मंगलवार, 14 जनवरी 2014

पूजा रानी सिंह की कुछ कहानियाँ

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कुछ कहानियाँ :-

एक लघु कथा " मुनक्का आपा "

"बड़े ख़यालों में तीतर पाला करते थे ! अब तो हक़ीक़त में रोटी भी मयस्सर नहीं। कहाँ ग़लीचों के बाग़ सजते थे ख़्वाबों में , यहाँ पैबंद लगी दरी बिछी है। कोई नहीं मुनक्का आपा , हम आप क्या कम हैं ?" कहती बादामो  , सामने एक टीन के शेड के नीचे रहती दोनों बहनें। बड़ी ख़ुशमिज़ाज और ज़हीन। आज बुलडोज़र आ गया , टीन का शेड ढह गया। बिना किसी शिकवे या शिकायत , अपनी फटी दरी बग़ल में दबोचे मुनक्का चल पड़ी। बादामों फिर बड़बड़ा रही थी -" या ख़ुदा ,रहम कर ! जीने दे ! कितना माँगती हूँ रोज़ और तू हर बार निवाला भी छीन लेता है , पर जानता है तू ! मुनक्का आपा नहीं झुकेगी और ना बिकेगी। ख्वामख्वाह , की बेचारगी है माँ न दी ,बाप ना दिया ! अब तरस खा।" मुनक्का चुपचाप मुस्कुराती जा रही थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।
फिर एक पेड़ के नीचे बैठ कर बोली -" ओ बादामों ! आ सुस्ता ले ज़रा , ख़ुदा की रहम देख ! कितनी छाया है यहाँ , इन परिंदों की आवारगी देख , कितना फुदक रहे हैं ? ले चने खा , और थोड़े नीचे डाल दे , किसी जीव का पेट भरेगा।" बादामों बस आसमाँ को देख यही बोल पायी -" या खुदा !! जी आपा अभी आई।"

पूजा रानी सिंह

  " कहानी लछ्मिनिया की "
हर साल जाती थी मैं गाँव , और इस साल भी गर्मी की छुट्टियों में गयी। वही नियमित रूप से हर बार कच्ची सड्कों पर पैदल चलना और दूर से ही जो लाल दहकता अंगारों सा पलाश के फूलों से लदा वृक्ष दिखता ,कदमों में तेजी सी आ जाती। पके फ़लों से लदे हुए नीम के पेड़् की सुगंध ,उधर साइफ़न बान्ध के पुल पर बैठे मस्ती में गीत गाते चरवाहे। वो बरगद का बडा सा पेड जहाँ सारे बुज़ुर्ग बैठ्कर पंचायत करते रहते। टूटी स्कूल की छत से बाहर झांकते बच्चे ,खेतों में लह्लहाती धान की बालियाँ ,पास ही नहर में कुछ पूरे नंगे और कुछ लंगोटी बान्ध कूद्-कूद कर चिल्लाते हुए नहाते अलमस्त चरवाहे। जैसे ही नज़र पडती हमपर, कोई बच्चा उठ्कर स्कूल की घंटी बजा देता और मास्टरजी के लाख चिल्लाने पर भीं भगदड़् मच जाती । सारे बच्चे अपना झोला उठा कर भाग जाते। वहीं कुछ नन्हे हाथ आकर हमारे हाथ से बैग , पानी की बोतल सब कुछ छीन कर भाग जाते। हाँ ! हमसे पहले हमारे आने की खबर घर पर पहुँच जाती।


सारा सामान आँगन में बिछी चौकी पर रखा रह्ता। सौंफ़ काली मिर्च का ठंडा मीठा शरबत लोटे में भरकर् पीने को मिलता। सच में सूखे-जले गले को जैसे तुरन्त तराई मिल जाती। उसके बाद खाने की सुगन्ध का तो पूछो ही मत , देसी घी में तले जाते पराठे , साथ में घीया या तोरैइ की सब्जी और पीछे स्टोव पर तले जाते गरमागरम पकोडे़।


ये सारे काम करती " लछमिनिया " और उसकी पूरी फ़ौज। चलिये आपको परिचय दे दूँ -गेहुआँ रंग ,मध्यम कद -काठी , साडी नीचे से थोडा़ ऊपर उठा कमर में खोसी हुई। पेट से गर्भवती और कैंची की तरह चलती उसकी ज़ुबान। हरदम चिल्लाती रहती ,कभी गाली देती ,कभी ज़ोर्-ज़ोर से हँसती। लेकिन कभी भी खाली बैठे नहीं देखा उसे। उसका साथ देते कई नन्हे हाथ जो उसके बच्चे थे। हर साल एक नया नाम और एक नया बच्चा मिलता देखने को। इस बार भी दिखी एक नई लडकी ,नाम पता चला " किशमिश "। लछमिनिया के साथ -साथ वो सब भी हमारे आगे पीछे दौड्ती रह्तीं। कभी टौफ़ी , चाक्लेट या मिठायी मिल जाति उन्हें ,तो झट हाथ में ले भाग जातीं ।
लाख बोला यहीं खा लो पर कभी खाते नहीं देखा उन बच्चों को। पहली थी बादामो , दूसरी सुखनी , तीसरी तेतर ,चौथी मुनिया और पाँचवीं थी किशमिश। शायद छठा बच्चा आने वाला था। हाँ , एक बेटा भी था सबसे बडा़ उसका नाम था-" अन्हरा "। पैदा होते ही उसे चेचक हुआ था और उसकी दोनों आँखें चली गयी थीं। अँधा था पर गाता बहुत खूब था। साईफ़न पर बैठ वही गा रहा था। बिना आवाज किये या बोले भी ,पता नहीं वो कैसे हमे पह्चान जाता था ? दीपाजी आई हैं , दीपाजी आई हैं , सुधान्शुजी आये हैं , गाँव में हल्ला मचा देता था।


लेकिन बात तो लछ्मिनिया की है , हर बार आठ महीने की गर्भवती मिलती थी मुझे। कितने सालों से ऐसा ही हो रहा था। पती रामासरे कुछ नहीं करता था वो तो शायद गाँव में रह्ता भी नहीं था। राजपूतों के घर में काम करती थी। उन्हीं के घरों से बचा -खुचा खाना लाकर बच्चों का पेट भरती थी ।


