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September 2013
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भारतीय संस्कृति दुनिया के महान संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। ऐसी महान संस्कृति में अस्पृश्यता एक कलंक के रूप में हैं। भारतीय वर्ण व्यवस्था में चतुर्थ वर्ण को शूद्र कहा गया है। इस वर्ण पर सदियों से जुल्म ढाए जा रहे हैं। आधुनिक युग में अनेक नेताओं और समाज सेवियों ने इस अस्पृश्यता को मिटाने के लिए एड़ी-चोटी के प्रयत्न किये हैं


महात्मा गांधी अस्पृश्यता मिटाना चाहते थे। उन्होंने भारतीय समाज पर लगे इस कलंक को मिटाने के लिए बहुत से प्रयास किए। म. गांधी के अनुसार, ‘‘हिंदू धर्म में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं है। अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर लगा एक कलंक है। यदि यह अस्पृश्यता प्रथा न गई तो हिंदू समाज और हिंदू धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।’’१


भारत जैसे विशाल देश में जहाँ सदियों से प्रेम, शांति, अमन, मानवता, सद्भावना जैसे शब्द को ठोस गरिमा है। विश्व के महान शांति प्रसारक और महान पृष्ठभूमि वाले देश में दलितों को लेकर यह व्यवहार ? जब कि सभी मानव एक समान हैं। आदमी की पहचान उसके कर्म से, ज्ञान से विद्ववत्ता से होनी चाहिए न की उसकी जाति से। इसलिए कबीर ने कहा है -


        ‘‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।’’


हम सभी हाड मांस से बने, एक समान हैं। हमें छुआछूत को पीछे छोड़ना चाहिए। अस्पृश्यता समाज में लगा कोढ़ है। छूत-अछूत के भेदभाव ने दलित वर्ग को प्रताड़ित किया है।


आज वर्तमान में भी अस्पृश्यता अपना स्थान बरकरार रखी हुई है। आज हम भले ही ग्लोबल होने की बात करते हैं किंतु आज भी जाति व्यवस्था जन्ममूलक बनी हुई है कर्ममूलक नहीं। इस संदर्भ में दिनकर लिखते हैं -
        ‘‘मगर मनुज क्या करें ? जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं।
चुनना जाति और कुल अपनी वश की तो है बात नहीं।’’२


जाति व्यवस्था भारतीय समाज की ऐसी चारित्रिकता है जो अन्यत्र नहीं मिलती है। अन्य धार्मिक समुदायों में विभेद पाये जाते हैं, मगर उतने रूढ़ नहीं है जितनी भारतीय समाज की जाति व्यवस्था। जाति व्यवस्था की पकड़ हमारे देश में दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। कहा जाता रहा है कि आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप जाति व्यवस्था ढीली होगी और अअंतः मिट जाएगी, मगर असलियत कुछ और ही है। हिंदी भाषा क्षेत्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से आर्थिक रूप से काफी उन्नत है और वहाँ अधिकतर आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। वे राजधानी दिल्ली से कई प्रकार से जुड़े हुए हैं और उनके काफी सारे लोग विदेश में कार्यरत हैं। फिर भी जाति व्यवस्था का शिकंजा जितना उनके यहाँ मजबूत है उतना पिछड़े हुए बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में नहीं है।


आए दिन दलित और गैर दलित के बीच शादी संबंध के परिणामस्वरूप लड़का-लड़की को मारने की बात सामने आती है। हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसी-न-किसी बहाने दलितों को उत्पीड़ित किया जाता है। यह स्थिति लगभग समग्र भारत की है सोचने की बात है कि इसके पीछे क्या कारण हैं ?


उत्तर वैदिक काल से ही शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया है जिसके कारण वह अज्ञान के गहरी अंधी खाई में लोटे गए हैं। म. फुले कहते हैं -
        ‘‘शिक्षा के अभाव से बुद्धि का र्‍हास हुआ।
बुद्धि के अभाव से नैतिकता की अवनती हुई।
नैतिकता के अभाव से प्रगति अवरूद्ध हो गयी।
प्रगति के अभाव से सम्पति लुप्त हो गयी।
सम्पत्ति के अभाव से शूद्रों का पतन हो गया।
इन सारी विपत्तियों का अभिभाव अकेले अज्ञान से हुआ।’’


जीवन की मूलभूत इकाइयों से वंचित दलित वर्ग सदियों से जीवन जी रहा नहीं, बल्कि जीवन को मानो ढो रहा है। साक्षर न होने के कारण जमीनदारों, साहूकारों, बनियों ने धूर्तता से उनका बेजा लाभ उठाया है। उधार लिए पैसों का ब्याज चुकाते-चुकाते जीवन से वे हार मान बैठे थे। शिक्षा के अभाव में दलितों का बहुत शोषण हुआ है। शिक्षा से समझ बढ़ती है, ज्ञान बढ़ता है। परंतु उन्हें हमेशा शिक्षा से वंचित ही रखा गया है। फिर कैसे वह अपने आप को व्यक्त करेंगे। शिक्षा से वंचित रखना यह दलितों के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश थी।


शिक्षित समाज में उपरी तौर पर दलितों के प्रति व्यवहार बदल रहा था पर सूक्ष्म रूप से अलगाव जारी था। जैसे खाने-पीने के अलग बर्तनों का प्रयोग आदि। ‘‘समय बदला है लेकिन फिर भी कही कुछ का वही ठहर गया है। आज भी जाति एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण घटक है। जब तक पता नहीं चलता लोग सामान्य रहते हैं। जाति का पता चलते ही सन्नाटा खींच लाता है। फुसफुसाहटे उठती हैं। दलित होने की पीड़ा चाकू की तरह नस-नस में उतरती जाती है। पढ़े-लिखे दलितों की अवस्था त्रिशंकू जैसे हो गयी है। उनकी पहचान उनकी अस्मिता का संकट आज पहले से अधिक बिकट है। वे समाज के मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं तो सवर्ण बाहें फैला कर नहीं अपनाते।’’४ जहाँ तक दलित जीवन का सवाल है वह भारतीय समाज में हमेशा तिरस्कृत ही रहा है और वर्तमान में भी तिरस्कृत ही है। इस तिरस्कार भरी जिंदगी से दलित वर्ग उब चुका है उससे वह मुक्ति चाहता है।


आधुनिक समय में दलित वर्ग अपनी सदियों की दासता से मुक्ति चाहता है। वह अपनी स्थिति में परिवर्तन लाना चाहता है। उसके बदलते हुए कदम उसमें परिवर्तन की मांग करते हैं। वह भी आज सर उठाकर जीना चाहता है। सभ्य समाज, जो मुख्यधारा कहलाता है। उसके साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है। उसे भी एक व्यक्ति के रूप में जाना जाय यही उसकी इच्छा है।


वर्तमान समाज में दलितों के उद्धारक महामानव डॉ. आंबेडकर ने उन्हें शिक्षा, संघटन और संघर्ष का रास्ता दिखाकर उनके अंधेरे जीवन में नई रोशनी की किरण दिखलायी है। शिक्षा के कारण दलित युवक आज पढ़-लिखकर अपने हक के प्रति जागृत दिखाई देता है। शिक्षा ने तीसरे नेत्र का काम किया, जिससे सामाजिक प्रवाह में वह अपने अस्तित्व की माँग कर रहा है। शिक्षित दलित समाज ने साहित्य में आगमन कर अपनी वेदना को जो परिधि पर थी उसे केंद्र में लाने का स्वयं कार्य किया है। महात्मा फुले के शब्दों में कहे तो, ‘‘राख ही बता सकती है जलने की पीड़ा क्या है ?’’५ यह पीड़ा लिए दलित समाज अपनी स्वानुभूति को समाज के सामने लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।


दलित वर्ग को लेकर साहित्य में चर्चा करना वर्जित माना जाता था। इसी हाशिए के बाहर के समाज का साहित्य में पर्दापन करना इतना आसान काम नहीं था। समकालीन साहित्यकारों ने समय के साथ सरोकार निभाते हुए इन हाशिये के बाहर के समाज को हाशिए के अंदर लाने का कार्य किया है। समाज से सताये गए इस वर्ग को सामाजिक स्तर पर न्याय दिलाने का प्रयास साहित्यकारों ने सफलतापूर्वक किया है।


        ‘दलित पँथर’ की स्थापना के उपरांत देश में अनेक संघटनाओं की स्थापना हुई जिसके द्वारा दलित साहित्य को बढ़ावा मिला या एक मंच प्राप्त हुआ। दलित साहित्य रूढ़िवाद, जातीयवाद और भाग्यवाद ही नहीं मानता, नारी उत्पीड़न और श्रमिक उत्पीड़न के विरूद्ध खुला विद्रोह उसके मूल स्वर में शामिल है।


हिंदी दलित साहित्य की देन सिर्फ दो ही दशकों की है। जिसका मूल स्त्रोत महाराष्ट्र का दलित साहित्य है। दलित साहित्य की प्रेरणाओं में डॉ. आंबेडकर, म. फुले, शाहू महाराज आदि रहे हैं। हिंदी पर मराठी दलित साहित्य का प्रभाव दिखाई देता है।
समकालीन साहित्यकारों ने दलित उत्पीड़न को लेकर कहानियाँ लिखी हैं। जिनमें प्रमुख रूप से - ‘सुरंग’ (सूरजपाल चौहान), ‘सलाम’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि), ‘दृष्टिकोण’ (अरविंद कुमार राही), ‘पुनर्वास’ (विपिन बिहारी), ‘चार इंच की कलम’ (कुसुम वियोगी) आदि कथासंग्रहों का समावेश है। हिंदी दलित सािहत्य का पहला उपन्यास जयप्रकाश कर्दम का ‘छप्पर’ सत्यप्रकाश का ‘जसतसभई सवेर’, मोहनदास नैमिशराय का ‘मुक्तिपर्व’ आदि उपन्यास महत्त्वपूर्ण हैं। उपन्यास साहित्य के साथ-साथ ही दलित आत्मकथा लेखन भी पूरी सशक्तता के साथ उभरकर आया जिसमें - मोहनदास नैमिशराय ‘अपने-अपने पिंजड़े’, ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘जूठन’, कौशल्या बैसंत्री ‘दोहरा अभिशाप’, डॉ. श्योराजसिंह बेचैन ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ आदि। जिसके द्वारा दलित विमर्श हमारे सामने आता है।


दलित लेखकों के साथ गैरदलित लेखकों ने दलित साहित्य पर लेखनी चलायी है। रमणिका गुप्ता ने दलित कथाओं का संपादन किया है। यह सारी कथाएँ व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह करती हैं।


दलित साहित्य को बढ़ावा देने में दलित साहित्य पत्रिकाओं ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिसमें ‘‘हिमायती’ (पाक्षिक), ‘नागमय संस्कृति’ (साप्ताहिक), ‘पूर्वदेवा’, ‘अनार्य भारत’ (साप्ताहिक) विशेष उल्लेखनीय हैं।’’६


समकालीन साहित्यकारों ने यह एहसास दिलाया कि दुनिया में महान संस्कृति के रूप में मानी जानेवाली भारतीय संस्कृति है पर इस महान संस्कृति को शर्म आये ऐसी समाज व्यवस्था दलितों को मानवीयता से वंचित रखती है। जो समाज विश्व को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की शिक्षा देता हो वही समाज अछूतों को समाज व्यवस्था के बाहर रखता है। समाज से बहिष्कृत कर उन्हें जानवरों से बदत्तर जीवन-यापन करने पर मजबूर करता है। ऐसे मानसिक रूप से विकलांग समाज का चित्रण दलित साहित्यकारों ने अपने साहित्य में किया है। साथ ही सवर्णों की सत्ता के विरूद्ध विद्रोह भी दिखलाया है। आज शिक्षा के कारण दलित जागृत हुआ है। वह भी इन्सान है, उसको भी मानवीय संवेदनाएँ हैं। वह भी आज अपने हक के लिए सजग दिखाई दे रहा है।

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संदर्भ सूची
१) दलित विमर्श - डॉ. नरसिंहदास खेमदास वनकर, पृ. ५५
२) रश्मिरथी - दिनकर, पृ. २६
३) समीक्षा - संपा. गोपालराय, अप्रैल-जून, २००७, पृ. ५
४) दलित विमर्श - प्रतिमा दवे, अनभै - उपन्यास विशेषांक - संपा. रतनकुमार पाण्डेय, पृ. १८३
५) रचनाकार : वीरेंद्र सिंह यादव का आलेख : दरकती, चटकती परम्पराओं का अक्स और दलित आत्मकथाओं का सच - प्ूज् : //ंत्दुेज्दू.म्दस्, पृ. ७
६) हिंदी साहित्य में दलित अस्मिता - कालीचरण ‘स्नेही’ - स्वातंत्र्योत्तर हिंदी काव्य में दलित चेतना, पृ. ३९

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डॉ. शेख अफरोज फातेमा

हिन्दी विभागाध्यक्ष,

मौलाना आजाद कॉलेज औरंगाबाद

// उफान //

        हमारे देश में हर चीज उफान पर है। मंहगाई तूफान पर है। रूपये की अंतर्राष्ट्रीय कीमत चढान पर है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें खौल रही हैं। खाने की वस्तु जला रही हैं। दूध, खाद्य तेल उबाल पर हैं। इन सब तूफानों के बीच देश का आम गरीब आदमी अपनी नैया पार करने की कोशिश कर रहा है।


        देश में न्याय, शिक्षा, आहार, आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं मंहगी हैं।  शिक्षा पर मंहगाई का ग्रहण लगा है। लाखों रूपये आवश्यक कोर्स की कीमत है। अस्पताल के बिल, फाईव स्टार होटल के, केश मेमो की याद दिलाते हैं। दबाओं की कीमतें उफान पर हैं। जल, जंगल, जमीन की कीमतें, बिजली के बिल की तरह करंट मारती है। एक आम वेतनभोगी के जिन्दगी भर के वेतन से ज्यादा अर्फोडेबल हाउस की कीमत है।


        देश में अश्लीलता उफान पर है। सिनेमा, टी.व्ही सीरियल, चैनल, अश्लीलता, अंधविश्वास हमारे बेडरूम और डायनिंग टेबिल पर परोस रहे हैं। दिन में जो चैनल अंधविश्वास, भूतप्रेत, तंत्र-मंत्र जादू टोना का विरोध करते हैं वहीं रात में लाखों करोडों रूपये का विज्ञापन प्रचार प्रसार में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। वे ढोंगी, पाखंडी, बाबाओं के निर्मल दर्शन कराते हैं। टोने टोटके, जादूटोने के नाम पर यंत्र बिकवाते हैं। श्री लक्ष्मीयंत्र धनवृद्वि ताबीज, कुबेर  कुंजी  बिकवाकर अपनी धनवृद्धि करते हैं। राम राज्य की आशा जगाकर अंधश्रद्धा का प्रचार करते हैं


        देश में भ्रष्टाचार उबाल पर है। विकेन्द्रीकरण के कारण पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगरनिगम आदि स्वायत संस्थाएं भ्रष्टाचार का साधन और साध्य बन गई हैं। आम जनता में विकास की सड़क एवं शिक्षा की रोशनी जगाने के नाम पर भ्रष्टाचार का नंगा नाच खेला जा रहा है।


        देश में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन चरमसीमा पर होने के कारण प्राकृतिक प्रकोप उफान पर है। प्राकृतिक प्रकोप के कारण उत्तरांचल में हजारों जाने गई, लाखों बर्बाद हो गये, करोंड़ों का नुकसान हो गया, लेकिन तब भी हम प्रकृति से छेड़-छाड़ करना बंद नहीं कर रहे हैं।
       
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हमें आजादी है कि ...

 

            देश को आजाद हुये 66 वर्ष हो गये हैं, लेकिन अभी देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी दो समय का पोषण आाहर कमाकर खाने में असमर्थ हैं, उसके लिये खाद्य सुरक्षा बिल पास हुआ है। लगभग 35 प्रतिशत आबादी अत्यन्त गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लगभग 50 प्रतिशत लोग अभी भी अशिक्षित हैं और उनमें से कुछ लोग शिक्षा के नाम पर केवल अपना नाम लिखना जानते हैं। देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी बेरोजगारी का दंश झेल रही है।


        इसके बाद भी हम अपने को पूरी तरह आजाद मानते हैं। हमें पूरी आजादी है कि हम सरकारी नियम, कायदे कानून को न माने और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करें, गदंगी फैलाये , सड़क किनारे लघुशंका करें दिशा मैदान जाये लेकिन अपने घर में सेप्टीकटेंक का निर्माण न करें।


        हमारे देश के कर्णधारों, नीतिनिर्धारकों, खेवनाहारों, नौकरशाह, ब्यूरोक्रेट, को आजादी है कि वह देश की जनता को मनमाने ढंग से लूटे, कोई भी काम बिना लेनदेन के न करें, और काम की कीमत अनुसार वसूली करें, हमें आजादी है कि हम आम जनता को जरूरत से ज्यादा तंग करें ताकि वह टेबिल के नीचे से दलाल मध्यस्थ के माध्यम से अधिक पैसा देकर काम करवायें।


        हमें आजादी है कि जितना वेतन, सुविधा, मानदेय, प्राप्त होता है, उसके अनुसार काम न करें। अपने कार्यालयीन समय में मोबाईल पर बात कर अपना और लोगों का समय बर्बाद करें। सरकारी काम की जगह व्यक्तिगत कार्य में समय बर्बाद करें। हमें आजादी के नाम पर हर वो गलत काम करवाने की आजादी है जो हमारे लिये लाभप्रद है।


        हमें बिजली की चोरी की आजादी है, सरकारी जल, जंगल, जमीन हड़पने और अतिक्रमण करने की आजादी है। हमें रेत उत्खनन, खनिज चुराने की आजादी है।
        हमें आजादी है कि हम यातायात नियमों का उल्लंघन कर सड़क पर बिना लायसेंस, परमिट, रजिस्टेशन  के वाहन चलाये तथा पकड़े जाने पर दमदार लोगों से फोन करवाकर दम पड़वाने की आजादी है। हमें आजादी है कि हम व्ही0आई0पी0 बनकर, व्यवस्था से हटकर, सभी नियम कानून तोड़कर अपना काम करवायें।


        हमें आजादी है कि हम सरकारी संपत्ति अपने पिता की संपत्ति समझ कर उसे नष्ट करें, बर्बाद करें। हमें आजादी है कि हम राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित किले, मंदिर, ऐतिहासिक इमारतों को नष्ट करें, उन पर अपना प्यार कर इजहार कर उसे सार्वजनिक करें।


        हमें आजादी है कि हम नकली दवा बेचें, पेट्रोल में मिट्टी का तेल मिलाकर बेचें, टैक्स चोरी करें तथा काम करवाने के बाद मजदूरी न दें, हमें पर्यावरण प्रदूषित करने की आजादी, मैच फिक्सिंग कर देश का तिरंगा लजाने की आजादी है।


        देश के दुखहन्ताओं की  आजादी है कि वह खेल, कफन, कोयला, तेल, तोप के नाम पर घपला और घोटाला करें। देश की जनता की लाखों करोड़ों की कमाई खा जावे और जनता को पूर्व की तरह भुखमरी के आधीन पराधीन रहने दें, उन्हें देश को दीमक की तरह खोखला करने की आजादी है।


        हमारे देश के निर्माताओं को आजादी है कि वह देश की नीति निर्धारण संस्थाओं में लड़कर उसे अखाड़ा बनाये और देश की जनता की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीतियों, सुविधाओं के साथ दंग करें तथा जनता को पूर्व की तरह मूल अधिकारों से वंचित करें और एहसास कराये कि आजादी छीनने वाले चले गये लेकिन अपनी दमनकारी नीतियां छोड़ गये।


        हमारे विघ्नकर्ताओं को आजादी है कि सत्ता के मोह और लालच में, कुर्सी के लोभ और होड़ में पद की चाहत और प्यार में लालबत्ती की चाह और राह में आज जनता को जाति के नाम पर लड़वायें, धर्म के नाम पर दंगा फसाद करवायें, आतंक फैलाये, वोट के लिये नोट बांटे, धनबल, जनबल, गनबल, बाहुबल के आधार पर अभिमत प्राप्त करें।


        हमें आजादी नहीं है कि हम पूर्व की तरह सरकार की गलत नीतियों का विरोध करें। यदि आज हम पूर्व की तरह सरकार की कुनीतियों का विरोध करते हैं तो हमें पहले की तरह लाठी पड़ती है। डन्डा खाने पड़ते हैं। झूठे मुकदमा झेलने पड़ते हैं। अदालत के चक्कर काटने पड़ते हैं। जेल की हवा खानी पड़ती है।


        देश को आजाद हुए 66 साल हो गये हैं लेकिन हमें अशिक्षा की पराधीनता तंग नहीं करती। भुखमरी नहीं सताती है। असमानता नहीं रूलाती है। दण्ड व्यवस्था का खौफ नहीं तंगाता है इसे जो लोग आजादी मानते हैं, उन्हें मूल अधिकारों की चाहत नहीं है। देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, हृास की चिंता नहीं है।


        अंग्रेजी दासता समाप्ती के बाद हमने मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखे थे कि हम अपने तौर-तरीके से देश चलायेंगे, लोगों को सम्मान प्राप्त होगा, मूल अधिकार प्राप्त होंगे, बुराईयों से स्वतंत्रता मिलेगी लेकिन आज हम ऐसी आजादी से सैकड़ों साल दूर हैं।


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  लुढ़कना

        हमारा राष्ट्रीय चरित्र ही लुढ़कना है। इसलिये यदि देश का रूपया तेजी से विदेशी मुद्रा के मुकाबले लुढ़क रहा है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं। रूपया रोज देश में भ्रष्टाचार के बढ़ते आंकड़े की तरह नये रिकार्ड बना रहा है। लोग कह रहे हैं कि रूपया लुढ़कने की यही गति जारी रही तो सौ रूपया एक डालर पौंड के बराबर हो जायेगा इसमें भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है।


