बुधवार, 15 जनवरी 2014

राजीव कुमार रावत का आलेख - संवाद प्रक्रिया :: चुनौती एवं समाधान

संवाद प्रक्रिया :: चुनौती एवं समाधान

मानव जीवन में परस्पर संवाद एक सेतु और संवाद हीनता एक दीवार की तरह होती है। संवाद जीवन का रस है किंतु है बहुस्वादकारक एवं बहुआयामी- कभी यह स्नेहिल होता है तो कभी कटु, कभी तोड़ देता है तो कभी जोड़ जाता है, कभी सच्चा लगता है तो कभी सिरे से नौटंकी अथवा पाखण्ड दिखता है-कभी अपनों को भी पराया कर देता है तो कभी पराएपन की लंबी दूरियां पलों में तय कर अपनेपन के संबंध कायम कर देता है। जीवन की सारी कसरत यह संवाद ही है और सारा जीवन इसी के इर्द-गिर्द चकरघन्नी सा घूमता रहता है। हमारे जीवन की सारी की सारी धमाचौकड़ी संवाद की ही क्रिया अथवा प्रतिक्रिया होती है- कभी हम किसी अपने से परायेपन का सा ठंडा संवाद करते हैं तो कभी किसी पराये से अपनेपन की गर्माहट से पेश आते है। कभी कोई दूर देश का जंतु (प्राणी-मनुष्य) जिससे हमारा कोई प्रत्यक्ष संपर्क कभी नहीं हुआ हो किंतु हमें मानसिक संवाद से अपने बहुत नजदीक लगता है जैसे कि बिल्कुल बगल में बैठा हो और कभी हमें अपने बगल में बैठे भैया, मां, बाप, पत्नी, पुत्र, भतीजे, भांजे, मित्र आदि भी बहुत दूर के लगते हैं और उनसे हमारा कोई संवाद नहीं हो रहा होता है। शायद संवाद के लिए भौगोलिक दूरियां या नजदीकियां ज्यादा जिम्मेदार नहीं है - बात ह्रदय अनुभूति की है, मात्र वाचिक अनुभव की नहीं है।

प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण उसकी परिस्थितियों एवं चिंतन से होता है जिससे उसकी विचारधारा बनती है और वह दूसरों से अपने ही पाले-पोसे पूर्वाग्रहों एवं संस्कारों से संवाद करता है और धीरे-धीरे अनुभवी होता चलता है। अनुभव भी नितांत निजी मसला है और इसे शब्दों के स्तर पर बिल्कुल भी समझा नहीं जा सकता कि जो अनुभव हमें है वह दूसरे को क्यों नहीं हो रहा है या जो दूसरे को हो रहा है, वह हमें क्यों नहीं हो रहा है और यह अनुभूतियों एवं संवेदनाओं के तंतुऔं के स्पंदन की गति तथा धड़कनें ही हमारे संवाद के स्तर एवं वार्ता में प्रयुक्त शब्द संग्रह, चयन अथवा नियोजन को निर्धारित करती हैं। तभी तो हम संसार में स्वयं से तथा अपने से इतर हर एक दूसरे से विभिन्न स्तरों का संवाद करने में सक्षम हो पाते हैं। हम बहुत अनुभवी हो सकते हैं किंतु हमारी अनुभूति एवं संवेदनाएं किसके नजदीक हैं उससे हम सदैव संवादरत रहते हैं और जिससे हम किन्हीं भी कारणों से नजदीकी नहीं पाते हैं चाहे उनके स्वभाव के कारण या और व्यवहारजनित दोषों के कारण या अपनी ही किन्हीं स्वभावगत विशिष्टताओं अथवा कमजोरियों के कारण, हम उनसे संवाद करने से बचते हैं अथवा कतराते हैं अथवा ऐसा कोई अप्रिय घटनाक्रम कर बैठते हैं कि संवाद निर्रथक हो जाता है या हमारे मन में यह भी गहरे पैठा हुआ एक अनुभव हमें निर्देशित करता है कि इस व्यक्ति विशेष से संवाद करने का कोई औचित्य है अथवा नहीं है- ऐसी स्थिति में संवाद वाचिक तो बहुत होता है किंतु उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं आता क्योंकि वहां उद्देश्यपरक वार्ता न होकर मात्र शाब्दिक आडंबर, घात-प्रतिघात अथवा तर्क-कुतर्क आ जाते हैं- एक दूसरे की कमियों को इंगित करना और अपने आपको दोषमुक्त सिद्ध करने में सारी शक्ति लग जाती है। ऐसी विशुद्ध कुतार्किता के संवाद और गहरे विषाद छोड़ जाते हैं और फिर लगता है कि इससे तो अच्छा था कि यह संवाद न ही हुआ होता। हमारे समाज में बहुत सी लोकोक्तियां एवं कहावतें संवाद से जुड़ी हुई है और प्रचलित हैं जैसे कि – पंचों की बातें सर माथे पर परनाला यहीं गिरेगा, रहिमन ओछे नरन की बैर भली न प्रीत-काटे चाटे स्वान की दोउ भांति विपरीत, कसमे वादे प्यार वफा सब बातें हैं, कोई शर्त होती नहीं प्यार में, सावन के अंधे को हरा ही हरा, न सावन अंधे न भादों हरे, बातों का क्या, फलां की बात कुत्ते की या गधे की लात आदि- मूलतः हैं संवाद से संबंधित और संदर्भ विशेष में प्रयुक्त की जाती हैं।