उसका घर देखा मैंने , झोपडी क्या ! बस थोडी सी ज़मीन भर थी। एक तरफ़ पुराने ,फ़टे , मैले कपडों का ढेर लगा हुआ था। गन्दगी ही गन्दगी चारों तरफ़ फ़ैली हुई थी। बच्चे ज़ोर - ज़ोर से बिलख रहे थे। एक कोने में रखा मिट्टी का चुल्हा जैसे बरसों से जला ही नहीं था। वहीं एक कोने में दो बच्चियाँ लगभग एक और दो साल की , पर देखने में एक बराबर , बुक्का फ़ाड़् कर रोये जा रही थीं।


ध्यान से देखा मैनें तो दोनों के पैर धनुष की तरह अन्दर को मुडे़ हुए थे । हाईस्कूल की किताब में पढा़ था मैंने विटामिन डी की कमी से रिकेट्स नाम की बीमारी होती है ये। पर सामने देखना बडा़ दर्दनाक था मेरे लिये। एक बडे़ से मिटटी के बरतन मे़ं माड़् (चावल का पानी) रखा था जिसमे़ जहां- तहां कुछ दाने चावल के तैर रहे थे। समझ गयी रोज़ लछ्मिनिया को माड़् फ़ेंकने में इतनी देर क्यूँ लगती थी ? वो गाय -बैलों को देने की बजाय अपने बच्चों के लिये लेकर आती थी। एक कोने में अन्हरा कुछ टटोल रहा था खाली हान्डी में। मैं और देख ही नहीं पाई ।


मुझे लछमिनिया से घिन्न आ रही थी। दूसरों का घर साफ़ करती है ,बच्चे पालती है और खुद के घर में इतनी गन्दगी ? गुस्से में घर आई मै और अपना निर्णय सुन दिया सबको " लछमिनिया आज से घर में काम नहीं करेगी , वो पहले अपने बच्चों और घर को ठीक करे, इलाज़ कराये बीमारी का उसके बाद ही घर में घुसने दूँगी "। मेरा इतना बोलना भर था कि वो तो जैसे चिल्लाती हुई मुझ पर बिफ़र सी पडी। "कौन देत पैसा दीपाजी ?रऊआ देब ? बीस रुपया महीना मजूरी देईला ,उभी पियक्कड ससुरा मार - पीट के हमरा से छीन लेव हे। हमर भर्तार भागल बा चोरी करके , घर्- घर के जूठन बटोर के लडिकिन के पोसली। उहो पर कभि ईहाँ कभी उहाँ जेकरा मन जहाँ हमर हाथ पकड के खीच ले जाले ई जर्लाहा ..मुँह झोँसा मर्दाना तैहन्..। अपन देह में दूसर के पाप ले कर ढोवत चलली। हमर न हवन, ई बच्चा सब राऊर लोगन के देल हवन। पियक्कड ससुर ...तडीपार भरतार ...के हमरा के बचायी ? "लछ्मिनिया भद्दी गालियाँ दे रही थी ,मैं हतप्रभ सी चुपचाप सुन रही थी। वो दो दिन नहीं आयी काम पर , तीसरे दिन आयी तो रो रही थी। आँसू पोछ कर बोली- " हमर लडिकी मर गैइलें ,हमरा काम करे दिहूँ मालकिन "। मैं समझ गयी खाने के अभाव में दोनो बीमार लड़कियाँ मर गईं थीं। वो चुपचाप काम करती रही और मैं पता नहीं क्यूँ रोती ही जा रही थी ।


पर लछ्मिनिया के आँसू थम चुके थे । मैंने जान - बूझकर अपने कान का एक सोने का झुमका आँगन में गिरा दिया और कमरे में चली गयी। शाम को सबने टोका कि आपका एक कान का झुमका नहीं है तो मैं लछमिनिया कि ओर देखकर बोली-" कोई बात नहीं जिसकी किस्मत में होगा उसको मिल जायेगा "।लछमिनिया झाडू लगा ढूँढ रही थी मेरा झुमका और मैं अपना सामान पैक् करने में लगी थी। निकलते वक़्त दूसरा झुमका लछमिनिया के हाथ में देकर बोली -" ये एक झुमका मेरे किस काम का ? तुम रख लो तुम्हारा बच्चा होने वाला है, इस बार हस्पताल चली जाना "।

पूजा रानी सिंह्

                "   लूज़ टॉक    "

          "वो जो जा रही है ना लाल साड़ी में ,उसकी बेटी बड़ी चालू है।पता है , कल एक लड़के के साथ खड़ी थी।और मेरी पड़ोसन , उसका पति उसे बहुत मारता है।दोनों में डाईवोर्स लेने की स्थिति आ गई है।ये दोनो आदमी जो वहाँ खड़े हैं ,कोने में ,तेरे सामने वाली के पति के जाने के बाद उससे मिलने उसके घर जाएँगे।" बोले जा रहीं थी आँटी जी , और सुमन के पास सिर हिलाने के अलावा कोई चारा न था। अब आँटी उम्र में बड़ी हैं तो कैसे कहे उनसे , कि उसे इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है। वो ये सब नहीं सुनना चाहती बड़े काम हैं उसे । सो हिम्मत जुटा बोली -"आँटी ,ये घर पर हैं ,चलती हूँ मुझे नाश्ता बनाना है।" बिना कोई जवाब सुनें वो दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते करके जल्दी से लिफ़्ट का बटन दबा घर की ओर निकल ली।


उसकी दोस्त पूनम की सास थीं ये आँटी ,जब भी उसे देखतीं रास्ते में रोककर ज़माने भर की बातें इधर से उधर कर बैठतीं। न चाहते हुए भी वो सिर्फ़ सिर हिलाकर फिर कोई बहाना बना कर घर चली जाती। दो बच्चे थे सुमन के , औफिस में काम भी करती थी , घर का भी सारा काम उसे ही देखना था। वक़्त तो जैसे सरकता जाता था। आराम करने का मन ही नहीं करता था उसका लगता कुछ काम निपट जाए पहले।सभी चीज़ों में आगे थी सुमन , औफिस में भी सभी लोग पसंद करते थे उसे , अपनी सोसायटी में भी काफ़ी पॉपुलर थी वो , स्पोर्ट्स में भी आगे , डाँस भी अच्छा कर लेती थी ,उसके बच्चे भी सुन्दर और आज्ञाकारी थे , पढ़ने में भी तेज थे।


