रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

2014
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

पिछले अंक 9 से जारी..

ठीक दस बजे कलेक्टर ने बैठक ली। बैठक में ज़मीन से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी- एस.डी.एम., तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी -ज़रूरी काग़ज़ात के साथ उपस्थित हुए।

कलेक्टर मंत्री से बात करने में व्यस्त है। कलेक्टर जब कुर्सी पर बैठा और सारे अधिकारियों-कर्मचारियों पर एक नज़र डालकर मुस्कुराया जैसे कह रहा हो जल्द से जल्द काम करवा लो, आज भारी व्यस्तता है, ठीक उसी वक़्त मंत्री का फ़ोन आ गया। आधे घण्टे से मोबाइल पर बात चल रही है, कलेक्टर ‘जी सर’, ‘जी सर’ जैसे सम्बोधनों से सभी बातें निपटाता जा रहा है और बीच में एस.डी.एम. से संकेत में कह चुका है कि वो कुम्हार वाला मामला है न, उसे सामने रखो। हो चुकी है चर्चा, कितनी बार करेंगे आप लोग बात। हाँ, ये कुम्हार का शपथ-पत्र है, उसने स्वेच्छा से दिया है। और लोगों का नहीं है न कुछ। कोई बात नहीं। सारी बस्ती घेरनी है, ज़मीन उनकी नहीं है, कब्जे की है, होने दो कब्जे की, अपन सब घेर लेते हैं। काग़ज़ में ये है कि सिर्फ़ कुम्हार की जगह घेरी जा रही है, ठीक है...

सभी अधिकारी-कर्मचारी विनीत भाव से सिर हिलाते जा रहे हैं। कलेक्टर बात के बीच काग़ज़ देखता जा रहा है, बार-बार पलटता जाता है, सारे अधिकारी-कर्मचारी झुके खड़े हुए एक-एक काग़ज़ दिखला रहे हैं। रह-रह कलेक्टर कुर्सी से उठ खड़ा होता है, बैठ जाता है।

कलेक्टर यकायक मुस्कुराता है। मोबाइल मेज़ पर रख देता है। सबको देखता है और कहता है- ये मंत्री काम नहीं करने देगा तभी बंगले से पत्नी का मोबाइल। कलेक्टर कान पर मोबाइल लगाकर बोला- हाय स्वीटी! यार, मीटिंग में हूँ, तीन बजे लंच पे आऊँगा, अभी आना है, यार, -अधिकारियों-कर्मचारियों को इशारा करता है कि आप लोग बैठो, मैं आया...

कलेक्टर चला गया है। चार बजने को हैं, सारे लोग इंतज़ार में हैं, कलेक्टर साहब अभी लौटे नहीं। सभी हैरान-परेशान और भूखे हैं। किसी ने दोपहर का खाना भी नहीं खाया है।

पटवारी पेशाब करने के बहाने बाहर आ गया है। कुम्हार को उसने इशारे से अपने पास बुला लिया है। बताया कि साहब कहीं चले गए हैं। जैसे ही आएँगे, तुम्हें पेश होना है। कुछ खाया या नहीं? पानी? यार, यहाँ कहाँ पानी? बाहर चाय के ठेलों पे मिलेगा, पी आओ। अपन तो हिल नहीं सकते। इधर गए उधर साहब आए तो हो गया चक्कर। इसलिए हम यहीं डटे हैं। तू जा, कुछ खा ले। समोसा खा ले। ये चिल्लर... नहीं चाहिए, कोई बात नहीं। यार, ऐसई है, ऐसी की तैसी कराना इसे ही कहते हैं। हम लोगों की तरफ़ से कोई देर नहीं, साहब बैठे और हुआ काम। कोई चक्कर ही नहीं, सारी पिक्चर साफ़ है...

कुम्हार ने जब हाथ जोड़कर झुककर कहा कि हुजूर, हम ग़रीब लोग... वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया कि पटवारी बोला- हम लोग तो तुमसे ग़रीब और परेशान हैं। तुम तो टैम पर खा-पी लेते हो, यहाँ आठ-नौ बजे से डटे हैं, अब यही देखो कि पाँच बजने को आए मीटिंग के चक्कर में चाय-पानी नसीब नहीं। ये है किस्मत। साहब कब आते हैं- भरोसा नहीं। सारे अफ़सरान अंदर बैठे हैं। मैं तो पेशाब के बहाने बाहर निकल आया। जान रहा था कि तुम बाहर होगे -लेकिन ये देख, तुम्हारे साथ के लोग, मैंने कहा था न कि कोई झँकेगा नहीं -हुआ न यही! अब बताओ, ऐसे में कौन उनके साथ खड़ा होगा। अगर खड़ा भी हो जाए कोई तो उल्टे अपमान झेलना पड़ेगा -ये मामला है! इसलिए मैंने कहा था तुम इनका चक्कर छोड़ो, अपना देखो, आगे बढ़ो, भाड़ में जाएँ सब।

अँधेरा घिरने लगा था। सब ओर बत्तियाँ जल उठीं। एक क्षण के लिए पटवारी अंदर गया, लौटा तो ख़बर दी कि कलेक्टर साहब कल मिलेंगे।

कुम्हार भारी क़दमों से घर की ओर बढ़ा।

***

दूसरा दिन भी निकल गया, साहब नहीं आए। इस तरह तीसरा-चौथा दिन भी निकल गया। दूसरा और तीसरा हफ़्ता भी निकल गया। पटवारी ने बताया कि कहीं मीटिंगों में फँसे हैं लेकिन कभी भी किसी भी वक़्त आ सकते हैं। इस तरह इंतज़ार में एक माह बीत गया। कुम्हार रोज़ आ-आकर निराश लौट जाता। अब वह परेशान हो गया है। हाथ के काम नहीं कर पा रहा है, इसलिए रोटी की दिक़्क़त आ खड़ी हुई है।

कुम्हारिन ने एक शाम चिढ़कर उससे कहा -कब आएगा जानहार? इस तरह तो हम कब तक उसको अगोरते रहेंगे? काम-दंद सब ठप्प हो गया है- अन्न एक दाना नहीं। क्या करें? ये तो अच्छा रोना आ खड़ा हुआ। हमसे तो अच्छे बच्चू, श्यामल के बाबू, परसादे हैं- हाथ का काम तो नहीं छूटा, दोनों जून की रोटी तो कमा रहे हैं।

कुम्हार गहरे अफ़सोस में है -अब क्या जवाब दे उसका?

-पटवारी का ही किया-धरा है सब! -कुम्हारिन बोली- पहले भी मुँहजले ने इतना छकाया हमें कि कई दिनों परेशान रहे, अब फिर वही नाटक! तभी साथ के लोग छिटक गए।

कुम्हार ने गहरी साँस छोड़ी -क्या करूँ बता?

-मैं क्या बताऊँ। तू सोच?

-क्या सोचूँ? कुछ समझ नहीं आता। अवध से अनबन हो गई, नहीं बड़े मियां को मंडी पहुँचा देते।

-श्यामल की माँ होती तो ज़रूर ऐसे वक़्त में मदद करती, अब वो यहाँ है भी नहीं - कुम्हारिन ने गीली आवाज़ में कहा।

सहसा बड़े मियां डुगरते दोनों के सामने आ खड़े हुए। गरदन झटकार कर वह दोनों को देखने लगे जैसे कह रहे हों कि रिश्तों में अनबन होती रहती है, कहो तो मैं अवध के पास जाऊँ और मण्डी का काम शुरू करूँ, कब तक चूल्हा नहीं जलेगा?

अनबन के बाद भी अवध के मन में कहीं यह बात गहरे में थी कि इस बखत बहन परेशानी में है, हमें उसके पास चलना चाहिए।

और यह संयोग ही था कि वह इस वक़्त बहन के झोपड़े के बाहर खड़ा बहन को हाँक लगा रहा था।

***

एक-दो माह नहीं बल्कि तीन माह हो गए, कलेक्टर साहब बैठ नहीं रहे थे। कहीं अन्यत्र व्यस्त थे। पटवारी ही था जो आस-पर-आस दिये जा रहा था। हालाँकि उसका आस देना एक झूठा खेल था- डूबते आदमी को भरोसा दे के, आवाज़ लगा के बचाने की जुगत जैसा जिसे कुम्हार अंदर से महसूस कर रहा था। वह रोज़ पटवारी से न मिलने की ठानता लेकिन सुबह होते ही पता नहीं क्या होता, वह तैयार होने लगता और उसके क़दम अपने आप उसकी तरफ़ बढ़ने लग जाते।

ऐसी ही एक सुबह जब वह तैयार होकर झोपड़े के बाहर आ खड़ा हुआ, पटवारी के पास जाने के लिए और उसके पीछे पत्नी उसका कलेवा कपड़े में बाँधकर और एक बोतल पानी उसे देने के लिए आ खड़ी हुई कि पाँच-छः लोग पास आते दिखे।

ये लोग कलेक्टर ऑफ़िस से आए थे। इनके पास कलेक्टर का आदेश था जो एक काग़ज़ में दर्ज़ था। उनमें से एक आदमी ने गोंद लगाकर आदेश को नीम पर अच्छे-से चिपका दिया।

पलभर को कुम्हार निश्चेष्ट खड़ा रह गया-उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि मामला क्या है। सहसा कुम्हारिन ने साहस बटोरकर एक आदमी से विनीत स्वर में पूछा कि भैया, यह सब क्या है?

उस आदमी ने बताया कि कलेक्टर का आदेश है कि बस्ती की सारी ज़मीन सरकारी है, लिहाजा समूची बस्ती ख़ाली कराई जाएगी। लोग अपने आप ख़ाली कर दें तो अच्छा नहीं, उन्हें यहाँ से जबरन हँकाला जाएगा... झोपड़े मकान जो भी हैं सब गिराए जाएँगे...

आगे की बात कुम्हारिन सुन न सकी। वह गश खाकर गिर पड़ी।

***

मैना उदास है और कातर-दृष्टि से सामने जो कुछ भी घट रहा है, देख रही है :

कुम्हारिन सड़क के किनारे कंकरीली ज़मीन पर अचेत-सी चित्त पड़ी है। उसे तेज़ बुखार है, बदन तप रहा है। बुखार उतारने के लिए कुम्हार ठण्डे पानी का कपड़ा उसके सिर पर रह-रह रखता जाता है। बुखार है कि उतरने का नाम नहीं ले रहा है। बढ़ता ही जाता है। सिरहाने, कुम्हार के बग़ल गोपी खड़ा है- उदास, अनमना। गोपी को कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। उसका मन बार-बार हो रहा है कि बाप से पूछे कि वह सड़क किनारे क्यों आ पड़ा हुआ है? झोपड़े में अब नहीं रह सकेगा क्या? एक दिन क्या सभी के साथ ऐसा होता है कि घर से उन्हें हँकाल दिया जाता है। और फिर बिरादरी या बस्ती के लोग जो सालों-साल साथ रहे, वे कभी साथ नहीं रह सकेंगे?- माँ को बुखार और बाप को चिंता में डूबा देख, वह कुछ पूछ नहीं पा रहा है।

जिस वक़्त कुम्हारिन ग़श खाकर गिरी थी, ठीक उसी क्षण कुम्हार के दिमाग़ पर हथौड़े जैसी चोट पड़ी थी और वह सन्न-सा रह गया था कि एक पल को उसे समझ में न आया कि क्या हो गया, फिर धीरे-धीरे चैतन्य हुआ तो एक अफ़सोस ने घेर लिया उसे। भरोसा न था कि पटवारी उसे कहीं का न छोड़ेगा! मीठी पुचकार से उसे घेरेगा और अंत में सीधे जिबह कर डालेगा! हे भगवान! क्या से क्या हो गया? किसी तरह हाड़-तोड़ मेहनत करके पेट पाल रहा था कि उसे घर-द्वार से बेदख़ल कर दिया गया। उसी की ज़मीन और उसी को उससे महरूम कर दिया गया। उसे अपनी बात रखने का मौक़ा भी नहीं दिया गया - और एकतरफ़ा फ़ैसला हो गया! कैसी नाइंसाफी है- लूट, अंधेर और ढीठपन! ऐसा तो कहीं देखा-सुना नहीं। क्या ज़माना आ गया है? किसके पास जाएँ, अपना दुख बताएँ- कौन सुनेगा? हम ग़रीब ही बचे थे लूटे-हँकाले जाने के लिए? और ऐसा क्यों किया जा रहा है? हमने तो किसी की सूत भर, ज़मीन नहीं दाबी, किसी को दबाया- सताया नहीं, उल्टे जो संभव मदद थी, की; तो क्या यह इसी का फल हमें दिया गया? ग़रीब- मेहनतक़श होने का यह ख़ामियाजा है या सीधे-सरल होने का दण्ड?

वह एक तरफ़ को गिरा पड़ा था। गोपी की चीख़-गुहार से उसे होश आया तो देखा- पत्नी ज़मीन पर अचेत पड़ी है।

दौड़कर वह पानी लाया और पत्नी के मुँह पर पानी के छींटे मारने लगा।

जब वह छींटे मार रहा था, उसी वक़्त उसके दिमाग़ में एक बवण्डर-सा उठा। उसका मन फट-सा गया। लूट लो! उजाड़ दो!! तहस-नहस कर दो जो मन में आए, कर डालो!!! इससे अलग कोई उम्मीद भी नहीं क्योंकि तुम्हारा धरम ही यही बचा है! हमें धोखा देके, कहीं का न रख के अगर तुम ख़ुश होते हो तो हो लो! लेकिन सचमुच में क्या तुम ख़ुश हो पाओगे?

कुम्हार ने सोच लिया कि वह झोपड़े में पाँव तक नहीं रक्खेगा! पटवारी भाई, बाबू, कलेक्टर साहब, ले लो, सब अपने नाम कर लो! झोपड़ा उजाड़ दो, चाक उखाड़ दो, नीम का पेड़ तहस-नहस कर दो, खेत लूट लो - जो मन आए कर दो... और ख़ुश हो जाओ...

बड़बड़ाते हुए उसने अचेत पत्नी को दोनों हाथों से उठाया और धीरे-धीरे चलता सड़क किनारे आ खड़ा हुआ। धीरे से, सम्हालकर उसने पत्नी को ज़मीन पर लिटा दिया। और सूनी आँखों चारों ओर देखने लगा, फिर आँखें मींच लीं।

क्षणभर के बाद जब उसने आँखें खोलीं- उसके मन पर तनिक बोझ न था। लम्बे समय से जिस यातना से ग़ुजर रहा था लगा जैसे उससे मुक्ति पा गया हो।

उसके मन में एक नए विचार का अंकुरण हो गया था!

थोड़ी देर बाद एक विशालकाय जेसीबी कुम्हार के झोपड़े के सामने तीखी आवाज़ करती आ खड़ी हुई- कुम्हार ने उसे देखा तक नहीं।

आस-पास ऐलानिये रिक्शे घूम रहे थे जिनके बाजुओं और सिर पर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर बँधे थे जो तेज आवाज़ में जनता से अपना घर ख़ाली करने, सामान हटा लेने और शांति बनाए रखने की गुहार लग रहे थे। यह गुहार ऐसी थी कि कान के पर्दे फट जाएँ।

कुम्हार ने कानों में उँगलियाँ घुसेड़ लीं। यह जलती आवाज़ इसलिए है कि यहाँ, सड़क किनारे भी पड़े रहने की ज़रूरत नहीं, भागो यहाँ से! भागो!!

कुम्हार ने गहरी साँस ली- हे भगवान!!!

गोपी ने कानों पर हथेलियाँ जमा लीं, फिर हटा लीं मानो कह रहा हो कि कैसी भी तीख़ी, बर्छी जैसी धारदार आवाज़ हो, वह डरने वाला नहीं, न भागने वाला!

सहसा कुम्हार पत्नी के गालों को थपथपाता, उसके कान के पास मुँह ले जाकर बुदबुदाया - कैसी तबियत है? आँख तो खोल। देख, मैं हूँ, गोपी है, देख तो सई...

पत्नी है कि ज़ोरों से बड़बड़ा उठती है- मार डाल मुझे! मार डाल! जला दो सब! फूँक डालो!

सहसा गाड़ी का शोर उठा। कुम्हार ने सामने देखा- एक लारी थी जो शोर करती, धूल उड़ाती जेसीबी के पीछे आ लगी। लारी में पुलिस के जवान भरे थे जो गाड़ी के रुकते ही नीचे उतरने लगे। पुलिस के जवान सिर पर लोहे के टोप चढ़ाए, सुरक्षा के सामानों के साथ हाथों में बड़े-बड़े लट्ठ लिए थे। जवान लट्ठ पटकते जैसे उसकी मज़बूती की जाँच कर रहे हों, जेसीबी के बग़ल खड़े हो गए। कुछ ही देर में फायरब्रिगेड की लाल रंग की चार गाड़ियाँ एक के पीछे एक शोर करती लॉरी के आस-पास आ लगीं।

सहसा सड़क की तरफ़ ज़ोरों का शोर उठा। जैसे हज़ारों की तादाद में लोग एक कण्ठ से चीखे हों। कुम्हार ने पलटकर पीछे देखा तो पचास-साठ लोगों का हुजूम चीखता-चिल्लाता ज़ोरों की आवाज़ लगाता पास आता दिखा- ये बस्ती के लोग थे। जवान, बूढ़े औरत-मर्द सभी। सबसे आगे लाल रंग की पग्गड़ बाँधे बच्चू था जो हाथ लहराता, चीख़ता चला आ रहा था।

हुजूम कुम्हार के पास आकर रुक गया। पुलिस-जेसीबी और फायरब्रिगेड की गाड़ियाँ देखकर तो लोग भड़क-से उठे। बेकाबू होने लगे। बच्चू सबको सम्हालता-सा बोला- डरने की कोई बात नहीं, भाइयो, हम वकील के पास से आए हैं। अभी हाल में हमें कोर्ट से स्टे मिल जाएगा। बस थोड़ा-सा सब्र करो। कोई कुछ नहीं कर पाएगा। अंधेर थोड़ै है!

भीड़ में से रास्ता बनाते लाठी डगडगाते बूढ़े काका कुम्हार के पास आए, बोले- काय भोला, तुम ऐसे काय पड़े हो, लुटे-पिटे! और ये परबतिया...

कुम्हार ने काका को कठोर दृष्टि से देखा जैसे कह रहा हो कि हमें कौन लूटेगा काका? और लूट के कोई खुश होता है तो हो ले!

-हम तो सोच रहे थे ऐसई थोथी बात है, लेकिन यहाँ तो संगीन मामला दीखता है- ये पुलिस-जेसीबी काहे के लाने जमा हैं... काका बोले।

-ये क्या कर लेंगे हमारा- काकी चूड़ियों से भरा हाथ लहराते ज़ोरों से चीखीं- चढ़ाओ जेसीबी। लहास गिरा दी जाएगी जानहारों की। हमारी ही ज़मीन मिली थी दफन होने को। सत्यानाश हो इनका। हम लेटे जात हैं चढ़ा दो जेसीबी, नासपीटे, हत्यारो!!!

नवयुवक जिसने पटवारी का गला मसका था, अपने मजबूत पंजों को उठाता बोला- मैं तो पटवारी को ढूँढ़ रहा हूँ। घर गया था मिला नहीं, पता नहीं कहाँ छुप गया है। मिल जाए तो सीधे ऊपर पहुँचा दूँ इन पंजों से...

श्यामल का बाबू बोला - लीला, गुड्डू बस आने ही वाले हैं, वो तो सीधे वकील के साथ कोर्ट चले गए हैं। देखते जाओ, पूरा समाज इकट्ठा हो जाएगा अभी। ले लें ये लोग ज़मीन। अपनी ज़मीन के लिए हम लोग जान दे देंगे!!!

कुम्हार के दिमाग़ में कुछ दूसरी ही बात थी। सारी बातें सुनते हुए भी वह सुन नहीं रहा था। जैसे कोई वास्ता ही न रहा हो। इस वक़्त वह सिर्फ़ यही चाह रहा था कि उसकी घरवाली ठीक हो जाए, आँखें खोल ले, उठके बैठ जाए...

सहसा उसने कुम्हारिन के गालों को थपथपाया और करुणार्द्र स्वर में बोला - कैसी तबियत है रानी? आँखें खोल, देख, गोपी है, तुझे बुला रहा है...

गोपी उसके कान से मुँह सटाता गीली आवाज़ में बोला- अम्मा आँखें तो खोलो, देखो, अपना झोपड़ा कोई नहीं लेगा, तुम मेरी बात तो मानों...

सहसा कुम्हारिन की पलकें फड़कीं। धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं। थोड़ी देर बाद वह उठकर बैठ गई।

***

कुम्हारिन को उठकर बैठता देख मैना मुस्कुराई, लेकिन तुरंत ही उदास हो गई क्योंकि सामने जो दृश्य था वह बहुत ही भयानक था। अपना हक़ माँगती जनता के ख़िलाफ़ पुलिस किसी भी क्षण बेरहमी पर उतर सकती थी।

पुलिस ने कँटीले तारों की बाड़ लगा दी थी। तारों के पीछे लट्ठ और संगीने लिए पुलिस के जवान थे। उनके पीछे फायरब्रिगेड की गाड़ियाँ थीं और उसके पीछे दैत्य का-सा पंजा उठाये जेसीबी मशीन। इस तरफ़ अपने हक ़की गुहार लगाते बस्ती के लोग थे जिनके हाथों में अत्याचार बंद करो, हमारी ज़मीन मुक्त करो, के नारों की पट्टियाँ थीं। लोग ऐसे चीख़ रहे थे मानो हक़ के लिए अपनी जान तक दे देंगे।

पुलिस का एक अफ़सर एक छोटे-से लाउडस्पीकर के चोगे को मुँह पर लगाए ज़ोरों से चीखता कह रहा था- आप लोग शांति बनाए रक्खें, नहीं हमें लट्ठ बरसाने को विवश होना पड़ेगा।

लोग गगनभेदी आवाज़ बुलंद करते हैं- लट्ठ बरसाओ! हमें इसकी चिंता नहीं!!! हमें हमारी ज़मीन चाहिए!!!

सहसा पुलिस की तीखी सीटी के साथ ज़ोरों का शोर उठा मानो जेसीबी ने अपनी हैवानी चीख़ निकाली हो, मैना ने देखा- हरकत में आए जेसीबी ने एक ही झटके में नीम का विशाल पेड़ किसी हाथी की तरह ज़मीन पर पटक दिया, इसी के साथ कुम्हार का झोपड़ा चिड़िया के घोंसले की तरह उजड़ गया - कुम्हार ने अपने अंदर धसकते पहाड़ को यकायक दृढ़ता से रोका। जिस नए विचार का अंकुरण उसके मन में हुआ था, उसके बहाव में उसने कुम्हारिन और गोपी का हाथ पकड़ा, बड़े मियाँ को इशारा किया और अनजान सड़क पर, वीराने इलाके की ओर बढ़ने लगा। शोर-चीख़-गुहार हल्ला- सब पीछे छूट गए।

वह जंगल में आ गया था।

मैना से रहा नहीं गया, वह उसके पीछे-पीछे उड़ती आई।

सामने स्वच्छ, ताम्बई रंग का चाक जितना बड़ा, थरथराता चाँद जिसे कुम्हार ने ज़िन्दगी में शायद पहली बार देखा था- पेड़ों के ऊपर उठ रहा था- कुम्हार का मन प्रसन्न हो उठा।

मैना ने पूछा - भोला, तुम कहाँ जंगल में भागे चले आए। क्या सोचते हो, दुश्मन तुम्हें यहाँ चैन से बैठने देंगे?

-नहीं बैठने देंगे तो और आगे चला जाऊँगा!

- और जो वहाँ भी टिकने न दें, हँकाल दें तो?

- कोई कितनी बार हमें उजाड़ेगा? हर बार हम बस जाएँगे। जब तक साँसा, तब तक आसा! - भोला हँसा और दृढ़ता से आगे बोला - हमें तो चिकनी - चिकनी माटी काढ़नी है, सुन्दर, सुन्दर बर्तन बनाने हैं। और हाँ, वह घड़ा बनाना है जिसके ठण्डे पानी से तुम्हारा प्यासा कण्ठ तृप्त हो सके!

मैना अवाक् थी। बिल्कुल उसके मैना जैसे दृढ़ विचारवाला आदमी है यह!

थोड़ी देर बाद वह मीठे स्वर में गा उठी।

कुम्हार लोकगीत की यह कड़ी गा उठा :

 

अधरतिया हो राजा

कर ले शिकार

गोरी तो हिरनिया हो गई आज!

**

--

(समाप्त)

पिछले अंक 8 से जारी..

