सोमवार, 27 जनवरी 2014

मनोज सिंह जादौन की कहानी - नीयत

नीयत

“बाबूजी लेना कितनी है ये तो बताइये ?”सब्जीवाला मुझे मनाता सा बोला, “पहले भाव ठीक से बताओ नहीं तो मै किसी और से ले लूँगा.” मैंने कहा

“बाबूजी मटर भी तो देखिए बिलकुल हरी और बड़े दानों से भरी मटर है इसीलिए थोड़ी महंगी है” वो मुझे कन्विंस करने की कोशिश करने लगा, “अच्छा तो तुम्हारे हिसाब से बाक़ी लोग छिलके बेच रहे हैं”.

“नहीं बाबूजी मेरे कहने का ये मतलब नहीं है,पर मेरी मटर अच्छी है और मेरी तौल पूरी है इसीलिए मेरी सब सब्जियां कुछ मंहगी है.” सब्जीवाले ने मुझे फिर समझाना चाहा.

मैंने प्रतिवाद किया “हाँ...हाँ..हरिश्चंदर तो बस तू ही है,ला एक किलो तौल दे,और धनिया भी डाल दियो.” “जी बाबूजी ही..ही..ही..” खीसें निपोरता हुआ वह सब्जीवाला मटर तौलने लगा.

महीनों से मैं इस सब्जी मंडी से सब्जियां ले जाता हूं .लेकिन इनमें से किसी का नाम मैं नहीं जानता हूं न ही शायद ये मेरा नाम जानते है लेकिन एक-दूसरे को पहचानते बखूबी हैं, महीनों से चलती इस खरीद फरोख्त में ये मोलभाव एक साझा तत्व है . ये पूर्वाग्रह भी पूरे यकीन से मुझमें मौज़ूद था कि थोड़ी बहुत बेईमानी तो सब सब्जीवाले करते ही हैं ,इसलिए मैं मोलभाव कर दाम कम करने की पुरजोर कोशिश करता रहता था. उस दिन भी मैं यही कर रहा था.मैं सब्जी लेकर चल दिया पर आज मैंने निश्चय कर लिया था कि घर जाकर सारी सब्जियां तौलूगा और एक ग्राम भी कम निकलीं तो इन सब्जी वालों कि तो खैर नहीं. नाप-तौल विभाग वालों से शिकायत कर सबकी तराज़ू और बाँट चैक कराऊंगा .एक तो महंगाई वैसे ही आसमान छू रही है कि नौकरी में ईमान को बचा पाना मुश्किल हो रहा है, और ऊपर से ये सब्जीवाले उफ़.तभी मुझे याद आया जनरल स्टोर से भी कुछ सामान लेना है ,अच्छा हुआ रास्ते में ही याद आ गया वर्ना घर पर झंझट हो जाती .

सामान की लिस्ट दुकानदार को देकर मैंने जैसे ही अपनी ज़ेब टटोली दिल धक् से रह गया “मेरा पर्स कहाँ गया?” बेसाख्ता मुंह से निकल गया , दुकानदार ने चौंककर मुझसे पूछा “क्या हुआ भाई साहब?” “अरे मेरा पर्स नहीं मिल रहा है ज़रा देखना ये सामान यहीं रखा है मैं पर्स ढूँढने जा रहा हूं” मैं बदहवास सा वापस भागा ,आख़िर पूरे महीने का वेतन उसी में था .एक मध्यमवर्गीय आदमी के लिए ये बज्रपात ही था कि पूरे महीने की कमाई महीने के शुरुआत में ही गुम जाए ये असहनीय था. अभी मैंने सड़क पर नज़र दौड़ना शुरू ही किया था कि मैंने देखा वो सब्जीवाला भागता हुआ मेरी ओर ही आ रहा था .मेरे पास आकर अपनी साँस थामने की कोशिश करने लगा उसका एक हाथ मेरी ओर था जिसमें मेरा पर्स था “बाबूजी ये आपका पर्स , मेरे ठेले के नीचे गिरा पड़ा था. जल्दी से पैसे देख लीजिये पूरे है न.” मैं स्तब्ध खड़ा था “बाबूजी जल्दी कीजिये ,मेरे ठेले पर कोई नहीं है, पड़ोसी से कह के आया हूं.”

मैं होश मै आया, मैंने कहा नहीं गिनने की कोई ज़रुरत नहीं.” मैंने पर्स में से एक पचास का नोट निकल कर उसे देना चाहा ,पर उसने हाथ जोड़ते हुए कहा “ बाबूजी, आप लोगों की दया से संतोष करने लायक कमा लेते है. अच्छा ” वह हाथ जोड़कर वापस चला गया और मैं उसे धन्यवाद कहने का साहस न जुटा पाया, शायद मैं शर्मिंदा भी था. मैं अपनी आँखों कि गिलावट को रुमाल से छुपाते हुए स्टोर पर जाकर सामान लेने लगा. मैंने तय कर लिया था कि मैं घर जाकर सब्जियां तौलकर नहीं देखूँगा.

लेखक:-मनोज सिंह जादौन,वार्ड नंबर18,सुनहरा रोड़ ,सबलगढ़,जिला-मुरैना (म.प्र.)

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