सबकुछ ठीकठाक ही चल रहा था , कि अचानक सुमन के पास एक फ़ोन आया। " हैलो सुमन , मैं पूजा बोल रही हूँ , सुना है तुम नौकरी छोड़ रही हो ?" सुमन को तो जैसे झटका सा लगा।" क्या ? तुम ठीक तो हो ? कौन इस तरह की बातें फैला रहा है ?" फ़ोन पर पूजा बोली -" अरे पूनम की सास कह रही थीं ,वो तो ये भी कह रहीं थीं तुम्हारी सामने वाली पड़ोसन का तुमसे झगड़ा हो गया है। और तुम्हारा पति भी तुमसे ख़ुश नहीं रहता।" सुमन ने ग़ुस्से में फ़ोन ही काट दिया।


वो एैसा कैसे कर सकती है ? झूठ बोलने की भी हद होती है। सुमन के दिमाग़ में खलबली सी मच गई। औफिस जाने का मन ही नहीं हुआ । किससे बात करे ? क्या पूछे सोचा पति को फ़ोन पर सब बताती है ,शायद कोई हल सुझाएँगे। सो फ़ोन लगाकर रोते हुए सारी बात कह सुनाई पति को। पति बोले -" अरे ,इन औरतों की बातों में मुझे न घसीटो। तुम्हारा मामला है तुम समझो ,बड़ा आँटी , आँटी होती थी ,मेरी माँ के तो पैर नहीं छुएँ जाते उन्हें दिन में चार बार नमस्ते। अब झेलो तुम।" पति ने फ़ोन काट दिया। सुमन परेशान होकर रोने लगी। क्या करे ? ये तो सच में पति से झगडें वाली परिस्थिति आ गई। सोचा चलो आँटी से ही पूछ ले कि उन्होंने पूजा से ये सब क्यूँ कहा? सो आँटी के पास गई। नमस्ते किया तो आँटी ने देखकर अनसुना कर दिया। सो वो पूनम के पास गई और सारी बात कह सुनाई। पूनम ने कहा " सुमन मेरी सास तो उलटा मुझसे कह रही थी ,कि तुमने मेरे बारे में बहुत भला बुरा कहा है , इतना कि मैं बता नहीं सकती। यहाँ तक कि तुम मुझसे नफ़रत करती हो। " सुमन फिर से रोने लग गई रोते हुए बोली -"मेरा विश्वास कर पूनम मैंने कुछ भी नहीं बोला।" पूनम कह रही थी " अब मैं तो अपनी सास की बात पर भरोसा तो करूँगी ही ना।" सुमन को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि पूनम की सास अभी तक तो अच्छी भली थी ये अचानक उसके ख़िलाफ़ क्यूँ बोलने लगी।


कई लोगों के फ़ोन आए सभी नई कहानी और आरोपों के साथ। पूनम की सास जो ख़ुद बोलती थी उसका सारा इल्ज़ाम सुमन पर लगाकर कई और मनगढ़ंत कहानियाँ बना सबको सुना दी। सुमन अंदर ही अंदर घुटती जा रही थी ,क्या करे ? पति सुनते ही नहीं थे। बच्चों पर भी ध्यान देना कम कर दिया। औफिस में भी मन लगाकर काम नहीं कर पा रही थी सो छोड़ दी नौकरी। सबकुछ गड़बड़ हो गया। अब सुमन को लगा कि जीने का कोई फ़ायदा नहीं है बड़ी बदनामी हो रही है ,सब उससे सवाल पूछ रहे है सो चल पड़ी ज़िन्दगी मिटाने के लिए रेल की पटरी की ओर। रेल आ रही थी पर उसे कुछ सुन नहीं रहा था। अचानक एक बच्चे ने आकर उसके पैर पकड़ लिए " माई जी भूख लगी है ,खाना खिला दो ना ,तीन दिन से कुछ नहीं खाया है"। सुमन को जैसे सुध आई और वो उस बच्ची से बात करने लगी। " कितने भाई - बहन हो तुम ? सबको ले आओ खाना खिलाती हूँ। वो बच्ची भागकर आसपास के कई छोटे बड़े बच्चों को पकड़कर ले आई। सबको लेकर सुमन घर आई प्रेम से भोजन बनाया , सभी बच्चों के हाथ -मुँह धुलाकर नीचे ज़मीन पर घर के बाहर ही दरी बिछा दी। पड़ोसन और आँटी भी देख रही थी।


बच्चों को एक-एक करके खाना परोसने लगी। बच्चे भूखे थे सो बार - बार दौड़- दौड़कर परोसना पड़ रहा था। ये सब देखकर और लोग भी इकट्ठा हो गए , कोई पानी दे रहा है तो कोई पूरी परोस रहा है। जैसे एक अच्छे काम में हाथ बँटाने की होड़ सी लग गई थी सब में। हँसते मुस्कुराते बच्चों को तृप्ति मिली। सभी सोसायटी वाले अपने -अपने घर से कुछ ना कुछ बच्चों को उपहार दे रहे थे। एक त्यौहार जैसा माहौल बन गया। पति भी औफिस लौटे ,तो रास्ते में ही पड़ोसियों ने बता दिया सुमन भूखे बच्चों को भोजन खिलाकर बडे़ उपकार का काम कर रही है सोसायटी का नाम बढ़ा रही है। हम सब उसके साथ है । पति ने भी आकर सुमन की पीठ थपथपाई। तभी आँटी ने सुमन की पड़ोसन के कान में कुछ कहा तो पड़ोसन चुनकर ज़ोर से बोली -" आँटी , डोन्ट डू लूज़ टॅाक , हमें पता है सुमन कैसी है और उसका दिल कैसा है। हम सब उसके साथ हैं।" सुमन के फ़ोन की घंटी बजी ! फ़ोन पर सुमन की मम्मी थी कह रहीं थी -" सुमन ,पड़ोस वाले अँकल की बेटी घर से भाग गई है।" सुमन बोली -" मम्मी , नो लूज़ टॉक प्लीज़ और फ़ोन काट दिया।"

