो रही है। हिंदी साहित्य में देर से ही सही पर सार्थक और आत्मपरीक्षण के साथ दलितों के संघर्ष का चित्रण होना उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत देता है। एक की चेतना हजारों को जागृत करती है एक का विशिष्ट आकार में ढलना सबके लिए आदर्श बनता है। जागृति के साथ आदर्शों को केंद्र में रखकर अपने जीवन के प्रयोजन अगर कोई तय करें तो सौ फिसदी सफलता हाथ में है। और आदर्श अपनी जाति-बिरादरी का हो तो अधिक प्रेरणा भी मिलती है। संघर्ष और चोट से प्राप्त सफलता कई गुना खुशी को बढ़ा भी देती है। ‘जूठन’ कार के शब्दों में –

‘‘पथरीली चट्टान पर

हथौडे की चोट

चिंगारी को जन्म देती है

जो गाहे बगाहे आग बन जाती है।

आग में तपकर

लोहा नर्म पड़ जाता है

ढल जाता है

मनचाहे आकार में

हथौडे की चोट में।’’

(कविता ‘चोट’ – ओमप्रकाश वाल्मीकि)

चिंगारी से आग बनना और हथौडे की चोट से मनचाहा आकार ग्रहण करना जीवन के उद्देश्य को पाना है। प्रत्येक दलित सृजनकर्ता की कहानी भी यहीं बखान करती है। डॉ. तुलसी राम द्वारा लिखित आत्मकथन ‘मुर्दहिया’ यहीं बता रहा है।

दलित विमर्श की सारी कसौटियों पर ‘मुर्दहिया’ को परखा जा सकता है। बचपन से महाविद्यालयीन जीवन तक का मार्मिक और वेदनामयी शब्दों में किया गया वर्णन किसी महाकाव्य से कम नहीं है। एक-एक घटना और प्रसंग प्रत्येक व्यक्ति को आत्मपरीक्षण करने का आवाहन करता है, कई सवाल सामाजिक व्यवस्था पर भी खड़े कर देता है। एक दलित, गरीब, उपेक्षित बच्चे का उच्च विद्याविभूषित होना प्रशंसा का पात्र है। सामाजिक व्यवस्था में दलित होना, फिर ईश्वरीय अवकृपा और चेचक की मार से काना बनना उस बच्चे के लिए दोहरा अभिशाप है। वह घर से भी दलित-उपेक्षित बनता है। संपूर्ण विपरीत स्थितियों के बावजूद भी सारी व्यवस्था पर जीत पाना और स्थापित होना भविष्य के अच्छे दृश्यों को दिखाता है। दुनिया की नजरों से एक ‘कनवा’ डॉ. तुलसी राम तक सफर तय कर सकता है तो इनसे बेहतर स्थिति का कोई भी दलित चेतना पाकर अपने पंखों में लंबी उड़ान की ताकत पा सकता है। ‘अपशकुन’ और ‘कनवा’ की दर्दनाक लकिरों को रगड़-रगड़कर मिटाना कोई तुलसी राम से सीखे। दलितों के कई आदर्शों में एक नवीन ताजा आदर्श डॉ. तुलसी राम है। जिनके वाणी की मिठास, स्वाभाविक मृदुता, प्रेम, क्षमाशीलता और कई अत्याचारों एवं उपेक्षाओं को सहन करने की सहनशीलता डॉ. तुलसी राम है। ऐसा व्यक्ति नजदीक से देख, पढ़ अगर आम व्यक्ति कुछ पाए तो आसमान को छू लेने का अनुभव कर सकता है।

1. वेदना

वेदना सबकी एक जैसी होती नहीं पर सबकी वेदनाओं को देख-पढ़कर मन में ‘आह’ जरूर पैदा होती है और प्रश्न उठता है कि यह वेदना उसे क्यों? उसे खुश रहने का अधिकार क्यों नहीं? दलितों के जीवन और उनके संघर्ष के साथ हमेशा वेदना जुड़ती है। नए समीक्षक दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र बताते वक्त वेदना की कसौटियों पर उसे आंकते भी है। आम वेदना और दलितों की वेदनाओं मे अंतर होता है। दुघर्टनावश प्राप्त आम वेदना स्वीकार्य है पर सामाजिक अधमता के कारण दी गई वेदनाएं चीढ़ निर्माण करती है। ‘मुर्दहिया’ का नायक तुलसी राम कोई एक दलित नहीं तो दलितों के संपूर्ण बच्चे और युवा पीढी की वेदनाओं को व्यक्त करता है। कम-ज्यादा रूप में यह प्रसंग हर एक दलित के हिस्से आए हैं जो सामाजिक घटियता को दिखाते हैं।

डॉ. तुलसी राम ने चमार जाति में जन्म लिया और दलित होने का दुःख सामाजिक व्यवस्था के कारण पाया पर चेचक की आपदा से दाईं आंख का खोना ‘अशुभ’ की श्रेणी में लाकर पटक देता है, अतः उनका दर्शन घर से लेकर बाहर तक के लिए ‘अपशकुन’ बना देता है। पास-पडोस, अपनों और अन्यों से की गई जातिगत और आंखगत टिप्पणियां उन्हें हमेशा वेदना देती है। ‘कनवा बड़ा तेज हौ’, ‘एक फाटक बंद है’ कहना तथा जाति पर आधारित की गई टिप्पणियां मर्मांतक वेदना देती है। स्कूल में बर्तन छूकर पानी पीने की आजादी नहीं और सवर्ण छात्र द्वारा उनके लिए पानी देने की विधा में आनंद ले-लेकर कपडे भिगोते जाना भद्दे मजाक से कम नहीं था। ‘‘हम अंजुरी मुंह से लगाए झुके रहते, और वे बहुत ऊपर से चबूतरे पर खड़े-खड़े पानी गिराते। वे पानी बहुत कम पिलाते थे किंतु सिर पर गिराते ज्यादा थे जिससे हम बुरी तरह भीग जाते थे।... पानी पीना वास्तव में एक विकट समस्या थी।’’ (पृ. 54) यह घटना आजादी के बाद की है जहां संविधान में सबके लिए समानधिकार था कानूनी तौर पर। छुआछूत मिटने का सभी बढ़-चढ़कर ऐलान कर चुके थे, ऐसे समय में यह दृश्य वेदना और घृणा निर्माण करते हैं। आत्मकथा के भीतर तुलसी राम जी ने पारूपुर गांव के एक ‘मुसहर’ परिवार का जिक्र किया है, जो पलाश की पत्तियों से पत्तल बनाया करता है। शादी-विवाह जैसे त्यौहारों के लिए सबके खाने की पत्तल का इंतजाम करता यह परिवार जूठी पत्तलों से झाड़-झाड़कर भोजन को इकठ्ठा करता है, यह दृश्य अमानवीयता की हद है। पढाई-लिखाई में ईमानदार और प्रतिभा के धनी तुलसी राम मन लगाकर मेहनत कर रहे हैं। इम्तहान की फीस के लिए चार आने की उसकी मांग मुन्नर चाचा ठुकराते हैं कोई बात नहीं पर ‘‘ई सब इंतिहाने के बदले पइसा ले जाइके नोनियानिया क पकौडी खालै।’’ (पृ. 108) कहना बाल मानसिकता को आहत कर देता है। जहां पर अपनी ईमामदारी का कोई मूल्य नहीं वहां पर रहना बहुत मुश्किल है ऐसा किसी बच्चे का सोचना उसकी दीन-हीन-पीडित स्थिति का बखान करता है; बिना सोचे समझे की गई टिप्पणी किसी के हृदय पर गहरे घांव कर सकती है इसका परिचय भी देती है। स्कूल में दलितों की बैठने की अलग कतार या पहली बार पाजामा पहन स्कूल जाने पर ब्राह्मणों द्वारा की गई टिप्पणी ‘‘बाप के पाद ना आवे, पूत शंख बजावे’’ उच्च वर्णियों की ईष्या-द्वेष को भी दिखाता है। ‘मुर्दहिया’ आत्मकथन में घटना-दर-घटना वर्णित कई प्रसंग पीडा और वेदना का निर्माण करते हैं।

2. संघर्ष

कोई भी सफलता सहजता से मिलती नहीं उसके साथ संघर्ष जुड़ जाता है। दुनिया के प्रत्येक प्रसिद्ध व्यक्ति को संघर्ष की कसौटी पर कसा गया है। दुनिया का आम व्यक्ति और दलित में जमीन-आसमान का अंतर है। अभाव, अज्ञान, भूख, अंधश्रद्धा, अस्वास्थ्य... के चलते सफलता हासिल करना साधारण कार्य नहीं। डॉ. तुलसी राम का संघर्ष और उनके साथ उनकी जाति तथा अन्य हरिजनों का संघर्ष ‘मुर्दहिया’ में वर्णित है। एक व्यक्ति, एक जाति, और एक समूह का संघर्ष सारे दलितों की संघर्ष गाथा का बखान करता है।

सहज, सरल और सार्थक जीवन जीने के लिए पैसों की जरूरत होती है और दलित के पास पैसा कम और अभाव ज्यादा होते हैं। अर्थाभाव की मार झेलते छोटे-बड़े परिवार खाने की चीजों से ओढ़ने तक के लिए तरसते हैं, शिक्षा और किताबें तो दूर की बात है। तुलसी राम जाड़े के दिनों के संघर्ष का वर्णन करते हैं। ‘‘हमारे घर में सोने के लिए जाड़े के दिनों में घर की फर्श पर धान का पोरा अर्थात् पुआल बिछाया जाता था। उस पर कोई रेवा या गुदडी बिछाकर हम धोती ओढ़कर सो जाते। इसके बाद मेरे पिता जी पुनः ढेर सारा पुआल हम लोगों के ऊपर फैला देते।... वे दिन आज भी याद आते हैं, तो मुझे लगता है कि मुर्दों-सा लेटे हुए हमारे नीचे पुआल, ऊपर भी पुआल और बीच में कफन ओढ़े हम सो नहीं बल्कि रात भर अपनी-अपनी चिताओं के जलने का इंतजार कर रहे हो।’’ (पृ. 34) एक तरफ यह स्थितियां और दूसरी ओर इसी देश में टाटा-बिर्ला-अंबानी जैसे अमीर लोग। आज भी हमारे देश से गरीबी हटी नहीं। अर्थाभाव, की मार और ऊपर से निम्न जाति का होना; जीवन मानो एकाध लड़ाई छिड़ने जैसा है। पिता जी के साथ मिलकर जमीन में गड़ी सड़ी लाश को ऊपर निकालना और सुदेस्सर पांडे को सोने की मुनरी देने की घटना में लेखकीय संघर्षशील जिंदगी के विड़बना का चित्रण है। दलित मजदूरों से मुफ्त में काम करवाना दिनभर के काम के बदले में एक-एक केडा फसल पाना शोषण और संघर्ष की चरमसीमा है। मरी हुई गाय का चमड़ा निकालते वक्त छोटे तुलसी राम का ‘हाहो-हाहो’ करते गिद्धों को भगाना और चादर की तरह चौपत कर चमड़े को ढोना हरिजनों के संघर्ष का वर्णन करता है। भाड़ों द्वारा गाए जाने वाले गीत का लेखक ने जिक्र किया है -

‘‘हरिजन जाति सहै दुख भारी हो।

हरिजन जाति सहै दुख भारी।।

जेकर खेतवा दिन भर जोत ली,

ऊहै देला गारी हो, दुख भारी।।

हरिजन जाति सहै, दुख भारी।।’’ (पृ. 106)

दिन भर की कड़ी मेहनत ओर संघर्ष के बाद भी पाया क्या? गाली। गाली, संघर्ष और अवहेलना का द्योतक है। लेखक का पढ़ाई के लिए किया गया संघर्ष, दादी मां तथा अध्यापकीय प्रेरणा स्रोतों के बावजूद परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा ‘काम के डर से पढ़ने का बहाना बनाकर बैठ गया है’, कहना लेखक के आत्मविश्वास को तोड़ देता है, उसे दुबारा ताकत के साथ जुटाना संघर्ष ही है। गांव के ब्राह्मणों द्वारा लेखक की मेहनत और बौद्धिक क्षमता को पागल हो जाने की स्थितियों का करार देना ईर्ष्या, द्वेष और षड़यंत्र का परिचायक है। इन विपरीत स्थितियों पर विजय पाना किसी युद्ध से कम नहीं है।

3. आत्मपरीक्षण

प्रगति और विकास की चोटी तक पहुंचना है तो जागृति, चेतना और आत्मपरीक्षण की जरूरत है। यह न केवल दलितों के लिए आम आदमी के लिए भी है। लेकिन दलितों के लिए आत्मपरीक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। सालों से काल-कोठरी में पड़े अंधेरे में पत्थरों से टकराते रहना इनके हिस्से में लिखा था। अवहेलना, अन्याय, अत्याचार, अपमान, शोषण, पीडा, दुःख... इनके विड़बनापूर्ण जीवन के अलंकार थे। जीवन की कुरूपता संपूर्ण तरीके से इन पर मेहरबान थी और उसे मानो किसी अलंकार–सा इन्होंने माथे पर सजाए रखा था, बिना आत्मपरीक्षण के। कोई विचार नहीं, कोई सोच नहीं, नकार नहीं, प्रतिरोध नहीं। अंधभक्ति, अंधश्रद्धा, अज्ञान, अशिक्षा के चलते जो जीवन सामने परोसा उसे सर-आंखों पर लिया। यह सोच बदलनी पडेगी, आत्मपरीक्षण करना पडेगा। अशिक्षा के अंधकार को ठोकर मारकर शिक्षा का दीपक हाथों में लेकर खुली आंखों से दुनिया की ओर देख प्रत्येक घटना, व्यवहार तथा बर्ताव का परीक्षण करना पडेगा। अपने हिस्से आई जिंदगी का पूर्ण मूल्यांकन करना पडेगा। सवाल करने पडेंगे। ‘नहीं’ कहना या ‘ना’ की ताकत जुटानी पडेगी। आज दलित समाज जिस मकाम पर पहुंचा है वहां तक पहुंचने के पीछे लंबा संघर्ष है, अतः वर्तमान में आत्मपरीक्षण के साथ सही दिशा का चुनाव और आत्मा की आवाज का परीक्षण भी अत्यंत आवश्यक बनता है। डॉ. तुलसी राम ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो स्थान पाया है उसका मूलाधार आत्मपरीक्षण, सब्र और मेहनत है। उहोंने शिक्षा को उद्देश्य मानकर जीवन का मंत्र बनाया और उसे पाने के लिए प्रत्येक कदम फूंक-फूंककर रखा। प्रत्येक प्रतिक्रिया और घटना का आत्मपरीक्षण किया।

लेखक के दादा की मृत्यु भूत से पीट-पीटकर होने का जिक्र सभी करते हैं और स्वीकारते भी हैं पर लेखक का तर्क और आत्मपरीक्षण बताता है कि उनके किसी दुश्मन ने इस अंधविश्वास का गलत लाभ उठाया होगा, यह तर्क लेखक की आरंभिक चेतना का द्योतक है। दलित लोगों द्वारा अपने लोगों को ही ‘कुजाति’ करना और वापसी के लिए दंड़स्वरूप सूअर-भात खिलाने की मांग गरीबी के भीतर और डूबते जाना है। जरूरी है ‘कुजाति’ प्रथा का आत्मपरीक्षण करें। लेखक अपने घर के बारे में लिखते हैं पर लेखक का घर-परिवार सारे दलितों का हैं। ‘‘हमारा परिवार संयुक्त स्वरूप से बृहत् होने के साथ-साथ वास्तव में एक अजायबघर ही था, जिसमें भूत-प्रेत, देवी-देवता, संपन्नता-विपन्नता, शकुन-अपशकुन, मान-अपमान, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य, ईर्ष्या-द्वेष, सुख-दुख आदि-आदि सबकुछ था किंतु शिक्षा कभी नहीं थी।’’ (पृ. 21) यह वाक्य दलितों के शिक्षा अभाव को दर्शाता है।

लेखकीय आत्मपरीक्षण, सब्र, सहनशीलता का उदाहरण पांचवी की परीक्षा के दौरान का है। दादी के कहने पर परीक्षा के पहले नहाना और ‘चमरिया माई’ की पूजा करना लेखक चाह रहे थे पर सवर्ण रामचरण यादव के ‘‘जल्दि से भाग चमार कहीं क। बड़कन लोगन के पोखरा में तू नहरबे?’’ (पृ. 83) कहते समय का रौद्र रूप देख डरना और भागना। परीक्षा के पहले आत्मविश्वास टूटते जाना, मन में मौन विद्रोह, आक्रोश, दुःख, डर, भय पर शिक्षा को पाने के लिए आत्मा की कुर्बानी देना आत्मपरीक्षण ही है। लेखक आगे लिखते हैं कि ‘‘इस घटना ने उस पुरानी पीडा से मुझे मुक्त कर दिया। और मुझे लगने लगा कि वैसी घटनाएं बदले की भावना से नहीं, बल्कि वैचारिक चेतना से ही रोकी जा सकती है।’’ (पृ. 84) लेखक के जीवन पर बुद्ध विचार का गहरा प्रभाव है, उसका परीक्षण करते वे लिखते हैं कि ‘‘उनके ज्ञान का मुख्य निचौड़ था दुनिया में दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण है तथा दुख निवारण का मार्ग है।’’ (पृ. 144) आदि लेखकीय तात्विक विवेचन, परीक्षण और चिंतन भविष्य का रास्ता तय करने में सहायक होता है। अर्थात् प्रत्येक कृति का आत्मपरीक्षण दलितों का जीवन बदल सकता है। आत्मपरीक्षण, अनुभव, घटना और प्रसंग के आधार पर जीवन को मूल्यांकित करने की लेखक की अपेक्षा है।

4. प्रतिरोध

किसी अन्याय को रोके रखना, उसका विरोध करना अपनी स्वतंत्रता का ऐलान कर देता है या युं कहे कि होने वाले अत्याचारों को रोकने की पहली पहल होती है। मानवी स्वभाव का स्वाभाविक गुण है कि सामने वाला थोडा नरम दिखा कि अपना शोषण तंत्र शुरू कर देता है। किसी के गलत मनसुबों को भापकर समय रहते उसे रोका नहीं गया तो गुलामी तय समझे। दलितों के साथ भी ऐसे ही होता है। दलित है समझ में आया कि सामने वाले की वाणी, आचरण और व्यवहार बदल जाता है। यह पहचान की बात नवीन जगहों की हो गई लेकिन जिस गांव में दलित रह रहे हैं उसकी जाति-कुल तो छिपता नहीं, अतः पहचान-अपहचान का सवाल ही पैदा होता नहीं। किसी दलित व्यक्ति का किसी सवर्ण से पहला संपर्क उसके आगे की जिंदगी, व्यवहार एवं भूमिका को तय करता है। अतः अपने व्यक्तित्व की पहचान समाज में बनानी होती है। डॉ. तुलसी राम का व्यक्तित्व विशिष्ट परिस्थिति में ढलता गया, आकार ग्रहण करता गया जो उस समय की घटनाओं में सही ठहरता है। ‘मुर्दहिया’ के कुछ प्रसंगों में सारे दलित समाज का प्रतिरोध ताकतवर बनकर आता है, जो लेखकीय समाज का दर्शन कराता है। लेखक ने ‘मुर्दहिया’ के कई प्रसंगों में दलित और ब्राह्मण के आमने-सामने आने का वर्णन किया है। जब बात लाठी-डंड़े तक आती है तब चौधरी चाचा के यहां पंचायत बिठायी जाती है। ‘कूर’ बांधने की प्रथा के तहत एक रेखा खिंची जाती है और इस पार से उस पार आवाहन दिया जाता अगर दम हो तो, रेखा लांघकर मारने का साहस करो। ब्राह्मणों के पास कुल्हाडी, भाले, बल्लम रहते थे पर दलितों के पास केवल लाठी। लेकिन दलित महिलाएं प्रतिरोध बनकर सामने आती है और मरे जानवरों की तलवारनुमा पसलियां, गढ्डों में फेंकी गंदगी – ‘बियाना’, मल-मूत्र हंडियों में भर-भरकर उन पर टूट जाती तो ब्राह्मण भाग जाते और क्षमा भी मांगते। (पृ. 64) उक्त दृश्य संपूर्ण दलितों के प्रतिरोध को दिखाता है।

लेखक ने जेदी चाचा के अहिंसात्मक प्रतिरोध को वर्णित किया है। जेदी चाचा किसी भी अन्याय के प्रति आवाज उठाते और सत्याग्रह पर बैठ जाते। इस परेशानी से मुक्ति पाने के लिए और जेदी चाचा को सबक सिखाने के लिए झूठ-मूठ का बकरी चोरी का आरोप लगाकर थाने ले लिया गया। पिटवाया गया और रस्सी से बांधकर पकड़कर ले जाया गया। मूल बात यह थी कि यह आरोप तथ्यहीन थे और बासू पांडे के पास कभी कोई बकरी थी भी नहीं। बाद में जेदी चाचा छुटे भी परंतु सारे दलितों पर पुलिस का भय हांवी रहा। जेदी चाचा ने अपना सत्याग्रह जारी रखा। ‘‘बासू पांडे के इस छलिया कपट से आघातित होकर जेदी चाचा प्रतिरोधस्वरूप नए किस्म का सत्याग्रह करने लगे। वे सब काम-धाम बंद कर दाढी-मूंछ बढाना शुरू कर दिए तथा निचंड़ धूप में चारपाई डालकर एक चादर ओढ़कर दिनभर सोते रहते थे। पूछने पर कहते थे कि जब तक बामन न्याय नहीं करते, मैं दाढी-मूंछ बढाता रहूंगा तथा धूप में ही सोऊंगा। वे इस मामले में निहायत जिद्दी थे। पंचायत आदि द्वारा किसी अन्य समझौते को वे मानने से साफ इनकार कर दिए थे।’’ (पृ. 92) जेदी चाचा का यह सत्याग्रह, असहकार प्रतिरोधकस्वरूप है हांलाकि इसमें उनकी मौत होती है लेकिन सारे दलित समाज में संवेदना, चेतना का टिमटिमता दीप जलाकर, यह बात कोई कम नहीं। लेखक को प्राप्त हुई 162 रुपए की स्कॉलरशीप में से 81 रुपए की लूट करने वाले देवराज सिंह दोस्ती के नाम पर धब्बा है। जो आदमी अपनी फाकाकशी में पकौडी खिलाकर स्वागत करता है, दोस्ती के लिए जान देने की बात करता है उसके सीने पर छुरी रखकर 81 रुपए की लूट करना कहां की मर्दुमकी है। लेखकीय अहिंसात्मक वृत्ति कहे या दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है वाली वृत्ति कहे आगे के लिए सचेत रहती हैं। इस घटना के बाद भी उनका यह लिखना कि ‘‘देवराज सिंह से कभी दुबारा मुलाखात नहीं हुई। मगर, कभी मिल गए, तो मैं उनका स्वागत पकौडियों से अवश्य करूंगा।’’ (पृ.178) मौन प्रतिरोध है। जो ऐसी प्रवृत्ति वाले लोगों के मुंह पर झनझनाता थप्पड़ जड़ देता है। कुलमिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि दलितों के भीतर का एक पात्र भविष्य को बनाने के लिए कई कुर्बानियां देता है और अपने प्रतिरोध को ‘डिफेन्सीव’ भी बनाता है। उसका कारण तत्कालीन परिस्थितियां है। हर आदमी की प्रकृति उसे नए-नए मार्ग बता देती है और उसके हिसाब से उसका बर्ताव भी तय होता है। ‘मुर्दहिया’ के अन्य ग्रामीण दलित पात्र सवर्णों को ‘कूर’ में पराजीत करवाते हैं यह बात प्रशंसनीय है। ऐसी घटनाओं से उनको आत्मबल भी मिलता है।