आधी रात को कुम्हार की एक दुःस्वप्न में नींद खुल गई। उसका समूचा शरीर काँप रहा था और तेज़-तेज़ साँसें चल रही थीं। वह उठ बैठा।

दुःस्वप्न में एक विशालकाय हाथी था जिसकी गर्दन पर महावत की जगह पटवारी बैठा था। पटवारी के हाथ में लोहे का भालेनुमा अंकुश था। पैरों के पंजों से वह हाथी को हँकाता हुआ मुँह से अजीबोगरीब आवाज़ निकाल रहा था जिसका आशय था कि अपनी मज़बूत सूँड़ से पहले कुम्हार का झोपड़ा गिरा, फिर बस्ती में जितने भी झोपड़े हैं एक-एककर उन्हें उजाड़ दो। हाथी के आगे-आगे बाबू है जो झोपड़ों की ओर इशारा कर रहा है कि इन्हें मिनटों में गिराओ, तनिक भी देर न करो।

हाथी जब पटवारी और बाबू के इशारों पर कुम्हार के झोपड़े की ओर भयंकर चिंघाड़ के साथ बढ़ता है तो भोला और कुम्हारिन और गोपी उसके सामने दृढ़ता से खड़े हो जाते हैं। भोला तीखी आवाज़ में कहता है- हमारी जान लेकर ही झोपड़ा गिराया जा सकता है! पहले हमारी जान लो।

पटवारी ग़ुस्से में अलफ। चीखता है- रौंद डालो!

हाथी ऐसा करने को होता है कि...

भोला की नींद खुल जाती है।

झोपड़े के ऊपर से बड़ा-सा चाँद आसमान में उठ रहा था। लगता था जैसे वह काँप रहा हो। भोला को लगा, चाँद की तरह ही उसका झोपड़ा काँप रहा है, नीम में भी यही कंपन हो रहा है। भोला उठा और आँगन में आ खड़ा हुआ। यहाँ घना अँधेरा था। पिछवाड़े का दरवाज़ा खोलकर उसने सामने क्षितिज की ओर देखा- स्याह अँधेरे में सब कुछ डूबा था। लगता था, यहाँ झोपड़े शेष नहीं रह गए हैं। सब उखाड़ दिए गए हैं। वास्तव में क्या ऐसा हो गया है? भोला सोचने लगा- अभी रात में जब वह सोया था तो सब कुछ था- यानी एक-दूसरे के कंधे से कंधा भिड़ाये झोपड़ों की शृंखला थी। जैसे कह रहे हों कि वे एक-दूसरे से जुड़े हैं, उन्हें कोई उखाड़ नहीं सकता। लेकिन आधी रात के अँधेरे में ऐसा क्या हुआ कि सब उखड़ गए। दूर तक फैले खेत अँधेरे के समुन्दर में डूबे थे मानों कह रहे हों कि अब हमें समुन्दर से कोई निकाल नहीं सकता। हमारी यही नियति है। नीम के नीचे अँधेरा और भी गाढ़ा था- भाँय-भाँय करता। न चाक दीखता था न मिट्टी के बर्तनों का ढेर! भोला एकदम से डर गया। मानों सब कुछ उससे छीन लिया गया हो।

यकायक उसका मन हुआ पत्नी को जगा दे। पत्नी ज़मीन पर लेटी थी। उसके बाजू में गोपी सोया था। उन पर भी अँधेरा इतना भारी था कि लगता था, यहाँ कोई है ही नहीं।

छोटे-छोटे डग रखता वह सार की तरफ़ गया जहाँ बड़े मियां विराजमान थे। सार दो तरफ़ से खुला था। यहाँ जब वह खड़ा हुआ- चाँद थोड़ा छोटा हो गया था और चारों तरफ़ उसका उजास फैल गया था। बड़े मियां उसे देखते ही उठने को हुए कि उसने कंधे दबाए कि बैठा रह, उठने की ज़रूरत नहीं।

भोला नीम के नीचे आ गया। स्याह अँधेरा अब न था। उसका डर यकायक जाता रहा। कुम्हारिन और बेटा भी उजास में अब साफ़ दीखने लगे थे।

यकायक उसके दिमाग़ में बच्चू कौंधा। कुएँ में कूदे जाने की घटना याद आई। टी.आई. तोमर याद आया और पटवारी जो बच्चू को जेल में डलवाने की रणनीति लेकर उसके पास आया था। कितना ग़लत है यह सब! भोला बुदबुदाया- पटवारी आख़िर ऐसा क्यों करना चाहता था? उसने तो ऐसा कुछ नहीं चाहा था! फिर? ऐसा कर वह उसे बिल्कुल अकेला कर देना चाहता है- यही उसकी मंशा थी।

दिमाग़ में उसके सहसा एक विचार कौंधा कि बस्ती के एक-एक लोगों के पास वह दौड़ा जाए और कहे कि हीले के चक्कर में अपनी ज़मीन और घर को छोड़ना कहाँ की समझदारी है? सबको कलेक्टर के पास चलकर अपनी बात रखनी चाहिए। हो सकता है, कलेक्टर का मन पसीज जाए और वह निर्णय बस्ती के हित में कर दे! बिना रोए माँ कभी बच्चे को दूध पिलाती है? दूध के लिए हमें रोना पड़ेगा। सब इकट्ठा होंगे तभी हो सकता है, काम बन जाए।

खाट पर लेटते हुए उसने मन बनाया कि सुबह वह सबके पास जाएगा, देखो फिर क्या होता है? चाँद को देखते हुए जो छोटे-छोटे झीने बादलों के बीच भागा चला जा रहा था, उसने आँखें मीचीं और थोड़ी देर में खर्राटे भरने लगा।

***

कुम्हार चुप बैठा है- अपने में कहीं खोया हुआ।

अभी-अभी कुछ देर पहले कुम्हारिन ने उससे कहा था कि वह इस तरह मुँह लटका के न बैठा करे। इस तरह बैठना उसे असगुन जैसा लगता है। अगर भाग्य में दर-ब-दर होना लिखा है तो उसे कोई मेट नहीं सकता और अगर अच्छा होना है तो अच्छा होगा, उसे कोई टाल भी नहीं सकता। इसलिए ख़ुश रहो। जबरन दुःखी न हो।

कुम्हार ने कहा- जबरन दुःखी नहीं हूँ और न होता हूँ। अब तुम्हें क्या बताएँ। जानती हो, बच्चू कह रहा था कि पुलिस से तुम झूठ क्यों बोल गए। जो होना था हो जाता। मैं भुगत लेता। ऐसा करके तुमने मेरे साथ अच्छा नहीं किया। वह बहुत शर्मिन्दा था और दुःखी। उसने कहा कि इस दुःख के चलते वह यहाँ नहीं आएगा चाहे ज़मीन-झोपड़े रहें या जाएँ।

-चलो उसने अपनी ग़ल्ती मानी यह बड़ी बात है।

-काका बीमार हैं, उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा है। और लोग हैं जो कह रहे हैं कि तू देख ले भोला, हम अब तेरे भरोसे हैं। श्यामल का बाबू भी यही कह रहा था, बताओ ऐसे में क्या करूँ?

-कुछ नहीं करना है, तुम तो जैसा पटवारी ने वचन दिया है काम करने का, वैसा करो। डर तो लगता है कि कहीं वह हमें अँधेरे में तो नहीं रख रहा है, लेकिन उसके अलावा कौन है जो रास्ता सुझावे और साथ चले। तहसीलदार ने तो समय ही नहीं दिया है, अब कलेक्टर साहब का ही वसीला है। मेरा विश्वास है कलेक्टर साहब समय देंगे और अपने पक्ष में होंगे।

-मुझे भी यही लगता है- कुम्हार बोला।

-कल दोपहर 12 बजे का समय बतलाया है। पटवारी ने सारी बातें मुझे समझा दी हैं। कलेक्टर आफिस के बाहर वह मिलेगा।

कुम्हारिन आँगन में चली गई थी और कुम्हार उसे आहत-सा देखता रह गया था कि तभी सामने मैना आ बैठी।

कुम्हार का मन हुआ कि पूछे कि उसके घर पर बदमाशों की छाया है, वह उससे कैसे बचे? -चाहकर भी वह मैना से यह प्रश्न नहीं कर पाया। और यह एक ऐसा प्रश्न था जो उसे लगातार उदासी के गर्त में ठेलता जा रहा था जिससे वह किसी तरह के बचाव का रास्ता नहीं निकाल पा रहा था।

उसने बीड़ी निकाली और उसके धुएँ में डूब गया।

कुम्हारिन ने कुम्हार को धुएँ में डूबे देखा तो सोचा-हो सकता है कुम्हार कोई रास्ता निकाल ले क्योंकि बीड़ी के धुएँ में डूबा वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता है।

***

टी.आई. तोमर से विदा लेकर जब पटवारी घर लौटा, उस वक़्त वह अपने को धिक्कार-सा रहा था कि जब लोग अपने आप निपट रहे हैं ऐसे में उन्हें पुलिस से उलझाना ठीक नहीं। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। यह ग़लत लड़ाई है। यह ग़ल्ती उससे हुई कैसे? क्या वह बाबू है जो पूरी तरह चुगद है जिसे हर क़दम पर सिखाना पड़ता है, इसके बाद भी वह सीख नहीं पाता। ख़ैर... गहरी साँस लेकर यकायक उसने पूरे मामले को दिमाग़ से निकाल दिया और आगे क्या करना है उस पर विचार करने लगा। मामले की पूरी तस्वीर उसके सामने थी। ऊपर के अफ़सरों के बीच जो बात तै हुई, वह यह थी कि काग़ज़ के हिसाब से सिर्फ़ कुम्हार की ज़मीन ही घेरी जाएगी जो उसने स्वेच्छा से दी है, लेकिन काग़ज़ से हटकर समूची बस्ती को भी घेरना है, कब्जे में लेना है। मान लो कल कोई कानूनी अड़चन आ खड़ी हो या कोर्ट-कचहरी में मामला अटके तो बात आईने की तरह साफ़ रहे कि बस्ती की ज़मीन से हमारा कोई लेना-देना नहीं, हमारे पास तो सिर्फ़ कुम्हार की ज़मीन है। इस तरह कुम्हार की ज़मीन के साथ समूची बस्ती की ज़मीन हाथ आ रही है। कारण कि लोग हक़ के लिए सामने आने वाले नहीं। आते भी हैं तो कितने दिन लड़ेंगे? अंततः उन्हें हारना ही है... इन बिन्दुओं को अफ़सरों के सामने रखा गया था जिन पर सभी सहमत थे। कलेक्टर ने भी इन बिन्दुओं पर गहन चिंतन-मनन किया। आख़िर में वह भी सहमत हो गया था।

इन बातों को सोचता पटवारी रात को एक बजे के आस-पास सोया होगा लेकिन तुरंत ही उसकी नींद खुल गई। पत्नी ज़मीन पर चादरा डाले लेटी थी। वह तख़्ते पर था। पत्नी को इस तरह ज़मीन पर सोया पड़ा देखकर उसके मन में यह बात उभरी कि सालों से उसने पत्नी से न ढंग से बात की और न ही प्यार किया। ज़मीन और पैसे के चक्कर में इस तरह खोया कि उसे पत्नी की सुध ही नहीं। वह क्या पहनती है, क्या खाती-पीती है, कैसे गृहस्थी चलाती है? उसने उससे कभी कुछ पूछा ही नहीं और न यह बात महसूस की। उस दिन की घटना उसे याद हो आई जब कुम्हार के कुएँ में कूदने की ख़बर पर वह उस पर बेतरह चिल्लाया था- उसे अपशकुन माना था। यह सब सोच कर वह दुःखी हो गया।

सहसा पत्नी उठकर बैठ गई। धीमी आवाज़ में उबासी लेते उससे पूछा -आप सोए नहीं, तबियत तो ठीक है?

पटवारी ने मन की बात छुपा ली, बोला -हाँ-हाँ, तबियत ठीक है। तुम सो जाओ!

-आजकल आप चिंता बहुत कर रहे हैं, नींद तभी ठीक से नहीं आ रही है -थोड़ा रुककर उसने आगे कहा -चाय बना लाऊँ?

मना करने के बाद भी पत्नी चाय बनाकर ले आई। पटवारी को कप थमाती बोली -लीजिए, चाय पीजिए। मेरी माने तो किसी तरह की चिंता मन में न लाएँ, नहीं बीमार पड़ जाएँगे।

पटवारी ने कप थाम लिया। पत्नी की बात मानते हुए चाय की चुस्कियाँ लेने लगा। यकायक पत्नी लेट गई और खर्राटे भरने लगी। चाय पीकर पटवारी फ्रेश होने चला गया। दो घण्टे तक हनुमान चालीसा का पाठ किया। जैसे ही पाठ ख़त्म किया, पत्नी उठ गई और फिर से चाय बनाने लग गई।

दुबारा चाय पीते हुए पटवारी आज 12 बजे की कलेक्टर की मीटिंग के बारे में सोचने लगा। ठीक उसी वक़्त कुम्हार अपने झोपड़े से निकला। सँकरे, कंकरीले, ऊबड़-खाबड़ रास्ते पार करता वह सबसे पहले बच्चू की झुग्गी के सामने आ खड़ा हुआ। बच्चू के आस-पास बस्ती के आठ-दस परिवार आ बसे थे जो सबके सब मजदूर थे जिनकी औरतें-बच्चे झोपड़ों में किराने की दूकानें चला रहे थे। बच्चू बाहर खाट में धँसा बैठा स्टील के गिलास को गमछे से लपेटे गर्मागर्म चाय पी रहा था। पास में प्लास्टिक के तीस-चालीस डब्बे जमा थे जो आधे भरे थे और आधे भरे जाने थे जिनको उसकी घरवाली नल से पानी ढो-ढोकर भरने में लगी थी। कुम्हार को देखते ही बच्चू खाट से उठ बैठा, बोला- आओ भोला, अच्छे समय पर तुम आए। तुम्हारी भाभी तीन बजे से पानी की लाइन में लग जाती है तब कहीं पानी मिल पाता है। बैठो, एक मिनट में चाय लेके आया- कहता वह झुककर झोपड़े में घुसा और अंदर से बोला- चाय बनी धरी है, गर्म करना भर है।

जब चाय गर्म कर वह लाया, घरवाली डब्बे में पानी कुरोती हाँफती-सी आवाज़ में भोला से कह रही थी- यहाँ बड़ी मारा-मारी है। तीन बजे से उठो, पानी भरो फिर कॉलोनी में निकल जाओ काम के लिए- यही ज़िन्दगी है।

खाँसते हुए बच्चू ने पूछा- ज़मीन का क्या हुआ? -फिर एक उँगली उठाता आगे बोला- यहाँ सब नाकारा लोग हैं, कोई सामने आने वाला नहीं। हाँ, ज़मीन मिल रही होगी तो सब आ टपकेंगे। मैं तो सबसे कह-कह के हार गया। कोई तुम्हारे पास जाने को तैयार नहीं। सब धंधे-पानी का रोना रोने लगते हैं- ऐसे में बताओ भला क्या होगा? -इन्हीं लोगों के चक्कर में मैं भी पीछे हटने लगता हूँ।

भोला चाय का गिलास थामता बोला- आज 12 बजे कलेक्टर साहब ने बुलाया है सबको। मैं तो पहुँचूँगा, देखते हैं क्या होता है। सब लोग आ जाते तो हमारी ताक़त बढ़ जाती- फिर अफस़रान ग़लत काम करने से डरते भी हैं...

-बात तो सई कह रहे हो -बच्चू खाट की पाटी पर बैठता बोला - तुम ठीक से बैठो, चिंता न करो, टूटेगी नहीं...क्या है भोला, भीड़-हंगामे से सभी डरते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कुछ होगा। गौरमिंट झूठै ज़मीन का हल्ला मचा रही है, कुछ होने वाला नहीं। ज़मीन जब हमारी है तो कोई भला उसे ले कैसे सकता है। मैं तो इसी बात पर अड़ा हूँ कि परधान मंत्री नहीं ले सकते तो ये अल्लू-लल्लू हैं।

-न ले सकें तो बहुतै अच्छा है, मगर मुझे अंदेशा है कि कहीं कुछ गड़बड़ है -भोला ने कहा -यही बात घरवाली भी शुरू से कहती आ रही है -लाख पटवारी ईमानदार हो या अपनापा दिखलाता रहे, विभीषण बनते इसे देर न लगेगी...

बच्चू आँख चमकाता बोला -भौजाई सही कहती है। किसी के पेट में फैली दाढ़ी को भला कौन देख सकता है, लेकिन हम इस बात पर अड़े बैठे हैं कि आज कोई किसी की ज़मीन नहीं हड़प सकता। कलेक्टर अंधा नहीं हो सकता, वह गलत काम नहीं करेगा, तुम देख लेना।

भोला बोला -तो हम ये मानें कि तुम नहीं आओगे, औरों की तो कह रहे हो, अपनी बताओ?

-अब क्या है दादा -बच्चू बीड़ी जलाता, उसका धुआँ नाक से निकालता कांड़ी हवा में लहराकर बुझाता बोला - तुम देख लो, अगर कुछ गड़बड़ दिखे तो ख़बर भर कर देना, मैं हाजिर हो जाऊँगा।

-इनके भरोसे मत रहना दादा -बच्चू की घरवाली पानी का डब्बा पटकती बोली -टेसन पर ये कितनी भी दौड़-धूप करते हों, यहाँ घर में तो खाट तोड़ने के अलावा इन्हें कुछ नहीं आता। ये नहीं आनेवाले जान लो। हाँ, झगड़ा-टंटा करा लो, तुमसे लड़ना था तो पहुँच गए तुम्हारे घर। वह भी जानते हो किसके भिड़ाने पर... पल भर को रुकते हुए वह आगे बोली -हम तो डर गए थे कि हुआ कुछ गड़बड़।

-अरे, ये तो कई बार कूद चुका है -बच्चू हँसा- मज़ा खिलाड़ी है, इसे कुछ नहीं होने वाला!

-ऐसा नहीं है। ये कहो पानी था, नहीं हाथ पैर टूट जाते। सिर में लग जाती। -बच्चू की घरवाली आँखें मटकाती बोली -टी.आई. यहाँ आया था, हाथ गरम हो जाए, इस फेर में था, हमने तो उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।

-सुना है भौजाई ने ऐसी धूल झाड़ी उसकी कि एक पल को न रुका, मुँह छिपा के भागा -बच्चू ने कहा- अरे, अरे भोला, कहाँ चले तुम, एक चाय इनके हाथ की तो पीते जाओ... रुको तो सई।

थोड़ी देर बाद कुम्हार परसादे, श्यामल के बाबू, काका और काकी के झोपड़ों के बाहर कच्ची सड़क पर नाली के किनारे खड़ा था। नाली ठहरी हुई थी, दुर्गंध छोड़ती जिसमें मच्छर-मक्खियाँ मँडरा रहे थे। नाली पर एक बड़ा-सा पत्थर रखा था जो आने-जाने का रास्ता था। काकी डंडे के सहारे पत्थर पर पैर जमाती धीरे-धीरे चलती, चूड़ियों भरा हाथ कमर पर रखे, दूर से चिल्लाती आवाज़ में बोलती आईं - काये भोला, बुढ़ापे में तो हमारी दुर्गति हो गई। कोई न कोई दिक बनी रहती है, क्या करें? कभी सिर में दर्द, कभी कमर में, कभी पेट में, कभी कंधों में। आँखें भी आगलगी चली गई हैं, सूझता ही नहीं कुछ। तुम्हारे काका का भी यही हाल है, बेचारे चार दिन से खाट पर पड़े हैं, कमर में कसका लगा है...

कुम्हार ने दौड़कर काकी को सहारा दिया। काकी झूठी नाराज़गी में उसके सिर पर हाथ मारती बोलतीं - तू झोपड़े में चल, यहाँ कहाँ आ खड़ा हुआ, चल। यहाँ तो आगलगी ऐसी बुरी बास उठ रही है कि...

इस बीच परसादे, श्यामल का बाबू और तीन-चार नवयुवक कुम्हार के पास आ गए।

श्यामल का बाबू बोला - हमें ख़बर लग गई है, 12 बजे कलेक्टर ने मिलने का समय दिया है, लेकिन भोला, यह बात समझ में नहीं आती कि जब नीचे के अफ़सर ने कई दिन पदाने के बाद भी समय नहीं दिया तो ये तो कलेक्टर- जिले का राजा, ये हमें समय देगा, हमसे मिलेगा? हमारा दर्द सुनेगा?

कुम्हार ने विनीत स्वर में कहा- भैया, पटवारी ने घर आकर हमें ख़बर दी है कि साहब हमारी बातें सुनना चाहते हैं।

परसादे ने यकायक चीखकर कहा -तो पहले वाले ने हमें क्यों रुलाया?

-सब एक से एक खुर्राट हैं, हमारी कोई नहीं सुनने वाला -एक नवयुवक जो हाथ में कड़ा पहने था, सिर के बाल कंधे तक थे, रंग उड़ी कसी जींस पहने था, कानों में पीतल के कुण्डल थे, कड़क आवाज़ में बोला -उस दिन तो हमने पटवारी को छोड़ दिया था, अब ज़रा भी गड़बड़ हुई तो उसकी ख़ैर नहीं... गला... कहकर वह अपना मजबूत पंजा देखने लगा।

काकी तिरछी नज़रों से नवयुवक को देखती- चिल्लाती-सी बोलीं -चल दुष्ट, बड़ा आया ख़ैर लेने। पटवारी थोड़ै कुछ कर रहा है।

-तो कौन कर रहा है? -नवयुवक जलती आँखों से काकी को देखता उनके मुँह से मुँह सटाता, तीखी आवाज़ में बोला।

-मुँह में थूक रहा है कमीन, हट -काकी ज़ोरों से चीखीं और ज़मीन पर थूकती बोलीं।

-काकी से तू क्यों उलझ रहा है? -श्यामल का बाबू नवयुवक को समझाता बोला।

-कुम्हार दादा से मैं नहीं बोलूँगा -नवयुवक ने कहा।

-क्यों नहीं बोलेगा?

-बो अपने मन की करेंगे, लाख हम कहें वे सुनने से रहे।

-कब नहीं सुनी तुम्हारी बात? -कुम्हार नवयुवक के सामने आ खड़ा हुआ, पूछा -तूने कौन सी बात कही बता पहले जो मैंने नहीं सुनी? हम तो जो सबकी राय बनी उसी के हिसाब से चलते आए हैं अब तक। अब साहब टैम नहीं दे रहा है या आगे कलेक्टर टैम देकर जुल दे जाए तो इसके लिए हम दोखी थोड़ै हैं। इसमें हमारी क्या ग़लती है बताओ! हमारा काम है पहले एक होकर रहना -अपनी बात कलेक्टर के सामने रखना। अगर हम एक नहीं होंगे, बिखरे रहेंगे, तो इसका लाभ सामने वाला उठाएगा। आज जब कलेक्टर ने हमें बुलाया है तो हम लोगों को एकजुट होकर जाना चाहिए। उनसे फरियाद करनी चाहिए।

काकी चीखीं- वहाँ कोई नहीं जाए, बस यहीं भोला के सिर पर गुस्सा फोड़ो -काकी गुस्से से तमतमा उठीं, बड़बड़ाने लगीं -सब एक से आगलगे, अपने मन के, नासपीटे। लुघरियाजले!!!

भोला ने सबकी ओर नज़र डालते हुए सहज भाव से कहा -देखो, मेरा फरज तो आप लोगों को बताने, साथ ले चलने का है, अब तुम लोग हमीं पर इलजाम लगाने लग जाओ, हमारी पीठ पर धूल लगाने लगो तो चुप हो जाने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकते।

यहाँ से कुम्हार निकला तो बस्ती के दूसरे लोगों के पास नहीं गया। उसका मन ख़राब हो गया था। उसे गुस्सा आ रहा था लोगों पर। उसने तै कर लिया था कि बस्ती के लोग साथ हों तो अच्छा; न होने पर वह पीछे हटने वाला नहीं। लड़ाई वह अंतिम साँस तक लड़ेगा।

जब वह नीम के नीचे पहुँचा, कुम्हारिन ने मुस्कुराते हुए उसका स्वागत किया। ठीक उसी वक़्त मैना मीठे स्वर में गा उठी। उसका मन प्रसन्न हो गया।

वह कुएँ पर गया और गड़ारी से खींच-खींचकर कई कलसे अपने बदन पर डाले। रोटी खाकर वह सीधे पटवारी के पास जाएगा -कलेक्टर ऑफिस।

***

--

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

पिछले अंक 7 से जारी..

शाम को जब कुम्हार घर पहुँचा, मैना कर्कश स्वर में किटकिट करती मिली। उसे अंदेशा हुआ ज़रूर कोई गड़बड़ है। और यह गड़बड़ ख़ुद उसी से हुई है- अँगूठा लगा के! पटवारी ने साज़िश रच के उससे अँगूठा ले लिया जिसमें उसका सर्वस्व था जो अब उसका नहीं रहा।

वह झोपड़े के बाहर पड़ी खाट पर बैठ गया, सिर थाम के।

कुम्हारिन झोपड़े से बाहर निकली तो भोला को इस तरह बैठा देखकर बोली- अरे, तुम कब आए? मैं तो गोपी की वजह से नहीं आ पाई, उसको दस्त लग गए थे, लस्त पड़ा है, लगता है धूप लग गई...

भोला उसी तरह बैठा रहा, कोई जवाब नहीं दिया, तो कुम्हारिन ने उसे झकझोर डाला- ये क्या है? मुँह क्यों लटकाए हो? साहब से भेंट हुई?

बहुत ही मरी आवाज़ में भोला ने कहा - साहब मरदूद आया ही नहीं। दुःख की बात तो ये कि बस्ती का एक आदमी पास न था। कल काकी थीं और मैं। आज काकी भी नहीं आ पाईं- ऐसे में भला मैं क्या कर लूँगा!