पूजा रानी सिंह

कुछ पति अपनी पत्नी की कमज़ोरियों का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। कैसे ? एक नया तरीक़ा है मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का। आप भी उनका ये अन्दाज़ देखें लघु कथा -" एक पति का बदला " में :-

"आह ! बहुत सिर दुख रहा है। रह-रहकर टीस सी उठती है। पूरा शरीर जैसे चुभन से छटपटा रहा है। पँखा चला दीजिए ना। उफ़ ! डाक्टर के पास ले चलिए ना। मान जाइए मानों प्राण निकले ही निकले। मर रही हूँ मैं , कुछ तो कीजिए। मेरे सिर पर हाथ ही रख दीजिए , थोड़ा सुकून मिल जाएगा। " माइग्रेन के दर्द से छटपटा रही थी रिद्धि। कभी ज़ोर -ज़ोर से सिर पकड़कर चिल्लाती तो कभी , पूरे बिस्तर को मुट्ठियों में भींचकर लोटने लगती। सुजय ने घड़ी की ओर देखा। रात के बारह बज रहे थे। पता नहीं उसकी पत्नी का यह फ़ितूर कब तक चलेगा ? थोड़ी देर रिद्धि के सिर पर हाथ रखकर मन मारकर सहलाता रहा , फिर धीरे से हाथ हटाकर पीठ घुमाकर लेट गया। उसकी पत्नी सिर पकड़कर चिल्लाती हुई उठी और किचन में जाकर रोटी सेंकने लगी। मिर्च भूनने की गंध आ रही थी। सुजय चुपचाप मुँह घुमाकर लेटा रहा। रिद्धि एक करारी सिकीं घी लगी रोटी , नमक और भुनी मिर्च से खा सही थी। सुजय के मुँह में पानी आ गया। फिर अंगूर का गुच्छा ले आई उसकी पत्नी। अब सुजय से रहा ना गया। " थोड़े अंगूर देना मुझे भी।" रिद्धि ने कुछ अंगूर तोड़कर सुजय की तरफ़ बढ़ा दिए। घड़ी की सुई रात के साढ़े बारह बजे हुए दिखा रही थी। सुजय मन ही मन मुस्कुरा उठा। आज की रात तो उसने आख़िर रिद्धि की ख़राब कर ही दी। आज दोपहर में ही तो उसने अपनी पहली प्रेमिका का ज़िक्र किया था रिद्धि से। " और मत बनाओ पकौड़े ? मेरी तनख़्वाह तो पूरी हथेली पर रख लेती हो।" सुजय के मुँह से निकला। रिद्धि सकपकाई सी सुजय की ओर देखकर फिर से माथा पकड़कर बैठ गई।

पूजा रानी सिंह

कहानी डर की , डर जो हमारे बीच पलता है। वही डर जो हमें धीरे -धीरे मज़बूत करता जाता है। आजकल यह डर हमारे जीवन से कोसों दूर है , इसीलिए कई लोग हर ग़लत काम को सही मान कर बैठे हैं। जीवन में डरना भी ज़रूरी है ,चाहे अपने अंदर बसे शैतान से या फिर बरगद पर बैठे भूत से। तो सुनिए कहानी :-
     " बरगद का भूत "

माई !! ओ माई !! जल्दी दौड़ के आओ , मंटू उहाँ बरगद के पेड़ के नीचे गिरा पड़ा है। भूत पकड़ लिया है उसको।" लँगड़ा बहुत हाँफता हुआ बोलता ही जा रहा था। " माई उका चेहरा सफ़ेद हुई गँवा है , छटपटायें रहे है धरती पर , बहुत भीड़ लगी है। कौनों चप्पल सुंघाय रहे हैं कौनों गोबर पर ,मिर्रगी का दौरा नहीं लगत है। उको बरगद का भूत पकड़ लियो है।" मंटू की माई तो जैसे सुनकर सन्न रह गई ,फिर तनिक सँभल कर , साड़ी कमर में खोस , बिना पल्लू ज़ोर ज़ोर से चिल्लाती हुई , बरगद के पेड़ की ओर भाग चली। " हाय! रे हमार मंटू ! लाख मना करें रहे उहाँ बरगद के दरख्त पर पिरेत का बास है , नहीं सुनी हमार !! हाय रे कौनों भूत झारे वाले खोपड़ी बाबा को बुलाए लाओ। अरे जाओ रे लँगड़ा !! जल्दी करो रे !!" मंटू की माई ने मंटू को देखा तो जैसे चीख़ ही पड़ी। उसे बरगद के पेड़ से बाँध रखा था लोगों ने। वो तो जैसे ज़ोर -ज़ोर से गरज रहा था। " नहीं छोड़ेंगे हम ! किसी को नहीं छोड़ेंगे ! सबको मार डालेंगे ! तुम लोगिन हमार बलि चढ़ाय रहे , अब हम तुम लोगिन की बली चढ़ाएँगे !! हहहहहहहहहहह सुखना नाम है हमरा !! नहीं छोड़ेंगे !! किसी को नहीं छोड़ेंगे।" मंटू की आँखें रक्त सी लाल चमक रही थीं। शरीर काँप रहा था रह रह के हवा में लहराता था , ऐसा लगता कि जैसे अभी नसें फट पड़ेंगी। अपने बेटे मंटू की यह दशा देखते ही माई तो बेहोश होकर नीचे गिर पड़ी। गाँव के लोगों ने सहारा देकर उसे वहीं एक कोने में बिठा दिया। वो अपना सिर धुन -धुनकर वहीं बैठी रोने लगी। तमाशा देखने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। कुछ दिलेर लोग मंटू के पास जाने का साहस करते पर वो इतनी ज़ोर से गरजता और हुँकारता कि ,पल भर में हवा खिसक जाती और सरपट वापस भाग लेते। लोग हँसने लगते। कुछ बड़े बुज़ुर्गों ने कई उपाय सुझाए , ये सुँघाओ , वो सुँघाओ पर सब बेअसर।
उधर खोपड़ी बाबा आ पहुँचे थे , बाबा ने आते ही भीड़ को एक तरफ़ किया और आग जलाकर ,हाथ में भभूत लेकर मंत्र पढ़ने लगे " आन बान , सान बान सईंया मशान बान , जिन खोजूँ तिनको पकड़ूँ , खोली खप्पर , लइया लक्कड़ , जिसको दुख हो उसको पकड़े , सबकुछ इस ताबीज़ में जकड़े , भूत -पिरेत प्रबल बलशाली , सबकी शक्ति होवे ख़ाली।" और उन्होंने भभूत को आग में डाल दिया। फिर तावीज़ लेकर मंटू की ओर बढ़े। तावीज़ देखते ही मंटू सकपका सा गया। झट से आगे बढ़कर खोपड़ी बाबा ने तावीज़ मंटू के गले में पहना दिया। मंटू एकदम शांत और जैसे बेदम सा होकर पेडं में बँधा लटका हुआ था ।