बहुत से लोग हमारे बहुत गहरे चिंतन में रहते हैं जिनसे संवाद कभी नहीं टूटता और कुछ हैं जिनसे कभी भी संवाद नहीं जुड़ता अथवा होते-होते टूट जाता है और कभी होके भी नहीं होता और अक्सर न होके भी होता रहता है- हम सारी जिंदगी संवाद ही तो करते रहते हैं और मेरा अपना अनुभव है कि बहुधा हम मूक संवाद ज्यादा करते हैं, हम खुद ही अपराधी, वकील, न्यायाधीश एवं अदालती कार्रवाई की भूमिका में रहते हैं क्योंकि हम हर समय दूसरे से बातें करते रहते हैं, विश्लेषण करते रहते हैं- यह हो गया – यह क्यों नहीं हुआ- काश हमने यह कह दिया होता - उसने ऐसा क्यों कह दिया- उसने हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया और हमने उसके साथ यह अच्छा किया- मूलतः हम अपने आपको तो जानने की कोशिश करते नहीं हैं पर दूसरों को जानने की प्रक्रिया में निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं और उनके साथ अपने संबंधों को परिभाषित करते रहते हैं, इसलिए अपने और दूसरों के अंतरमन में यह वार्ता चक्र अनवरत चलता ही रहता है तभी तो हम कहीं-कहीं अचानक किसी समाधान पर पहुंच जाते हैं और कहीं-कहीं आक्रोश में फट पड़ते हैं क्योंकि मानसिक संवाद में हम उसकी काफी तैयारी कर रहे होते हैं या कर चुके होते हैं।