-हे भगवान! लगता है, किसी को अपनी ज़मीन से प्यार ही नहीं - कुम्हारिन बोली -ऐसे में गौरमिंट अपने हिसाब से सबको बेदख़ल कर देगी। हम लोग रह जाएँगे टापते। यकायक वह चुप हो गई, क्षणभर बाद आगे बोली - लेकिन - तुम्हें हार नहीं माननी है। एक अकेला आदमी भी भारी होता है हुकूमत को झुकाने में...

कुम्हार की आँखें खुली थीं लेकिन दिमाग़ शपथ-पत्र में डूबा था जिस पर उसने अँगूठा लगाया था। क्यों की उसने ग़ल्ती? बहकावे में क्यों आ गया???

और जब यह बात उसने कुम्हारिन से की तो लगा उस पर बिजली गिर पड़ी हो। काफ़ी देर तक वह अवाक्-सी रही, फिर बोली - तुमसे कहा था कि उसकी मीठी बातों में न आना; आख़िर आ ही गए!!! काहे के लिए किसी काग़ज़ पर अँगूठा लगा दिया - कहीं वह ज़मीन का काग़ज़ तो नहीं? हो सकता है, वह ज़मीन का काग़ज़ रहा हो- गहरे अफ़सोस में कुम्हारिन ने अपना मत्था पीट लिया।

यकायक कुम्हार के दिमाग़ में पता नहीं क्या आया, वह उठा और दौड़ता हुआ-सा पटवारी के घर जा पहुँचा।

पटवारी समझ गया कि भोला किसलिए आया है। उसने अपने को पूरी तरह ठण्डा और विनम्र रखा, पूछा -भोला, क्या हुआ? इत्ती रात में कैसे आना हुआ? खैरियत तो है?

भोला ने करुणार्द्र स्वर में कहा- मालिक, हम तो आप के गुलाम हैं, आप पे भरोसा करते हैं। ज़मीन के मामले में कहीं कोई गड़बड़ी न होने पाए, नहीं हम कहीं के न रहेंगे।

पटवारी ने उसका कंधा छूते हुए कहा- भोला, तू बलभद्दर पाँड़े के पास आया है, और उस पर भरोसा किया है और तू जानता है कि मैं ब्राह्मण आदमी हूँ। हमसे ग़लत बात कभी हुई न होगी, चूक की बात अलग है। इसलिए तुम निश्फिकर रहो। तुम सोच रहे होगे कि तुमसे जो अँगूठा लगवाया है, कहीं वह गड़बड़ तो नहीं। अरे भाई, लूटने के लिए तुम्हीं बचे थे क्या? यह ब्राह्मण जब तुम्हें वचन दे चुका है तो तुम्हारे साथ कोई धाँधली नहीं करेगा और न होने देगा। यह जान लो। इसलिए तुम किसी चिंता में न गलो। जाकर आराम से रोटी खाओ, चैन से सो। है न? काहे के लिए दिमाग़ में उल्टी-सीधी बातें लाते हो। यह भी जान लो- यह बात तुम किसी से कहना भी नहीं- लोग अपने अपने हिसाब से तुम्हें ज्ञान देंगे और तुम परेशान होगे और होना हवाना कुछ नहीं। इसलिए मेरा भरोसा करो और जाओ। खाना खाना हो तो हमारे साथ दो रोटी खा लो। बढ़िया कढ़ी बनी है, मीठी नीम की पत्तियाँ डली हैं, आओ दो रोटी इस ब्राह्मण की भी खा लो...

भोला यहाँ से जब निकला, उसका चित्त शांत था। किसी तरह की कोई दुविधा मन में न थी। अँधेरे में जब वह झोपड़े के पास पहुँचा, उसे बच्चू, श्यामल के बाबू और बूढ़े काका की आवाज़ें सुनाई पड़ीं। पत्नी की भी आवाज़ आ रही थी। लगता था जैसे वह कोई सफ़ाई दे रही हो और लोग हैं कि उसकी बात मान नहीं रहे हैं।

पास पहुँचते ही, कुम्हारिन ने कहा- ये लोग तुम्हें अगोर रहे थे। बच्चू कह रहा है कि तुमने...

-क्या तुमने? समझा नहीं? -कुम्हार ने भौंहें चढ़ाकर पूछा।

बच्चू ने यकायक तीखी आवाज़ में उससे पूछा -सुना है तुमने किसी काग़ज़ पर अँगूठा लगाया है?

-हाँ, लगाया है, क्यों? -कुम्हार ने शांत भाव से जवाब दिया।

-तुमने अँगूठा क्यों लगाया? - बच्चू का तीखा सवाल।

-समझा नहीं मैं?

-इसमें समझने की ऐसी कोई बात नहीं है। काग़ज़ पर तुमने अँगूठा क्यों लगाया, यह बताओ?

-हमने किसी काग़ज़ पर अँगूठा नहीं लगाया -कुम्हार साफ़ मुकर गया, आगे बोला-हुआ क्या यह बताओ?

-हुआ यह कि इससे हमारी ज़मीन चली जाएगी।

कुम्हार ने गर्दन हिलाते हुए श्यामल के बाबू से पूछा- क्यों भैया, यह बताओ, हम अपने काग़ज़ पर अँगूठा लगा सकते हैं कि किसी दूसरे के? दूसरे के काग़ज़ पर हमारा अँगूठा चलेगा?

श्यामल का बाबू गहरे सोच में पड़ गया, सहसा बोला - ये तो मैं इसे कब से समझा रहा हूँ, ये बंदा समझने को तैयार ही नहीं, बस जान खाए जा रहा है।

-कौन-सी बात नहीं समझ रहा हूँ -बच्चू आँखें निकालता, उसके मुँह पर ज़ोरों से चीखता -सा बोला- उल्लू समझते हो क्या? हमने इस आदमी पे भरोसा किया, सारा मामला इसके सुपुर्द किया लेकिन इसने जो गड़बड़ी कर डाली, वह हमें कहीं का न रक्खेगी!

-भोला भैया, तुमने क्या किया? -काका ने पग्गड़ उतारते हुए भोला से प्रश्न किया - सच्ची-सच्ची बताओ?

-काका! -बच्चू काका पर गरजा- तुम चुप्पै रहो। तुम नहीं जान पाओगे, इस कुम्हार ने हमें सड़क पर ला दिया है।

यकायक कुम्हारिन चटक पड़ी। हाथ उठाकर बच्चू से पूछा- कैसे ला दिया सड़क पे, ज़रा बताओ तो सई।

-अब तुम अपने मरद से पूछो जो सत्यानाश करके आया है- बच्चू ने आग में बारूद भर दी।

-हमारे मरद ने ऐसा कुछ भी नहीं किया- कुम्हारिन उसके बारूद पर पानी डालती-सी बोली- अगर उसने अँगूठा लगाया होगा तो अपने काग़ज़ पे। तुम्हारे काग़ज़ से उसका कोई साबिका नहीं-इत्ती अकल तुममें होनी चाहिए!

-ये भौजी! - बच्चू की आँखों में सहसा भयंकर ग़ुस्सा उतर आया -अकल बकल की बातें हमें न सिखाओ, तमीज से बात करो, बताय देता हूँ!

-तमीज से तू बात कर। औरतजात से कैसे बात की जाती है- ऐसे बात की जाती है?- कुम्हारिन फिर तड़ककर बोली।

यकायक कुम्हार बच्चू के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, बोला-तुम्हें किसी ने बरगला दिया है, हमने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे तुम्हारा अनिष्ट हो...

-अगर हो तो? आँखें निकालते हुए बच्चू ने पूछा।

-मुझे जान से मार डालना, बस! - कुम्हार बोला- इससे जादा मैं और कुछ नहीं कहूँगा।

-भोला! - बच्चू अब लड़ने पर उतारू हुआ जा रहा था।

भोला क्या कहे? उसने काका, श्यामल के बाबू के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा- हमने कोई ग़लती नहीं की। अगर इस पर भी भरोसा नहीं तो बताओ इसके लिए कौन-सी कसम खाऊँ जिससे बच्चू को तसल्ली हो।

कुम्हार रोने लगा।

-झूठे टेसुए न गिरा हरामखोर! बच्चू ने उस पर आग बरसाई।

-क्या बोला तू- कुम्हारिन तड़प के बोली- फिर से बोल!

-हरामखोर! दोगला- बच्चू ने मुँह आसमान की ओर करके तोप-सी दागी।

-तू होगा हरामखोर, दोगला- कुम्हारिन बदन पर मिर्चा-सी डालती बोली- भोले-भाले जात्रियों को लूटता है कमीन, तेरे तो कीड़े पड़ेंगे...

कुम्हार अब फूट-फूटकर रोने लगा। यकायक वह बेचैनी की हालत में अनमना-सा अँधेरे में बढ़ता गया, बढ़ता गया। अपने को निर्दोष साबित करने के लिए उसके पास एक ही रास्ता था- कुआँ जो उसके सामने था।

कुम्हारिन ज़ोरों से चिल्लाई। दौड़ी।

कुम्हार ने परवाह न की। वह कुएँ में कूद गया।

कुएँ से ज़ोरों की आवाज़ उठी।

सहसा कुम्हारिन ज़मीन पर लोट गई। बेतरह रोते, छाती पीटते वह चिल्लाई- हमारे मर्द को बच्चू ने कुएँ में ढकेल दिया। पुलिस को बुलाओ। हम अनाथ हो गए। कुम्हार को बचाओ!!! कुम्हार को बचाओ!!! हे भगवान!!!

***

पटवारी को जब यह ख़बर लगी कि कुम्हार कुएँ में कूद गया है, उस वक़्त वह अपने छोटे-से मंदिर में गमछा बाँधे, आँख मीचे, ज़ोर-ज़ोर से हथेलियाँ बजाता हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था- भारी ख़ुश हुआ और गला फाड़-फाड़कर पाठ करने लगा जिससे उसकी पत्नी डर गई कि अभी तक तो पांड़े ठीक थे, कुम्हार की ख़बर से ऐसा क्या हो गया कि गला फाड़-फाड़कर पाठ करने लगे। हथेलियाँ भी बहुत ज़ोरों से बजाने लगे... कहीं दिमाग़ तो नहीं चल गया। इधर जबसे ज़मीन का मामला शुरू हुआ है, ढंग से न खा रहे हैं, न पी और न सो! तीन बजे रात से ही उठ बैठते हैं और बाहर चक्कर लगाने लग जाते हैं, बोलो तो ऐसे चीख़ते हैं कि मत पूछो...

यकायक पटवारी उठा और दरवाज़े से बाहर निकलने को हुआ कि सामने पत्नी को खड़ा पाकर ज़ोरों से चीख़ पड़ा कि कमीन रास्ते में आ खड़ी हुई, हट किनारे हो- उसने बुरा-सा मुँह बनाया और बाहर खड़े आदमी से पूछने लगा कि मामला क्या था? आदमी ने जब यह बतलाया कि उसे सिर्फ़ इतना ही पता है कि कुम्हार कुएँ में कूद गया बस्ती के लोगों से तकरार के बीच- पटवारी अपरम्पार ख़ुशी से लहराने लगा- चलो बिना कुछ करे-धरे मामला अपने हत्थे आ गया। कलेक्टर के पास अब जाने की ज़रूरत भी नहीं- यह सोचता जैसे ही वह अंदर गया, हनुमान जी की फ़ोटो के आगे नमन के लिए झुका और कहा कि भगवान आपने मेरी प्रार्थना सुन ली, अब हम हनुमान गढ़ी पे लड्डू चढ़ाएँगे- जनेऊ से पीठ खुजलाते हुए उसने कमरे के कई चक्कर लगाए और जैसे ही बाहर पैर रखा-बाबू हाँफता खड़ा दिखा जो कह रहा था कि कुम्हार मरा नहीं, बच गया है। लड़ाई-झगड़े में पगला के कुएँ में कूद तो गया लेकिन बस्ती के लोगों ने मचिया डाल के उसे निकाल लिया। ताज़्ज़ुब कि उसे खरोंच तक नहीं आई।

पटवारी इस बात से बुझ-सा गया। उसने पत्नी को गालियाँ दीं जो बीच रास्ते में आ खड़ी हुई थी जिससे अशुभ हो गया। नहीं मामला बन गया था। यकायक उसने सोचा- कुम्हार मरे या जिए- काम तो अपना होना ही है- सौ फीसद! काहे को दुःखी होता है वह?

थोड़ी देर बाद बाबू चला गया और पटवारी इस सोच में डूब गया कि बस्ती में इतनी बड़ी घटना घट गई और पुलिस को ख़बर तक नहीं। हद्द है यह तो।

अगले ही पल वह थाने में था और उसके दस मिनट के बाद टी.आई. तोमर के साथ कुम्हार के झोपड़े के सामने। नीम के नीचे।

कुम्हारिन ने खाट पर लेटे कुम्हार को टी.आई. और पटवारी के आने की ख़बर दी।

कुम्हार को यह समझते देर न लगी कि मामला थाने तक पहुँच गया है। अब पुलिस बेवजह मुझे तंग करेगी और बच्चू को!

कुएँ में कूदने से कुम्हार को ऊपरी चोट कहीं भी न लगी थी। हाँ, दिल में हौल ज़रूर बैठ गया था। रह-रह लगता कहीं वह शांत न हो जाए। इस हौल को निकालने के लिए वह पूरी तरह आराम कर रहा था। धीरे-धीरे चलता वह टटरा सरकाता बाहर निकला और टी.आई. और पटवारी को झुककर राम-राम की।

टी.आई. तोमर मोटर साइकिल से टिका खड़ा था, उसी के बग़ल में था पटवारी बलभद्दर पाँड़े मुँह में पान ठूँसे।

टी.आई. ने पूछा -क्या हुआ भोला? कुएँ में तुम्हें किसने ढकेल दिया?

कुम्हार हाथ जोड़ता बोला- कुएँ में मुझे भला कौन ढकेलेगा, मालिक?

-अपने आप तो आज तक नहीं गिरा- टी.आई. कुटिलता से मुस्कुराता, सिर हिलाता बोला- कल रात यहाँ झगड़ा-टंटा किससे हो रहा था?

-कोई झगड़ा-टंटा नहीं हूजूर, ऐसई यहाँ के लोग मिलने की ख़ातिर आए थे...

-मिलने आए थे तो तू कुएँ में गिर गया? -टी.आई. आँखों में बदमाशी लाता बोला।

-कुछ नहीं साहब, ऐसई गफलत हो गई थी।

-गफलत कैसे हो गई? -टी.आई. गहरे उतरता बोला- ये लोग कहाँ रहते हैं?

-साब, शहर में रहते हैं- यहाँ उनकी ज़मीनें और घर हैं।

-तो दो जगह ठिकाने! -टी.आई. हँसा -यहाँ भी और वहाँ भी। इसके अलावा भी कहीं। क्या बात है? ज़मीन कब्जियाने का यह उम्दा रास्ता है, क्यों भाई पाँड़े जी?

पाँड़े मुस्कुराए भर, बोले कुछ नहीं जिसने बहुत कुछ कह दिया था।

टी.आई. कड़क आवाज़ में बोला- साफ़-साफ़ बताओ, नहीं बात बिगड़ जाएगी! दारू पी के झगड़ा-टंटा हुआ और कहते हो कुछ नहीं।

कुम्हार हाथ जोड़ता, झुककर बोला- साब, सच्ची बात है कि किसी ने दारू नहीं पी रक्खी थी। जिसकी कसम कहें हम खा सकते हैं। बस्ती के ही साथी थे जो ज़मीन के बारे में बात करने आए थे- बस ये बात थोड़ी गर्म हो गई थी और कुछ नहीं...

टी.आई. ने पटवारी की ओर देखा जिसका आशय था कि कुम्हार बात तो सही कह रहा है, अब तुम बताओ इसे किस रास्ते घेरें?

पटवारी कुटिलता से मुस्कुराया और खैनी की पीक थूकने के बहाने पीछे मुड़ गया, बोला कुछ नहीं। जैसे कह रहा हो कि रास्ते हज़ार हैं, अब आप पुलिसवाले हो, ख़ुद देखो। जिसने गड़बड़ की है उसे घेरना ज़रूरी है। बच्चू का नाम लो, वही टंटे की जड़ है, वही है जिसने मेरे ख़िलाफ़ आग लगाई...

-बच्चू कौन है?- टी.आई मुद्दे पर आया जिसके ख़िलाफ़ पटवारी कड़ी कार्रवाई चाहता था- यही था जो उसकी मंशा को तार-तार करने गया था और कुम्हार से लड़ पड़ा था- यकायक रूल से कॉलर के नीचे पीठ खुजलाते आगे बोला- ये वही कुली है जो रेलवे स्टेशन के पीछे झुग्गियों में रहता है।

-हाँ साब, वही है।- कुम्हार ने सहजता से जवाब दिया।

-ये बरखुरदार पहले भी फौज़दारी कर चुके हैं- टी.आई. ने जब यह कहा, कुम्हार उसकी बात काटता ज़ोरों से बोला- हुजूर, माफ़ करेंगे, उसने कभी कोई फौजदारी बगैरा नहीं की, ग़लत कहा जा रहा है!

टी.आई. गर्दन हिलाता, आँखों में रोष लाता बोला- अब तू बताएगा ग़लत- सही का भेद!

-नहीं मालिक- कुम्हार हाथ जोड़ता बोला- सच्ची बात कहने में हिचकना ग़लत होगा।

-और कौन लोग थे?- नाम ले?- टी.आई. कड़क अंदाज में बोला।

-साब, श्यामल का बाबू, बच्चू, बूढ़े काका थे और कोई नहीं...

टी.आई. ने पटवारी की ओर देखा जैसे कह रहा हो कि जल्द मैं मुद्दे पर आ रहा हूँ, परेशान न हो; फिर कुम्हार से सवाल किया- सुना है, ये लोग तुझे खतम करने आए थे?

कुम्हार ने पटवारी की ओर देखा जैसे कह रहा हो कि तुम्हारे ही कारण टंटा हुआ, तुम न अंगूठा लगवाते और न वह लड़ने आता। हम लोगों की गर्दन क्यों फँसवा रहे हो। वह भी झूठ में। टी.आई. को समझा दो, बात ख़तम हो- चुप खड़े हो और कुछ बोल नहीं रहे हो- क्या चाहते हो?- हम लोग कहीं के न रह पाएँ?- गहरी साँस भरता यकायक वह ज़ोरों से सिर हिलाकर टी.आई से बोला- बिल्कुल ग़लत! बिल्कुल ग़लत!!! सरासर झूठ!!! काहे को आप बात ग़लत जानिब में ले जा रहे हैं- ये लोग भला मुझे क्यों मारना चाहेंगे? हमने क्या बिगाड़ा है इनका?

टी.आई. ने कहा - तू किसी दबाव में सच्ची बात छुपा रहा है, साफ़ बोल, नहीं चल थाने!!!

कुम्हारिन अभी तक ओट में खड़ी सब कुछ देख-सुन रही थी। कहीं कोई ग़ल्ती नहीं, झूठै फँसा रहा है, ऊपर से थाने चलने की धमकी दे रहा है- यकायक सामने आकर ज़ोरों से बोली- काहे को थाने चलें!- उसने त्यौरी चढ़ाके टी.आई. से कहा- क्या किया है हमारे आदमी ने?

-अब तू ये कहती है कि क्या किया है आदमी ने?

-हाँ, ये कहती हूँ कि हमारे आदमी ने ऐसा कुछ नहीं किया जो ग़लत हो!

-तो कुएँ में इसे अल्ला मियां पटक गए?- टी.आई. ज़ोरों से हँसा।

पटवारी भी दबी हँसी हँसा।

-अल्ला मियां क्यों गिराएँगे। ये ग़लती से गिर गया, किसी को ढकेला नहीं, ख़ुद गिरा है। आप अब इस मजलूम को क्यों सता रहे हैं?

-सता रहा हूँ? क्या बोलती है?- टी.आई. रोष में भर उठा।

-बिल्कुल सता रहे हैं आप? छोटी जात को सता रहे हैं और ये सरासर बेइंसाफी है। पुलिस हो तो क्या? कुछ भी जुलम करोगे? हम आपके ख़िलाफ़ अपने थाने में मामला लिखवाते हैं कि आपने हमारे साथ बदसलूकी की, उल्टा-सीधा बोला, देखते हैं आप फिर क्या करते हैं?

पाँसा पलट गया था। टी.आई. ने ऐसा सोचा न था कि ऐसा कुछ घट सकता है- उसने पटवारी को देखा जिसने इशारा किया कि बात यहीं ख़तम करना ज़रूरी है नहीं तो बिगड़ जाएगी- सहसा वह खाँसता भोला के पास आया, उसे नीम की आड़ में ले गया। उसे अभी भी भरोसा था कि उसकी बात भोला मान लेगा, कहने में क्या जाता है। बोला- क्या है, तोमर साहब तुम्हें नहीं, उन लोगों को दुरुस्त करना चाहते हैं जो तुम्हारे ख़िलाफ़ हैं, तुम्हें तंग करना चाहते हैं- मैं भी यही सोचता हूँ कि ऐसे गड़बड़ लोगों को रास्ते से हटा देने में ही भलाई है। ये रहेंगे तो कुछ न कुछ गड़बड़ी करेंगे इसलिए यही समय है, तुम लगा दो इन्हें ठिकाने! मुझे सब पता है कि कल रात में बच्चू तुम्हें मारने आया था- उल्टा-सीधा बोल रहा था। तुम ख़ुद कुएँ में कूद गए, नहीं वह तुम्हें ढकेलता। वैसे बात दोनों एक ही हैं! किसी ने तुम्हें तंग किया और तुम उसके दबाव में आए और कूद गए- नहीं तो वह तुम्हें किसी न किसी बहाने से आड़े-तिरछे अड़दब में डाल के ढकेल ही देता। मेरी सलाह है कि तुम उस कुली का नाम तोमर साहब को बतला दो और उसे जेल कराओ! फिर जो होगा, देखा जाएगा। साला नीच कहीं का, कपटी! साला स्टेशन पर यात्रियों को लूटता है, सोचता है यहाँ भी वह नंगई कर लेगा। मान लो कल को कुछ हो जाता- कौन ज़िम्मेदार होता- कच्ची गृहस्थी- तीन-तेरह हो जाती! बच्चे- पत्नी का मुँह देखो! चल साहब से बोल दे, हीलाहवाला छोड़- पटवारी उसकी बाँह पकड़कर आगे ठेलता बोला- ठीक है, जा, नाम ले ले!

कुम्हार थानेदार के सामने आता कि कुम्हारिन उसके पास आई। कुम्हार को पीछे ठेलती, ख़ुद आगे आ खड़ी हुई, तमककर बोली- कुम्हार को उल्टी-सीधी बातें क्यों पढ़ाते हो पटवारीजी? हम बिरादरी के लोग आपस में कुछ भी बोलें-चालें -दो-चार बर्तन होंगे तो टकराएँगे, इसका मतलब यह नहीं कि हम दुश्मन हो जाएँ एक-दूसरे के! बच्चू ने ऐसा कुछ नहीं कहा और न ऐसी कोई बात हुई। भोला पानी के लिए गया था, पैर फिसल गया... कुम्हारिन क्षण भर को रुकी, फिर आगे बोली -आपको तो कुम्हार की मदद के लिए आगे आना था, उल्टे थानेदार साहब को लेकर आए कि इसी बहाने तंग करो... ऐसा कुछ हुआ तो जान दे दूँगी...

पटवारी ने दोनों हाथ माथे से लगाए -तुम गलत समझ रही हो। मैं तो तुम्हारे हित के लिए आया हूँ और तुम्हारा हितैषी हूँ और रहे तोमर साहब तो ये कोई ख़राब आदमी थोड़ै हैं, जबरन थोड़ै कुछ करेंगे। बो तो बच्चू के लाने आए थे... ख़ैर, बात यहीं ख़त्म हो गई। भोला, तुम आराम करो, जाओ, झोपड़े में जाओ। मैं तोमर साहब को समझा लूँगा।

पटवारी ऊपर से ऐसा बोल ज़रूर रहा था अंदर बदमाशी करवट ले रही थी कि अपने दरवज़्ज़े ब्राह्मण का अपमान किया है, तुम्हें दर-ब-दर न किया, ब्राह्मण की औलाद नहीं, समय आन दे...

सहसा टी.आई. साहब से हाथ जोड़ता बोला-चलो टी.आई. साब! जान दो इसे। गरीब गुर्बा हैं, इन्हें माफ करना ही धर्म है। क्यों भाई भोला? चलूँ फिर। जल्दी कलेक्टर साहब के सामने पेशी करनी है तेरी। तैयार रहना, ठीक?

टी.आई. ने मोटर साइकिल स्टार्ट की और दोनों यहाँ से चलते बने।

कुम्हारिन ने मुँह बिचकाया जिसका तात्पर्य था कि आगे से ये बंदा भूल से यहाँ आने वाला नहीं।

***

--

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

पिछले अंक 6 से जारी..

