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कीर्ति सिंह की कबाड़ से जुगाड़ कलाकृतियाँ

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कीर्ति सिंह मोटर-वाहनों के पुराने कलपुर्जों को कबाड़ से खरीद लाते हैं और उन्हें तराश कर कलाकृतियों का रूप देते हैं. बेहद आकर्षक और प्रभावी कला-कृतियाँ. आप भी देखें और प्रेरणा लें. अपने आसपास के कबाड़ से कलाकृतियाँ बनाने के लिए!

डॉ. शेख अफरोज फातेमा का आलेख - भारतीय समाज व्यवस्था का अंग - अस्पृश्यता और हिंदी दलित लेखन

भारतीय संस्कृति दुनिया के महान संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। ऐसी महान संस्कृति में अस्पृश्यता एक कलंक के रूप में हैं। भारतीय वर्ण व्यवस्था में चतुर्थ वर्ण को शूद्र कहा गया है। इस वर्ण पर सदियों से जुल्म ढाए जा रहे हैं। आधुनिक युग में अनेक नेताओं और समाज सेवियों ने इस अस्पृश्यता को मिटाने के लिए एड़ी-चोटी के प्रयत्न किये हैं
महात्मा गांधी अस्पृश्यता मिटाना चाहते थे। उन्होंने भारतीय समाज पर लगे इस कलंक को मिटाने के लिए बहुत से प्रयास किए। म. गांधी के अनुसार, ‘‘हिंदू धर्म में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं है। अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर लगा एक कलंक है। यदि यह अस्पृश्यता प्रथा न गई तो हिंदू समाज और हिंदू धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।’’१
भारत जैसे विशाल देश में जहाँ सदियों से प्रेम, शांति, अमन, मानवता, सद्भावना जैसे शब्द को ठोस गरिमा है। विश्व के महान शांति प्रसारक और महान पृष्ठभूमि वाले देश में दलितों को लेकर यह व्यवहार ? जब कि सभी मानव एक समान हैं। आदमी की पहचान उसके कर्म से, ज्ञान से विद्ववत्ता से होनी चाहिए न की उसकी जाति से। इसलिए कबीर ने कहा है -
        ‘‘जाति न पूछो साधु की, प…

उमेश गुप्ता के व्यंग्य

// उफान //        हमारे देश में हर चीज उफान पर है। मंहगाई तूफान पर है। रूपये की अंतर्राष्ट्रीय कीमत चढान पर है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें खौल रही हैं। खाने की वस्तु जला रही हैं। दूध, खाद्य तेल उबाल पर हैं। इन सब तूफानों के बीच देश का आम गरीब आदमी अपनी नैया पार करने की कोशिश कर रहा है।
        देश में न्याय, शिक्षा, आहार, आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं मंहगी हैं।  शिक्षा पर मंहगाई का ग्रहण लगा है। लाखों रूपये आवश्यक कोर्स की कीमत है। अस्पताल के बिल, फाईव स्टार होटल के, केश मेमो की याद दिलाते हैं। दबाओं की कीमतें उफान पर हैं। जल, जंगल, जमीन की कीमतें, बिजली के बिल की तरह करंट मारती है। एक आम वेतनभोगी के जिन्दगी भर के वेतन से ज्यादा अर्फोडेबल हाउस की कीमत है।
        देश में अश्लीलता उफान पर है। सिनेमा, टी.व्ही सीरियल, चैनल, अश्लीलता, अंधविश्वास हमारे बेडरूम और डायनिंग टेबिल पर परोस रहे हैं। दिन में जो चैनल अंधविश्वास, भूतप्रेत, तंत्र-मंत्र जादू टोना का विरोध करते हैं वहीं रात में लाखों करोडों रूपये का विज्ञापन प्रचार प्रसार में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। वे ढोंगी, पाखंडी, बाबाओं के निर्मल दर्शन…