समस्या है तो समाधान भी निश्चित है- किसी ने लिखा है कि- “जो जहर हलाहल है,अमृत भी वही लेकिन, मालूम नहीं तुमको, अंदाज पीने का” । संवाद भी ऐसी है क्रिया-प्रक्रिया का संजोग है जो दोनों ही भूमिकाएं निभाता है-असल में समस्या सबसे बड़ी यह है कि हम सब बोलना तो जानते हैं पर क्या बोलना है यह नहीं जानते और न सीखना चाहते हैं-हमें अपनी मूर्खताओं से भी मोहब्बत हो जाती है इसलिए हम वार्ता तो करते हैं पर अपनी शर्तों पर- सामने वाले से पूरा समर्पण चाहते हैं और अपनी शत-प्रतिशत जीत- हम कुछ भी हारना नहीं चाहते और इतिहास अपना बनाना चाहते हैं जबकि इतिहास विजेता लिखते हैं, इस कारण संवाद विफल रहते हैं। पूर्व काल में ग्रामीण परिवेश में चौपाल-चबूतरों पर प्रतिदिन शाम को संवाद ही तो होता था जिसमें सब तरह की वार्ता होती थी, लोग दिल खोल के बात करते थे, थोडी बहुत ऊंच-नीच भी होती थी तो वह अगली शाम तक पिघल जाती थी अथवा कोई बुजुर्ग मामले को सुलझा देता था।

संवाद प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती है कि आज घर परिवार समाज राष्ट्र में ऐसे मान्य व्यक्तित्वों का घोर अकाल हो चला है जो वार्ता प्रक्रिया को हल्के आघात, संघात, स्नेह की थपकियों से अंजाम तक ले जा सकें। वार्ता चक्र के बीच आने वाले उतार चढ़ाव वार्ता की रुकावट न बनें एवं एक कसक या चाहत बची रहे अथवा बनी रहे तो संवाद भी निरंतर चलता रहेगा। कभी संवाद दूसरे की गर्ज लगता है तो कभी अपना धर्म लगता है, पर मेरे हिसाब से संवाद के विषय में इसे न मैं अपनी गरज़ मानता हूं न ही दूसरों की, बल्कि संवाद की दुनिया में सबसे ज्यादा नुकसान इस गरज़ शब्द ने ही किया है क्योंकि जैसे ही हम यह मानने लगते हैं कि यह मेरी गरज़ हैं या उसकी क्या गरज़ है या मैं ही क्यों करुं वह करे, हम संवाद की प्रारम्भिक शर्त ही हार जाते हैं-और इसलिए उसके बाद जो भी होता है वह विवाद, विषाद, युद्ध, संघर्ष, रामायण-अयोध्या, महाभारत-कुरुक्षेत्र आदि कुछ भी हो सकता है-बस संवाद नहीं होता। इसी से अपनी गोद के पाले बच्चे अलग हो जाते हैं, मां बाप एवं अन्य सगे संबंधियों को छोड़ देते हैं। संवाद यदि किसी ध्येय को ध्यान में रखकर किया जाए तो वह विचार-विमर्श बन जाता है, और इतिहास को ध्यान में रखकर हितसाधन के लिए अथवा अधिक से अधिक अपनी शर्तों पर प्राप्त करने के लिए किया जाए जिसमें तात्कालिकता के स्थान पर दीर्घ लाभहानि जुड़े हों तो वह राजनीति अथवा कूटनीति की चालाकी बन जाता है। परंतु मेरा मानना है कि संवाद को मानवीय जीवन की सहज क्षुधा-पिपासा की भांति स्वीकार किया जाए तो यह जीवन का स्नेहन है।