थोड़ी देर आराम करने के बाद पटवारी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और उठ बैठा। उसकी ख़ैरियत जानने के लिए भोला, श्यामल का बाबू, बच्चू और काकी उसकी तरफ़ दौड़े। पटवारी ने हाथ के इशारे से कहा कि वह आराम से है, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं, फिर धीरे से सबसे कहा- देखो, ये बाबू बहुत ही नालायक है। इसकी बातों में आप लोग न आना। इससे तो मैं निबट लूंगा। मुझे तो बाबू ने पीटा है- मैं यह कहता हूँ और आप लोगों ने उसे ऐसा करते देखा। लड़कों ने मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं की- आप चिंता न करें- कहता वह खाट पर लेट गया। थोड़ी देर सिर थामकर उठने के बाद वह आगे बोला- देखो, आप लोगों से एक विनती करना चाहता हूँ। विनती इसलिए कि हम आप लोगों से वर्षों से जुड़े हैं- दुख-दर्द में साथ-साथ चलते रहे हैं। दुःख ही एक ऐसा मोड़ होता है जहाँ पर ठहर कर लोगों की पहचान होती है कि कौन अपने हैं और कौन पराए। मैं एक ऐसे ही मुकाम पर हूँ जहाँ से मैं आप लोगों को छोड़ना नहीं चाहता। आप के साथ रहना चाहता हूँ, क्योंकि मैं भी आप लोगों की जमात से उठकर थोड़ा आगे बढ़ा हूँ लेकिन हालत आप लोगों जैसी है। -एक क्षण के लिए वह रुका, फिर बोला- भोला से मैं पहले भी कह चुका हूँ कि ऊपर के अफ़सरानों की नीयत ठीक नहीं, बहुत हरामी हैं वे, उनसे निपटना आसान भी नहीं। अगर आप मुझ पर थोड़ा भी भरोसा करें तो मैं आप लोगों को रास्ता सुझाता जाऊँगा। मैं पूरे मन से आपके साथ रहूँगा। अफ़सरान आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे क्योंकि मामले की कुंजी हमारे हाथ में है...

भोला ने लोगों की तरफ़ देखा जैसा पूछ रहा हो कि क्या किया जाए। जब भीड़ ने कहा कि पटवारी जैसा कह रहे हैं उसमें सार है, हमें उनकी बात पर भरोसा हो रहा है, तो भोला ने सिर हिला दिया, पटवारी से कहा- मालिक, हम ग़रीब-गुर्बा लोग, आप जानते ही हैं, किसी तरह बाल बच्चे पाल रहे हैं। अब आप हमारी नाव खेने वाले हो। जिसमें न्याय की आशा हो, वही करो- हम सब आपके पीछे हैं।

पटवारी अंदर ही अंदर आह्लादित हुआ, बोला- ठीक है, अभी मैं घर जाता हूँ, आप लोग और सोच-विचार लो, जैसा कहोगे, करूँगा। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। भगवान साक्षी है, मैं कुछ गड़बड़ नहीं होने दूँगा- आपके साथ मैं भी सीधी लड़ाई में रहूँगा, मुझ पर सरकार का चाहे जो इल्जाम लगे, मैं उसे झेलूँगा - लेकिन साथ आपका दूँगा। मेरे पास भगवान का दिया काफ़ी है, किसी की चूपड़ी छीनने से मेरा पेट नहीं भरेगा बल्कि अनिष्ट हो जाएगा - इसलिए फिर कहता हूँ कि आप मेरे कहे पर बार-बार सोच लें, मैं शाम को आऊँगा...

भोला बोला - मालिक, साथ में बच्चे भी हैं, खाना-पानी भी होना है, देर हो जाएगी इसलिए आप शाम का विचार बदल दें, अभी थोड़ा रुक लें और हम लोग कह ही चुके हैं, आप जैसा रास्ता सुझाएँगे, हम उस पर चलेंगे।

इस पर सभी एकमत थे।

***

दोपहर को रोटी खाकर जैसे ही कुम्हार खाट पर लेटने को हुआ, मैना सिरहाने झप्प से आ बैठी।

कुम्हार उठ बैठा, बोला - मैना रानी, कहाँ थीं? इतने लोग जमा थे, तुम पता नहीं कहाँ छुपी बैठी रही, बोलीं तक नहीं।

कुम्हारिन बोली - ये नीम में छुपी बैठी सब देख रही थीं कि तुम लोग क्या कर रहे हो। इसने कई बार किट-किट की आवाज़ की थी जैसे इसे जो कुछ भी हो रहा था, जँच नहीं रहा था।

-ऐसा है मैना? - कुम्हार ने पूछा।

-हाँ, वो पटवारी मुझे गड़बड़ लग रहा है - मैना बोली - वो जो भी बात कर रहा था, उसमें खोट था।

-अब क्या करें? किसी न किसी पर भरोसा करना ही होगा।

-भरोसा करो लेकिन विवेक गिरवी रखकर नहीं - मैना बोली- हमारे मैना ने भी ऐसा ही भरोसा किया था और वहीं वह चोट खा गया...

-लेकिन पटवारी... कुम्हार सिर खुजलाने लगा- भरोसे का न होता तो गला मसके जाने पर विरोध तो करता।

-यहीं तो मुझे गड़बड़ दिखता है।

-अपना सिर तक फोड़ लिया उसने -कुम्हार बोला।

-यह तो और बड़ा नाटक था। -मैना बोली।

-हे भगवान! अब तुम्हीं बचाओ हम लोगों को - कुम्हार माथा सहलाता बोला- तो कल सुबह हम लोग तहसीलदार से मिलने जा रहे हैं, उनसे फरियाद करनी है। तो न करें?

-क्यों न करो फरियाद, इसके लिए कौन रोकता है- कुम्हारिन बोली- लेकिन उस नासपीटे से सम्हल कर रहो, कहीं वह हमें डुबो न दे।

कुम्हार मैना की तरफ़ देखने लगा जिसने कुम्हारिन की बात की तसदीक की।

सहसा गोपी बड़े मियां की पीठ पर चढ़े हुए सामने आया, बोला- बाबू, बड़े मियां कह रहे हैं कि मण्डी में ज़ादा मज़े हैं।

-तो वही जाके रह - कुम्हारिन ने आँखें तरेरीं - जब बीसों लट्ठ टूटेंगे पीठ पर तो सारा मज़ा निकल जाएगा।

-चिंता क्यों करता है, समय तो ऐसा आने वाला है कि तुम्हें वहीं रहना पड़ेगा। -कुम्हार धीमी आवाज़ में बोला।

-भगवान न करे ऐसा समय आए -बड़े मियां करुणार्द्र स्वर में बोले - अगर ऐसा होगा तो मैं कहीं और भाग लूँगा।

-मुझे छोड़ जाएगा? - कुम्हार ने कातर भाव से पूछा।

बड़े मियां ने कुम्हार की आँखों में देखा, आँसू छलछला आए थे, बोले- ये तो समय बताएगा भोला! अभी से हम क्या बोलें।

सहसा कुम्हार ने मैना को देखा तो उसके कहे की चिंता में बिंध गया। उसे क्या जवाब दे? पटवारी ने उसे इस तरह घेर लिया है कि अब कोई रास्ता ही नहीं बचा- बेबस हो गया है वह? क्या करे, क्या न करे- उसे कुछ सूझ नहीं रहा था! यकायक उसने गहरी साँस लेते हुए सोचा, जो नसीब में होगा उसे कोई मेट नहीं सकता, वह होकर रहेगा।

और आख़िर में कुम्हार इसी बिन्दु पर आकर ठहर गया। मन में उसने कहा - जो होगा, सो देखा जाएगा, जी दुखाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। हाँ, लड़ने से मैं भाग नहीं रहा...

अंगौछे का तकिया बनाकर वह लेटा तो रात को खाने के लिए भी नहीं उठा।

रात तीन बजे के आस-पास जब कुम्हारिन की नींद टूटी, देखा -कुम्हार आँगन में झाड़ू लगा रहा था। बड़े मियां को चोकर-पानी दे चुका था। कुएँ से पानी भी खैंच चुका था।

कुम्हारिन पास आकर बोली -क्या कर रहे हो तुम?

-दिख नहीं रहा तुम्हें?

-दिख रहा है तभी कह रही हूँ, अपना काम करो जो तुम्हें करना है। मेरा काम करके मुझे शर्मिंदा न करो।

-अरे, ऐसा कुछ भी नहीं। ग़लत मत सोचो, मैं लीला, गुड्डू, श्यामल के बाबू, बच्चू सभी को बोलने जा रहा हूँ। सब तहसील में जुटेंगे। तुम भी आ जाना, गोपी यहाँ खेलता रहेगा बड़े मियां के साथ। मैंने बड़े मियां से कह भी दिया है, वे भी इधर उधर नहीं जाएँगे।

जब मटमैला उजास जगर-जगर कर रहा था, कुम्हार घर से निकला।

***

पटवारी कुम्हार की बस्ती से सीधे बाबू के घर पहुँचा। बाबू उस वक़्त पीढ़े पर बैठा रोटी खा रहा था, थाली पाँव के पंजे पर चढ़ाए। पत्नी स्टोव में हवा भर रही थी।

पटवारी को देखते ही बाबू थाली सरकाता बोला- आओ दादा, आओ, मैं तो सीधे घर भाग आया, मैं तो डर गया था, कहीं...

-फालतू बात मत करो- पटवारी ने उसे बरजा और खाट बिछाता उस पर बैठता बोला- मैं तो तुम से पहले ही कह चुका हूँ कि नालायकी छोड़ो और संकेत समझो। लेकिन तुम... गर्दन हिलाता वह बोला- मैं तुझसे भारी नाराज़ हूँ। पूछो कि क्यों? क्यों इसलिए कि तुझे बात समझ में आ क्यों नहीं रही है। आज ज़माना सीधे लड़ने का है? अरे, आज सीधे मूर्ख लड़ते हैं और जूते खा जाते हैं। हम लोग बाबू आदमी ठहरे- जनता से भला लड़ सकते हैं? हममें बूता ही नहीं, तो ऐसा खेल करो जो अपने हित का तो हो लेकिन दूसरे के हित का न हो- मतलब जनता के हित का तो बिल्कुल नहीं। वह अफ़सरों- बाबुओं के हित का भी हो, लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा अपने हित का, समझे? हमें जनता के हित से क्या लेना-देना? जनता हमें क्या दे रही है? और साली यह गौरमिंट भी हमें क्या दिए दे रही है? तीस-पैंतीस साल की नौकरी में एक प्रोमोशन नहीं- नाम बदल दिया पद का और हो गया प्रोमोशन। ऐसे में हम क्या जनता को देखें, क्या गौरमिंट को, क्या अफ़सरों को। हमें तो अब सिर्फ़ अपने को देखना है। वह काम करना है जो लाभ का हो जिसमें दो पैसे हाथ आएँ। इसी हिसाब से मैं तुझे समझा के ले गया था। और यह बात समझो, जिनकी ज़मीन छिनेगी, वे तो लड़ेंगे, जान देने पर उतारू हो जाएँगे और हों भी क्यों नहीं? हम तुम नहीं होंगे जब हमारी ज़मीन-रोटी छिनेगी? इसलिए जब उन लड़कों ने मेरा गला मसका और मुझे पीटने लग गए तो हमने उसे ग़लत नहीं माना। मार खाके ही यह जतला सकते हैं कि हम तुम्हारे आदमी हैं। ऐसा करके हमने लड़कों को दोषी बनवा दिया। एक अपराध-बोध, एक डर सबमें पैदा हुआ जो कहीं न कहीं मेरे आगे सिर टिकाता है और वही हुआ। मैं सबका हितू बन गया। लोगों ने कमान मेरे हाथों में दे दी। इसलिए तुझे समझा रहा हूँ कि खेल करना सीख। ग़ुस्सा अपने मिजाज़ से निकाल दे। यह बहुत ही ख़राब चीज़ है- हमें मिटा देगी। अब तू तै कर ले कि ग़ुस्सा चाहता है कि धन-दौलत। ग़ुस्सा करने या लड़ने वाला कभी आगे नहीं बढ़ पाता- चुप रहने वाला, ग़मखाने वाला आदमी बदमाशी के बाद भी आगे बढ़ जाता है जबकि ग़ुस्सैल सच्चा होने के बाद भी कहीं का नहीं रहता। उसको साथ के लोग तक छोड़ देते हैं।

थोड़ी देर चुप रहने और ख़ूब मीठी चाय पीने के बाद पटवारी आगे बोला- चल, हो गया लेक्चर। अब इस हिसाब से चल। सब तहसील में कल जुटेंगे और कमान अपने हाथों में होगी।

और वास्तव में कमान पटवारी के हाथ में थी। तहसील में लगने वाली भीड़ को उसने अपने कब्जे में कर लिया था। सबसे पहले वह वहाँ पहुँच गया था। लोगों के आने पर उसने सब कुछ समझा दिया था कि तहसीलदार साहब को अपनी बातें साफ़-साफ़ बता दी जाएँ। अगर तहसीलदार अपनी बातें नहीं सुनेगा तो वह ऊपर कलेक्टर तक जाएगा और कलेक्टर नहीं सुनता है तो उसकी ख़ैर-ख़बर ली जाएगी। सुनेंगे क्यों नहीं? काहे के लिए यहाँ गद्दी पर बैठे हैं? सिर्फ़ राज भोगने के लिए! जनता का काम नहीं करेंगे?

नौ-दस बजे से तेज़ धूप पड़ने लगी थी और तेज़ हवा ने जो गर्द उड़ाई उसने सबकी हालत बिगाड़ दी थी।

कुम्हार बोला- एक तो धूप है और उस पर तेज़ हवा ने तो आँधी ला दी। यहाँ तो खड़ा होना मुश्किल हो रहा है।

पटवारी बोला - क्या किया जाए। मजबूरी है। साहब तो ग्यारह बजे से पहले आएँगे नहीं, तब तक धूप और तेज़ हो जाएगी। गर्द और मामला बिगाड़ देगी। ख़ैर, देखते हैं।

कुम्हार ने तेज़ धूप और बवण्डर के बीच बस्ती के लोगों को देखा। सौ के आस-पास लोग थे जिनमें बच्चे, बूढ़े, जवान औरत-मर्द सब थे। सुबह नौ बजे जब आए थे तो भारी उत्साह था, ज्यों ज्यों धूप तेज़ होती गई और गर्द का बवण्डर गहराने लगा- यह उत्साह मद्धिम पड़ता गया। तहसील में छाँव नाम की चीज़ न थी। जो पेड़ थे वे ठूँठ थे। पीने का पानी भी न था।

ग्यारह बजे के आस-पास ज़ोरों का हल्ला उठा-साहब आ गए लेकिन साहब नहीं आए थे।

बाबू ने कहा- अभी साहब नहीं आए हैं, आने ही वाले हैं।

श्यामल का बाबू बोला - किसी ने कहा कि अंदर बैठे हैं।

पटवारी ने कहा - नहीं, बो तो दूसरे साहब हैं, तहसीलदार साहब अभी नहीं आए हैं, मैं देख आया हूँ।

कुम्हार बोला - उन्हें पता है कि हम लोग मिलना चाहते हैं तो उन्हें समय पर आना चाहिए।

बाबू हँसा।

पटवारी ने कहा - यही तो रोना है भोला! हम लोग तो आजिज़ आ गए हैं इन साहबों से। बैठते ही नहीं सीट पर। जब देखो तब मीटिंग में गए हैं- कलेक्टर के पास। कलेक्टर के पास जाकर पूछो तो पता चलता है कमिश्नर के पास गए हैं। वहाँ जाओ तो पता चलता है कि मंत्री ने उन्हें बुला रखा है। अब भगवान जाने ये कहाँ जाते हैं?

यकायक बूढ़े काका लाठी लेटते पास आए और उन्होंने पूछा कि पानी कहाँ मिलेगा? प्यास के मारे जान निकली जा रही है।

पटवारी ने कहा- काका, यहाँ पानी कहीं नहीं मिलेगा। चाय की दो दूकानें थीं बंद पड़ी हैं, पान वाला भी नहीं दिख रहा है, नहीं, वही पानी दे देता। दो मील जाने पर ही अब पानी मिलेगा, वह भी पानी की बॉटल 15 रु. में।

काका ने आँखें फैला दीं- हे भगवान! यहाँ तो प्यासे मर जाएँगे हम! बच्चा भी पानी माँग रहा है। पता होता तो लेकर आते।

बच्चू बोला- अब देखते जाओ। यहाँ क्या होता है। इससे अच्छा तो रेलवई स्टेशन है जहाँ गंदा ही सही पानी तो मिल जाता है।

भोला ने आँखें तरेरकर कहा- सबको तुम रेलवई से क्यों तौलते हो? रेलवई अपनी जगह है यह अपनी जगह!

-पानी तो मिलना चाहिए- बच्चू चीख के बोला- ऐसा अंधेर तो कहीं नहीं होता। माना तहसील है यहाँ भी जनता आती ही है!

पटवारी ने बात सम्हाली - क्या है, पानी यहाँ शाम को आता है नल से। सीपर शाम को मटकों में भर जाता है, बो अफसरों बाबुओं के लिए होता है, जनता के लिए नहीं, जनता अपना देखे....

-गजब है। बच्चू बोला।

-क्या गजब है? - श्यामल के बाबू ने कहा- तू कोई अफ़सर तो है नहीं कि तेरे लिए पानी सजा के रखा जाए?

-अफ़सर नहीं जनता तो हूँ।

-जनता के लिए जो होना चाहिए बो है। बो तुम्हें दिख रहा है। श्यामल का बाबू हँसा।

-दरअसल हमें इंसान भी नहीं माना जा रहा है- बच्चू ने जब यह कहा तो काका बीच में बोल उठे- अब कही सच्ची बात।

सहसा भीड़ में ज़ोरों का हल्ला मचा। ये लोग दौड़े तो पता चला कि बूढ़ी काकी को चक्कर आ गया था। वे ज़मीन पर पड़ी थीं, बेहोश।

-हम मना कर रहे थे कि मत चल, लेकिन नहीं, बुढ़िया मानने को तैयार नहीं- काका चीखते हुए बोले - अब भुगत।

दो-चार नवयुवकों ने काकी को उठाया और तहसील के बाहर जहाँ गूलर के पेड़ हैं, उनकी छाया में लिटा दिया और उन पर गमछे से हवा करने लगे।

सहसा काकी को होश आ गया।

एक लड़के ने कहा- काकी, तुम यहाँ मरने के लिए काहे चली आईं।

लड़के की बात पर काकी भारी नाराज़ हो गईं। उठकर बैठती जलती आवाज़ में चीखीं- मैं मरने आई हूँ कि तू। नासपीटा आगलगा! कुछ भी बोल रहा है। लूघर लगा दूँगी तेरी पोंद में, हरामी के पिल्ले! किसका छोरा है गिरधर का या बजरंग का?

इस बीच काका आ गए थे। उन्होंने काकी को समझाया- चुप तो रह, यहाँ भी तू लूघर लगाने से बाज नहीं आ रही है...

काकी अपना चूड़ियों से भरा निहायत हँड़ीला हाथ लड़के की तरफ़ उठाती बोलीं- देख रहे हो कमीन को। कुछ भी बके जा रहा है।

शाम को तीन बजे के आस-पास जब तहसीलदार का अता-पता न चला, पटवारी भयंकर ग़ुस्से में भर उठा। उसने तहसीलदार को गंदी गालियाँ दीं और उदास-सा दीवार से टिक कर बैठ गया।

भोला ने कहा- मालिक, आप दुःखी न हों, हम लोग कल जमा हो जाएँगे और कल खाना-पानी लेकर आएँगे। देखते हैं कब तक नहीं आते हैं तहसीलदार साहब।

भोला का कहना था कि सभी लोग एक स्वर में यही बात कहने लग गए। अंत में सबकी यही राय बनी।

धीरे-धीरे सारे लोग चले गए। पटवारी ने यकायक ज़ोरों से हँसते हुए बाबू से कहा- देखा तुमने! एक ही दिन में हवा निकल गई। देखते हैं कब तक ये लोग यहाँ धूप में खड़े होते हैं। एक न एक दिन हम इनका कन्ना ढीला कर देंगे और फिर ये चें बोल जाएँगे। न सब भाग खड़े हुए तो मेरा नाम बलभद्दर पाँड़े नहीं, क्या!!!

वह हँसा और देर तक हँसता रहा।

***

दूसरे दिन बूढ़ी काकी को छोड़कर सभी लोग तहसील में इकट्ठा हो गए। बूढ़ी काकी को बुखार हो गया था, इसलिए वह नहीं आ पाई थीं। हालाँकि वह बुखार में भी चलने की ज़िद कर रही थीं। काका ने उन्हें आने नहीं दिया। लोगों के पास खाना था और पर्याप्त पानी। कुम्हार तो ठण्डे पानी के कई मटके उठा लाया था। देखते हैं, कब तक नहीं आते हैं साहब? सारे लोग जबरदस्त उत्साह में थे। गोपी श्यामल से लेकर नब्बे साल के बूढ़े तक।

पटवारी ने मन में कहा - तुम लोग कुछ भी कर लो जो हम चाहेंगे वही होगा। तहसीलदार साहब बड़े लोगों से मिलेंगे कि कुम्हार-कुलियों से! वह कुटिलता से मुस्कुराया।

बाबू ने धूप से बचते हुए सिर पर गमछा कसते पटवारी से कहा- आज तो भयंकर धूप है। बवण्डर ने तो साँस लेनी मुश्किल कर दी है।

बच्चू, श्यामल का बाबू और भोला भी धूप और बवण्डर की बातें कर रहे थे कि यकायक ये तीनों धीरे-धीरे चलते पटवारी के पास आये। कुम्हार ने कहा- मालिक, आपने तो कहा था कि तहसीलदार साहब अपनी बात सुनेंगे। 12 बजे जरूर आ जाएँगे, लेकिन मालिक, दो ढाई बजने को होंगे, साहब का कहीं अता-पता नहीं...

पटवारी बोला- अरे भाई, उन्हें कोई एक काम तो है नहीं, हज़ारों काम हैं, मंत्री से लेकर कमिश्नर, कलेक्टर तक उन्हें रात-बिरात तलब कर लेते हैं। फिर घण्टों बैठाके रखते हैं, ऐसे में साहब बिचारे क्या करें? कहीं फँस गए होंगे। नहीं, वे सुबह-सुबह आ जाते, अपनी बातें सुनते और ऊपर पहुँचा देते। वैसे हमने सब समझा दिया है, वे ख़ुद सारा मामला जानते हैं। बहुत सज्जन आदमी हैं, लेकिन एक बार आप लोगों का आमना-सामना ज़रूरी है, उसका फरक पड़ता है।

-सही कह रहे हैं मालिक! -भोला बोला- हम तो सब लोगों को इसी बात पे रोके हुए हैं कि साहब बस आने ही वाले हैं, कहीं ऊपरवाले अफ़सरों ने उन्हें अटका लिया होगा लेकिन मालिक, यहाँ लोग मान नहीं रहे हैं, ग़ुस्से में भरते जा रहे हैं कि हमें बेवकूफ बनाया जा रहा है, कह रहे हैं कि साहब नहीं आएँगे, नहीं आएँगे, नहीं आएँगे। और वे बदमाश लड़के तो और भी बदमाशी पे उतारू हो रहे हैं...

-ऐसा है भोला - पटवारी उसके कंधे पर हाथ रखता बोला- तुम लोगों की लड़ाई में मेरा फायदा क्या है- बता दे? मैं तो महज तुम्हारे खातिर यहाँ लू धूप में आ खड़ा हुआ हूँ। अगर तुम्हें लगता है कि मैं कुछ गड़बड़ कर रहा हूँ तो मैं किनारे हो जाता हूँ। अपने को क्या?

-नहीं, नहीं मालिक! भोला ने कहा- साथ के लोग हैं, शिकायत तो करेंगे ही फिर गलत तो हैं नहीं? जायज ही तो कह रहे हैं।

यकायक पीछे से चना ज़ोर गरम बेचने वाला परसादे सामने आकर खड़ा हो गया, बोला- मालिक, हम लोग रोज़ कुआँ खोदते और पानी पीते हैं। एक दिन काम नहीं करेंगे तो रोटी के लाले पड़ जाएँगे। इसलिए आपसे अरदास है कि जल्द से बात हो और हम अपने हीले से लगें।

बाबू ने लाचारगी में कहा - बात तो तुम ठीक कह रहे हो- हम तुम्हारी सबकी तकलीफ़ समझते हैं, कहने की ज़रूरत भी नहीं- लेकिन साहब लोग अपने हाथ में होते तो अभी काम हो जाता- तुम तो देख ही रहे हो, आठ बजे सुबह से हम यहाँ मुँह बाँधे खड़े हैं, अभी तक मुँह में अन्न तक नहीं डाला।

यकायक पटवारी बीच में बोला - आप लोग हमारे पीछे पड़े थे कि कुछ खा लो लेकिन हमने नहीं खाया। अब हम तभी खाएँगे जब साहब से भेंट होगी।

पटवारी की इस बात ने तो लोगों के अंदर और भी भरोसा जगा दिया, इसलिए साँझ घिर रही थी, सब शांत बैठे रहे।

जब साँझ गाढ़ी होने लगी, साहब नहीं आए, लोगों में निराशाजन्य बेचैनी बढ़ने लगी।

पटवारी ने एक युक्ति निकाली। गमछा बिछाकर वह धरने के अंदाज़ में बैठ गया और ज़ोर-ज़ोर से कहने लगा- मैं अब तभी उठूँगा जब साहब आएँगे। मजाक समझ लिया है- सहसा वह बाबू से मुखातिब होता बोला- जा तू, साहब से कह आ कि मैं उनके ख़िलाफ़ अनशन-धरने पर बैठ गया हूँ। अब या तो हमारी बातें सुनें मानें, नहीं मैं उठने वाला नहीं, जान दे दूँगा।

सारे लोग भौचक थे। सभी ने कहा- मालिक, एक-दो दिन और देख लेते हैं फिर साहब अगर नहीं मिलते हैं तो हम लोग ऐसा करेंगे!