5. नकार

नकार दो प्रकार का होता है, एक आपको दिए हुए कार्य, स्थान एवं स्थितियों को नकारना और दूसरा सामाजिकता नकारता के भीतर एक शक्ति पाकर सारे समाज को नकारते अपने अस्तित्व को ढूंढ़ना। कहां जाता है कि आप किसी को जितना दबाने की कोशिश करेंगे वे उतनी ही ताकत के साथ उठने का प्रयास करेंगे। पीढियों से दबा दलित समाज जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ उठ चुका है, अब कोई भी दबाव उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। अर्थात् नकार से शक्ति पाना हमारी फितरत में हो। डॉ. तुलसी राम जैसे अनेक दलित लोगों का निर्माण सामाजिक नकार के पश्चात् ही हुआ है। प्रत्येक दलित पात्र ध्यान रखे कि आत्मसम्मान, प्रतिष्ठा एवं अधिकार पाने का एक जरिया है – शिक्षा। दुनिया भर के अभाव और पीडाओं को झेलते सबकी हिकारत एवं ‘अपशकुन’ अगर डॉ. तुलसी राम बन सकती है तो आम दलित क्यों नहीं? सबके पास प्रतिभा होती है और अभाव की परिस्थिति में और निखरती है, प्रज्वलित होती है। दलित ऐसी परिस्थिति पहले से पा चुके हैं, बस जरूरत है केवल शिक्षा की। साधारण शिक्षा से बीस साल जुडी मेहनत न केवल किसी एक व्यक्ति को उठाती है बल्कि उसके पूरी जाति और समूह में ताकत भर देती है। अतः जरूरत है सामाजिक नकार का पूरा-पूरा लाभ उठाए।

डॉ. तुलसी राम के परिवार में वे सबसे छोटे रहें। दलितों की चिट्ठियों को पढ़ने से ब्राह्मणों का नकार तुलसी को स्कूल भेज देता है और अपनी प्रतिभा के बलबूते पर सारे ठाकुर, ब्राह्मण और सवर्णों को पिटते हुए हमेशा क्लास में अव्वल आता है।ब्राह्मणों से हुई पढाई-लिखाई की गलतियों से उनको पिटने का मौका लेखक को मिला करता था, और पढ़ने का, मेहनत करने का हौसला बढ़ जाता है। अतः सामाजिक नकार उनके लिए हीत का कार्य करता है।

भारतीय समाज, जाति-धर्म, संपत्ति-जमीन-जायदाद का मालिकाना हक भी लेखक नकारते हैं। दलितों का संघर्ष, पीडा, भूखमरी को देखकर लेखक को पीडा होती है। ‘‘ऐसी परिस्थितियों से गुजरने वाले वातावरण में ‘हकबट’ तथा ‘सभी कमाएंगे सभी खाएंगे’ इतना ज्यादा मेरे दिल को छू गए थे कि मैं आने वाली सारी जिंदगी में समाजवाद तथा सोवियत संघ का अंधभक्त बना रहा।’’ (पृ. 38) सामाजिक नकार, अन्याय-अत्याचार, असमान अधिकार का नतिजा है कि लेखक की सोच ऐसी बनी। यह केवल लेखकीय मंशा ही नहीं तो प्रत्येक दलित इस बात का पुरस्कार करता है।

6. विद्रोह

वेदना, संघर्ष, आत्मपरीक्षण, प्रतिरोध और नकार विद्रोह को जन्म देता है। विद्रोह दलित विमर्श की कसौटी में चरमोत्कर्ष की अवस्था है। सामाजिक असंतोष संपूर्ण स्थितियों को नकारते हुए अत्याचार के विरूद्ध लड़ने के मनसुभों को पुख्ता करता है। लेखकीय गांव में दलित और सवर्ण की लडाइयां, संघर्षात्मक स्थिति विद्रोह ही तो है, लेकिन वह लंबी शक्ल नहीं लेती। ऐसी घटनाओं में भविष्य के संकेत मिलते हैं।

यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करना आवश्यक है जो लेखक के साथ दसवीं की फायनल परीक्षा के दौरान घटित होती है। उन्हीं की क्लास में पढ़ता हीरालाल बचपन से लेखक के साथ बेवजह भीड़ता था और अपमानित करता था। बार-बार ‘चमरा-चमरा’ कहकर अपमानित करना आम बात थी पर उसका ‘‘का रे चमरा तं येहो आ गइले।... देखत हईं तू कइसे इम्तिहान दे ला।’’ (पृ. 156) कहना लेखक को भयभीत करता है। रूपराम तक यह बात जब पहुंच जाती है, वह विद्रोह कर उठते हैं। दस-पंद्रह आदमियों को लेकर लाठी-भाले के साथ गरजना, दलित समाज के प्रति उनकी एकजुटता का बेजोड़ उदाहरण है, लेखक के रोकने के पश्चात् वे सब रूके नहीं तो हीरालाल का पिटना तय था। ऐसे दस-बीस पात्र अगर हाथों में लाठी और आवाज में दहाड़ लेकर बरसने लगे तो सवर्णों के अन्याय और हिकारत को मिटाया जा सकता है।

डॉ. तुलसी राम का बचपन हमेशा मौन और आत्मपरीक्षण के साथ गुजरता है। उनके मन में कई बाते चलती हैं लेकिन सामाजिक जीत और परिवर्तन के लिए कई बार सहनशीलता को अपनाती है। उनके कड़वे विद्रोह से एक बार चकित होना भी होता है। ‘‘सन् 1961 के ही जाडों की बात है, पिता जी मां को मारने के लिए फरुही लेकर दौडे। मैं वहीं खडा था। मैंने बहुत जोर से पिता जी को एक तमाचा मारा।’’ (पृ. 126) इसके बाद पिता जी द्वारा उन्हें भी पिटा गया परंतु बेटे की इस पहल के बाद दुबारा मां को मारने से वे घबराने लगे। यह प्रसंग लेखक के उबलते विद्रोह को दिखाता है। सामाजिक दबाव, अत्याचार के विरोध में उनका विद्रोह ‘लडाई’ के नाते कभी फूटा नहीं परंतु ‘पढाई’ के नाते फूटा और उसका रूख शिक्षा की ओर मोड़ने में लेखक ने सफलता पाई और यह थप्पड़ समाज का ठेका ले चुके सवर्णों के गाल पर जबरदस्त पडा है। लेखकीय प्रतिभा, समयसूचकता, सब्र, मेहनत, सामाजिक भान विद्रोह के ही अंग बनकर सामने आ जाते हैं।

निष्कर्ष

डॉ. तुलसी राम द्वारा लिखित ‘मुर्दहिया’ आत्मकथन अपशकुन से शुभशकुन तक के सफर को वर्णित करता है। शिक्षा से कौनसा परिवर्तन हो सकता है इसका बखान और आदर्श उदाहरण प्रस्तुत आत्मकथन है। उनके आत्मकथन के अगले हिस्से का सबको इंतजार रहेगा। दोनों आत्मकथनों को पढ़कर दलित समाज के संघर्षरत युवक, विद्यार्थी और बच्चे आत्मबल पाए। वर्तमान युग में आप बडी किताबें, ग्रंथ एवं चिंतनात्मक तात्विक बातें पढे बेहतर है पर इनके नहीं पढ़ने से कोई विशेष हानि नहीं होगी। लेकिन ‘मुर्दहिया’ जैसी कृतियां, कृतियां नहीं तो जीती-जागती जिंदगी का चलचित्र है, जो प्रत्येक दलित पात्र को अपनी लगती है; अतः ऐसी रचानाओं को पढे। दलित होने के नाते सामाजिक बहिष्कार और एक आंख से अंधा होने के कारण पारिवारिक बहिष्कार-उपेक्षा के शिकार डॉ. तुलसी राम दोहरी मार झेलते हैं। ज्ञान और शिक्षा की आंख पाकर वे जिस मुकाम पर पहुंच चुके हैं उससे उनकी एक आंख अलंकार बनकर आती है, जो उनके लिए बहुमूल्य है। आशा है डॉ. तुलसी राम की एक आंख दलितों की आंखें खोलने में सफल हो जाएगी।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था प्रायव्हेटायझेशन के दौर से गुजर रही है और सरकारी नीतियां प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक नकारात्मक बनती जा रही है। ‘मुर्दहिया’ को पढ़ते इसका एहसास हो जाता है कि हमारे देश में प्रतिभा की कमी नहीं है परंतु उस प्रतिभा को निखारने के लिए उचित शिक्षा तंत्र की आवश्यकता है। सरकारी तंत्र सारी शिक्षा की जिम्मेदारी उठाए और प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक का सफर पूर्ण रूप से मुफ्त करे। आगे चलकर यह भी पहल करे कि प्रत्येक विद्यार्थी को स्कूल की उपस्थिति के लिए खाना नहीं तो आर्थिक रूप में भरपूर शिक्षावृत्ति दे। कोई जाति-धर्म माने बिना सबके लिए शिक्षावृत्ति और मेधावी-प्रतिभासंपन्न छात्रों के लिए उनसे चार गुना शिक्षावृत्ति बहाल करे तो भारत का भविष्य उज्ज्वल बन सकता है। दलित-पीडित पात्र शिक्षा के बलबूते पर लंबी उडान ले सकता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत एक देश के नाते विकसित देशों की तुलना में अपना अस्तित्व दलित रूप में ही पाता है। अतः शिक्षा के वर्तमान स्थिति पर पूनर्विचार करते हुए केवल मुफ्त नहीं तो सबके लिए शिक्षावृत्ति के साथ पढाई की कल्पना मंहगी है पर असंभव नहीं। ‘मुर्दहिया’ के बहाने केवल दलित नहीं तो प्रत्येक भारतवासी अपना आत्मपरीक्षण करें तो बेहतर होगा।

समीक्षा ग्रंथ –

मुर्दहिया (आत्मकथन) – डॉ. तुलसी राम, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली,

प्रथम संस्करण - 2010, पेपर बैक्स संस्करण – 2012, पृष्ठ 184, मूल्य – 125

डॉ. विजय शिंदे

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देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे


लघुकथा: थोड़ी सी प्यास

    किसान हीरा की पत्नी घाट से जो मटका भर कर लाती थी, उसमें छोटा सा छेद हो गया था| उस पर हाथ रखते रखते भी पानी ज़मीन पर गिर ही जाता| जैसे तैसे वो पानी लेकर आती थी|

    उसने अपने पति से इस बात की शिकायत की कि, अब इस मटके से पानी भरना संभव नहीं है, आप नया मटका ले आओ| हीरा थोड़ा व्यस्त था, जब तक वो नया मटका खरीदता, तब तक पुराने मटके का छेद काफी बढ़ गया और बहुत सारा पानी तो रास्ते में ही गिर जाता|

    नया मटका आते ही पुराना मटका हीरा की पत्नी ने बाहर फैंक दिया, वहां काफी कीचड़ थी, उसमें मटका घुल गया| मटके के गिरे हुए पानी ने धरती की शायद थोड़ी सी प्यास बुझाई थी, इसलिये धरती ने अपनी गोद में जगह दे दी...

    थोड़ी सी प्यास बुझाने का क़र्ज़ चुकाया....शायद यही अंतर है, प्रकृति और इंसान में !

    - चंद्रेश कुमार छतलानी

    --
    Regards,
    Chandresh Kumar Chhatlani
    +91 99285 44749
    http://chandreshkumar.wetpaint.com

    पर्यावरण - बच्‍चे क्‍या करें ?

    (बालवाणी, हिन्‍दी संस्‍थान लखनऊ के जुलाई-अगस्‍त 2013 में प्रकाशित)

    बच्‍चों आप सबने अपने स्‍कूल की किताबों में पर्यावरण के विषय में बहुत कुछ पढ़ा है । पर्यावरण दिवस पर आप में से बहुतों ने चित्रकला प्रतियोगिताओं और रैलियों में भी भाग लिया होगा । प्रकृति ने वनों और नदियों के रुप में जो नैसर्गिक सौंदर्य हमें प्रदान किया है, उसमें निरन्‍तर कमी आ रही है और यह बहुत ही चिन्‍ता का विषय है। यह बहुत ही आश्‍चर्य की बात है कि बच्‍चों को तो पर्यावरण का सुरक्षित रखने के लिए जागर�क बनाया जाता है और आप अपनी जागरुकता दिखाते भी हैं परन्‍तु वास्‍तविकता में बड़े लोग अर्थात आपके या आपके कई मित्रों के माता-पिता पर्यावरण के प्रति उतने जागरुक दिखायी नहीं देते । बड़े लोगों की पर्यावरण के प्रति उदासीनता चिन्‍ता का विषय है । आज आवश्‍यकता इस बात की है कि बच्‍चे स्‍वयं तो जागरुक हों ही वरन अपने माता-पिता को भी जागरुक बनायें और इस बात का अहसास करायें कि यदि बड़े लोग पर्यावरण के प्रति उदासीन होंगे या लापरवाही बरतेंगे तो इससे उनके ही बच्‍चों की हानि होगी । पेड़ कार्बन डाइआक्‍साइड को आक्‍सीजन में परिवर्तित कर हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा देते हैं, वहीं नदियां पीने के लिए सिंचाई के लिए पानी देती हैं ।

    आप बच्‍चे सोंचेंगे कि इसके लिए वे क्‍या कर सकते हैं? तो बच्‍चों यहां मैं आपको बिन्‍दुवार कुछ सुझाव दे रहा हूँ और आप से आशा करता हूँ कि आप स्‍वयं तो इन पर अमल करें ही अपने माता-पिता को भी इन पर अमल करने के लिए प्रेरित करें ।

    1- पेड़ों को काटने से बचाना - जिन बच्‍चों के पिता वन विभाग में कार्य करते हैं या किसी भी प्रकार की निर्माण संस्‍था से जुड़े है, वे बच्‍चे अपने पिता को इस बात के लिए प्रेरित करें कि जहां तक सम्‍भव हो पेड़ों को काटने से बचायें । सड़कों को चौड़ा करने या नयी सड़क बनाने के लिए यदि कुछ पेड़ काटने आवश्‍यक हों तो कम से कम उतने ही पेड़ सड़कों के किनारे लगाने की व्‍यवस्‍था भी करें । पेड़ों के बीच से जाती सड़क कितनी सुन्‍दर लगती है यह अपने स्‍वयं अनुभव किया होगा । जहां सड़क के किनारे पेड़ नहीं होते वो सड़कें बड़ी वीरान नज़र आती हैं ।

    2- अपने घर के आस-पास पेड़ लगाना - आप में से कई बच्‍चों ने चित्रकला प्रतियोगिता में भाग लेकर बड़ी सुन्‍दर सी पेड़ों से घिरी झोपड़ी या मकान बनाया होगा लेकिन यह नहीं सोचा कि आप के घर के बाहर बहुत सी ऐसी जगह है जहां पेड़ लगाये जा सकते हैं । तो बच्‍चों अपने माता-पिता से थोड़ी ज़िद करें कि वे कुछ पेड़ लगाने में आपकी सहायता करें । कुछ ही दिनों में जब वह पेड़ बड़ा होगा तो आपको छाया देगा और आपका स्‍कूटर या कार भी गर्मी में धूप में नहीं तपेगी । उस पेड़ पर बैठी चहचहाती चिड़ियां भी आपको मधुर गीत सुनायेंगी ।

    3- नदियों और तालाबों को प्रदूषण से बचाना - नदियों और तालाबों का प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्‍या है । आप ज़रा अपने माता-पिता से पूछें कि क्‍या उन्‍हे वह दिन याद हैं कि जब वह अपने बचपन में नदी या किसी तालाब के किनारे जाते थे तो पानी कितना साफ़ होता था । वह अवश्‍य ही कहेगें कि हाँ पहले पानी बहुत साफ़ हुआ करता था । तो फिर अब क्‍या हो गया? यह सब लोगों की लापरवाही का परिणाम है । आप लोग अपने माता-पिता से कहें कि पूजा के फूल नदियों या तालाबों में न डालें इससे प्रदूषण बढ़ता है । पूजा के फूलों को अपने ही घर की बग़ीचे में एक गड्‌ढे में जमा करें साथ ही सब्‍ज़ियों और फलों के छिलके भी उसमें जमा करते जायें, कुछ दिनों बाद यह आपके बग़ीचे और गमलों के लिए खाद का काम करेंगे । बहुत सी फ़ैक्‍टरियों का दूषित जल व हानिकारक रसायन नदियों में बिना उचित व्‍यवस्‍था के प्रवाहित हो रहे हैं । सरकार इस विषय पर कार्य कर रही है परन्‍तु खेद है कि यह प्रयास अभी तक सफल नहीं हुए हैं । आप अपने माता-पिता के साथ इस विषय में मिल जुल कर सम्‍बन्‍धित विभागों को पत्र लिख सकतेे हैं या राष्‍ट�पति, प्रधान मन्‍त्री, राज्‍यपाल और मुख्‍यमन्‍त्री को ज्ञापन भेज सकते हैं । सबकी एक आवाज़ सरकार को और अधिक प्रभावी र�प से कार्य करने के लिए विवश करेगी ।

    4- पॉलीथीन के प्रयोग पर लगाम - बच्‍चों पॉलीथीन आज के समय की बहुत विकट समस्‍या है । हम लोग जो पॉलीथीन बाहर सड़क पर या कूड़े में फेंक देते हैं उसमें से बहुत सा सीवर में चला जाता है । सीवर में जाकर या तो सीवर को बन्‍द कर देता है या फिर नदियों तक पहुंच जाता है और प्रदूषण बढ़ाता है । दोनों ही स्‍थितियों में हानि सबकी होती है । बहुत से लोग बचा हुआ घर का कूड़ा या बचा हुआ बासी खाना पॉलीथीन में डाल कर बाहर डाल देते हैं जिसे अनजाने में गाय खा लेती है और पॉलीथीन उसके पेट में चला जाता है । यह गाय के लिए बहुत ही पीड़ा दायक है । इन सभी स्‍थितियों से बचने के लिए एक प्रण लेने की आवश्‍यकता है कि हम पॉलीथीन का प्रयोग कम से कम करेेंगे । कैैसे करेंगे? अपने माता-पिता से कहें कि सामान, सब्‍ज़ी, फल या दूध लेने जाते समय घर से थैला लेकर जायें । अगर एक थैले में आलू प्‍याज़ मिल कर घर आ जायेगा तो कोई हानि नहीं होगी और उसे घर आकर अलग किया जा सकता है । इसी तरह सेब और केला या सन्‍तरा एक थैले में लाकर घर पर अलग कर सकते हैं, उन्‍हें अलग पॉलीथीन में लाने का कोई औचित्‍य नहीं है । दूध के पैकेट भी थैले में लाये जा सकते हैं और पॉलीथीन का प्रयोग कम किया जा सकता है ।

    5- कार और स्‍कूटर का उचित रख-रखाव आवश्‍यक - विभिन्‍न वाहनों से निकलने वाला धुआं पर्यावरण के प्रदूषण का एक बहुत मुख्‍य कारण है । वाहनों से होने वाले प्रदूषण से बचाने के लिए ही शहरों में अधिक से अधिक बड़ी गाड़ियां सी0एन0जी0 से चलायी जा रही हैं । ड़ीज़ल और पैट्रोल से चलने वाले वाहनों निकलने वाले धुंए की मात्रा भी निर्धारित है । अतः आप अपने माता-पिता से कहें कि वह अपनी गाड़ियों का रख-रखाव भली प्रकार करें और इंजन की ट्‌यूनिंग समय पर कराते रहें जिससे धुंआ कम निकले और वातावरण के प्रदूषण को कम किया जा सके ।

    बच्‍चों आप यह सोंच रहे होंगे कि यह सारी बातें मैं आपसे से करने के लिए क्‍यों कह रहा हूँ ? तो बात यह है कि बच्‍चे तो समाज और देश का भविष्‍य हैं । उन्‍हें ही आगे चलकर देश की बागडोर संभालनी है । इसलिए यदि वर्तमान में जागरुकता केवल किताबों तक सीमित रह जायेगी तो उससे कोई लाभ नहीं होगा । अतः आप स्‍वयं जागरुक बनने के साथ-साथ यदि आप ब्रड़ों को भी जागरुक बनाने में सफल होते हैं तो यही आपके उज्जवल भविष्‍य की सफलता है । अच्‍छा पर्यावरण अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बहुत आवश्‍यक है ।

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    (शैलेन्‍द्र नाथ कौल)

    11, बसन्‍त विहार

    (निकट सेन्‍ट मेरी इन्‍टर कालेज)