        हमारे देश में सब कुछ लुढ़क-फुढ़क रहा है। पूरा देश लुढ़कने की कगार पर है। हम आंतकवाद, नक्सलवाद की ओर लुढ़क रहे हैं। हममें क्षेत्रीयता, धार्मिकता, सांप्रदायिकता, जातियता की भावना लुढ़क गई है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र भ्रष्टाचार में तर हो गया है। भ्रष्टाचार लुढ़क कर देशवासियों के खून में समा गया है।


        हमारे देश के राजनीतिज्ञों नीति निर्धारकों का चरित्र लुढ़काव की चरमसीमा पर है उनके चरित्र पतन के लुढ़कने का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है उनका चाल, चरित्र, चेहरा,  सब कुछ लुढ़कना दर्शाता है।


        हमारे देश की सीमा में असुरक्षा लुढ़क गई है। सीमा के अंदर घुसकर आंतकवादी आकर गर्दन काटकर ले जाते हैं। हम अपनी सुरक्षा में कुछ कदम नहीं उठा पाते हैं देश की सीमा के अंदर घुसकर दुश्मनी ताकतें घुसपैठ करती हैं। हम शांति, एकता, अखण्डता, भाईचारा, विश्वशांति के नाम पर चुप रहते हैं। विदेशी, दुश्मनी ताकतें, देश के अंदर लुढ़ककर देशद्रोहियों के साथ मिलकर देश की एकता अखण्डता को खोखला कर रही है।


        हमारे देश में शिक्षा का स्तर लुढ़का है। शालीनता लुढ़की है, शुचिता लुढ़की है, अश्लीलता ने पैर पसारे हैं। सिनेमा, टी0व्ही0 सीरियल, इंटरनेट अश्लीलता, फूहड़ता परोस रही हैं। 


        हम अनैतिकता, असमाजिकता और असहिष्णुता की ओर लुढ़क रहे हैं। परिवार में बुजुर्ग बोझ और निर्जीव वस्तु बनते जा रहे हैं, उन्हें अब कोई अनुभव की किताब, दुआओं का बैंक, आशीर्वाद की खान मानने को तैयार नहीं हैं यही कारण है कि हम सामाजिक विघटन की ओर लुढ़ककर आश्रयगृह, वृद्धा आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं।


        हमारे देश में इन्सानियत लुढ़की है। इन्सान लुढ़का है। ईमान लुढ़का है। ईमानदारी लुढ़की है। सब तरफ लुढ़कन का दौरा जारी है जो हमें आर्थिक परतंत्रता, राजनैतिक, पराधीनता, सामाजिक असमानता, नरक की हैवानियत की ओर ले जा रहा है। हम परतंत्र भारत की तरह गुलाम बनकर जातिवाद, अंध विश्वास की ओर पूर्व की तरह लुढ़कते, सरकते, फिसलते नजर आ रहे हैं। दहेज बालविवाह, घरेलू हिंसा, बलात्कार, गैंगरेप सभी समाज का आवश्यक अंग हो गये हैं।  
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  // बी0पी0एल0//

        हमारे देश में बी.पी.एल. शब्द बहुत लोकप्रिय है। इसमें देश के बडे-बडे नेता, धनी, कुबेर, जमींदार शामिल हैं, जो इसकी जमात में शामिल होकर इसका कार्ड बनवाकर गरीबों की सुख-सुविधाऐं, आनन्द प्राप्त करते हैं और उनका राशन अपने नाम से खाते हैं। उनके मिट्टी के तेल से अपने घर के चिराग जलाते हैं।


        बी.पी.एल. का अर्थ भी सबके लिये अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र में इसका अर्थ बिलो प्रापर्टी लाइफ है वो राजनीति शास्त्र में इसका तात्पर्य बिना पैंदी का लौटा है, जिसका अनुसरण शतप्रतिशत अनुयायी करते हैं।


        हमारे देश में नेताओं की लौटे की तरह लुढ़कने की इस आदत से तो सब परिचित हैं, लेकिन देश का आम आदमी भी इस लुडकन से प्रभावित हो गया है और वह भी जहां पैसा, सुविधा, फायदा, लाभ देखता है, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, नरूलवाद, जातिवाद की फिसलन पर लुढ़क जाता है।


        नेताओं को तो जन्मसिद्व अधिकार ही वोट के लिये लुढ़कना है, लेकिन उनके लुढ़कने, खिसकने, फिसलने की कोई सीमा तय नहीं रहती है वो अनैतिकता की सीमा को भी लांग कर नहीं रूकते हैं।


        लेकिन हमारे देश में आम नागरिक को अपनी लुढ़कन पर नियंत्रण रखना चाहिये, उसे देश की अस्मिता को दांव पर लगाकर करणधारों की पड़ोसी देशों से दबने की सीमा तक नहीं लुढ़कना चाहिये, लेकिन वह भी नैतिकता, ईमानदारी, देशभक्ति को ताक पर रखकर ग्लेश्यिर के मजे लुढ़क कर ले रहा है।


        आज हम देश की फिसलन, लुढ़कन, डूबत के लिये एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं। घूम फिरकर नेताओं पर बात आकर समाप्त कर देते हैं। सारा दोष, जिम्मा, जबावदारी उन पर डालकर अपना पडला झाड़ लेते हैं।


        ये नेता कौन हैं ये हमारी ही उपज हैं, हमारे ही नीतियों से उत्पन्न हुये हैं, हमारे ही चन्दे से ही इनकी पार्टी चलती है, हम ही चुनकर नेता बनाते हैं। हम ही इनके जनक हैं। हम जो करते हैं, हम जो चाहते हैं उसी के आधार पर यह नीति निर्धारित करते हैं फिर भी हम इनसे ही सबसे ज्यादा हैरान परेशान हैं और यह ही सबसे ज्यादा दागदार हैं।


        हम अपना चुनाव सही क्यों नहीं करते हैं। जब हमें चुनने का अवसर प्राप्त होता है तब हम सूरदास की तरह बनकर कंस का चुनाव कर देते हैं  और उसके बाद उसकी रावण नीति को लेकर रोते रहते हैं।


        यह अवश्य है कि हमारे पास चुनाव की सीमा नहीं हैं जितने खडे होते हैं सब दागी बागी होते हैं। लेकिन उनके सबसे कम बागी को चुनकर सुधारा जा सकता है अथवा सबमें से किसी को चुनकर भी अपना अभिमत दिया जा सकता है।


        हमारे देश की लुढ़कन, डूबत, फिसलन के लिये सब एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं। सब एक-दूसरे का उत्तरदायी बता रहे हैं, लेकिन मौका मिलने पर कोई भी चौका मारने में पीछे नहीं है सब मौका मिलते ही फिसलने, लुढ़कने, खिसकने, उफनने, तैरने, डूबने, गोता लगाने में देर नहीं करते हैं।


        इसके बाद भी सबकी उंगलियां एक-दूसरे पर तनी हुई हैं। सबकी निगाहें एक-दूसरे को सक की निगाह से देख रहे हैं, लेकिन कोई भी अपनी तरफ ध्यान देकर देखने तैयार नहीं हैं। सब मेहनत, मजदूरी की जगह आराम की नौकरी के लिये जुगाड लगा रहे हैं। सरकारी नौकरी के लिये सिफारिश, लेन-देन के लिये तैयार रहते हैं। सब कानून व्यवस्था में छेद बनाकर अपनी जगह बनाना चाहते हैं।


        आज कोई भी ईमानदारी का हैलमेट पहनकर सदाचार का लायसैंस लेकर नैतिकता का सीमा कराकर चरित्र का रजिस्ट्रेशन करवाकर देशप्रेम का परिमिट लेकर देशभांति की फिटनिश के साथ चलना नहीं चाहता हैं।


        जिसे देखो वह बेईमानी की सड़क पर चलकर भ्रष्टाचार के वाहन में सवार होकर अनैतिकता की स्पीड से बैठकर विकास की मंजिल, समृद्वि, प्रगति की ट्रेन, सुख सुविधाओं की गाडी, धन का पहाण, ताजमहल या आशियाना चाहता हैं।


        वह जानता है कि ताजमहल अन्य से एक सुन्दरी स्त्री की कब्रगाह बस है, लेकिन वह लोगों की खूबसूरती, बुलन्दता, एश्वर्य, यश समान दिखाना चाहता है।

 
        इसलिये आवश्यक है कि हम सुधरें, अपने को सुधारे हम सुधरेगें तो समाज सुधरेगा, समाज सुधरेगा तो देश सुधरेगा। जब तक हम खुदको नहीं सुधारते तब तक हम किसी को सुधारने का भाषण, उपदेश भी नहीं दे सकते हैं।


        आज देश के तमाम धर्मगुरू, खाउ अफसर, उडाउ नेता सब हमारी देन हैं। इन भस्मासुर को हमने ही समाज में पैदा किया है, हमें ही इन्हें भस्म करना होगा। इसके लिये संपूर्ण समाज को शिव, विष्णू और मोहनी बनना पडेगा। दस रावन को जब एक राम मार सकता है तो देश के एकसौ बीस करोड राम इन चंद भस्मासुरों का अंत कर सकते हैं, अगर अगर उनके पीछे पड जायें तो यह भस्मासुर खुद अपने सिर पर अपना हाथ रखकर भस्म हो जायेंगे।

खाना खाने के कुछ देर बाद अम्मा अपने कमरे में जाकर लेट गईं।

श्यामा रसोई में व्यस्त थी। खाने के पश्चात कुछ चीजें निकालकर रखने तथा बरतन खाली करने में लगी थी। वहीं अम्मा की आवाज सुनाई दी-श्यामा जी,अम्मा आई। श्यामा उनके कमरे की ओर चल दी। बेटी, इस बार मेरी जाने की इच्छा नहीं है। अपने आप को अस्वस्थ महसूस करती अम्माजी की ओर देखते हुए श्यामा ने कहा -कोई बात नहीं अम्मा , अगर आप जान नहीं चाहती तो मत जाइये । हम जीजाजी को फोन कर देंगे कि आप नहीं आना चाहती।

शिवांग आपसे कुछ नहीं कहेंगे। अम्माजी को चिन्ता थी कि कहीं शिवांग ऐसा न कह दे कि अब कुछ नहीं होगा और मना करना भी उचित नहीं है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ ही देर में अम्माजी आश्वस्त हो गईं और कब उनकी आँख खुद उन्हें भी पता नहीं चला। पन्दह मिनिट के बाद जब उनकी आँख खुली तो इतनी तरोताजा लग रही थीं जैसे कुछ हुआ ही न हो । कहने लगी -श्यामा , मैं सोच रही थी इस बार हो आती हूँ। दामादजी ने रिजवेशन कराया है तो उन्हें मना भी कैसे करुँ?एक तो वे मुझे लेने आए हैं और मैं ही मना कर दूँ। ठीक नहीं लगता।

अम्मा ने जाने की तैयारी तो पहले ही कर ली थी। बेटी के घर जो जाना था। अपनी बैग में उन्होंने सब कुछ रख लिया था। पूरे महीने की दवाइयाँ,घर में पहनने की दो साड़ियों के साथ एक साड़ी और खरीद ली थी। सफेद साड़ी पर मरून फूल जैसे रिवल उठे थे। रख लेती हूँ बहू, कब जरूरत पड़ जाए कह नहीं सकते। लेकिन इस बार तुम मुझे लेने जरूर आओ गी। तुम लेने आओगी तो ही मैं जाऊँगी? आओगी न?ज रूर अम्मा, कॉलेज परीक्षाएँ खत्म होते ही मैं आपको लेने आ जाऊँगी। तब तक आप वहँा आराम से रहना। मैं जरूर आऊँगी। बहू की बातों से आश्वस्त हो अम्माजी खुशी -खुशी अपनी बेटी के घर चली गई। जैसे बेटी के घर नहीं बहू के घर जा रही हों।

वहाँ पहँचने के कुछ दिनों पश्चात ही अम्मा के अस्वस्थ होने की खबर आई। फिर शुरु हुई डॉकटरी जाँच ,टेस्ट और हॉस्पीटल के चककर। रोगी के शरीर की थो़डी -सी भी विषम प्रक्रिया डॉकटरों को जैसे जागृत बना देती है और उसके अपनों को परेशान। अम्माजी की वृददावस्था तथा कुछ तकलीफों ने उन्हें जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिनने के लिये मजबूर कर दिया था । बेटों से दूर चले जाने के बावजूद उनके भाग्य ने अंतिम घड़ी में भी बेटों-बहुओं और नाती-पोतों से मिला दिया था।

अम्मा के जीवन की तरह ही उनकी मृत्यु भी शांत और संतुष्ट थी। एक तरह से वे बिल्कुल संतुष्ट जीव थीं । न ही खुद के मन में किसी प्रकार की हाय- हाय थी और न ही इस वजह से उन्होंने कभी किसी को दुखी और परेशान किया था।

अम्मा के पार्थिव शरीर को स्नान कराते समय श्यामा के आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । यादों का तूफान भी शांत नहीं हो रहा था ।

अम्मा के कहे एक-एक शब्द जैसे उसके स्मृतिपट से सरकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । उनके अंतिम समय में उन्हें वही साड़ी पहनाई जो उन्होंने अतिरिक्त खरीदी थी । अपने अंतिम सफर का जैसे सारा इंतजाम उन्होंने कर लिया था जिससे किसी को किसी भी प्रकार की दौड़ -धूप न करनी पड़े। इस तरह वे अपने आगामी सफर के लिये निकल गई थीं । जाते वक्त कह गई थीं -इस बार हो आती हूँ

डॉ. लता सुमन्त

वरिष्ठ व्याख्याता ,पादरा कॉलेज

म. स. विश्वविद्यालय बड़ौदा।

5. शौच

शौच का अर्थ है- शुचिता, शुद्धता, स्वच्छता, पवित्रता एवं निर्मलता। शौच का अर्थ शरीर के धरातल पर ‘स्वच्छता’, मन के धरातल पर ‘पवित्रता’ तथा आध्यात्मिक धरातल पर ‘आत्मशुद्धि’ है। कर्मबन्धनों से रहित परम चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार ही आन्तरिक शौच है। आत्मा का मूल स्वभाव शौच है। आत्मा का सहज स्वभाव शुद्ध चैतन्य मात्र है। चैतन्य स्वभाव का अनुसरण करने वाले आत्मा के परिणाम को उपयोग कहते है। ‘अज्ञानी जीव राग आदि के बन्धन के कारण ज्ञान की उपासना नहीं करता। आत्मा और शरीर में एकता की कल्पना के कारण रागद्वेषों की तथा अन्याय विकल्पों की पूजा करता है।’

वेदान्त भी यह प्रतिपादन करता है कि शौच आत्मा का स्वाभाविक गुण है। अशौच के कारण ही आत्मा भव-बन्धन में पड़ती है। मल ही बन्धन का कारण है। शैव तान्त्रिकों के अनुसार समस्त मलों से मुक्त हो जाने पर ‘पशु’ ‘पशुपति’ बन जाता है। गीता में ज्ञान के साधनों का विवरण देते समय नौ गुणों में शौच को भी स्थान दिया गया है। (देखें- गीता, 13/ 7)

व्यक्ति जब बहिर्मुखी होकर खोज करता है तो ‘अपने’ को नहीं खोज पाता। वह बाहरी साधनों में सुख की खोज करता है। उसे तात्कालिक सुख का अहसास भले ही हो जाए, स्थायी आनन्द प्राप्त नहीं हो पाता। इसी कारण दार्शनिक कहते है ‘अपने को पहिचानो।’ दर्शन की इस मान्यता का समर्थन मनोविज्ञान करता है। मनोविज्ञान की पहुँच आत्मा तक नहीं है, किन्तु चेतन मन (बाह्य) की अपेक्षा वह अचेतन मन (आन्तरिक) को महत्वपूर्ण मानते हुए कहता है - अपनी गुप्त दमित प्रवृत्तियों को चेतना की सतह पर लाने का उपाय करो।

मलिनता किसी भी धरातल पर ठीक नहीं है। हम अपने शरीर को साफ करते हैं। अपने वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यदि हम अपने शरीर की सफाई न करें तो शारीरिक रोग उत्पन्न हो सकते हैं। यदि हम परिवेश को साफ न करें तो उसको देखकर हमारे मन में जुगुप्सा का भाव आ सकता है। अपने परिवेश की स्वच्छता के प्रति लापरवाही के कारण पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या कितनी चिन्ताजनक है- इससे हम सभी विदित हैं।

शरीर की सफाई की अपेक्षा मन की सफाई अधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। स्नान करके व्यक्ति अपने शरीर को तो साफ कर सकता है, किन्तु इससे उसका मन पवित्र नहीं होता। मन की मलिनता से व्यक्ति को शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के रोग होते हैं। शारीरिक दृष्टि से घातक बीमारियाँ हो जाती हैं। मानसिक दृष्टि से वह आत्मग्लानि, चिन्ता, भय, क्रोध, ईर्ष्या तथा निराशा का अनुभव करता है। वह जटिल व्याधियों का शिकार हो जाता है। मनोविज्ञान अचेतन मन में जमा दुर्गुणों को चेतना के धरातल पर लाकर उन्हें शान्त करके का उपाय बताता है। आत्मनिरीक्षण, आत्मस्वीकृति तथा आत्मनियन्त्रण द्वारा उन्हें मित्र बनाकर उनके रेचन की विधि बताता है।

आत्मा के साक्षात्कार के लिए शौच गुण का पालन अनिवार्य है। किसी वस्तु का दर्शन हम तभी कर सकते हैं जब वह अपने स्वरूप में प्रकट हो। आत्मा शुद्ध स्वरूप है, इस कारण शौच गुण का पालन आत्मदर्शन के लिए अनिवार्य है। हमारी आत्मा मलों एवं कषायों के आवरण द्वारा ढकी हुई है। हम इस आवरण को हटाकर आत्मशुद्धि कर सकते हैं। रूई से बने हुए कपड़े का प्रकृतरंग सफेद है। गन्दगी एवं धूल के कण उसे गन्दा एवं मैला कर देते हैं। जिस कपड़े का मूल रंग धवल है, वह ‘पर’ संयोग के कारण मैला लगता है। हम कहते हैं कि कपड़ा गन्दा है, मैला है। गन्दगी और मैलापन कपड़े का स्वाभाविक गुण नहीं है। जब हम कपड़े को साफ कर देते है, तो कपड़ा गन्दा नहीं रह जाता। जब उसका मैल हटा देते हैं तो वह अपने स्वाभाविक रंग में दिखाई देने लगता है। जब व्यक्ति कषायों एवं कर्म-मलों की गन्दगी को हटा देता है तो आत्मा का शुद्ध स्वभाव शौच प्रगट हो जाता है। कपड़े के साथ जब तक गंन्दगी एवं मैलेपन का संयोग रहता है, तब तक उसकी धवलता नजर नहीं आती। आत्मा के साथ जब तक राग-द्वेष जन्य कर्म बन्धन की अशुद्धता रहती है, तब तक आत्मा के शुचि-स्वभाव का दर्शन नहीं हो पाता। जीवात्मा का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है। इस कारण आध्यात्मिक दृष्टि बाह्य शौच की अपेक्षा आन्तरिक शुचिता को महत्व देती है। पाप या कषाय शरीर को नहीं आत्मा को लगते हैं। महाभारत में जब युधिष्ठिर को यह तत्व-बोध हो जाता है तो वे स्वीकार करते हैं कि बाहरी स्नान से शुद्धि की कल्पना भ्रामक है। भगवान कृष्ण उपदेश देते हैं कि अंतःकरण की शुद्धि आवश्यक है। आत्मा रूपी नदी में संयम का जल भरा है, तप की तरंगें उठती हैं, सत्य उसका प्रवाह है और ब्रह्मचर्य उसका तट है। व्यक्ति को इसी में स्नान करना चाहिए।

भगवान महावीर ने भी घोषणा की है कि प्रातः स्नान आदि कर लेने से मोक्ष नहीं होता।

धर्म के ही पवित्र अनुष्ठान से आत्मा का शुद्धिकरण होता है। ‘धम्मो सुद्धस्स चिट्ठई’ (शुद्धात्मा में ही धर्म स्थित रह सकता है)। (उत्तराध्ययन, 3/ 12)

शुद्ध आत्मा में ही धर्म स्थित रहता है, अशुद्ध आत्मा में नहीं। बिना शुचिता के सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन एवं सम्यग् चारित्र सम्भव नहीं है। आत्मा चेतना का साक्षात्कार करना है तो आत्मशुद्धि आवश्यक है। कषायों को हटाना अनिवार्य है। कर्म-रूप ग्रन्थियों को ढीला कर देने से ही काम नहीं चलता, उन्हें दूर करना होता है, निर्ग्रन्थ बनना होता है।

आत्म-विशुद्वि का रास्ता किसी व्यक्ति या देवता के प्रति नमन नहीं है। यह व्यक्ति के आत्म स्वभाव को जानने की प्रक्रिया है। व्यक्ति के जिन होने की अर्थात् इन्द्रियों को जीतने की स्थिति है। विकारों की राख के नीचे दबी हुई शुद्ध एवं परम चैतन्य रूपी आग की खोज है। ऐसी आग जब राखों की परतों को अलग करके अपने शुद्ध चैतन्य स्वभाव से प्रदीप्त हो जाती है तो संसार के प्राणी मात्र को प्रकाश देती है।

शौच का महत्व प्रायः सभी धर्म एवं दर्शन-सम्प्रदाय स्वीकार करते हैं। शुद्धि किसकी? इसके सम्बन्ध में अलग-अलग दर्शन सम्प्रदायों की शब्दावली में अन्तर है। योगी शरीर, प्राण, मन, शुक्र, वाणी एवं स्वरों की शुद्धि करते हैं। भक्त अपने भाव को शुद्ध करता है। ज्ञानी मन की शुद्धता तथा हठयोगी काया की शुद्धि का उपदेश देते हैं। यदि तत्व की दृष्टि से देखें तो इन सबका लक्ष्य ‘आत्मशुद्धि’ ही है। शौच का भावार्थ भी अलग-अलग दर्शन सम्प्रदायों में अलग-अलग वाचकों द्वारा अभिव्यक्त है। ये वाचक हैं – (1)बन्धन का अभाव (2) मलों की अप्सारणा (3) भोगों से विरति एवं संन्यास (4)कषायों का नाश, चित का शुद्धिकरण, आत्मविशुद्धि आदि।