लता सुमन्त की कहानी - इस बार हो आती हूँ

खाना खाने के कुछ देर बाद अम्मा अपने कमरे में जाकर लेट गईं। श्यामा रसोई में व्यस्त थी। खाने के पश्चात कुछ चीजें निकालकर रखने तथा बरतन खाली करने में लगी थी। वहीं अम्मा की आवाज सुनाई दी-श्यामा जी,अम्मा आई। श्यामा उनके कमरे की ओर चल दी। बेटी, इस बार मेरी जाने की इच्छा नहीं है। अपने आप को अस्वस्थ महसूस करती अम्माजी की ओर देखते हुए श्यामा ने कहा -कोई बात नहीं अम्मा , अगर आप जान नहीं चाहती तो मत जाइये । हम जीजाजी को फोन कर देंगे कि आप नहीं आना चाहती। शिवांग आपसे कुछ नहीं कहेंगे। अम्माजी को चिन्ता थी कि कहीं शिवांग ऐसा न कह दे कि अब कुछ नहीं होगा और मना करना भी उचित नहीं है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ ही देर में अम्माजी आश्वस्त हो गईं और कब उनकी आँख खुद उन्हें भी पता नहीं चला। पन्दह मिनिट के बाद जब उनकी आँख खुली तो इतनी तरोताजा लग रही थीं जैसे कुछ हुआ ही न हो । कहने लगी -श्यामा , मैं सोच रही थी इस बार हो आती हूँ। दामादजी ने रिजवेशन कराया है तो उन्हें मना भी कैसे करुँ?एक तो वे मुझे लेने आए हैं और मैं ही मना कर दूँ। ठीक नहीं लगता। अम्मा ने जाने की तैयारी तो पहले ही कर ली थी। बेटी के घर जो जाना थ…

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 5 - शौच

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5. शौच शौच का अर्थ है- शुचिता, शुद्धता, स्वच्छता, पवित्रता एवं निर्मलता। शौच का अर्थ शरीर के धरातल पर ‘स्वच्छता’, मन के धरातल पर ‘पवित्रता’ तथा आध्यात्मिक धरातल पर ‘आत्मशुद्धि’ है। कर्मबन्धनों से रहित परम चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार ही आन्तरिक शौच है। आत्मा का मूल स्वभाव शौच है। आत्मा का सहज स्वभाव शुद्ध चैतन्य मात्र है। चैतन्य स्वभाव का अनुसरण करने वाले आत्मा के परिणाम को उपयोग कहते है। ‘अज्ञानी जीव राग आदि के बन्धन के कारण ज्ञान की उपासना नहीं करता। आत्मा और शरीर में एकता की कल्पना के कारण रागद्वेषों की तथा अन्याय विकल्पों की पूजा करता है।’ वेदान्त भी यह प्रतिपादन करता है कि शौच आत्मा का स्वाभाविक गुण है। अशौच के कारण ही आत्मा भव-बन्धन में पड़ती है। मल ही बन्धन का कारण है। शैव तान्त्रिकों के अनुसार समस्त मलों से मुक्त हो जाने पर ‘पशु’ ‘पशुपति’ बन जाता है। गीता में ज्ञान के साधनों का विवरण देते समय नौ गुणों में शौच को भी स्थान दिया गया है। (देखें- गीता, 13/ 7) व्यक्ति जब बहिर्मुखी होकर खोज करता है तो ‘अपने’ को नहीं खोज पाता। वह बाहरी साधनों में सुख की खोज करता है। उसे तात्कालिक सुख …

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 4 - सत्य

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4. सत्य आर्जव से सत्याचरण के लिए प्रेरणा मिलती है। आर्जव की नींव पर सत्य का भवन बनाया जा सकता है। निष्कपटता एवं ऋजुता से मिथ्यात्व का अन्त होता है तथा सत्याचरण की प्रवृत्ति विकसित होती है। जब व्यक्ति सत्याचरण करने लगता है तब कपट कुटिलता के द्वार बन्द हो जाते हैं। सत्य एवं ‘शौच’ का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। बिना चित्त की शुद्धि के व्यक्ति लोभ-वृत्ति को दूर नहीं कर पाता। जब तक लोभ की भावना रहती है तब तक झूठ बोलने की भी सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। हम जिन कारणों से झूठ बोलते हैं उनमें लोभ बहुत बड़ा कारण है। ‘शौच’ से हम लोभ पर विजय प्राप्त करते हैं। इस कारण शौच गुण का सत्य से गहरा सम्बन्ध है। सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्याचरण के बिना आत्मिक शुद्धि असम्भव है। इस कारण सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्य को अंगीकार किये बिना आत्मा का उद्धार असम्भव है। इसी कारण कहा गया है कि आत्मार्थी साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालतारहित तथा किसी को भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलनी चाहिए। चुभे हुए लौह कंटक का दुःख घड़ी दो घड़ी का होता है। वह काँटा निकालने पर सरलत…