    सेक्‍टर-14, इन्‍दिरा नगर, लखनउ�-226016

    मोबाइल-9839040657

    स्वामी विवेकानन्दः मानव-सेवा एवं सर्वधर्म समभाव

    प्रोफेसर महावीर सरन जैन

    स्वामी विवेकानन्द को ठीक तरह से समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस को सम्यक् रूप से आत्मसात करना जरूरी है। इसी के साथ जब हम रामकृष्ण परमहंस को जानना चाहते हैं तब यह बोध होता है कि उन्हें भारतीय अध्यात्म परम्परा की पृष्ठभूमि में ही पहचाना जा सकता है। इसी को कुछ विद्वानों ने यह कहकर व्यक्त किया है कि “रामकृष्ण परमहंस को समझना है तो चैतन्य महाप्रभु को समझना होगा और विवेकानन्द को समझना है तो रामकृष्ण परमहंस को समझना होगा”।

    रामकृष्ण परमहंस भारतीय साधना के प्रतीक योगी हैं। वे भारतीय अध्यात्म परम्परा के आधुनिक-काल के प्रतिनिधि हैं। दिनकर उन्हें “धर्म के जीते जागते स्वरूप” मानते हैं। उनकी जीवनलीला के विविध विचित्र प्रसंगों को पढ़कर अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है। जैसे गीता में भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप को देखकर अर्जुन को विचित्र व्यापक अनुभूति हुई होगी, वैसी ही अनुभूति हमें श्री रामकृष्ण परमहंस के लीला प्रसंगों को पढ़कर होती है।

    भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व पर विचार करते हुए उसकी पीठिका के रूप में रामकृष्ण परमहंस का उल्लेख किया है। पं. नेहरू के शब्द अत्यंत सारगर्भित हैं –

    “वे चैतन्य की परम्परा के संत थे। उन्होंने मुस्लिम, ईसाई और हिन्दू साधना पद्धतियों का अवलम्बन कर, सत्य की खोज की। वे सीधा सादा जीवन व्यतीत करते थे। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर नरेंद्र विवेकानन्द बने”।

    चैतन्य ने भक्ति की भावप्रवण धारा प्रवाहित की। वेदांती उन्हें अपनी परम्परा के अंतर्गत अचिंत्य-भेदाभेदवाद के आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। मगर स्वयं चैतन्य शास्त्रज्ञान को अपने हाथों में लेकर आगे नहीं बढ़े। उन्होंने स्वयं आचार्य का गौरव पाने के लिए प्रस्थानत्री (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, गीता) पर भाष्य नहीं लिखे। उनको अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए “नाना पुराण निगमागम सम्मत” कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी। उनकी भक्ति की भावप्रवण धारा में अवगाहन करने के लिए शास्त्रों में पारंगत होना जरूरी नहीं, शास्त्रों को पढ़ने की भी प्रासंगिकता नहीं। उसके लिए तो हृदय का द्रवित होना अनिवार्य शर्त है। हृदय का पिघलना जरूरी है। हृदय की भावप्रवणता जरूरी है। भावप्रवणता की ऐसी तेज धारा में बहना जरूरी है, जिसके वेग में सब कुछ बह जाता है – मन की सारी कल्मषताएँ और समाज की सारी विषमताएँ। ऊँच-नीच की, जाँति-पाँति की, अमीर-गरीब की सारी दिवारें ध्वस्त हो जाती हैं। चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करते करते ऐसी भाव-समाधि में लीन हो जाते थे कि उस स्थिति में न कोई अपना रह जाता था और न कोई पराया। उन्हें किसी अन्य का कोई भान नहीं रह जाता था। उन्हें अपने शरीर का भी कोई भान नहीं रह जाता था। उस स्थिति में क्या शेष रह जाता था। इसका उत्तर है – एकात्मता की अनुभूति। यह पढ़ने की या बाँचने की नहीं; अनुभूत करने की साधना है।

    चैतन्य महाप्रभु के सदृश्य रामकृष्ण परमहंस की भी जीवनलीला भावप्रवणता के अतिरेक की है। यदि चैतन्य को कीर्तन में अद्भुत एकात्मता की अनुभूति होती थी तो रामकृष्ण को अपनी आराध्या आद्या-शक्ति से निरंतर ऐसे आत्मीय अंतरंग सम्बंध की अनुभूति होती थी, जहाँ उपास्य और उपासक में कोई भेद नहीं रह जाता। शास्त्र-ज्ञान की उपयोगिता साधक को साधना के मार्ग का बोध कराने में है जिस पर चलकर वह मंजिल तक पहुँच सके। यदि कोई साधक सीधे मंजिल तक पहुँच जाए तो फिर शास्त्र-ज्ञान की क्या प्रासंगिकता। मध्य युग में नाथ एवं संत साधकों ने इस रहस्य को जाना था; पहचाना था। रामकृष्ण भी ऐसे ही साधक थे। सभी धर्मों के मूल तत्त्वों को उन्होंने अपने जीवन में साकार किया। वे क्रमशः वैष्णव, शैव, शाक्त, अद्वैतवादी, तांत्रिक, मुसलमान तथा ईसाई बने। उन्होंने इन विभिन्न धर्मों एवं साधनाओं के मूल तत्त्वों को किसी किताब से पढ़ने पर जोर नहीं दिया। उन्होंने उन्हें अपने जीवन में साधा। उन्हें अनुभूत किया। वैष्णव परिवार में जन्म, माँ काली मंदिर के अनन्य एवं अप्रतिम पुजारी तथा भैरवी माँ से तंत्र साधना, महात्मा तोतापुरी से अद्वैत साधना, गोविंद राय से इस्लामी साधना तथा शम्भूचरण मल्लिक से ईसाइयत साधना में दीक्षित होकर रामकृष्ण ने निम्न निष्कर्ष निकालेः

    1. धर्म मुँह से कहने की चीज़ नही है। यह आचरण में उतारने की साधना है।

    2. सभी धर्म एवं साधना-पद्धतियाँ एक ही ईश्वर या शक्ति या सत्य की उपलब्धि के रास्ते हैं। विभिन्न धर्मों का अवलम्बन करने के कारण, वे सर्वधर्म समभाव की सहज प्रतीति कर सके।

    शास्त्रों का विधिवत अध्ययन किए बिना ही उनका परमतत्त्व से सीधा नाता जुड़ गया। उनका धर्म गहरा आनन्द था। उनकी पूजा समाधि। शास्त्रीय ज्ञान के अभ्यासी रामकृष्ण परमहंस के जीवन लीला के विभिन्न प्रसंगों की तर्क-संगत व्याख्या नहीं कर पाते, उनको समझ नहीं पाते; उनका आकलन नहीं कर पाते। उन्होंने अपने मन को सहज साधना से साध लिया था। अपने चित्त को निष्कलुष बना लिया था। यदि कभी मन विचलित होता तो समाधिस्थ हो जाते। कंचन-कामिनी से वे कभी भावित नहीं हुए। उनके लिए सभी स्त्रियाँ जगदम्बा के ही अंश थे। दक्षिणेश्वर की काली की मूर्ति तो उनकी माँ थी हीं, अपनी पत्नी शारदा में भी वे माँ के ही दर्शन करते थे। शारदा देवी जो सुहागिन होकर भी दाम्पत्य विहीन थीं, गृहस्थिन होकर भी संयासिनी थीं तथा मातृत्व विहीन होकर भी जगन्माता थीं। एक प्रसंग आता है। शारदा मंदिर में रहने के लिए आ जाती हैं। एक दिन जब वे रामकृष्ण के पैर दबा रही थीं तो रामकृष्ण के मन से जो शब्द निकले वे इसके सहज प्रमाण हैं कि वे प्रत्येक स्त्री में माँ के ही दर्शन करते थेः ” जो माता उस काली मंदिर में है, वही इस शरीर को जन्म देकर नौबतखाने में निवास करती है और वही यहाँ पर इस समय मेरे पैर दबा रही है”। ऐसे प्रसंगों को शास्त्र-ज्ञान या तर्क-बुद्धि से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए एकात्म की अनुभूतिगम्यता की स्थिति में पहुँचना होता है।

    रामकृष्ण एवं नरेन्द्र का मिलनः

    रामकृष्ण विश्वास, आस्था एवं निष्ठा के अथाह शीतल-सागर थे। नरेंद्रनाथ संशय, दुबिधा, तर्क, विज्ञ एवं मेधा की प्रचंड धधकती ज्वालाएँ। नरेंद्रनाथ दत्त और रामकृष्ण का मिलन ऐतिहासिक घटना है। नरेंद्रनाथ दत्त जैसा बौद्धिक प्रतिभा का धनी एवं प्रचंड तर्कों के लिए विख्यात नास्तिक युवक रामकृष्ण के पास जाकर उनको ललकारता हुआ प्रश्न करता हैः “क्या तुम मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हो”।

    आत्मविश्वास से आपूरित रामकृष्ण का स्वीकारात्मक उत्तर मिलता है। रामकृष्ण के सीधे-सादे एवं नपे-तुले शब्दों को सुनकर तथा उनके सरल-निष्कपट व्यवहार को देखकर नरेंद्र का चित्त पिघलने लगता है। नरेंद्रनाथ दत्त का रामकृष्ण से अनेक दिन संवाद चलता है। रामकृष्ण नरेंद्रनाथ दत्त को माँ के दर्शन कराते हैं। अचानक जो घटित होता है, उसको किसी तर्क से नहीं समझा जा सकता। उसकी किसी शास्त्र-ज्ञान से मीमांसा नहीं की जा सकती। शक्तिपात के बारे में शास्त्रों में उल्लेख तो मिलते हैं। मगर आधुनिक काल का तार्किक मानस उस पर विश्वास करने को तैयार न होता था। जब नरेंद्र के जीवन में यह घटित होता है तब सारे संशयों, सारे द्वंदों, सारी आशंकाओं, सारी दुबिधाओं तथा सारी उलझनों के आगे पूर्ण विराम लग जाता है। नरेंद्रनाथ दत्त तिरोहित हो जाते हैं और उनके स्थान पर विवेकानंद का अभ्युदय होता है और विवेकानन्द के रूप में भारत की सुषुप्त चेतना जागृत होती है। नए भारत का जन्म होता है। इस मिलन की परिणति का गहरा अर्थ है। उस प्रतीकार्थ को समझना जरूरी है। अर्थ है - तर्क और बुद्धि का आस्था और विश्वास के आगे सिर झुकाना। प्रतीकार्थ है – तर्क के स्थान पर विवेक को तथा बुद्धिगत भटकावों के स्थान पर आनन्द को अंगीकार करना।

    रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्दः

    रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द को विचारक एक ही सत्य के दो पक्ष मानते हैं। इस मान्यता में सत्यांश तो है, मगर यह पूर्ण सत्य नहीं है। दोनों की तुलना ही करनी है तो मुझे स्वामी निर्वेदानन्द का मत अधिक संगत प्रतीत होता हैः “ रामकृष्ण की जटाओं रूपी वैयक्तिक समाधि के कमंडलु में धर्म की गंगा बंद थी। विवेकानन्द ने भगीरथ की तरह धर्म-गंगा को रामकृष्ण के कमंडलु से निकालकर सारे संसार में फैला दिया”। इसी को इस तरह आगे बढ़ाया जा सकता है कि दोनों अलग-अलग रास्तों पर चले। ये रास्ते उसी प्रकार अलग थे जिस प्रकार बौद्ध धर्म के अर्हत्-यान अथवा श्रावक-यान एवं बुद्ध-यान अलग थे जो बाद में हीनयान एवं महायान के भेद के रूप में जाने गए। एक का लक्ष्य था – अपनी मुक्ति। दूसरे का लक्ष्य था – असंख्य जीवों का कल्याण।

    चैतन्य एवं रामकृष्ण भक्त की भक्ति के प्रतिमान हैं। विवेकानन्द का महत्व अथवा उनका प्रदेय निम्न कारणों से अधिक हैः

    (1) व्यावहारिक जीवन की समस्याओं का समाधान करना तथा समसामयिक दृष्टि से पराधीन भारत के सुषुप्त मानस में आत्म गौरव एवं आत्म विश्वास का मंत्र फूँककर उनको कर्म-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देना।

    (2) मंदिर में विराजमान मूर्तियों की पूजा एवं उनको भोग चढ़ाने की अपेक्षा जीते-जागते इंसान की सेवा को महत्व प्रदान करना।

    (3) सर्व धर्म समभाव का प्रतिपादन करना।

    समकालीन भारत की समस्याओं का समाधान एवं कर्म-पथ पर आगे बढ़ने का आवाहनः

    विवेकानन्द का प्रदेय समकालीन भारतीय परिस्थितियों के समाधान की दृष्टि से भी कम नहीं है। विवेकानन्द की धर्म-चेतना केवल व्यक्ति के निजी कल्याण तक सीमित नहीं है। उनकी धर्म-चेतना सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग भी है और सचेष्ट भी।

    सन् 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में उनके व्याख्यान ने विश्व- मानस को कितना प्रभावित किया – इसका वैज्ञानिक पद्धति पर अवलम्बित अध्ययन प्रस्तुत करना तो दुष्कर है मगर इस पर सब एकमत हैं कि उनके व्याख्यान को सुनकर जहाँ पश्चिम जगत भारत की अध्यात्म चेतना की श्रेष्ठता का कायल हो गया वहीं उसने भारतीयों में नई प्राण चेतना का संचार किया। इस दृष्टि से महर्षि अरविंद का यह कथन द्रष्टव्य है –

    “पश्चिमी जगत में विवेकानन्द को जो सफलता मिली वह इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को ही नहीं जगा है वरन् वह विश्व-विजय करके दम लेगा”।

    विवेकानन्द ने व्यावहारिक दृष्टि से भारत की जनता को सचेत कियाः “सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र। चाहिए चरित्र का ऐसा बल और मन की ऐसी दृढ़ता जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रति बन सके”।

    “उठो, जागो, और जब तक ध्येय की प्राप्ति नहीं हो जाती – तब तक रुको मत”।

    वाद-विवाद की, शास्त्रार्थ की जरूरत नहीं है। जरूरत है – कर्म-पथ पर आगे बढ़ने की, बढ़ते जाने कीः

    “तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न करो। मिल-जुलकर आगे बढ़ो”।

    “जो केवल अपने ही उद्धार में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार कर सकेंगे और न दूसरों का। - - - - कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। जब कार्य करने का समय आता है तो उनका पता नही चलता। तुम काम में जुट जाओ। अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ो”।

    “मुक्ति उसी के लिए है, जो दूसरों के लिए सब कुछ त्याग देता है। और दूसरे, जो दिन-रात मेरी मुक्ति, मेरी मुक्ति कहकर माथा-पच्ची करते रहते हैं, वे वर्तमान और भविष्य में होने वाले अपने सच्चे कल्याण की सम्भावना को नष्ट कर यत्र-तत्र भटकते फिरते हैं। मैंने स्वयं अपनी आँखों ऐसा अनेक बार देखा है”।

    साधक को साधना पथ पर आगे बढ़ने के लिए क्या करणीय है। विवेकानन्द का उत्तर हैः

    “मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा”।

    साधना पथ में कभी-कभी बाधाएँ आती हैं। मन डाँवाडोल हो जाता है। विवेकानन्द ऐसे साधकों को प्रबुद्ध करते हैं :

    “किसी बात से तुम उदास एवं निराश मत होओ। जीवन के अंतिम क्षण तक डरो मत। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के सदृश्य काम करते रहो”।

    “लोग चाहे तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग के बाद – इन सबसे निर्लिप्त तुम न्यायपथ से कभी विचलित न हो”।

    “अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। विघ्नों के बीच ही कल्याण का रास्ता भी निकलता है। कोई संशय मत पालो। कोई चिन्ता न करो। शत्रुओं से मत घबराओं। अपना काम करते जाओ”।

    “वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो। व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है। इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं”।

    “परोपकार का काम करना बच्चों का खेल नहीं है। श्रेष्ठ आदमी वे हैं जो अपने हृदय-रुधिर से दूसरों के लिए रास्ता तैयार करते हैं। एक आदमी सेतु निर्माण के लिए अपना जीवन भी दाव पर लगा देता है। हज़ारों आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते हैं”।

    “लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर, एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहो। क्या तुमने नहीं सुना। कबीरदास का दोहा है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार। साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार"। हम सबको भी ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन में किसी प्रकार का महान कार्य करना सम्भव न होगा”।

    विवेकानन्द की वाणी निराश, मायूस, हताश, भग्नाश आदमी के मन में आशा, विश्वास एवं उत्साह के भाव वपन करती है, उसमें अदम्य साहस पैदा करती है तथा साधनविहीन होते हुए भी अपने लक्ष्य को पाने के लिए आगे बढ़ने की अजेय प्रेरणा प्रदान करती है। यह कहा जा सकता है कि विवेकानन्द के कारण गुलामी की जंजीरों से जकड़े भारत को आत्म-आस्था के प्रदीप के आलोक में अपनी स्वतंत्रता-प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए रास्ता मिला तथा उस रास्ते पर कदम बढ़ाने के लिए अपार प्रेरणा प्राप्त हुई।

    मानव सेवाः

    प्राचीन काल में भगवान महावीर ने अहिंसा के सूत्र से तथा गौतम बुद्ध ने करुणा के सूत्र से प्राणी-मात्र के कल्याण का रास्ता खोजा था। आधुनिक काल की उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से बीसवीं शताब्दी के उदय की कालसीमा में विवेकानन्द ने “मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है” का मर्म जाना तथा वेदांत दर्शन की परात्पर परब्रह्म की अवधारणा के सूत्र से यह खोज कीः

    “प्रत्येक मनुष्य ब्रह्म-स्वरूप है। प्रत्येक मनुष्य की सेवा करना ब्रह्म की ही आराधना है। प्रत्येक मनुष्य ब्रह्म का जीता जागता स्वरूप है। अपनी मुक्ति तक सीमित हो जाना स्वार्थ है। जब कोई मनुष्य भूखा-प्यासा हो या बीमार, रूग्ण, असहाय, लाचार एवं निरुपाय हो तब उसकी सेवा करना छोड़कर पत्थर की मूर्ति को भोग लगाना पाप है”।

    संयासी का क्या धर्म है। उत्तर हैः

    “संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर कर्म करना”।

    यह विवेकानन्द के दर्शन का, उनकी साधना का, उनकी जीवन दृष्टि का सार है। उनका रामकृष्ण मिशन मनुष्य मात्र की सेवा का मिशन है। प्राचीन काल की साधना का प्रतिमान मोक्ष-प्राप्ति था। मध्य युग की साधना का प्रतिमान भक्ति था। विवेकानन्द ने मानव-सेवा का प्रतिमान स्थापित किया। सर्वधर्म समभाव की आधार भूमि पर खड़े होकर उन्होंने मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाया तथा मानव-सेवा को धर्म का पर्याय बना दिया।

    “परब्रह्म सभी जीवों के योग अधिक नहीं है। मानव-बंधुओं की सेवा करना सच्ची ईश्वरोपासना है”।

    “प्रत्येक जीवात्मा ईश्वरीय चैतन्य का अंश है- देवी है। उस दिव्यता की अभिव्यक्ति आत्म-दर्शन है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। यही धर्म का रहस्य है। यही धर्म है”।

    अपनी आत्मशक्ति के अनुभव के बाद वे अन्य सभी मनुष्यों में उसी शक्ति को पहचानने के लिए प्रेरित करते हैं:

    “ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं – इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी उसी ज्योति से आलोकित हैं”।

    कन्याकुमारी में उन्हें यह अहसास हुआ कि भूखे व्यक्ति को रोटी चाहिए। उसके लिए धर्म की कोई प्रासंगिकता नहीं है। उसको धर्म का उपदेश देना व्यर्थ है। उनके वचन हैं:

    “जो जाति भूख से तड़प रही है, उसके आगे धर्म परोसना उसका अपमान है”।

    “जब पड़ौसी भूखा मरता हो तब मंदिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं; पाप है”।

    “वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा है; रोगी और कमजोर की पूजा है”।

    सर्वधर्म समभावः

    विवेकानन्द को वेदांत दर्शन की सीमाओं में ही कैद नहीं किया जा सकता। विवेकानन्द को ज्ञान-मार्ग, भक्ति-मार्ग, योग-मार्ग एवं कर्म-मार्ग में से किसी एक मार्ग के अनुयायी के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। रामकृष्ण के सम्पर्क में आने के पहले एक ओर उन्होंने वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत, विभिन्न पुराणों आदि हिन्दू धर्म- ग्रंथों का गहन अध्ययन किया तो दूसरी ओर तथ्यवाद एवं समाजशास्त्र के विचारक आगस्त कॉन्त, उत्पत्ति की सर्वसमावेशक अवधारणा के व्याख्याता हरबर्ट स्पेंसर, व्यक्तिगत स्वातंत्र्य की शक्ति एवं उसकी सीमा के मीमांसक जॉन स्टूवर्ट मिल, विकासवाद के सिद्धांत के प्रख्यात जनक चार्ल्स डॉरविन, नैतिक शुद्धता के सिद्धांत के विवेचक जर्मन दार्शनिक इमानुएल कॉट, नव्य-कांटवाद एवं आदर्शवाद के जर्मन-दार्शनिक गॉतिब फिश्ते, अनुभव आधारित वास्तविक ज्ञान-प्राप्ति के समर्थक स्काटलैण्ड के दार्शनिक डेविड ह्यूम, नास्तिक निराशावाद के दर्शन के प्रतिपादक जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहॉवर, हेगेलीय दर्शन अथवा निरपेक्ष आदर्शवाद के प्रणेता जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिच हेगल तथा सर्वधर्म निरपेक्षवाद के प्रवर्तक यहूदी मूल के डच दार्शनिक बारूथ स्पिनोज़ा आदि विभिन्न पाश्चात्य दार्शनिकों एवं मनीषियों के ग्रंथों का भी पारायण किया। स्पेंसर के विचारों से वे प्रभावित हुए थे। इसका प्रमाण उनका स्पेंसर से किया गया पत्राचार है। पाश्चात्य दर्शन एवं उसकी वैज्ञानिक दृष्टि के वे प्रबल समर्थक थे तथा भारत की युवा-शक्ति को उन्होंने विषय की विवेचना-पद्धति में इसे अपनाने का आग्रह किया। सत्य के उपासक की दृष्टि उन्मुक्त होती है। अगर कहीं भी अच्छी बात है तो उसको समझने एवं ग्रहण करने का यत्न करना चाहिए। अपनी फरवरी से मार्च 1981 की यात्रा के दौरान अलवर में उन्हें भारतीय इतिहास की विवेचना पद्धति में वैज्ञानिक दृष्टि की कमी का अहसास हुआ तथा उन्होंने भारत के युवाओं को पाश्चात्य वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने का आग्रह किया। उनका मत था कि इसके ज्ञान से भारत में युवा हिन्दू इतिहासकारों का ऐसा संगठन तैयार हो सकेगा जो भारत के गौरवपूर्ण अतीत की वैज्ञानिक पद्धति से खोज करने में समर्थ सिद्ध होगा और इससे वास्तविक राष्ट्रीय भावना जागृत हो सकेगी। (देखेः रोमां रोलां : द लॉइफ ऑफ् विवेकानन्द एण्ड दॉ यूनिवर्सल गॉसपॅल, पृष्ठ 23-24, अद्वैत आश्रम (पब्लिशिंग डिपार्टमैण्ट) कलकत्ता- 700 014, पंद्रहवाँ संस्करण (1997))।

