कुबेर का व्यंग्य - चोखा रंग

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व्यंग्य

चोखा रंग

नयापन और अनोखापन लोगों का लुभाते हैं। पारंपरिक रंगों से उकता चुके लोगों के लिए खुशखबरी है। अब की होली के अवसर पर देश की जानी-मानी कंपनियों के द्वारा आधुनिक और अनोखे रंगों की सेल लगाई गई है। सेल्समेन द्वारा ग्राहकों को इन रंगों की विशेषताओं के बारे में हाईटेक माध्यमों से और मनोरंजक तरीके से समझाया जा रहा है। मुफ्त बँट रहे इस ज्ञान को लपकने के लिए खरीददारों का तांता लगा हुआ है।

जिस अनुपात में बिकने वाले मादक द्रव्यों के पैकेटों पर वैधानिक चेतावनी छापी जाती है, उसी अनुपात में उसकी बिक्री बढ़ जाती है। इसी फार्मुले से प्रेरित होकर इन रंगों के निर्माता कंपनियों द्वारा इनके पैकेटों पर बड़े-बड़े अक्षरों में वैधानिक चेतावनी छापी गई है - ये रंग शरीर और आत्मा, दोनों के लिए हानिकारक हैं।

इन रंगों के निर्माता बड़े धार्मिक प्रवृत्ति के जान पड़ते हैं वरना रंगों का प्रभाव आत्मा पर भी पड़ता होगा, यह ज्ञान उन्हें कहाँ से मिलता? ज्ञान की ऐसी बातें तो संत कबीर जैसा महात्मा ही कह सकता है। सांसारिक मोह-माया के बंधनों में बँधकर आत्मा काम, क्रोध और लोभ के रंगों से रंग जाता है। मानवता पर भी इनके निर्माताओं की गहन आस्था होगी, वरना ग्राहकों के शरीर की चिंता उन्हें भला क्यों होने लगता?

शरीर और आत्मा पर इन रंगों का चाहे जो असर पड़ता हो, इनके फ़ायदे कम नहीं है। मसलन, इससे कपड़ा बदरंग होने की जगह और भी चमकने लगता है। ये त्वचा पर ऐसा असर छोड़ते हैं कि चंद दिनों में ही इसमें निखार आने लगता है। पहले गोरापन आता है और बहुत जल्द ही इसमें लालिमा आ जाती है। चेहरा नूरानी हो जाता है। रूग्ण शरीर भी चंद दिनों में पहलवानी हो जाता है। इन रंगों के व्यापारी रातों-रात अरबों के मालिक हो जाते हैं। इन रंगों के निर्माण में अतिआधुनिक नैनों टैक्नोलाजी का इस्तेमाल हुआ होगा, तभी तो इनका असर आत्मा जैसे अदृश्य तत्व पर भी हो जाता है।

इन रंगों का व्यापार और इस्तेमाल करने के लिए लज्जा नामक फालतू चीज का परित्याग करना पड़ता है। होली में भला लज्जा का क्या काम? इन रंगों को घोलने के लिए अब अव्यवहारिक हो चुके ईमानदारी और नैतिकता जैसी मूल्यों का प्रयोग करना पड़ता है। आज के जमाने में ईमानदारी और नैतिकता जैसे मूल्यहीन चीजों को पकड़कर रखने से भी क्या लाभ?

सेल के पहले काऊण्टर पर बिक रहे रंग का नाम है आचार रंग। नाम सुनकर ही मुँह में पानी आने लगता है। कार्यालयीन महामानव इन रंगों का इस्तेमाल बरसों से करते आ रहे हैं। जनता नामक नासमझ प्राणी चिल्लाता है कि भैया यह तो भ्रष्टाचार का रंग है, इसे बंद करो। टुटपूँजिये लोग, जिन्हें हमेशा अपने बदरंग कपड़ों की चिंता बनी रहती है, चिल्लायेंगे ही। इन जैसे लोगों की बातों पर अनावश्यक ध्यान देकर भला कोई अपना होली खराब करता है क्या? ऐसे शालीन और शिष्टाचार के रंग को नासमझ लोग भ्रष्टाचार का रंग कहें तो भला कोई क्या करे?

दूसरे काऊण्टर पर अपनी छटा बिखेर रहा है मसाला रंग। इसका निर्माण राजधानियों में होता है। इस रंग के असर के बारे में लोग खासे पूर्वाग्रही हैं। अरे मूढ़ों, मतिमारों, चिल्लाने से क्या होगा कि यह तो घोटाला रंग है। इस्तेमाल करके देखो भी तो। पर आदत है, चिल्लाओ, अपनी बला से। होली के इस हुड़दंग में है कोई, जो तुम्हारी चिल्लाहट सुनेगा?

तीसरे काऊण्टर पर बिक रहे निराले, ऊँचे और उम्दा रंग करा नाम ही निराला रंग है। देश के आला और उम्दा लोगों के लिए इसे बनाया गया है। इसका इस्तेमाल आज तक जनता नहीं, उसके प्रतिनिधि करते रहे हैं। अब इसका विकेन्द्रीकरण किया जा रहा है। जनता की आँखें तो इसकी चमक से पहले ही चुँधियाई हुई है, उन्हें भला इससे क्या लेनादेना? खुद को बुद्धिजीवी और साहित्यकार मानने वाले, गलतफहमी के शिकार, नीरस लोग इस रंग का संबंध अपने किसी पूर्वज से जोड़कर इसके महत्व को कम करने की भूल न करें। हाँ! इसे हवाला का रंग कहकर चाहे जितना विरोध करना हो, करते रहो। हर अच्छी और जनता का भला करने वाली चीज का पहले-पहले विरोध तो होता ही है।

देश के सारे आला और उम्दा लोग इन अनोखे रंगों की स्वीमिंग पूल में पहले ही गले तक डूबे हुए हैं। अब इन रंगों के विकेन्द्रीकरण की योजना का देश की जनता स्वागत करे। अब की बार जमकर होली खेले।

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