सोमवार, 27 जनवरी 2014

सतीष कुमार यदु की कहानी - ज्ञान अंजोर

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ज्ञान अंजोर

बहुत दिनों पहले की बात है एक गाँव अंधियारखोर था। यहां के ग्रामवासी अनपढ़ व असाक्षर थे। ज्ञान के अभाव में दिन-रात के कारणों, रात्रि-तम से मुक्‍ति की युक्‍ति से सर्वथा अनभिज्ञ थे य किन्‍तु श्रम से जी नहीं चुराते थे। सभी ग्रामवासी प्रत्‍येक दिवस सूर्यास्‍त का अस्‍ताचल में आते ही रात्रि-तम को दूर करने के लिए अपने- अपने घरों से अंधकार ढोनेग्रामीण अंचल में प्रचलित पारंपरिक भार-साधक साधन - टुकना, झउहा, चुरकी (बांस से निर्मित) एवं खनन-यंत्र गैंती, फावड़ा, कुल्‍हाड़ी आदि लेकर निकल पड़ते - अंधकार को दूर भगाने।

अंधियारखोर के प्रत्‍येक बड़े-बंढ़े एवं बच्‍चे रात्रि के अंधकार को बटोरने का उद्यम करते और गाँव की सीमा क्षेत्र के बाहर फेंक आने का नियमित व निरंतर किन्‍तु निरर्थक प्रयास करते रात्रि के पहर-दर-पहर बीतने पर चन्‍द्रमा के उजलापन में उत्‍तरोत्‍तर वृध्‍दि से अंधकार के मध्‍दिम होता, सूर्य का उदयाचल में होने से शनैः-शनैः पौ फटता और सभी श्रम-दान कर रहे ग्रामीण सुबह की पहली किरण देख फूले नहीं समाते थे।

जब रात्रि के अंधकार को चीर कर पूरब से सूरज की किरणें अंधियारखोर की वादी में सुनहरे प्रकाश फैला देती य काल की गति से अंधकार के बाद पुनः जब रवि-रश्‍मि, अंचल को प्रकाशित कर देता, ग्रामवासी अंधकार का अंत होना अपनी रात भर की ईमानदारी से की गई कड़ी मेहनत का प्रतिफल मानकर बेहद खुश होते। अंधकार मिटाने के लिए ग्रामीणों का यह मेहनत-मशक्‍कत उनके नित-दिन की दिनचर्या में शामिल थी।

एक दिन की बात है अंधियारखोर के निवासी अंध-भक्‍त के सुपुत्र का ज्ञानोदय का विवाह ''अंधरीकछार'' की ज्ञानदेवी से वैदिक परम्‍परानुकुल समारोहपूर्वक सम्‍पन्‍न हुआ। ग्रामीण खुश थे कि दो '' दो हाथ'' और मिल गए थे रात्रि के अंधेरापन से लड़ने।

विवाहोपरान्‍त शाम होते ही गाँव की युवतियाँ नई-नवेली दुल्‍हन के पास पहुँचकर '' मुँह दिखाई ''(रस्‍म) के लिए चुरकी भेंट की और लगे हाथ अंधकार को ढ़ोने के लिए श्रमदान हेतु चलने का न्‍यौता भी दे डाली। साक्षर नवोढ़ा दुल्‍हन को उनकी बात कुछ अटपटी सी लगी फिर वस्‍तुथिति भांप करमुस्‍करा उठती है। वह तत्‌पश्‍चात्‌ ग्रामीण युवतियों की समझाती है, '' संपूर्ण ग्रामीण जनों का कठिन परिश्रम निरर्थक है, रात्रि के बाद दिन का होना प्रकृति का शाश्‍वत नियम है। अंधेरा दूर भगाने के लिए श्रम ही नहीं ज्ञान की भी आवश्‍यकता होती है। '' ज्ञानदेवी ने आगे बताया - '' यह साक्षरता की चमक से संभव है कहती हुई घर से कुछ कपास लेकर बाती (बत्‍ती) बनाती है और उसे तेल में लेकर जलाती है, चारों ओर प्रकाश फैल जाता है। अंधियारखोर जगमगा उठता है जो कार्य घण्‍टों की मेहनत से पूरे ग्रामवासी नही कर पाते थे ''नई-बहू'' ने चुटकी बजाते ही कर दिया। गाँव में यह खबर आग की तरह फैल गई।

सभी ग्रामीण सुखद आश्‍चर्य से अभिभूत होकर अंधकार मिटाने का राज जानने आतुरता से ज्ञानदेवी के पास एकत्रित होने लगे। ज्ञानदेवी ने सर्वजनों कोे संबोधित करते हुए ज्ञान की बात बताई - ''श्रम के साथ-साथ ज्ञान आवश्‍यक है। हम ग्रामीणी में श्रम-शिक्‍ तो कूट-कूट कर भरी हुई है, किन्‍तु निरक्षरता के कारण किसी कार्य को तरतीब एवं आसान तरकीब से नहीं कर पाते है। निरक्षता के अंधकार को गाँव से मिटाने हम ज्ञान-गुढ़ी (साक्षरता केन्‍द्र) स्‍थापित करेंगे। मैं आप सभी को ज्ञान दान देकर ज्ञानदेवी नाम को चरितार्थ करते हुए नारी धर्म को निभाउंगी जिससे प्रत्‍येक माँ अपने घर में ज्ञान-दीप जला सके।

दूसरे दिस अंधियारखोर में सूरज नव-विहान लेकर उदित हुआ। सतत्‌ शिक्षा रुपी नई आशा की किरणें लेकर आई। सभी ग्रामीण सोल्‍लास ज्ञान-गुढ़ी की ओर अग्रसर हो रहे है। नर्द बहू ज्ञानदेवी ज्ञानदूत के रुप में ज्ञान-गुढ़ी में ज्ञान ज्‍योति जगाने में लगी हुई है।''

कहते हैं तब से ही साक्षरता के लिए भागीरथ प्रयत्‍न का शुभारंभ हुआ जो आज एक जन अभियान का रुप ले चुकी है। बापू का सपना '' ग्राम-सुराज '' को साकार करती अंधियारखोर ग्राम आज साक्षरता रुपी सूरज की रोशनी से नहीं कर ज्ञान अंजोर के सोपान चढ़ रहा है।

सतीष कुमार यदु (ब्‍याख्‍याता)

कवर्धा (छत्‍तीसगढ़)

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