    रामकृष्ण से जब उनका प्रथम मिलन हुआ, उन्होंने रामकृष्ण को आलोचक की नज़र से देखा। उन्हें ठोक बज़ाकर देखा, परखा, समझा। उनका खूब छिद्रान्वेषण किया। रामकृष्ण की सरलता, अनुभूतिगम्यता तथा निर्भ्रांत मगर सहज भाव से कहा गया यह संदेश कि प्रत्येक नजरिए से, हर दृष्टि से सत्य को पहचानने की कोशिश करो- उनके दिल को छू गई। हर पहलू से सत्य को जानना एवं पहचानना उनका मूल मंत्र बन गया। वे हमेशा गीता एवं द इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट की प्रतियाँ अपने साथ रखते थे। वे जहाँ जहाँ गए, वहाँ वहाँ उन्हें जिस धर्म के शास्त्रों को पढ़ने एवं उस धर्म के विद्वानों से उस धर्म के तत्त्व को समझने एवं जानने का अवसर प्राप्त हुआ, उन्होंने उसे सत्य-साधक के रूप में आत्मसात् किया। विवेकानन्द के विचारों की जो विवेचनाएँ हुईं हैं उनमें वेदांत दर्शन एवं बौद्ध दर्शन के उनके गहन अध्ययन की मीमांसाएँ ही अधिक हुईं हैं। यह कम लोगों को पता है कि उन्होंने सन् 1891 में अहमदाबाद में इस्लाम एवं जैन दर्शन का तथा सन् 1892 में गोवा में इसाई धर्म एवं क्रिश्चियन दर्शन का गहन अध्ययन किया था तथा इन सभी धर्मों के तत्त्वों को जाना परखा था। अपनी यात्राओं में उन्होंने विभिन्न जातियों, धर्मों, संस्कृतियों की मान्यताओं, विश्वासों, धारणाओं एवं आचरण-पद्धतियों का समीक्षात्मक अन्वेषण किया। वे उनमें निहित सत्यांशों को अंगीकार करते गए तथा प्रतिगामी मान्यताओं एवं गतिरोधी रूढ़ियों एवं अंध-विश्वासों को विलगाते गए। विवेकानन्द ने अपने सह-यात्री एवं सहगामी साथियों से कहा थाः “ हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि "दूसरों के धर्म के प्रति कभी द्वेष न करो"; इसके आगे बढ़कर हम सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उनको पूर्ण रूप से अंगीकार करते हैं”।

    प्रत्येक धर्म के ऋषि, मुनि, पैगम्बर, सन्त, महात्मा आदि धर्म को अपनी जिन्दगी का हिस्सा बनाते हैं, उसके अनुरूप आचरण करते हैं । वे धर्म को ओढ़ते-बिछाते नहीं हैं अपितु जीते हैं। साधना, तप, त्याग आदि दुष्कर हैं । ये भोग से नहीं, संयम से सधते हैं। इस कारण धर्म को आचरण में उतारना सरल कार्य नहीं है । महापुरुष ही सच्ची धर्म-साधना कर पाते हैं । इन महापुरुषों के अनुयायी जब अपने आराध्य साधकों जैसा जीवन नहीं जी पाते तो उनके नाम पर सम्प्रदायों एवं पंथों आदि संगठनों का निर्माण कर, भक्तों के बीच आराध्य की जय-जयकार करके अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं । अनुयायी साधक नहीं रह जाते, उपदेशक हो जाते हैं । ये धार्मिक व्यक्ति नहीं होते, धर्म के व्याख्याता होते हैं । इनका उद्देश्य धर्म के अनुसार अपना चरित्र निर्मित करना नहीं होता, धर्म का आख्यान मात्र करना होता है । जब इनमें स्वार्थ-लिप्सा का उद्रेक होता है तो ये धर्म-तत्वों की व्याख्या अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगते हैं।

    धर्म की आड़ में अपने स्वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलाल अथवा ठेकेदार अध्यात्म सत्य को भौतिकवादी आवरण से ढकने का बार-बार प्रयास करते हैं । इन्हीं के कारण चित्त की आन्तरिक शुचिता का स्थान बाह्याचार ले लेते हैं । पाखंड बढ़ने लगता है । कदाचार का पोषण होने लगता है । जब धर्म का यथार्थ अमृत तत्व सोने के पात्र में कैद हो जाता है तब शताब्दी में एकाध साधक होते हैं जो धर्म-क्रान्ति करते हैं। धर्म के क्षेत्र में व्याप्त अधार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता का प्रहार कर, उसके यथार्थ स्वरूप का उद्घाटन करते हैं । इस परम्परा में ही रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानन्द आते हैं। इस परम्परा के अध्यात्म साधकों के जीवन चरित का अध्ययन करने पर यह सहज बोध होता है कि आत्मस्वरूप का साक्षात्कार अहंकार एवं ममत्व के विस्तार से सम्भव नहीं है। अपने को पहचानने के लिए अन्दर झाँकना होता है, अन्तश्चेतना की गहराइयों में उतरना होता है। धार्मिक व्यक्ति कभी स्वार्थी नहीं हो सकता। आत्म-गवेषक अपनी आत्मा से जब साक्षात्कार करता है तो वह एक को जानकर सब को जान लेता है, पहचान लेता है, सबसे अपनत्व-भाव स्थापित कर लेता है।

    विवेकानन्द धार्मिक सामंजस्य एवं सद्भाव के प्रति सदैव सजग दिखाई देते हैं।विवेकानन्द ने बार-बार सभी धर्मों का आदर करने तथा मन की शुद्धि एवं निर्भय होकर प्राणी मात्र से प्रेम करने के रास्ते आगे बढ़ने का संदेश दिया। उनके इन विचारों को आत्मसात करने के लिए उनकी निम्न सूक्तियाँ उद्धरणीय हैं :

    “प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चो, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप, दुराचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी। उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष, निरन्तर संघर्ष! पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो -- सारा धर्म इसी में है”।

    “बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है”।

    “सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी प्रयत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी”।

    “सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है”।

    विवेकानन्द के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए उनके निम्न वचनों को हमेशा याद रखना चाहिएः

    “मेरे आदर्श का सार है - मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना”।

    “बसन्त की तरह लोगों का हित करना' - यही मेरा धर्म है”।

    "मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः- यही मेरा धर्म है”।

    “उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड-मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो”।

    अपने विचार एवं दर्शन के समर्थन के लिए उन्होंने योग प्रवर्तक पंतजलि का सूक्ति-वचन उद्धृत कियाः

    "जब मनुष्य समस्त अलौकिक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म-मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह परमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसी का प्रचार करना है। जगत में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्यक्ष आचरण नहीं करता”।

    “एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है -- वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्रष्टा महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते”।

    पूरे विश्व में एक ही सत्ता है। एक ही शक्ति है। उस एक सत्ता, एक शक्ति को जब अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है तो व्यक्ति को विभिन्न धर्मों, पंथों, सम्प्रदायों, आचरण-पद्धतियों की प्रतीतियाँ होती हैं। अपने-अपने मत को व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति की विशिष्ट शैलियाँ विकसित हो जाती हैं। अलग-अलग मत अपनी विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग करने लगते हैं। अपने विशिष्ट ध्वज, विशिष्ट चिन्ह, विशिष्ट प्रतीक बना लेते हैं। इन्हीं कारणों से वे भिन्न-भिन्न नजर आने लगते हैं। विवेकानन्द ने तथाकथित भिन्न धर्मों के बीच अन्तर्निहित एकत्व को पहचाना तथा उसका प्रतिपादन किया। मनुष्य और मनुष्य की एकता ही नहीं अपितु जीव मात्र की एकता का प्रतिपादन किया।

    तत्त्वतः आत्मानुसंधान की यात्रा में व्यक्ति एकाकी नहीं रह जाता। उसके लिए सृष्टि का प्रत्येक प्राणी आत्मतुल्य हो जाता है। एक की पहचान सबकी पहचान हो जाती है तथा सबकी पहचान से वह अपने को पहचान लेता है। भाषा के धरातल पर इसमें विरोधाभास हो सकता है। अध्यात्म के धरातल पर इसमें परिपूरकता है। जब व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रत्येक पर-पदार्थ के प्रति अपने ममत्व एवं अपनी आसक्ति का त्याग करता है तब वह राग-द्वेषरहित हो जाता है। वह आत्मचेतना से जुड़ जाता है। शेष सबके प्रति उसमें न राग रहता है न द्वेष। इसी प्रकार जब साधक सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को आत्मतुल्य समझता है तब भी उसका न किसी से राग रह जाता है और न किसी से द्वेष। धर्म का अभिप्राय व्यक्ति के चित्त का शुद्धिकरण है जहाँ पिण्ड में ही ब्रह्माण्ड है। समस्त प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव, प्रेमभाव तथा समभाव होना ही धर्म है और इस दृष्टि से सर्वधर्म समभाव में से यदि विशेषणों को हटा दें तो शेष रह जाता है: धर्म-भाव। सम्प्रदाय में भेद दृष्टि है, धर्म में अभेद-दृष्टि।

    प्रोफेसर महावीर सरन जैन

    (सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

    123, हरि एन्कलेव

    बुलन्द शहर – 203001

    31 अगस्‍त को मैथिलीशरण गुप्‍त की 125वीं जयन्‍ती पर विशेष

    राष्‍द्रकवि मैथिलीशरण गुप्‍त का अवदान आज भी प्रासंगिक है। यह जान कर आश्‍चर्य और विस्‍मय होता है कि रामचरितमानस के बाद गुप्‍तजी द्वारा लिखित ‘भारत भारती' और ‘जयद्रथवध' हिन्‍दी की ऐसी काव्‍यकृतियां है जो लाखों की संख्‍या में आज भी पढ़ी जाती रही है। आज जब लोक मानस राष्‍द्रीय स्‍वार्थ से विमुख हो अपने स्‍वार्थ भोग में लिप्‍त हैं, गुप्‍तजी का यह आह्‌वान ‘चिरकाल तिमरावृत रहे, आलोक का भी स्‍वाद लो' आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की यह परतंत्र भारत के लोक मानस के लिए था।

    निरंतर क्षीण होती राष्‍द्रीय प्रेम का न होना आज देश की सबसे बड़ी समस्‍या है ऐसे माहौल में ‘भारत भारती' के कवि की वाणी की कि ‘हम कौन थे, क्‍या हो गए और क्‍या होगें अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्‍याएं सभी' आज की सबसे बड़ी राष्‍द्रीय आवश्‍यकता है। आज भारत में मैथिलीशरण गुप्‍त जैसे देशभक्‍त कवियों की जरूरत है क्‍योंकि गुलाम भारत से ज्‍यादा भयावह स्‍थिति वर्त्‍तमान भारत में मौजूद है। गुप्‍तजी ने भारतीय जीवन की समग्रता में समझने और प्रस्‍तुत करने का प्रयास किया है। गुप्‍तजी का काव्‍य राम काव्‍य और प्रबन्‍ध काव्‍य है, आपने जहां इस देश की तथा आधुनिककाल की कथा को अपने प्रबन्‍धों का विषय बनाया, वहीं विदेश संबंधी एवं प्रागैतिहासिक सामग्री को वस्‍तु-रूप में ग्रहण किया है। अज्ञात एवं अख्‍यात व्‍यक्‍तियों से होकर महामहिम महिप तक इनके काव्‍यों के पात्र है, जो गप्‍तजी की कविता को काफी विस्‍तार देती है। ये विश्‍व के महान प्रबंन्‍ध कवियों के समान अमर चरित्रों के स्रष्‍टा और पुनर्निमाता भी है। उर्मिला, यशोधरा और बिष्‍णुप्रिया आदि आपकी अपूर्व और अभुतपूर्व चरित्र सृष्‍टियां हैं। इन पात्रों के चरित्र की परिकल्‍पना गुप्‍तजी की सृजन प्रतिभा की परिचायक है।

    खड़ी बोली के स्‍वरूप निर्धारण और विकास में गुप्‍तजी का योगदान अन्‍यतम है, खड़ी बोली को उसकी प्रकृति के भीतर सुघड़ रूप देने में गुप्‍तजी ने भरपूर प्रयास किया तथा यह पहली बार गुप्‍तजी ने ही यह सिद्ध किया कि खड़ी बोली कविता की भाषा है। ‘जयद्रथवध' तथा ‘भारत भारती' का प्रचार एवं लोकप्रियता मानों खड़ी बोली की विजय दुन्‍दभी थी। महाकवि निराला ने 1929 में ‘माधुरी' में लिखा था कि ‘खड़ी बोली का सेहरा अगर किसी एक ही कवि को पहनाया जाए तो वह है बाबू मैथिलीशरण जी गुप्‍त। खड़ी बोली की कविता के उत्‍कर्ष के लिए इनकी सेवा अमूल्‍य है।

    गुप्‍तजी की प्रासंगिकता आज इस अर्थ में भी है कि आप मर्यादा को देश की सुव्‍यवस्‍था का मेरूदंड मानते थे। आपने मर्यादावादी कवि की तरह सम्‍मिलित परिवार में आस्‍था प्रकट की है, नारी के प्रति आपका दृष्‍टिकोण आदरपूर्ण है, वर्णाश्रम धर्म में विश्‍वास के बावजूद मध्‍यकालीन विकार आपको स्‍वीकार्य नहीं है। अगर गुप्‍तजी का नारी के प्रति दृष्‍टिकोण कि ‘नारी विलास की निर्जीव उपकरण मात्र न होकर पुरूष की सहभागी, सहयोगी, अर्द्धांगिनी है, नारी के बिना पुरूष अधूरा है' को हम माने तो नारी उत्‍पीड़न होना ही बंद हो सकती है।

    गुप्‍तजी अपने युग के प्रतिनिधि कवि थे। आधुनिक काव्‍य में प्रचलित काव्‍य की सभी शैलियां और भावनाओं को आयत करने में आप समर्थ रहे है। आपके काव्‍य में हिन्‍दी कविता के पांच दशकों का इतिहास सुरक्षित है। कवि की रचना धर्मिता के पीछे विलास और सहित की दो प्रवृतियां विराजमान रहती है। गुप्‍तजी साहित्‍य विलास की प्रवृति से प्रेरित होकर अपनी कृतियों की रचना नहीं किए अपितु सामाजिक हित की प्रवृति से प्रेरित होकर काव्‍य कृतियों की रचना किए हैं। ‘भारत भारती' से भारतीय संस्‍कृति की ओर पुनःआकृष्‍ट करने का आपका उद्‌ेश्‍य स्‍पष्‍ट होता है। सांस्‍कृतिक परम्‍पराओं में आस्‍था रखने के बावजूद आपने युगधर्म की कभी उपेक्षा नहीं की। भारतीय संस्‍कृति के प्रवक्‍ता होने के साथ-साथ आप नवीन भारत के राष्‍द्र कवि थे। राष्‍द्रीयता के प्रचार-प्रसार में ‘भारत भारती' का योगदान को विस्‍मृत नहीं किया जा सकता है। आपने कटाक्ष इस तरह किया हैः-

    सब अंग दूषित हो चुके है अब समाज शरीर के

    संसार में कहला रहे है हम फकीर लकीर के

    क्‍या बाप-दादों के समय की रीतियां हम तोड़ दें ?

    वे रूग्‍न हों तो क्‍यों न हम भी स्‍वस्‍थ्‍य रहना छोड़ दें

    क्‍या आज हम भारत की स्‍थिति देखकर गुप्‍जी जी की ओर देखने के लिए मजबूर नहीं है जब आप कहते है कि ः-

    जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्‍जवल हुई सारी मही,

    था जो जगत का मुकुट, है क्‍या हाय! यह भारत वही ?

    भारत, कहो तो आज तुम क्‍या हो वही भारत अहो !

    है पुण्‍य भूमि ! कहां गयी है वह तुम्‍हारी श्री कहां ?

    गुप्‍तजी की कविताओं को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्‍तजी आज भी कहीं लिख रहें हैं जब आप कहते है कि ः-

    दायें और बायें सदा सहचर हमारे चार हैं,

    अविचार, अंधाचार हैं, व्‍यभिचार अत्‍याचार है,

    हा गाढ़तर तमसावरण से आज हम आच्‍छन हैं,

    ऐसे विपन्‍न हुए कि अब सब शांति मरणासन्‍न हैं।

    हिन्‍दी साहित्‍य का इतिहास इस बात का गवाह है कि गुप्‍त जी की कविता का प्रभाव समाज, साधारण जनमानस, विद्याार्थियों, कवियों, कविता के रसज्ञों पर समान रूप से पड़ा था और आज के भारत में निरंतर क्षीण पड़ते राष्‍द्रीयता को पुनः प्रज्‍वलित करने के लिए गुप्‍तजी की कविताओं की आवश्‍यकता है।

    राजीव आनंद

    मो․ 9471765417

    (जन्माष्टमी के पावन पर्व पर विशेष)

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    कर्मयोगी श्रीकृष्ण

    श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एकदम निराला-अद्भुत और अनूठा है. देवताओं और अब तक हुए अवतारों की परम्परा में वे अन्यतम व्यक्ति हैं. उन्होंने जीवन को गहराई से उतरकर, उसको समग्रता मे देखा और जिया. जहाँ राम मर्यादापुरुषोत्तम के रुप में जाने गए, बुद्ध करुणा के सागर कहलाए, लेकिन उन्हें पूर्णावतार न कहकर अंशावतार ही कहा जाता है. क्योंकि वे अपनी-अपनी मर्यादाओं में बंधे रहे,जबकि श्रीकृष्ण ने किसी बंधन को स्वीकार नहीं किया. इसलिए वे पूर्णावतार कहलाए. उन्होंने मनुष्य जीवन को भरपूर उत्साह के साथ जिया. अतः वे कभी अप्रांसगिक नहीं हो सकते.

    श्रीकृष्ण ने जीवन को उसके समस्त यथार्थ के रुप में देखा और विभिन्न परिस्थितियों से स्वयं गुजरते हुए उसे हमारे सन्मुख प्रस्तुत किया. दूसरी ओर इन्होंने कभी भी मौतिक जीवन का न तो निषेध किया और न ही बचने की बात की. कभी वे कालियादह में उतरकर कालिया से जा भिडते हैं, तो कभी गोपियों के सिर पर रखी दूध-दही-माखन की मटकियां को फ़ोड देते हैं और तो और वे अपने ही घर में, ऊँचे सींकचें पर रखी माखन की मटकी उतार अपने ग्वाल-बाल मित्रों को खिलाते हैं. अखाडॆ में उतरकर अच्छे-अच्छे सूरमाओं को धूल चटाते हैं, तो कभी कुंज-गलियों में बांसुरी बजाकर अपने से अधिक उमर की गोपियों के संग रास रचाते हैं. जरुरत पडने पर उन्हीं के हाथों से निकला सुदर्शनचक्र मानवता के शत्रुओं की गर्दन उतारने में देर नहीं लगाता, तो कभी वे गोवर्धन पर्वत उठाकर अभय का प्रतिरुप बन जाते हैं, अपने भाई बलदाऊ के साथ वे निशंक मथुरा में प्रवेश करते हैं और दुष्ट कंस को यमलोक पहुँचाते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं.

    वे पाडवॊं के शांतिदूत हैं,वहीं वे संघर्ष की प्रेरणा देने वाले कर्मनिष्ठ भी हैं..बडॆ-से बडॆ संकट से घिर जाने जाने पाण्डवों के मन में धीरज बंधाते हैं, अभिमन्यु, घटोत्कच की मृत्यु पर वे जिस सहानुभूति और संवेदना का परिचय देते हैं और हतोत्साहित पांडवों की मुरझाई चेतना में नया उत्साह-नया जोश भरते हैं..अपने बुआ के लडके शिशुपाल द्वारा उनका घोर विरोध करने और अपमानित करते रहने पर भी, वे जिस धैर्य और अनुशासन का प्रदर्शन करते है, यह हमें एक संदेश और सबक देता है. उस जमाने में सारथी को हेय दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन धर्म की संस्थापना के लिए उन्होंने अपने बाल सखा अर्जुन का सारथी बनने में तनिक देर नहीं लगाई. उनके लिए लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में अपमानजनक कुछ भी नहीं था.