शौच के पालन के लिए आर्जव अनिवार्य है। जब तक कषायों के बन्धन ढीले नहीं होते, तब तक उन्हें हटाया नहीं जा सकता। आर्जव के द्वारा व्यक्ति बन्धनों को शिथिल करता है। क्षमा एवं मार्दव के द्वारा अपने द्वेष भाव को दूर करता है। इसके बाद वह शौच के द्वारा लोभ पर विजय प्राप्त करता है। क्षमा, मार्दव, आर्जव एवं शौच के गुणों के पालन से राग-द्वेष के भाव समाप्त हो जाते हैं, कर्म बन्धन के कारण दूर हो जाते हैं। शुद्धि के मार्ग में लोभ अवरोधक तत्व है। लोभ मन की चंचलता है। लोभ के कारण हमारा असन्तोष बढ़ता है, इच्छाओं में वृद्वि होती है। लोभ से राग उत्पन्न होता है। राग से पर वस्तुओं में, पर पदार्थो में आसक्ति उत्पन्न हेाती है। ऐसी स्थिति में हम अपने ही स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं। लोभी जीव की तृष्णा कभी शान्त नहीं होती। जब तक लोभ है, तब तक त्रिलोक की राज्य प्राप्ति के पश्चात् भी सन्तोष नहीं हो सकता। इसी कारण यह कहा जाता है कि लोभ सभी सद् गुणों का नाश कर देता है- ‘लोभो सव्व विणासणो’। (दशवैकालिक, 8/ 38)

हिन्दू पुराणों में बहुत सी कथाओं में यही विषय है कि पृथ्वी लोक के किसी साधक की सत्व विशुद्धि देखकर जब देवगण स्वयं स्वर्गों से अपदस्थ होने के भय से व्याकुल हो जाते है तो वे उसकी साधना में अवरोध उत्पन्न करने के लिए उसे अनेक प्रकार के प्रलोभन देते हैं। लोभ से ही भोग का रास्ता प्रशस्त होता है। भोग की प्रवृत्ति को रोकने के लिए लोभवृत्ति को हटाना आवश्यक है। जब तक लोभ एवं भोग भाव रहता है तब तक मल एवं कषाय विद्यमान रहते हैं। इस कारण शौच के लिए लोभ वृत्ति एवं भोग-भावना को जीतना आवश्यक है।

जब व्यक्ति में समताभाव उत्पन्न होता है तो वह संसार के सभी प्राणियों को अपने समान समझने लगता है। फिर वह न तो किसी के प्रति क्रोध करता है और न अपने प्रति अहंकार रखता है। प्राणी मात्र के प्रति आत्मतुल्यता का भाव उत्पन्न होने पर मान एवं क्रोध के भाव समाप्त हो जाते हैं। सन्तोषवृत्ति के कारण लोभ की भावना समाप्त हो जाती है। सन्तोष से मन स्थिर रहता है। मन का असन्तोष दूर होता है। इस प्रकार समताभाव एवं सन्तोष के परिपालन एवं विकास से व्यक्ति के मन के क्रोध, बैर, घृणा, प्रतिशोध, द्वेष, मान, अहंकार, मद, राग, काम , लोभ, मोह एवं तृष्णा आदि विकार समाप्त हो जाते हैं। ये सभी मनोविकार अंतश्चेतना को मलिन करते हैं। चेतना की शुद्धता के लिए इनका निवारण आवश्यक है। इस प्रकार समता एवं सन्तोष के विकास से शौच गुण की प्राप्ति होती है। क्षमा, सन्तोष, मृदुता, सरलता, सत्य, दया, समता इत्यादि मनःशुद्धि के सहायक तत्व हैं।

शौच में शुद्धि के साथ-साथ पवित्रता का भाव समाहित है। व्यक्ति के सामाजिक जीवन में भी शौच का अत्यधिक महत्व है। व्यक्ति लोभ के कारण झूठ बोलता है। भौतिक साधनों का अधिकाधिक संग्रह करता है। तृष्णा के कारण परिग्रह की वृत्ति का विकास होता है। वह भौतिक वस्तुओं का संग्रह करके ही सन्तुष्ट नहीं रहता, पूँजी उत्पादन के साधनों पर भी अपना एकाधिकार करना चाहता है। इसके कारण समाज में आर्थिक विषमताएँ बढ़ती हैं तथा सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

लोभी व्यक्ति सामाजिक आक्रोश का पात्र बन जाता है। लोभ वृत्ति के कारण उसकी उदारता समाप्त हो जाती है। वह अनुदार एवं असहिष्णु हो जाता है। उसके मन में पाशविकता एवं क्रूर वृत्तियों का विकास होता है। समाज के जो सदस्य उसके अधीन कार्य करते हैं, उनका वह शोषण करता है। परपीड़न में उसे तृप्ति मिलती है। इस कारण समाज के सदस्यों एवं उसके अधीनस्थ लोगों के मन में उसके प्रति विरक्ति, उपेक्षा, अमैत्री, घृणा एवं आक्रोश के भाव उत्पन्न होते हैं।

इसके विपरीत सन्तोष एवं धैर्य हमारे सामाजिक जीवन के विकास के लिए सहायक है। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि सन्तोष का अर्थ अकर्मण्यता नहीं है। संतोषी व्यक्ति कर्मवादी होता है, भाग्यवादी नहीं। कर्म से प्रसूत फल के प्रति उसके मन में सन्तोष रहता है। इसी सन्तोष के कारण व्यक्ति कभी निराश नहीं होता, कभी टूटता नहीं, और किसी से पराजित नहीं होता। श्रम करने पर भी यदि उसे अनुरूप फल प्राप्त नहीं होता, तो वह हताश नहीं हो जाता, अपना विवेक नहीं खो देता। इसके विपरीत विवेक के साथ शान्त मन से पहले से अधिक संकल्प के साथ परिश्रम करता है। ऐसा व्यक्ति कुंठाओं का शिकार नहीं बनता। इसी विचारधारा का दार्शनिक प्रतिपादन गीता में निष्काम कर्मयोग के रूप में हुआ है। इस प्रतिपादन की सार्थकता एवं प्रयोजनशीलता हमारे जीवन में व्यावहारिक दृष्टि से भी है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से शौच अचेतन मन में पड़ी हुई दमित कुंठाओं एवं वासनाओं के मल को दूर कर, चेतन एवं अचेतन मन के एकात्मीकरण, दुष्प्रवृत्तियों के मार्गान्तीकरण एवं दुर्गुणों का रेचन कर हमारे सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक व्यक्तित्व का शुद्धिकरण करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से शौच राग-द्वेषों से विरत आत्मा के प्रकाश की शुभ्रता से परिचित कराता है। सामाजिक दृष्टि से शौच व्यक्ति को भौतिकवादी व्यवस्था की चकाचौंध से हटाकर आन्तरिक नैतिक मूल्यों के आचरण के लिए प्रेरित करता है।

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सम-संतोस-जलेणं, जो धोवदि तिव्व-लोह-मल पुंजं।

भोयण-गिद्धि-विहीणो, तस्स सउच्चं हवे विमलं।।

(जो मुनि समताभाव और सन्तोषरूपी जल से तृष्णा और लोभ रूपी मल के पुंज को धोता है तथा भोजन में लालची नहीं होता, उसके निर्मल शौच-धर्म होता है)।

सुवण्ण-रूप्पस्स उ पव्वया भवे,

सिया हु केलाससमा असंख्या।

नरस्स लुद्धस्स न तेहि किंचि,

इच्छा हु आगाससमा अणन्तिया।।

स्वर्ण और चाँदी के कैलाश के समान असंख्य पर्वत के होने पर भी लोभी मनुष्य के लिए वे किंचित ही हैं। इच्छा आकाश के समान अनन्त है।

लोभो सव्वविणासणो।

लोभ सभी सद् गुणों का नाश कर देता है।

करेइ लोहं, वेरं वड्ढइ अप्पणो।

जो लोभ करता है, वह अपने चारों ओर वैर की अभिवृद्धि करता है।

4. सत्य

आर्जव से सत्याचरण के लिए प्रेरणा मिलती है। आर्जव की नींव पर सत्य का भवन बनाया जा सकता है। निष्कपटता एवं ऋजुता से मिथ्यात्व का अन्त होता है तथा सत्याचरण की प्रवृत्ति विकसित होती है। जब व्यक्ति सत्याचरण करने लगता है तब कपट कुटिलता के द्वार बन्द हो जाते हैं।

सत्य एवं ‘शौच’ का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। बिना चित्त की शुद्धि के व्यक्ति लोभ-वृत्ति को दूर नहीं कर पाता। जब तक लोभ की भावना रहती है तब तक झूठ बोलने की भी सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। हम जिन कारणों से झूठ बोलते हैं उनमें लोभ बहुत बड़ा कारण है। ‘शौच’ से हम लोभ पर विजय प्राप्त करते हैं। इस कारण शौच गुण का सत्य से गहरा सम्बन्ध है।

सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है।

सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि आत्मार्थी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित तथा किसी को भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख घड़ी दो घड़ी का होता है। वह काँटा निकालने पर सरलता से दूर हो जाता है। दुर्वचनों का काँटा एक बार चुभ जाने पर सरलता से नहीं निकलता। इस कारण सत्य प्रिय एवं हितकारी होना चाहिए। केवल तथ्य-परकता ही सत्यता नहीं है। इसके साथ व्यक्ति की मानसिकता का जुड़ाव है। इसी कारण क्रोध, मान, माया, लोभ, द्वेष, दम्भ, कल्पित व्याख्या तथा हिंसा का आश्रय लेकर जो भाषा बोली जाती है, वह असत्य भाषा कहलाती है। सत्य अहिंसा का रक्षक है। इसलिए सत्य में दूसरे प्राणी की हित-आंकाक्षा का तत्व जुड़ा रहता है। सत्य आत्मा का धर्म है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। इस कारण ‘अहिंसा निरपेक्ष यथातथ्य प्रकाशन’ सत्य नहीं माना जा सकता।

सत्य का विरोधी भाव झूठ बोलना तथा मिथ्या व्यवहार करना है। झूठ बोलना तथा किसी सद् वस्तु के स्वरूप, स्थान, काल आदि के सम्बन्ध में मिथ्या बोलकर, उसे असत् बतलाना - ये दोनों ही प्रकार असत्य वचन के द्योतक हैं। किसी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को छिपाकर झूठ बोलना ही सामान्यतः सत्य का विरोधी माना जाता है। मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अप्रिय, अहितकारी एवं पर-पीड़क वचन बोलना भी असत्य है।

सत्य का महत्व सभी धर्मों ने स्वीकार किया है। वैदिक ऋषियों ने सत्य के स्वरूप की सूक्ष्म व्याख्या की है। ‘सब कुछ आत्माश्रित है। आत्मा सत्य है, अतः सब कुछ सत्यात्मक है। यही सत्य मैं (जीव) हूँ। (देखें - छान्दोग्य उपनिषद् , 6/ 87)

सत्य को ब्रह्म कहा गया है और आत्मा का रूप बतलाया गया है। श्रीमद् भागवत में परमात्मा को सत्यव्रत, परमसत्य, त्रिसत्य, सत्यनिहित, सत्य का सत्य एवं सत्यात्मक कहकर उसकी वंदना की गयी है। अद्वैतवादी शंकराचार्य सत्य की तीन श्रेणियाँ मानते हैं : (1)व्यावहारिक सत्य (2) प्रातिभासिक सत्य (3) पारमार्थिक सत्य। उन्होंने पारमार्थिक सत्य को ही वास्तविक सत्य माना है। बौद्धाचार्यों ने सत्य के दो रूप माने हैं - (1) सांवृत्तिक सत्य(2)पारमार्थिक सत्य।

प्रश्न उठता है कि सत्य क्या है? सत्य की प्रकृति क्या है? एक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि जिस किसी भी वस्तु की सत्ता है, वह सत्य है। हमें पानी दिखाई पड़ता है, इसलिए पानी सत्य है। इसी के साथ प्रश्न उपस्थित होता है कि जो दिखाई न पड़े या जिसका अनुभव न हो, क्या वह सत्य नही है? किसी अंधेरे कमरे में पड़ी हुई सुई को यदि हम देख नहीं पाते, उसकी सत्ता का अनुभव नहीं कर पाते, तो क्या उसकी सत्ता नहीं है?

हम किसी भौतिक वस्तु की सत्ता का ज्ञान सर्वथा आसानी से नहीं कर पाते। कभी उसके लिए हमें उस वस्तु को स्वयं जाकर देखना होता है। कभी देखने के लिए प्रकाश की व्यवस्था करनी होती है। कभी प्रकाश में भी अनेक बार खोजना पड़ता है, ध्यान लगाना पड़ता है, मन एकाग्र करना पड़ता है। प्रश्न उपस्थित होता है कि अतीन्द्रिय एवं निरपेक्ष सत्य की सूक्ष्म एवं अमूर्त सत्ता का ज्ञान हम किस प्रकार कर सकते हैं ?

जिस सत्य की हम खोज कर रहे हैं उसके आधारों तथा खोज के कारणों के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न दृष्टियाँ हैं। नैयायिक निम्न ‘प्रमाण’ मानते हैंः (1) प्रत्यक्ष प्रमाण (2) अनुमान प्रमाण (3) उपमान प्रमाण (4)शब्द प्रमाण।

इनके अतिरिक्त वेदान्ती और मीमांसक- अनुपलब्धि और अर्थापत्ति- ये दो अतिरिक्त प्रमाण मानते हैं। सांख्य केवल प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द को ही मानते हैं। यथार्थ ज्ञान के सम्बन्ध में बहुत मतभेद हैं। कुछ विचारक यह मानते हैं कि जिन वस्तुओं का प्रत्यक्षण हो रहा है वे सभी सत्य हैं। दूसरे विचारक मानते हैं कि कुछ समय के लिए हमें भ्रान्ति भी हो सकती है, जैसे हम रस्सी को साँप समझ सकते हैं। इस कारण प्रातिभासिक सत्य यथार्थ सत्य नहीं है। कभी-कभी सारे साधनों के बावजूद भी हम सत्य की तह तक पहुँचने में एकदम समर्थ नहीं हो पाते। प्रत्यक्ष में इन्द्रिय दोष भी हो सकता है। हमारा मस्तिष्क किसी अन्य स्थान पर केन्द्रित हो सकता है। इसके कारण हमारी आँखे खुली रहने पर भी हम कुछ देख नहीं पाते। अपनी सीमित दृष्टि से देखने पर हमें वस्तु के एकांगी गुण तथा धर्म का ज्ञान होता है। विभिन्न स्थानों से देखने पर एक ही वस्तु हमें भिन्न प्रकार की लग सकती है तथा एक ही स्थान पर एक ही वस्तु विभिन्न द्रष्टाओं को विभिन्न प्रकार की प्रतीत हो सकती है। इन्हीं कारणों से जैन तत्व-चिन्तन वस्तु के अनेकान्त स्वरूप की मीमांसा करता है। स्याद्वाद कथन शैली है। सप्तकारक-वचन-विन्यास से वस्तु के अनन्त धर्मों की अभिव्यक्ति की दिशा में तत्व चिन्तक को सही दिशा एवं सही माध्यम प्राप्त होता है।

जैन दर्शन का अनेकान्तवाद वस्तु के अनेकांत स्वरूप की सत्यता को आत्मसात करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति को अपनाता है। किसी वस्तु के अनेकांत धर्मों को पहले विभक्त करता है; उनका विश्लेषण करता है। इस पद्धति से वह पदार्थ के अनेक गुणों को एक-एक करके आत्मसात करता है। इसके बाद पदार्थ को संश्लिष्ट रूप से पहचानता है। यह समग्र सत्य को पहचानने की वैज्ञानिक पद्धति है। एक अपेक्षा से पदार्थ अविनाशी है। दूसरी अपेक्षा से वही विनाशी है। एक दृष्टि से पदार्थ में बदलाव हो रहा है; उत्पाद-व्यय हो रहा है, दूसरी दृष्टि से जिस पदार्थ में उत्पाद-व्यय हो रहा है वह पदार्थ वहीं है; ध्रुव है। एक दृष्टि से पदार्थ नित्य है। दूसरी दृष्टि से पदार्थ अनित्य है। देशकाल आदि के द्वारा जो परिणामी एवं परिवर्तित हो रहा है वे उसके रूप आदि का परिवर्तन है। वे उसकी पर्याय हैं।

भगवान महावीर ने अपने प्रथम प्रवचन में कहा कि ‘सत’ उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य युक्त है: ‘‘सद् द्रव्य लक्षणम। उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्तं सत्’’।

( तत्त्वार्थ सूत्र, 5/29-30)।

द्रव्य (पदार्थ) का लक्षण सत है। जो सत है उसकी सत्ता है, उसका अस्तित्व है। अस्तित्व गुण के कारण पदार्थ अविनाशी है। उसका कभी विनाश नहीं होता। पदार्थ को द्रव्य भी कहा गया है। इस कारण वह हमेशा बहता रहता है, सदा एक रूप नहीं रहता, एक रूप से दूसरे रूप में बदलता रहता है, अवस्थाओं में परिवर्तन होता रहता है। अवस्थाओं का परिवर्तन पदार्थ की पर्याय हैं। ‘सत’ लक्षण की जैन दर्शन में व्याख्या की गई है कि स्व की अपेक्षा से पदार्थ ‘सत’ है। इसका अर्थ है कि पदार्थ स्वरूप से है। इसका अर्थ यह भी है कि पदार्थ स्व रूप से है; पर रूप से नहीं है। एक पदार्थ अपना सब कुछ कर सकता है; दूसरे पदार्थ का कुछ नहीं कर सकता। स्व की अपेक्षा से अस्तित्व है। पर की अपेक्षा से अस्तित्व नहीं है।

जिसका सत्ता है, जिसका अस्तित्व है वह ध्रुव है। उसका कभी विनाश सम्भव नहीं है। मगर जिसकी सत्ता है, उसकी अवस्था में परिवर्तन होता रहता है। कोई जन्म लेता है। जन्म लेता है तो मरता भी है। जन्म से मृत्यु के बीच की अवस्थाओं में परिवर्तन प्रत्यक्ष है। जिसकी अवस्थाओं में परिवर्तन होता रहता है, वह तो वही रहता है। इसी प्रकार वर्तमान जन्म, विगत जन्म, आगत जन्म तो अवस्थाओं की स्थितियाँ हैं। उनमें जो जन्म लेता है वह तो स्वरूप से सदा स्थित है, ध्रुव है, नित्य है, निरंतर है।

अवस्थाओं में परिवर्तन उत्पाद-व्यय रूप है, अनित्य है, परिणामी है। नवीन अवस्था का प्रकट होना उत्पाद है। उत्पाद के समय ही पूर्व अवस्था का विनाश होना व्यय है। अनादि एवं अनन्तकाल तक जो सदा स्थिर एवं मूल स्वभाव है वह पदार्थ है। जिसका उत्पाद एवं व्यय नहीं होता, वह ध्रौव्य है। त्रिकाल की अपेक्षा से ‘सत’ ध्रुव है। पर्याय की अपेक्षा से उत्पाद-व्यय होता रहता है। नवीन पर्याय उत्पन्न होती है। पुरानी पर्याय नष्ट होती है। इस दृष्टि से पदार्थ नित्य भी है तथा अनित्य भी है। सामान्य स्वरूप की अपेक्षा से पदार्थ नित्य है। पदार्थ जो पहले समय में था वही दूसरे समय में भी होता है। इस अपेक्षा से पदार्थ अव्ययी, अविनाशी एवं नित्य है। उत्पन्न एवं विनाश के होते रहने पर भी पदार्थ में जो पदार्थत्व बना रहता है वह उसका गुण है। पदार्थ में जो उत्पाद-व्यय होता रहता है वह परिणमन उसकी पर्याय हैं। इस अपेक्षा से पदार्थ अनित्य है। इस प्रकार जैन दर्शन पदार्थ / द्रव्य का लक्षण निम्न प्रकार से प्रतिपादित करता है:

(1) पदार्थ (द्रव्य) का लक्षण ‘सत’ अर्थात् सत्ता है।

(2) पदार्थ (द्रव्य) का लक्षण उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्त है।

(3) पदार्थ (द्रव्य) का लक्षण गुण-पर्याय आश्रित है।

आचार्य कुन्दकुन्द का प्रसिद्ध कथन है:

दव्वं सल्लवक्खणियं उत्पाद व्यय ध्रुवत्तर्सजुतं।

गुणपज्ज या सयं वा जं तं भण्णंति सव्वण्हू।। (आचार्य कुन्दकुन्दः पंचास्तिकाय, गा0 10)।

द्रव्य का उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्त होना अथवा द्रव्य का गुण लक्षण पर्याय आश्रित होना ही अनेकान्तवादी विचार दृष्टि का बीज-मंत्र है। द्रव्य-लक्षण बीज है, अनेकान्तवाद बीज से विकसित वृक्ष है।