एक-दो दिन तो क्या एक सप्ताह तक इंतज़ार किया गया। साहब नहीं आए तो नहीं आए।

इस बीच रोजी-रोटी के चक्कर में बहुतेरे लोग पीछे हटने लगे। उन्होंने आना बंद कर दिया। पन्द्रहवें दिन तो यह हाल रहा कि सिर्फ़ बूढ़ी काकी और भोला रह गए थे। इसके दूसरे दिन तो काकी भी ग़ायब थीं।

पटवारी ने बाबू को रहस्य भरी नज़रों से देखते हुए कहा- देखा, ये होता है खेल! सब लोग किनारे लग गए कि नहीं? रहा विचारा कुम्हार माटी का खिलौना - वह हँसा - इसे भी अब ज़्यादा देर नहीं लगेगी भागने में। चुटकियों में उड़ जाएगा। अब देख तू बलभद्दर पाँड़े का खेल। विश्वास नहीं कर रहा था तू, अब मान गया न उस्ताद को!

भोला के आने पर उसने कहा- भोला, तू कहता था कि लोग अपनी ज़मीन के लिए मर-मिटेंगे। मर-मिट गए न! देख लिया तूने। कोई नहीं है आज की तारीख़ में तेरे साथ। ये हैं अपने लोग! इससे साफ़ है कि ज़मीन इन लोगों की नहीं है। अगर होती तो ये यहाँ से टसकते नहीं, हिलते नहीं। सिर्फ़ ज़मीन तेरी है और तुझे वह मिलेगी, देख लेना। मैं कह रहा हूँ- बलभद्दर पाँड़े, पटवारी! छोटा पटवारी नहीं हूँ मैं, ब्राह्मण हूँ जिसके ख़िलाफ़ चुटैया खोल लेता हूँ उसे मिटा के रहता हूँ। देख, अब मैं यह चुटैया तेरे हक के लिए खोल रहा हूँ- यह तभी बँधेगी जब फ़ैसला तेरे हक़ में होगा- कहकर उसने बड़ी-सी चुटैया खोल दी। यकायक उसने आगे कहा- ये साला तहसीलदार क्या है रे? ऐसे लाले तो मैंने हज़ारों निकाल दिए। यह किस खेत की, किस संडास की उपज है। साले को बो लात खैंच के दूँगा, कलेक्टर-कमिश्नर के आफ़िस में गिरेगा जहाँ इसकी नाल ठुँकी है। बताओ- कहकर पटवारी गहरी चुप्पी में चला गया। जैसे गहन चिंतन-मनन कर रहा हो। फिर यकायक जैसे तंद्रा से जागा हो, बाबू से बोला-हाँ, अब हम कलेक्टर से सीधे मिलेंगे- उन्हीं से अपनी बात कहेंगे - वे ही निपटारा करेंगे- कहकर उसने उस शपथ-पत्र को निकालने को कहा जो कल शाम को उसने नोटरी से बनवाया था। शपथ-पत्र पर कुम्हार के अंगूठे के निशान लेने थे जिसमें दर्ज़ था कि राज़ी-ख़ुशी से वह अपनी ज़मीन छोड़ रहा है। सरकार उस ज़मीन को जिसे चाहे सौंपे। शपथ-पत्र में यह भी दर्ज़ था कि पूरे होशोहवाश के मद्देनज़र यह शपथ-पत्र है- आज की तारीख़ से इस पर हमारा किसी तरह का, कोई मालिकाना हक नहीं रहा।

पटवारी ने भारी विनम्रता से कुम्हार से कहा- यह काग़ज़ उस माटी का माफ़ीनामा है जो तुम पर कर्ज़ की तरह चढ़ा है। अब तुम्हें माटी का पुराना बकाया पैसा नहीं चुकाना होगा- हम इस काग़ज़ से बकाया माफ करवा लाए हैं... हाँ, हाँ इस पर अँगूठा लगाना होगा, अँगूठा! अरे, अरे, तुम्हारा बदन क्यों काँप रहा है- मेरे रहते अगर तुम्हें कुछ होगा तो मैं अपने बदन पर तेज़ाब डाल लूँगा और ज़िन्दगी ख़तम कर लूँगा..

कुम्हार ने शपथ-पत्र पर काँपते हुए अँगूठे का निशान लगा दिया। और पूछा - अब कलेक्टर साहब के पास कब चलना है? कोई साथ न हो मालिक, कोई बात नहीं, मैं तो हूँ।

-बिल्कुल! अब तू ही बचा है। तुझे ही साहब के सामने पेश होना है- अपनी बात रखना। साफ़-साफ़ बोलना। बहुत अच्छे हैं कलेक्टर साहब। सबकी सुनते हैं, समय देते हैं- मैं तेरे को मिलवा दूँगा - सहसा चुप होकर उसने बाबू को आँख मारी और कुम्हार से आगे कहा-भोला, अब हम घर चलते हैं। राशन-पानी नहीं है, पूरे पन्द्रह दिन हो गए। तुम्हारी भाभी परेशान हो रही होंगी। राशन रख दूँ फिर कल मिलेंगे और सारा काम कराएँगे...

सहसा वह तेज़ी से चलता तहसील से बाहर निकल गया।

कुम्हार को सहसा लगा जैसे उसका सर्वस्व लुट गया हो।

***

--

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

पिछले अंक 5 से जारी..

सुबह उठते ही, कुम्हार सीधे पटवारी के घर पहुँचा। उस वक़्त वह बाहर संडास में था। और इस तरह कराह रहा था जैसे कोई उसे हलाल कर रहा हो। भारी कराह के बीच उसने कुम्हार से थोड़ी देर इंतज़ार करने को कहा।

कुम्हार बाहर ही खड़ा रहा। पटवारी बहुत ही गंदी गली में रहता था जिसकी दोनों तरफ़ बनी नालियों से इस वक़्त टट्टी बह रही थी। तीखी दुर्गंध उठ रही थी। कुम्हार का दम-सा घुटने लगा। बचाव के लिए धीरे-धीरे चलता वह गली के मुहाने पर आ गया। यहाँ भी भयंकर गंदगी और बदबू थी। सामने कूड़े का अम्बार लगा था। सूअरों और कुत्तों की नोंक-झोंक थी।

कुम्हार रात भर इस कुड्डना में था कि उसे बेदख़ल करने के लिए कैसी चालें चली जा रही हैं। जिस जगह पर वह रह रहा है, वह उसके पुरखों की है और खेत भी उन्हीं के हैं जो उसे विरासत में मिले। अब यह कैसी चाल है कि उससे पट्टे के काग़ज़ माँगे जा रहे हैं। हमारे पास कहाँ से आया काग़ज़? किसी भी किसान के पास घर या खेत का काग़ज़ नहीं मिलेगा। यह काम तो पटवारी का है। खसरा-खतौनी किसलिए हैं? यह तो सरासर नाइंसाफी है और उसे सताने का नया तरीका। इसी बहाने सताया जाए, तंग किया जाए ताकि भाग खड़ा होऊँ और यह जगह ये लोग हथिया लें और ऊँचे दामों में बेचें - यही कुछ खेल है। इस खेल में बड़े साहब से लेकर पटवारी तक जुड़े हैं। तभी बड़े साहब मौक़ा देखने आए थे। श्यामल का बाबू और बच्चू ने तो यहाँ तक उसे बताया कि मौक़ा तो बड़े साहब कई बार देखने आए। तूने तो एक ही बार उन्हें देखा। पहले तो यह हवा उड़ी कि केवल उसकी ज़मीन पर फैक्टरी लग रही है लेकिन अब मामला कुछ दूसरा है। सारी बस्ती ख़ाली कराई जाएगी। सबसे पट्टे काग़ज़ माँगे जा रहे हैं- पट्टा काग़ज़ दिखाओ, नहीं तो भागो। हे भगवान! क्या होने जा रहा है? हमने पहले यही सोचा था कि परेशान होने की ज़रूरत नहीं। जब बात साफ़ होगी, तभी देखूँगा। पटवारी ने कहा था कि परेशान न हो, वह सब रास्ता निकाल देगा? कहीं कोई रास्ता न निकाल पाया तो? ख़ैर जो सब के साथ होगा वही उसके साथ होगा। पटवारी पर भरोसा करने में क्या जाता है। हो सकता है वह कुछ जुगाड़ बना दे- वह बार-बार कह रहा है, रास्ता निकाल देगा, भरोसा रखो। लेकिन परबतिया कहाँ सुन रही है, वह तो कहती आ रही है कि यह पटवारी नम्बर एक का शातिर है- इसका भरोसा मत करना। मैना ने भी उसे आगाह किया है, वह तो उस पर झपट्टा मार बैठी थी - बड़े मियां ने भी उसे बैठने न दिया। क्या किया जाए फिर? अब बस्ती के लोग नए फरमान पर क्या उसके पास आएँगे? क्यों नहीं आएँगे, अब तो मामला ही उलट गया! इन्हीं बातों में ऊभ-चूभ था वह। सो नहीं पा रहा था। परबतिया भी कहाँ सो पाई थी। रह-रह उठती, पानी पीती, हे भगवान की पुकार लगाती, रात-भर बिस्तर में कल्थती रही। वह भी तो झूठे खर्राटे भरता सोने का नाटक करता रहा। इसी में रात निकल गई..

पटवारी बाहर खड़ा दिखा जाँघिया का नाड़ा लगाता, तो कुम्हार उसकी तरफ़ दौड़ा आया। पटवारी जाँघिया भर पहने था। बाल भरी छाती पर बाल चीटों की तरह चिपटे नज़र आ रहे थे। वह जनेऊ पहने था जो जाँघिया के नाड़े तक लटका रहा था। छाती वह बेतरह खुजला रहा था। नंगे पाँव था। कुम्हार के पास आते ही उसने उसे ऊपर से नीचे तक कुटिलता से देखा जैसे कह रहा हो कि जब मैं दरवाज़े जाता था तो ऐंठ दिखलाता था, सीधे मुँह बात नहीं- अब बताओ क्या हुआ? क्यों दौड़े आए? अब बेटा तुझे और तेरी बस्ती को टाँग न दूँ तो नाम बलभद्दर पांड़े नहीं। ब्राह्मण की औलाद नहीं। यकायक वह मुस्कुराया और बोला - अरे भोला तुम! क्या हुआ? परेशान दीख रहे हो? मैंने पहले ही कहा तुम जरा भी परेशान न होना, मैं जो हूँ। सब रास्ते पे ला दूँगा, कैसा भी टेढ़ा मामला हो, ये ब्राह्मण सुलझा देगा; फिर तुम्हारा और किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा- यकायक वह चुप हो गया, नाली में थूकता आगे बोला- क्या है, ऊपर के अफ़सरान बहुतै टेढ़े हैं, उन्हें क्या है, उन्हें तो आडर देना है, बस दे दिया। मुसीबत तो हमारे सिर है। ये काम हमारा थोड़ई है। यह तो बाबू का है लेकिन बाबू भी निहायत हरामी है - कुछ करता नहीं, इसलिए बड़े साहब ने मेरे मत्थे डाल दिया। अब तुम देखो, चालीस घर हैं जहाँ तुम रहते हो- आगे-पीछे सब मिलाकर। फिर पीछे खेत हैं, मैं जानता हूँ कि तुम्हारे हैं और बस्ती के लोगों के भी हैं किसानों के; लेकिन अफ़सरान यह लफड़ा लगा रहे हैं कि सब ज़मीन कब्जे की है। मैंने खसरा-खतौनी दिखा दी- तुम्हारी भी खसरा-खतौनी दिखा दी, उस पर तुम्हारा नहीं, तुम्हारे बाबा का नाम है, एक तरह से ज़मीन तुम्हारी ही है, तुम्हारा उनकी जगह नाम चढ़ना है। साहब लोगों का यह खेल चल नहीं पाएगा जब हम लोग मिलकर उनके ख़िलाफ़ खड़े होंगे? यकायक पटवारी चुप हो गया। पेट पर हाथ फेरने लगा जैसे पेट में दर्द हो रहा हो।

और वास्तव में यह सच्चाई थी। पेट में उसके दर्द था। वह बताने लगा कि दर्द की वजह से वह ठीक से सो नहीं पा रहा है। बवासीर की चोट अलग है। हालत ख़राब है।

यकायक उसने कुम्हार के कंधे पर हाथ रखा और भारी स्नेह से कहा- भोला, ज़िन्दगी में कुछ रखा नहीं है, ग़लत काम से भगवान बचाए। ग़रीबों की हाय मैं अपने सिर पर नहीं लेना चाहता। कहते हैं कि मरी खाल की हाय से लौह तक भस्म हो जाता है, फिर ऐसे में हम जीवित इंसान हैं। आज तुमसे मैं सच्ची कहता हूँ सारी नौटंकी ऊपर के अफ़सरान की रची है- मैं नौकरी में हूँ तो काम तो मुझे सब करने होंगे- ऐसे में तुमसे और बस्ती के लोगों से बस एक ही प्रार्थना है कि मुझ पर कोई शक न लाएँ। जो भी षड़यंत्र होगा वह ऊपर से होगा- उसमें मैं कहीं नहीं। यह तुम सब लोग साफ़ जान लो। मैं तुम लोगों की तरफ़ हूँ और जो भी रास्ता बताऊँगा वह जीत का होगा, समझ गए! मुझे बार-बार यह बात कहते ख़राब लग रहा है, अब तुम जैसा कहोगे मैं करने को तैयार हूँ...

कुम्हार बोला - हम लोग क्या कहेंगे? कहना तो आपको है। मैं आपकी बात सब तक पहुँचा दूँगा, फिर देखते हैं क्या राय बनती है...

पटवारी अंदर ही अंदर भारी प्रसन्न हुआ- अब जाकर मछली बंसी में फँसी। देखते हैं आगे क्या होता है- सारी मछलियाँ एक बार में फँस जाएँ तो कमाल हो जाएगा।

पटवारी की पत्नी ने चाय तैयार होने की आवाज़ दी। पटवारी ने बहुत ही प्यार से कहा- भोला, चाय पी के जा देख, तेरी भाभी निमंत्रण दे रही हैं, बस एक मिनट लगेगा।

यकायक पटवारिन उँगलियों में कप फँसाए उबलती चाय भगोनियाँ में लिए सामने आ खड़ी हुई।

-देख भोला, तेरी भाभी तेरे लिए चाय लाई है- भोला की तरफ़ इशारा करते हुए उसने पत्नी से पूछा- जानती है ये कौन हैं?

पत्नी मुस्कुराती बोली- क्यों नहीं जानती। कुम्हार भैया हैं, बड़े मियां की सवारी करने वाले!

कुम्हार भाव-विह्वल हो गया। पटवारिन के सामने हाथ जोड़कर झुक गया।

पटवारिन ने मुस्कुराते हुए कपों में चाय ढाली।

-ले भोला- पटवारी ने अपने हाथों से भोला को कप देते हुए कहा- चाय पी! बैठ जा, हाँ, फर्श पर, आराम से...

फर्श पर उकडूँ बैठे गर्म-गर्म चाय पीते कुम्हार को लगा वह ग़ैर के घर पर नहीं अपने किसी साथी के घर पर है। वह साथी जो उसका हितू और संकट से उबारने की चिंता में है। कंधे-से-कंधा मिलाकर चलनेवाला।

पटवारिन ने कुम्हार का कप दुबारा भर दिया न-न करने के बाद भी।

***

कुम्हार जब पटवारी से मिलने के लिए उसके घर जा रहा था, मैना ने उसे देख लिया था। मैना जान रही थी कि पटवारी कुम्हार के साथ कोई गड़बड़ी करने पर तुला है। कहीं उसके जैसा सलूक कुम्हार के साथ न हो जाए- इसलिए पहले दिन से ही वह सचेत हो गई थी और वह उस पर वार भी कर बैठी थी- लेकिन उसके आगे वह बेबस थी। कुम्हार को देख-देख आहत हो उठती थी। कुम्हार को मिलने वाला काग़ज़ और दोनों का चिंता में रात-रात सो न पाना- उसकी चिंता को बढ़ा गया था। वह शाम को चाक पर बैठना चाह रही थी, उस वक़्त पता नहीं क्या सोचकर रह गई थी; लेकिन सुबह कुम्हार को जाता देखकर उससे रहा नहीं गया। वह उड़ती हुई चाक पर आ बैठी।

कुम्हारिन झाड़ू लगा रही थी, उदास-सी। मैना को देखते ही बोल पड़ी- मैना रानी, तुम तो सब देख- सुन रही हो कि क्या हो रहा है। लगता है, हम कहीं के न रहेंगे।

-नहीं, ऐसा नहीं होगा- मैना धीमी आवाज़ में बोली- ये सही है कि बदमाश किसी खुचड़ में लगे हैं, अनर्थ करना चाहते हैं लेकिन ऐसा होने नहीं पाएगा...

-हम गरीब-गुर्बा क्या कर सकते हैं?

-बस किसी के भुलावे में न आओ, पटवारी कुछ भी बोले, मीठी-मीठी बात करे, सचेत रहना है...

-तुम तो जानती हो, माटी की उधारी के बहाने दाँव-पेंच शुरू हुई, अब पट्टा माँग रहे हैं, दरअसल यहीं अनर्थ की साया दीखती है।

झाड़ू लगाने के बाद वह कुएँ से पानी खैंचने लगी। सब ओर पानी किंछा। गोपी को उठाया और पढ़ने के लिए बैठाल दिया। इधर वह भी अनमना-अनमना रहता। घर पर छाई विपदा और फिर श्यामल का साथ छूटने से उसकी सारी चंचलता ग़ायब-सी हो गई है। बड़े मियां के पास कम ही जाता। पहले दिन भर गलियों-कुलियों में इधर-उधर घूमता फिरता था, अब नीम के नीचे ही बना रहता। कहीं जाता ही नहीं। माँ-बाप की उदासी उसे रह-रह काटने दौड़ती। चाहकर भी उनसे कुछ पूछ नहीं पाता। पहले बाप उसे अपनी गोद में बैठा कर सुबह-शाम रोटी खिलाता था, अब चुपचाप अकेले एक दो कौर खाता है और ढेरों पानी पी के उठ खड़ा होता है। अम्मा भी ऐसई करती है।

गोपी ने अपनी एक किताब खोली और माँ से कहा- अम्मा, नानी हमसे पूछती थी कि अमरीका कहाँ है?

-तूने क्या बताया?

-सात समुन्दर पार कोई गाँव है... यह बताया....

-तू पूरा गधा ही रहेगा, बड़े मियां की तरह- कुम्हारिन ने मन में कहा- अमरीका पड़ोस की कुम्हारिन है, कभी-कभी यहाँ आती थी। अब दूर कहीं चली गई है। जब आती थी तो तेरा बाप उससे मसखरी करता था, मैं अनजान बनी रहती थी। काश, अब वह आए, कम से कम तेरा बाप उदासी से तो उबरे!

थोड़ी देर बाद जब गोपी तैयार होकर पीठ पर बस्ता लादे, पानी की बोतल पकड़े स्कूल के लिए निकला, कुम्हारिन रसोई साफ़ करके कुएँ पर मुगरियों से पीट-पीट कर कपड़े धो रही थी, कुम्हार नीम के नीचे डली खाट पर आकर बैठ गया। पटवारी से मिलकर आशा की जो किरण उसे दिखी थी, घर तक आते-आते वह लुप्त हो गई और ऐसा लग रहा था कि कोई उसे गगरे की तरह गले में रस्सी बाँध कर गहरे, अँधेरे कुएँ में ठेल रहा हो।

कुम्हारिन समझ गई कि कोई बात बन नहीं पाई है, नहीं कुम्हार इस तरह आकर न बैठता। वह चुप रही, कपड़े धोती रही।

सहसा कुम्हार के मन में आया कि कुम्हारिन से पूछे कि अगर उसे यहाँ से बेदख़ल किया गया तो क्या वह चली जाएगी?

-क्यों चली जाऊँगी?

-फिर करोगी क्या?

-कुछ न बना तो जान तो दे दूँगी अनर्थ के सामने।

कुम्हार ने मन ही मन सवाल-जवाब कर डाले और मैना के बारे में सोचने लगा जो चाक पर बैठी उसकी तरफ़ ताक रही थी। इस बिचारी पर कितना बड़ा जुल्म हुआ, कितना सहा है इसने!

सहसा बड़े मियां के खुरों के पटकने की आवाज़ आई। जान गया कि पानी चाहता है, वह उठा और पानी की बाल्टी लिए सार की तरफ़ बढ़ा।

जब लौटा तो कुम्हारिन ने मीठी आवाज़ में कहा- जिया गोपी से अमरीका के बारे में पूछ रही थीं कि कहाँ है वह?

कुम्हार ऊपर से गुनमथान बना रहा, अंदर एक गुदगुदी-सी उतर गई, पूछना चाहा, आई थी क्या? लेकिन पूछा नहीं। वह नहाने के लिए तैयार होने लगा। कुम्हारिन समझ गई कि अमरीका के नाम से कुम्हार अंदर ही अंदर ख़ुश है।

इस वक़्त उसे इसी ख़ुशी की तलाश थी।

***

सरकार के फ़रमान-पट्टे वाली बात जंगल में आग फैलने की गति से भी तेज़ गति से बस्ती के लोगों को पता चली तो वे कुम्हार के पास टूट पड़े। बस्ती में अकेला कुम्हार ही बचा था जो ज़िद के चलते डटा हुआ था, बाक़ी सारे लोग यहाँ से चले गए थे। झोपड़ों में ताले पड़े थे।

इतवार के दिन, सुबह बस्ती के तक़रीबन सभी लोग कुम्हार के झोपड़े के सामने, नीम की छाँव में जमा थे। बच्चे, बूढ़े, जवान-औरत मर्द सभी। सभी इस बात से नाराज़गी जतला रहे थे कि हमारी ज़मीन है तो हमें बेदख़ल करने की साजिश क्यों रची जा रही है? सरकार हमें न पानी देती है, न बिजली और न अन्य ज़रूरत की चीज़ें, बावजूद इसके हम किसी तरह गुज़र-बसर कर रहे हैं। सरकार से कुछ माँग नहीं रहे हैं फिर क्यों यह खूँरेज हरकत? जरूर इसमें पटवारी से लेकर बड़े साहब का खेल है। बड़े साहब के निर्देश पर बेदख़ल करने का खेल रचा जा रहा है ताकि बड़ी रकम हाथ लगे। हमें बेदख़ल करके यह ज़मीन किसी फैक्ट्री मालिक या बिल्डर को दी जाएगी। और फैक्ट्री मालिक या बिल्डर उस पर मनमानी करेगा... लेकिन ऐसा हो पाएगा क्या? लोग इस बात पर तमतमा उठते कि कोई ऐसी पहल करे तो सई, फिर हम बताते हैं कि ज़मीन के लोग, मज़दूर किसान छोटे-मोटे रोज़गार के इंसान होते क्या हैं? हमारी ज़मीन भला कोई हड़प कैसे सकता है? कुछ नौजवान रह-रह लट्ठ चमकाने लग जाते कि पटवारी अगर मिला तो उसका एक ही बार में भेजा उड़ा दिया जाएगा।

भोला ने समझाया कि लट्ठ से काम नहीं चलेगा बल्कि बिगड़ जाएगा- अपनी लड़ाई बहुत ही शांत तरीके से सोचकर लड़ी जाए ताकि जीत हमारी हो। इसके लिए हमें ऊपर फरियाद करनी पड़ेगी।

श्यामल के बाबू ने भोला से कहा- दादा, पहले तो यह पता चला था कि तुम्हारी ज़मीन पर फैक्टरी डल रही है और उसका कोई काग़ज़ तुम्हें थमाया गया है...

भोला ने गर्दन हिलाकर कहा- हमारी ज़मीन में फैक्टरी डलने की बात तो तुम्हीं लोगों ने मुझे बताई, पटवारी से मैंने पूछा तो उसने साफ़ कुछ नहीं कहा- घुमा के बात करता रहा, अभी कल वह आया बाबू के साथ दूसरा फरमान सुनाया। पहले बोला कि तुम्हारे पास पट्टा है क्या? मैंने कहा- हमारे पास पट्टा कहाँ से आया। हमारी ज़मीन है, खसरा-खतौनी में हमारे बाप-दादों का नाम दर्ज़ है। पटवारी बोला- देख लो घर में कहीं कोई न कोई काग़ज़ होगा। मैंने कहा- मालिक ऐसा कुछ भी नहीं है तो वह बोला कि घबराओ नहीं, जब ज़मीन तुम्हारी है तो उसे कोई ले नहीं सकता- यह उनके लिए है जिन्होंने ज़मीन कब्जियाई है जिनके नाम खसरा-खतौनी में नहीं हैं, उनके लिए यह आडर है। उसने जेब से आडर निकाला और कहा- जिन्होंने ज़मीन कब्जियाई है उन्हें यहाँ से हटना होगा। यह भी कहा कि यह आडर किसी एक के नाम नहीं आम सूचना है, सभी के लिए, सारी बस्ती के लिए -कहकर पटवारी ने काग़ज़ सबके सामने कर दिया- लो, देख लो, ये रहा।

एक नवयुवक ने काग़ज़ को देखने के लिए उस पर झपट्टा जैसा मारा।

श्यामल के बाबू ने नवयुवक के व्यवहार पर माथा सिकोड़ा, फिर भोला से पूछा- पहले तो पटवारी तुम्हें घेर रहा था?