    पांडव भी इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि बिना कृष्ण के वे महाभारत जीत नहीं सकते. उन्होंने उनके विश्वास को बनाए रखा और अपनी कूटनीति की अनूठी प्रतिभा का परिचय देते हुए, उन्हें विजयी बनाया. युद्ध में शस्त्ररहित रहने का वचन देते हैं तो वहीं दूसरी ओर वे शस्त्र धारण करके अपनी प्रतिज्ञा तो बेहिच तोड भी देते हैं. युद्ध के पश्चात वे पांडवों द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में किस तरह कुशल संयोजक की भूमिका का निर्वहन करते हैं, और स्वयं अपने लिए काम की तलाश करते हुए अतिथियों की जुठी पत्तलें उठाने में तनिक भी संकोच नहीं करते. हम सभी जानते है. यही एक मात्र कारण है कि आज पांच हजार साल बीत जाने के बाद भी, वे हमारे जीवन के प्रतिनिधि बने हुए हैं और बने रहेंगे.

    हम उनके द्वारा रची गई लीलाओं को केवल चमत्कार की श्रेणी में न रखते हुए, उसे अपने जीवन से जोडकर देखें तो ज्ञात होता कि उनका जीवन अपने समय से बहुत आगे का था. उनके चरित्र की हर बात हमें अपने वर्तमान का प्रतिनिधित्व करती दिखलायी पडती है. बकासुर, कागासुर,धेनुकासुर आदि का वध करने के पीछे का प्रमुख कारण यह था कि वे फ़सल, बाग-बगीचों पर अपना आधिपत्य जमाए हुए थे और जनता का शोषण कर रहे थे. अतः इन आततायियों को मार गिराना जरुरी था. कलिया-मर्दन के पीछे जो सूत्र काम कर रहा था, वह यह था कि उसने यमुना का सारा जल प्रदुषित कर रखा था. आज ठीक इससे उलट हो रहा है.

    हम आज बडी ही बेशर्मी से सारा गंधा जल नदियों में प्रवाहित कर रहे हैं और प्रदूषण फ़ैला रहे हैं. हमें श्रीकृष्ण की इस लीला से सीख लेने की जरुरत है. गाय चराने वन में जाना, ग्वालबालों के साथ वनभोजन करना और बंसी बजाने के पीछे उस सत्य को खोजना होगा कि आखिर एक राजकुमार को यह सब करने की जरुरत ही क्या थी? लेकिन उन्होंने वह किया और हमें संदेश दिया कि गाय का महत्व एक माँ से कम नहीं होता. उसका दूध पीकर, घी खाकर हम अच्छा स्वास्थ्य अर्जित कर सकते हैं. उनसे प्राप्त गोबर की खाद बनाकर उन्नतवार खेती की जा सकती है. पर आज क्या हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है. पशुधन अब बूचडखाने में भेजे जा रहे हैं. खेतों में अब गोबरखाद की जगह यूरिया जैसी घातक खाद को प्रयोग में ला रहे हैं,जो खेत को बंजर बनाने का काम कर रही है. दुधारु गाय के न रहने पर आज हमारे शिशुओं को नकली दूध पीना पड रहा है. गोवर्धन पर्वत को धारण करने की कथा के द्वारा श्रीकृष्ण पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं.

    अपने बचपन के मित्र सुदामा के आने की खबर पाकर वे दौडे चले आते हैं उन्होंने उनका स्वागत-सत्कार ही नहीं किया बल्कि .अपने सिंहासन पर बैठाया और बडॆ प्रेम से अपनी पत्नियों के साथ उनके चरण पखारते रहे थे.और बिदाई के समय उन्हें अकूत धन-दौलत भी दी. क्या हम और हमारे मित्रों के बीच इतने प्रगाढ संबंध सुरक्षित बच पा रहे हैं? कंस के मारे जाने के बाद, महल में रह रही सोलह हजार कन्याओं के साथ उन्होंने विवाह रचाकर उन्हें ससम्मान समाज में जीवन यापन कर सकने का हक प्रदान किया. द्रौपदी ने उन्हें रक्षासूत्र बांधते हुए अपना भाई बनाया था. वह दृष्य तो आपको याद ही होगा कि जब दुर्योधन ने दुशासन को भरी सभा में निवस्त्र करने का आदेश दिया था, तब उन्होंने अपनी बहन की लाज बचाने के लिए दौडकर आना पडा था. क्या हो गया है आज के भाईयों को कि उनकी बहनों की इज्जत सरेआम लूटी जा रही है और वे एक ओर खडॆ तमाशा देख रहे है.?

    महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद जब वे शोकसंतप्त धृतराष्ट्र और गांधरी को सांत्वना देने पहुँचे तो गांधारी के श्राप से बच नहीं पाए थे और उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे स्वीकार किया था. कभी किसी ने उन्हें गोपाल कहकर पुकारा, किसे ने माखनचोर कहा,किसी ने घनश्याम.नन्दलाल, गोपीवल्लभ, गोपबंधु,राधावल्लभ तक कहा. वे सारे नाम- उपनाम को सहर्ष स्वीकारते हुए, सबके दुलारे, सबके चहेते बने रहे. यही सारी खूबियाँ उन्हें पूर्णावतार का रुप देती है और लोक में अनश्वर बनाती है एवं अभिनव समकालीनता प्रदान करती है. उनकी लोकचेतना को यदि हम अपने जीवन के साथ जोडकर देखें तो पाते हैं कि वे बिल्कुल अकेले और अनोखे हैं.

    जब कर्म ही ईश्वर है और मेहनत ही पूजा है तब पग-पग पर श्रीकृष्ण कर्मयोगी सन्यासी की तरह यथार्थ की कठोर धरती पर पूरी दृढता के साथ खडॆ दिखाई देते हैं, बिना किसी अलौकिकता के साथ. हम आज चाहे जितने मन्दिर बना लें,और उसमें अपने राधामोहन को प्रतिष्ठित कर सुबह-शाम घंटॆ-घडियाल बजा-बजा कर उनकी पूजा अर्चना करते रहें, तब भी बात कुछ बनती दिखाई नहीं देती,जब तक की हम उनकी खूबियों को अपने चरित्र में उतारकर उसका अनुसरण नहीं करते, तब तक उस विराट व्यक्तित्व के स्वामी की सच्ची सेवा नहीं हो सकती.

    आज जन्माष्ठमी है,हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम उनके बतलाए हुए मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन को धन्य बनाएंगे. जै श्रीकृष्ण.

    १०३,कावेरीनगर,छिन्दवाडा गोवर्धन यादव

    २०/०८/२०१३

    · संदर्भ 28 अगस्‍त श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर विशेष

     

    मानवीय गुणों के अवतार श्रीकृष्‍ण

    प्रमोद भार्गव

    हाल ही में एक भारतवंशी ब्रितानी शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं और पुरातात्‍विक व भाषाई साक्ष्‍यों के आधार पर दावा किया है कि भगवान कृष्‍ण हिन्‍दू मिथक और पौराणिक कथाओं के काल्‍पनिक पात्र न होते हुए एक वास्‍तविक पात्र थे। सच्‍चाई भी यही है। ब्रिटेन में न्‍यूक्‍लियर मेडीसिन के फिजिशियन डॉ․ मनीष पंडित ने अपने अनुसंधान में बताया है कि टेनेसी के मेम्‍फिस विश्‍वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर डॉ․ नरहरि अचर द्वारा एक शोध पत्र में उल्‍लेख है कि खगोल विज्ञान की मदद से महाभारत युद्ध के काल का पता लगाया है। इसी आधार पर जब डॉ․ पंडित ने तारामंडल के साफ्‍टवेयर की मदद से डॉ․ अचर के निष्‍कर्षों की पड़ताल की तब वे आश्‍चर्यचकित रह गये जब दोनों निष्‍कर्षों में अजीब संयोग पाया गया। कृष्‍ण का जन्‍म 3112 बी․सी․ में हुआ। डॉ․ पंडित द्वारा बनाई गई दस्‍तावेजी फिल्‍म ‘‘कृष्‍ण इतिहास और मिथक'' में बताया गया है कि पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत की लड़ाई ईसा पूर्व 3067 में हुई थी। इन गणनाओं के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म ईसा पूर्व 3112 में हुआ था, यानि महाभारत युद्ध के समय कृष्‍ण की उम्र 54-55 साल की थी। महाभारत में 140 से अधिक खगोलीय घटनाओं का विवरण है। इसी आधार पर डॉ․ अचर ने पता लगाया कि महाभारत के युद्ध के समय आकाश कैसा था और उस दौरान कौन-कौन सी खगोलीय घटनायें घटी थीं। जब इन दोनों अध्‍ययनों के तुलनात्‍मक निष्‍कर्ष निकाले गये तो पता चला कि महाभारत युद्ध ईसा पूर्व 22 नवंबर 3067 को शुरू होकर 17 दिन चला। इससे स्‍पष्‍ट होता है कि कृष्‍ण कोई अलौकिक या दैवीय शक्‍ति न होकर एक मानवीय शक्‍ति थे।

    यही कारण रहे कि कृष्‍ण बाल जीवन से ही जीवनपर्यंत समाजिक न्‍याय की स्‍थापना और असमानता को दूर करने की लड़ाई दैव व राजसत्‍ता से लड़ते रहे। वे गरीब की चिंता करते हुए खेतीहर संस्‍कृति और दुग्‍ध क्रांति के माध्‍यम से ठेठ देशज अर्थ व्‍यवस्‍था की स्‍थापना और विस्‍तार में लगे रहे। सामरिक दृष्‍टि से उनका श्रेष्‍ठ योगदान भारतीय अखण्‍डता के लिए उल्‍लेखनीय रहा। इसीलिए कृष्‍ण के किसान और गौपालक कहीं भी फसल व गायों के क्रय-विक्रय के लिए मंडियों में पहुंचकर शोषणकारी व्‍यवस्‍थाओं के शिकार होते दिखाई नहीं देते ? कृष्‍ण जड़ हो चुकी उस राज और देव सत्ता को भी चुनौती देते हैं जो जन विरोधी नीतियां अपनाकर लूट तंत्र और अनाचार का हिस्‍सा बन गये थे ? भारतीय लोक के कृष्‍ण ऐसे परमार्थी थे जो चरित्र भारतीय अवतारों के किसी अन्‍य पात्र में नहीं मिलता। कृष्‍ण की विकास गाथा अनवरत साधारण मनुष्‍य बने रहने में निहित रही।

    16 कलाओं में निपुण इस महानायक के बहुआयामी चरित्र में वे सब चालाकियां बालपन से ही थीं जो किसी चरित्र को वाक्‌पटु और उद्‌दण्‍डता के साथ निर्भीक नायक बनाती हैं। लेकिन बाल कृष्‍ण जब माखन चुराते हैं तो अकेले नहीं खाते अपने सब सखाओं को खिलाते हैं और जब यशोदा मैया चोरी पकड़े जाने पर दण्‍ड देती हैं तो उस दण्‍ड को अकेले कृष्‍ण झेलते हैं। वे दण्‍ड का भागीदार उन सखाओं को नहीं बनाते जो चाव से माखन खाने में भागीदार थे। चरित्र का यह प्रस्‍थान बिंदु किसी उदात्त्‍ा नायक का ही हो सकता है।

    कृष्‍ण का पूरा जीवन समृद्धि के उन उपायों के विरूद्ध था, जिनका आधार लूट और शोषण रहा। शोषण से मुक्‍ति समता व सामाजिक समरसता से मानव को सुखी और संपन्‍न बनाने के गुर गढ़ने में कृष्‍ण का चिंतन लगा रहा। इसीलिए कृष्‍ण जब चोरी करते हैं, स्‍नान करती स्‍त्रियों के वस्‍त्र चुराते हैं, खेल-खेल में यमुना नदी को प्रदूषण मुक्‍त करने के लिए कालिया नाग का मान मर्दन करते हैं, उनकी वे सब हरकतें अथवा संघर्ष उत्‍सवप्रिय हो जाते हैं। नकारात्‍मकता को भी उत्‍सवधर्मिता में बदल देने का गुर कृष्‍ण चरित्र के अलावा दुनिया के किसी इतिहास नायक के चरित्र में विद्यमान नहीं हैं ?

    भारतीय मिथकों में कोई भी कृष्‍ण के अलावा ईश्‍वरीय शक्‍ति ऐसी नहीं है जो राजसत्ता से ही नहीं उस पारलौकिक सत्ता के प्रतिनिधि इन्‍द्र से विरोध ले सकती हो जिसका जीवनदायी जल पर नियंत्रण था ? यदि हम इन्‍द्र के चरित्र को देवतुल्‍य अथवा मिथक पात्र से परे मनुष्‍य रूप में देखें तो वे जल प्रबंधन के विशेषज्ञ थे। लेकिन कृष्‍ण ने रूढ़, भ्रष्‍ट व अनियमित हो चुकी उस देवसत्‍ता से विरोध लिया, जिस सत्‍ता ने इन्‍द्र को जल प्रबंधन की जिम्‍मेदारी सौंपी हुई थी और इन्‍द्र जल निकासी में पक्षपात बरतने लगे थे। किसान को तो समय पर जल चाहिए अन्‍यथा फसल चौपट हो जाने का संकट उसका चैन हराम कर देता है। कृष्‍ण के नेतृत्‍व में कृषक और गौ पालकों के हित में यह शायद दुनिया का पहला आंदोलन था, जिसके आगे प्रशासकीय प्रबंधन नतमस्‍तक हुआ और जल वर्षा की शुरूआत किसान हितों को दृष्‍टिगत रखते हुए शुरू हुई।

    पुरूषवादी वर्चस्‍ववाद ने धर्म के आधार पर स्‍त्री का मिथकीकरण किया। इन्‍द्र जैसे कामी पुरूषों ने स्‍त्री को स्‍त्री होने की सजा उसके स्‍त्रीत्‍व केा भंग करके दी। देवी अहिल्‍या के साथ छल पूर्वक किया गया दुराचार इसका शास्‍त्र सम्‍मत उदाहरण है। आज नारी नर के समान स्‍वतंत्रता और अधिकारों की मांग कर रही है लेकिन कृष्‍ण ने तो औरत को पुरूष के बराबरी का दर्जा द्वापर में ही दे दिया था। राधा विवाहित थी लेकिन कृष्‍ण की मुखर दीवानी थी। ब्रज भूमि में स्‍त्री स्‍वतंत्रता का परचम कृष्‍ण ने फहराया। जब स्‍त्री चीर हरण (द्रौपदी प्रसंग) के अवसर पर आए तो कृष्‍ण ने चुनरी को अनंत लंबाई दी। स्‍त्री संरक्षण का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण दुनियां के किसी भी साहित्‍य में नहीं है ? इसीलिए वृंदावन में यमुना किनारे आज भी पेड़ से चुनरी बांधने की परंपरा है । जिससे आबरू संकट की घड़ी में कृष्‍ण रक्षा करें। जबकि आज बाजारवादी व्‍यवस्‍था ने स्‍त्री की अर्ध निर्वस्‍त्र देह को विज्ञापनों का एक ऐसा माल बनाकर बाजार में छोड दिया है जो उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति का पोषण करती हुई लिप्‍साओं में उफान ला रही है। स्‍त्री खुद की देह को बाजार में उपभोग के लिए परोस रही हैं। कृष्‍ण का मंतव्‍य स्‍त्री शुचिता की ऐसी निर्लज्‍जता के प्रदर्शन प्रबंधन का हितकारी कहीं भी कृष्‍ण साहित्‍य में देखने में नहीं आता।

    कृष्‍ण युद्ध कौशल के महारथी होने के साथ देश की सीमाओं की सुरक्षा संबंधी सामरिक महत्‍व के जानकार थे। इसीलिए कृष्‍ण पूरब से पश्‍चिम अर्थात मणीपुर से द्वारका तक सत्ता विस्‍तार के साथ उसके संरक्षण में भी सफल रहे। मणीपुर की पर्वत श्रृंखला पर और द्वारका के समुद्र तट पर कृष्‍ण ने सामरिक महत्‍व के अड्‌डे स्‍थापित किए जिससे कालांतर में संभावित आक्रांताओं यूनानियों, हूणों, पठानों, तुर्कों, शकों और मुगलों से लोहा लिया जा सके। वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में हमारे यही सीमांत प्रदेश आतंकवादी घुसपैठों और हिसंक वारदातों का हिस्‍सा बने हुए हैं। कृष्‍ण के इसी प्रभाव के चलते आज भी मणीपुर के मूल निवासी कृष्‍ण दर्शन से प्रभावित भक्‍ति के निष्‍ठावान अनुयायी है। यह अचरज भरा वैभव कोई अद्वितीय मानव ही कर सकता है।

    सही मायनों में बलराम और कृष्‍ण का मानव सभ्‍यता के विकास में अद्‌भुत योगदान है। बलराम के कंधों पर रखा हल इस बात का प्रतीक है कि मनुष्‍य कृषि आधारित अर्थव्‍यवस्‍था की ओर अग्रसर है। वहीं कृष्‍ण मानव सभ्‍यता व प्रगति के ऐसे प्रतिनिधि हैं जो गायों के पालन से लेकर दूध व उसके उत्‍पादनों से अर्थव्‍यवस्‍था को आगे बढ़ाते हैं। ग्रामीण व पशु आधारित अर्थव्‍यवस्‍था को गतिशीलता का वाहक बनाए रखने के कारण ही कृष्‍ण का नेतृत्‍व एक बड़ी उत्‍पादक जनसंख्‍या स्‍वीकारती रही। जबकि भूमंडलीकरण के दौर में हमने कृष्‍ण के उस मूल्‍यवान योगदान को नकार दिया जो किसान और कृषि के हित तथा गाय और दूध के व्‍यापार से जुड़ा था। बावजूद इसके पूरे ब्रज मण्‍डल और कृष्‍ण साहित्‍य में कहीं भी शोषणकारी व्‍यवस्‍था की प्रतीक मंडियों और उनके कर्णधार दलालों का जिक्र नहीं है। शोषण मुक्‍त इस अर्थव्‍यवस्‍था का क्‍या आधार था हमारे आधुनिक कथावाचक पंडितों को इसकी पड़ताल करनी चाहिए ? कृष्‍ण मानव पात्र ही थे जो उन्‍होंने उस प्राकृतिक संसाधनों की चिंता की जिसके उत्‍पादन तंत्र को विकसित करने में भू-मण्‍डल को लाखों करोड़ों साल लगे। कृष्‍ण तो इस जैव विविधता रूपी सौंदर्य के उपासक व संरक्षक थे। जिससे ग्रामीण जीवन व्‍यवस्‍था को प्राकृतिक तत्‍वों से जीवन संजीवनी मिलती रहे। डॉ․ मनीष पंडित और डॉ․ अचर के खगोलीय घटनाओं क आधार पर निष्‍कर्ष सही लगते हैं कि कृष्‍ण पौराणिक युग के काल्‍पनिक पात्र कतई नहीं थे, वे मानव थे और उनमें मानवजन्‍य तमाम खूबियां और खामियां थीं। इन सबके बावजूद वे एक ऐसे उदात्‍त नायक थे जो महाभारत युद्ध के नेता और प्रणेता अपने गुणों के कारण बने।

    प्रमोद भार्गव

    लेखक/पत्रकार

    49, शब्दार्थ, श्रीराम कालोनी, शिवपुरी (म․ प्र․)

    दूर․ 07492-232007, मोबा․ 09425488224

    यायावर

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    वो यायावर था ।अलग अलग स्थान जाना न सिर्फ उसका शौक था, बल्कि उसकी प्रवृत्ति थी ।

    उम्र के हिसाब से भी ज़्यादा जगह का भ्रमण कर चुका था वो ,इन दिनो वो एक पहाड़ी रास्ते से होकर चमोली पहुंचा था पहाड़ की खूबसूरत वादियाँ उसके मन को लुभा रही थी झरनों का निर्मल स्त्रोत उसके मन में शांति का अनुभव करा रहा था । वो एक चट्टान के किनारे बैठ गया और उसकी खूबसूरती को निहारने लगा ।सहसा उसके मन में आया ,बिलकुल इसी की तरह हूँ मैं। भला झरनों के निर्मल को कोई बांध पाया है । कहाँ से निकल के कहाँ बही चली जाती है अनवरत , क्या कभी ये कोई सोच पाया है ।मगर उसका लक्ष्य है बहना और निरंतर बहते रहना । किस तरफ बह के जाएगी उसे भी नहीं पता शायद मैं भी इसका अनुकरण कर रहा हूँ।

    वो सोच ही रहा था कि किसी पहाड़ी धुन से उसकी तंद्रा भंग हुयी । कुछ पहाड़ी लड़कियां पहाड़ी गीत गाते उसी कि ओर चली आ रही थी वे समूह में थी देख कर लग रहा था मानो आज उनका कोई त्योहार है पहाड़ी कपड़ों में सुसस्सजित नख तक शिख तक शृंगार किए हुए ये लड़कियां खुशी से आल्हाड़ित हो रही थी कुछ  बच्चे भी उनके साथ तालियाँ बजाते हुए चले आ रहे थे अब मुझे जाना चाहिए उसने सोचा और उठकर खड़ा हो गया थोड़ी दूर आगे बढ़कर उसके कदम ठिठक गए प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य में कहीं कहीं वृक्षों कि डालियों में खिले फूल ईश्वर की अनुपम कृति का आभास दे रहे थे ऐसा लग रहा था मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो वो अकचका कर अपलक उधर निहारने लगा जीवन भी तो उस ईश्वर की ही सौगात है सुख और दुख के साये में पलते बढ़ते हम कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता और एक दिन इस नश्वर देह को त्याग कर चल पड़ते है उस अनंत यात्रा पर ।

    उसने सामने देखा कुछ एक यात्री रह में चलते दिखाई पड़ रहे थे उसने देखा एक बुजुर्ग व्यक्ति पालकी में बैठकर पहाड़ के ऊपर चढ़ रहा है ।मन में जाने क्या क्या आस रहती है जिसे पूरा करने हर व्यक्ति अनवरत प्रयास करता रहता है वह बुदबुदाया । मगर यह आस किसी की पूरी हो पाती है किसी की अधूरी । वो आगे चल पड़ा कहाँ जा रहा था उसे खुद भी नहीं पता । रास्तों में बीच बीच में कुछ दुकान सजी थी जहां कुछ धार्मिक पुस्तकें रत्न भगवान की तस्वीरें इत्यादि बिक रही थी ।लोगो की भीड़ वहाँ पर दिखलाई पड़ रही थी कुछ एक लोग बगल के भोजनालय में आराम की दृष्टि से बैठे थे ।कुछ एक भोजन कर रहे थे । वो सोचने लगा जीवन एक आनंद है एक उत्सव है ।

    थक तो वो भी चुका था मन हुआ की भोजनालय में जा कर कुछ खा ले अचानक ज़ोर की आवाज़ के साथ न जाने कहाँ से पानी का सैलाब आया । वो कुछ समझ पाता उससे पहले ही वो उस पानी में बह चला उसके कानों में चीख, पुकार, चित्कार , रुदन साफ सुनाई पड़ रहा था ।उसके बाद उसे याद नहीं कि क्या हुआ । जब उसने आँख खोली तो अपने आप को किसी दूसरे गाँव में पाया पूछने पर पता चला कि बचाव दल की मदद से वो बच पाया है ।चार दिन की कमजोरी के बाद आज वो बेहतर महसूस कर रहा था । उसने दूर तक दृष्टि घुमायी । चारों ओर तबाही ही तबाही का मंज़र नज़र आ रहा था । वह सोचने लगा कि थोडे वक्त पहले जिस कुदरत की करिश्माई सुंदरता की वह मिसाल दे रहा था वह आज उसी के हाथो नष्ट भी हो गयी । ठीक उसी तरह जिस तरह जीवन जीते जीते इंसान जाने कब इंसान मौत के आगोश में आ जाता है , उसे पता ही नहीं चलता । ये सब एक अनबूझ पहेली है जिसको समझना इंसान के बस में नहीं है । वो डगमगाते हुए धीरे धीरे आगे बढ्ने लगा । विचारों को विराम देकर उसने आगे की राह पकड़ी । आखिर वो यायावर था , रुकना उसकी प्रवृति नहीं थी । बढ़ चला वो एक नए अंजान राह की ओर ।

     

    सुजाता शुक्ला,  ,रायपुर (छत्तीस गढ़ ),पिन 492007

    परिचय := एम एस सी वनस्पति शास्त्र से करने के बाद कुछ महीने कॉलेज में अध्यापन

    आकाशवाणी रायपुर से कविता कहानियाँ प्रसारित ,नवभारत पेपर सहित अन्य

    पत्र पत्रिकाओं में कहानी कवितायें एवम लेख प्रकाशित ,वर्तमान में आकाशवाणी रायपुर में नैमित्तिक उद्घोषिका एवम दूरदर्शन में कार्यक्रमों का संचालन

    व्‍यंग्‍य

    एक सुबह मन्‍त्री जी के बंगले की

    पूरन सरमा

    मैं जिस समय मन्‍त्री जी के बंगले पर पहुँचा तो सुबह के सवा आठ बज चुके थे तथा मन्‍त्री जी सो रहे थे। धीरे-धीरे लोगों की भीड़ व कोलाहल बढ़ रहा था। मुझे लगा शायद मन्‍त्री बनने के बाद लोगों के शोर से जगने की आदत पड़ गई हो, वरना पहले तो ये पाँच और छः के बीच उठ जाया करते थे। सौभाग्‍य से मन्‍त्री जी मेरे ही क्षेत्र से एम․ एल․ ए․ थे। मैं बहुत बेचैन था। नौ बजे तक उनके जगने के संकेत नहीं मिले तो मैंने वहाँ के कर्मचारी से फिर पूछा-‘क्‍यों भाई अब भी नहीं उठे क्‍या ?'

