शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथाएँ

लघुकथा (1)

श्रद्धांजलि

 

समाचारों से ज्ञात हुआ कि उनकी ह्रदय - गति रुक गयी , परिणाम स्वरूप उनका स्वर्गवास हो गया .

उसके लिए यह घटना किसी अपने को खोने से कम नहीं थी . आज जिस घर को वह अपना निवास कहता है , वह जमीन के उसी, टुकड़े पर बना है जिसकी व्यवस्था उसने वर्षों पहले ,उन्हीं के माध्यम से की थी , भले ही इसे जमीन का रूप एक पुराने तालाब को कचरे से पाट कर किया गया था और बाद में नगर - निगम के बाबू ने उससे दो हजार रूपये बतौर नजराना भी लिए थे .

उसकी दिली इच्छा थी कि वह स्व्यम उनकी अन्तेष्ठी में शामिल होकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करे परन्तु इस उम्र में एक तो वह इतनी बड़ी भीड़ को पार पाने में असमर्थ था और दूसरी बड़ी बात यह भी थी कि इतनी दूर जाने - आने के लिए रेल - किराये का इंतजाम करना भी उसके लिए आसान नहीं था .

उसने तय किया कि वह उनके अंतिम दर्शन टी .वी . पर ही करेगा और यहीं से उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दे देगा .

उनके लिए उमड़े जन-सैलाब को टी . वी .पर देखकर उसका मन फिर से भर आया , वह स्व्यम को रोक नहीं सका और रोने भी लगा . तभी उसने देखा कि उनके मृत शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित करने वालों के चेहरे उसके शहर के उन लोगों से भरे पड़े थे जो या तो सीधे - सीधे अपराधी और लफंगे थे या फिर ऐसे लोगों की मदत करते थे जिनका काम ही कमीशन - खोरी था. इनमे नगर -निगम का वह बाबू भी था जिसने उससे कभी दो हजार रूपये रिश्वत के लिए थे और जिसका शरीर पहले की अपेछा बहुत भारी हो चुका था .इस आदमी की पहुँच शायद टी . वी . वाले तक थी इसीलिए टी . वी .वाले ने टी . वी . पर उसे बोलने का अवसर भी दे दिया था. उसकी आँखों में रुआंसे - पन की लाली छलक रही थी और उसका कंठ भरा था . भरे कंठ से उसने कहा , " साब - जी तो मेरे गाड - फादर थे .आज में जो कुछ भी हुँ उन्हीं की किरपा से बन पाया हुँ . मेरी नौकरी से लेकर धन्धा जमाने तक हर जगह उन्होंने हमेशा अपना हाथ मेरे सर पर रखे रखा . असल में वही तो मेरी जिन्दगी के सभी क्रिया - कलापों के सूत्रधार थे .हम जैसे आम लोग उन जैसे बड़े नेताओं का कर्ज कई जन्मों तक नहीं उतार सकते . "

उस रिश्वत-खोर गंदे आदमी की बेशर्म स्वीकारोक्ति से वह अचम्भित रह गया .उसे अपने शरीर के हर अंग में अचानक थकान महसूस होने लगी . उसी छण उसका सारा विश्वास , अविश्वास में बदल गया .

उसने मन ही मन कहा " अच्छा हुआ जो वह इतनी दूर शोक मनाने नहीं गया ."


 

लघुकथा(2)

कानून

 

भरी बस के साथ ऊमस भरी गर्मी . न्यूट्रल लेकर चालक बार - बार एक्सीलेटर दबाता पर बस को चलाता नहीं था .लोगों से ठुसी हुई बस में उसे अभी और सवारियों की जरूरत थी . होती देर और गर्मी ने मेरी बैचेनी को बढ़ा दिया . इन सब परेशानियों से बेखबर मेरे बगल की सीट पर बैठे दढीयल ने बीड़ी सुलगा ली . पहला कश भरकर जैसे ही उसने धुआं अपनी नाक से बाहर उगला , मुझे लगा कि मेरा दम घुट जायेगा .मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बोला , " मेरे भाई , बस में धूम्र - पान का जुर्माना सौ रूपये लग जाता है ."

उसकी तीखी नजरें मुझे ऐसे घूरने लगीं जैसे मैंने उसके मौलिक अधकारों पर कैंची चला दी हो. उसने मुझे चेताया , " वो देखो ड्राइवर भी तो सूटे मार रहा है , उसे रोकने के बाद मुझे जुर्माने की धमकी देना ."

मैंने ड्राइवर की ओर द्रष्टि फेरी . मुसाफिर की बात ठीक थी .ड्राइवर भी पूरी मस्ती से मुँह में लगी बीड़ी का धूआँ उगल रहा था.

मैं उसे रोकने के लिए अपने स्थान से उठने को हुआ था कि मेरे अचेतन ने मुझे टोक दिया ," ड्राइवर इस बस का सबसे खास आदमी है . अगर मैंने उसे कानून का पाठ पढ़ाने की कोशिश की तो निशचय ही मेरी खिल्ली उड़ेगी .हो सकता है अपमानित भी होना पड़े .क्या पता मुझे बस से ही उतार दिया जाये . पर मेरे बगल में बैठा आम मुसाफिर कानून की परवाह न करे ,यह मुझे हजम नहीं हुई .मैंने कहा ," उसे बाद में देख लेगें .पहले तुम बताओ कि अगर बस में जेब - कतरे सवार होकर सवारियों की जेब काटने लगें तो क्या तुम भी वही करने लगोगे ?"

मुसाफ़िर ने हिकारत - भरी एक और नजर मुझ पर डाली और इत्मिनान से एक और भरपूर सूटा भरकर धुएँ के बादल उगलने के साथ कहा , " हो तो डरपोक पर बातें खूब बना लेते हो .इतनी समझ और पैदा कर लो कि बेमतलब की बातों की कोई अहमियत नहीं होती ........!"

मैं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करता इससे पहले ही वह फिर भन्नाया , " जाओ जुर्माना करने वाले को बुला लाओ ,उससे निबटने के बाद तुमसे भी निबट लेगें ."

मेरी समझ ने तुरन्त काम किया , " मैं चुपचाप बस से उतर कर घर पहुँचने का कोई और साधन ढुंण लूँ तभी मुन्ने का होम - वर्क करवा पाऊँगा , नहीं तो बेइज्जती तय है ."

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद, उत्तरप्रदेश- 201005 E.Mail arorask1951@yahoo.com

3 blogger-facebook:

  1. दूसरी लघुकथा अच्छी है ,दृष्टि वास्तविक,शीर्षक कुछ और भी अच्छा हो सकता था.

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  2. मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित है.amazingmanojuniverse.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा7:31 pm

    धन्यवाद , आपकी टिप्प्णी देर से देखी, आपके ब्लॉग पर भी उपस्थित होऊँगा : सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

    उत्तर देंहटाएं

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