गाँव वालों ने बाबा के इशारे पर मंटू को बंधन मुक्त किया और घर पर पहुँचा दिया। उसके बाद गाँव के लड़कों ने बताया कि मंटू ने शर्त लगाई थी कि वो बरगद के पेड़ के नीचे रात बिताएगा। और सुबह होते ही सबको पता चला कि बरगद का भूत उसपर सवार हो गया है। यह सब सुनकर गाँव के सबसे बुज़ुर्ग पूरन काका सामने आए और उन्होंने बरगद के भूत की कहानी सुनाई।


क़रीब डेढ़ सौं साल पहले एक सुखना नाम का चरवाहा रहता था। वो लोगों की गाय , बैल , भैंस , बकरियाँ चराता और इसी बरगद के नीचे बैठकर सुस्ताता रहता या गाना गाता रहता। उस समय आस पास ही बड़े घने जंगल हुआ करते थे। वहीं बरगद के पेड़ से लगभग बीस फ़र्लांग दूर एक कुअाँ था जिसे आज सबलोग घोड़हवा इनरा के नाम से जानते हैं। गाँव के ज़मींदार ने कुछ ग़रीबों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की सोची। वो रात को मशाल लेकरके कई घुड़सवारों के साथ आया और सभी गरीब किसानों के खलिहानों में कटी फ़सल को आग लगा दी , सबके घर जला दिए और कुछ लोग जो विरोध करने आए , उन्हें ज़िन्दा जला दिया गया। सुबह होने को ही थी ग़रीब लोग बेचारे आग बुझाने के लिए कुँए के पास आए। वहाँ पर ज़मींदार और उसके आदमी घोडंे से उतरकर हथियार रखकर पानी पी रहे थे। लोगों का ग़ुस्सा भड़का और सबने ज़मींदार और उसके आदमियों को निहत्था देख पीट -पीटकर मार डाला। उन सबकी लाशों को उस कुँए में डाल दिया। उन्होनें घोड़ों को भी नहीं बख़्शा। उन्हें भी ज़िन्दा ही कुँए में ढकेल दिया गया। बहुत देर तक घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज़ आती रही फिर सब शांत हो गया। तबसे आधी रात को अभी भी घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज़ सुनाई देती है। इसीलिए उसे घोड़हवा इनरा कहते हैं। इन सबके बाद फिर से किसानों ने ख़ूब मेहनत की अपने घर बनाए। खेतों को फ़सल के लिए तैयार किया। पर भगवान शायद नाराज़ थे सो बारिश ही नहीं हुई। कुँए से कितना खेत सींच सकते थे ? धीरे धीरे कुँए भी सूखने लगे। गाँव के सरपंच ने कुलदेवी को ख़ुश करने के लिए मानव बली चढ़ाने को कहा। गाँव के लोग इतना घबराए हुए थे कि वो तुरंत ही तैयार हो गए। बली के लिए सुखना को चुना गया। सुखना को इसी बरगद के पेड़ से बाँध दिया गया। फिर आधी रात को जब पूर्णिमा का चाँद निकला तो उसे हाथ पैर बाँधकर घोड़हवा इनरा में डाल दिया गया ।


तबसे सुखना का भूत इसी बरगद के पेड़ पर आकर बैठा रहता है। जो कोई रात को इसके आसपास मिलता है , ये उसको धर दबोचता है। इसलिए गाँव के बड़े अपने बच्चों को शाम के धुँधलके में बाहर निकलने के लिए मना करते हैं। बात सबकी समझ में आ चुकी थी। पर सवाल हज़ारों थे और जवाब बस इतना डरने में ही भलाई है। वैसे भी गाँव में बिजली तो थी नहीं और रात में जंगली जानवरों का भी डर था। कुछ ख़तरनाक लुटेरे भी घूमते रहते थे। तो इतने ख़तरों से बचने के लिए एक डरावनी कहानी बहुत ज़रूरी है या सच कहें तो दिल में डर का होना आपको कई ग़लत काम करने से रोकेगा। सो ज़्यादा ख़ुशी से जीने के लिए थोड़ा डर ज़रूरी है। है ना !

पूजा रानी सिंह

"  बातचीत एक सिरफिरे से फ़ेसबुक पर "