संवाद में समस्या आती है हमारी ईगो (इसे अहंकार नहीं कहा जाना चाहिए) की, क्योंकि हम आज कल संबंधों में व्यापार पहले देखने लग गए हैं और जीवन बाद में- यह कुछ इस तरह से है कि हम पपीहे के अंकुर में भविष्य में लगने वाले आम के फल देखें वहां तक तो ठीक है किंतु उसमें हम यह देखने लगें कि यह आम का वृक्ष कटने पर बीस हजार की लकड़ी दे जाएगा - यह धूर्तता है। स्वार्थबुद्धि के कारण संबंधों में से मान- मुनौब्बल, हास-परिहास, उलाहना, गिले-शिकवे, चिरौरी खत्म होते जा रहे हैं- एक तो विकासवादी एवं भौतिकवादी युग में पारस्परिकता एवं निर्भरता कम होती जा रही है इसलिए हर बच्चा और व्यक्ति अपने आप में एक पूर्ण इकाई बनने की धुन में लगा है, वह किसी का अंग नहीं रहना चाहता, किसी का भी हिस्सा बन कर रहना उसके बस की बात नहीं रह गई है इसलिए वह संपूर्ण निर्भर स्वतंत्र अस्तित्व के लिए जूझ रहा है- वह न संयुक्त घर का, न परिवार का, न गांव का, न समाज का, न देश का और न मानव जाति का-हिस्सा बनना चाहता है, बस वह तो परम सत्ता का केन्द्र स्वयं होना चाहता है इसलिए वह दूसरे से संवादहीनता की स्थिति को महसूस तो करता है किंतु यह शून्यता उसे शायद अपने अस्तित्व से जुडी सफलता लगती है। आजकल वह उलाहना खत्म होता जा रहा है जब हम अपने बचपन को याद करते हैं तो किसी की कुछ महीनों चिट्ठी न आने पर अपने ही अंदर की हूक एक पोस्टकार्ड लिखा देती थी कि क्या बात है बहुत दिनों से कोई चिट्ठी पत्री नहीं मिली है, या उस गांव के किसी परिचित अपरिचित से रास्ते में हुई भेंट में भी अपने उस परिचित का जिक्र करते थे कि भई उनके क्या हाल हैं। आज कैरियर और व्यवसाय में निरंतर सफलता इतनी हावी हो गई है कि उसके आगे अन्य सब अवसर- शादी – विवाह, गमी, बीमारी आदि बौने हो गए हैं और वहां जाना या पहुंचना अनिवार्य नहीं लगता क्योंकि मिलने-जुलने की, हुलसने की, गुदगुदाने की, मग्न रहने की हुलस और हूक नोटों और सुविधाओं के नीचे कुचल कर मरणासन्न हो गई है कि बेचारी अब कराह भी नहीं पा रही है। हमारे खुद के ही पावों के नीचे से उसकी अंतिम सांसें हमारे दिल और दिमाग तक नहीं पहुंच रही हैं। मैं बहुत सी जगह कॉल करता हूं किसी कारणवश बात नहीं हो पाती है तो प्रतीक्षा रहती है कि वह जब देखेगा तो कॉल करेगा—एक दो दिन के इंतजार के बाद मैंने फिर कॉल किया और उलाहना दिया कि मैंने परसों फोन किया था आप शायद कहीं बिजी थे, मिसकॉल तो देखी होगी, कॉल कर लिया होता तो जवाब मिला कि हां मिस कॉल तो देखी थी, फिर मैंने सोचा कि कोई काम होगा तो आप फिर कॉल करोगे ही.... यह है आज का विकासशील युग और विकसित मनुष्य और हमारे संबंध और संवाद की इच्छा का स्तर। जबकि मैं कहीं भी कुंवारी कॉल (मिस काल) नहीं करता श्रीमती कॉल करने के लिए ही फोन करता हूं। एक समय आएगा कि इनके पास कहने के लिए बहुत कुछ होगा किंतु इनके पास कोई प्रेम से सुनने वाला नहीं होगा।