अनेकान्त: तत्वबोध की दृष्टि -

अनेकान्त शब्द अनेक एवं अंत इन दो शब्दों के संयोग से बना है। अंत का अर्थ यहाँ धर्म है। पदार्थ में विविध गुण होते हैं। पदार्थ अनन्त धर्मात्मक होता है। जड़ और चेतन में, अनात्मा एवं आत्मा में अनेक धर्म एवं गुण होते हैं। अनेकांतवाद जीव आदि पदार्थों का सामान्य गुणों एवं विशिष्ट गुणों आदि से संवलित बतलाना मात्र नहीं है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पदार्थ में विविध गुणों की सत्ता की स्वीकृति अन्य दर्शनों में भी है। पदार्थ को अनन्त धर्मात्मक मानने वाले सभी दर्शन अनेकान्तवादी नहीं है। अनेकान्तवाद एकान्तवादी आग्रह का निषेध करता है। जब आग्रह समाप्त होता है, जब मतवाद समाप्त होता है, जब संकीर्णताएं टूटती हैं तब अनेकान्त दृष्टि का उदय होता है। जब दृष्टि में अनाग्रह, उदारता, व्यापकता, सहिष्णुता, समन्वय-भावना तथा सर्वधर्म समभाव आता है तब अनेकांत दृष्टि का उन्मेष होता है। प्रत्येक पदार्थ स्व सत्ता, स्वक्षेत्र, स्वकाल एवं स्वभाव रूप से अस्तिरूप है। प्रत्येक पदार्थ पर सत्ता, परक्षेत्र, परकाल एवं परस्वभाव की अपेक्षा से नास्तिरूप या असत है। जो सत है वही असत है, जो तत है वही अतत है, जो अभेद दृष्टि से एक है वही भेद दृष्टि से अनेक है, जो द्रव्यार्थिक नय से नित्य है वही पर्यायार्थिक नय से अनित्य है। पदार्थ के पदार्थत्व में विद्यमान परस्पर विरूद्ध शक्तियों का प्रकाशित होना अनेकान्त है। अनेकांत-दृष्टि से विचार करना ही अनेकांतवाद है।

अनेकान्तवाद व्यापक विचार-दर्शन है। इससे हम विभिन्न दर्शनों एवं धर्मों को व्यापक पूर्णता में संयोजित कर सकते हैं, सर्व धर्म समभाव की स्थापना कर सकते हैं, ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न मतवादों में निहित सत्य का अनुसंधान कर सकते हैं, मानवीय व्यवहार की मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय विभिन्न विचारधाराओं में निहित तथ्यों एवं सत्यों का विश्लेषण एवं विवेचन कर सकते हैं।

जब हम एकांगी दृष्टि से विचार करते हैं तब मिथ्या मान्यता का आग्रह हमारी उन्मुक्त दृष्टि को कुंठित कर देता है। उन्मुक्त एवं वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर परस्पर विरूद्व प्रतीयमान विचारों की सत्यता स्पष्ट हो जाती है। एक ही पदार्थ में परस्पर प्रतीयमान विरोधी धर्मों का अस्तित्व सम्भव है। समाज में एक ही व्यक्ति की भिन्न प्रस्थितियाँ एवं भूमिकाएँ होती हैं। एक व्यक्ति यदि प्राध्यापक है तो ‘प्राध्यापक-प्रस्थिति’ में जिस प्रकार व्यवहार करता है उस प्रकार का व्यवहार अपने घर जाकर नहीं करता। घर में ‘पति-प्रस्थिति’ में अपनी पत्नी से एक प्रकार का व्यवहार करता है। घर में ही ‘पिता-प्रस्थिति’ में अपने बच्चों से दूसरे प्रकार का व्यवहार करता है। भाषा-व्यवहार के भी कितने भेद होते हैं। एक ही प्रस्थिति में एक ही व्यक्ति भिन्न-भाषा-शैलियों का प्रयोग करता है। भाषा की अपेक्षा से एक ही भाषा होती है; शैलियों की अपेक्षा से अनंत होती हैं। एक ही काल एवं क्षेत्र में विभिन्न द्रष्टाओं की प्रतीतियाँ भिन्न प्रकार की हो सकती हैं। किसी फिल्म को देखकर जब दर्शक सिनेमा हॉल से बाहर निकलते हैं तो एक दर्शक कहता है - फिल्म सुपरहिट है। दूसरा दर्शक कहता है – फिल्म फ्लॉप है। काल के एक ही क्षण विश्व के एक भाग में सवेरा होता है, दूसरे भाग में शाम। काल के उसी क्षण विश्व के एक भूभाग का व्यक्ति ‘सूर्योदय’ देखता है, विश्व के दूसरे भाग का व्यक्ति सूर्यास्त के दर्शन करता है।

आइंस्टीन ने दिक्-काल की सापेक्षता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। आइंस्टीन का सिद्धान्त केवल भौतिक-विज्ञान तक सीमित है। अनेकान्तवाद जीवन के प्रत्येक पक्ष के विश्लेषण विवेचन की वैज्ञानिक प्रविधि है। यह सत्य के अनुसंधान की तर्कसंगत एवं सुनियोजित प्रक्रिया है।

पदार्थ के अनेकांत को पहले विभक्त करना है; विश्लेषित करना है। इसके बाद एक-एक गुण-धर्म को देखना है, विचार करता है, पहचानना है। तदनन्तर एक ही पदार्थ में अविरोधपूर्वक विधि और निषेध के भावों में समन्वय स्थापित करना है। इस प्रकार सीमित ज्ञान शक्ति के होते हुए भी पदार्थ के एक-एक गुण-धर्म का ज्ञान करने के अनन्तर पदार्थ के समग्र धर्मों एवं गुणों को पहचानना है। सामान्य व्यक्ति के द्वारा भी सत्य के सम्पूर्ण साक्षात्कार की शोध-प्रविधि का नाम है - अनेकान्तवाद।

इसी अनेकान्तवाद दृष्टि के कारण भगवान महावीर ने विरुद्ध प्रतीत होने वाले मतों को एक सूत्र में पिरो दिया। उन्होंने जीवन आचरण के लिए अहिंसा को परम धर्म माना। वैचारिक क्षेत्र की अहिंसा दृष्टि का नाम है - अनेकान्तवाद। उन्होंने मनुष्य के विवेक को जागृत किया; दृष्टि को व्यापक बनाया। भगवान ने उन्मुक्त दृष्टि से विचार करने का मार्ग प्रशस्त कर प्रतीयमान परस्पर विरोधी मतों में समन्वय स्थापित किया। तत्वबोध की व्यापक एवं सर्वव्यापी उदार दृष्टि के कारण वे पदार्थ का अनेकान्तिक स्वरूप पहचान सके। उनके विचारों में कहीं भी संशय नहीं है। उन्होंने स्पष्ट एवं निर्भ्रांत रूप में विचार दर्शन प्रस्तुत किया है:

(1) पदार्थ नित्य भी है और अनित्य भी। अपनी गुणात्मक सत्ता (ध्रौव्य स्वभाव) की दृष्टि से पदार्थ नित्य है किन्तु पर्याय (उत्पाद-व्यय) दृष्टि से अनित्य है। आचार्य हरिभद्र सूरि ने इसे इस प्रकार समझाया है कि जिस प्रकार स्वर्ण-रूप में अवस्थित रहते हुए भी उसमें कड़ा कुंडल आदि अनेकविध रूप उत्पन्न एवं नष्ट होते रहते हैं उसी प्रकार द्रव्यों एवं पर्यायों को प्राप्त जीव द्रव्य (पदार्थ) का नित्यत्व एवं अनित्यत्व भी न्याय सिद्ध है:

जह कंचणस्स कंचण-भावेण अवट्ठियस्स कडगाई।

उप्पज्जंति विणस्संति, चेव भावा अणेगविहा।।

एवं च जीव दव्वस्स, दव्वपज्जव विसेस भइयस्स।

निच्चत्तमणिच्चत्तं, च होइ णाओवल भंतं।। (आचार्य हरिभद्र सूरिः सावय पण्णत्ति, 184-185)।

(2) प्रवाह की अपेक्षा पदार्थ अनादि (शाश्वत) है। स्थिति (एक अवस्था) की अपेक्षा पदार्थ सादि (आदि-अंत होने वाला) है।

(3) स्वभाव की अपेक्षा से जीव और पुद्गल सदा अपनी-अपनी गुणात्मक सत्ता तथा पर्याय सत्ता में रहते हैं। विभाव की अपेक्षा से जीव और पुद्गल परस्पर प्रभाव डालते हैं।

संसार में जितने दर्शनभेद हो सकते हैं, जितने भी वचनभेद हो सकते हैं उतने ही नयवाद हैं। उन सबके समागम से अनेकान्तवाद फलित होता है। आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने भिन्न दर्शनों को भिन्न नयों की दृष्टि से विवेचित कर सुसंगत रूप से अनेकान्तवाद के सर्वधर्म समभाव रूप को संयोजित करने का स्तुत्य कार्य किया। आपने संग्रह नय की अपेक्षा से अद्वैतदर्शन, ऋजुसूत्रनय की अपेक्षा से बौद्ध-दर्शन, द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से सांख्य-दर्शन तथा द्रव्यार्थिक नय एवं पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से कणाद दर्शन का समाहार कर धार्मिक सहिष्णुता के बीज का वपन किया। इस प्रकार अनन्त को अनेक अपेक्षाओं, अनेक दृष्टियों, अनेक रूपों से देखना एवं जानना अनेकान्तवाद है। अनेकान्त साधन है - ज्ञान की अनावृत्त दशा की प्राप्ति का। जब केवलज्ञान प्राप्त हो जाता है, जब साध्य की सिद्धि हो जाती है तो साधन ‘अनेकांतवाद’ की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है।

जैन दर्शन में सत्य के प्रतिपादन में भाषा की सीमा की भी विशद विवेचना हुई है। इस दृष्टि से अन्य दर्शनों में भी संकेत मिलते हैं। ऋग्वेद का नासदीय सूक्त इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। सृष्टि की उत्पत्ति के मूल कारण की विवेचना उभयविध रूप में हुई है। न तो यह कहा जा सकता है कि ‘‘है’’ और न यह कहा जा सकता है कि ‘नहीं’ है’। सृष्टि का मूल न ‘सत’ था न ‘असत’ था। एक अपेक्षा से उसे सत कहा जा सकता है, दूसरी दृष्टि से उसे असत कहा जा सकता है। (नासदासीन्नो सदासीत् तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परोयत्। - ऋग्वेद, 10/129)। जैन दर्शन में स्याद्वाद के अंतर्गत सप्त भंगों का विवेचन है। उनमें यहाँ अवक्तव्यम् के बारे में कुछ संकेत किए जा रहे हैं जिससे भाषा की सीमा स्पष्ट हो सके। वक्तव्य का अर्थ है - कहे जाने योग्य। जिसको कहा जा सके, बोला जा सके, जिसका वर्णन किया सके, वह है - वक्तव्यम्। जिसका शब्दो द्वारा विधान करना सम्भव न हो वह है - अवक्तव्य। व्यक्त न होना ही अवक्तवय है। यह हमें शब्द व्यापार की सीमा का बोध कराता है:

(अ) इन्द्रियों द्वारा ज्ञान के सभी विषय व्यक्त नहीं हो पाते। कुम्हार ने मिट्ठी से घड़ा बनाया। घड़े का रंग मटियाला है। कुम्हार ने घड़े को आग में पकाया। पकने के बाद घड़े का रंग रक्तवर्ण हो गया। जब घड़ा पकता है - रंग मटियाले से रक्तिम होता है - तब इन्द्रियों द्वारा रंग-परिवर्तन का ज्ञान होता है। मगर भाषा में इस अवस्था के रंग को व्यक्त करने वाला शब्द या वाचक नहीं होता - इस कारण उसका विधान किसी एक शब्द द्वारा नहीं किया जा सकता। इस कारण अवक्तव्य है। भाषा में इस प्रकार व्यक्त कर भी सकते हैं कि इस समय मटियाले एवं रक्तिम दोनों का मिश्रित रूप है - इस कारण ‘किंचित अवक्तव्य’ है।

(आ) मन के द्वारा मनन, विचार, भाव, अनुभूति, संवेदना आदि की भाषा में पूर्ण अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है।लेखक ने भगवान महावीर की देशना से सम्बन्धित प्रकरण के अन्तर्गत कालगत व्यवधान की विवेचना के समय इसका संकेत किया है। भाषा-वेत्ता जानते हैं कि समस्त भावों एवं विचारों की भाषा में तदनुरूप अभिव्यक्ति दुष्कर है। भाषा एवं विचार के बीच गहरा सम्बन्ध है मगर दोनों एकार्थक नहीं हैं, अभिन्न नहीं हैं। वक्ता की दृष्टि से विचार और उसकी अभिव्यक्ति में अन्तर होता है। हमारे मस्तिष्क में विचार, भाव, बिम्ब उद्भूत हो जाते हैं किन्तु कभी-कभी हम उसके वाचक शब्द का उच्चारण नहीं कर पाते। श्रोता एवं पाठक की दृष्टि से भी शब्द-बोध एवं अर्थ-बोध में अन्तर रहता है। उद्भूत विचारों एवं उनकी अभिव्यक्ति में अभिन्नता नहीं होती। (देखें - डॉ0 महावीर सरन जैनः भाषा एवं भाषाविज्ञान, पृ0 73-79)।

श्री उद्धव को मथुरा से ब्रज भेजते समय कृष्ण जैसे महायोगी के मन के भाव को रत्नाकर ने इस प्रकार व्यक्त किया है: ‘नैंकु कही बैननि, अनेक कही नैननि सौं, रही-सही सोऊ कहि दीनी हिचकीनि सौं। (जगन्नाथदास रत्नाकरः उद्धव शतक, पृ0 4)। वाणी से तो किचिंत ही कहा, अनेक नयनों से कहा, रहा-सहा हिचकियों द्वारा व्यक्त हुआ। यह भाषा की अभिव्यक्ति की सीमा की ओर संकेत है।

(इ) इन्द्रियों एवं मन के द्वारा गृहीत ज्ञान की अभिव्यक्ति में भाषा की सीमाओं का बोध होता है। इन्द्रिय एवं मन की सहायता के बिना आत्म चेतना को जब अवधिज्ञान, मनः पर्याय ज्ञान एवं केवल ज्ञान होता है तब उस ज्ञान की अभिव्यक्ति के समय भाषा की सीमा की केवल कल्पना की जा सकती है। जो ज्ञान इन्द्रिय एवं मन की सहायता के बिना प्रत्यक्ष आत्मचेतना को होता है वह आत्मिक ज्ञान है, प्रत्यक्ष ज्ञान है। तत्वतः यह ज्ञान बुद्धि एवं वाणी का विषय नहीं बन सकता। संसार में रहने वाला कर्म-बद्ध जीव सापेक्ष ज्ञान की ही अभिव्यक्ति कर सकता है। निरपेक्ष ज्ञान अथवा पारमार्थिक ज्ञान की अभिव्यक्ति एक चुनौती है। तत्वतः हमारी भाषा इतनी अपूर्ण है कि वह पारमार्थिक ज्ञान की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति में समर्थ नहीं है। तत्वेत्ताओं को इसी कारण कहना पड़ा है - ‘अविगत गति कछु कहत न आवे। भगवान महावीर सर्वज्ञ हो गए, केवली हो गए। इसके बाद भी देशना न दे सके। सर्वज्ञ को भी उसी भाषा का सहारा लेना पड़ता है जो सीमित है, जो अपूर्ण है। वस्तु अनेकान्त स्वरूप है। सभी धर्मों का प्रतिपादन एक साथ करना सम्भव नहीं है। जैन आचार्यों ने भी इसी कारण कहा कि आत्मा का किसी भी शब्द द्वारा कथन करना सम्भव नहीं है। उसके जितने भी पर्यायवाची नाम हैं, वे उसके विशिष्ट धर्मां का ही कथन करते हैं। इसी कारण निर्विकल्प आत्मा का ज्ञान कराने के लिए आचार्य कुन्दकुन्द को ‘णादा जो सो दु सो चेव’ (जो ज्ञात हुआ वह तो वहीं है) कहना पड़ा। (आचार्य कुन्दकुन्दः समयसार, 6)।

कैवल्य भाव में या मुक्त जीव की स्थिति में तो सभी नयों का अन्त हो जाता है। यह कहा जा चुका है कि अनेकान्तवादी के सिद्धान्त रूप की प्रासंगिकता भी समाप्त हो जाती है। जब तक निरपेक्ष ज्ञान की स्थिति नहीं आती, सापेक्षता की स्थिति रहती है। तब तक अभेद को भेद करके बताना होता है। जिस प्रकार अनाड़ी पुरूष को उसकी भाषा में बोले बिना नहीं समझाया जा सकता, उसी प्रकार परमार्थ का उपदेश भी व्यवहार के बिना नहीं हो सकता:

जह णवि सक्कमणज्जो अण्णज्ज भासं विणा दु गाहे दुं।

तह ववहारेण विणा परमत्थुवदेसण मसक्कं।। (वही, 8)।

बौद्ध दर्शन वस्तु को अवाच्य मानता है। आत्मा के सम्बन्ध में जब गौतमबुद्ध से प्रश्न किया गया तो उन्होंने उसे ‘अव्याकृत’ कहा। बुद्ध की दृष्टि में यह व्याख्यात नहीं है। उन्होंने केवल परिवर्तित दृष्टि से विचार किया था। इस कारण जो अपरिवर्तित है उसकी उन्होंने व्याख्या नहीं की। उसका प्रतिपादन नहीं किया। उसकी अभिव्यक्ति नहीं की। उन्होंने उसे अवाच्य माना। इस कारण उसके सम्बन्ध में जब प्रश्न किए गए तो उन्होंने उत्तर नहीं दिया। वे मौन रहे। उपनिषद् के ऋषियों ने ‘नेति नेति’ शैली को अपनाकर अनिवर्चनीय तत्व का निर्वचन किया। इस दृष्टि से तैत्तिरीय उपनिषद् में भृगु की कथा उल्लेखनीय है। भृगु ने अपने पिता वरुण से बह्मज्ञान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। पिता ने तप करने के लिए कहा। भृगु ने तप किया। इसके बाद पिता के पास आकर कहा - अन्न ही ब्रह्म है। पिता ने कहा - नहीं। फिर तप करो। भृगु ने दुबारा तप किया। इसके बाद पिता के पास आकर कहा - प्राण ही ब्रह्म है। पिता ने कहा - नहीं। फिर तप और इसके बाद - मन ही ब्रह्म है। पिता ने कहा - नहीं। फिर तप और इसके बाद - मन ही ब्रह्म है। पिता ने कहा - यह भी नहीं। फिर तप, फिर कहा - विज्ञान ही ब्रह्म है। पिता वरुण ने कहा कि यह भी नहीं है। वरुण ने कहा - मंजिल के पास हो। थोड़ा तप और करो। अन्त में भृगु ने कहा - आनन्द ही ब्रह्म है। आनन्द अर्थात सुख-दुख से अतीत, राग-द्वेष से अतीत, कषायों से विरहित। शुद्ध चैतन्य प्राप्ति की यात्रा पूर्ण हुई। तप और खोज में पहले भौतिक तत्व, जिसे अन्न कोष कहा गया। इसके बाद बुद्धि तत्व की खोज जिसके क्रमिक विकास प्राण-कोश, मन कोश एवं विज्ञान कोश हैं। इसके बाद ही उपनिषद् के ऋषियों ने आत्म तत्व का संधान किया। जैन दर्शन ने नयवाद द्वारा पदार्थों (द्रव्यों) के सभी गुणों एवं धर्मों को पहचानने एवं जानने के मार्ग का संधान किया। पदार्थ के अनेक धर्मों एवं गुणों का प्रतिपादन इस प्रकार हो कि एक-एक धर्म/गुण की अभिव्यक्ति हो मगर अभिव्यक्ति के समय अन्य धर्मों एवं गुणों के अस्तित्व का बोध भी बना रहे। अनेकान्तवाद एवं स्याद्वाद का सार है कि अनन्त को विभक्त करो, अंशी के अंशों को पृथक-पृथक करो, संश्लिष्ट का विश्लेषण करो। अंश-अंश को जानो। एक एक धर्म को जानो। विश्लेषण के बाद जितने विश्लेषित गुण धर्म हैं, उन्हे पृथक-पृथक एक-एक करके जानो। जिस प्रकार जानो, उसी के अनुरूप उसका प्रतिपादन करो। एक-एक धर्म, एक-एक गुण की अपेक्षा से प्रतिपादन करने के तरीके का नाम है - स्याद्वाद। इस दृष्टि से ‘स्याद अवक्तव्य’ का तात्पर्य है कि वह अपेक्षा से अवक्तव्य है। भाषा में उसका प्रतिपादक कोई एक शब्द नहीं है। इस अपेक्षा से अवक्तव्य है। उसके एक-एक अंश का प्रतिपादन करते हुए उसे व्यक्त किया जा सकता है। इस अपेक्षा से वक्तव्य है। पदार्थ के सम्यक् विचार के लिए जिस प्रकार दृष्टिकोणों की विवक्षा अपेक्षित हैं; अनेकान्त दृष्टि अपेक्षित है उसी प्रकार पदार्थ के सम्यक् स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए नय या विवक्षा या अपेक्षा से कहना अपेक्षित है। अपनी सीमाओं के कारण हम अनन्त या केवलज्ञान के एकांश का ही ग्रहण कर पाते हैं, एकांश की ही अभिव्यक्ति कर पाते हैं। पदार्थ के अनेक गुणों, धर्मों तथा अनन्त पर्यायों को जिन-जिन दृष्टिकोणों से देखा जाता है अथवा कहा जाता है वे सभी नय कहलाते हैं। पदार्थ में अनेक धर्म हैं। किसी एक धर्म को मुख्य करके कहने वाला वक्ता या अभिप्राय विशेष नय कहलाता है। इस प्रकार निरपेक्ष ज्ञान की अभिव्यक्ति तो अवक्तव्य है, अवाच्य है, भाषा द्वारा उसकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। जैन दर्शन अनन्त को उसके एक-एक धर्म/गुण की अपेक्षा से व्यक्त करता है तथा यह ध्यान रखता है कि हम जो कह रहे हैं वह नय या अपेक्षा सहित है। यही किचिंत अवक्तव्यम् है। द्रव्यार्थिक नय एवं पर्यायार्थिक नय की दृष्टि से भी व्याख्या सम्भव है। द्रव्यार्थिक नय से वस्तु के सामान्य धर्म को ग्रहण किया जाता है। पर्यायार्थिक नय से वस्तु में निरन्तर होने वाले आभासों को ग्रहण किया जाता है। जब वस्तु एक साथ दोनों रूप प्रतीत होती है तब भाषा में उसको व्यक्त करने वाले एक वाचक न होने के कारण इसे अवक्तव्य कहा जाता है। अपेक्षा से एक-एक नय का प्रतिपादन कर सकते हैं। अतः किंचित अवक्तव्य है।