अंजना:- हाय ! आप कैसी हैं ?
मैं:- I am good thank you what about you ?
अंजना :-क्या आपको हिन्दी नहीं आती ?
मैं:- I love hindi but don't prefer to write hindi in English as sometimes the meanings differ and it may sound absurd .
अंजना :-ठीक है , क्या आप राजपूत हैं ?
मैं:- yes Chauhan rajpoot
अंजना :- बिहार से हैं क्या ?
मैं:- yes ,how do you know ?I was born in Bihar .,but my education and upbringing was in different places .
अंजना :-अाप लोंगों में राजपूतों की हालत सबसे ख़राब है , बहुत बरबादी की आपने ?
मैं :- मैंने ?
अंजना :- हाँ , आप लोगों की वजह से ही हम लोग हैं ?
मैं :- हम लोग?
अंजना :-ये ऊपर लगी फ़ोटो देख रहीं हैं प्रोफ़ाइल पर ?
मैं :- हाँ एक बच्ची की है ,बहुत ही प्यारी है।
अंजना :-वो बच्ची मेरी बहन थी , जिसे श्रीलंका में बिना किसी ग़लती के तड़पा - तड़पा कर मार दिया गया ।
मैं:- ओह ! अफ़सोस है मुझे ,मैं आपकी अवस्था समझ सकती हूँ।
अंजना :-नहीं ,आप नहीं समझ सकती !! आप ख़ुद भी ज़िम्मेदार हैं उसकी मौत की। जब तक आपके अपने नहीं मरेंगे आपको दर्द का अहसास नहीं होगा ।ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्
मैं:-क्या बकवास है ये ?
अंजना :- क्यूँ ? सुन कर इतनी तकलीफ़ हो रही है ते मरा हुआ देखकर क्या होगा ? ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्
मैं :-अंजना जी , क्रोध और बदले की भावना आपकी सोचने समझने की शक्ति ख़त्म कर देती है।
अंजना :-तुम मुझे पागल समझती हो ? जल्द ही पता चल जाएगा कि मैं कौन हूँ।
मैं :- नहीं पागल नहीं ,पर आपकी सोच को दिशा देने की ज़रूरत है ।
अंजना :- ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता मुझे उपदेश दे रही हो।
मैं :- नहीं ,मैं स्वयं को छोड़कर किसी से नहीं डरती।
अंजना :-तुम जहाँ पर हो वहीं पर आकर तुम्हारे सामने तुम्हारे परिवार के छोटे-छोटे टुकड़े कर के मारूँगी ,तुम्हारी सात पुश्तें तक काँपेंगी।ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्
मैं:- मौत जब आनी होगी आ जाएगी , परिवार का साथ अगर होगा क़िस्मत में तो मिलेगा ही। जो होगा देखी जाएगी। जाओ किसी और को धमकाऔ और हाँ। तुम्हारी बहन की मौत का बहुत अफ़सोस है। अगर मेरी मदद की ज़रूरत हो तो बताना।
अंजना :- बहुत अच्छे ! तुम मेरी मदद करोगी ? चलो मुझे तो तुम्हारा ज्ञान नहीं भाएगा।एक नाम देती हूँ इनसे बात करो वो तुम्हारी बात समझ सकेंगे और तुम्हें समझा भी पाएँगे।
मैं:- मैं किसी ग़ैर आदमी से बात नहीं करती। तुम लड़की थी सो इतनी बात करी।
अंजना :-नहीं तुम बात करो ये आई आई टी खड़गपुर से पढ़े हुए हैं और तुम्हारी तरह ही समझदार हैं। मेरे पिता गणित पढ़ाते हैं कानपुर में। उनके मेधावी छात्रों में से एक हैं। तुम्हें अफ़सोस नहीं होगा।
मैं:- पर मैं बात क्यूँ करूँ ?
अंजना :- चिन्ता न करो ,हमारी आपस में जो भी बात अभी हुई है उसकी ख़बर है उन्हें , वो यहीं से बात को आगे ले जाएँगे अभी फेस बुक रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करो।