संवादमार्ग में और भी कई रुकावटें हैं जैसे सीता जी की सुधि लाने के मार्ग में हनुमान जी के समक्ष कई सारे व्यवधान थे। सबसे महत्वपूर्ण एवं पहाड़ जैसी रुकावट है हमारा स्वयं का दुराग्रही पक्ष एवं पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार- हमें लगता है कि बस हम ही सही हैं और दूसरा गलत है, इसलिए मुझे क्या पड़ी है कि मैं संवाद शुरु करुं या संवाद ही क्यों करुं जब बिना उसके भी जिंदगी मजे में कट रही है बल्कि और अच्छी कट रही है कि पहले कहन-सुनन थी-अब नहीं हैं। हम कुछ अधेढ़ एवं मेरे जैसे बहुत से लोग इसे आज इतना शिद्दत से क्यों महसूस कर रहे हैं क्योंकि आज लगभग पिछले 20-25 वर्षों में हमारी शिक्षा का मूलभूत आधार बदल गया है, सामाजिक सरंचना बिखर गई है, संबंध कमजोर हुए हैं, बाजार एवं भौतिक संपदा सबके ऊपर हावी है और कृतघ्नता स्वभाव बन गई है-हमें अपने संस्कारों में कृतज्ञता घुटी में मिली है, पहले बलात् लादी जाती थी-संबंध भारी होते थे, बच्चे के अहंकार को दबाकर संबंधों का भार रखा जाता था कि ये गुरु हैं, पिताजी हैं, दादी-दादा, नाना-नानी, जीजी-जीजाजी आदि हैं, रिश्तेदार हैं, पूज्य हैं, किंतु आज यह देखने को नहीं मिलता, आज सब वेतनभोगी व्यव्स्थापक अथवा प्रबंधक हैं या अपने कर्तव्य पालने वाले सेवक- पहले धाय मां होती थी आज क्रेच में आया है, गुरु ब्रह्म होता था आज ट्यूटर है, चाची ताई भाभी के साथ छोटी मां, बड़ी मां, नई मां आदि संबोधन होते थे किंतु आज बच्चे मां बाप से भी कहने में कोई संकोच नहीं करते कि ठीक है पाला-पोसा था तो क्या अहसान किया –अपनी ड्यूटी निभाई है ना, हम पर क्या अहसान है (हालांकि यह शाश्वत चिरंतन सर्वयुगीन संवाद है, पर आज कुछ ज्यादा ही मुखर हो चला है) । शिक्षा में से पंचतंत्र की कहानियां, गौरवगाथाएं, ऐतिहासिक प्रेरणाएं गायब हो गई हैं। आज अध्यापक बच्चों से कुछ कह नहीं सकता- बराबरी के खोखले नारों और बाल अधिकारों की गलत व्याख्या ने बच्चे को गुरु के उच्चस्तर पर स्थापित कर दिया है और गुरु को उसकी फीस से वेतनादि पाने वाला कर्मचारी बना दिया है। पारिवारिक संबंधों ने अपनी गरिमा संपत्ति बंटवारे एवं स्वार्थपूर्ति तक निभाने की मजबूरी की चालाक धूर्तता एवं लोलुपता के कारण गिरादी है। आज हर कोई संवाद परंपरा को मिटाने पर तुला है पर चाहता है कि संवाद दूसरा करे और मेरी स्वार्थपूर्ति जहां तक हो वहीं तक करे, जो मुझे चुभने वाली बातें हो सकती हैं उन्हें बिल्कुल न करें और मुझे कोई भी आघात करने की छूट मिले, सामने वाला अपना बचाव भी न करे क्योंकि उसके बचाव करने का अर्थ हमारा वार खाली जाना होगा और हम इतना सा भी आघात नहीं झेल पाएंगे, इसलिए संवाद तो हो पर मेरे लिए असहज करने वाला न हो- कुछ भी उघड़े नहीं न मेरी क्षुद्रता, न मेरे स्वार्थ, न इतिहास, न तथ्य, न लोकाचार, न परंपरा, न न्याय, कुछ भी ऐसा न हो जो मेरे प्रतिकूल हो और जो मुझे स्वीकार न हो पाए, पर मेरी भलमनसाहत दिखे कि संवाद हो रहा है। अंग्रेजी सॉरी की बहुतायत ने हमें मानसिक एवं भाविक उथला तो कर ही दिया है और हम इस शब्द के इतने आदी हो गए हैं कि यह हमें एक सुविधाजनक गलियारा दे देता है परिस्थितियों से पलायन करने का और इसलिए अंदर कुछ नहीं होता, न अफसोस, न खिन्नता, न बदलने की अकुलाहट और न बदलने का कोई दबाव या जरुरत, और हमारे जीवन के हर स्तर से दंड प्रक्रिया का ह्रास एवं शीर्ष पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ जनों का चारित्रिक स्खलन भी हमारे संवादमार्ग के विचलन का कारण बना है। दण्ड व्यवस्था के सारे शीर्ष अनैतिक हो गए हैं, श्रीहीन हो गए हैं अतः वे स्वयं ही संवाद एवं शिक्षा परंपरा के संवाहक नहीं रह गए हैं इसलिए उनके प्रति सहज श्रद्धा किसी के मन में नहीं है- प्रौद्योगिकी एवं नवीनतम उपकरणों ने सब को सबके सामने लगभग नंगा कर दिया है इसलिए हमारे मित्र इकबाल हिन्दुस्तानी जी लिखते हैं कि –

क़तरा गर एहतजाज करे भी तो क्या करे, दरिया तो सब के सब समंदर से जा मिले ।

हर कोई दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ, फिर यह भी चाहता है कि मुझे रास्ता मिले ।।

....और आखिर में यही अभिलाषा एवं सलाह है कि भाई यह दुनिया हमसे पहले भी थी और बाद में भी रहेगी- संवाद जारी रखिए- क्या कोई भी व्यक्ति आग, पानी, हवा, सर्दी, गर्मी, बीमारी, शेर, सांप आदि से भी खतरनाक है- नहीं- तब हम इन सबके साथ जीना सीख रहे हैं तो एक व्यक्ति, घर, परिवार, समाज, देश में जीना क्यों नहीं सीख पा रहे हैं, जब हम अपनी बहुत सी कमजोरियों एवं कमियों के साथ जीते हैं तो दूसरे को अपराधी क्यों बना देते हैं, मान लेते हैं और संवाद से दूर हो जाते हैं। भोपाल के प्रसिद्ध कवि श्री मयंक श्रीवास्तव जी की पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करता हूं-

इस शहर में आजकल
हर शख्स सन्नाटा बुने
बन्धु अपने पाँव से कुछ आहटें पैदा करो।
हलचलों के स्त्रोत सारे
सूख कर पत्थर हुए
कल तलक जो बोलते थे
बंद सारे स्वर हुए
अब मुझे ये चुप्पियाँ
खामोशियाँ भाती नहीं
लोग चिल्लाने लगें, घबराहटें पैदा करो।
हर गली बैठी हुई है
एक गूंगापन लिए
शोरगुल की चिट्ठियां
लाते नहीं हैं डाकिये
फिर नया तूफ़ान आए
फिर नयी आंधी चले
तुम विचारों में नयी टकराहटें पैदा करो।
आँख में आँसू नहीं हैं
किन्तु चेहरा सुन्न है
राम जाने किस व्यथा से
अनमना मन खिन्न है
आदमी बेचैन होकर
ख़ुद लगे कुछ बोलने
तुम अकारण ही सही, झुंझलाहटें पैदा करो।

( मेरे प्रिय पाठकों- यह लेख अथवा आलेख या जो कुछ भी यह हो, कुछ अपनी कुछ पराई कुछ सुनी कुछ भोगी अनुभूतियों का रचा हुआ शाब्दिक व्यसन है-इसे साक्षी भाव से देखें और अपने अनुभवों से इसे और आगे बढाएं- जिससे कुछ हलचलें पैदा हों.........)

 

डॉ. राजीव कुमार रावत,हिंदी अधिकारी

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर-721302

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  1. उत्तर
    1. धन्यवाद महोदय

      हटाएं
    2. धन्यवाद महोदय
      सादर

      हटाएं
  2. वाह्ह्हह्ह बहुत सुन्दर ,,,,,,,,रुचिकर ..........हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद अल्का जी
      सादर

      हटाएं

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