    ‘बस अब उठने ही वाले होंगे।'

    ‘अरे भाई इस भीड़ में मिलने का नम्‍बर आयेगा तब तक तो अॉफिस में आकस्‍मिक अवकाश का आवेदन पहुँचाना होगा।'

    ‘क्‍या करें साहब रात को देर से सोये हैं। आदमी जागेगा भी तो सोयेगा भी ?' कर्मचारी ने कहा।

    मैं चुप हो गया। मेरी इच्‍छा हुई कि मैं भागकर इस काम करने वाली सरकार के मुख्‍य मन्‍त्री के पास जाऊँ और कहूँ कि देखिये जनता परेशान हो रही है और आपके मन्‍त्री जी सो रहे हैं। परन्‍तु अपने काम का स्‍मरण करके शांत रहा। वहाँ बेचैनी से टहल रहे एक सज्‍जन से मैंने पूछा-‘कब से टहल रहे हैं आप ?'

    फट पड़ा-‘पाँच दिन हो गये। मिलने का नम्‍बर ही नहीं आता। नौ बजे से पहले बाहर नहीं आते। आते हैं तो पाँ-सात लोगों से मिलने के बाद उद्‌घाटन, भाषण, चाटन का समय हो जाता है। समझ में नहीं आता कि इस देश का क्‍या होगा, ये भी पुराने वालों के ही चरण चिह्नों पर चल रहे हैं। सारे ही एक थैली के हैं ?'

    दूसरे सज्‍जन जो मुँह लटकाये एक पेड़ के नीचे बैठे थे, उनसे पूछा-‘क्‍यों साहब चेहरे पर उदासी के घने बादल क्‍यों छाये हैं ?'

    उत्त्‍ार में बोले-‘भगवान दुश्‍मन को भी यह बदनसीब दिन न दे, जो उसे मन्‍त्री से मिलने जाना पड़े। बच्‍चे का इंटरव्‍यू है आज। मन्‍त्री जी ने आश्‍वासन दिया था कि वे हेल्‍प करेंगे, परन्‍तु दस बजे इंटरव्‍यू है और वे अभी सो रहे हैं।'

    तभी तीसरे सज्‍जन खुद-ब-खुद आकर रो पड़े-‘क्‍या खाक करेंगे ये लोग काम ? भगवान भले मिल जायें, परन्‍तु ये तो शहंशाह हो गये हैं। झलक ही नहीं देना चाहते।

    जैसे ये जनता गुलाम है-जो यों ही खड़ी रहेगी। मैं तो सार्वजनिक हित के लिये आया हूँ। गाँव में जच्‍चाखाना नहीं है। हर वर्ष दस-पाँच औरतें देखभाल व नासमझी में अकाल मर जाती हैं। यह प्रसूति-गृह खुल जाये तो जनता का कल्‍याण हो।

    2

    मन्‍त्री कहते हैं कि थोड़ा टच में रहो तो काम हो जायेगा। चुनाव में तो एक साथ उठना-बैठना, खाना-पीना, सोना रहना था, परन्‍तु मन्‍त्री क्‍या बने नखरे ही अलग हो गये। गाँव से गाँठ का किराया खर्च करके आते हैं, इन्‍हीं के क्षेत्र में विकास का काम है और सोते रहते हैं।'

    तभी शोर हो गया कि ‘मन्‍त्री जी जाग गये' मुझे बड़ी हँसी आई कि नींद का खुलना जागना मान रहे हैं लोग। ये तो जागते हुये भी सोये हुए हैं। मैं लपककर लाइन में जा लगा। आठवाँ नम्‍बर था। करीब साठ-सत्त्‍ार लोग थे। धूप में खड़े थे। मेरा नम्‍बर आया तो मन्‍त्री जी ने जबरन डेढ़ इंच हँसी चेहरे पर बिखेरी और बोले-‘कहिये कैसे आना हुआ है ?'

    मैं बोला-‘अजी बस एक टेलीफोन कराना था आपसे।'

    ‘अरे भाई टेलीफोन ही करते हैं दिनभर। एक टेलीफोन और सही। बोलो कहाँ करना है। दोपहर में कर देंगे।'

    ‘नींद अभी करना होगा। दोपहर को आपको याद कौन दिलायेगा ?'

    ‘अरे भाई यह डायरी किस काम की है। इस डायरी में जो भी दर्ज हुआ वह समझो हो गया। काम हो या न हो, टेलीफोन जरूर हो जायेगा।'

    ‘देखिये पहले वाल मन्‍त्री जी भी यही कहते-कहते चले गये। इसलिये आप तो टेलीफोन कर ही दो।'

    ‘देखो दूसरे लोग बाहर खड़े हैं, उनसे भी मिलना है तथा सवा दस बजे सेक्रेटेरियट में मीटिंग है केबीनेट की, इसलिये समझो टेलीफोन हो गया। हम लोग इस तरह एक-एक आदमी को इतना समय देने लगे तो जनता का काम कैसे होगा ?' मन्‍त्री जी बोले।

    मैंने कहा-‘चुनाव के समय तो आप मेरे घर आकर बुला ले जाते थे और आज आपके पास समयाभाव हो गया है।'

    ‘देखो भाई स्‍थितियों को समझा करो। इस समय जन-प्रतिनिधि हूँ। पब्‍लिक मैन की लाइफ भी कोई लाइफ है। दोस्‍ती भी नहीं निभा सकता, अब तुम जाओ तुम्‍हारा टेलीफोन हो जायेगा।'

    मुझे फिर मजाक सूझा सो बोला-‘और आप यह नौ बजे तक कब से सोने लगे। सुबह उठकर खेतों पर जाया करते थे। नया आलम खूब पेला है आपने।'

    ‘सच तो यह है शर्मा जी। नींद ही बहुत आने लगी है। सरकारी सुविधाएँ इतनी हैं कि जागते-जागते ही नींद आ जाती है। अरे भाई सो लेने दो। पता नहीं किस घड़ी नींद उड़ जाये।

    3

    तुमसे तो क्‍या छिपाना पलंग का गद्‌दा इतना मुलायम और मोटा है कि बिना गोलियों के आने लगी हैं नींद भी। स्‍वास्‍थ्‍य भी देख रहे हैं। चार महीने में करीब चालीस किलोग्राम वनज ‘इन्‍क्रीज' हो गया है।'

    ‘आपको पता है चार महीने में मेरा वनज पाँच किलो घट गया है।' मैंने कहा।

    वे बोले-‘मुझे पता है आपका वनज घट रहा है। जनहित की सोचने वाला कमजोर ही रहता है। जब से चिंता-फिकर छोड़ा है स्‍वास्‍थ्‍य बिना ‘हिल स्‍टेशन' गये ही गोलमटोल हो गया है।'

    ‘अच्‍छा खैर छोड़ो, टेलीफोन जरूर कर देना।'

    ‘हाँ जाओ, मुझे भी मीटिंग में जाना है। उसके बाद सोशल वेलफेयर का फंक्‍शन है, फिर लंच तथा शाम को सी․ एम․ से मिलना है उनके निवास पर।'

    यह कहकर वे कमरे से बाहर निकले तो भीड़ उनके पीछे होली। वे सीधे गाड़ी में घुसे और फुर्र हो गये। लोग बड़बड़ाते रहे। कुछ मासमी धुन में कदमताल करते हुये रिक्‍शे वालों को पुकारने लगे तो कुछ अपने वाहनों से फूट गये।

    मन्‍त्री जी के यहाँ सुबह का यह आलम विचित्र, सुहाना तथा कुतूहलपूर्ण होता है। मन्‍त्री जी की दिनचर्या का यह पहलू आम है। सो रहे हैं, खा रहे हैं, मीटिंग में हैं, पूजा में हैं, सी․ एम․ के गये, तबियत ठीक नहीं या फिर दिल्‍ली गये। आम आदमी का चक्र यह है कि वह अनवरत इस तरह ही उनके बंगलों पर जाता रहा है तथा अनादि काल तक जाता रहेगा। दोनों की नियति यही है। इसी उपक्रम में कभी मिल जायें और काम हो जाये तो ठीक अन्‍यथा आशा-निराशा की आँखमिचौली चालू है। वे मन्‍त्री बने हैं तो मन्‍त्री ही रहेंगे, आपसे मिलकर क्‍या मिलेगा उनको, इससे अच्‍छा तो वे सोयेंगे।

    मौलिक एवं अप्रकाशित व्‍यंग्‍य

    (पूरन सरमा)

    124/61-62, अग्रवाल फार्म,

    मानसरोवर, जयपुर-302 020,

    (राजस्‍थान)

    मोबाइल-9828024500

    सफल और सार्थक व्‍यंग्‍य

    सुप्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार पूरन सरमा का सोलहवां व्‍यंग्‍य संकलन घर घर की राम लीला' आया है। वे राष्ट्रीय स्‍तर पर चर्चित व्‍यंग्‍यकार है। उन्‍होंने व्‍यंग्‍य के अलावा उपन्‍यास एवं नाटक विधा पर भी कलम चलाई है। उनका एक उपन्‍यास समय का सच काफी चर्चित रहा है।

    पूरन सरमा व्‍यंग्‍य - लेखन के क्षेत्र में अपनी मौलिकता तथा कथात्‍मक रचनाओं के कारण जाने जाते है। वे साहित्‍य अकादमी से समाद्रत है। लगभग हर पत्र पत्रिका में उनको स्‍थान मिलता रहा हैं। व्‍यंग्‍य हिन्‍दी में आधुनिक काल में पुप्‍पित पल्‍लवित हुआ है। भारतेन्‍दु काल से लगाकर हरिशंकर परसाई, शरद जोशी व श्री लाल शुक्‍ल तक की व्‍यंग्‍य - यात्रा के अवलोकन से स्‍पष्‍ट है कि आज व्‍यंग्‍य साहित्‍य की एक महत्‍वपूर्ण विधा है। पूरन सरमा के इस संकलन में विभिन्‍न विषयों पर लिखे उनके छियासठ व्‍यंग्‍य संकलित है। पूरन जी में विपयों को ढूढंने की क्षमता है और वे रचना के अन्‍त तक विपयों के निर्वहन में सिद्धहस्‍त है। लगभग चालीस वर्षों से वे लिख रहे है।

    इस संकलन में साहित्‍य, चुनाव, राजनीति, शिक्षा, भ्रष्टाचार, नारी विमर्श, सत्‍ता, सगंठन, सरकार, आदि विविध विषयों पर उन्‍होंने कलम चलाई है।

    कई स्‍थानों पर वे सहज-सरल भाषा में गहरा कटाक्ष कर जाते हैं। जैसे -

    फेल होने के अपने मौलिक फायदे हैं, इन्‍हें लेने से मत चूकिये।

    इसी प्रकार बनानी है सरकार में वे लिखते है -

    गिरे हुए लोगों ने मिलकर बनायी थी सरकार, सो गिर रही थी सरकार।

    इसी प्रकार एक अन्‍य व्‍यंग्‍य लेख सत्‍ता में आने दो में वे लिखते है -

    बिना सत्‍ता में आये वे कुछ नहीं कर सकते है। सत्‍ता ही समाधान की सीढ़ी है। इस वाक्‍य में अनुप्रास अलंकार भी है। पाठक जी व आओ हड़ताल करे भी प्रभावशाली रचनाऐं है। आज के इस भौतिकवादी युग में समकालीन यथार्थ को, नंगेपन को पूरी ताकत के साथ पाठकों तक पहुँचाने में पूरन जी सफल है पूरन सरमा के व्‍यंग्‍य यह बताते है कि समाज, सरकार, सत्‍ता, में कहाँ क्‍या गलत है। कभी कभी वें समाधान का रास्‍ता भी सुझाते है।

    कथ्‍य, शिल्‍प, कथानक के सहारे वे रचना का ताना बाना बुनते है और बुनते ही चले जाते है। पाठक रचना को आद्योपान्‍त पढ़ कर ही रुकता है। और यही पूरन जी की सफलता है। वे समाज में व्‍याप्‍त विसंगतियों , विद्रूपताओं, टुच्‍चेपन को पूरी शक्‍ति के साथ उजागर करते है।

    इस पठनीय संकलन के प्रकाशन पर पूरन सरमा को बधाई। व्‍यंग्‍यकारों की इस भीड़ में पूरन सरमा एक ऐसा नाम है जिसकी अनदेखी संभव नहीं। पुस्‍तक का प्रोडक्‍शन -गेटअप सुन्‍दर है 000

    पुस्‍तक का नाम - घर घर की राम लीला

    लेखक- पूरन सरमा

    प्रकाशक-पंचशील प्रकाशन,

    जयपुर पप्‍ठ- 200

    मूल्‍य- 400रु․

    संस्‍करण- प्रथम

    समीक्षक - यशवन्‍त कोठारी

    86, लक्ष्‍मीनगर ब्रहमपुरी बाहर

    जयपुर - 302002 मो․ 9414461207

    कर्फ्यू
    स्कूल से जैसे-तैसे घर आया वह बच्चा बहुत डरा हुआ था । स्वाभाविक भी था ।
    सुबह जब वह स्कूल के लिए निकला था तब सब कुछ सामान्य था।
    मोर्निग-वाक,सब्जी, दूध वाले और स्कूल जाते बच्चे रोज की ही तरह निकले
    थे। बाद में हालात बिगड़े और कर्फ्यू की घोषणा हो गयी।
    घर पर उसने पिताजी से पूछा " पापा रास्ते पर इतनी पुलिस क्यों खडी है?"
    "कर्फ्यू लगा है बेटा" पापा ने जवाब दिया।
    " कर्फ्यू क्या होता है ? क्यों लगाते है ?" बच्चे ने स्वाभाविक जिज्ञासा से पूछा।
    "बेटा जब लोग खतरनाक हो जाते हैं , बदमाशी करते हैं , किसी के काबू में
    नहीं आते तो कर्फ्यू लगाना पड़ता है ताकि लोग घरों से बाहर नहीं आये" पापा
    ने फिर जवाब दिया।
    "लेकिन पापा वहां सड़क पर तो कुत्ते ,सांड ,सूअर सब घूम रहे थे उन्हें
    किसी ने नहीं रोका। आदमी क्या जानवर से भी ज्यादा खतरनाक होता है
    ?"..........बच्चे ने और भी ज्यादा मासुमियत से पूछा |
    और पापा............क्या कहते ...... निरुत्तर थे |

    -दिलीप लोकरे
    ३६ -ई,सुदामा नगर ,इंदौर
    diliplokreindore@gmail.com

    पिछवाड़े बुढ्ढा खांसता

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    बुढ्ढे को जिंदगी भर कभी बीमार नहीं देखा हट्टा-कट्टा,चलता-फिरता ,दौड़ता-भागता मस्त तंदरुस्त रहा। कभी छीक ,सर्दी-जुकाम, निमोनिया-खासी का मरीज नहीं रहा|

    अभी भी वो सत्तरवे बसंत की ओर पैदल चल रहा है। उसकी सेहत का राज है कि वो , घर की सुखी दाल-रोटी में मगन रहता है। दो बच्चे थे ,शादियाँ हो गई। इस शादी के बाद पत्नी की सीख पर कि बहु–बेटियों का घर है ,समधन पसरी रहती हैं ,आते –जाते खांस तो लिया करो।

    इस प्रायोजित खांसी की प्रेक्टिस करते –करते उन्हें लगा कि ‘ग्लाइकोडीन’ का ब्रांड एम्बेसडर बनना ज्यादा आसान था, कारण कि टू बी..एच. के. वाले मकान में जहाँ पिचावाडा ही नहीं होता ,आदमी कहाँ जा के खासे ?

    हमारे पड़ोस में दो दमे के बुजुर्ग मरीज रहते हैं ,उनके परिवार वाले बाकायदा उनको पिछवाड़ा अलाट कर रखे हैं जब चाहो इत्मीनान से रात भर खांसते रहो।

    एक हमारे चिलमची दादा भी हुआ करते थे ,एक दिन इतनी नानस्टाप, दमदार,खासने की प्रैक्टिस की कि पांच-दस ओव्हर पहले खांसते-खासते ,उनकी पारी सिमट गई ,वे अस्सी पार न कर सके।

    आजकल हमारे चेलारामानी को पालिटिकली खांसने का शौक चर्राया है।

    वे लोग लोकल पालिटिकल फील्ड में हंगामेदार माने जाते हैं ,जो समय पे ‘खासने’ का तजुर्बा रखते हैं मसलन ,सामने वाले ने प्रस्ताव रखा महापौर को घेरने का सही वक्त यही है वे कहेंगे नहीं अभी थोड़ी गलती और कर लेने दो ,वे खांस कर वीटो कर देते हैं उनकी उस समय,मन मार के , सुन ली जाती है ।

    आप कैसा भी प्रस्ताव, कहीं भी, चार लोगों की बैठक में ले आओ वे विरोध किए बिना रह ही नहीं सकते।

    लोग अगर कह रहे हैं कि देखिये ,हम लोग मोहल्ले में पानी की कमी के बाबत मेयर से मिल के समस्या से अवगत करावे। वे खांस दिए मतलब उन्हें इस विषय में कहना है। जोर से खांसी हुई तो मतलब उनकी बात तत्काल सुनी जावे। वे सुझाव देने वाले पर पलटवार करके पूछते हैं। आपके घर में पानी कब से नहीं आ रहा ?घर के कितने लोग हैं , हमारे घर में चौदह लोग रहते हैं .सफिसियेंट पानी आता है। इतना आता है कि नालियां ओव्हर फ्लो हो रहती हैं। मेयेर से हमारी तरफ नाली बनवाने का रिक्वेस्ट किया जावे।अभी गरमी आने में तो काफी वक्त है आपकी समस्या तब देख ली जावेगी।मीटिंग उनके एक लगातार खासने से, अपने अंत की तरफ चली जाती है ,न पानी और न ही नाली की बात, मेयर तक पहुच पाती है।

    हम मोहल्ले वाले चेलारमानी के ‘न्यूसेंस-वेल्यु’ को भुनाने के चक्कर में उनको एक बार मोहल्ला सुधार समिति का अध्यक्ष बना दिए। उनने साल भर का एजेंडा यूँ बनाया।भादों में सार्वजनिक गणेश उत्सव ,कलोनी वालों से चन्दा ,फिर नवरात्रि में कविसम्मेलन का भव्य आयोजन , चंदा। मोहल्ला सुधार समिति की तरफ से विधायक –मन्त्री का स्वागत ,जिसमें मोहल्ले के विकास के लिए राशि की मांग ,सड़क –नाली सुधार पर ध्यानाकर्षण।हरेक माह समिति के सदस्यों की बैठक।

    वे बैठक में एकमेव वक्ता होते ,आए दिन ,चंदा उगाही में, मुस्तैदी के चलते मोहल्ले वाले तंग आ गए। किसी भी दरवाजे पर खटखटाने की बजाय वे केवल खास दिया करते तो लोग समझ जाते चेलारमानी आ गए। एक सौ, चंदे की चपत लग गई समझो। आदमी सौ तो बर्दास्त कर लेता, मगर बिना चाय के न टलने की आदत को बर्दाश्त न कर पाते।

