शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

यशवन्त कोठारी का ताज़ा व्यंग्य - ठण्ड में गरम राजनीति

ठण्‍ड में गरम राजनीति

यशवन्‍त कोठारी

अमेरिेका से लगाकर ठेठ जयपुर में तेज ठण्‍ड पड़ रही है। बाहर बरफ गिर रही है, हाड़ कम्‍पाती सर्दी में तेज ठण्‍डी हवा चल रही है मगर राजनीति गरम गरम चल रही है। आप की सरकार धरने पर बैठकर रजाई ओढ़ कर जनता की समस्‍याएं हल करने के असफल प्रयास कर रही है। आप तो आप है सबकी बाप है मगर सड़क छाप है। कभी कभी लगता है खाप है जो सरकार के गले में लटका साँप है। चेतन भगत ने इसे राजनीति की आइटम गर्ल कह दिया है मगर राखी सावंत ने स्‍पष्‍ट कर दिया कि वह आप से ज्‍यादा बेहतर सरकार चला सकती है। वैसे भी एक बुजुर्ग राजनेता राजनीति को वेश्‍याओं का पेशा कह चुके हैं ऐसी गरमागरम राजनीति के झोंके हरतरफ से आ रहे है। तीन तीन प्रधान मंत्री इन वेटिंग चल रहे है और एक पूर्व पी․एम․ इन वेटिंग शीत समाधि में चले गये हैं। शीत समाधि भी ठण्‍ड में ही होती है। राजनीति के इस कीचड़ में कमल खिलेगा या झाडू निकलेगी या हाथ का पंजा अपना जौहर दिखलायेगा ये कौन जानता है। राजनीति का भाग्‍य तो देवता भी नहीं जान सकते। राजनीति के इस मूल्‍य हीन दौर में सब कुछ गड़बड़ हो गया है। एक प्रदेश में तो सरकार की लुटिया एसी डूबी कि बस ढूंढते रह गये पुरानी सरकार कहाँ गई ?

जनता को गुस्‍सा क्‍यों आता है। यह कोई नहीं जानना चाहता। सरकार का गुस्‍सा जनता पर चलता है। गरीब मध्‍यमवर्गीय कर्मचारी निलम्‍बित हो जाता है। सरकार चलाने वाले मुख्‍यमंत्री का कुछ नहीं बिगड़ता। सरकार का स्‍वाद जिसने चखलिया वो इस स्‍वाद को और ज्‍यादा स्‍वादिष्‍ट बनाने में लग जाता है। स्‍वादिष्‍ट सरकार सुवासित सरकार पर कब्‍जा जमाने के लिए ठण्‍ड में जनता के दरबार में जाने के बजाय लोग टिकट के लिए राजनीति पार्टियों के दफ्‌तर में चक्‍कर लगा रहे हैं। कोई अनशन की धमकी दे रहा है और एक पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जा रहा है। प्रजातन्‍त्र के लड्‌डू, बरफी, सब खाना चाहते है। हलवाई कोई नहीं बनना चाहता। सवालों के घेरे के बाहर खडे होकर तमाशा देखना अलग बात है और ठण्‍ड में सवालों से रुबरु होना अलग बात है। कविता करते करते राजनीति करना और राजनीति करते करते कविता करना भी बिलकुल अलग है राजनीति में फटे में टांग अड़ाने से कविता भी हाथ से निकल जाती है। वैसे भी फणीश्‍वनाथ रेणु ने कहा था यदि राजनीति और साहित्‍य में एक को चुनना पड़े तो लेखक को साहित्‍य चुन लेना चाहिये।

इस ठण्‍ड में लाख टके का प्रश्‍न यही है कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री। मगर दोस्‍तो हम तो परोसी हुई थाली को लुढ़काने में विश्‍वास रखते हैं। बाहर अभी भी ठण्‍ड पड़ रही है। ठण्‍डी हवाँए चल रही है मगर दिल्‍ली में राजनीति की गरम हवाँए सबको झुलसा रही है केजरी वाल से लगाकर आम आदमी को।

बयानवीर लगातार बयान दे रहे हैं, ज्‍यादा बड़े बयानवीर बयानों से पलटकर मीडिया पर दोषारोपण कर रहे हैं और भी ज्‍यादा महावीर, परमवीर बयानवीर बयानों की बाजीगरी दिखाने के लिए चेले-चेलियां पाल रहे हैं। बयानों से इस भयानक जंगल में आग लगी हुई है, जो ठण्‍ड में गरमी का अहसास करा रही है। वरना सरकारे धक्‍के से चल रही है बूढ़ा प्रजातन्‍त्र कम्‍बल की तलाश में ठण्‍ड में भटक रहा है। नेता प्रजातन्‍त्र के लड्‌डू, पे‌डे, बरफी, काजू खा रहे हैं। तेज ठण्‍ड में और वे बेचारे कर भी क्‍या सकते हैं ?

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यशवन्‍त कोठारी

86-लक्ष्‍मीनगर, ब्रहमपुरी बाहर जयपुर

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