-हाँ, ये बात सही है -कुम्हारिन बोली- ये बीमार पड़ गए थे, पटवारी कई बार आया, लेकिन साफ़ कुछ नहीं बोल रहा था, जो कुछ सुना तुम लोगों से सुना, ख़ैर, मैंने कई बार उससे पूछा कि मालिक कौनों बात हो तो बतलाओ, लेकिन वो ऐसा चंट कि मिनका तक नहीं, बात छुपाए रहा; आखिर कल पट्टे की बात कह डाली और ये काग़ज़ दे गया...

-यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है- श्यामल के बाबू ने कहा।

-काय भैया, ए बताओ - बूढ़े जगेसर ने अपनी पग्गड़ उतारते हुए भोला से कहा - हम तो अस्सी साल से खेती कर रहे हैं, कभी ऐसा फरमान नहीं आया, लगान फगान जो सिर पड़ती थी, दे आते थे, मामला खतम, मगर जे बात हमारी समझ में तनिक जम नहीं रही है कि पट्टा दिखलाओ, पट्टा नहीं तो हटो।

-काका, श्यामल के बाबू ने ज़ोरों से कहा ताकि काका बात ठीक से सुन-समझ लें- यही बात के लाने तो हम सब यहाँ जुड़े हैं।

काका ने पहले यह आपत्ति दर्ज़ की कि ज़ोर से बोलने की ज़रूरत नहीं, हमें सब सुनाई पड़ रहा है, फिर बोले, जे तो अंधेर है! पूरा अंधेर!!!

काका की बूढ़ी पत्नी यानी काकी जो हाथों में ढेर-सी लाल-हरी चूड़ियाँ डाटे थीं, हाथ मटकाते हुए ज़ोरों से चीखीं- जे अंधेर हुआ तो हम यहीं जान दे देंगे। हम यहीं डोली में बैठ के आए, अब यहाँ से हमारी लहास उठेगी ठठरी में...

काका चीखे - लहास काहे को उठेगी। हम उनकी लहास उठा देंगे। ऐसा नहीं होगा कि कोई हमारी आराज़ी हड़पे और हम चुप बैठे रहें।

बच्चू कुली बोला- हमें तो पटवारी की कारस्तानी लगती है। ज़रूर उसी का खेल है यह।

-बिल्कुल सही कहा - परसादे बोला जो बहँगी में चना ज़ोर गरम बेचता है - वो जैसा ऊपर के अफ़सरों को सुझाएगा वो वैसा करेंगे!

-ज़रूर उसने अफ़सरों को सल्लाह दी होगी कि बस्ती की समूची ज़मीन की नीलामी लगा दो, खसरा-खतौनी हम देख लेंगे... बच्चू खैनी की पीक किनारे थूकता बोला।

रामचरण का बेटा जो सरकारी स्कूल में पढ़ रहा था, ज़ोरों से चीखकर बोला - खसरा-खतौनी उसके बाप की है जो जैसा चाहेगा, करेगा!

-ये सब कर सकते हैं - श्यामल का बाबू गर्दन हिलाते बोला- इतने चालबाज़, बदमाश और चंट होते हैं कि कुछ भी कर डालें!!!

-सही कह रहे हो तुम - भोला श्यामल के बाबू का समर्थन करता बोला - लेकिन हम उनकी एक चाल नहीं चलने देंगे! ये डाल-डाल तो हम पात-पात!!!

-सही कहा - सबने ज़ोरों से इस बात का समर्थन किया।

-और हमने अगर ऐसा न किया तो हम कहीं के न रहेंगे- भोला आगे बोला- और इनके हौसले तो देखो, सीधे लूट पर उतर आए। ज़रा-भी सरम-हया आँखों में न रही।

बच्चू बोला- अरे काका, सरम-हया की तो बातै न करो। सब दूर यही मचा है। अब तो किसी को गला काटते जरा भी हिचक नहीं होती-कमीनपन तो ख़ून में मिल गया है। हमारे यहाँ रेलवई में देखो, कोई किसी को नहीं पहचानता। कोई भी मरता-खपता रहे, किसी को कोई लेना-देना नहीं। कोई रेल से कटा तो कट जान दो, पुलिस आई और ले गई- मामला खतम। ऐसई सब ओर हो रहा है, कोई किसी का मीत नहीं।

-तो ये क्या रेलवई का मामला है? - श्यामल का बाबू आँखों में रोष भरता बोला - ऐसा नहीं है। यहाँ हम सब पटवारी और ऊपर के अफ़सरानों के बाँस बजा देंगे। मजबूरी में हम सब यहाँ से चले क्या गए, सोच लिया यहाँ कोई रहता नहीं। एक गरीब कुम्हार बचा है- लात मार के हँकाल दो- ये इत्ता आसान नहीं है- भोला तो आधी रात को मेरे पास दौड़ा आया था, सारा मामला बतलाया, हमने लीला और गुड्डू से भी बात कर ली है, वे अभी आने वाले हैं, उनकी तो ऊपर तक पकड़ है।

काका बीच में हाथ लहराकर बोलने को हुए कि श्यामल का बाबू उन्हें रोकता बोला- काका, बोलने तो दो, बीच में, अरे यार, तुम बच्चू कमाल करते हो, ये काकी, तुम काए को तूफान खड़ा करने लग गईं बीच में। सुनो तो सई। लो हम बैठे जात हैं, तुम लोग कर लो बातें... यकायक सब ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कौन क्या बोल रहा है। काकी बीच में खड़ी हो गईं, कहने लगीं - हमने तो अंगरेजन के छक्के छुड़ा दिए, ये गू खौने सियार किस खेत की मूली हैं। पूछो काका से हमने कहा कि यहाँ अंधेर नहीं चलेगा, छावनी नहीं बन सकती, ज़मीन हमारी है और कहीं विराने में जाओ, फिर क्या था हैट उतार कर वह हमारे सामने झुक गया, बोला - राइट!

बच्चू बोला - काकी, ये अंगरेजन के बाप हैं। इतने हरामी इतने हरामी कि क्या कहें। अंगरेज तो हैट उतारकर खड़ा हो गया होगा, झुक गया होगा और छावनी नहीं बनी होगी, ये नीच तुम्हारे सामने झुक भी जाएँगे, बात भी मान लेंगे, पीछे से पलटा खा जाएँगे। इनके पेट में इतनी घनघोर दाढ़ी है कि भगवान तक नहीं जान सकते...

यहाँ ये बातें चल रही थीं, दूसरी तरफ़ पटवारी, बाबू के साथ, संडास के बग़ल वाली कुठरिया में बैठा सोच रहा था कि ऐसा क्या किया जाए कि साँप भी मर जाए और डंडा भी न टूटे। इनके भले भी बने रहें और इन्हें कहीं का भी न छोड़ें।

और उसने रास्ता निकाल लिया था। पटवारी ने बाबू से कहा- आ, मेरे पीछे आ। पता नहीं कैसा बाबू है, कुछ गुर सीख ले, नहीं ज़िन्दगी दोजख में तब्दील हो जाएगी। ये सिधाई का ज़माना नहीं है, यहाँ ख़ून पीकर ही जिया जा सकता है। कौन किसका ख़ून नहीं पी रहा है, बता दे तू? हर आदमी किसी न किसी का ख़ून पी रहा है। शेर अगर ख़ून न पिये तो क्या जिएगा? कर ले वो रहम। निपट जाएगा। इसीलिए तेरे से कह रहा हूँ कि मेरे सुझाए रास्ते पर चल। जी कड़ा कर और कस के अब गला पकड़। छूरी भी चलाएगा और रहम भी करेगा- ये दो बातें एक-साथ नहीं चलतीं। और यहाँ हम छूरी कहाँ चला रहे हैं। ये तो धरम करम है। राजकाज। इसमें सब चलता है। सब जायज़ है। अब अगर ऊपर वाले अफ़सर चाहते हैं कि उनकी जेबें भरी जाएँ तो कैसे भरी जाएँगी-इसी तरह। बो हमारा गला पकड़ेंगे और हम दूसरे का। बस हो गया खेल। ये सही है कि ज़मीन किसानों की है, खसरा-खतौनी में दर्ज है, लेकिन हम ठप्पे से कहते हैं कि उनकी नहीं है, तो नहीं है। हमारे पास दूसरे सौ तरीक़े हैं। हम सिद्ध कर सकते हैं कि ज़मीन इनकी नहीं है। कोई माई का लाल कितना भी बड़ा कानून का बाप हो, उसे ले नहीं सकता। कितना भी दौड़े - धूपे। न्याय की गुहार लगाए- लेकिन वही न्याय कहेगा कि ज़मीन इनकी नहीं है जो कल तक इनके पक्ष में था। इसलिए बाबू महाराज, आप जी कर्रा करो, आगा-पीछा छोड़ो- आँख बंद करो और मेरे पीछे चलो। अब छूरी क़साई की तरह पहटनी होगी और तेज़ धार रखनी होगी और वैसा ही कर्रा वार करना होगा, फिर देखो मज़ा, कोई सामने आए, उसे कटना ही होगा। मेरे सब्र का बाँध अब टूट गया। अरे, कहाँ जाता है बे! इधर रामू हलवाई के बग़ल वाली गली और फिर सीधा रास्ता। कितनी मौक़े की ज़मीन है। अरबों रुपए आएँगे। साहब कह रहे थे कि ऐसा कंपा बनाओ कि एक बार में शिकार फँस जाए; दूसरे कंपे की ज़रूरत ही न पड़े। सीधा रास्ता दिख रहा है न! देख, यहाँ फिर कुछ नया खेल होगा। कमान अपने हाथ में फिर कठपुतलियों को जैसा चाहो नचाओ।

इन्हीं बातों के बीच पटवारी और बाबू कुम्हार के झोपड़े के सामने आ पहुँचे। यहाँ अपरम्पार भीड़ थी। पूरा मेले जैसा मामला।

पटवारी जैसे ही भोला का नाम ले आगे आया, भीड़ से निकले एक नवयुवक ने दौड़कर उसका जबड़ा पंजों में भर लिया और ज़ोरों से दबाकर जबरदस्त चीख़ के बीच उसके सिर पर ज़ोरों से मुक्के बरसाने लगा।

भोला जब तक दौड़ता एक दूसरा नवयुवक भयंकर चीत्कार के साथ पटवारी पर झपटा और उसने पटवारी का गला मसक दिया।

भोला जब तक छुड़ाता, पटवारी बेहोश हो चुका था और ज़मीन पर अचेत पड़ा था।

सब ओर सन्नाटा। दोनों नवयुवक भीड़ में खोकर लापता हो गए थे। सारे लोग ऐसे खड़े थे मानों बेजान, बेहिस हों।

एक दूसरा ही मामला आ खड़ा हुआ था। सब भयभीत, डरे हुए थे कि अब पुलिस आएगी, पूछताछ होगी, सबकी धुनाई और फिर थाने का चक्कर। ले लो ज़मीन अब।

यकायक बाबू सिर पर पैर रख के यहाँ से भागा। और दूर जा खड़ा हुआ। घबराया- बौखलाया, काँपता-सा। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करे?

सहसा काकी चिल्लाईं कि पानी डालो मूँ पर, अभी होश आ जाएगा, ऐसई गश आ गया होगा।

कुम्हारिन कलसा उठा लाई।

पटवारी के मुँह पर पानी डाला गया। उसे हिलाया-डुलाया गया। सहसा वह कराहा।

बाबू चीखा दूर से- मैं पुलिस को इत्तिला करता हूँ। सबको बँधवा डालूँगा। हम तो सरकारी काम से आए हैं, हमें काहे मारे डाल रहे हो।

थोड़ी देर में पटवारी उठ बैठा। गरदन लटकाए था। दरअसल उसने नाटक किया था जिसमें वह सफल हो गया था। अंदर ही अंदर वह बेहद ख़ुश था। वह बाबू को बताना चाह रहा था कि उल्लू चुप तो रह, अब मामला अपने हाथ में है, सब उसकी गिरफ़्त में होंगे कठपुतली जैसे, तू देखता जा। उसने बाबू को चुप रहने को कहा जो चीख़े जा रहा था।

पटवारी को खाट पर बैठाया गया। उसे पीने को पानी दिया गया। भोला ने कहा- लो मालिक तनक पानी पी लो, तबियत दुरुस्त हो जाएगी। आपको चक्कर आ गया था।

-हाँ, मुझे चक्कर आ गया था - काँखता हुआ पटवारी बोला।

-तुझे चक्कर नहीं आया, गुण्डों ने तेरा गला मसका था। झूठ काहे को बोलता है- बाबू बोला तो पटवारी काँखता, अफ़सोस में बोला- काहे को तू किसी को फँसाता है भाई, मैं कह रहा हूँ, मुझे चक्कर आया था, तू कहता है, गुण्डों ने गला मसका था। क्यों भोला?

भोला चुप।

पटवारी ने काँखती आवाज़ में आगे कहा - क्यों काकी, तुम क्या कहती हो?

काकी आँखें चमकाती, चेहरे पर आई मुस्कुराहट छिपाती बोलीं - तुझे भला कौन मार सकता है। बो लड़के तो तेरे सुआगत में बढ़े थे... सहसा भीड़ से चीख़ती आवाज़ में बोलीं- चलो, चलो यहाँ से! तमाशा न लगाओ, आदमी को साँस तो लेने दो। चढ़ आए छाती पे।

-सबको बेवकूफ बना दो मुझे कतई नहीं बना सकता- बाबू यकायक आग-बबूला होता बोला।

पटवारी ने निःशक्त भाव से हाथ उठाया जैसे कह रहा हो कि मूर्ख, इतना समझाया फिर भी बात समझ में नहीं आई। काहे को बाबू बना है तू! घास बेच। उल्लू कहीं का!

बाबू चीखता ही रहा, पटवारी की बात उसकी समझ में नहीं आ पाई थी।

यकायक पटवारी ज़ोरों से चीख़ा-चुप रहता है कि नहीं, हरामखोर! -कहकर उसने अपना सिर खाट के पावे पर दे मारा-ले चिल्ला! और चिल्ला!! जान ले ले मेरी!!!

खाट के पावे पर मार जबरदस्त थी कि पटवारी ख़ूनाख़ून हो गया। माथे से बेतरह ख़ून बह उठा।

दृश्य बदल गया था और अब जो दृश्य था, अजीबो-ग़रीब था।

भोला, श्यामल के बाबू और बच्चू ने दौड़कर पटवारी को सम्हाला। चोटखाई जगह पर हथेली जमा दी ताकि ख़ून न बह पाए।

थाड़ी देर में चोटखाई जगह पर फिटकरी पीसकर भरी गई। अब ख़ून रुक गया। सिर पर पट्टी बाँध दी गई थी और पटवारी को खाट पर थोड़ा आराम करने को कहा गया।

पटवारी आराम करने लगा। चेहरे पर मुस्कान थी जो दीख नहीं रही थी मगर उसके पूरे शरीर को रौशन कर रही थी।

बाबू ग़ुस्से और डर से काँपता भाग खड़ा हुआ।

***

--

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

पिछले अंक 4 से जारी..

रात में कुम्हार को भूख नहीं थी। पत्नी के बार-बार कहने पर उसने एक रोटी खाई और ढेरों पानी चढ़ा लिया। इस पर पत्नी नाराज़ हुई। उसने पत्नी की नाराज़गी पर ज़रा भी ध्यान न दिया। सीधे खाट पर पड़ गया। लेटते ही उसकी आँख लग गई लेकिन थोड़ी ही देर में वह जाग गया। उसे अजीब-सी बेचैनी हो रही थी। मन में बार-बार यह ख़्याल आ रहा था कि कहीं उसकी ज़मीन हाथ से जाने वाली तो नहीं। उसे लग रहा था कि हो न हो बड़े साहब की निगाह उसकी ज़मीन पर है तभी वह दौरे पर आए थे, उसके झोपड़े, ख़ाली पड़ी ज़मीन और नीम के विशाल पेड़ को लालच भरी निगाह से देख रहे थे। उन्होंने तभी पटवारी को तलब किया था जो दौड़ा हुआ उनके सामने जा खड़ा हुआ था। ज़रूर बड़े साहब ने पटवारी को हुक्म दिया कि यह ज़मीन मौक़े की है, इस पर कब्जा जमाओ... पटवारी उस वक़्त हाथ जोड़ के हुक्म की तामीली के लिए उनके सामने झुक गया था जैसे कह रहा हो कि हुजूर, यह काम हो जाएगा, आप निशाख़ातिर रहें। हे भगवान! क्या अनर्थ होने वाला है। घरवाली भी उसे सचेत कर रही थी। वह तो साफ़ कह रही थी कि यह पटवारी गड़बड़ आदमी है, कुछ न कुछ अंधेर ज़रूर करेगा।

कुम्हार उठकर बैठ गया। तकिया के नीचे से उसने बीड़ी का बंडल निकाला। बीड़ी जलाने को हुआ कि अंधेरे में बीड़ी की चिनगी नज़र आई। लग रहा था कोई उसके पास आ रहा है। श्यामल के बाबू थे, खाना खाकर उसके पास यूँ ही दो पल के लिए बैठने आए थे। हाथ में उसके जलती बीड़ी थी। खाट पर बैठते ही उसने पूछा- और भोला, कैसे हो? अब तो तुम चंगे हो गए।

-हाँ भाई, जो कष्ट लिखा है, वह तो भोगना ही पड़ेगा। यकायक वह खोखली हँसी हँसा - अब बिलकुल ठीक हूँ। भगवान चाहेगा तो अब नया हीला और भी रफ़्तार पकड़ लेगा।

-बिल्कुल! आज कुछ भी करो, माटी बेचो, पैसे कहीं नहीं गए। आदमी में बस हुनर हो, वह भूखा नहीं मरेगा- श्यामल का बाबू बोला- पेट भर को मिल ही जाएगा यार, और ये तुमने समय रहते कर लिया, अच्छी बात है। आगे इसी काम को गोपी भी अच्छे से सम्हाल सकता है।

-अरे, गोपी की क्या? अभी तो उसके खेलने के दिन हैं; सज्ञान होते कौन-सी लाइन हाथ लगे, क्या भरोसा। देख नहीं रहे हो नई-नई चीज़ें आ रही हैं, नये नये धंधे। कभी सोचा नहीं, कभी देखा नहीं।

-ऐसई है भाई- श्यामल का बाबू थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला- फैक्टरी का क्या मामला है? तरह-तरह की बातें सुन रहा हूँ। कोई कह रहा है कि बस्ती के बीचोबीच में कहीं लगने वाली है, कोई कहता है तुम्हारे झोपड़े के सामने। आज पटवारी मुझे मिला संझा को, मैंने उससे पूछा तो वह भी कहने लगा कि फैक्टरी लगेगी। मैंने पूछा कहाँ तो बोला चिंता क्यों करते हो। सुना है, तुम्हारी ख़ैर-ख़बर लेने घर आया था?

कुम्हार बोला- हाँ, आया था। मुझसे भी यही कहने लगा कि मेरे रहते चिंता न करो, मुझ पर भरोसा रखो, मैं सब देख लूँगा।

-तुम किसी से या पटवारी से चर्चा न करना - श्यामल का बाबू बोला- पटवारी तो मेरे कान में कह रहा था कि बड़े साहब को तुम्हारा झोपड़ा और नीम का पेड़ और खाली पड़ी ज़मीन जँच गई है, हो न हो वहीं फैक्टरी डले।

कुम्हार के प्राण नहों में समा गए।

-तुम चिंता मत करो- श्यामल का बाबू बोला- कोई मज़ाक-खेल है क्या? हम लोग मर गए हैं क्या? कोई यहाँ घुसे तो सई। लहास गिरा देंगे.. वह ग़ुस्से में भर उठा था।

यकायक श्यामल की आवाज़ आई। शायद उसकी माँ उसे बुला रही थी। जय राम कहकर श्यामल का बाबू उठा और अँधेरे में खो गया।

कुम्हार के दिल की धड़कन बढ़ गई थी। थोड़ी देर बाद जब वह मटके से पानी निकालकर पी रहा था, उसके दिमाग़ में आया कि उसे घबराना नहीं चाहिए जब तक कोई बात साफ़ नहीं हो जाती। अभी एकदम से भड़भड़ाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। पटवारी ज़रूर गड़बड़ आदमी है लेकिन जब वह कुछ कह रहा है तो उस पर यक़ीन करना चाहिए। हो सकता है, वह कुछ मदद करे। अक्सर देखा गया है, नीचे के लोग मदद कर देते हैं। हो सकता है कुछ करे, नहीं भला क्यों कहता। वह तो हमारी ख़ैर-ख़बर के लिए झोपड़े पर आया, आज भला कौन किसे पूछता है- ऐसे में बिना सबूत के उस पर शक करना ठीक नहीं। जब वह कह रहा है कि हम कोई न कोई रास्ता निकाल देंगे तो उस पर भरोसा करने में क्या जाता है। पत्नी लाख मना करे, मैं तो अभी उस पर भरोसा करूँगा चाहे जो हो जाए। उड़ी-उड़ी बातों पर क्यों कान दें...इन बातों को सोचता वह काफ़ी देर तक नीम के नीचे टहलता रहा। जब दूर के पेड़ों पर पंछियों के पंख फड़फड़ाने की आवाज़ आई और पीछे के ठूँठ पर बैठने वाले उल्लू के बोलने की आवाज़, वह खाट पर लेट चुका था।

थोड़ी देर बाद वह गहरी नींद के हवाले था।

***

सबेरे जब कुम्हार की नींद टूटी, अवध सामने खड़ा मिला। वह बहन को लेने आया था। माँ सख़्त बीमार थी और उसके नाम की रट लगाए थी। इस ख़बर से कुम्हारिन के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। आँगन में बैठी वह घुटी आवाज़ में मुँह में आँचल ठूँसे रो रही थी। माँ के लिए वह रो रही थी, इसी के साथ कुम्हार को अकेला छोड़ने का दुःख भी उसे साल रहा था। वह बीमार था, अभी-अभी तो ठीक हुआ- उसे छोड़ के कैसे जाए? सोच-सोचकर बेहाल हुई जा रही थी वह।

कुम्हार ने अवध से पूछा - क्या हुआ जिया को?

सास को वह जिया कहता था। हालाँकि सभी उसे जिया कहके पुकारते थे।

अवध ने कहा - पहले सर्दी हुई, फिर तेज़ बुखार और पेट में दर्द। उस पर दस्त। अब ये हाल है कि उठ-बैठ नहीं पा रही हैं, कह रही हैं, समय आ गया है, परबतिया को बुलाओ। न कुछ खा रही हैं न पी। बस एक रट परबतिया! परबतिया!!!

परबतिया अपना सामान बाँध रही थी और बीच-बीच में कुम्हार से कहे जा रही थी- ठीक से रहना। रोटी बना लेना। मन तो हो रहा है कि गोपी को छोड़ जाऊँ लेकिन बो जाने की ज़िद किए है कि नानी के घर जाएँगे... एक पल यहाँ नहीं रुकेगा, नहीं छोड़ जाती।

अवध ने कहा- जीजा, तुम भी चलो न! हम ऑटो बुला लाते हैं, वैसे भी तुम कभी निकल नहीं पाते हो!

