सोमवार, 13 जनवरी 2014

ज्योतिर्मयी पंत की कहानी - मकर संक्रांति

मकर संक्रांति (घुघुती त्यौहार )


रिया पहली बार भारत आई थी .उसके माता पिता किसी कारण अभी साथ नहीं आ पाये थे .अतः उनके आने तक रिया अपने दादा दादी के पास अपने पैतृक गाँव आ गयी थी .रिया के लिए सभी कुछ नया -नया सा था .वह हर बात और वस्तु को बहुत गौर से जाँच परख रही थी .आज सुबह जैसे ही वह उठी तो दादी ने उसे जल्दी से नहा कर आने को कहा .बाहर ठण्ड भी थी पर उसने मना नहीं किया .जैसे ही वह तैयार होकर आई .दादी ने उसे रोली से तिलक किया,नए कपडे पहनाये और उसके गले में एक लम्बी सी माला डाल दी ..वह हैरान सी हो गई अभी तक उसने फूलों की मालाएँ ही देखी थी पर इस माला में तो एक भी फूल नहीं था बल्कि मीठे आटे से बने हुए शक्करपारे, पूरियाँ , ढाल -तलवार ,अनार के फूल ,चिड़िया(घुघुत) के आकार के पकवान ,संतरे ,गन्ने के टुकड़े,बड़े , और ताल मखाने गुँथे हुए थे .

दादी उसका हाथ पकड़ पर आँगन में ले आई .उसने देखा आस पास के सभी घरों में बच्चे इसी तरह की माला पहने अपने घरों की छत या आँगन में खड़े थे और अपनी माला से इन पकवानों के टुकड़े तोड़ -तोड़ कर उछाल रहे थे.वे कौओं को आवाज़ दे दे कर बुला रहे थे कि वे इन पकवानों को खाएँ और उनके बदले में उन्हें कुछ वरदान भी दे जाएँ .

सभी समवेत स्वरों में कुछ गा भी रहे थे ...
दादी भी उसे यह बोल सिखा रही थी ...
काले कौआ काले
घुघुत की माला खाले
ले कौआ बड़ा
मुझे देना सोने का घड़ा
ले कौआ फूलो
मुझे दे दूल्हो
ले कौआ तलवार
मुझे दे सुन्दर परिवार ......आदि .


इसी तरह तुक बंदी के साथ बच्चे गाते ,ख़ुशी से खिलखिला रहे थे .किसने अधिक कौओं को खिलाया यह भी प्रतियोगिता सी चल रही थी .बाद में गाँव के सभी घरों में इस तरह की मालाओं का उपहार स्वरुप आदान -प्रदान भी .नवजात शीशों या जिनका अन्नप्राशन नहीं हुआ हो उनके लिए.मखाने , किशमिश आदि मेवों की मालाएँ बनी थी .
रिया को तो यह सब एक स्वप्न जैसा लग रहा था उसकी जिज्ञासा को शांत करने दादी ने बताया .".रिया बेटी आज मकर संक्रांति है .यह बहुत बड़ा धार्मिक पर्व है .ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आज सूर्य देव मकर राशि में आते हैं और उत्तरायण शुरु होता है .हमारे यहाँ यह एक बाल पर्व भी माना जाता है .तुम्हें कौओं की इस आवभगत से अचरज हो रहा हैं न ...इसके भी कई कारण हैं .एक मान्यता है की इस पावन पर्व पर देव पितर आदि रूप बदलकर पृथ्वी पर आते हैं .


दूसरा कौआ बहुत मेहनती और चतुर पक्षी है .वैसे भी हमारी संस्कृति में सभी पशु पक्षियों से प्रेम की शिक्षा दी गयी है .


मकर संक्रांति पूरे देश में अलग अलग तरीकों से मनाई जाती है .उत्तराखंड में इसे घुघुतिया त्यौहार के नाम से जाना जाता है . लोक कथा है ...प्राचीन समय में एक राजा था उसका घुघुतिया नामक मंत्री राजा के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा था .एक कौए ने इस की सूचना राजा को देदी .मंत्री को दण्डित किया गया .तब राजा के आदेश से कौओं को पकवान खिलाने की प्रथा चल पड़ी .


घुघुती एक कबूतर सा पक्षी है जो यहाँ के जन मानस गीत संगीत और लोक कथाओं की आत्मा है .भाई बहन के स्नेह को   दर्शाती कथा में भाई से न मिल पाने की व्यथा में एक स्त्री ने प्राण त्याग दिए और वह घुघुती बन गई थी .इस कारण भी इस त्यौहार को घुघुतिया कहा जाता है ......दादी न जाने क्या- क्या बताती जा रही थी ....रिया की कल्पना में वे साकार हो रही थीं .


रिया बहुत खुश थी. दादी के साथ कितना कुछ सीखने को मिल रहा है और वहाँ अमेरिका के एक शहर में सब अपने आप में व्यस्त .सुबह से शाम तक मम्मी पापा ऒफ़िस .वह स्कूल और घर में खिलौनों... कम्प्यूटर के साथ .....मम्मी पापा भी इन बातों को भूल गए या पैसा कमाने की धुन में फुर्सत ही नहीं ....बच्चों का भी उनके समय में हक़ होना चाहिए .कुछ पूछने और जानने का ...


रिया सोच रही थी अब मम्मी पापा आयें तो ...या तो दादी भी साथ चलेगी या फिर वह यहाँ रहेगी ..इस संक्रांति से वह अपनी संस्कृति से जुड़ कर रहेगी ....


ज्योतिर्मयी पंत

3 blogger-facebook:

  1. kale koye kale ghughat ki mala khale aanclik bhasha ka achcha prayog kiya hai

    उत्तर देंहटाएं
  2. दीपक दुमका4:59 am

    बहुत सुन् दर

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------