मैं :-अंजना जी ने आपसे बात करने को बोला था।
मनु :- हाँ मुझे पता है , मैनें ही उसे कहा आपसे बात कराने को। आप करती क्या हैँ?
मैं:-एच सी एल टेक्नोलोजी में एच आर हूँ
मनु :-हहहहहह फिर तो आप मेरी नौकरी लगवा सकती हैं।
मैं:-हाँ , कोशिश कर सकती हूँ आप आई आई टी खड़गपुर से हैं तो कही भी किसी भी कंपनी में आसानी से जौब मिल जाएगी।
मनु :-बहुत अच्छे , पर मेरी इन्ग्लिश थोड़ी कमज़ोर है इसलिए इन्टरव्यू में छँट जाता हूँ।
मैं :- वो तो अगर आप किसी से बात करें जो अच्छी इंग्लिश जानता हो तो एक हफ़्ते में ही आपकी एक्सेंट ठीक हो जाएगी।
मनु :-फिर आपसे अच्छा गुरू कौन मिलेगा ?आप तो क़ौल सेंटर में अमेरिकन एक्सेंट में बात करती थीं।
मैं:- हाँ मैं कनवर्जिस में काम करती थी।
मनु :-क़ौल सेंटर में काम करने वाली में दिमाग़ कब से होने लगा ?
मैं:-मेरे लिए काम करना ,पैसा कमाना तब ज़रूरी था क्यूँकि पति का करियर सेटल्ड नहीं था।सो कई जगह काम किया।
मनु :-तुम मुझसे क्या बात कर पाओगी ?
मैं:-मुझे कोई बात नहीं करनी।पर हज़ारों लड़कियाँ काम करती हैं क़ौल सेंटर में सभी ख़राब नहीं होतीं। और मैं ये कह सकती हूँ क्यूँकि मैंने देखा है बहुत सी सीधी साधी लड़कियाँ हैं जो चुपचाप आती हैं ,फ़ोन और कंम्पयूटर पर लोगिन करती है , काम निपटाती है , सैकड़ों बैक टु बैक कौल्स लेती है बिना थके , मुस्कान सजाए और काम ख़त्म होते ही कैब में बैठकर घर चली जाती हैं।
मनु :-अपनी बात रखती हो दूसरों के नाम से बड़ी चतुराई से। तुम्हारी ससुराल कहाँ है ?
मैं:- लखनऊ में।
मनु :-सास का व्यवहार कैसा है ?
मैं:-ठीक नहीं है ,हमारी शादी में पैसे को लेकर बहुत दिक़्क़तें आई थी सो वो मुझे बेइज़्ज़त करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती। पति भी माँ की बात मानते हैं।
मनु :-ओ़ह फिर भी तुम पति से प्यार करती हो।
मैं:- बहुत प्यार करती हूँ। बस सास कभी - कभी फ़ोन पर ही मेरे पति को भड़काकर मुझपर ग़ुस्सा करवाती रहती है।
मनु :-कहो तो लखनऊ में ही एक्सीडेंट करवा दूँ बुढ़िया का ? सारा लफड़ा ही खतम।
मैं:- नहीं ! मैं इतनी भी उनसे दुखी नहीं हो सकती कि जान लेने को बोलूँ। वो मेरे पति की माँ हैं मेरे लिए पूजनीय हैं।
मनु :-तो पति को छोड़ दो , ऐसा भी क्या कि वो माँ की बातों में आकर तुम्हारा सम्मान नहीं करता ।
मैं:-नहीं , वो मेरे बिना जी नहीं पाएँगे।
मनु :- तुम्हारे पति की क़िस्मत से जलन हो रही है , क़ौल सेंटर में काम करके भी पति के लिए इतना सम्मान और सास के बहकाने पर भी सास को इज़्ज़त देती हो।
मैं:-जी भारतीय नारी हूँ ।
मनु :-चलो ये जानकर सुकून हुआ कि ,आज भी जींस पहनने और विदेशी खान पान ,रहन सहन के बाद भी तुम्हारे मन में कोमलता है।
मैं:- पर तुम्हें इन सब से क्या लेना ?
मनु :-अपना फ़ोन नम्बर दोगी ,तुमसे कुछ बात करनी है जो फ़ेसबुक पर नहीं हो सकती।
मैं :- ना सही , मुझे जाना है।
मनु :-रुको तो कल मिलोगी इसी समय ?
मैं:- कह नहीं सकती , आज ही बहुत वक़्त बर्बाद हुआ मेरा।
मनु :-सुनो, मेरा एक काम कर दो।
मैं:- कैसा काम ?
मनु :-एक नाम देता हूँ , सुनीता का , उसके प्रोफ़ाईल पर जाओ और मेरी फ़्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने को बोलो।
मैं:- पर मैं क्यूँ ?तुम ख़ुद ही बोलो , मुझे इन सब में मत घसीटो। फिर मैं तुम्हें जानती ही कितना हूँ ?
मनु :-पर मैं तो तुम्हारे पूरी राजपूत जाति को ही जानता हूँ। तुम बिहार से हो ना ? औरंगाबाद सासाराम के एरिया के आसपास से हो ना ? वहाँ मुझे लीडर मानते हैं सब। मैं क्रांति करवाता हूँ। कल को बड़ा नेता भी बनूँगा।
मैं :- कैसी क्रांति ? कैसा लीडर ?वहाँ के लोगों को तुम नहीं जानते काट कर फेंक देंगे और तुम्हारा अता पता भी नहीं चलेगा।
मनु :-हहहहहहहहह मुझे कौन काटेगा पूरी फ़ौज है मेरे पास , कमांडर हूँ मैं। ट्रेनिंग देता हूँ। मैं अकेला दस या ज़्यादा से ज़्यादा सौ तुम जैसे पूँजी पतियों और ज़मीन को हड़पने वालों को मारूँगा । पर सेना का हर सिपाही सोचो अगर इतने ही लोगों को मारे तो तुम लोग तो सब गए ।हहहहहहहह
मैं :- पागल हो तुम जो लोगों को मारकर सोचते हो ज़मीन पा लोगे पैसा पा लोगे। सेना से मुट्ठी भर लोगों का मुक़ाबला करवाकर उन मासूम लोगों को मरवाना चाहते हो। धिक्कार है तुम पर। बातचीत से हल नहीं निकाल सकते। गाँधी जी का तरीक़ा अपनाओ ।
मनु :-तुम लोग जिन कहारो और चाकरों को अपने घर में दो रोटी के निवाले पर उनकी माँ , बहन ,बेटियों को रखैल बनाकर रखते हो। मेरा ख़ून उबलता है तुम लोगों की बलि चढ़ाने को।
मैं:- वो ज़माना और था ! आज कोई किसी का बंधुआ मज़दूर नहीं। सब पैसा लेकर काम करते है। दादा , परदादा के ज़माने का मुझे पता नहीं पर हाँ कहारों को बसाया मेरे दादाजी ने था और आज भी उनका परिवार हमारे घर से पलता है ।काम करते हैं पैसा लेते है।
मनु :-यही तो , अब यही तुम्हारा खाना खाने वाले जब तुम्हारे टुकड़े करेंगे तब पता चलेगा तुम्हें। बहुत चूसा तुमने ख़ून अब जवाब तगड़ा देंगे हम।
मैं :- क्या कर लोगे तुम मुट्ठी भर आदमी सबके सब मारे जाओगे। मेरी मानों ख़ून ख़राबे का ख़याल छोड़ों।
एम प्रभाकर मनु :-हहहहहहहहह डर गई यही डर मैं सभी के चेहरे पर देखना चाहता हूँ। मेरे आदमी श्रीलंका्, तमिलनाडु , उड़ीसा ,मध्यप्रदेश हर जगह पर है और हम सब मिलकर हमला करने वाले है। वो भी इतनी बड़ी संख्या में कि कोई कुछ नहीं कर पाएगा। बड़ी संख्या में लोग मारे जाएँगे। तुम अख़बारों में ख़बर पढ़ लेना।
मैं :- तुम्हारी तरफ़ से मैं बात करूँ किसी से। शायद तुम्हें किसी मनोवैज्ञानिक की ज़रूरत है।
मनु :- हहहहहहहहह मुझे नहीं पर तुम्हें किसी भी प्रकार से मेरी ज़रूरत प़ड़े तो मुझे याद करना।वैसे मुझे पता है तुम मुझे ब्लौक करने जा रही पर फिर भी कोई काम हो तो मेरे इस नम्बर पर फ़ोन करना।नोट कर लो @#$%&*^(* चलता हूँ , मेरी बात याद रखना हमला होगा ठीक आज से दो महीने बाद महत्वपूर्ण लोग मारे जाएँगे। मेरे साथ संस्था में जुट जाओ , तुम्हारे जैसे निडर लोग चाहिए हमें। यक़ीन करो तुम्हारे परिवार को कुछ नहीं होगा। फिर मिलेंगे।