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 3 - आर्जव

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3. आर्जवमार्दव से आर्जव का परिपाक होता है। विनम्रता से सरलता आती है तथा सरलता से निष्कपटता की वृत्ति विकसित होती है। सरलता से अपने दोषों की आलोचना करनेवाला व्यक्ति माया एवं मद से मुक्त हो जाता है। आर्जव के विरोधी भाव माया, छल, कपट एवं कुटिलता हैं। जिस व्यक्ति के हृदय में कपट एवं कुटिलता होती है उसकी दृष्टि आविष्ट, आविल एवं मलिन होती है। उसका जीवन कृत्रिम एवं असामाजिक बन जाता है। माया के कारण वह यह नहीं समझ पाता कि ऋजु क्या है और कृत्रिम क्या है; कपट क्या है और निष्कपट क्या है? इस कारण माया से सौभाग्य का प्रतिघात होता है। छल एवं कपट से दुर्गुणों को प्रश्रय मिलता है। हमारा व्यक्तित्व कुंठाग्रस्त हो जाता है। छल एवं कपट का जिस व्यक्ति के जीवन में जितना प्राबल्य होगा उसके चेतन एवं अचेतन मन की भावना का अन्तर उतना ही अधिक होगा। ऐसे व्यक्ति की स्मरण-शक्ति, कल्पना, चित्त की एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति दुर्बल होती जाती हैं। मानसिक ग्रन्थियाँ दृढ़तर होती जाती हैं। उसमें न तो चरित्र बल रह जाता है और न व्यक्तित्व की पवित्रता। कपट के कारण व्यक्ति खुल नहीं पाता, अचेतन मन की खोज करके प्रत्येक प्रकार के द…

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 2 - मार्दव

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2. मार्दव ‘क्षमा’ के परिपाक एवं विकास के लिए ‘मार्दव’ का महत्व है। किसी पर क्रोध न करना ही पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यक्ति के लिए यह भी आवश्यक है कि वह ‘अहंकार’ का परित्याग कर, दूसरों के प्रति विनम्रता के साथ मृदुता का आचरण करे। अहंकारहीन एवं मृदु व्यवहार करने वाले व्यक्ति के चित में क्रोध भाव उत्पन्न होने की सम्भावनाएँ क्षीण होती जाती हैं। समाज के एक कार्यकारी सदस्य के रूप में व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह भद्र एवं सभ्य व्यक्ति के रूप में व्यवहार करे ; अहंकार का त्याग कर मृदुता का व्यवहार करे जिससे दूसरों के मन को पीड़ा न पहुँचे। व्यक्ति को समाज निरपेक्ष स्थिति में व्यक्तिगत साधना के धरातल पर भी अपने अहंकार का विसर्जन करना होता है। हृदय की कठोरता एवं क्रूरता को छोड़े बिना व्यक्ति का चित्त धार्मिक नहीं हो सकता। कारण यह है कि अध्यात्म-यात्रा की सबसे बड़ी रुकावट ‘मैं’ की है। भगवान महावीर ने कहा है कि जिसे तू मारना चाहता है वह तू ही है, जिसे तू शासित करना चाहता है, वह तू ही है, जिसे तू परिताप देना चाहता है, वह तू ही है। (आचारांग, 5/ 5) ‘मार्दव’ की कई अर्थ छायाएँ एवं स्तर हैं। ए…

श्याम गुप्त का आलेख : अगीत साहित्य के अलख-निरंजन –डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’

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अगीत साहित्य के अलख-निरंजनडा रंगनाथ मिश्र सत्य                   ( डा श्याम गुप्त ) हिन्दी साहित्य-जगत में अगीत-विधा, संतुलित कहानी एवं संघीय समीक्षा पद्धति आदि विधाओं के प्रवर्तन द्वारा अपनी अलग से एक विशिष्ट पहचान बनाने वाले डा.रंगनाथ मिश्र जी ‘सत्य-पथ के पाथेय’ हैं आपने अपना उपनाम ही सत्य रख लिया है। अपने नामानुसार ही वे बहुरंगी व्यक्तित्व व बहु-विधायी साहित्यकार तो हैं ही, बहु-नामी शख्शियत भी हैं। भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीरप्रसाद द्वेदी व निराला जी की भांति युगप्रवर्तक व अज्ञेय की भांतिप्रयोगवादी डा.सत्य के आज तक जितने नामाकरण व नामोपाधिकरण हुए हैं उतने नामों से साहित्य-जगत में शायद ही किसी को पुकारा गया हो हो सकता है कि कभी स्कूलों कालेजों में‘अ’ मानी ‘अगीत’ के साथ-साथ डा रंगनाथ के पर्यायवाची भी पढाए-पूछे जाने लगें। (रंगनाथ मिश्र सत्य)जहां पूर्व न्यायाधीश–साहित्यकार श्री रामचंद्र शुक्ल जी सत्यजी को ‘साधना का व्रती’.... ‘अदम्य संगठन कर्ता’...अनुष्ठानधर्मा व योग्यतम संचालक ..का नाम देते हैं तो गीतकार डा चक्रधर नलिन जी उन्हें ‘युग-प्रवर्तक’ व ‘प्रयोगधर्मी’ का और जंग बहादुर…

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य : मिस कॉल

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व्यंग्यमिस कॉलडॉ. रामवृक्ष सिंहमोबाइल फोन के आगमन के साथ संवाद और संदेश-संप्रेषण से जुड़ी कई नई-नई अवधारणाएं हमारे समाज में आई हैं। इनमें मिस कॉल भी एक है। मिल कॉल का आशय है, एक टेलीफोन से दूसरे टेलीफोन पर किया गया फोन, जिसका उद्देश्य यह जताना होता है कि हम आपसे बात करने के इच्छुक हैं, किन्तु उसपर जो भी खर्च आनेवाला है उसकी जुगाड़ हमारे पास न थी, न है और न होगी। हम सब जानते हैं कि मोबाइल फोन में या तो हम पहले धन अदा करके टॉक टाइम डलवाते हैं या पहले बातें कर लेते हैं और जब बिल मिलता है तो अब तक की गई बातों का बिल अदा करते हैं। लेकिन मिस कॉल करनेवाला या वाली, इनमें से किसी भी रूप में धन अदा नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि बात तो वह करे, किन्तु उसके लिए जो भी चवन्नी-अठन्नी या रुपय्या खर्च करना है, वह आप करें। इतनी रकम या तो उसके पल्ले है नहीं या वह खर्च करना नहीं चाहता। खैर...। अब सवाल यह पैदा होता है कि मिस कॉल के जवाब में कोई किसी को फोन क्यों करे? सच्ची बात तो यह है कि हममें से अधिकतर इन्सान बेहद सामाजिक प्राणी होते हैं। सामाजिक होने के साथ-साथ हमारी संवेदनाएं भी बड़ी प्रखर होती हैं। …

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 1 - क्षमा

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दशलक्षण धर्म: प्राणी मात्र का कल्याण एवं सामाजिक सौमनस्य तथा सामरस्य प्रोफेसर महावीर सरन जैन अनुक्रमभूमिका 3 - 111.क्षमा 12 - 20 2. मार्दव 21 - 31 3. आर्जव 32 - 39 4. सत्य 40 - 58 5. शौच 59 - 67 6. संयम 68 - 77 7. तप 78 - 88 8. त्याग 89 - 100 9. आकिंचन्य 101 - 114 10. ब्रह्मचर्य 115 - 131 दशलक्षण धर्म: प्राणी मात्र का कल्याण एवं सामाजिक सौमनस्य तथा सामरस्यभूमिका गृहस्थ के लिए आचरण का प्रतिमान है - अहिंसा धर्म का पालन करना। वैचारिक अहिंसा अनेकान्तवाद है; कथन शैली की अहिंसा स्याद्वाद है; आर्थिक क्षेत्र की अहिंसा परिग्रह परिमाण व्रत का पालन है। जब व्यक्ति भौतिकवादी होता है तो भौतिक पदार्थों का अधिक से अधिक परिग्रह करता है। लालसा बढ़ती जाती है। भगवान महावीर ने जाना था कि विश्व के सभी प्राणियों के लिए परिग्रह के समान दूसरा कोई जाल नहीं है। इसके कारण की विवेचना करते हुए भगवान ने कहा - ‘‘इच्छा हु आगास-समा अणंतिया (इच्छा आकाश के समान अनन्त है)। (उत्तराध्ययन 9/ 48) गृहस्थ अपरिग्रही नहीं हो सकता। गृहस्थ जीवन के लिए भौतिक पदार्थों की उपलब्धता जरूरी है। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति अनिवार…

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रचनाकार

रवि रतलामी

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