-बहन को ले जाओ, समय मिला तो मैं पीछे से आ जाऊँगा।

परबतिया ने कहा - रहन दो तुम, कोई झूठ तुमसे बुलवा ले।

-चलो न जीजा! अवध ने इसरार किया।

भोला ने कहा - सच्ची कहता हूँ, तुम चलो, मैं जरूर आऊँगा। जिया को देखने का मेरा भी मन है।

परबतिया का जाने का ज़रा भी मन न था। रह-रह वह अँसुआ पड़ती। रुँधे कण्ठ के बीच उसने खाना बनाया, सबको खिलाया। जब जाने को हुई, उसे ज़ोरों की रुलाई छूटी। आवाज़ तो नहीं निकल पाई क्योंकि उसने मुँह में आँचल ठूँस लिया था। हाँ, आँसुओं को वह रोक न सकी जो उसके चेहरे को भिंगो रहे थे।

अवध झोला लिए आगे-आगे चलने को हुआ, पीछे गोपी की उँगली पकड़े कुम्हारिन थी।

ठीक इसी वक़्त मैना ने दर्दीला स्वर छेड़ दिया। कुम्हारिन ने मैना को देखा जैसे कह रही हो कि ध्यान रखना कुम्हार का। मैं जल्द लौटूँगी।

हाथ हिलाते हुए कुम्हार रुँधे कण्ठ से दीवार की आड़ में आ गया। पता नहीं क्यों इस वक़्त पत्नी को जाता देख वह सिसकियाँ दे रो पड़ा।

***

मण्डी के ठेले में जोतने के लिए बड़े मियां को चटकारा देता जब अवध बढ़ा, उस वक़्त इंतहा ख़ुश था। इसलिए कि अब वह बड़े मियां को लाइन पे ला देगा। बहुत बदमाशी, हरमपन जोता था, अब उसका हिसाब निपटाना है। देखता हूँ कौन बचाने आएगा अब! जीजा की मज़बूरी है और बहन बोलने से रही- ऐसे में मैं ख़ुदमुख़्तार हूँ। ऐसा बाँस बजाऊँगा कि शरीर की सारी चूलें ढीली हो जाएँगी। फिर करते रहना सीपो, सीपो। देखते हैं कितना सिपियाते हो। हरमपन न घुसेड़ दी तो अवध नाम नहीं। साला, नीच! कमीन! बिनती करी कि यार, बिरादर, किसी तरह काम निकाल दो। भाई रस्ते में खैंच के पड़ गया है। अगर वह खैंचे न होता तो कोई बात ही न थी। काम सुभीते से हो जाता। मैं सहारे के लिए था ही, ऐसे में भाई सुनने को तैयार ही नहीं। सच्चाई के लिए रोने लगे, भोला को धोखा दिया, उसे बताया नहीं साफ़-साफ़। एक नेक आदमी से बात छुपाई और उसे निकाल लाए। लो, अब निकाल नहीं लाया, सामने बात करके, सीधी-सीधी। अब सच्चाई झाड़ो। ईमानदारी का रँड़ापा रोओ। कौन सुनेगा? कौन है तुम्हारा जो बीच में आएगा। आए तो सई। समझा दूँगा उसे भी अच्छे से कि बीच में आने का मतलब क्या होता है। अवध से उलझने का मतलब क्या होता है- समझ में आ जाएगा जब लट्ठ चलेगा। साला हरामी... वह बड़बड़ा रहा है- बड़े मियां नाम रक्खा है, सारा बड़प्पन निकाल दूँगा इस बार। करो हरमपन, देखता हूँ कितना करते हो। टाँग के रख दूँगा, सारी हेकड़ी निकल जाएगी...

कुम्हार की पीछे से आवाज़ आई- सँभालकर रखना हमारे बड़े मियां को...

बिना पीछे देखे अवध ने जवाब दिया- चिंता न करो जीजा, ख़ूब आराम से रखूँगा। ऐसा आराम ज़िन्दगी में न मिला होगा। और अब आराम ही आराम है। कोई झंझट नहीं। मण्डी के मज़े लो और करो सीपो-सीपो! सुबह से शाम तक मज़े ही मज़े। एक चक्कर, दो चक्कर, तीन चक्कर, चार चक्कर, पाँच चक्कर। इस मण्डी से उस मण्डी, उस मण्डी से उस मण्डी। बढ़ते जाओ, चलते जाओ, गाड़ी खैंचते जाओ। दुनिया के मज़े लो ख़ूब, क्या रक्खा है ज़िन्दगानी में। खोने को क्या है अपने पास, पाने को ज़हान है...

बड़े मियां तेज़ गति से चल रहे थे, उन्हें हँकाने की ज़रूरत नहीं पड़ रही थी, उल्टे अवध को दौड़ना पड़ रहा था।

-यार, तू तो दौड़ रहा है, मुझे थका डालेगा, धीरे तो चल- अवध हाँफता बोला।

अवध जब बड़े मियां को लेकर निकला था तो उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था, गुस्से में तड़प रहा था, लेकिन पता नहीं अब यकायक उसे क्या हुआ कि वह सोचने लगा कि जानवर को सताने का कोई मतलब नहीं। जो हुआ सो हुआ, भूल जाओ। बड़े मियां से प्यार भरे अंदाज़ में बोला - देखो बड़े मियां, तुम्हें हम साफ़ समझा देना चाहते हैं। तू तो जानता है कि मैं अब ठेला खैंचने लगा हूँ। इस मण्डी से उस मण्डी। पहले वाला काम, खेती का, मैंने छोड़ दिया और ये बात मैंने अभी तक किसी से बताई नहीं, जीजा से भी नहीं, इसलिए भी नहीं बतलाई कि पहले काम तो जमे फिर बताएँ सबको! यहाँ काम जमा नहीं और हल्ला मच गया। इसलिए मैंने खेती से हाथ जोड़ लिए - साली में कुछ है भी नहीं, बरखा भी नहीं हो रही है, कुंओं में पानी नहीं है तो खेती भला क्या होगी? ख़ाक़! ऐसे में मैंने चुपचाप ये धंधा पकड़ लिया है। पिछली दफा तुम्हें जब लाए थे झूठ बोल के तब शुरुआत की थी और तब तुमने ऐसी की तैसी कर दी थी, नहीं तुम्हें मौज़ कराता। मण्डी में खाने की कोई कमी तो है नहीं, सब्ज़ी ही सब्ज़ी, और बो भी तरह-तरह की। ढेर लगा है, तुम मज़े से भर पेट खाते; लेकिन उस रात तो मेरी जान पर बन गई थी। वह हमारा साथी, करण था न, काम से पहले देसी जम के खैंच गया। अब खैंच तो ली लेकिन बेटा अपने को सँभाल नहीं पाए, फिर वह देसी भी पता नहीं कैसी थी कि उसने उसकी हालत बिगाड़ दी; चढ़ गई। ऐसी चढ़ी कि न पूछो। वह मण्डी में ही डल गया। कित्ती कोशिश की, उठा ही नहीं। फिर तुमने भी रंग में भंग कर दिया। दुलत्ती और चला बैठे- अवध दाढ़ दिखाने लगा - देखो, अभी भी दर्द बना है, तुमने ऐसी दुलत्ती भाँजी कि मैं चारों खाने चित। घण्टों होश नहीं। ठेले खड़े थे बेसहारा। हे भगवान! क्या करता उनका। फिर अकेले भगवान का नाम लेकर खैंचना शुरू किया। पूरी रात ठेले खैंचे तब जाकर काम पूरा हुआ - और पसीना इत्ता कि हर बार बनियान कपड़े गारने पड़ते... ख़ैर, अब तू गड़बड़ नहीं करेगा, समझ ले... रुक, पहले बीड़ी, खैनी का जुगाड़ तो कर लूँ....

अवध पान के ठेले के सामने रुक गया। उसी के बग़ल लाला की चाय की दुकान थी जहाँ इस वक़्त ताज़ा समोसे बनने की गंध उठ रही थी।

अवध बोला - बड़े मियां, समोसा खाना है तो बोल दे। गरम-गरम मामला है, ऊपर से धनिया की चटनी, ऐ रामू, एक गुटखा और जर्दा तो रगड़ बढ़िया, ख़ुशबूदार।

लाला बोले - अरे, ये बड़े मियां को तुम कहाँ ले जा रहे हो, यह तो भोला कुम्हार का साथी है।

अवध बोला - बड़े मियां ने हीला बदल दिया है। वक़्त के हिसाब से जीना चाहता है जिसमें मौज़-मस्ती भी कुछ करने को मिले, बहुत हो चुके मटके, कुल्हड़, सकोरे, परई!!!

लाला ने अवध से छिपाकर बड़े मियां को चार समोसे दिये जो कल रात के बचे थे। अंदर का माल ख़राब हो गया था।

बड़े मियां कुछ नहीं बोले। चुपचाप खा गए। जानवरों के साथ सब ऐसा ही बर्ताव करते हैं। किसी में ज़रा भी हमदर्दी नहीं।

-कैसे लगे बड़े मियां - अवध ने पूछा - अच्छे थे न? ख़ूब गर्म?

बड़े मियां ने कोई जवाब न दिया।

-एक और चलेगा? अवध ने पूछा

बड़े मियां कोई जवाब देते इससे पहले ही लाला ने एक काफ़ी गर्म समोसा बड़े मियां को दिया जिसे वे बहुत ही मुश्किल से किसी तरह हलक के नीचे उतार पाये। रास्ते में जहाँ खटखटे के घोड़े-खच्चर और गधे पानी सोखते हैं, अवध ने बड़े मियां को ढील दिया। खैनी-तम्बाखू का मज़ा लेने को भी कहा जिसे बड़े मियां ने हँसकर मना कर दिया।

अवध के व्यवहार पर बड़े मियां आश्चर्यचकित थे। ये वही अवध है कि कोई और अवध। यह तो बहुत ही अच्छा आदमी है। कितनी सेवा कर रहा है, कितना ध्यान रख रहा है। प्यार से काम समझाता है, ज़रा भी नाराज़ नहीं होता। ऐसे चलो, किनारे चलो, फासला बना के। रुक-रुककर सुस्ता के चलो, कोई जल्दी नहीं, कोई आफ़त नहीं फटी पड़ी है। ठेले मुकाम पर पहुँच जाएँ सही सलामत - यही अपना काम है। ठेले वाले कर्रे पैसे देते हैं तो उनका भी काम अच्छे से होना चाहिए, क्या?

हफ़्ते-दस दिन में बड़े मियां ने अवध का दिल जीत लिया। सलीक़े और लगन से ऐसा काम किया कि अवध उसे इंतहा प्यार करने लगा।

थोड़े ही दिन में बड़े मियां शहर के चप्पे-चप्पे से परिचित हो गए। किस मण्डी में, किस रास्ते से कैसे माल लेकर निकलना है- अच्छे से जान गए थे। कहाँ ढाल है, कहाँ चढ़ाव, कहाँ गहरा जानलेवा गड्ढा, कहाँ रास्ता सँकरा, कहाँ चौड़ा - सब उनके दिमाग़ में बसा था। आँख मूँदकर बता देते।

शाम को दो-तीन बजे से सब्ज़ी बाज़ार लगना शुरू हो जाता। शुरू में तो लोग इक्का-दुक्का दिखते लेकिन गैस बत्ती के जलते ही ऐसी गदर मचती कि न पूछो। ठेलमठेल। चीख़-गुहार। सब्जी वालों की ऐसी गुहार कि कान के पर्दे फट जाएँ। बड़े मियां सोचते, ऐसी गुहार की क्या ज़रूरत? लोग अपने आप आ रहे हैं, सामान ख़रीद रहे हैं, फिर भी गुहार! यह गुहार लगातार तेज़ होती जाती। जैसे-जैसे रात घनी होती जाती गुहार और भीड़ ढलान पर होती जाती। धीरे-धीरे भीड़ छँटने लग जाती। सब्जी बेचनेवाले ही रह जाते। गैस-बत्तियाँ बुझाई जाने लगतीं। और फिर सामान बँधने लग जाते। ठेलों को एक लाइन में बाँधना शुरू हो जाता। फिर शुरू होता इन्हें दूसरी मण्डी में ले जाने का सिलसिला।

बड़े मियां अपने काम को बहुत ही अच्छे से अंजाम दे रहे थे कि अगले माह ही ऐसा कुछ घट गया जिसने सब कुछ उलट-पलट डाला।

हुआ यह कि बड़े मियां ठेलों की आख़िरी खेप लेकर धीरे-धीरे बढ़ रहे थे। वे सबसे आगे थे और एक-दूसरे से बँधे दस ठेले उनके पीछे। यकायक उनके आगे दो साइकिल सवार जो बेतरह शराब पिए हुए थे, नशे में डाँवाडोल, उलझकर सड़क पर आ गिरे। शराबियों के गिरते ही सामने से तेज़ गति से आ रहा एक डम्फर, उनको कुचलने से बचाने के चक्कर में यकायक संतुलन खो बैठा। शराबी तो बच गए, रहे ठेले उसकी चपेट में आ गए। दस के दसों ठेले पहचान में नहीं आ रहे थे, दुच गए थे। उनमें लदा सामान चारों तरफ़ बिखर कर मिट्टी में मिल गया था। क़िस्मत अच्छी थी कि बड़े मियां को गिरने के बाद भी तनिक भी चोट न लगी और वे भौंचक खड़े थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। कैसे अवध को बुलाया जाए।

संयोग था कि अवध वहाँ आ पहुँचा। दुचे ठेले और सामान का सत्यानास देखकर उसका दिमाग़ घूम गया - बड़े मियां ने ज़रूर कोई हरमपन की तभी यह हादसा हुआ, अब ठेलेवाले उसे ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे? कहाँ से भरेगा वह पैसा! हे भगवान! उसकी आँखों में ख़ून उतर आया - उसने लट्ठ उठाया और अनगिनत लट्ठ बड़े मियां पर बरसने लगे। पाँवों पर लट्ठ, पीठ पर लट्ठ, सिर पर लट्ठ, पोंद पर लट्ठ। हे भगवान! ये ज़ालिम तो मार डालेगा। बड़े मियां गिर गए फिर भी लट्ठों की बरसात होती ही रही।

इस बीच, पता नहीं कैसे और क्या हुआ कि अवध का पाँव चीथड़े में उलझ गया और वह ज़मीन पर लोट गया।

बड़े मियां को जान बचाकर भागने का मौक़ा मिल गया। वे भागे, सिर पर पाँव रखे। बेतरह चिल्लाते।

***

पत्नी मैके क्या गई, कुम्हार को घर काटने-सा दौड़ता महसूस होता। लगता वह वीराने में रह रहा है जहाँ परिन्दे तक जाना पसंद नहीं करते। पत्नी जा रही थी तो मैना दर्दीला गीत गा रही थी। उसके जाते ही ऐसी चुप हुई जैसे कण्ठ अवरुद्ध हो गया। या वह बोलना भूल गई हो। कुम्हार ने कई बार आवाज़ देकर उसे बुलाया, दाने का आमंत्रण दिया, वह बंदी उतरी तो उतरी नहीं। लगता था जैसे उसे भी कुम्हारिन का जाना अखर गया हो। पेड़ में छिपी बैठी वह कभी ज़ोरों से पंख फड़फड़ा उठती जिससे उसके होने का एहसास तो होता, लेकिन वीरानगी और बढ़ गई-सी लगती।

रात को कुम्हार को भूख ही नहीं लगी, इसलिए पानी पीकर खाट पर लेट गया। अँधेरी रात थी, हाथ को हाथ न सूझने वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। पल भर को कुम्हार की आँख लगी कि एकदम से चौंककर उठ बैठा। लगा पत्नी है जो बड़े मियां को पानी देने गई है। बाल्टी से वह उसके बड़े मुँह के मटके में पानी कुरो रही है। वह उठा और धीरे-धीरे चलता सार की तरफ़ गया। सार में घना अँधेरा था। बड़े मियां को तो अवध ले गया था, वो तो यहाँ थे नहीं, फिर पत्नी भी तो नहीं है- वो कैसे यहाँ आ गई।

गहरी साँस छोड़ता कुम्हार खाट पर वापस आ गया। पता नहीं क्यों खाट पर बैठते ही उसे लगा, पत्नी जाँत चला रही है, साथ में लोकगीत की कोई दर्दीली पंक्ति जाँत की चाल से मिलाकर गा उठी है। रह-रह चूड़ियाँ भी खनक रही हैं। वह खाट से उठा, झोपड़े में गया - कोई न था!

हे भगवान! क्या हो गया है उसे! उसने श्यामल के घर की टोह ली। यह आवाज़ और किसी की नहीं, कुम्हारिन की थी - उसकी पत्नी की। उसने उसका नाम मन में उच्चारित किया - परबतिया! परबतिया!!

खाट पर सीधा लेटकर वह सोचने लगा कि पत्नी कब मायके गई थी। उसे कुछ याद नहीं। शायद गोपी छे माह का था तभी एक माह के लिए गई थी। उसके बाद घर वह एक पल को नहीं छोड़ पाई थी। घर गृहस्थी में ऐसी फँसी कि सीवान-खेत से आगे न बढ़ पाई। यही उसकी चौहद्दी थी जिसमें वह कोल्हू के बैल की तरह घूमती रही।

-सोते क्यों नहीं? क्या सोच रहे हो? - जैसे ही उसकी आँख लगी, कानों में ये शब्द बजे। उसने आँखें खोलीं, देखा तो कोई नहीं। वह सोच में पड़ गया- पत्नी की आवाज़ थी, कानों में गूँजी थी। कहाँ से आई? कैसे आई? समझ में नहीं आता। ज़रूर कुछ है जो समझ से परे है! मैके में वह उसे बेक़रारी से याद कर रही है, तभी वह याद यहाँ मुझे बेक़रारी में डाले है।

यकायक वह उठ बैठा। सोचा, क्यों न सास के बहाने वह पत्नी से मिल आए। सास की ख़ैर-ख़बर मिल जाएगी इसी बहाने पत्नी से भेंट भी हो जाएगी। मन भी जुड़ा जाएगा। फिर सोचा, कहीं बुरा न मानें पत्नी तो? मानने दो बुरा। पत्नी से ही तो मिलने गया था, किसी और से तो नहीं। इसमें हरज क्या है? फिर अवध ने भी तो आने के लिए इसरार किया था, कई बार बोला था- यह तर्क देकर वह लेटा और विचार बना लिया कि कल सुबह वह घर से निकलेगा और सीधे ससुराल के लिए चल देगा। वैसे ससुराल है भी कितनी दूर। कुल मिलाकर दस किलोमीटर। पाँचों पीरन के पास!

अलसुबह जब झीना उजास फैल रहा था, कुम्हार को नींद लग गई। नींद में उसने देखा, बड़े मियां भयंकर चीत्कार के साथ सरपट, सिर पर पैर रखे उसकी तरफ़ दौड़े चले आ रहे हैं और उनके पीछे अवध है जिसके हाथ में है बड़ा-सा लट्ठ, तेल पिया। अवध बेतरह ग़ुस्से में है, अलफ़, बेहिसाब गालियाँ बकता। वह बड़े मियां को रुकने के लिए चिल्ला रहा है ताकि वह उसका मार-मार कर कचूमर निकाल दे। बड़े मियां हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। सार में पनाह के लिए वे भागे। अवध सार में पहुँच गया। बड़े मियां वहाँ से किसी तरह निकले और कुम्हार के झोपड़े में घुस गए और खाट पर लेटे कुम्हार के ऊपर चढ़ बैठे बेतरह गुहार लगाते कि बचाओ! बचाओ!! जल्लाद से बचाओ!!!

भयंकर चीख़ के साथ कुम्हार उठ बैठा, आँखें खोलकर देखा तो सामने सचमुच में बड़े मियां खड़े थे। बड़े मियां के अंजर-पंजर ढीले थे। शरीर ख़ूना-ख़ून था। पैर, सिर, पीठ, गरदन, शरीर का कोई भी हिस्सा ऐसा न था जो चोटखाया न हो, ख़ून से छिबा न हो।

कुम्हार को यह समझते देर न लगी कि किसने इसके साथ दुराचार किया। उसकी आँखों में ख़ून उतर आया, बावजूद इसके उसने ज़ब्त किया। बड़े मियां के घावों को गर्म पानी से धोया, उस पर फिटकिरी फेरी और मरहम का लेप लगाया।

बड़े मियां को दाना-पानी देकर कुम्हार घण्टों उसके बदन को सहलाता रहा।

दूसरे दिन दोपहर होने से पहले कुम्हार बड़े मियां के साथ अपनी ससुराल के दरवाज़े पर था। बड़े मियां ने सी-पो की मीठी गुहार से साँकल खोलने का निवेदन किया।

कुम्हारिन ने साँकल खोली, दोनों को सामने खड़ा देखा तो शर्म से सिर पीट लिया- हाय दैया! फिर कुम्हार से कहा- इतनी बेसब्री की क्या ज़रूरत थी। भगे चले आए। एकाध दिन तो रुक जाते। साथ में बड़े मियां को भी ले आए! मैना की कसर रह गई थी बस...

***

कुम्हार जब ससुराल पहुँचा था तो दरवाज़े की संध से उसने पत्नी को देख लिया था जो आँगन में पटे पर बैठी हसिया से तरकारी काट रही थी। सामने उसकी माँ नाव जैसी खाट पर लेटी थी। माँ पाँव में चाँदी के लच्छे पहने थी जो धूप में चमक रहे थे।- ये तो भली-चंगी है, बीमार बिल्कुल नहीं। जरूर परबतिया को बुलाने का नाटक रचा गया। वैसे तो किसी तरह निकल न पाती।

उसका मन हुआ कि साँकल खड़काए लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया, पीछे हट गया। बड़े मियां से फुसफुसाकर बोला- यार, तुम आवाज़ लगाओ न।

-न बाबा, हमसे न होगा- बड़े मियां घबराकर बोले।

-क्यों नहीं होगा?

-मुझे डर लग रहा है। भौजाई उल्टा-सीधा न सोचें।

-तो बेवकूफ ये बात तूने पहले क्यों नहीं बताई।

-तुमने पूछा कब था? मैं तो तुम्हारी ख़ातिर दौड़ा चला आया।

-तो मेरे ख़ातिर ही अब आवाज़ लगा दो।

-न बाबा!!!

-तो तू लौट जा यहाँ से - कुम्हार ने जब यह कहा तो बड़े मियां आँखें चमका के बोले- यह तुम्हारी नहीं, मेरी भी ससुराल है।

-बो कैसे?

-तुम्हारी ससुराल है तो इस नाते मेरी भी ससुराल हुई।

-तो तू ससुराल में रसगुल्ले खा, मैं निकलता हूँ- जब कुम्हार ने ऐसा कहा और बढ़ने को हुआ तो बड़े मियां ने हारकर गुहार लगा दी।

एक हफ़्ते बाद जब कुम्हारिन घर आई, कुम्हार ने उसे ये बातें बताईं।

कुम्हारिन बोली- तुम भी गजब हो- वह हँसने लगी।

कुम्हार भी हँसा।

कुम्हारिन बोली- चले गए तो अच्छा ही हुआ, माँ से, सबसे भेंट हो गई। वैसे जिया को कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं थी। दस्त हुए और वह लस्त पड़ गई। लगी छाती पीटने कि बुलाओ सबको। बिचारा अवध काम छोड़कर भागा आया। समय से जिया को दवा मिल गई, एक खुराक में बच गई... लेकिन तुम्हारे बिना एक पल वहाँ रहना मुश्किल था। मैं तो उस रात जागती रही, करवटें बदलती रही। बस तू ही तू आँखों के आगे था।

कुम्हार ने मुस्कुराकर कहा - मैं तो तान के सोया और देर से उठा।

कुम्हारिन बोली- हो ही नहीं सकता! अगर ऐसा होता तो भागे आते भाई बंद को लिए!

-मैं तो जिया की ख़ातिर गया था।

-झूठा कहीं का! तू ऐसई बोलता है, कसम खा।

-किसकी? लंगड़ी की।

-हाँ, तेरे लिए तो वही सबसे प्यारी है।

-हाँ, मैं लंगड़ी की कसम खाके कहता हूँ कि उस रात मैं सो नहीं पाया। पूरी रात तेरी याद में कट गई...

-अब तू जान और तेरी लंगड़ी जाने!

हल्की ठण्ड थी, धूप अच्छी लग रही थी। कुम्हारिन बोली- यहाँ तो कम है, माँ के यहाँ जादा ठण्ड थी। तुम जब आए थे जिया धूप में पड़ी थीं। उसके पाँव के चाँदी के लच्छे कैसे चमक रहे थे काँच से....

-बुढ़ापे में भी जिया गहने लादे रहती हैं।

-क्यों न लादें, भगवान ने दिया है तो लादे हैं। उस पर भी नज़र लगी है कि माँ किसे देती है। अवध को या दया को। क्या करना है अपने को! सब अच्छे से रहें- भैया जियें कुशल से काम।

जीजी! - गौरी की आवाज़ थी।

श्यामल के बाबू ने शहर में झुग्गी बना ली थी। लीला ने जगह दिखलाई और बस मामला जम गया। कई दिनों से यहाँ से जाने का हो रहा था, सामान तो थोड़ा-थोड़ा करके चला गया था, कुछ रह गया है, वह यहीं पड़ा रहेगा, उसकी ऐसी ज़रूरत भी नहीं। आज शाम को गौरी बच्चे श्यामल के साथ यहाँ से चली जाएगी। यह ख़बर देने वह आई थी। वह यह भी कह रही थी कि तुम लोग भी वहीं आ जाओ, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। यहाँ कुछ नहीं धरा है।

गीली आँखें रुँधा कण्ठ लिए जब पत्नी लौटी, कुम्हार सब जानते हुए भी अनजान बना रहा, प्लास्टिक के गिलासों की गिनती करने में उलझा था। पत्नी ने गौरी के यहाँ से जाने की ख़बर दी तब भी वह कुछ नहीं बोला। बोलकर भी क्या करेगा वह?

शाम को गोपी श्यामल के घर से लौटा तो आँखों में आँसू भरे, बेआवाज़ रो रहा था।

माँ ने अनजान बनते हुए पूछा - क्या हो गया बेटा?

गोपी यकायक ज़ोरों से रो पड़ा।

-क्या हो गया है? बोल तो सई।

रोते-रोते वह बोला- श्यामल जा रहा है, हम किसके साथ खेलेंगे। हमें भी भेज दो उसके साथ।

कुम्हार बोला- तो यहाँ बड़े मियां के साथ कौन खेलेगा? मैना को दाना-पानी कौन देगा?

-अम्मा दे देगी।

-अच्छा दादा- तेज़ी से आता श्यामल का बाबू कुम्हार-कुम्हारिन के पाँव छूता बोला- हम लोग निकल रहे हैं, अब तुम्हारा इंतज़ार है। आ जाओ तो मज़े रहेंगे। लीला और गुड्डू का जलवा है, घर बन जाएगा चुटकियों में... अच्छा...