व्यावहारिक दृष्टि से विचार करें तो सत्य का आचरण जीवन की तपश्चर्या है। इसके मार्ग में हमें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण योगी अरविंद ने कहा कि सत्य को जीतना बड़ा कठिन एवं दुष्कर है। इस जीत के लिए मनुष्य को सच्चा योद्धा बनना पड़ता है- ऐसा योद्धा जो किसी भी वस्तु या परिस्थिति से भय नहीं खाता।

सत्य का पालन किये बिना अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता, साधना सफल नहीं हो पाती। आत्मा नदी है, संयम पुण्य तीर्थ है, सत्य उसका पुण्य जल है एवं शील उसकी तरंगे हैं। महाभारतकार ऐसी ही नदी में पांडु पुत्र को स्नान करने का परामर्श देते हैं तथा बताते हैं कि पानी की नदी में स्नान करने से आत्मा का शुद्धिकरण सम्भव नहीं है।

सत्य आध्यात्मिक साधना की नींव है। जब व्यक्ति भौतिक सुखों को ही चरम-सत्य मानकर बैठ जाता है तो वह वास्तविक आत्मिक शक्ति की प्राप्ति करने में असमर्थ रहता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य सत्य से असत्य की ओर, ज्येाति से अन्धकार की ओर एवं अमृत से मृत्यु की ओर गमन करता है। राग और द्वेष के कारण वास्तविक सत्य पीछे छूट जाता है तथा मिथ्यात्व ही सत्य प्रतीत होने लगता है। ऐसे व्यक्ति सत्य का तब तक साक्षात्कार नहीं कर पाते जब तक उनका अहंकार विगलित नहीं हो जाता तथा उनकी वृत्तियों में निष्कपटता नहीं आ जाती। अज्ञानी की अपेक्षा मिथ्याज्ञानी को सत्य का ज्ञान कराना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। जब अमृत-तत्व स्वर्ण के पात्र में बन्द हो जाता है, तब उसकी खोज का रास्ता बड़ा कठिन हो जाता है। स्वर्ण की चकाचैंध में वह अपना लक्ष्य भूल जाता है। असत्य से सत्य की ओर, तम से ज्योति की ओर एवं मृत्यु से अमृत की ओर चलने का आह्वान करने वाले उपनिषद्कारों ने संशय रहित, द्विविधाहीन मनःस्थिति में सोने के पात्र के स्वर्णिम आवरण को हटाने की बात कही। सन्त कबीर ने भी कहा कि अन्धविश्वास मत करो, विवेक के आधार पर वस्तु की परख करो। जो व्यक्ति खरे खोटे का विचार किये बिना ही विश्वास कर लेता है, वह उस मूर्ख महाजन की भाँति है जो मूल गँवाकर लाभ की आशा करता है: खरा खोटा जिन नहीं परखाया। चहत लाभ तिन्ह मूल गँवाया।।

यही कारण है कि सत्य प्राप्ति के लिए चित की उन्मुक्तता एवं अनाग्रह तथा विवेक परम आवश्यक है। इस वृति से जो विचार किया जाता है, वह सम्यग् ज्ञान होता है।

जो सत्य है, वह आत्मा है। आत्मा का स्वभाव सत्य है। कषायों के बन्धन के कारण व्यक्ति ‘पर’ को ‘अपना’ मानता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्ति अपने अचेतन मन की भावना का विचार नहीं कर पाता। जो मनुष्य तप एवं साधना के द्वारा सत्य का साक्षात्कार कर लेता है, वही दार्शनिक दृष्टि से आत्म-साक्षात्कार करने में तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चेतन और अचेतन मन के द्वन्द्व को दूर करने में समर्थ होता है। उसे आनन्द की प्राप्ति होती है। इसी कारण सत्य, आनन्द एवं ब्रह्म का प्रयोग समान अर्थो में होता है।

सत्य विश्व तथा विश्व के समस्त अस्तित्वों का आधार है। सत्य का सम्यग् ज्ञान न होने तक ही अनस्तित्व एवं सत्याभास जीवित रहते हैं। जब सत्य का प्रकाश धूमिल हो जाता है तभी जैन दर्शन की दृष्टि से आत्मा की शुद्ध चेतना राग-द्वेष एवं मोह के कारण ‘पर’ को अपना समझने लगती है तथा वेदांत दर्शन की दृष्टि से माया अज्ञान की चादर उढ़ाकर आत्मा से भिन्न भेदपूर्ण सृष्टि उत्पन्न करती है तथा स्वतन्त्र पुरूष पर तीनों प्रकार के मलों का आवरण डालकर उसे लिप्त एवं परतन्त्र बना देती है तथा गीताकार की दृष्टि से कामरूप बैरी मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ज्ञान को आच्छादित कर, जीवात्मा को मोहित कर देता है।

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भासियव्वं हियं सच्चं।

सदा हितकारी सत्य वचन बोलें।

सच्चं च हियं च मियं च गाहणं च।

ऐसा सत्य वचन बोलना चाहिए जो हित, मित और ग्राह्य हो।

विस्ससणिज्जो माया व, होइ पुज्जो गुरु व्व लोअस्स।

सयणु व्व सच्चवाई, पुरिसो सव्वस्स होइ पिओ।।

(सत्यवादी माता की भाँति विश्वसनीय, लोक के लिए गुरु की भाँति पूज्य और स्वजन की भाँति सबको प्रिय होता है)।

सच्चम्मि वसदि तवो, सच्चम्मि संजमो तह वसे सेसा वि गुणा।

सच्चं णिबंधणं हि य, गुणाणमुदधीव मच्छाणं ।।

सत्य में तप, संयम और शेष समस्त गुणों का वास होता है। जैसे समुद्र मछलियों का कारण है, उसी प्रकार सत्य समस्त गुणों का कारण है।

तं सच्चं खु भगवं।(वह सत्य ही भगवान है।)

3. आर्जव

मार्दव से आर्जव का परिपाक होता है। विनम्रता से सरलता आती है तथा सरलता से निष्कपटता की वृत्ति विकसित होती है। सरलता से अपने दोषों की आलोचना करनेवाला व्यक्ति माया एवं मद से मुक्त हो जाता है।

आर्जव के विरोधी भाव माया, छल, कपट एवं कुटिलता हैं। जिस व्यक्ति के हृदय में कपट एवं कुटिलता होती है उसकी दृष्टि आविष्ट, आविल एवं मलिन होती है। उसका जीवन कृत्रिम एवं असामाजिक बन जाता है।

माया के कारण वह यह नहीं समझ पाता कि ऋजु क्या है और कृत्रिम क्या है; कपट क्या है और निष्कपट क्या है? इस कारण माया से सौभाग्य का प्रतिघात होता है। छल एवं कपट से दुर्गुणों को प्रश्रय मिलता है। हमारा व्यक्तित्व कुंठाग्रस्त हो जाता है। छल एवं कपट का जिस व्यक्ति के जीवन में जितना प्राबल्य होगा उसके चेतन एवं अचेतन मन की भावना का अन्तर उतना ही अधिक होगा। ऐसे व्यक्ति की स्मरण-शक्ति, कल्पना, चित्त की एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति दुर्बल होती जाती हैं। मानसिक ग्रन्थियाँ दृढ़तर होती जाती हैं। उसमें न तो चरित्र बल रह जाता है और न व्यक्तित्व की पवित्रता। कपट के कारण व्यक्ति खुल नहीं पाता, अचेतन मन की खोज करके प्रत्येक प्रकार के द्वन्द्व को चेतना की सतह पर नहीं ला पाता। उसके अचेतन मन में जो भाव एवं विचार एकत्र होते हैं वे उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर देते हैं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दुःखों की जड़ हमारे ही मन में है। ग्रन्थियों के कारण हम अन्तर्मन की खोज नहीं कर पाते तथा दुःख का कारण सदा बाह्य वातावरण में खोजते रहते है। सत्य जानने का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। अंधेरी कोठरी में बन्द व्यक्ति अपने से ही लड़ता रहता है। मानसिक संघर्ष के कारण बाहरी जगत में संघर्षात्मक स्थितियाँ उत्पन्न कर लेता है। अहंकार मन के कपट को बढ़ा देता है। ऐसी स्थिति में मानसिक बेचैनी, अकारण चिन्ता, भय, कल्पित शारीरिक रोग आदि उत्पन्न हो जाते हैं।

इन मानसिक रोगों से बचने के लिए निष्कपट होना होता है। निष्कपटता से मनुष्य का आन्तरिक संघर्ष चेतना की सतह पर आ जाता है। जो वासना, स्मृति एवं विचार दमित अवस्था में अचेतन मन में रहते हैं, वे चेतन मन के धरातल पर आ जाते हैं। इस प्रकार के प्रकाशन से अचेतन मन की ग्रंथियाँ ऋजु होकर शक्तिहीन हो जाती हैं। मन की गाँठें खुल जाती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चेतन मन के धरातल पर स्वतः के प्रयत्न द्वारा सप्रयास आत्मनियन्त्रण कर सकता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति कपट के कारण अपना प्रकृत स्वभाव भूल जाता है। राग-द्वेष तथा इन्द्रियों के वशीभूत होकर जीव मन, वचन एवं शरीर से कर्म संचय करता है। मिथ्यात्व, अविरति प्रमाद एवं कषायों के कारण कर्मो का आस्रव होता है। इनका सामान्य परिचय इस प्रकार है: (1) मिथ्यात्व - अनादि से मिथ्या दर्शन कर्म के उदय से सभी संसारी जीवों को पर में मेरेपन की अनुभूति हो रही है। यही मिथ्यात्व है।

(2) अविरति - इन्द्रियों के विषय भूत बाह्य पदार्थों में प्रवृत्त होना अविरति है।

(3) प्रमाद - आत्म कल्याण तथा सत्कर्म में उत्साह न होना, आलस्य करना प्रमाद है।

(4) कषाय – आत्म-परिणामों में उत्पन्न हुई मलिनता का नाम कषाय है।

संक्षेप में कषाय के दो भेद हैं - (1) राग (2) द्वेष। विस्तार में इसके चार भेद हैं - (1) क्रोध (2) मान (3) माया (4) लोभ

(5) योग - काय, वचन और मन - इन तीनों के द्वारा आत्म-प्रदेशों में कम्पन के फलस्वरूप कर्म-वर्गणा की तरंगों का आत्म प्रदेशों की ओर आने को योग कहते हैं।

कर्म या माया के कारण आत्मा का शुद्व स्वभाव आच्छादित हो जाता है। इस तथ्य को प्रायः सभी दर्शन स्वीकार करते हैं। आत्मा (जीव) के साथ जैन दर्शन में पौद्गलिक कर्मों का, बौद्व दर्शन में तृष्णा का, वेदान्त दर्शन में माया का, कपिल-पतंजलि के सांख्य-योग दर्शन में प्रकृति का संयोग माना गया है। कपट एवं कुटिलता के कारण बन्धन की ग्रन्थियाँ जुड़ती जाती हैं। ‘आर्जव’ का पालन करने पर इन ग्रंथियों की जकड़न दूर हो जाती है, गाँठे ऋजु हो जाती हैं। हृदय सरल, स्पष्ट, निष्कपट हो जाता है। इसी के पश्चात् हृदय शुद्ध होता है। आत्म-संशोधन होता है, जहाँ धर्म ठहर सकता है। इसी कारण भगवान् महावीर से जब प्रश्न किया गया कि हृदय को पवित्र एवं शुद्ध किस प्रकार बनाया जा सकता है तो उन्होंने उत्तर दिया कि ऋजुता से हृदय को पवित्र किया जा सकता है- ‘माया विजएणं अज्जवं जणयइ (माया को जीत लेने से ऋजुता प्राप्त होती है)। (उत्तराध्ययन, 29/ 69)

गीता में भी आर्जव को साधना का एक प्रधान अंग माना गया है तथा इस शब्द का प्रयोग ‘मन वाणी की सरलता’ के अर्थ में किया गया है। अर्जुन को ज्ञान के साधनों के बारे में बताते हुए भगवान कृष्ण ने श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, अहिंसा तथा क्षमा के बाद ‘आर्जव’ को स्थान दिया है।

‘अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्’।। (गीता, 13/7)

कपट का परित्याग करके ही व्यक्ति सत्य की साधना कर सकता है तथा अन्तःकरण की शुद्धि कर सकता है। इस कारण ‘सत्य’ एवं ‘शौच’ के पालन के लिए ‘आर्जव’ भूमिका का निर्माण करता है।

स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन तथा आत्मानुसंधान के अतिरिक्त सामाजिक विश्वास का वातावरण बनाने की दृष्टि से भी आर्जव का महत्व है।

कुटिलता के कारण पारिवारिक जीवन में अविश्वास उत्पन्न हेाता है। सामाजिक जीवन में छल, छद्म एवं विश्वासघात की वृत्तियाँ पनपती हैं। राजनैतिक जीवन कुटिलता का पर्याय बन जाता है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के विकास के लिए तथा परस्पर मैत्री भाव के लिए जिस प्रकार मार्दव गुण आवश्यक है, उसी प्रकार आर्जव गुण भी आवश्यक है। मार्दव गुण के कारण अहंकार समाप्त होता है तथा मन, वचन एवं क्रिया की दुष्टता दूर होती है। आर्जव गुण के कारण छल, कपट, कुटिलता दूर होती है तथा मन, वचन एवं क्रिया की एकरूपता स्थापित होती है। मार्दव गुण के कारण व्यक्ति परिवार और समाज के अन्य सदस्यों के अस्तित्व की स्वीकृति प्रदान करता है। आर्जव गुण के कारण मैत्री भाव की आधारभूमि बनती है। मित्रता का आधार है- परस्पर निष्कपटता, स्पष्टवादिता तथा ईमानदारी। मित्रों के बीच कोई दुराव-छिपाव नहीं होता। माया के विषय में भगवान महावीर ने कहा है कि माया मित्रता को नष्ट कर देती है (माया मित्ताणि नासेइ)। (दशवैकालिक, 8/ 38)

पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में परस्पर मैत्रीभाव के लिए आर्जव गुण के सतत अभ्यास की आवश्यकता असंदिग्ध है। मार्दव के कारण हम दूसरों को अपनी विनम्रता से अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा आर्जव गुण के कारण सच्चे एवं सरल हृदय से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इसी कारण गौतम बुद्ध ने कहा कि जिस प्रकार कुशल बढ़ई लकड़ी को सीधा करके उससे सुन्दर खिलौने और विशाल भवन तैयार करता है, वैसे ही साधक अपने आपको सरल एवं सीधा बनाता है।

राजनीति के क्षेत्र में छल और कपट बढ़ रहा है। राजनीति को तात्कालिक स्वार्थसिद्धि एवं सत्ता प्राप्ति के कौशल के रूप में परिभाषित किया जा रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि राजनीतिज्ञों के जीवन में परस्पर अविश्वास, अपवित्रता एवं कुटिलता बढ़ती जा रही है। उनके प्रति आस्था की भावना घट रही है। राजनैतिक जीवन की सफलता एवं स्थायित्व के लिए जनता के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि जो कह रहा है वही करेगा। जो राजनीतिज्ञ जनता का विश्वास खो देता है, उसका राजनैतिक जीवन समाप्त हो जाता है। वह अपने त्याग एवं जनसेवा के संकल्प की लाख दुहाई देता है किन्तु फिर भी जनता का बहुमत उसके कथन पर या तो विश्वास नहीं करता अथवा उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को संशय एवं सन्देह की दृष्टि से देखता है। इसके विपरीत जो राजनीतिज्ञ अपनी निष्कपटता एवं ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं, वे यदि एक शब्द भी बोलते हैं तो उसका जनमानस पर प्रभाव पड़ता है। उनकी बात पर विश्वास किया जाता है। राजनैतिक जीवन में भी स्थायी सफलता तथा लोक-विश्वास प्राप्त करने के लिए आर्जव गुण का महत्व है।

आधुनिक जीवन में आर्जव गुण की कमी के कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दुराव-छिपाव का वातावरण पनप रहा है। परस्पर अविश्वास एवं अनास्था से जीवन में विश्वासहीनता, उद्वेग, उत्पीड़न तथा भटकन बढ़ रही है। भरी-भीड़ में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है। जीवन में संत्रास और निराशा की भावना बढ़ रही है। भौतिक साधनों की दृष्टि से आज व्यक्ति अधिक सम्पन्न हैं। सुख के साधन प्रचुर हैं। मन की कुटिलता के कारण ही अनावश्यक मानसिक तनाव तथा परस्पर अविश्वास से उत्पन्न विश्वासघात की भावना बढ़ रही है। व्यक्ति अपने ऊपर, अनेक प्रकार के मिथ्या आडम्बर लाद रहा है। प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वह मानसिक विकारों का शिकार तथा उत्तरोत्तर ‘एबनार्मल’ बनता जा रहा है। अपने मन की परतों को न खोल सकने के कारण वह मानसिक तनावों में जी रहा है। कपटता के कारण परस्पर के मैत्री सम्बन्ध नष्ट होते जा रहे हैं। दूसरों को धोखा देने की, ठगने की, ऊपर से मित्र एवं हितेषी बनकर अन्दर विरोध एवं घात करने की समाजिक वृत्तियों के कारण हमारा जीवन भयावह हो उठा है। इनके समाधान का जो रास्ता पाश्चात्य विचारकों ने निकाला है, वह व्यक्ति को और अधिक भटका रहा है। साम्यवादी विचारधारा के कारण वर्ग संघर्ष की प्रेरणा तो मिली किन्तु मानव जाति में परस्पर अनुराग की भावना का पोषण नहीं हुआ। इसी प्रकार अस्तित्ववादी-दर्शन चेतनाओं में पारस्परिक सम्बन्धों की आधार-भूमि सामंजस्य को नहीं अपितु विरोध को मानता है। वह यह स्वीकार करता है कि एक व्यक्ति के अस्तित्व वृत्त तथा अन्य व्यक्तियों के अस्तित्व-वृत्तों के मध्य संघर्ष है।

बिना सामाजिक प्रेम, विश्वास एवं बन्धुत्व के व्यक्ति का जीवन सुखी नहीं बन सकता। इस कारण समाज में परस्पर मैत्रीभाव का होना आवश्यक है।

भोगवादी विचारधारा इन्द्रियों की तृप्ति में ही सुख मानती है। इन्द्रियों के सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानती है। जैन दर्शन इस मान्यता को स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है। कामनाएँ तो आकाश के समान अनन्त हैं। मिथ्या आवरणों को हटाने पर ही प्रकृत स्वभाव का दर्शन सम्भव है। इसलिए हमारा सारा प्रयास यह होना चाहिए कि हमारी चेतना के ऊपर कपट, बेईमानी एवं मिथ्या आडम्बरों की जो अनेक तहें जम गयी हैं, उनको आर्जव के द्वारा हटा सकें। ऐसा करने पर हमारा जीवन सरल बन सकेगा। हम तनावों से मुक्त हो सकेंगे।

आर्जव का अर्थ प्रज्ञा-सम्पन्न व्यक्ति के द्वारा आन्तरिक सद्गुणों का विकास करना है, अचेतन मन की अनजानी दमित वासनाओं को चेतन मन के धरातल पर लाना है। ‘आर्जव’ आत्म-संशोधन की भूमिका का निर्माण करता है, व्यक्ति के चरित्र एवं व्यवहार को निष्कपट बनाता है, कषायों के बन्धनों को ऋजु कर विवेक की भूमिका प्रदान करता है तथा मिथ्या माया का आवरण हटा आत्मानुसंधान के रहस्य-द्वार के कपाट को थपथपाता है।

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माया विजएणं अज्जवं जणयइ।

माया को जीतने से आर्जव की प्राप्ति होती है।

जो चिंतेइ ण वंकं, ण कुणदि वंकं ण जंपदे वंकं।

ण य गोवदि णिय दोसं, अज्जव-धम्मो हवे तस्स।।

जो वक्र (कुटिल) विचार नहीं करता, वक्र (कुटिल) कार्य नहीं करता, वक्र(कुटिल) वचन नहीं बोलता और अपने दोषों को नहीं छिपाता, उसको आर्जव धर्म होता है।

2. मार्दव

‘क्षमा’ के परिपाक एवं विकास के लिए ‘मार्दव’ का महत्व है। किसी पर क्रोध न करना ही पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यक्ति के लिए यह भी आवश्यक है कि वह ‘अहंकार’ का परित्याग कर, दूसरों के प्रति विनम्रता के साथ मृदुता का आचरण करे।

अहंकारहीन एवं मृदु व्यवहार करने वाले व्यक्ति के चित में क्रोध भाव उत्पन्न होने की सम्भावनाएँ क्षीण होती जाती हैं।

समाज के एक कार्यकारी सदस्य के रूप में व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह भद्र एवं सभ्य व्यक्ति के रूप में व्यवहार करे ; अहंकार का त्याग कर मृदुता का व्यवहार करे जिससे दूसरों के मन को पीड़ा न पहुँचे।

व्यक्ति को समाज निरपेक्ष स्थिति में व्यक्तिगत साधना के धरातल पर भी अपने अहंकार का विसर्जन करना होता है। हृदय की कठोरता एवं क्रूरता को छोड़े बिना व्यक्ति का चित्त धार्मिक नहीं हो सकता। कारण यह है कि अध्यात्म-यात्रा की सबसे बड़ी रुकावट ‘मैं’ की है। भगवान महावीर ने कहा है कि जिसे तू मारना चाहता है वह तू ही है, जिसे तू शासित करना चाहता है, वह तू ही है, जिसे तू परिताप देना चाहता है, वह तू ही है। (आचारांग, 5/ 5)