    जिस गरमी से उसे चुना गया था उसी मुस्तैदी से उसे हटाने का अभियान चलाना पड़ा ।लोग चंदा दे-दे के हलाकान हो गए थे।

    चेलारमानी के सब्सीट्युट , ताकतवर खांसने वाले की तलाश मोहल्ले में जारी है।

    अगर आपके पिछवाड़े में कोई बुढ्ढा खांसता हुआ मिले तो इस मुहल्ले में भिजवा दे।

    --

    सुशील यादव

    श्रीम सृष्टि ,अटलादरा,वडोदरा 390012

    23.8.13/09426764552


               भीम गाथा
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    रचित & संपादित  –
    राम आश्रय
    चित्रांकन –विपुल सुधाकर

     


                       भीम गाथा ;----
             भारत रत्न डाक्टर बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के जीवन संघर्षों को अक्षरों में बांधना कोई आसान कार्य नहीं । उन्होंने अपने जीवन में जिन बाधाओं और विपदाओं को हँसते हँसते पार किया और दुनिया को यह दिखा कि संसार की कोई भी बाधा उन्हे उनकी मंजिल को पाने से नहीं रोक सकती है । हमारा हिन्दू समाज अपने ही समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को शिक्षा की सुविधा से विमुख कर के ही नहीं रखा था बल्कि उनकी उन्नति के सारे रास्ते भी बंद करके रखे थे । यहाँ तक की जिस मंदिर की बुनियाद से लेकर प्राण प्रतिस्ठा तक जी जान से तैयार करते,मंदिर का निर्माण होते ही यह उस मंदिर के लिए अछूत हो जाते थे । दर्शन की बात तो बहुत दूर, उन्हे उस गली से निकलना भी मुश्किल था।पाठशाला, चिकित्शालय, सामाजिक उपयोग की जगहों पर उन्हें जाने की मनाही थी ।   जलाशयों में जानवर तो  पानी पी सकता था परंतु मनुष्य जो जलाशयों को बनाता था वह पानी नहीं पी सकता था ।बाबा साहब ने अपने दृण आत्म विश्वास और ज्ञान के बल पर सारे विश्व को बता दिया मानव-मानव सभी समान हैं । सभी को शिक्षा का अधिकार, रोजगार करने का अधिकार होना चाहिए।स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री बनकर उन्हों ने उन सभी के लिए ,ऐसी व्यवस्था किया जिससे भविष्य में कोई भी शिक्षा से विमुख न रह सके । परिणाम स्वरूप आज सभी को यह अधिकार हमारे संविधान में उपलब्ध है । उन्होने न केवल दलितों के लिए बल्कि सारे समाज के लिए संविधान में व्यवस्था किया । जिसके आधार पर आज हमारा देश दिनों दिन प्रगति कर के उन तमाम ऊंचाइयों को छू रहा है और विश्व में अपनी ताकत का लोहा मनवा रहा है । फिर चाहे यह चीन हो या जापान, अमेरिका हो लंदन हो । कोई भी देश आज हमारे देश को आँख दिखाने की कोशिश नहीं कर सकता है। आज शिक्षा ने मानव को उसकी उन्नति के सारे दरवाजे खोल दिया है। 


               स्त्री शिक्षा के लिए उन्होने संविधान सभा में बिल को प्रस्तुत किया परंतु जवाहर लाल नेहरू के धुल मुल नीतियों के कारण यह बिल संविधान सभा से पास नहीं हो सका और शिक्षा के महत्व पूर्ण अधिकार से वंचित रखा गया । परंतु दुर्भाग्य हमारे देश का यह है की आज प्रजातन्त्र की सम्पूर्ण शक्तियाँ  कुछ लोगों के हाथों में सीमित होती जा रहीं हैं जो कि  भविष्य में देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित हो सकती है और जो देश के लिए खतर नाक सिद्ध हो सकती है इस लिए हमें समय इन कमियों को दूर करने की चेष्ठा करनी होगी ।हमें देश कल औए परिस्थितियों के अनुकूल कार्य करना ही होगा अन्यथा बहुत देर हो जाएगी ।  मैंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बाबा साहब भीम राव अंबेडकर जी की 
    गाथा ,वंदना ,गीत, और कविताओं की रचना करने की कोशिश किया है । मुझे आशा है की आप को आनंद की अनुभूति देगी ।  

    लेखक परिचय ----
    राम आश्रय
    पिता –श्री छोटे लाल एक साधारण किसान
    जन्म स्थान –कसेन्दा 
    शिक्षा –प्राइमरी –गाँव के सरकारी पाठशाला
    उच्च शिक्षा –इलाहाबाद विश्व विद्यालय
    रचित पुस्तकें –हिन्दी में –भीम गाथा , नवीन पथ ,
    अँग्रेजी में –माई कामिटमेंट और सोसल मिस्टिक


    अनुक्रमणिका सूची :---
    1॰ भीम गाथा
    2. संविधान रच लाये बाबा
    3 बाबा के सपनों का भारत
    4॰ नारी मुक्ति
    5. संविधान निर्माता
    6॰ बाबा इतना तू कर
    7. माला की दासता
    8. एक सच्चा देश भक्त
    9. तूफान
    10॰ महात्मा बुद्ध
    11.  दान
    12 . इतिहास
    13 . आँगन
    14 . आज का विद्यार्थी
    15 . शतरंज
    16 . साहित्यकार 
    17॰ कलम
    18॰ आंशु क्यों बहाते हो
    19. भ्रष्टाचार 
    20.ओ मेरे बाबा
    21.मेरा वतन
    22. सोचो जरा
    23. पत्थर की दासता  


    1.         भीम  गाथा
    नमन करूँ मैं भीम को, सादर शीश नवाय ।
    दया करहु मुझ पर प्रभो,सेवक है असहाय ॥
    ज्ञान की दौलत दीजिए,कीजे एक उपकार ।
    साथ मेरे तुम होइए,नाव लगा दो पार॥ 
    भीम बड़े भट मानी छोड़े अमित कहानी ,
    खुशी सरजा भवानी सरस्वती मुसकानी ।
    बोली प्रेम मयी वाणी सुनो भीम बलखानी,
    तेरे संघर्ष की कहानी है दुनिया सारी जानी  ।
    नेता करें न मनमानी ऐसा मंत्र दिया तू ज्ञानी,
    उनकी चाल को समझे जनता हो गई सयानी ।
    हुई तेरी मेहरवानी किसान ढंग से करे किसानी,
    भूख और लाचारी अब हो गईं सारी बात पुरानी ।
    लिया ज्ञान की कमान अपने कर में संभाल ,
    भेदा दुष्टों का अभिमान किया अधम निढाल ।
    आप करुणा की शान किया जग में कमाल ,
    मिला सबको सम्मान सब हुए माला माल ।
    फैली ज्ञान की ज्योति हटी तिमिर की कटारी,
    आज देश में आई सच्ची हरित क्रांति की बारी। 
    मन की पीड़ा सारी भूल मिले प्रमुदित नर नारी, 
    सारी हृदय की गाँठे खोल पुछे कुशल आचारी ।
    भीम बड़े ही सुजान रचा भारत का विधान,
    सबको शिक्षा का अधिकार ऐसा किया प्रविधान।
    पाखंडी आज हुए परेशान जीत बाबा की आशान ,
    बाबा तुम हो बड़े महान फैला ज्ञान जग जहान  ।
    आज की सरकार है सभी गरीबों के है सदा साथ,
    सबको मिला अधिकार शिक्षित बालक एक साथ ।
    जाति धर्म मिटी की दीवार सभी लोग एक साथ ,
    किसका करते इंतेजार प्रभु देता है उनका साथ।
    जो देते अपने कर्मो से सदा सृजन का साथ, 
    अब लो अपने अधिकार आज दुनिया तेरे साथ ।
    सबको शिक्षा का अधिकार हुआ संविधान में पास,    
    देश से मिटा अंधकार जागा सबमें आत्मविश्वास ।
    शासन सत्ता की अब डोर पहुंची जनता के पास,
    आज हुआ चमन गुलजार फैली खुशबू आस पास । 
    आज देश में बहती नही  कोई धारा प्रतिकूल,
    विष हुआ अमृत और परिस्थियाँ हो गई सब अनुकूल ।
    एकता बीज उगे और घट गई जड़ता की सभी कूल,
    राग, व्देष कटुता मिटी आज बिखर गए सब सूल ।
    ममता फैली सभी दिशा,छायी अब समता की मूल,
    उपवन में खिले खुशियों के फूल मौसम हुआ अनुकूल।   
    आयी प्रेम की बहार लोग गए सारी ईर्ष्या भूल ,
    धन वैभव सुख समृद्धि आई प्यार की बरसे सुंदर फूल ।
    अम्बर डोला धरती काँपी, हिला पाखंडी आज !
    बाबा तेरे एक वार से, सुधरा आज समाज ॥
       

       

     

     

       
    2                           संविधान रच लाये बाबा   I
    शोषित जन को मंगल करने ,
    उन सबका जीवन खुशियों से भरने I
    दुखियों के सब दुख को हरने ,
    राजा और रंक को बराबर करने I  
    फैली विषमता को जड़ से मिटाने ,
    ऊंच - नीच का मतभेद हटाने I 
    आपस में  सबको साथ मिलाने,
    विश्वाश और सदभाव बढ़ाने I   
    मानव मानव को समान बनाने ,
    शाशन सत्ता को सुदृण बनाने I
    सबको उनका अधिकार दिलाने ,
    समाज से कुरीतियों को जड़ से मिटाने I 
    देश की एकता को मजबूत बनाने ,
    समता और ममता का पाठ पढाने I
    प्रांतवाद की बढ़ती दीवार गिराने,
    ज्वलंत समस्याओ का समाधान दिलाने I संविधान रच लाये बाबा   I
    शिक्षा की ज्योति को घर - घर पहुंचाने ,
    मंदिर , मस्जिद का वर्चस्व घटाने I
    जाति धर्म और मजहब को मिटाने ,
    अपने देश के गौरव को बढाने I     संविधान रच लाये बाबा   I


          3.      बाबा के सपनों का भारत
    शोषण पर निर्मित समाज ,हिंदूवाद की देन ।
    बंटा देश जो आज है , घृणा की सच्ची देन ॥
    जातिवाद की अमर बेल ,फैली है हर शाखा पर ,
    तोड़ रही यह अमर प्रेम, नस्तर करती हर आशा पर ,
    अपना कलुषित कपाट खोल, मानवता को घायल कर,
    जन जन में दिया नफरत घोल ,हिन्दू साहित्य के नाम पर ,
    निहित स्वार्थों में पड़कर , किया देस्ग का खंडन ।
    ममता की जड़ कट कर , तोड़ दिया सब बंधन ॥
    मानवता का कर दिया मर्दन ,कुटिल नीति से जोड़ तोड़ कर ,
    ब्राह्मण वाद का किया संवर्धन , अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर ,
    बना दिया सामाजिक बंधन ,नाना आड्म्बरों को आज जोड़कर ,
    सारे समाज का कर दिया विघटन , शिक्षा पर अधिकार जमाकर ,
    ज्ञान ज्योति को लूट कर, शासक हुए खुशहाल ।
    धन वैभव सब अर्जित कर , सबको किया कंगाल ॥
    गरीबों को शिक्षा से वंचित कर , सूर्य पर विजय समझ लिया ,
    नाना जुल्म किया समाज पर ,अपने को ईश्वर समझ लिया ,
    दृढ़ प्रतिज्ञ बाबा अंबेडकर ,अंगद सादृश्य पग जमा दिया ,
    उनके अभियान को जड़ से ध्वस्त कर ,नये युग का संचार किया,
    नए पथ का सृजन किया , कष्ट अनेकों सहकर ।
    अज्ञान का विनाश किया , गरीबों के बीच रहकर ॥
    शिक्षा का अस्तित्व समझाकर,मुरदों में प्राण फुक दिये ,
    शासन में हिस्सेदारी लेकर , सब कुटिल नीति को तोड़ दिये ,   
    देश के संविधान का सृजन कर , सबको एक सूत्र में जोड़ दिये ,
    स्वतंत्र देश के कानून मंत्री बनकर , हीरा सादृश्य सिर ताज हुए ,
    नीति पुरानी तोड़कर, जोड़ा सकल समाज । 
    समता ममता साथ कर,साधा सबका काज ॥
    बाबा के सपनों का भारत ,आज धरा पर उदित हुआ ,
    समानता पर निर्मित भारत,दुनिया का आदर्श है बना हुआ ,
    बाबा ने किया प्रयत्न अथक , जो इस युग का प्रादुर्भाव हुआ ,
    कोई समाज अब नही रहा पृथक , अब नई किरण का उदय हुआ ,
    संविधान का सृजन हुआ, श्री कमलों के हाथ ।
    नव युग का संचार हुआ ,आज देश के साथ ॥ 

     

     

     


                   4.   नारी  मुक्ति

    हिंदुवादी समाज में , कैद नारी जीवन ।
    दासी बनी यथार्थ में , हाथ पड़े थे बंधन I।
    हिंदुवाद के अदभुत खेल  में ,नारी कैद घर अंदर में ,
    बचपन पिता की छाया में, यौवन ममता  माया  में ।
    पती प्रेम के चक्कर में ,जीवन भर जकड़ी बंधन में ,
    दुख हजारों सहती घर में ,घाव लिये अंतस्थल में ।
    पोषित पुरुष प्रधान जग, नारी पीड़ित रोज ।
    सेवा करती रात दिन ,रख मन अन्दर राज ।।
    सारे समाज में बिगुल बजा , नारी मुक्ति  का संग्राम चला ।
    हिंदुवादियों का पारा  चढ़ा , नारी को लगा दिया फहरा कड़ा । 
    दासी से उठा उसे देवी कहा , उसके सिर देवी का ताज मढ़ा ।
    शिक्षा का अमृत स्वय चखा , नारी को शिक्षा से दूर ही रखा ।
    युद्ध भूमि में नारी ने ,दिया पुरुष का साथ ।
    जीत लिया रण क्षेत्र को , मिला प्रेम से हाथ ।।    
    बदलती चाल फिरंगियों की , अब आकर एक करवट ली ।
    जब बागडोर आजादी की , नारी ने अपने हाथों में ली ।।
    लक्ष्मी बाई ने हाथ में ली ,रणभूमि में दुश्मन को हरा दी ।
    हर मोर्चे पर कामयाबी मिली , मैदान अपने नाम कर ली ।
    नारी विजय संग्राम से , मचा जगत मेँ  शोर ।
    सब बाधा पथ से हटी , दुश्मन हुआ कमजोर ।।
    सदियो की पड़ी दासता से , आजाद हुआ जब अपना वतन ।
    पूज्य बाबा अंबेडकर जी ने , किया नारी मुक्ति का जतन ।
    नेहरू बिल को बचा न सके , सभा मेँ बिल का हो गया पतन ।
    दब गयी  आवाज सभा के कोने में , तत्काल किया बिल का दफन ।
    रानी दासी का मिटा, सारा फैला द्वेष ।
    नारी अब नारी हुई , कोई रहा न भेद ।। 
    त्याग बाबा का सार्थक हो गया , नारी घर और दफ्तर ले ली ।
    उनका स्वप्न साकार हो गया ,आज सभा ने बिल पास कर दी ।
    नारी को अधिकार मिल गया ,सदियों से वंचित अधिकार पा ली ।
    आज नारी पुरुष के समान हो गयी , अपनी लड़ाई स्वयं जीत ली ।
    समता फैली देश में, मिला सभी को प्यार । 
    हुई एकता चहु ओर में , गिरी सभी दीवार ।।

     

     

     

    5.            संविधान निर्माता ।
    हे स्वर्णिम तंत्र विधाता ,संविधान निर्माता ।
    तुम नवजीवन दाता ,गरीबों के भाग्य विधाता ॥
    तुम ओज मयी, तुम वीर मयी,तुम शक्ती के दाता ,
    तुम न्याय मयी,तुम बंधु मयी,तुम समता के दाता ,
    तुम ज्ञान मयी,तुम शील मयी,तुम सौभाग्य विधाता,
    जीर्ण शीर्ण जर-जर समाज के,तुम हो नव जीवन दाता,
    बाधाओं से,विपदाओं से,तुम हो निजात के दाता ,
    जुल्म और अत्याचारों  से,तुम हो विराम के दाता,
    गूंगे बहरे मुर्दों में,तुम हो उनके अधिकारों  के दाता,
    शिक्षा से वंचित समाज के, तुम हो नव जीवन दाता,
    तुम रिद्धि मयी ,तुम सिद्धि मयी,तुम हो सुखों के दाता,
    तुम सत्य मयी,तुम प्रेम मयी,तुम हो करुणा के दाता ,
    तुम आनंद मयी, तुम कीर्ति मयी,तुम हो यस के दाता ,
    प्रबुध और शिक्षित समाज के ,तुम हो सच्चे निर्माता ,
    भ्रष्टाचार, गरीबी से,तुम हो सबके संरक्षण कर्ता,
    तुम शोषित के,तुम शोषण के,तुम हो उन्मूलन कर्ता ,
    दुष्टों और भ्रष्टों से तुम, हो गरीबों के संरक्षण कर्ता,
    दीन दुखी मन क्षीर्ण जनों के,तुम हो पालन कर्ता,
    हे स्वर्णिम तंत्र विधाता ,संविधान निर्माता .


    6.                   बाबा इतना तू कर !
    बाबा इतना तू कर, बस तू एक प्रेम डोर बन ।
    बेला, चमेली, जूही, चम्पा की कलियों की सुन ,
    गेंदा, गुड़हल ,गुलाब,फूल सारी बगिया से चुन,
    अनेकों फूलों को जोड़ ,बस एक माला तू बन ॥
    बाबा इतना तू कर, सारे जगत में मधुर रस घोल ।
    बागों में , बहारों में ,हर गली और कूँचों में ,
    खेत खलिहान और हर शहर की सड़कों में ,  
    सभी जगहों को मिला, एक मंजिल तू बन ॥
    बाबा इतना तू कर,बस एक धारा तू बन ।
    गंगा, यमुना ,महानदी ,कृष्णा, कावेरी ,
    ब्रह्मपुत्र ,नर्मदा , सोन गंडक और कोसी ,
    सारी नदियों को जोड़, एक धारा तू बन ॥
    बाबा इतना तू कर, बस एक भारत तू बन ।
    हिन्दू, मुस्लिम ,सिक्ख ,जैन और ईसाई ,
    बौद्ध, पारसी यहाँ आज मिलकर रहें भाई ,
    सारे मजहब को जोड़, एक मानव समाज तू बन
    बाबा इतना तू कर, बस तू एक प्रेम डोर बन ।


    7.    माला की दासता
    साथियों सुनाता हूँ माला की दास्तां
    गले में हर बनी एक सुंदर मोती की ।
    शोभित थी गले में, गली से न वास्ता ,
    मूल को छोड़कर उसने बड़ी भूल की ।
    झूमती घमंड में थी छोडती न रास्ता
    अपने तीखे वचनों सब को घायल की । 
    एक भूल की और काटा रिश्ता अपनों से,
    गले से टूटी और गली में आ गिरी ।
    देखे पथिक राह में घृणा के भाव से,
    उसके बुरे कार्य की उसको सजा मिली ।
    बार-बार हुई पद दलित पथिकों से,
    उसे प्यार मिला नहीं किसी रही की ।
    हुई मूर्छित होकर गिरी सड़क पे ,
    पर द्या मिली न किसी मानव की ।
    हे साथी सोचो तुम अपने मन में ,
    अगर राह में एक सुंदर हार गिरे ।
    क्या ! हार सड़क में कहीं पड़ा रहे ,
    क्षण मात्र में राही जो राह से निकला ।
    उसने कैसा उसको अपना प्यार दिया,
    झट गले लगाकर अपना सारा प्यार दिया ।
    अब व्यर्थ गवाओं न एक क्षण तुम,जग में मोती बन रहना छोड़ दो ।
    मोती से अब माला बनकर तुम,अपनी ताक़त जग को दिखला दो ।
    मंजिल पर चल कर देखो तुम,अपने मन में रखकर विश्वास को ।
    निश्चित कर अपनी विजय तुम,बाबा के सपनों को एक नया आकार दो ।
    हुंकार लगा अब आवाज दो तुम,बाबा के संघर्षों को व्यर्थ आज मत होने दो।
    करो प्रतिज्ञा सब मिलकर तुम , अपनी एकता से अपना भविष्य बना लो ।


            8        एक सच्चा देश भक्त
    देश भक्त समाज के लिए ,शाश्वत सुपथ का निर्माण करता ।
    सदा सुनहरे भविष्य के लिए ,नई नीतियों का सदा सृजन करता ।
    मनोहर कल्पनाओं के लिए ,कठिन परिश्रम से भूमि तैयार करता ।
    मानवता के पोषण के लिए ,दुखों का सदा समूल विनाश करता ।
            
    समाज में समता लाने के लिए ,आपसी विश्वास जगाने का प्रयास करता ।
    हमेशा देश की रक्षा के लिए, एक जागरूक प्रहरी तैयार करता ।  
    जो गर्मी की तेज धूप सह कर ,दुश्मन से अपने देश की रक्षा करता ।
    सर्द हवा के झोंकों से लड़कर, अपने देश पर प्राण निछावर करता ।

    भूख-प्यास को खुशी से सहकर ,जन जन के जीवन की रखवाली करता ।
    सुनहरे कल के उन्नति के लिए ,नई पौध को तन मन से संवर्धन करता ।
    वृक्ष के मूल को नीर से सींचकर, उसकी शाखाओं को सदा सँवारता ।
    फल की अपेक्षा मन में न रखकर,नाना बुराइयों से सदा उन्हे बचाता ।

    अपने प्रयत्नों से आगे बढ़ कर ,औरों के लिए कल्प तरु तैयार करता ।
    विपत्ति में धैर्य धारण कर ,घोर निराशा के बीच आशा के बीज बोता ।
    अपने परिजनों में भरोसा जागृत कर,प्रेम को नए सिरे से परिभाषित करता ।
    समाज में सभी के उत्थान के लिए,सुखमय वातावरन का निर्माण करता ।