काफ़ी दूर तक दोनों उन्हें ऑटो के पीछे-पीछे चलते छोड़ने आए।

गोपी खाट में मुँह छिपाए रो रहा था।

***

फैक्ट्री लगने वाली बात जंगल में आग की तरह फैली। और शहर के जिस भी कोने में बस्ती के लोग थे, उन तक किसी न किसी के ज़रिए पहुँच ही गई। यह बात सच है कि उनकी ज़मीनों पर आँच नहीं आई थी, इसलिए वे अंदर ही अंदर ख़ुश थे लेकिन यह भी सच है कुम्हार के साथ होने वाले अन्याय से सभी दुखी भी थे और उसे दिलासा दे रहे थे कि जो भी सुना है, ख़राब है, लेकिन हम तुम्हारे साथ हैं, तुम जब भी आवाज़ दोगे, हम हक़ की लड़ाई के लिए आ खड़े होंगे। कुम्हार के लिए यह एक बहुत बड़ी बात थी कि समूची बस्ती के लोग उसके साथ हैं। सभी उसके साथ लड़ने-मरने के लिए तैयार हैं। उसकी छाती फूल कर दुगुनी हो गई थी।

सुनी-सुनाई बातों से जहाँ कुम्हार विचलित था, वहीं यह सोच उसे अंदर ही अंदर ताक़त दे रहा था कि जब तक बात साफ़ होकर सामने नहीं आए घबराना मूर्खता है। पटवारी ने भी यही कहा है कि फैक्ट्री लगने वाली है, लेकिन कहाँ लगेगी- यह बात उसने अभी तक साफ़ नहीं की थी। वह तो यहाँ तक कह रहा है कि मेरे रहते घबराने की ज़रूरत नहीं। मुझ पर भरोसा रक्खो, मैं सब रास्ते पर ला दूँगा। यह बात अलग है कि पटवारी ने अभी तक जो काम किए, ग़लत किए हैं, पत्नी भी इसी बात को रह-रह दुहराती रहती है लेकिन जब तक वह हमारे साथ कुछ ग़लत नहीं कर रहा है, उस पर भरोसा करने से क्या जाता है।

मैना का स्वर आज बदला हुआ है। जैसा सुरीला वह गाती उसके बिल्कुल उलट। उसमें कुछ ऐसा भाव है जैसे कोई घपला होने वाला है, कुम्हार को उससे आगाह कर रही हो। और कुम्हार है कि उसकी बात समझ नहीं पा रहा है। निरीह भाव से वह टुकुर-टुकुर पत्नी की ओर ताक रहा है। कुम्हारिन भी कुछ समझ नहीं पा रही है। यकायक वह बोली- चिड़िया ऐसा तभी बोलती है जब उन्हें साँप या बिल्ली आते दिखाई देते हैं। वे संकट पहचानती हैं।

-चल तू काम कर, जो होगा सो देखा जाएगा। अभी से उसके लिए हलाकान क्यों हों? - कुम्हार ने कुम्हारिन से कहा।

कुम्हारिन चाक के पास रौंधी माटी रख रही थी और कुम्हार चाक पर बैठने से पहले बड़े मियां को देखने गया। उसके घावों पर उसने मरहम का लेप लगाया था। मरहम घाव पर टिकता नहीं था इसलिए कई-कई बार उसे लगाना पड़ता था। और सब घाव पुर गए थे, कूल्हे का घाव बाक़ी था जो उसे भारी पीड़ा दे रहा था, पुरने का नाम नहीं ले रहा था।

कुम्हार के नगीच आती कुम्हारिन बोली- नाकिस ने इतनी बेरहमी से मारा कि जान निकलना रह गया था।

-पूरा मार डालता तो सब्र होता।

कुम्हारिन आँखें तमतमा के बोली- अवध अब दिखे तो बताऊँ उसे। इतना सुनाऊँगी कि यहाँ दुबारा कभी पाँव नहीं रखेगा।

-वह नीच है कमीन! ऐसा दोगला आदमी हमने देखा नहीं। झूठा कहीं का मक्कार। देखो न, मण्डी में काम करने लगा, ख़बर तक न दी जैसे मैं उससे काम की बोलूँगा।

-मर भी जाऊँ तो न बोलूँ - पत्नी ने कहा।

गहरी साँस भरता कुम्हार चाक पर बैठने को हुआ कि उसे पटवारी आता दिखा। पेड़ों की चितकबरी धूप-छाँव में धीरे-धीरे चलता वह सीधे कुम्हार के पास आता जा रहा है।

कुम्हारिन बोली- लो, पटवारी आ गया। मैना इसके लिए तो नहीं किटकिटा रही थी?

कुम्हार कुछ नहीं बोला। उसके स्वागत में झुककर खड़ा हो गया, बोला- हुजूर, बैठें- बाल्टी में हाथ डुबोता मिट्टी साफ़ करता वह बोला- बस एक मिनट हाथ धोके खाट लाया।

वह खाट के लिए झोपड़े में घुसा।

खाट बिछाता वह बोला- बैठें हुजूर।

-अरे यार, मैं तो यूँ ही यहाँ घूम आया, मैं तो तहसील जा रहा था- यकायक नई बुनी खाट को देखता बोला- बड़ी सुन्दर बुनी है। भोला, तू जो काम करता है नायाब करता है। तेरे मटके भी ऐसई कमाल के होते हैं!

वह खाट पर बैठ के बाध पर पंजे पटकता उसकी तारीफ़ के पुल बाँधने लगा कि मैना ज़ोरों से किटकिटाने लगी।

सहसा वह फड़फड़ाते हुए तीर की तरह नीचे उतरी और पटवारी के सिर पर ऐसा झपट्टा मारा मानो उसका मुँह नोच डालना चाहती हो।

पटवारी सकते में आ गया। घबरा गया। लगा बाज है जो उसकी आँखें निकालना चाहता है।

वह हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ और ज़ोरों से चीख़ा- ये बाज़ कहाँ से आ गया! मारो! मारो!! मारो!!!

मैना पलक झपकते नीम में कहीं छिप गई थी। पटवारी हकबकाया हुआ था- क्या करे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बाज उस पर क्यों झपट्टा मार रहा है? उसने क्या बिगाड़ा है उसका? वह निरीह भाव से मुस्कुराया और कुम्हार की ओर देखने लगा जैसे उसी से यह प्रश्न कर रहा हो।

कुम्हार जानते हुए भी अनजान बना रहा और यह कहने लगा- बैठें हुजूर, बाज-फाज से क्या डरना, पंछियों की भला किसी से क्या अदावत होगी! वे तो वैसे ही इंसानों से दूर रहना चाहते हैं।

सिर खुजलाता पटवारी जैसे ही खाट पर बैठने को हुआ- मैना फिर उस पर झपट्टा मार बैठी।

अजीब मामला था। पटवारी परेशान। अब वह एक पल भी यहाँ बैठना नहीं चाह रहा था, बोला- फिर आते हैं भोला, ये बाज़ कहीं मेरी आँखें न फोड़ डाले। क्या भरोसा! पता नहीं कौन-सी अदावत का बदला ले रहा है यह दुष्ट? आज का दिन ही ख़राब है, साहब अलग परेशान कर रहे हैं। ख़ैर, भोला,- आँखों पर हाथ धरे, कहीं बाज़ उस पर फिर झपट्टा न मार बैठे-पटवारी जिस रास्ते आया था, उसी पर धीरे-धीरे चलता आगे बढ़ा और सीधे बाबू के घर जा पहुँचा।

बाबू कई दिनों से बीमार था। पटवारी को देखते ही बोला- आओ दादा, आओ! यहाँ तो समूची बस्ती के लोग- सब एक ही बात पूछ रहे हैं कि कहीं उनकी ज़मीन तो नहीं दब रही है! मैं कुछ नहीं बोल रहा हूँ। मुँह सिए बैठा हूँ, जब तुम इशारा करोगे तभी मैं कुछ बोलूँगा। लेकिन दादा मेरी समझ में नहीं आ रहा, तुम मामले को इतना झुला क्यों रहे हो? जब ऊपर से आदेश आ गया है, तो थमा दो उसे-काहे को रोके पड़े हो...

पटवारी ढेर सारा पान मुँह में भरे बाबू को देखता, मुस्कुराता रहा। यकायक पान की पीक को एक तरफ़ थूकता बोला- देखा तुमने! मेरी ज़रा-सी हवा से बस्ती के लोग हरकत में आ गए। हड़कम्प मच गया है। रहा कुम्हार, ऊपर से चाहे वह कितना बन रहा हो, अंदर से टूट चुका है। बस थोड़ा और रुक जाओ, आदेश तो थमाना ही थमाना है...

यहाँ पटवारी और बाबू में ये बातें चल रही थीं, वहीं कुम्हार और कुम्हारिन मैना की कारसाज़ी पर आह्लादित थे। कुम्हारिन ठहाका लगाके बोली- मुझे तो लगा, मैना आँखें नोंच के रहेगी। यह कहो बच गया, नहीं सूरे बना देती। अब वह यहाँ आने वाला नहीं।

-आएगा तो मैना उसकी गत बना देगी। कुम्हार हँस के बोला।

कुम्हार ने सोचा पटवारी अब यहाँ आने से पहले दस बार सोचेगा। लेकिन पटवारी था कि दूसरे दिन सुबह-सुबह कुम्हार के झोपड़े के सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था।

कुम्हारिन कुम्हार से बोली - तुम अंदर रहो, मैं देखती हूँ। क्यों बार-बार फेरे लगा रहा है?

कुम्हार बोला - लगाने दो फेरे! चिंता काहे की। तू मत जा बाहर। औरतजात है, अच्छा नहीं लगता। कुछ ऊँच-नीच हो जाएगी।

-ऊँच-नीच की मुझे चिंता नहीं- कुम्हारिन फुसफुसाकर बोली।

-तुझे नहीं है, मुझे तो है।

-क्या ऊँच-नीच होगी बता? कुम्हारिन यकायक ग़ुस्साकर बोली।

-यही कि यह अच्छा आदमी नहीं है, इसके मुँह लगना ठीक नहीं।

-इसके मुँह कौन लग रहा है- इसे तो समझाना है कि कोई भी जुल यहाँ चलने वाला नहीं। दुनिया में हल्ला करने से कुछ नहीं होगा। मान लो अगर पुराना पैसा है तो पर्ची काट दो, हम भर देंगे। काहे को बार-बार भिखारियों की तरह आ खड़े हो रहे हो।

कुम्हार हँस पड़ा। कुम्हारिन भी।

कुम्हारिन आगे बोली- देख रहे हो तुम! फेरे पर फेरे। कोई तरीका है यह?

कुम्हार बोला - अच्छा तू तरीका मत सिखा, अंदर चल।

-मैं अंदर नहीं जाने वाली। इसकी पग्गड़ न उतार दी, नाम परबतिया नहीं।

-तेरे हाथ जोड़ता हूँ।

-पाँव भी जोड़ ले तब भी मैं सुनने वाली नहीं।

कुम्हार पत्नी की कलाई पकड़े अंदर की तरफ़ खींच रहा था, पत्नी थी कि समूची ताक़त लगाकर बाहर की तरफ़ निकल पड़ने के लिए कसमसा रही थी। यकायक उसने दाँत काटने का नाटक कर कलाई छुड़ा ली और बाहर की ओर भागी। बाहर से उसने टटरा भिड़ा दिया।

पटवारी को सामने खड़ा देख, कुम्हारिन इस अंदाज़ में बोली जैसे उसके आने की उसे भनक तक न हो- हुजूर, ये तो घर पे नहीं हैं। अभी-अभी निकले हैं, बड़े मियां का मरहम लेने गए हैं। आप बैठें, खाट लाती हूँ...

-मैं बैठूँगा नहीं, चलूँगा।

-कोई बात हो तो बता दें - मैं उन्हें बतला दूँगी।

-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। बस ऐसई, वह हँसा- पटवारी जब तक अपनी जरीब न घुमा ले उसे चैन कहाँ पड़ता है- चलो तुम कहती हो तो थोड़ा इंतज़ार कर लेते हैं, खाट की चिंता तुम न करो, खड़े रहेंगे, ऐसा क्या?

कुम्हारिन जिस उबाल के दबाव में झोपड़े से निकली थी, पता नहीं क्या हुआ कि वह शांत हो गया। दरवाज़े आए आदमी के साथ अनादर ठीक नहीं जब तक वह कोई गड़बड़ न करे। इस लिहाज़ से टटरा हटाती अंदर आई और खाट लेकर बाहर निकली।

खाट बिछाती वह बोली - बैठें हुजूर, दरवाज़े पर खड़ा रहना अच्छा नहीं लगता।

मुस्कुराता हुआ पटवारी खाट पर बैठ गया। उसने पान की पन्नी निकाली और कई सारे पान मुँह में ठूँस लिये। थोड़ा सा चूना भी उँगली से काटा और चारों तरफ़ नज़र मारने लगा।

इस बीच कुम्हारिन काम के बहाने से झोपड़े के पीछे गई। आँगन से होती हुई बाहर के झोपड़े में आई, कटाक्ष करती कुम्हार से बोली - तुम्हारे जीजा दरवज्ज़े पर बैठे इंतज़ार कर रहे हैं, तुम्हारा। आरती के लिए जाओ।

-तू तो कह रही थी कि पग्गड़ उतार लूँगी, अब क्या हुआ?

कुम्हारिन चुप।

-बोल न, क्या हुआ?

-यह तुम्हारा मामला है, तुम जानो।

-यह हमारा अकेले का मामला है? इसमें तुम नहीं हो?

-मैं क्या जानूँ! - कुम्हारिन तंजिया अंदाज़ में मुस्कुराती बोली।

-ये तो अंधेर है। - कुम्हार गहरी साँस छोड़ता बोला।

-चिंता न कर मेरे माटी के कुम्हार, चिंता न कर! तूने ही कहा है जब तक बात साफ़ न हो, चिंता में गलना अच्छा नहीं।

सहसा बाहर पेड़ पर मैना अजीब-सी आवाज़ में किटकिटाने लगी। पटवारी खाट पर पैर चढ़ाकर बैठ गया था, मैना का यह रूप देखकर उठ खड़ा हुआ - भयभीत सा।

कुम्हार ने चुटकी ली - तू नहीं है तो मैना है मेरे साथ - वह निपट लेगी।

कुम्हारिन ने जब इस पर नाराज़गी जतलाते हुए उसे तिरछी नज़रों से देखा तो वह हँसता आगे बोला- जा तू, अपना काम निपटा। बड़े मियां को खुल्ला छोड़ दे, इधर-उधर चर लेगा। कुछ तो पेट भरेगा उसका।

सार में बड़े मियां पीठ खुजला रहे थे, कुम्हारिन को देखते ही बोले- ये पटवारी जानहार दरवज्ज़े पे काहे खड़ा है जमदूत की तरह। कई दिनों से इसे देख रहा हूँ, चक्कर काटते।

-मुझे नहीं पता, इनसे पूछ तू।

-मुझे तो इसकी आँखों में बदमाशी दीखती है।

-तो तू कुछ कर। कोई खेल दिखला दे, जो होगा देखा जाएगा।

-और जो कुम्हार मेरी कुटम्मस करे तो...

-मैं किस मर्ज़ की दवा हूँ...

कुम्हारिन ने बड़े मियां को खुल्ला छोड़ा तो वह बगटुट दौड़ता झोपड़े के सामने खाट पर बैठे पटवारी को देखता उस तक जा पहुँचा और फिर पता नहीं क्या हुआ कि वह उसके मुँह पर ज़ोरों की सी-पो, सी-पो की गुहार लगाने लगा। मैना भी किटकिटाते हुए पेड़ से उतर पड़ी।

एक तरफ़ बड़े मियां की गुहार थी, दूसरी तरफ़ मैना की किटकिट...

पटवारी ने सोचा - भाग लो यहाँ से, कहीं बाज़ झपट्टा न मार बैठे और उसकी हालत बिगाड़ दे और ये बड़े मियां को तो देखो, मुँह पर रेंक रहा है जैसे कान के पर्दे फाड़ डालेगा। उस पर कहीं दुलत्ती झाड़ दी तो मैं कहीं का न रहूँगा।

यकायक पटवारी यहाँ से भागा और सीवान पर जाकर साँस ली। महुए के पेड़ की छाँह में खड़े होकर वह कुम्हार का इंतज़ार करने लगा। कुम्हार आएगा तो इसी रास्ते। और कोई रास्ता है नहीं। देखते हैं कब तक नहीं आता है।

***

चाक के सामने कुम्हार उदास बैठा है। थोड़ी ही दूरी पर घरवाली है जो कुम्हार की उदासी से आहत है। जबसे कुम्हार बाज़ार से लौटा है- गुमसुम है, उदास है। जैसे कोई नाइंसाफी उसके साथ हो गई है जिसे वह पीड़ा की वजह से होंठों तक ला नहीं पा रहा है। क्योंकि ख़ुद तो वह उससे टूटा है, कहीं घरवाली भी बेज़ार न हो जाए। पत्नी समझ रही है कि ज़रूर पटवारी की कोई न कोई कारस्तानी है जिसके चलते कुम्हार उदास हो गया है।

ढेरों माटी वह छान चुकी थी, इस वजह कि इसी बहाने वह कुम्हार से बात भी कर लेगी, लेकिन कुम्हार है कि अनमना, रह-रह गहरी साँस छोड़ता और ‘हे भगवान’ की कराह छोड़कर ज़मीन ताकने लग जाता।

मैना चाक पर बैठी है। कहने पर भी उसने दाने की तरफ़ नहीं देखा-जैसे कुम्हारिन की तरह वह भी कुम्हार से उदासी का कारण जानना चाहती हो।

-बड़े मियां के कूल्हे का घाव पुर नहीं रहा है।

कुम्हार ने गहरी साँस छोड़ी।

-मक्खियाँ अलग जान खाए जा रही हैं उसकी - कुम्हारिन की यह बात भी कुम्हार की ज़बान खोलने के लिए थी, लेकिन कुम्हार चुप तो चुप।

-गोपी दिन भर श्यामल की रट लगाए रहता है। न खेलता है न कुछ खाता है...

यह बात ज़रूर कुम्हार को हिला डालेगी लेकिन यह भी बेकार गई।

-मैं जाऊँ? - जलती आवाज़ में जब कुम्हारिन ने यह प्रश्न किया तो कुम्हार के बोल फूटे।

-कहाँ जा रही है?

-कुएँ में कूदने।

-कुएँ में कूदने! काहे के लिए?

-कुएँ में कूद रही हूँ और पूछता है काहे के लिए। इत्ता भोला क्यों बन रहा है तू?

कुम्हार ने कनखियों से पत्नी को देखा जो उसका नाम कभी नहीं लेती थी, आज कैसे अनचित्ते में ले बैठी।

पत्नी बात तो समझ रही थी बावजूद इसके अनजान बनी रही।

-भोला बनने की बात नहीं है। भोला तो मैं हूँ।

-कहाँ है भोला? बता तो सई। मैं उसे ढूँढ रही हूँ।

-अब तुझे नहीं दीखता है तो क्या करूँ। चिराग लेकर दिखाता फिरूँ?

-तीन घण्टे से तू होंठ सिए बैठा है, तुझे ज़रा भी रहम नहीं कि मैं कित्ता परेशान हो रही हूँ!

कुम्हार सोच में डूब गया। अब इसका क्या जवाब दे? क्या बताए कि बाज़ार में था तो वह ख़ुश था। उसने दूकानों में माल पहुँचाया था और उसका पैसा भी उसे मिला था। लाला ने उसकी इस बात के लिए तारीफ़ की थी कि थोड़े ही दिनों में उसने बाज़ार की चाल पकड़ ली है और उसका पक्का खिलाड़ी हुआ जा रहा है। लाला की बात से उसकी छाती दुगुनी हो गई थी। उसी वक़्त उसने चौकड्डे पर गन्ने की चरखी जमाने की बात भी सोची थी और उसी की धुन में वह था। रमेसर ने उसे किराए पर चरखी देने का वचन दिया था। बस ठेले की जुगाड़ उसे करनी थी... इसी सोच में डूबा वह बड़े मियां के पीछे-पीछे चला जा रहा था कि महुए के पेड़ के पास ही सब मामला बिगड़ गया...

पटवारी ने उसे घेर लिया था। पटवारी के साथ बाबू भी था जिसने पटवारी से वादा किया था कि वह उसके इशारे पर चलेगा और उसी के स्वर में स्वर मिलायेगा। बाबू अब पूरी तरह चंगा था।

बाबू ने चुटकी लेते हुए कहा - भोला, आज तो तू भारी ख़ुश दिख रहा है, लाटरी हाथ लग गई क्या?

भोला सिटपिटाया-सा बोला - नहीं मालिक, लाटरी में हमारा तनिक भी भरोसा नहीं। बस ऐसई...

पटवारी बोला- तेरे घर गए थे, तू था ही नहीं। कहाँ चला गया था? तेरी घरवाली ने बताया नहीं कि हम आए थे। काफ़ी देर तक बैठे रहे, फिर तेरे बड़े मियां और उस दुष्ट बाज़ ने हमें वहाँ टिकने नहीं दिया। ऐसी ख़ातिरदारी की कि कुछ कह नहीं सकता।

भोला ने विनीत स्वर में कहा - हुजूर, घरवाली ने बताया था... सहसा बात घुमाकर बोला - बात ये हुई कि सास की तबियत जादा खराब हो गई थी, उसी चक्कर में वहाँ निकल गया था, इसलिए भेंट नहीं हो पाई।

पटवारी बोला - कोई बात नहीं भोला, अब मिल गया है तू - फिर कुटिलता से आँख मारकर बाबू से बोला - भोला को काग़ज़ दे दो।

बाबू ने कमीज़ की जेब से एक काग़ज़ निकाला और भोला को थमाता बोला - ले, तहसील से आया है, पढ़ ले...

भोला घबरा गया, बोला - क्या है, हुजूर, हम तो पढ़े-लिखे हैं नहीं, आप बताएँ कि यह क्या है? -भोला हाथ जोड़ता दोनों के सामने खड़ा था।

पटवारी ने कहा - घबराने की कोई बात नहीं है। वही फैक्टरी वाली बात है।

बाबू ने समझाया - देखो, हाँ, यहीं खड़े रहो, उधर मत जाओ। क्या है कि गौरमिंट ने एक आडर निकाला है। आडर यह है कि सड़क किनारे और उसके आजू-बाजू जो लोग बसे हैं उनके पास ज़मीन का पट्टा है तो उसे दिखाएँ। पट्टा नहीं है तो वह ज़मीन कब्जे की मानी जाएगी, गौरमिंट सबको हटाएगी... तू घबरा न, तू तो बरसों से रह रहा है, तेरे पास तो पट्टा होगा।

कुम्हार बोला - मालिक, पट्टे की हम नहीं जानते, हाँ, ज़मीन हमारे पुरखों की है। मुद्दतों से हम यहाँ रहते और खेती करते आ रहे हैं, यह ज़मीन हमारी है। हम तो उसमें अन्न उगाते हैं किसी से भी पूछ लो...

पटवारी बोला - किसी से क्या पूछ लें, तू बता? पट्टा है तो दिखा।

-मालिक, बो तो खसरे-खतौनी में सब होगा हमारे बाप-दादों का नाम, आप देख लें...

बाबू ने उसके कंधे पर हाथ रखा, कहा - अभी तू परेशान न हो, घर में देख ले, सब मिल जाएगा।

पटवारी ने सान्त्वना के अंदाज में कहा- हम तो काग़ज़ देना नहीं चाह रहे थे, वैसे यह तेरे नाम है भी नहीं, आम जनता के नाम है, आडर है, सूचना है। हम कई दिनों से टालते आ रहे थे कि किसी तरह बात टल जाए, लेकिन क्या है, ऊपर का फरमान है। हम कितने दिन इसे दबा सकते हैं, जितने दिन हमसे दब गया, हमने दबाया। अब जब हम पर दबिश पड़ रही है, हम लाचार हैं। ये काग़ज़ सबको थमाना पड़ रहा है, फिर तू चिंता काहे कर रहा है। मैंने पहले भी कहा था कि मैं तेरे साथ हूँ और अंतिम समय तक रहूँगा, तू विश्वास तो कर! ऐसे काग़ज़ तो आए दिन आते हैं- मैं सब मामला निकाल दूँगा।

सहसा दोनों ‘बड़े साहब ने तलब किया है’ कहकर चले गए थे।

कुम्हार ने गहरी साँस छोड़ते हुए पत्नी से कहा - अब ये मामला है, क्या करें बताओ?

कुम्हारिन ने गीली आवाज़ में कहा - मैंने पहले ही कहा था, दाल में कहीं काला है। ये कमीन और कुछ नहीं, हमें बेदखल करना चाहते हैं।

काफ़ी देर तक दोनों के बीच गहरी चुप्पी छाई रही। इस बीच कुम्हार ने मैना को दाना और पानी परोसा।

मैना काठ की तरह बैठी रही जैसे जतला रही हो कि ऐसी ख़बर पर भला कोई दाना-पानी हलक के नीचे उतार कैसे सकता है!

बड़े मियां भी ग़मगीन-से धीरे-धीरे चलते चाक के पास आकर बैठ गए।

***

--

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *