सोमवार, 27 जनवरी 2014

श्याम गुप्त का आलेख - गाय और कृष्ण का तादाम्य ..गो व .गोपाल का निहितार्थ ....

 

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गाय और कृष्ण का तादाम्य ..गो व .गोपाल का निहितार्थ ....

द्रौपदी ने जब प्रथम मुलाक़ात में कृष्ण से पूछा कि तुम वास्तव में कौन हो ? कृष्ण का कथन था ‘ मैं कौन हूँ !...मैं तो एक ग्वाला हूँ ..गाय चराने वाला ...लोग मुझे गोविन्द कहते हैं।

गोविन्द अर्थात यो विन्दते गो ..जो गौऔं को आनंद देता है...जिसे गौऔं में आनंद प्राप्त होता है, उनकी वन्दना करता है। गोपाल ...जो गायों का पालक है।

उपनिषदों के बारे में एक कथन है ..”सर्वोपनिषद गावो दोग्धा नन्द नन्दनम “ अर्थात सारी उपनिषद् गायें हैं और उनके दुहने वाले एवं उन्हें आनंदित करने वाले नन्द नंदन गोपाल श्री कृष्ण हैं।

वस्तुतः तात्विक अर्थ में गाय का अर्थ गाय व पृथ्वी के अतिरिक्त ज्ञान व बुद्धि भी होता है। अतः तात्विक अर्थ है कि सभी उपनिषद् ( साथ में अन्य शास्त्रों को भी लिया जा सकता है ) गो अर्थात ज्ञान का भण्डार हैं उन्हें श्रीकृष्ण ने सार रूप में दुह कर विश्व को गीता प्रदान की ..इसीलिये वे गोपाल हैं..गोविन्द हैं।

ऋग्वेद के मन्त्र ५/५२/४०९४ में कथन है....

गवामपि ब्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिव:

नहिं त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वंत:

ब्रज में गौ ...अर्थात समस्त ज्ञान, सभ्यता, संस्कृति की उन्नति व वृद्धि ..राधा-कृष्ण ..दोनों के सम्मिलित सेवा, प्रयासों व विविध अन्वेषणों द्वारा हुई।

कृ = कर्म.., कर्तव्य, कृष्ण, सेवा .....राधो = आराधना, साधना, राधन( रांधना,गूंथना ) राधा ...नियमित शोध..शोधन ...अर्थात कर्म व साधना द्वारा की हुए शोधों से हुई ....

तथा....”यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे “.अर्थात यमुना के किनारे गाय, घोड़े आदि धनों का वर्धन (वृद्धि व उत्पादन-पालन ) आराधना सहित करें या होता है।

---अर्थात ज्ञान को कर्म एवं साधना द्वारा ही प्राप्त व उन्नत, विकिरित, प्रसारित किया जा सकता है।

एतिहासिकता व तथ्यानुसार गोकुल वैदिक काल से ही विश्व का प्रमुख गौ ( = समस्त गोवंश एवं घोड़े आदि पालतू पशु ) का प्रजनन व वर्धन केंद्र रहा है। गोपालक समूह के प्रमुख नन्द द्वारा पालित श्रीकृष्ण अपने क्षेत्र की आर्थिक-शक्ति को मथुरा नगर व साम्राज्य को नहीं भोगने देना चाहते थे। मथुरा-गोकुल.... श्रीकृष्ण–राधा–गोकुल के गोपालकों तथा कंस के मध्य यही तो झगड़ा था ...दुग्ध वितरण व उसके अर्थशास्त्र का। देखिये एक कुण्डलीछंद...

गोकुल वासी क्यों गये, अर्थशास्त्र में भूल,

माखन दुग्ध नगर चला,गांव में उडती धूल ।

गांव में उडती धूल, गोप बछडे सब भूखे,

नगर होंय सम्पन्न, खांय हम रूखे सूखे ।

गगरी देंगे तोड, श्यामसुनलें ब्रज वासी,

यदि मथुरा लेजायें, गोधन गोकुल वासी॥--ब्रज बांसुरी से (डा श्याम गुप्त... )

सामान्य जीवन व्यवहार में ......मानव जीवन का मूल लक्ष्य क्या है ?...जीवन व्यवहार क्या व कैसे और क्यों होना चाहिए ? इसी पर तो सिर्फ मानव का ही नहीं अपितु प्राणी, वनस्पति, जीव-जगत एवं जड़-जंगम सभी का भूत, भविष्य व वर्तमान टिका है। कर्म, धर्म, वैराग्य, संसार, ज्ञान, मोक्ष सभी कुछ इसी प्रश्न पर टिके हैं। और उत्तर जाने कितने हैं---‘कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर’... कर्मण्येवाधिकारस्ते....परमार्थ ही जीवन है...सत्यं वद धर्मं चर...ईश्वर की राह ...आदि आदि ..

पर क्यों ? क्योंकि आराधना, साधना, प्रसन्नता, परिश्रम से गो पालन के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता....बिना संस्कारित बुद्धि, ज्ञान, विवेक के साधनामय कृतित्व व कर्म के बिना जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता जैसा यजुर्वेद के अध्याय ४० –ईशोपनिषद के मन्त्र ११ में निहित है...

विद्यांचाविद्यां च यस्तत वेदोभय सह।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते।। ..----अर्थात ज्ञान एवं संसार दोनों को जो व्यक्ति साथ-साथ बुद्धि व विवेक पूर्णता से साधता है वह सांसारिक ज्ञान से मृत्यु को जीत कर आध्यामिक ज्ञान से जीवन लक्ष्य...मुक्ति प्राप्त करता है।

यही तो कृष्ण गीता में कहते हैं....

श्रुति विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।। गीता २/53....

----- अर्थात भान्तियों से युक्त बुद्धि जब समाधि में अचल निश्चल होती है तभी साधक को योग की प्राप्ति होती है। एवं...

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्व भूतानि चात्मनि।

ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।

---- अर्थात जो सब भूतों ( संसार में जो कुछ भी है ) को स्थिर बुद्धि ( वास्तविक ज्ञान व साधना युत कर्म ) से मुझ परमात्मा में देखता है वह समाधि अवस्था के सुख ( जीवन लक्ष्य पूर्ति का सुख ) को अनुभव करता है।

अतः जो ज्ञान व बुद्धि के उपयोग से कठोर श्रम, आराधना व साधना के साथ कर्म करते हैं वे ही जीवन लक्ष्य प्राप्त करते हैं।

यही कृष्ण और गाय का तादाम्य एवं ..गोपाल..गोविन्द का निहितार्थ है......।

4 blogger-facebook:

  1. सारगर्भित रचना है,बधाई गुप्त जी।

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    1. धन्यवाद विजय जी....राधे-गोविन्द की जय ...

      हटाएं
  2. अति सुंदर
    राधे राधे

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद राजेव जी....राधे-राधे ...नास्ति कृष्णार्चनं राधार्चनम बिना ...

      हटाएं

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