    अपने मित्र को सदा घोर संकट से ,बचाने में उसकी सहायता करता ।

        देश भक्त समाज के लिए, शाश्वत सुपथ का निर्माण करता ।

     


    9    तूफान
    भ्रष्टाचार के प्रचंड तूफान ने ,
    वृक्षों को जड़ से हिला दिया ,
    दूर तक उड़ा दिया उनकी डाल को 
    कमजोर को छोड़ा नहीं,इस प्रचंड तूफान ने ।
    क्षत विक्षत कर दिया प्रबुद्ध समाज को,
    धरती से मिटा दिया कितनों को जड़ से,
    इस प्रचंड तूफान ने ।
    सोचने पर लोग विवश हुए,
    उग्र दानव के अगूढ़ रहस्य को,
    मानव हृदय को विचलित किया , इस प्रचंड तूफान ने ।
    झोपड़ी से जा छान दूर पड़ी ,
    धिककारती अपने भाग्य को ।
    लहू लुहान कर दिया था। इस प्रचंड तूफान ने ।
    जड़ता गहरा गई थी जगत में ,
    सूझता न था किसी के हाथ को ।
    समाज में उलट फेर कर दिया था इस प्रचंड तूफान ने ।
    ढृण प्रतिज्ञ अन्वेषियों ने खोजा,
    इस भयंकर दानव के संरक्षक को,
    अपने हथियार सारे डाल दिए ,
    इस प्रचंड भ्रष्टाचार के तूफान का ,
    सारी धरा से विनाश अब हुआ ।
    नव ज्योति मिली जगत को, भ्रष्टाचार का अंत हुआ ॥

       


                  10   महात्मा बुद्ध

    प्रकृति का यह नियम शाश्वत, कोई न परिपूर्ण हुआ  ,
    जिसने किया परमार्थ यहाँ, वह अमर जगत में हुआ ।
    हर मानव यह आश ले संसार में सब जगह घूमा फिरा ,
    जो कुछ मिला उन्हें खोज में, वह दीन दुखियों में भरा ।
    ज्ञान के आतुर परिंदे खोज में, उड़ते अम्बर में यहाँ-वहाँ,
    बन न पाये स्थिर बसिन्दे, हर क्षण भटकते थे यहाँ-वहाँ ।
    जो भी उनके पास आया, वे सदा खुस हो सब लुटाते रहे ,
    ज्ञान ज्योति में विस्तार आया वह सदा आगे बढ़ते रहे ।
    निश्चल बादल सदृश्य ठहर, बस एक जगह बरसने लगे ,
    बस वहीं गुरु नाम से, विश्व विख्यात विदयालय बने ॥
    ज्ञान की ऊर्जा संसार में, चारों तरफ फैलाता रहा ,
    तिमिर से लड़ने शक्ति, हर इंसान में जगाता रहा ।
    बीज बोता सतमार्ग का, जीवन में पून्यार्जन करता रहा ,
    कल्याण कर इंसान का, सबकी मंगल कामना करता रहा ॥
    ज्ञान सलिल सागर सदृश्य, नाना रत्नों से परिपूर्ण हुए ,
    सारी बुराइयाँ संसार की, अपने तेज ज्ञान से मिटाते हुए ॥
    समाज को हर काल में शुद्ध कर, संहार से बचाते रहे ,
    खुल स्वर्ग का व्दार जग में ऐसा उपक्रम चलाते रहे ।
    खुला जग में ज्ञान पीठ एक नया अद्भुत रूप धरण कर ,
    ज्ञान ज्योति की पूञ्ज फैली सारी अज्ञानता को कुचलकर ॥

       

     

               11      दान

    एक दान है विद्यादान, करो सदा मन लाय ।
    ज्यों ज्यों खर्चे जगत में ,त्यों त्यों बढ़ता जाय ॥
    जो देता दिल खोल कर , जग में पूजा जाय ।
    धन संपदा सब कुछ मिले ,नाम अमर कर जाय ॥
    दान दूसरा जगत में , जो प्रभु का वरदान ।
    कर दो सोच विचार कर , जग में मिले सम्मान ॥
    ईश सृष्टि के विस्तार में, कर सच्चा योगदान ।
    इस सृजन के संग्राम में ,अपना कर बलिदान ॥
    अभय दान उससे बड़ा , जो गुरु का आदेश ।
    शत्रु को भी उपहार कर, ले उसका आशीष ।।
    शांती लाए लक्ष्मी बसे ,मिटे हृदय के क्लेश ।
    राज पाठ दोनों मिले , पहुंचे सच्चा संदेश ॥

    अंग दान सबसे महान , ज्यों जग जीता जाय ।
    कर न सका जो दान यह , फिर पीछे पछताय ॥
    जग से जाने से पहिले , करो नेत्र का दान ।
    तेरी उपस्थिति दे सके , करो जगत का कल्याण ॥

     

     

     


    12     इतिहास    
    इतिहास का उपहास मत  कर,यह  तेरे आतीत का दर्पण है ।  
    ये जीवन के सभी मोड़ों पर ,ये ज्ञान ज्योति का प्रकाश पुंज है ।
    स्वर्ग से सुदर राज महल पर ,सारी दुनिया आज फिदा है ।
    मानव सभ्यता के विकास पथ पर ,चलता फिरता एक कथा चित्र है ।
    पर्वत का सीना आज फाड़कर ,तूने जो विजय  पथ बनाया है । 
    गिरिवर की उतुंग चोटी पर ,पद चिन्ह तुम्हारे जो अंकित हैं ।
    नदी की बहती धारा को मोड़कर ,बिजली जो आज तुमने बनाई है ।
    बंजर धरती पर बीज रोपकर ,जो फसल आज तूने उपजाई है ।
    सागर की लहरों से लड़कर ,कनिष्क ,विराट को तैराया है ।
    वारिध को रण मेन परास्त कर ,मोती चुन गर्त से बाहर लाये हो ।
    अम्बर मेन उड़ते वायुयान पर ,नजर सभी की टिकी हुई है ।
    अब चंदा से लेकर मंगल पर ,तेरी शोर्य पताका फैली है ।
    यह जीवन की उन्नति अवनति पर,एक वृसितित लेखा जोखा है ।
    अपने इतिहास का उपहास मत  कर,यह  तेरे आतीत का सच्चा  दर्पण है । 

     

     

     

                           13          आँगन में
    नए वर्ष की स्वर्ण किरण,पहले आए तेरे आँगन में ,
    अंधकार की काली छाया, टिक न पाये तेरे आँगन में । 
    प्रीत,स्नेह और धन वैभव ,लाये कुबेर तेरे आँगन में ,
    दुनियाँ की सारी सुख सुविधा ,भर जाएँ तेरे आँगन में ।
    फूल कली से महके उपवन , भँवरे गायें तेरे आँगन में ,
    प्यारी चिड़ियों की मधुर गूंज , हर क्षण गूँजे तेरे आँगन में ।
    सौरभ सुगंध बन तेरा गौरव ,छा जाये जग के आँगन में ,
    दुख दरिद्र और हीन भावना , कभी न आए तेरे जीवन में ।
    काम क्रोध और मन में लालच , कभी न टिके तेरे दामन में ,
    चन्दा ले चमके धवल चाँदनी , हर शाम तुम्हारे आँगन में  ।
    तारों की झिल मिल ज्योति , हर रात सजे तेरे आँगन में ,
    रतनाकर की हर उठती तरंग , रत्न भरे तेरे आँगन में ।
    कारे कजरारे सांवन के बादल , मोती बरसाएँ तेरे आँगन में ,
    सबकी उन्नति और प्रेम भावना, हो लक्ष्य तुम्हारे जीवन में ।
    शांति और सदभाव की कामना , फैले सबके जीवन में ,
    नए वर्ष की स्वर्ण किरण,पहले आए तेरे आँगन में ॥

     


       14    आज का विद्यार्थी
    हमारी प्रगति में गुरुजनों का योगदान ,
    सभा में बैठे गुरुजन हैं महिमा से मंडित ।
    सदा हमको दिया विद्या का श्रेष्ठ दान ,
    ज्ञान विज्ञान से आज हम हैं सुशोभित ।
    अजी ! छोटे में हमने वादा किया था ,
    बड़ों का सम्मान गुरुजनों  का आदर ।
    हर सुबह हमने प्रतिज्ञा किया था ,
    कभी भी न किसी का करेंगे निरादर ।
    मान सम्मान का पूरा ध्यान रखा था ।
    छोटी -छोटी गलतियों ध्यान हटाकर ,
    कभी काम न किया तो निकम्मा कहा था ।
    बुरी आदतों से हमें रखा  बचा कर,
    जो बचपन हमने उनसे  वादा किया था ।
    पूरा करेंगे सारे कसमें निभा कर ,
    पाँच सितंबर उन्हें दे देंगे सम्मान ।
    उनकी सारी  शिकायत को दूर कर, 
    पढ़ देगें व्याख्यान निभा देंगे वादा ।
    आशा की ज्योति फिर से जलाकर ,
    अपने गुरुजन के मन में है आश जगाना ।

     

             15   शतरंज
    शतरंज के एचआर मोहरे , चलते अपनी चाल ।
    बैरी को सब मिल मारते , रखते सबका ख्याल ॥
    शतरंज समाज का सच्चा है आइना ,
    हर खिलाड़ी सदा जीत की करता कामना ।
    वर्तमान में भविष्य का दिखलाता रास्ता ,
    बैरी से डटकर सदा करता है सामना ।
    अपने प्रतिद्व्दी को कम नही आँकता ,
    युद्ध के मैदान से पीछे नहीं भागता ।
    खतरों की प्रवाह न करता सिपाही , 
    राजा की शान हैं ये सच्चे सिपाही ।
    अपने राजा की राह करते आसान ,
    राजा की जीत में सदा पाते सम्मान ।
    शतरंज में प्रजातन्त्र का , झलकता है सही रूप ।
    समाज के हर क्षेत्र का , रखता समग्र प्रारूप ॥
    फैला जगत में आज सर्वत्र एक रूप ,
    शासन में जनता का दिखता स्वरूप ।
    सूरज सादृश्य सबको देता है धूप ,
    भेद भाव छोड़ बना सबके अनुरूप ।
    नाना जाति धर्म बंटा अपना समाज ,
    प्रगति पथ है खुला सबके लिए आज ।
    गरीब मजदूर सब मिलकर रहते आज ,
    बढ़ रहा आगे प्रतिदिन अपना समाज ।
    मंत्री अधिकारी सब हैं एक दूजे के साथ ,
    जन नायक आज मांग रहे जंता से साथ ।
    प्रखर बुद्धी का परिचय दे , शतरंज जीते प्रवीण ।
    दुश्मन से बाजी छीने , कर सबको पराधीन ॥
    शतरंज बुद्धि जीवियों का उत्तम खेल ,
    समाज के हर वर्ग का दिखलाता मेल ।
    समय का इस खेल में नही कोई मोल ,
    दुश्मन पर विजय की देता राह खोल ।
    संकट में धैर्य रखकर लेता उत्तर खोज ,
    आलस्य को त्याग सतर्क रहता हर रोज ।
    बाजी हर चाल की चलता है  नाप तोल ,
    हर किसी से रखता आपस में मेल जोल ।
    उसके यश की पताका जग में फैले चहु ओर ,
    सूरज की तरह अम्बर में चमके चारों ओर ।
    दिखा रहा शतरंज आज , शासक की योग्यता ।
    साम्राज्य में आपूर्व तेज , सूर्य सादृश्य चमकता ॥

     

    16     साहित्यकार    
    साहित्यकार है एक सफल मालाकार ,
    जो नाना फूलों से बना देता सुंदर माला ।
    रचता है कविता लिखता, कहानी का सार ,
    जो सबके दिल को प्रभावित केआर डाला ।
    भाषा के शब्दों को चुनकर देता आकार ,
    अपनी कल्पनाओं को देता सुंदर आकार ।
    समाज में फैली विसंगति को मिटाकर ,
    देता है अपने देश के गौरव को संवार । 
    त्याग बलिदान की सच्ची इबारत रचकर ,
    भर देता है जन जन के मन में प्यार ।
    अपनी सहज मनोवृतियों से सृजन कर ,
    लाता है पुरानी परम्परायों में सुधार ।
    राग ,द्वेष ,ईष्या को मानव हृदय से मिटाकर ,
    भविष्य की  नयी  पौध करता है तैयार ।
    जो विपत्ति के तेज धूप में गहन छाया बनकर ,
    जोड़ दे सबको, बनकर माला की एक डोर ।

     


    17.  कलम
    मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
    नन्ही सी आकृत ले ,मैंने कदम रखा ।
    चल पड़ी मई आशा के जीवन पथ पर ,
    जहां मुझे खुद को कुछ नहीं था पता ।
    हंस रहे थे लोग मेरे परिणित  पर,समय ने मुझको दिया सुनहरा मौका ।
    मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
    मैं ने सजने सँवारने का नहीं छोड़ा मौका ।
    देखते ही देखते मैं छा गयी बाजार पर ,हर तरफ संसार में होने लगी चर्चा ।
    बच्चे ,बड़े हर किसी के जेब पर,
    मैंने आसानी से कर लिया कब्जा ।
    मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,मेरे रूप सौंदर्य का बट गया पर्चा ।
    मैं सदा रहने लगी मानव के मुख पर ,
    मुझे साथ रखने के लिए लोग करने लगे खर्चा ।
    बाजार में बिकने लगी नाना रूप धारण कर ,सुंदरता के साथ मैं ने बढ़ायी अपनी क्षमता ।
    दो घड़ी से बड़ अब मैं चलने लगी सप्ताह भर ,
    धरती से लेकर अम्बर की ऊंचाई को छुआ ।
    मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,दिखा दिया मानव को वह अजेय लम्हा ।
    मैं नन्ही सी कलम ,मुझे विश्वाश  है अपने ऊपर ,
    मैं दे सकूँ सबको सुख का लम्हा । मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर ।

     

    18    आंशू  सदा बहाते क्यों !
    जब वर्षा रानी रूठ गयी, तो आंशू क्यों बहाते हो ।
    जड़ जंगल रह सावधान, सब  अपना धर्म निभाते ।
    मीठे-मीठे सुमधुर फल देकर , सबकी भूख मिटाते ।
    पशु पक्षी को परम प्यार दे , सदा उनकी रक्षा करते ।
    हर प्राणी को शरण में रखकर ,धरती की शान बढ़ाते । 
    जड़ चेतन का सुंदर रिश्ता , जीवन में  सदा निभाते ।
    बदले में कुछ आश न रखकर , मानव को पाठ पढ़ाते ।
    पर मूर्ख इंशान !इनकी प्यार की भाषा कहाँ समझते  ।
    प्यार के बदले नस्तर देकर , सब जड़ से इन्हे मिटाते ।
    वर्षा लाने वाले उपवन की ,रक्षा मन से कभी न करते ।
    नभ में छाए घन  देखकर ,इन्द्र की  पूजा हैं नित करते ।
    जीवन देने वाले वन को , सच्चा प्यार कभी न करते ।
    जब वर्षा रानी रूठ गयी, तो आंशू सदा  बहाते । नदियां सारी सूख गयी, तो आंशू सदा बहाते ।
    लालच के वशीभूत होकर , जंगल से पेड़ को काटते । नदियों पर फिर बांध बनाकर , पानी को एसे बांटे ।
    नदी किनारे उद्दयोग लगाकर , जल में जहर मिलाते ।
    नदी का पानी शहरों में लेकर, अपनी प्यास बुझाते ।
    जंगल पर अधिकार जमाकर, पशु पक्षी से बसेरा छीने ।
    नदी के जीवन चक्र तोड़कर , ये झूठी शान दिखाते ।  
    नदियां बहना भूल गयी तों  अब आंशू क्यों हो बहाते I


    19.    भ्रष्टाचार
    आज भ्रष्टाचार ने कोहराम मचा दिया ,
    प्रजातन्त्र की नींव को जड़ से हिला दिया ।
    ईमान की दीवार को नश्त नाबूत कर दिया,
    देश की सुरक्षा पीआर प्रश्न चिन्ह लगा दिया ।
    शासन में परिवार वाद ने अपना घर बना लिया,
    बेईमानी का बीज हर क्यारी में उगा दिया ।
    प्यार और सद्भाव को झकझोर कर रख दिया ,
    चारों तरफ नफरत की बाड़ खड़ी कर दिया ।
    चापलूसों का समाज में हुजूम सा लगा दिया ,
    मेहनत कस इंसान का जीवन बेकार कर दिया ।
    सबके लिए उन्हें मात्र हंसी का पात्र बना दिया,
    नेता और बाबू ने लूटना अपना ईमान बना लिया ।
    आज महगाई ने सभी का जीना दुश्वार बना दिया,   
    बाजार में कालाबाजारी और लूट सरे आम कर दिया ।
    देश के नवजवानों को उनके पथ से भ्रष्ट कर दिया ,
    लेखनी और किताब की जगह उन्हें बंदूक दे दिया ।
    उदारीकरण के नाम पर देश को गिरवी रख दिया ,
    बड़ी कंपनियों को देश के नेताओं ने हथियाँ लिया ।
       समाज कल्याण के नाम पर टैक्स बचा लिया ।
    सड़क से संसद तक कानून का मखौल उड़ा दिया ,
       घपलों और घोटाओं से देश को शर्म शार कर दिया ।
         अपने देश का पैसा विदेशी बैको में जमा कर दिया ,
          देश को आर्थिक बदहाली के किनारे खड़ा कर दिया ।
    मेरे देश के नवजवानों जागो अब समय आ गया ,
    बचा लो देश की गरिमा यह संदेश आ गया ॥

     

     

     

     

     

      20    ओ मेरे बाबा
    तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे । तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥
    सूरज से तुम हो न्यारे ,चन्दा से हो तुम प्यारे ।
    लाखों गरीब जन के ,आँखों के तुम हो तारे ।
    तुम इंसान नहीं भगवन मेरे,हर कम तुम सँवारे ।
    आरती करू मैं हर दिन , आरती शाम और सवेरे ।
    गंगा से तुम हो पावन ,तुमने पतित को तारे ।
    शिक्षा का अमृत घर-घर , तुम आज ले पधारे ।
    समझा हमारे दुख को , संविधान ले पधारे ।
    वंदन करू मैं निसि दिन ,नित शाम और सवेरे ।
    मुसीबतों में तुम प्ले ,सदा अन्याय से लड़े ।
    कभी भूल से भी आप,अपनी मंजिल से न डिगे ।
    किश्ती निकली मझधार से ,लहरों से न डरे ।
    नमन करू मैं हर दिन , नित शाम और सवेरे ।
    अज्ञानता से सब लड़ सकें , वह ज्ञान दे दिए ।
    प्रभु मांगे बिना ही आपने , सब कुछ हमें दिए ।
    घाव भरे हमारे मन के , सब कष्ट हर लिए ।
    पूजा करू मैं हर दिन , नित शाम और सवेरे ।
    तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे । तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥


            21    मेरा वतन
    आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
    कल बागों में कोयल कूक रही ,बैठी पेड़ों पर चिड़ियां चाहक रहीं ,
    कलियाँ मंद पवन में झूम रहीं ,अपनी भीनीं सुगंध को बिखेर रहीं ,
    कल झरनों का पानी जीवन देता रहा ,पशुओं की प्यास को हरता रहा ,
    कण कण में नव जीवन भरता रहा ,जग सुख और वैभव लुटाता रहा ,
      कल हिन्दू ,मुस्लिम ईसाई में एकता रही ,सच्चे प्रेम की सरिता बहती रही ,
    धर्म के नाम पर कोई शिकायत नहीं ,सभी आपस में करते थे प्यार सभी ,
    देश प्रगति पथ पर आगे बदता रहा , गली गाँव शहरों में प्रेम बीज बोता रहा ,
    दुखों पर स्नेह का मलहम लगाता रहा , अपने दुश्मन पर सदा जीत पता रहा ,
    कल वैज्ञानिक नए शोध करते रहे , अपने गौरव को जगत में फैलते रहे ,
    नित नए रोज अस्त्र बनाते रहे ,अपने वतन की सुरक्षा को बढ़ाते रहे ,
    नदियां कलुषित हुईं, प्रगति बाधित हुई ,कलियाँ मुरझा गयीं ,खुशबू खंडित हुई ,
    सारे झरने सुख गए , वैज्ञानिक गुम हो गए ,धर्म चक्र रुक सा गया , जीवन थम सा गया ।
    आज नेता बुद्धिजीवी कर लो विचार मंथन ,
    नयी पीड़ी के लिए अब कर लो थोड़ा चिंतन,
    मानव की कुरुरता पशु झेल रहे हर दिन ,
    अब पक्षियों के सामने आ खड़ा है दुर्दिन ,आज मेरे वतन को क्या हो गया ।

    22                     सोचो जरा !
    सूरज रोज सवेरे आता , चंदा चाँदनी है बिखराती ।
    विराम दायिनी रजनी आती,सबको सुख दे जाती ।
    अम्बर में तारे गतिशील ,हैं ये सड़कें आती जाती ।
    आयु हमारी बदती रोज ,मणि से शोभित है नागराज ।
    मंदिर में हैं परमपिता ,सबके आँखों में है ज्योति ।
    सूरज में बस्ती है लाली , हाथी के मस्तक में मोती ।
    स्वर्ग में फैला इंद्रासन,सबके तन में है जीवन ।
    कानों से उत्पन्न कर्ण ,उत्तानपाद से जन्मे ध्रुव तारा ।
    विष्णु सोते शेष नाग पर , राम के डर से हिला संन्दर ।
    हनुमान जी निगले थे सूर्य,  । रावण था दशकंदर ।
    अहिल्या पाषाण बनी थी ,राम चरण रज से इंसान बनी थीं ।
    गज आनन थे देव गणेश ,तीन नेत्र से प्रसिद्ध महेश । 
    ये दोस्तों छोड़ दो सारे भ्रम ,टूट जायेगे सब फैले मर्म ।
    जब होगा ज्ञान का संसर्ग , हम सब का मन होगा निर्मल ॥ 

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