‘मार्दव’ की कई अर्थ छायाएँ एवं स्तर हैं। एक दृष्टि से मार्दव का अर्थ है- मृदु, शिष्ट एवं विनम्र व्यवहार। इसके आगे जाकर मार्दव का अर्थ होता है- कठोरता का पूर्ण विर्सजन। इसके भी आगे जाकर ‘मार्दव’ से व्यक्ति के अन्तःकरण के उस गुण का बोध होता है जिसमें वह किसी भी प्राणी के दुःख को देखकर सहजरूप से करुणा से अभिभूत हो जाता है, प्रत्येक प्राणी को वह आत्मतुल्य एवं समभाव की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त हो जाता है तथा उसका मन करुणा से आपूरित रहता है।

व्यक्ति के मनोभाव की दृष्टि से मृदुता के दो प्रकार हैं:

(1) प्रतीयमान मृदुता

(2) यथार्थ मृदुता

‘प्रतीयमान मृदुता’ का पालने करने वाला व्यक्ति बाह्य दृष्टि से विनम्र एवं शिष्ट होता है किन्तु उसका ‘अन्तर्मन’ मार्दव से अप्रभावित रहता है। बाह्य दृष्टि से आवश्यकता से अधिक विनम्र होने पर व्यक्ति अन्तर्मन की दमित वासनाओं का शिकार हो सकता है। उसके अचेतन मन का अंहकार ही विनय के रूप में प्रदर्शित हो सकता है। जब समाज में इस प्रकार के व्यक्तियों की संख्या बढ़ जाती है तो अनुराग एवं विश्वास द्योतक शब्दों के अर्थ बदलने लगते हैं। ऐसा सम्भव है कि बाह्य स्तर पर कोई हमसे मित्रता व्यक्त करे किन्तु अन्दर से अहंकार के वशीभूत अथवा स्वार्थसिद्धि हेतु हमारे विनाश की योजना बनाए। इस प्रकार के व्यक्ति के आचरण की वास्तविकता के अनावृत होने पर हमारा उसके प्रति संचित विश्वास समाप्त हो जाता है और वह हमारी नफरत और घृणा का पात्र हो जाता है। इस प्रकार की प्रतीयमान मृदुता अवांछनीय और त्याज्य है।

‘यथार्थ मृदुता’ का जो व्यक्ति अभ्यास करता है उसका अन्तर्मन मार्दव से भावित होता है। उसके जीवन में विनयशीलता, निरभिमानता एवं उदारता का क्रमशः विकास होता है। अन्ततः उसके चित्त में मैत्री का अजस्र स्रोत प्रवाहित होने लगता है।

मार्दव के विरोधी-भाव अहंकार, गर्व, मद, कठोरता हैं। मार्दव की विपरीत स्थिति मन, वचन, क्रिया की कठोरता है। ‘अहंकार’ अधर्म का मार्ग है। इससे हम आत्म-चेतना से दूर होते जाते हैं। बाह्य पदार्थो में हमारी आसक्ति एवं अनुरक्ति बढ़ती जाती है। ‘गर्व’ के कारण मन में अपने अहंकार के प्रति ‘मान’ होता है। ‘मान’ विनय का विनाश कर डालता है। ‘मद’ में हम विवेक खो देते हैं। सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। मन की सारी कोमलता नष्ट हो जाती है। हमारा वचन ही नहीं, मन एवं कर्म भी कुटिल हो जाते हैं।

लोक में आठ प्रकार के मद प्रसिद्ध हैं-

(1) शरीर का मद

(2) धन का मद

(3) बल का मद

(4) कुल का मद

(5) जाति का मद

(6) ज्ञान का मद

(7) चारित्र्य का मद

(8) तप का मद।

जो व्यक्ति इन आठों प्रकार का किंचित् भी ‘मद’ नहीं करता वही उत्तम मार्दव का पालन करता है। हम पाते हैं कि समाज में कुल, जाति, वर्ण एवं सम्प्रदाय के कारण अनेक बार संघर्ष की स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। इसके मूल में अपनी जाति, अपने कुल, अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ तथा दूसरे के कुल, जाति एवं सम्प्रदाय को हीन मानने की कुत्सित भावना काम करती है। भगवान महावीर के समय समाज में कुल की श्रेष्ठता एवं हीनता की भावना बहुत प्रबल थी। भगवान महावीर ने इसकी अतार्किकता को पहचाना तथा समाज को सचेत किया। उनके शब्द हैं:

से असइं उच्चागोए असइं नीआगोए, नो हीणे नो अइरित्ते।

नोsपीहए इति संखाए, के गोयावाई के माणावाई ? ।।

यह (पुरुष) अनेक बार उच्च गोत्र और अनेक बार नीच गोत्र का अनुभव कर चुका है। (जन्म जन्मांतर के कारण)। न कोई हीन और न कोई अतिरिक्त (अर्थात् उच्च) है। स्पृहा न करे। (अर्थात् उच्च गोत्र की इच्छा न करे)। कौन गोत्रवादी होगा, कौन मानवादी। (अर्थात् यह जान लेने पर कि वह अनेक बार विभिन्न जन्मों में उच्च गोत्र में भी जन्म ले चुका है और अनेक बार नीच गोत्र में भी जन्म ले चुका है, ऐसा कौन मूर्ख होगा जो गोत्र की उच्चता एवं नीचता में विश्वास करेगा तथा उच्च गोत्र में जन्म लेने पर अपने गोत्र का मान या अभिमान करेगा)।

यहाँ यह द्रष्टव्य है कि अपने चरित्र एवं तप का मद भी बहुत भयावह होता है। मद के उपर्युक्त प्रकारों का विवरण ज्ञानी, मनीषि, साधु, मुनि, तपस्वी कोटि के लोगों के लिए एक प्रकार की चेतावनी है। भगवान महावीर ने स्पष्ट शब्दों में भिक्षुकों के लिए निम्न व्यवस्था दी है:

पन्नामयं चेव तवोमयं च, निन्नामए गोयमयं च भिक्खू।

आजीवगं चेव चउत्थमाहु, से पण्डिए उत्तमपोग्गले से।। (सूत्रकृतांग, 1/13/ 15)। (प्रज्ञा मद, तप मद, गोत्र मद और आजीविका मद – इन चारों प्रकारों के मदों को नहीं करने वाला निस्पृह (इच्छा न करने वाला, किसी प्रकार की कामना न करने वाला) भिक्षु सच्चा पण्डित और पवित्र आत्मा होता है)।

सारांश यह है कि किसी प्रकार का भी मद (अर्थात् अहंकार) समस्त साधना को निर्मूल कर देता है। आधुनिक मानेविज्ञान इस बात को स्वीकार करता है। अहंकार होने पर ‘सुपरइगो’ प्रकृत-प्रवृतियों का दमन करके आत्मभर्त्सना का रूप ग्रहण कर लेता है और अवांछित प्रवृत्तियों का निराकरण नहीं हो पाता। फलस्वरूप चेतन मन का संघर्ष अचेतन मन में होने लगता है। मानसिक शक्ति का उदात्तीकरण नहीं हो पाता। चेतन मन अचेतन मन के आवेगों का अनुभव नहीं कर पाता। मद एवं अंहकार के दूर होने पर ही दमित मानसिक-शक्ति चेतना की सतह पर लाई जा सकती है तथा चेतन मन के धरातल पर आत्म-नियन्त्रण किया जा सकता है।

अहंकार, मद एवं मान से कषायों का जन्म होता है। राग-द्वेष का संचार होता है। हमारे अहंकार को चोट लगने पर मन में क्रोध, ईर्ष्या , क्रूरता आदि भाव उत्पन्न होते हैं। विनम्रता एवं मृदुता से कषायों का नाश होता है। जीवन में ऋजुता आती है। जब ‘अहंकार’ विगलित होने लगता है तो मन की पाषाण जैसी कठोरता चूर-चूर होकर कोमल सिकता कणों में परिणत होने लगती है। विनम्रता एवं करुणा के शीतल जल-प्रवाह द्वारा मन का ताप मिट जाता हैं, मानवीय प्रवृत्तियों का विकास होता है। यदि कोई उसे दुःख पहुँचाता है तो भी चित्त की विनम्रता एवं करुणा उसे क्षमा कर देती है। जब अहंकार की परतें हटने लगती हैं तो कषायों के बन्धन खुलने लगते हैं। इस प्रकार ‘मार्दव’ जहाँ ‘क्षमा’ के विकास एवं परिपाक में सहायक है वहीं ‘आर्जव’ के विकास एवं परिपाक में भी सहायक है।

जब तक अहंकार रहता है, व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का अपेक्षित विकास नहीं कर सकता। अहंकार के कारण उसके विकास की गति धीमी पड़ जाती है। वह गर्व में डूब जाता है। मद के कारण वह यह भूल जाता है कि उसकी मंजिल अभी दूर है।

तत्त्वतः बन्ध और मोक्ष अपने ही भीतर हैं। आत्मस्वरूप को पहचानने के लिए ‘मैं’ को गलाना पड़ता है। जिस प्रकार वृक्ष के मूल से स्कन्ध पैदा होता है, स्कन्ध से शाखाएँ और शाखाओं से प्रशाखाएँ निकलती हैं, प्रशाखाओं से पत्ते पैदा होते हैं और इसके पश्चात् क्रमशः फल-फूल और रस उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार धर्मरूपी वृक्ष का मूल ‘विनय’ है और मोक्ष उसका फल है। अहंकार के आवरण को हटाये बिना अमृत-तत्व प्राप्त नहीं हो सकता। एक बार गौतम ने भगवान महावीर से पूछाः

भंते, मृदुता से क्या होता है ?

भगवान ने कहा- ‘मृदुता’ से अपने आपको दूसरों से अतिरिक्त, दूसरों से विशिष्ट मानने की भावना नष्ट हो जाती है।

‘मृदुता’ से इसी कारण समस्त जीवों पर मैत्री भाव रखने एवं समस्त संसार के जीवों को समभाव से देखने की दृष्टि विकसित होती है।

तप एवं त्याग के बावजूद यदि व्यक्ति के चित में अहंकार एवं मान शेष रह जाता है तो उसकी सारी साधना निष्फल हो जाती है।

मृदुता से उदारता, सहिष्णुता एवं दृष्टि की उन्मुक्तता का विकास होता है। सत्यानुसंधान के लिए यह बहुत आवश्यक है। अहंकार से आग्रह जन्म लेता है, उदारता से अनाग्रह। अनाग्रह की चेतना ही अनेकांतवादी जीवन-दृष्टि प्रदान करती है।

‘अहंकार’ के कारण पारिवारिक जीवन में अशान्ति उत्पन्न होती है, सामाजिक जीवन में संघर्ष उत्पन्न होता है एवं राजनैतिक जीवन में पराजय प्राप्त होती है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के विकास के लिए सभी सदस्यों में परस्पर प्रेम भाव, दूसरों के अस्तित्व की स्वीकृति तथा एक सदस्य का अन्यों के प्रति करुणा एवं मैत्रीभाव का होना आवश्यक है। ‘मार्दव’ से उपर्युक्त गुणों का विकास होता है। व्यक्ति के हृदय में दूसरों को आत्मतुल्य मानने का भाव उत्पन्न होता है। दूसरों के विचारों एवं कार्यों के प्रति उसके मन में आदर, सहिष्णुता एवं उदारता उत्पन्न होती है तथा अन्ततः सहन शक्ति का विकास होता है। यदि व्यक्ति अहंकार नहीं छोड़ता तो परिवार के अन्य सदस्यों की उपेक्षा का पात्र बन जाता है। समाज उसके प्रति अरुचि, उपेक्षा एवं अन्ततः घृणा करने लगता है। मार्दव गुण सामाजिक प्राणी का सर्वप्रथम सकारात्मक गुण है। हमें यह प्रयास तो करना ही चाहिए कि हमारे व्यवहार से किसी को पीड़ा न हो। हमारे पास जो है-उसे किसी को दे सकने की स्थिति में न हों तो कम से कम इतना सामाजिक दायित्व बोध तो हममें होना ही चाहिए कि हम अपने व्यवहार से दूसरों के मन को आघात न पहुँचाएँ। हमारा मृदु एवं विनम्र आचरण दूसरों को हमारी तरफ आकर्षित करता है। हमारा सामाजिक दायरा विस्तृत होता है। व्यक्ति समाज के अन्य सदस्यों से संघर्ष एवं कलह की स्थितियों को सर्वथा समाप्त नहीं कर सकता तो उन्हें कम अवश्य कर सकता है। संघर्ष के भयावह एवं वीभत्स वातावरण को नष्ट कर सकता है। अन्य सदस्यों से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित होने पर परस्पर सौहार्द एवं प्रेम का वातावरण निर्मित होता है जो सामाजिक शान्ति की स्थापना में सहयोग की भूमिका निभाता है।

राजनैतिक जीवन में भी मार्दव गुण का बहुत महत्व है। लोकतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था में नेतृत्व के लिए यह आवश्यक है कि वह मार्दव गुण का पालन करे, सत्ताप्राप्ति के पश्चात् भी सत्ता के मद से दूर रहे। यदि जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं कर पाता तो उसके एवं जनता के बीच दूरी बढ़ जाती है। इस दृष्टि से महाकाव्य ‘कामायनी’ में वर्णित संघर्ष सर्ग की कथा अत्यन्त प्रेरक है। ‘मनु’ सारस्वत प्रदेश के राजा बनकर अपने बनाये हुए नियमों से शासन संचालित करते हैं, किन्तु स्वयं उन नियमों का पालन नहीं करना चाहते। वे स्वयं स्वच्छन्द जीवन व्यतीत करने का प्रयास करते है। इड़ा उन्हें समझाती है कि नियामक को भी नियमों के अनुरूप आचरण करना चाहिए। संसार की ताल में, विश्व की लय में, समाज के बन्धन में सम होना चाहिए। इससे संगीत की लय नहीं बिगड़ती, जीवन की समरसता में विषमता उत्पन्न नहीं होती। अहंकारी मनु पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रजापति इड़ा को प्राप्त करने के लिए वे समस्त बन्धनों एवं नियन्त्रणों को तोड़ने का प्रयास करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि प्रजाजन विद्रोह करते हैं। संघर्ष होता है। मनु क्रूरता के साथ अपने खड्ग से प्रजाजनों को कुचलकर आगे बढ़ना चाहते हैं। भीषण जन-संहार होता है। रक्तोन्मत मनु का हाथ रुक नहीं पाता। उधर प्रजा का साहस भी नहीं थमता। इसका समापन मनु की पराजय में होता है और वे मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं:

और गिरीं मनु पर, मुमूर्ष वे गिरे वहीं पर,

रक्त-नदी की बाढ़, फैलती थी उस भू पर। (कामायनी, पृष्ठ 202)

इस कथा से हमें ज्ञात होता है कि किस प्रकार अहंकार में व्यक्ति असंयमी एवं क्रोधी हो जाता है, जिससे वह सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टि से पराजित हो जाता है।

आधुनिक जीवन में मार्दव गुण के अभाव के कारण सामाजिक जीवन में परस्पर संघर्ष एवं तनाव का वातावरण पनप रहा है। अहंकार की भावना के कारण अपने को सर्वोच्च, शक्तिमान एवं श्रेष्ठ तथा दूसरों को अपने से निम्न, दुर्बल एवं हीन मानने के कारण साम्प्रदायिक दंगे होते हैं, जातीय संघर्ष होते हैं, वर्णगत विभेद बढ़ता है। ‘धर्म’ व्यक्ति को समभाव सिखाता है। अपने धर्म की श्रेष्ठता का प्रतिपादन कर; धर्म के ठेकेदार साम्प्रदायिक दंगे करवाने में सफल हो जाते हैं और धर्म के नाम पर हैवानियत का नंगा नाच करने तथा दूसरों को इंसान से हैवान बनाने का कुत्सित प्रयास करते हैं। ‘मार्दव’ की वृत्ति के विकास से समाज के सभी सदस्यों में परस्पर अनुराग एवं मैत्री सम्भव है। आत्मतुल्यता की दृष्टि विकसित होने पर सभी आत्माओं की स्वरूप की दृष्टि से समानता एवं प्रत्येक आत्मा की अस्तित्व की दृष्टि से स्वतन्त्रता की मान्यता का विकास होने पर समाज में ऊँच-नीच, बड़ा-छोटा, गोरा-काला आदि के आधार पर बनी हुई विभेदकारी रेखाएँ स्वतः मिट जायेंगी।

‘मृदुता’ का अर्थ आत्म-पराजय अथवा हीनता-बोध नहीं है। इसका भावार्थ आत्मिक दृढ़ता है, अपनी आत्मा की स्वीकृति का भाव है तथा अपनी ही जैसी सभी जीवों की आत्माओं के प्रति आत्मतुल्यता की भाव-प्रतीति है। यह स्वीकृति एवं प्रतीति व्यक्ति की चिन्तन-दृष्टि को उन्मुक्त बनाती है, आग्रहों से लिपटे दायरों को समाप्त कर सतत जागरूकता प्रदान करती है। ‘मैं’ का आवरण हटा आत्मानुसंधान के रहस्य द्वार को खोलती है तथा सृष्टि के प्राणियों के प्रति मैत्री एवं अपनत्व की भावना उत्पन्न करती है।

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एवं धम्मस्स विणओ, मूलं परमो से मोक्खो।

जेण कित्तिं, सुयं, सिग्धं, निस्सेसं चाभिगच्छई।।

((इसी प्रकार) धर्म रूपी वृक्ष का मूल विनय है और उसका अंतिम फल मोक्ष है। इससे कीर्ति, सुयश और श्रुतज्ञान सभी इष्ट तत्त्वों की उपलब्धि होती है।

कुलरूपजादिबुद्धिसु, तवसुदसीलेसु गारवं किंचि।

जो णवि कुव्वदि समणो, मद्दवधम्मं हवे तस्स।।

जो श्रमण कुल, रूप, जाति, ज्ञान, तप, श्रुत और शील का किंचित भी गर्व नहीं करता, उसको मार्दव धर्म होता है।

अगीत साहित्य के अलख-निरंजनडा रंगनाथ मिश्र सत्य

                   ( डा श्याम गुप्त )

हिन्दी साहित्य-जगत में अगीत-विधा, संतुलित कहानी एवं संघीय समीक्षा पद्धति आदि विधाओं के प्रवर्तन द्वारा अपनी अलग से एक विशिष्ट पहचान बनाने वाले डा.रंगनाथ मिश्र जी ‘सत्य-पथ के पाथेय’ हैं आपने अपना उपनाम ही सत्य रख लिया है। अपने नामानुसार ही वे बहुरंगी व्यक्तित्व व बहु-विधायी साहित्यकार तो हैं ही, बहु-नामी शख्शियत भी हैं। भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीरप्रसाद द्वेदी व निराला जी की भांति युगप्रवर्तकअज्ञेय की भांति प्रयोगवादी डा.सत्य के आज तक जितने नामाकरण व नामोपाधिकरण हुए हैं उतने नामों से साहित्य-जगत में शायद ही किसी को पुकारा गया हो हो सकता है कि कभी स्कूलों कालेजों में मानी अगीत’ के साथ-साथ डा रंगनाथ के पर्यायवाची भी पढाए-पूछे जाने लगें।

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(रंगनाथ मिश्र सत्य)

जहां पूर्व न्यायाधीश–साहित्यकार श्री रामचंद्र शुक्ल जी सत्यजी को ‘साधना का व्रती.... ‘अदम्य संगठन कर्ता’...अनुष्ठानधर्मायोग्यतम संचालक ..का नाम देते हैं तो गीतकार डा चक्रधर नलिन जी उन्हें ‘युग-प्रवर्तक’ व प्रयोगधर्मी’ का और जंग बहादुर सक्सेना ..’काव्य का दिशा वाहक। प्रोफ.उषा सिन्हा उन्हें अगीत विधा का बट-बृक्ष’ नामित करती हैं तो रूसी भाषाविद संगमलाल मालवीय- ‘लखनऊ साहित्यिक व्यायामशाला का अखाडेबाज़ चौधरी’ और प्रोफ. नेत्रपाल सिंह साहित्यकार दिवस के प्रेरणा स्रोत’ के नाम से पुकारते हैं। उनके योग्य शिष्य सूर्य प्रसाद मिश्र ‘हरिजन’ उन्हें सत्य का सूर्य’ का नाम देते हैं तो श्रीमती स्नेहलता व देवेश द्विवेदी ‘साहित्यिक संत का। गुरुवर, गुरूजी, गुरुदेव नाम से तो वे अपनी अगीत मंडली, शिष्य मंडली, अगीत पाठशाला व अगीत कार्यशाला, अगीत साहित्य-जगत एवं सारे युवा-साहित्यकार जगत में जाने ही जाते हैं; जो उनके शिष्य-शिष्याओं, प्रशंसकों, साथियों की लंबी संख्या व उनकी लोकप्रियता की व्याख्या करता है। सृजन संस्था के अध्यक्ष डा.योगेश गुप्ता उन्हें ‘कर्म-योद्धा’ का नाम देते हैं

उनके अभिन्न साथी व शिष्य श्री पार्थोसेन उन्हें ’आंदोलनकारी व्यक्तित्व कहते हैं वरिष्ठ वयोवृद्ध सुकवि शारदा प्रसाद मिश्र के वे विलक्षण साहित्य सेवी हैं। कवयित्री डा मंजू शुक्ला ने उन्हें ‘हिन्दी के सच्चे सिपाही’ का नाम दिया है और विजय कुमारी मौर्या के लिए वे ‘सत्य का आईना‘ हैं। पट्ट-शिष्य तेज नारायण राही के लिए ‘साहित्य धाम का काव्य संत’ हैं तो स्नेहप्रभा (दिल्ली) ने उनका लिए एक तपस्वी का नाम उद्घोषित किया है। वैदिक विद्वान श्री धुरेन्द्र बिसरिया जी उन्हें सत्य का साधक’...’संकल्प का धनी...अरुंधती तारा...’कर्म-रथी व ‘उद्गीथ का प्रणेता” आदि नामों से नवाज़ते हैं। और भी जाने कितने नाम हैं सत्य जी के। ‘हिन्दी का सूर्य’...’साहित्य उपवन का अनोखा सुमन”...और कवि अनिल किशोर ‘निडर’ उन्हें इस 'युग का चतुरानन पुकारते हैं ...

खिले अगीत-गीत हर आँगन,

तुम हो इस युग के चतुरानन।

और मैं स्वयं डा श्याम गुप्त उन्हें अगीत का कवि-कुल-गुरु कहता हूँ तथा आज अगीत का अलख निरंजन

सतत परिवर्तनशीलता ही प्रकृति-नटी का स्थिर नियम है, चिर-सत्य है, यही प्रकृति है, प्राकृतिक बंधन भी है, रूढिवादिता भी, प्रगतिशीलता भी। इसी प्रकार सतत नवीन चिंतन शैली, कुछ न कुछ सोचते रहना, नया करते रहना, रूढ़िवादी कवि की भांति झोला कंधे पर डाले परन्तु परिवर्तन के चितेरे की भांति चरैवेति-चरैवेति ...चलते रहना ...आते-जाते रहना, सारे नगर में ..देश में... सत्य जी का नियम है। अपने बहुमुखी कृतित्वों, सर्वाधिक साहित्यिक कृत्यों, असंख्य शिष्य-शिष्याओं व युवा कवियों को एवं तमाम साहित्यिक संस्थाओं को अगीत-परिषद के सह-संयोजकत्व में गतिमान, प्रगतिमान रखने वाला बहुयामी व्यक्तित्व समाये वे साहित्यिक जगत के विलक्षण व्यक्तित्व ही हैं साथ ही वे ऐसे व्यक्ति व साहित्यकार भी हैं जिनकी सबसे अधिक आलोचना भी होती है परन्तु वे अपने स्वभावानुसार, नामानुसार अपनी ही धुन में चलते जारहे हैं सतत, अनथक, अविराम, अविचलित, अनासक्त-भाव व सत्य-भाव से। अगति में भी गतिमयता लिए हुए ...अगीत.. गुनुगुनाते हुए .....

“‘सत्य और संयम

मन में उत्साह भरें,

जीवन आशान्वित हो

शान्ति के सहारे,

हिंसा का त्याग करें ;

सबको सुख देकरके

हम गरल पियें।

                                                    ---- डा श्याम गुप्त

व्यंग्य

मिस कॉल

डॉ. रामवृक्ष सिंह

मोबाइल फोन के आगमन के साथ संवाद और संदेश-संप्रेषण से जुड़ी कई नई-नई अवधारणाएं हमारे समाज में आई हैं। इनमें मिस कॉल भी एक है। मिल कॉल का आशय है, एक टेलीफोन से दूसरे टेलीफोन पर किया गया फोन, जिसका उद्देश्य यह जताना होता है कि हम आपसे बात करने के इच्छुक हैं, किन्तु उसपर जो भी खर्च आनेवाला है उसकी जुगाड़ हमारे पास न थी, न है और न होगी। हम सब जानते हैं कि मोबाइल फोन में या तो हम पहले धन अदा करके टॉक टाइम डलवाते हैं या पहले बातें कर लेते हैं और जब बिल मिलता है तो अब तक की गई बातों का बिल अदा करते हैं। लेकिन मिस कॉल करनेवाला या वाली, इनमें से किसी भी रूप में धन अदा नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि बात तो वह करे, किन्तु उसके लिए जो भी चवन्नी-अठन्नी या रुपय्या खर्च करना है, वह आप करें। इतनी रकम या तो उसके पल्ले है नहीं या वह खर्च करना नहीं चाहता।

खैर...। अब सवाल यह पैदा होता है कि मिस कॉल के जवाब में कोई किसी को फोन क्यों करे? सच्ची बात तो यह है कि हममें से अधिकतर इन्सान बेहद सामाजिक प्राणी होते हैं। सामाजिक होने के साथ-साथ हमारी संवेदनाएं भी बड़ी प्रखर होती हैं। जैसे ही कोई कॉल आती है, और हमारे उठाने से पहले कट जाती है, यानी मिस कॉल में परिणत हो जाती है, हम लपककर फोन उठाते हैं। हमें लगता है कि पता नहीं मिस कॉल करनेवाले पर क्या आफत आई है, जो पैसे न होने के बावज़ूद या पैसे होने पर भी उन्हें खर्च करने की इच्छा न होने के बावजूद हमसे बात करना चाहता है। हम कॉलर का नम्बर देखते हैं और पलटकर फोन करते हैं।

उधर मिस कॉल करनेवाले को यह डर लगा रहता है कि कहीं कॉल मिल न जाए, यानी जिसे कॉल कर रहे हैं वह फोन उठा न ले। यदि फोन उठा लिया गया तो गजब हो जाएगा। कॉल चार्ज हो जाएगी और पैसे लग जाएंगे, यदि प्रीपेड है तो पैसे वहीं के वहीं कट जाएँगे और यदि पोस्ट-पेड़ है तो बिल में जुड़ के आ जाएँगे। यदि ऐसा गज़ब हो गया, यानी इरादा तो मिस कॉल मारने का था, लेकिन कॉल उठ गई तो मिस कॉल का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। तब वह मिस कॉल न रहकर पूरी की पूरी कॉल ही हो जाएगी। इसलिए मिस कॉल करनेवाले जितनी जल्दी हो कॉल को काट देते हैं। कई बार तो जैसे ही दूसरी ओर घंटी बजी, वैसे ही वे कॉल काट देते हैं। इससे वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कॉल किसी भी हाल में उठने न पाए। यानी चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए। लेकिन कई बार वे शीघ्रता की अति कर देते हैं और इस कॉल काटने में इतनी तत्परता बरतते हैं कि दूसरी ओर के मोबाइल पर उनका नंबर भी पूरा नहीं आ पाता। अब जब नंबर ही पूरा नहीं आया, तो दूसरी ओर से कोई वापस कॉल कैसे करे? लिहाजा मिस कॉल का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है। बायोलॉजी में कहें तो मिस कॉल की भ्रूण-हत्या हो जाती है। जिस उद्देश्य के लिए कॉल की गई थी, वह पूरा ही नहीं हो पाता।

वैसे तो पूरी घंटी बजने के बाद भी जब फोन नहीं उठता तो उसे मिस कॉल ही कहा जाता है। लेकिन इस स्थिति में कॉल-कर्ता एक-दो-तीन-चार यानी कई बार फोन करता है और घंटी की मियाद पूरी होने तक फोन होल्ड किए रहता है। तकनीकी रूप से यह भी मिस कॉल ही है, लेकिन व्यवहार्यतः मिस कॉल का वही अर्थ और अभिप्राय है, जिसकी चर्चा हम ऊपर कर आए। कॉल की घंटी बजने की मियाद पूरी होने से पहले ही इस मक़सद से कॉल को काट देना कि दूसरा व्यक्ति कॉलर आईडी देखकर वापस फोन करे और हमसे बात करे।

मिस कॉल करनेवाले कई प्रकार के लोग हो सकते हैं। इनमें प्रधानता गँवई-गाँव के लोगों की होती है, जो या तो गाँवों में रहते हैं, या जो कई दशक से शहर में रहकर भी नागर नहीं हो पाए, गँवार ही रह गए। जिन सौभाग्यशाली पाठकों के रिश्तेदार गाँव में नहीं रहते, या शहर में रहते-रहते ग्राम्य संस्कारों से पूरी तरह बरी हो चुके हैं, उन्हें बधाई। लेकिन उनके लिए अफसोसनाक खबर यह है कि वे शायद ही कभी मिस कॉल जैसी स्थिति का अनुभव कर पाएँ। मिस कॉल तो केवल ऐसे लोगों को मयस्सर है, जिनके जानने वाले, रिश्तेदार और नातेदार धेले-अधेले, पैसे और पाई का मोल जानते हैं। और निरपवाद रूप से ऐसे लोगों की एक बहुत बड़ी तादाद हमारे गाँवों में है, जहाँ के बारे में किसी समझदार कवि ने कहा था कि है अपना हिन्दुस्तान कहाँ, वह बसा हमारे गाँवों में। तो इस ग्राम्य भारत में यदि आपके रिश्तेदार व हित-चिन्तक बसते हैं, तो वे निश्चय ही गाहे-ब-गाहे मिस कॉल का तजुर्बा आपको करवाते होंगे। हमें पक्का यकीन है।

यदि उनकी मिस कॉल पर आपने पलटकर फोन कर लिया, तो फिर जो बात दो मिनट में हो सकती थी, उसके समाप्त होने में बीस मिनट लगने ही लगने हैं। और यदि आपने फोन उठा लिया, यानी वे सफल मनोरथ नहीं हुए तो क्या होगा? कॉल-कर्ता पर अज़ाब तो नाजिल होगा ही, लेकिन वह केवल क्षणजीवी होगा। उधर से तुरन्त मनुहार होगी- ‘हैं-हैं. ऐसा है भइया कि हमारे फोन में टाक टाइम बस दो मिनट का बचा है। लेकिन तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है। तो हम फोन काटते हैं, जरा तुम मिलाओ।‘ कभी-कभी यही बात दूसरे शब्दों में कही जाएगी। यानी सीधे-सीधे अभिधा में नहीं, बल्कि लक्षणा और व्यंजना में- ‘हैं,हैं.. साहब, इस फोन को जाने क्या हो गया है, कुछ आवाज ही समझ में नहीं आ रही हैगी.. अच्छा तो ऐसा करो कि एक बार काट के तुमई मिलाय लेओ, तब शायद आवाज किलियर आए।’ आपने काटकर मिलाया तो समझिए गए काम से। अब अपने सारे काम छोड़कर आप उनकी बातें सुनने के लिए तैयार हो जाइए। उनका खून खून है, आपका खून पानी। उनका पैसा पैसा है आपका पैसा मिट्टी।

मिस कॉल करनेवालों के मन में कभी यह विचार भी नहीं आता कि वह हमारे साथ कितना बड़ा अन्याय कर रहे हैं। बल्कि इसे वह अपना जन्म-सिद्ध अधिकार समझते हैं। यदि मिस कॉल आने के बाद भी आप पलटकर फोन न करें और कुछ समय व्यतीत होने के बाद उसी व्यक्ति से दुबारा बात करने का मौका मिले, तो वह बाकायदा शिकायत करता है- ‘क्या यार, आपको मिस कॉल की थी, आपने तो पलटकर फोन तक नहीं किया!’ हम जानते हैं कि यह हमारा भावनात्मक शोषण है। चूंकि हम भले आदमी हैं, और फोन करनेवाले की भावना का हम खयाल रखते हैं, इसलिए वह गाहे-ब-गाहे हमें चूना लगाने पर उतारू रहता है। गोया चूना लगाना उसका अधिकार है और लगवाना हमारा। है न मज़े की बात।

 

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दशलक्षण धर्म:

प्राणी मात्र का कल्याण

एवं

सामाजिक सौमनस्य तथा सामरस्य

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अनुक्रम

 

भूमिका 3 - 11

1.क्षमा 12 - 20

2. मार्दव 21 - 31

3. आर्जव 32 - 39

4. सत्य 40 - 58

5. शौच 59 - 67

6. संयम 68 - 77

7. तप 78 - 88

8. त्याग 89 - 100

9. आकिंचन्य 101 - 114

10. ब्रह्मचर्य 115 - 131

दशलक्षण धर्म:

प्राणी मात्र का कल्याण

एवं

सामाजिक सौमनस्य तथा सामरस्य

 

 

भूमिका

गृहस्थ के लिए आचरण का प्रतिमान है - अहिंसा धर्म का पालन करना। वैचारिक अहिंसा अनेकान्तवाद है; कथन शैली की अहिंसा स्याद्वाद है; आर्थिक क्षेत्र की अहिंसा परिग्रह परिमाण व्रत का पालन है।

जब व्यक्ति भौतिकवादी होता है तो भौतिक पदार्थों का अधिक से अधिक परिग्रह करता है। लालसा बढ़ती जाती है। भगवान महावीर ने जाना था कि विश्व के सभी प्राणियों के लिए परिग्रह के समान दूसरा कोई जाल नहीं है। इसके कारण की विवेचना करते हुए भगवान ने कहा - ‘‘इच्छा हु आगास-समा अणंतिया (इच्छा आकाश के समान अनन्त है)। (उत्तराध्ययन 9/ 48)

गृहस्थ अपरिग्रही नहीं हो सकता। गृहस्थ जीवन के लिए भौतिक पदार्थों की उपलब्धता जरूरी है। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति अनिवार्य है। साँस लेने के लिए वायु, पीने के लिए पानी, खाने के लिए आहार, पहनने के लिए कपड़े, रहने के लिए मकान का होना अनिवार्य है। सुख के सीमित भौतिक साधनों का उपयोग एवं संचय गृहस्थ के लिए वर्जित नहीं हो सकता।

धर्म एवं दर्शन की सामाजिक प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि धर्म से सदाचरण की प्रेरणा प्राप्त होती है। धर्म के बोध से यह ज्ञान प्राप्त होता है कि इन्द्रियों को तृप्त करने वाला सुख एवं मानसिक शान्ति प्रदान करने वाला आचरण एकार्थक नहीं हैं। स्वार्थ एवं परार्थ एकार्थक नहीं हैं। बहिर्जगत एवं अन्तर्जगत एकार्थक नहीं हैं। भौतिक सुख एवं मानसिक शान्ति एकार्थक नहीं हैं। सामाजिक व्यक्ति को इनमें संतुलन स्थापित करना चाहिए। व्यक्ति को सफल, सम्पन्न, समृद्ध होने के साथ-साथ संतुष्ट एवं सुखी भी होना चाहिए। धर्म प्रत्येक प्राणी का मंगल करता है। इसी कारण भगवान महावीर ने धर्म को परिभाषित किया कि - ‘धम्मो मंगलमुक्किटठं’ (धर्म उत्कृष्ट मंगल है)। (दशवैकालिक, 1/ 1)

सावय धम्मकार ने सामाजिक दृष्टि से विचार करते हुए प्रतिपादित किया कि मनुष्यता का सार सुख है। सुख धर्म के अधीन है ‘सुहु सारउ मणुयत्तणहं तं सुहु धम्मायत्तु’। (सावय धम्म दोहा, 4)

हिंसा से अशान्ति एवं पाशविकता का जन्म होता है ; अहिंसा से शान्ति, सद्भावना, मानवीयता एवं सामाजिकता का। जीव वैज्ञानिक दृष्टि से तो आदमी भी एक पशु है। अहिंसा की चेतना एवं भावना के कारण उसमें मानवीय एवं सामाजिक भावना का विकास हुआ है।

आदिम युग में जब मनुष्य जंगल में रहता था तो वह पशु के समान आचरण करता था, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता था, अपनी शक्ति के बल पर सब कुछ प्राप्त कर लेना चाहता था। उस समय उसे केवल अपनी चिन्ता रहती थी। जब कोई ताकतवर आदमी दूसरे से कोई वस्तु छीन-झपट लेता था तो वह ताकतवर आदमी थोड़ी देर के लिए तो मदमस्त हो जाता था मगर अपने से अधिक ताकतवर व्यक्ति की उपस्थिति की आशंका उसे चैन से बैठने नहीं देती थी। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से आशंकित रहता था। प्रत्येक के जीवन में अनिश्चयात्मकता बनी रहती थी। किसी को किसी का विश्वास न था। प्रत्येक के मन में चिंता, घबराहट, शंका, दुबिधा एवं भय का भाव बना रहता था। इस मानसिकता में वह भागता रहता होगा, दौड़ता रहता होगा ; एक स्थान से दूसरे स्थान की खोज करता रहता होगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति मकान नहीं बना पाता, खेती नहीं कर पाता, घर नहीं बसा पाता। इस भाग-दौड़ एवं मानसिक परेशानी से जब ‘जंगली आदमी’ थक गया होगा तो उसने किसी दूसरे के साथ मिलकर साथ-साथ रहने की सोची होगी। जिस दिन दो व्यक्तियों के मध्य ‘सह-अस्तित्व’ की भावना उदित हुई उसी दिन उनके मन में प्रेम, विश्वास एवं मैत्री-भाव के बीज छिटके, सामाजिक भावना की दूब अंकुरित हुई; समाज-निर्माण की आधारशिला रखी गई। धीरे-धीरे ‘सह-अस्तित्व’ का दायरा बढ़ा। अधिक व्यक्तियों ने परस्पर मिलजुलकर एक स्थान पर साथ-साथ रहने का संकल्प लिया। स्वयं जीने के साथ ही दूसरों को भी जीने देने का भाव उत्पन्न हुआ। ऐसी स्थिति में उन्होंने एक स्थान चुना होगा। उसको खण्डों में बाँटा होगा। अलग-अलग खण्डों को अलग-अलग व्यक्तियों के लिए नियत किया होगा। प्रत्येक व्यक्ति ने अपने-अपने भूखण्ड पर झोंपड़ीनुमा आवास बनाया होगा। भू-खण्ड की सरहदों पर कँटीले झाड़ लगाकर सुरक्षा का प्रबन्ध किया होगा। फिर कृषि-उत्पादन के लिए जमीन को खेतों में बाँटा होगा तथा अपने खेतों के चारों ओर मेंड़ें बनाई होंगी। एक-दूसरे की झोंपड़ी तथा खेत पर कब्जा न करने के बारे में समझौता हुआ होगा। ऐसी ही परिस्थितियों में समाज-रचना का सूत्रपात होता है।

ज्यों-ज्यों व्यक्ति के मन में अहिंसा विकसित होती है त्यों-त्यों उसके जीवन में मानवीय एवं सामाजिक भावना का उद्रेक होता है। जब किसी व्यक्ति के हृदय में यह बात आती है कि जिस प्रकार उसे अपने प्राण प्रिय हैं उसी प्रकार दूसरों को भी अपने प्राण प्रिय होंगे, जिस प्रकार वह जीवित रहना चाहता है उसी प्रकार दूसरा भी जीवित रहना चाहता होगा, जिस प्रकार वह मरना नहीं चाहता उसी प्रकार दूसरा भी मरना नहीं चाहता होगा, उसी समय वह अहिंसा का कदम उठाता है। जब वह यह संकल्प करता है कि वह दूसरों के प्राणों का वध नहीं करेगा, तब वह अहिंसा का चरण बढ़ाता है। इस सीमा तक ‘अहिंसा’ का नकारात्मक मूल्य होता है। जब वह दूसरे की धन-दौलत, स्त्री तथा भौतिक-अभौतिक सम्पदा को छीनने, हड़पने, चुराने तथा झपटने की भावना का परित्याग करता है तब उसमें सकारात्मक अहिंसा का भाव उत्पन्न होता है। जब वह दूसरे के कष्ट, अभाव तथा पीड़ा से द्रवित होकर उन्हें दूर करने के लिए कारगर कदम उठाता है, तब उसके अन्दर के देवता का, उसकी अन्तश्चेतना का, अन्तर्निहित सद् वृत्तियों का जागरण होता है। इस प्रकार का आचरण जब किसी समाज के सदस्यों का सहज स्वभाव बन जाता है तब उन सदस्यों के व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में न केवल स्थायी शान्ति ही आती है ; सौमनस्य एवं मैत्री-भाव ‘स्थायी’ भाव बन जाते हैं।

धर्म-भावना से चेतना का शुद्धिकरण होता है, वृत्तियों का उन्नयन होता है। धर्म व्यक्ति की पाशविकता को नष्ट करके उसमें मानवीयता एवं सामाजिकता के गुणों का उद्रेक करता है। धर्म व्यक्ति को जीने की कला सिखाता है। धर्म व्यक्ति के आचरण को पवित्र एवं शुद्ध बनाता है। धर्म से सृष्टि के प्रति करुणा एवं अपनत्व की भावना उत्पन्न होती है।

मनुष्य को अपने जीवन में जो धारण करना चाहिए वही धर्म है। धर्म दिखावा नहीं, रूढि़ नहीं, प्रदर्शन नहीं, किसी के प्रति घृणा नहीं, मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव नहीं अपितु मनुष्य में मानवीयता के गुणों की विकास शक्ति है, सार्वभौम चेतना का सत्-संकल्प है। अपनी सम्पूर्णता में, समग्रता में, यथार्थता में ‘धर्म’ को टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता, उसे खण्डों में नहीं तोड़ा जा सकता। धर्म एक समग्र सत्य-साधना है। संसार के किसी भी मनुष्य को अच्छा मनुष्य बनने के लिए, श्रेष्ठ सामाजिक व्यक्ति बनने के लिए जिन आदर्शों तथा जीवन-मूल्यों को अपने जीवन में धारण करना है, अपने आचरण में उतारना है - वही धर्म है।

धारण करने योग्य क्या है ? क्या हिंसा, क्रूरता, कठोरता, अपवित्रता, अहंकार, क्रोध, असत्य, असंयम, व्यभिचार, परिग्रह आदि विकार धारण करने योग्य हैं ? यदि संसार का प्रत्येक व्यक्ति हिंसक हो जाए तो यह संसार चार दिन भी नहीं चल सकता और न इसका अस्तित्व ही कायम रह सकता है। यदि समाज के सभी सदस्य झूठ बोलने लगें तो इसका परिणाम क्या होगा ? समाज के सदस्यों में परस्पर विश्वास-भाव समाप्त हो जायेगा। यदि समाज के सभी व्यक्ति यौन-मर्यादा के सामाजिक अथवा नैतिक बन्धनों को तोड़ दें तो उस स्थिति में क्या परिवार की कल्पना की जा सकेगी, सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना हो सकेगी ? यदि सभी व्यक्ति असंयमी, परिग्रही एवं व्याभिचारी हो जायेंगे तो इसकी परिणति क्या होगी ? इन्द्रिय भोगों की तृप्ति असंख्य भोग-सामग्रियों के निर्बाध सेवन एवं संयम-शून्य कामाचार से सम्भव नहीं है।

अहिंसा का आधार अपरिग्रह है तथा अपरिग्रह का आधार संयम है। जब व्यक्ति अपने को नियंत्रित एवं अनुशासित करता है, सामाजिक नियमों का पालन करता है, दायित्व-बोध की दृष्टि से जीवन व्यतीत करता है तभी उसके अधिकार तथा उसकी स्वतन्त्रता कायम रह पाते हैं। जब व्यक्ति भौतिक वस्तुओं के संग्रह एवं परिग्रह का संयमन करता है तभी आर्थिक विषमताओं का अन्तर कम होता है तथा उत्पादित वस्तुएँ समाज की प्रत्येक इकाई तक पहुँच पाती हैं, प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत तथा आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो पाती है।

हमारी कामनाओं को नियंत्रित करने की शक्ति या तो धर्म में होती है या फिर शासन-व्यवस्था में। व्यक्ति अपनी चेतना के द्वारा अपने को अनुशासित करता है। जब समाज के सदस्यों में यह अनुशासन नहीं रह जाता तो व्यवस्था बनाये रखने के लिए राज्य-शक्ति निर्ममता के साथ कठोर दण्ड-व्यवस्था लागू करती है। धर्म-भावना से प्रेरित होकर व्यक्ति आत्मानुशासन करता है। शासन के द्वारा विधि-विधानों तथा दंड-प्रक्रिया द्वारा व्यक्तियों पर लगाम लगायी जाती है। जिस समाज के व्यक्ति धर्म-चेतना से प्रेरित होकर आचरण करते हैं वहाँ शासन व्यवस्था की जकड़न कमजोर हो जाती है। उस स्थिति में व्यक्ति अधिक स्वतन्त्र, निर्भय एवं परस्पर सद्भावपूर्ण वातावरण में जीवन जीता है। जो धारण करने योग्य नहीं है, उन्हीं को जब समाज के व्यक्ति अपने आचरण का अंग बना लेते हैं तब राज्य की शक्ति व्यवस्था अधिक उग्र, कठोर एवं निर्मम हो जाती है। ऐसे समाज में केन्द्रीकृत अथवा व्यक्ति-विशेष की निरंकुश सत्ता एवं तानाशाही स्थापित हो जाती है। हमारे सामाजिक जीवन की स्वतन्त्रता, समता तथा पारस्परिक प्रेम, सद्भाव एवं विश्वासपूर्ण व्यवहार के लिए धर्म का पालन एक अनिवार्य शर्त है।

जैन धर्म में पर्यूषण पर्व के अंतर्गत दस दिन धर्म के 10 लक्षणों के चिंतन, मनन एवं पालन करने का विधान है। इसके अनन्तर संसार के प्राणी मात्र से विगत वर्ष में जाने अनजाने मन, वचन अथवा कर्म से अपने ऐसे कृत्यों के लिए क्षमा याचना करने के निर्देश हैं जिनके कारण उन प्राणियों के मन को आघात पहुँचा हो। यह अपने अहंकार को निर्मूल करने एवं मैत्री भाव के पल्लवन करने की प्रक्रिया है, विधि है, अनुष्ठान है।आत्मा का सहज स्वभाव ही उसका धर्म है। राग-द्वेष रहित आत्मा का सहज स्वभाव क्षमा, मार्दव, आर्जव,सत्य,शौच,संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य है। धर्म के इन 10 लक्षणों की सामाजिक प्रासंगिकता भी है। ये सभी अहिंसा परम-धर्म के पोषक धर्म हैं। क्या अहिंसक व्यक्ति किसी पर क्रोध कर सकता है ? क्षमा उसका सहज स्वभाव हो जाता है। जिसके मन में सृष्टि के कण-कण के प्रति प्रेम एवं करुणा है क्या वह किसी पर क्रोध कर सकता है ? जो सभी जीवो पर मैत्रीभाव रखता है वह क्या किसी की हिंसा कर सकता है ? विश्लेषण पद्धति की दृष्टि से धर्म के सामान्य लक्षणों, अंगों,विधियों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है:

धर्मभाव = सद्गुणों का वरण ।

अधर्ममाव = दुर्गुणों में आसक्ति

1. क्षमा

1. क्रोध / वैर / द्वेष

2. मार्दव/विनम्रता/करूणा एवं विनयशीलता

2. अहंकार / गर्व / मान / मद

3. आर्जव / निष्कपटता / हृदय की शुद्धता शुद्धता /आत्म संशोधन / मन, वाणी एवं कर्म की एकरूपता

3. माया / कपटता / कुटिलता / मिथ्यात्व

4. सत्य/सत्य-आचरण

4.झूठ बोलना / दुर्वचन / मिथ्या व्यवहार

5. शौच/ आत्मशुद्धि / पवित्रता

5. लोभ / बंधन / मल / भोगों में रत रहना।

6. संयम / अप्रमाद / आत्म- संयम

6. इन्द्रिय लोलुपता / प्रमाद

7. तप / मनोनिग्रह / अन्तःकरण की पवित्रता

7. वासनायें / कषाय / कलमषताएँ

8. त्याग / दान करना / परिग्रहों का त्याग / अनासक्ति

8. संग्रह / तृष्णा / आसक्ति

9. आकिंचन्य / अपरिग्रह वृत्ति / पदार्थों के प्रति अनासक्ति

9. पदार्थों के प्रति आसक्ति / ममत्व एवं मन का अहंकार / परिग्रह वृत्ति

10. ब्रह्मचर्य / कामवासना पर विजय / / कामभाव का संयमीकरण

10. कामाचार/विषय वासनाओं में लीन होना/ इंद्रियों की चंचलता

प्रस्तुत पुस्तक में इन दश लक्षण धर्मों का विवेचन प्राणी मात्र के कल्याण तथा सामाजिक सद्भाव एवं सामरस्य के विशेष संदर्भ में करने का विनम्र प्रयास है।

(प्रोफेसर महावीर सरन जैन)

क्षमावाणी पर्व, दिनांक 20 सितम्बर, 2013

1. क्षमा

सामाजिक जीवन में राग के कारण लोभ एवं काम की तथा द्वेष के कारण क्रोध एवं बैर की वृत्तियों का संचार होता है। क्रोध के कारण संघर्ष एवं कलह का वातावरण बनता है। क्रोध में अंहकार एक उर्वरक का काम करता है। इस दृष्टि से क्रोध एवं अंहकार एक दूसरे के पूरक हैं। अहंकार से क्रोध उपजता है तथा क्रोध का अहंकार के कारण विकास होता है। क्रोधी मनुष्य तप्त लौह पिंड के समान अंदर ही अंदर दहकता एवं जलता रहता है। उसकी मानसिक शान्ति नष्ट हो जाती है। विवेकपूर्ण कार्य करने की स्थिति समाप्त हो जाती है। क्रोध के कारण कोई व्यक्ति दूसरे का उतना अहित नहीं कर पाता जितना अहित वह स्वयं अपना कर लेता है।

अहंकार से प्रेरित होकर व्यक्ति अपने को सब कुछ समझने लगता है। वह यह समझता है कि उसके पास इतनी शक्ति है कि वह दूसरों को नष्ट कर सकता है। उसमें अपने आपको बड़ा मानने तथा दूसरों को अपने से छोटा समझने की चेतना विकसित होती है। वह सोचता है कि दूसरे व्यक्तियों का अस्तित्व और विकास उसकी इच्छा पर निर्भर है। वह स्वामी है, दूसरे सेवक हैं। वह टुकड़े बाँटता है, दूसरे उसके टुकड़ों पर पलते हैं। इसी अहंकार के कारण वह समाज के सदस्यों से यह अपेक्षा करने लगता है कि सब उसके ही इशारों पर चलें, सब उसके स्वार्थ की सिद्धि में सहायक हों। जब कोई व्यक्ति स्वतन्त्र निर्णय लेकर अपनी मर्जी से चलना चाहता है अथवा उसके स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता तो वह आहत हो उठता है और उसका क्रोध जाग जाता है।

क्रोध में विनय तथा समता की भावना नष्ट हो जाती है। समता की भावना का विकास होने पर अहंकार उत्पन्न नहीं होता तथा क्रोध का पौधा मुरझाने लगता है। इसका कारण यह है कि आत्मतुल्यता की चेतना से सम्पन्न व्यक्ति दूसरों के व्यवहार तथा आचरण से व्यक्तिगत-धरातल पर अशांति का अनुभव नहीं करता।

यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या क्रोध सर्वथा त्याज्य है? क्या समाज की व्यवस्था तोड़ने वाले व्यक्ति पर क्रोध नहीं करना चाहिए? व्यवस्था बनाये रखना वाले अधिकारी को क्या क्रोध नहीं करना चाहिए ? यदि अधिकारी अपराधी पर क्रोध नहीं करेगा तो सामाजिक व्यवस्था कैसे कायम रह सकती है। अपराधी को यदि समुचित दण्ड नहीं मिलेगा तो समाज में अपराध बढ़ते जायेंगे और सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। सामाजिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए उचित दण्ड प्रणाली अनिवार्य है। अन्यायी एवं अनाचारी को सबक सिखाने के लिए कभी कभी उसे मृत्यु दण्ड भी मिलना चाहिए। ऐसे लोगों के प्रति यदि कोई समाज अपना आक्रोश व्यक्त करता है तो इसका स्वागत करना चाहिए। एक ओर आक्रोश और दूसरी ओर क्षमा के महत्व का प्रतिपादन। क्या ये परस्पर विरोधी नहीं हैं। उत्तर है – नहीं।

अन्याय एवं अनाचार के प्रति आक्रोश करना एक बात है तथा अहंकार के कारण क्रोधित होना दूसरी बात है। समाज की व्यवस्था एवं नियम के विपरीत आचरण करने वाले व्यक्ति पर सामाजिक न्याय की भावना के कारण क्रोधित होने वाली मानसिकता में तथा अहंकार की भावना से उत्पन्न क्रोध की मानसिकता में अन्तर होता है, वे भिन्न होती हैं। अपने सामाजिक जीवन के दायित्व-बोध के आधार पर आचरण करने तथा क्रोध एवं अहंकार के वशीभूत आचरण करने में अन्तर है। अहंकार से क्रोधित व्यक्ति जब किसी का विनाश करना चाहता है तब वह अपना विवेक खो देता है। जब कोई व्यक्ति सामाजिक भावना से प्रेरित होकर सामाजिक विकास में बाधक बनने वाले असामाजिक एवं दुष्ट व्यक्तियों का दमन करता है तो वह अपने विवेक को कायम रखता है। वह दुष्ट व्यक्तियों का दमन इसलिए करता है जिससे सामाजिक व्यवस्था कायम रह सके। उसके मन में दुष्ट व्यक्ति को सुधारने का संकल्प होता है, उसके अस्तित्व को मिटा देने का नहीं। वह प्रतिकार इसलिए नहीं करता क्योंकि किसी के द्वारा उसका अपमान हुआ है, अपितु उसके ही सुधार एवं कल्याण के लिए वह सामाजिक दृष्टि से अन्याय करने वाले व्यक्ति का प्रतिरोध करता है।

क्रोध के अभ्यास से व्यक्ति का विवेक नष्ट हो जाता है। क्रोध से अन्धा व्यक्ति सत्य, शील एवं विनय का विनाश कर डालता है। किसी ने उसका अहित किया है या कोई उसका अहित करना चाहता है इसके अनुमान मात्र के आधार पर वह तत्क्षण क्रोधित हो जाता है। इस प्रकार सोच समझकर कार्य करने की प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। इसके कारण द्वेष भाव का विकास एवं विस्तार होता है। सम्पूर्ण जगत को वह अपना शत्रु समझने लगता है। उसके जीवन दर्शन विध्वंसात्मक हो जाता है। संघर्ष, तोड़-फोड़, विनाश, हत्या आदि उसका जीवन की प्रवृत्तियाँ हो जाती हैं। इस प्रकार जब क्रोध का विकास होता है, विस्तार होता है तो व्यक्ति की सम्पूर्ण मानवीयता एवं सामाजिकता नष्ट हो जाती है। इस स्थिति पर यदि नियन्त्रण नहीं हो पाता तो उसके अपराधी बन जाने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

गीता में कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि क्रोध से अविवेक एवं मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है तथा बुद्धि के नाश हो जाने से आदमी कही का नहीं रह जाता:

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।। ( गीता, 2/ 63)

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं, अन्याय का प्रतिकार करने के लिए बार-बार कहते हैं किन्तु दूसरी तरफ युद्ध में कूद जाने की प्रेरणा देनेवाले श्रीकृष्ण क्रोध से बचने के लिए सर्वत्र सावधान करते हैं। गहराई से विचार करने पर इस प्रतीयमान अंतर्विरोध का रहस्य इस तथ्य में निहित है कि लोकमंगल की साधना के लिए अन्याय का प्रतिकार करने तथा क्रोधित होकर दूसरे का नाश करने के लिए तत्पर होने में बहुत अन्तर है।

क्रोध का विरोधी भाव क्षमा है। क्षमा, ‘क्षम्’ धातु से बना है। इसके दो मुख्य अर्थ हैं। एक अर्थ में क्षमा का अर्थ है धैर्य,सहनशीलता एवं विनम्रता। दूसरे अर्थ में क्षमा सामर्थ्य वाचक है- सहने योग्य होना अर्थात् पर्याप्त सक्षम होना।

क्षमाशील व्यक्ति धैर्यवान होता है, विनम्र होता है एवं अत्यन्त सहनशील होता है। क्षमा कायरता नहीं है। क्षमाशील व्यक्ति समर्थ एवं सक्षम होता है। दुःख पहुँचाने वाले व्यक्ति को वह प्रताड़ित कर सकता है किन्तु अपनी क्षमावृत्ति के कारण वह उस दुःख को सहन करता है, विनम्र रहता है। वह क्रोध को शान्ति के साथ जीतता है। ‘ऐसा व्यक्ति कम्प रहित होकर क्रोधादि कषाय को नष्ट कर देता है - ‘विगिंच कोहं अविकंपमाणे’ (आचारांग, 4/ 3/ 135)

सामाजिक जीवन में हम कभी-कभी अज्ञानवश यह समझ बैठते हैं कि अमुक व्यक्ति के कारण हमारा अहित हुआ है। यदि हम तत्क्षण क्रोधित नहीं हो जाते अपितु धैर्य, संयम तथा शान्ति के साथ विवेकपूर्वक स्थितियों का विश्लेषण करते हैं तो बहुधा हमारे मन की भ्रांतियाँ दूर हो जाती हैं, स्थितियाँ स्पष्ट हो जाती हैं। हमारी असफलता का कारण अनेक बार हमारी अपनी ही कमजोरी होती है। यदि किसी व्यक्ति ने किसी कारणवश या अकारण ही हमारा अहित कर भी दिया है तो हमें पहले पूरी परिस्थितियों से परिचित होना चाहिए तथा हमको उस व्यक्ति के साथ धैर्यपूर्वक बातें करनी चाहिए। अपना पक्ष उसके सामने प्रस्तुत कर उसके पक्ष एवं दृष्टि से अवगत होना चाहिए। ऐसा करने पर वह व्यक्ति या तो आत्मग्लानि का अनुभव करता है अथवा उन परिस्थितियों को स्पष्ट कर देता है जिसके कारण उसने हमारा अहित किया।

क्षमा का पालने करने वाला व्यक्ति यदि कभी अन्याय का विरोध करता भी है तो भी उसका मार्ग क्रोध का मार्ग नहीं होता। अपने मन में इसी कारण वह किसी के प्रति कभी बैर नहीं बाँधता। इस प्रकार यदि उसे दुष्टता एवं अन्याय का प्रतिरोध करना पड़ता है तो भी उसके मन में किसी के प्रति शत्रुता का भाव उत्पन्न नहीं होता। यदि कभी कहीं शत्रुभाव उत्पन्न हो भी जाता है तो भी वह अपनी क्षमा वृत्ति के कारण उस भाव का शमन कर लेता है। इसी कारण गौतम बुद्ध ने कहा, ‘उसने मुझे गाली दी, उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया, उसने मुझे लूटा, इस प्रकार की बातों को जो व्यक्ति गाँठ बाँधकर नहीं रखते उनका बैर शान्त हो जाता है-

अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे।

ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति।।(धम्मपद,1/ 4)

इस प्रकार क्रोध मन की गाँठों को बाँधता है, प्रतिकार की भावना, कठोरता, दयाहीनता एवं हिंसा आदि प्रवृत्तियों को विकसित करता है। क्षमा मन की गाँठों को खोलती है तथा दया, सहानुभूति, सन्तोष, उदारता, प्रेम, मानशून्यता एवं वैराग्य की प्रवृत्तियों को विकसित करती है। सहनशक्ति क्षमा की धुरी है। आधुनिक युग में भारत में अरविन्द ने इसका आख्यान किया तथा गांधीजी ने सामाजिक जीवन में इसका प्रयोग किया। अरविन्द ने सविनय-अवज्ञा-आन्दोलन के सन्दर्भ में कहा-‘दमन की वेदनाओं को सहन करो।’ अहिंसा की शक्ति का प्रतिपादन करते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि सच्ची अहिंसा भय से नहीं, प्रेम से जन्म लेती है ; निःसहायता से नहीं, सामर्थ्य से उत्पन्न होती है। जिस सहिष्णुता में क्रोध नहीं, द्वेष नहीं, निःसहायता का भाव नहीं, उसके समक्ष बड़ी से बड़ी शक्तियों को भी झुकना पड़ेगा।

क्षमा की कई कोटियाँ, अनेक रूप एवं प्रकार हैं। ‘उत्तम क्षमा’ मन की सहज प्रवृत्ति है। जब हम व्यक्तिगत रागद्वेष की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं तथा संसार के सभी प्राणियों के प्रति मैत्री-भाव एवं आत्म-तुल्यता की प्रतीति करने लगते हैं तो क्षमा का भाव हमारे जीवन का सहज अंग बन जाता है। मध्य कोटि की क्षमा वह होती है जहाँ हम आत्मतुल्यता की भावना से प्रेरित होकर नहीं अपितु उपेक्षा-भाव से प्रेरित होकर दूसरों को क्षमा करते हैं। जब हम मन की सहज भावना से नहीं अपितु किसी स्वार्थ से प्रेरित होकर अथवा भय की भावना के कारण क्षमा का प्रदर्शन करते हैं अथवा क्रोधित नहीं होते तो इस प्रकार की क्षमा अधम कोटि की क्षमा है। वस्तुतः यह क्षमा नहीं, कायरता है।

हमें यह प्रयास करना होगा जिससे क्षमा की वृत्ति हमारी मानसिकता का एक अभिन्न अंग बन सके। क्षमा वृत्ति के विकास में जैन दर्शन की प्रांसगिकता उल्लेखनीय है। जैन दर्शन यह स्वीकार करता है कि प्रत्येक द्रव्य स्वतन्त्र है, उसके गुण और पर्याय भी स्वतन्त्र हैं। विवक्षित किसी एक द्रव्य तथा उसके गुणों एवं पर्यायों का अन्य द्रव्य या उसके गुणों और पर्यायों के साथ कोई अभिन्न सम्बन्ध नहीं है। प्राणीमात्र आत्मतुल्य है। स्वरूप की दृष्टि से सभी आत्माएँ समान हैं। अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक आत्मा स्वतन्त्र है। प्रत्येक जीव अपने ही कारण से संसारी बना है और अपने ही कारण से मुक्त होगा। आत्मा अपने स्वयं के उपार्जित कर्मो से बँधती है। आत्मा का दुःख स्वकृत है। व्यक्ति अपने ही प्रयास से उच्चतम विकास भी कर सकता है। आत्मा सर्व कर्मो का नाश कर सिद्ध पद प्राप्त करने की क्षमता रखती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने ही बल पर उच्चतम विकास कर सकता है। प्रत्येक आत्मा अपने बल पर परमात्मा बन सकती है। अपने विकास में तत्त्वतः कोई दूसरा बाधक नहीं हो सकता। हमारे कर्म ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। इस प्रकार के बोध एवं ज्ञान के कारण हमारे मन में प्रत्येक प्राणी के प्रति क्षमा का भाव सहज ही विकसित हो जाता है।

सामाजिक जीवन के लिए क्षमावृत्ति अनिवार्य है। क्रोध से क्रोध उपजता है। यह चक्र सामाजिक सापेक्षता की भावना को समाप्त कर देता है। सामाजिक सद्भाव एवं पारस्परिक बन्धुत्व की भावना के लिए क्षमावृत्ति अनिवार्य है। इससे व्यक्ति धार्मिक बनता है, शान्त-चित एवं विवेकशील होकर विचार करने एवं कार्य करने में समर्थ होता है। क्षमा याचना के आधार पर वह समाज के अन्य सदस्यों के प्रति अपनी प्रेम-भावना का विकास करता है, उसके जीवन में आस्था और विश्वास का संचार होता है, आत्मतुल्यता की दृष्टि का विस्तार होता है।

खामेमि सव्वेजीवा, सव्वे जीवा खमन्तु मे।

मेत्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ।।

( मैं समस्त जीवों से क्षमा याचना करता हूँ।

समस्त जीव मुझे क्षमा प्रदान करने की अनुकम्पा करें।

मेरी समस्त जीवों के प्रति मैत्री है।

मेरा किसी के प्रति वैर-भाव नहीं है।

सव्वस्स जीवरासिस्स, भावओ धम्मनिहिअचित्तो।

सव्वे खमावइत्ता, खमामि सव्वस्स अहयं पि।।

धर्म में स्थिर चित्त होकर मैं भावपूर्ण समस्त जीवों से अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करता हूँ और उनके समस्त अपराधों को मैं भी क्षमा करता हूँ।

- क्रमशः अगले अध्याय में जारी...

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