पूजा रानी सिंह

व्हाइटफ़ील्ड, बैंगलोर

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स्व परिचय :-
एक छोटे शहर औरंगाबाद ( बिहार ) में १९ जुलाई १९७८ में आषाढ़ पूर्णमा को क्षत्रिय चौहान राजपूतों के घर जन्मी मैं, यानि  "पूजा रानी सिंह"। परदादा दुंद बहादुर सिंह ज़मींदार थे , दादा राजेन्द्र प्र्साद सिंह ने शिक्षा चुनी और वो सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य बन सेवानिवृत हुए। पिता चन्द्रशेखर सिंह ने शिक्षक न बन कुछ नया करने की सोची और मेरे जन्म के बाद शुगर मिल में कार्यरत हुए। पिता की उन्नति के साथ - साथ कई नए शहर और वहाँ के लोगों को देखने और समझने का मौक़ा मिला। पढ़ाई के अलावा किसी चीज़ में अधिक दिलचस्पी न थी। मेरे छोटे पापा प्रवीण कुमार सिंह जो औरंगाबाद में महिला कालेज में पढ़ाते थे ,उनके साथ मैंने छुट्टियों में हर तरह का साहित्य पढ़ने का अवसर पाया। मेरी सोच को दिशा छोटे पापा से मिली। पर डरती थी , किसी को मेरे लिखने के बारे में पता न चले , ख़ास तौर पर पिता को जो मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे हरियाणा में एक छोटे शहर जींद के " हैप्पी सीनियर सेकेण्डरी स्कूल "से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। मेरठ के "इलेक्ट्रा विद्यापीठ "(जो अब ट्रांसलैम ऐकेडमी है ) से सीनियर सेकेण्डरी किया। यहाँ के छात्रालय में मुझे ख़ुद को परखने का मौक़ा मिला। मैंने खरगोश पर परीक्षण से मना किया और मेनका गान्धी के कार्यों से प्रभावित हो उनसे सम्पर्क किया। उनका ख़ुद अपने हाथों से लिखा प्रशस्ति पत्र मिलने पर मैंने समाज के लिए ख़ुद को समर्पित करने की सोची। ग़ाज़ियाबाद के "एम एम एच कॉलेज " से स्नातक की परीक्षा साइंस विषय से उत्तीर्ण की । इसी दौरान कई भाषण ,निबन्ध, और बहस की प्रतियोगिताएँ जीतीं। नाटक लिखे और उनमें भाग भी लिया। कई अख़बारों में नाम छपा। वर्ष 1996-1997 की "बेस्ट एन एस एस स्टूडेण्ट् औफ द ईयर "का अवार्ड मिला। पढ़ाई के दौरान ही बच्चों को स्कूल में भी पढ़ाना शुरू कर दिया सबसे कम उम्र की लेकिन बच्चों में लोकप्रिय शिक्षिका रही। मेरे पढ़ाए बच्चे आज टीसीएस एवँ इन्फ़ोसिस में अच्छे पद पर हैं। ख़ुश हूँ कि आज भी वो मुझे याद करते हैं। बाद में एम एस सी ( केमिस्ट्रि ) "मगध विश्व विद्यालय के एस सिन्हा कौलेज ,गया " से ६८% मार्क्स से उत्तीर्ण किया। कई अन्य कम्पनियों में इस बीच कार्य करती रही।वर्ष २००५में शादी के बन्धन में बंधी। शादी के उपरान्त जॉब के साथ-साथ एम बी ए इन (एच आर ) "पौन्डिचेरी यूनिवर्सिटी "से किया और " एच सी एल टेक्नॉलजी " कम्पनी में कार्यरत हुई। आज मेरी सम्पत्ति मेरे दो बच्चे हैं। मैं घर से ही अपने सपने को कविता और लेख के रूप में फिर से पुनर्जीवित करने की चाह रखती हूँ जो अनायास ही किसी के उत्साहित करने पर शुरू हुई। मेरी कुछ कविताओं को "आधुनिक साहित्य " जो आशीष कुमार कंधवाए जी द्वारा प्रकाशित है में स्थान मिला। इस बार की "हिन्दी जगत " में भी डाॅ सुरेश रितुपर्णो जी ने मेरी कुछ कविताओं को स्थान दिया है । मेरा व्यंग्य " प्लास्टिक की दुनिया " को "आफ्टर ब्रेक " न्यूज़ में स्थान दिया गया। एक और पत्रिका "मनमीत " में भी मेरी कविता को स्थान दिया गया। आप सभी का प्रेम और अनुग्रह मेरे साथ है। हाल ही में माननीय पुरुषोत्तम शर्मा जी ने अपनी पत्रिका " यज्ञ भारती " में भी मेरी कहानी " बैलाडोना लिली " को स्थान दिया है। लेखन ही मेरा जीवन है।

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  1. पूजा रानी सिंहजी ,कहानियों के बाद आपने अपना परिचय दिया है.लेकिन आपका परिचय तो आपकी कहानियों ने पहले ही दे दिया है.वाह . मन प्रशन्न हो गया .इसे अन्यथा न लें,पर आपकी कलम चूम लेने का मन करता है(वैसे मुझे पता है ये कहानियां आपने कंप्यूटर पर लिखीं है.)
    जिस स्वाभाविकता से रोशनाई कलम से निकलती है उसी सहजता से आपकी कहानियाँ भी .हार्दिक प्रशंसा

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  2. मैंम.. आपका जवाब नहीं !!! ऐसा कौन संवेदनशील इंसान होगा, जो इस लेखन की धारा में बह न सके....उम्मीद है, अपनी लेखनी की नैया से देश के युवाओं के डूबते नैतिक मूल्यों को पार लगाएंगी..

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  3. बहुत खूब... संवेदनशील युवाओं को नई राह दिखाने की पूरी क्षमता है आपकी लेखनी में !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. achhi kahaniyan hain ma'm.
    abd achhi baat ye hai k sab chhoti hain. to zada time nahi chahiye padhne k liye

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी8:29 pm

    Sunder bhasha pravah...bahut hi accha likha hai...

    उत्तर देंहटाएं
  6. bhaskar3:50 am

    maine sare lekh padhe...behterin hain...kuch sujhao aur apne vichar thodi study a baad doonga....aap mein khas talent hai.....keep it up and all the best for the future......

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह्ह्हह्ह्ह्ह बहुत सुन्दर कहानियाँ है .......लाजवाब.......मार्मिक

    उत्तर देंहटाएं

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